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जवाहर लाल नेहरू के निधन पर 29 मई 1964 को लोकसभा में दिया गया अटल बिहारी वाजपेयी का भाषण

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Nehru-Vajpayee

जवाहर लाल नेहरू के बारे में आये-दिन दुष्प्रचार करने वाली बीजेपी के मौजूदा नेतृत्व में स्थापित मूर्खों को पता ही नहीं है कि उनके ही युगपुरुष और आदर्श, अटल बिहारी वाजपेयी ने नेहरू के निधन पर संसद में क्या भाषण दिया था? सार्वजनिक जीवन की वैसी शालीनता से मौजूदा भगवा ख़ानदान का कहीं दूर-दूर तक का कोई नाता नज़र नहीं आता। इसके भी अधिक अफ़सोस की बात ये है कि मौजूदा भगवा-सम्प्रदाय, प्रमाणिक इतिहास को विकृत करके अपनी और देश ही मौजूदा तथा आगामी पीढ़ियों को भ्रमित कर रहा है। अफ़ीम चाटकर लोट रहे उसके निपट मूर्ख और अज्ञानी भक्त उसी डाल यानी देश के गौरवपूर्ण इतिहास को काटने पर आमादा हैं, जिस पर वो बैठे हैं।

बहरहाल, जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु पर 29 मई 1964 को लोकसभा में जिन शब्दों में अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें याद किया, उसे अवश्य पढ़ना चाहिए। ताकि हम ये समझ सकें कि वाजपेयी को अपना पितृपुरुष बताने वाले आज के सत्ताधारी और उनके मूढ़ समर्थक सत्ता की ख़ातिर कितने नीचे गिरकर नेहरू को लांछित और अपमानित करने का शर्मनाक अभियान चलाते रहते हैं।

अध्यक्ष महोदय,

एक सपना था जो अधूरा रह गया। एक गीत था जो गूँगा हो गया। एक लौ थी जो अनन्त में विलीन हो गयी। सपना था, एक ऐसे संसार का, जो भय और भूख से रहित होगा। गीत था, एक ऐसे महाकाव्य का, जिसमें गीता की गूँज और गुलाब की गन्ध थी। लौ थी, एक ऐसे दीपक की, जो रात भर जलता रहा, हर अँधेरे से लड़ता रहा और हमें रास्ता दिखाकर, एक प्रभात में निर्वाण को प्राप्त हो गया।

मृत्यु ध्रुव है। शरीर नश्वर है। कल, कंचन की जिस काया को हम चंदन की चिता पर चढ़ाकर आये, उसका नाश निश्चित था। लेकिन क्या यह ज़रूरी था कि मौत इतनी चोरी छिपे आती? जब संगी-साथी सोये पड़े थे, जब पहरेदार बेख़बर थे, तब हमारे जीवन की एक अमूल्य निधि लुट गयी। भारत माता, आज शोकमग्ना है – उसका सबसे लाड़ला राजकुमार खो गया। मानवता, आज खिन्नमना है – उसका पुजारी सो गया। शान्ति, आज अशान्त है – उसका रक्षक चला गया। दलितों का सहारा छूट गया। जन-जन की आँख का तारा टूट गया। यवनिका पात हो गया। विश्व के रंगमंच का प्रमुख अभिनेता अपना अन्तिम अभिनय दिखाकर अन्तर्ध्यान हो गया।

महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में भगवान राम के सम्बन्ध में कहा है कि वे असम्भवों के समन्वय थे। पंडितजी के जीवन में महाकवि के उसी कथन की एक झलक दिखाई देती है। वह शान्ति के पुजारी, किन्तु क्रान्ति के अग्रदूत थे; वे अहिंसा के उपासक थे, किन्तु स्वाधीनता और सम्मान की रक्षा के लिए हर हथियार से लड़ने के हिमायती थे। वे व्यक्तिगत स्वाधीनता के समर्थक थे किन्तु आर्थिक समानता लाने के लिए प्रतिबद्ध थे। उन्होंने समझौता करने में किसी से भय नहीं खाया, किन्तु किसी से भयभीत होकर समझौता नहीं किया। पाकिस्तान और चीन के प्रति उनकी नीति इसी अद्भुत सम्मिश्रण की प्रतीक थी। उसमें उदारता भी थी, दृढ़ता भी थी। यह दुर्भाग्य है कि इस उदारता को दुर्बलता समझा गया, जबकि कुछ लोगों ने उनकी दृढ़ता को हठवादिता समझा।

मुझे याद है, चीनी आक्रमण के दिनों में जब हमारे पश्चिमी मित्र इस बात का प्रयत्न कर रहे थे कि हम कश्मीर के प्रश्न पर पाकिस्तान से कोई समझौता कर लें, तब एक दिन, मैंने उन्हें बड़ा क्रुद्ध पाया। जब उनसे कहा गया कि कश्मीर के प्रश्न पर समझौता नहीं होगा तो हमें दो मोर्चों पर लड़ना पड़ेगा तो वो बिगड़ गये और कहने लगे कि अगर आवश्यकता पड़ेगी तो हम दोनों मोर्चों पर लड़ेंगे। किसी दबाव में आकर वो बातचीत करने के खिलाफ़ थे।

महोदय,

जिस स्वतंत्रता के वे सेनानी और संरक्षक थे, आज वह स्वतंत्रता संकटापन्न है। सम्पूर्ण शक्ति के साथ हमें उसकी रक्षा करनी होगी। जिस राष्ट्रीय एकता और अखंडता के वे उन्नायक थे, आज वह भी विपदग्रस्त है। हर मूल्य चुकाकर हमें उसे कायम रखना होगा। जिस भारतीय लोकतंत्र की उन्होंने स्थापना की, उसे सफल बनाया, आज उसके भविष्य के प्रति भी आशंकाएँ प्रकट की जा रही हैं। हमें अपनी एकता से, अनुशासन से, आत्म-विश्वास से, इस लोकतंत्र को सफल करके दिखाना है। नेता चला गया। अनुयायी रह गये। सूर्य अस्त हो गया। तारों की छाया में हमें अपना मार्ग ढूँढना है। यह एक महान परीक्षा का काल है। यदि हम सब अपने को समर्पित कर सकें, एक ऐसे महान उद्देश्य के लिए जिसके अन्तर्गत भारत सशक्त हो, समर्थ और समृद्ध हो और स्वाभिमान के साथ विश्व शांति की चिरस्थापना में अपना योग दे सके तो हम उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करने में सफल होंगे। संसद में उनका अभाव कभी नहीं भरेगा। शायद, तीन मूर्ति को उन जैसा व्यक्ति कभी भी अपने अस्तित्व से सार्थक नहीं करेगा। वह व्यक्तित्व, वह ज़िन्दादिली, विरोधी को भी साथ लेकर चलने की वह भावना, वह सज्जनता, वह महानता शायद निकट भविष्य में देखने को नहीं मिलेगी। मतभेद होते हुए भी उनके महान आदर्शों के प्रति, उनकी प्रमाणिकता के प्रति, उनकी देशभक्ति के प्रति, और उनके अटूट साहस के प्रति हमारे हृदय में आदर के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं उस महान आत्मा के प्रति अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।

— अटल बिहारी वाजपेयी, 29 मई 1964, लोकसभा

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बस, एक-एक बार ही जीते विश्वास और अविश्वास

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No-trust motion Parliament

संसदीय लोकतंत्र में ऐसे अनोखे मौक़े भी आते हैं जब विश्वास या अविश्वास का मतलब एक ही होता है! सरकार को गिराने के लिए अविश्वास और बचाने के लिए विश्वास प्रस्ताव लाया जाता है। विपक्ष का प्रस्ताव सरकार के प्रति अविश्वास और गुस्सा दिखाने के लिए होता है तो प्रधानमंत्री का प्रस्ताव अपने लिए विश्वास की दुहाई माँगता है! दोनों से सरकार की ताक़त और उसकी क़िस्मत तय होती हैं। दोनों से बहुमत की जाँच होती है। दोनों लोकसभा के एक ही नियम से संचालित होते हैं।

विश्वास और अविश्वास को मिलाकर, लोकसभा में अब तक 27 बार शक्ति-परीक्षण के मौके आये हैं। विपक्ष की ओर से 20 बार अविश्वास प्रस्ताव लाये गये। लेकिन वो सिर्फ़ एक बार ही सरकार गिरा पाया। जुलाई 1979 में मोरारजी देसाई को अपने ख़िलाफ़ पेश हुए अविश्वास प्रस्ताव के पारित होने पर इस्तीफ़ा देना पड़ा। दूसरी ओर, अब तक 7 बार प्रधानमंत्रियों को विश्वास मत पेश करना पड़ा है। इसमें से 6 बार उन्हें हार मिली। जुलाई 2008 में विश्वास मत जीतने वाले मनमोहन सिंह एकलौते प्रधानमंत्री बने।

प्रथम अविश्वास प्रस्ताव की नौबत तीसरी लोकसभा में आयी। अगस्त 1963 में समाजवादी नेता आचार्य जेबी कृपलानी ने प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया। वो चार दिनों तक चली 21 घंटे लम्बी बहस के बाद गिर गया। लाल बहादुर शास्त्री ने भी अपने छोटे कार्यकाल के बावजूद तीन बार अविश्वास प्रस्तावों को नाकाम किया। सबसे ज़्यादा अविश्वास प्रस्तावों के सामने अडिग रहने का कीर्तिमान इन्दिरा गाँधी के नाम है। उन्होंने 15 बार अविश्वास प्रस्तावों को परास्त किया। 1966 से 1975 के बीच 12 बार और 1981 से 1982 के दरम्यान तीन बार।

मोरारजी देसाई ने दो बार शक्ति-परीक्षण का सामना किया। 1977 में उन्होंने पहला विश्वास प्रस्ताव जीता था। लेकिन 1979 में दूसरे अविश्वास प्रस्ताव पर लोकसभा में वोटिंग की नौबत आने से पहले जब मोरारजी ने पाया कि वो बहुमत गँवा बैठे हैं तो उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया। वो पहला मौक़ा था जब अविश्वास प्रस्ताव पारित होने की वजह से सरकार गिरी थी। बाक़ी जितनी भी सरकारें अपना कार्यकाल पूरा करने से पहले गिरीं, वो सभी विश्वास प्रस्तावों के पारित नहीं होने से सत्ता से बाहर हुई थीं।

पहली बार जुलाई 2008 में मनमोहन सिंह की ओर से लाया गया विश्वास प्रस्ताव लोकसभा में पारित हुआ। जबकि उससे पहले पेश हुए तीन विश्वास प्रस्तावों को नकारा जा चुका था। 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह, 1997 में एचडी देवेगौड़ा और 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी के विश्वास प्रस्ताव लोकसभा ने पारित नहीं किये। तीन मौके ऐसे भी रहे जब प्रधानमंत्री ने अपने विश्वास प्रस्ताव पर मत-विभाजन यानी वोटिंग की नौबत आने से पहले ही इस्तीफ़ा दे दिया। जुलाई 1979 में मोरारीजी देसाई, अगस्त 1979 में चौधरी चरण सिंह और मई 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी ने विश्वास प्रस्ताव पर मतदान होने से पहले इस्तीफ़ा दे दिया था।

नरसिम्हा राव ने तीन बार और राजीव गाँधी तथा अटल बिहारी वाजपेयी की सरकारों को एक-एक बार अविश्वास प्रस्ताव को हराने का मौक़ा मिला। वाजपेयी ने 17 अप्रैल 1999 को एक वोट से अपने विश्वास प्रस्ताव पर हार का मुँह देखा। लेकिन चार साल बाद 2003 में उनके ख़िलाफ़ पेश हुआ अविश्वास प्रस्ताव पारित नहीं हुआ।

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ज़रा हटके

अब कौन कहेगा, ‘ऐ भाई! जरा देख के चलो’

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Gopaldas Neeraj

नई दिल्ली, 19 जुलाई | ‘लिखे जो खत तुझे‘, ‘ऐ भाई! जरा देख के चलो‘, ‘दिल आज शायर है‘, ‘जीवन की बगिया महकेगी‘, ‘खिलते हैं गुल यहां’ जैसे मशहूर गानों के जरिए लोगों के दिलों में जगह बनाने वाले हिंदी के प्रख्यात गीतकार और कवि गोपाल दास नीरज 93 वर्ष की उम्र में गुरुवार को दुनिया छोड़ चले, लेकिन ऐसा जिंदादिल कवि कभी मरता है क्या!

उत्तर प्रदेश के इटावा जिले स्थित पुरवली गांव में 4 जनवरी, 1925 को जन्मे गोपाल दास नीरज जब छह वर्ष के थे, तभी उनके पिता का देहांत हो गया था। सन् 1942 में एटा से हाईस्कूल परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास करने के बाद उन्होंने इटावा की कचहरी में कुछ समय टाइपिस्ट का काम किया। उसके बाद सिनेमाघर की एक दुकान पर नौकरी की, लेकिन लिखने की कला अपने हाथ में समेटे गोपाल दास लंबी बेकारी के बाद दिल्ली आ गए।

दिल्ली आकर उन्होंने सफाई विभाग में टाइपिस्ट की नौकरी की। वहां से नौकरी छूट जाने पर कानपुर के डीएवी कॉलेज में क्लर्की की। फिर बाल्कट ब्रदर्स नाम की एक प्राइवेट कंपनी में पांच साल तक टाइपिस्ट का काम किया। नौकरी करने के साथ प्राइवेट परीक्षाएं देकर 1949 में 12वीं, 1951 में बीए और 1953 में प्रथम श्रेणी में हिंदी से एमए पास किया।

Image result for neeraj poet पद्मभूषण सम्मान

‘दर्द दिया है’, ‘आसावरी’, ‘बादलों से सलाम लेता हू’ं, ‘गीत जो गाए नहीं’, ‘कुछ दोहे नीरज के’, ‘नीरज की पाती’ जैसे रचना संग्रह, ‘तमाम उम्र मैं इक अजनबी के घर में रहा’, ‘हम तेरी चाह में, ऐ यार! वहां तक पहुंचे’, ‘अब तो मजहब कोई ऐसा भी चलाया जाए’, ‘दूर से दूर तलक एक भी दरख्त न था’ , ‘पीछे है बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिये’ जैसी गजलें लिखने वाले मशहूर कवि और गीतकार गोपाल दास नीरज को 1991 में पद्मश्री और 2007 में पद्मभूषण सम्मान से भी नवाजा गया था।

उत्तर प्रदेश सरकार ने भी यश भारती सम्मान से सम्मानित कर उनके दमदार लेखनी को सराहा था। बॉलीवुड फिल्मों में कई सुपरहिट गाने लिखकर अपना लोहा मनवाया था। उन्हें उनकी लेखनी के लिए कई बार सम्मानित किया गया था। उन्होंने तीन बार फिल्म फेयर अवार्ड भी अपने नाम किया था।

हिंदी मंचों के प्रसिद्ध कवियों में शुमार नीरज को अंतिम दिनों में सांस लेने में तकलीफ हो रही थी, जिस कारण मंगलवार को तबीयत बिगड़ने के बाद आगरा के लोटस हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था, लेकिन तबीयत ज्यादा खराब होने पर उन्हें एम्स लाया गया, हालांकि बुधवार को तबीयत में सुधार की भी खबरें आई थीं, लेकिन अगले दिन नीरज ने दुनिया को अलविदा कह दिया। उनके लाखों चाहने वालों का दिल आज रोएगा बहुत, उनकी प्रसिद्ध कविता ‘रोने वाला ही गाता है’ सबको ढाढस बंधाएगी। कवि कभी मरता नहीं, नीरज सदियों अपनी रचनाओं के रूप में जीवित रहेंगे। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि!!!

–आईएएनएस

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ज़रा हटके

ग्रेटर नोएडा : इमारत में इसी सप्ताह हुआ था ‘गृह प्रवेश’

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Greater Noida building collapse

ग्रेटर नोएडा, 18 जुलाई (आईएएनएस)| ग्रेटर नोएडा में मंगलवार रात धराशायी हुई इमारत में हाल ही में अपनी मां के साथ रहने आए शिव त्रिवेदी (25) ने इसी सप्ताहांत गृह प्रवेश की पूजा आयोजित की थी। उनके सपनों के घर को सजाने के लिए उनकी साली अपने एक वर्षीय बच्चे के साथ यहीं रुक गईं थीं।

बुधवार को वे सभी एक बहुमजिला इमारत के उनकी इमारत के ऊपर ढहने से उसके मलवे में फंसे थे और इसमें उनके जीवित नहीं रहने की संभावना है।

दर्जनों बचाव कर्मी मलबे को हटाने के लिए क्रेनों और बुलडोजरों का इस्तेमाल कर रहे हैं। दूर रोते हुए खड़े त्रिवेदी परिवार के सदस्य मलवे में फंसे चारों लोगों के जीवन की प्रार्थना कर रहे थे।

Greater Noida Building

नोएडी की एक कंपनी में शाखा प्रबंधक शिव उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में रह रहे अपने माता-पिता के दो बेटों में छोटे हैं। तीन साल पहले बेहतर जीवन की तलाश में वे नोएडा रहने लगे थे।

उनके पिता ने कहा कि शिव परिवार के लिए आशा की किरण है और हमेशा से ही होनहार रहे हैं।

शिव ने दिल्ली आने के मात्र तीन सालों के अंदर इसी मार्च में ये घर खरीदा था।

शिव के एक चाचा ने आईएएनएस को बताया, “उसने काफी कम उम्र में बहुत कुछ हासिल कर लिया था। मेरी आयु 50 है और मैं अपने परिवार के लिए घर नहीं खरीद सकता। लेकिन उसने मात्र 25 वर्ष की आयु में घर खरीद लिया।”

उन्होंने अपने कार्यालय में आखिरी बार मंगलवार को रात लगभग 8.50 बजे बात की थी। लेकिन उसके बाद से उनसे संपर्क नहीं हो सका क्योंकि वे इस हादसे का शिकार हो गए। उनकी इमारत दिल्ली के व्यावसायिक केंद्र कनॉट प्लेस से लगभग 30 किलोमीटर दूर स्थित है।

शिव के पिता, बड़े भाई, दो चाचा, चचेरे भाई और अन्य करीबी रिश्तेदार बुधवार सुबह तक घटनास्थल पर पहुंच गए थे।

शिव के भाई राम त्रिवेदी (27) ने आईएएनएस को बताया, “मुझे विश्वास है कि वे मलबे में हैं और उनके जीवित होने का भी पूर्ण विश्वास है लेकिन उन्हें जल्दी निकाले जाने की जरूरत है।”

पेशे से वकील राम ने कहा कि शिव ने शनिवार को गृह प्रवेश पूजा का आयोजन किया था जिसके बाद शिव की मां, साली और उनकी एक वर्षीय बेटी को छोड़कर लगभग सभी लोग मैनपुरी चले गए थे। ये लोग नए घर में कुछ दिन उनके साथ रहने और घर को व्यवस्थित करने के लिए यहीं रुक गए थे।

विचलित राम ने बैठने से मना कर दिया, इस दौरान वे मुट्ठी बांधे लगातार मलबे की तरफ देख रहे थे।

परिजनों ने आरोप लगाया कि इमारत के निर्माण में बिल्डर ने घटिया निर्माण सामग्री का उपयोग किया था। उन्होंने बचाव अभियान के देर से शुरू होने की भी शिकायत की, जिससे इमारत में फंसे हुए लोगों के जीवित बचने की उम्मीद कम हो गई है।

शिव के एक रिश्तेदार ने क्षेत्र में नियमों में ढिलाई का आरोप लगाते हुए कहा, “इतना समय हो गया है और हमारे परिवार का अभी तक कोई पता नहीं लगा है। उन्होंने अगर रात में ही बचाव अभियान शुरू किया होता तो मेरे परिवार को बचाया जा सकता था।”

–आईएएनएस

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