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कहीं आपको गोपाल में कसाब तो नहीं दिख रहा?

भूलकर भी दिमाग़ में ये विचार नहीं लाएँ कि कसाब और गोपाल का मतलब एक ही है। आख़िर, एक मुसलमान और दूसरा हिन्दू जो है।

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Ram Bhakt Gopal and Kasaab

दोनों तस्वीरों में पोशाक के सिवाय बहुत सी समानता है। कसाब, आतंकवादी है। मुसलमान है। ग़ुमराह है। लेकिन गोपाल, राष्ट्रभक्त है। हिन्दू है। सच्चाई की राह पर है। दोनों के हाथ में बन्दूक है। दोनों ने इसे मासूम और निहत्थे लोगों के ख़िलाफ़ उठा रखा है। लेकिन दोनों इंसानियत के दुश्मन नहीं हैं। क्योंकि एक हिन्दू है तो दूसरा मुसलमान। एक, इस देश का जन्मजात नागरिक है और दूसरा नामुराद घुसपैठिया। दोनों अपने आकाओं के प्रति वफ़ादार हैं। वफ़ादारी की ख़ातिर अपना सर्वस्व न्यौछावर करने पर आमादा हैं। हर क़ीमत चुकाने को तैयार हैं।

देश को ऐसे दिन यूँ ही देखने को नहीं मिले। भगवा नेताओं ने इसे बड़े जतन और पीढ़ियों के ख़ून-पसीने तथा बलिदान, त्याग और तपस्या से सींचा है! रोहित की आत्महत्या, अख़लाक़ और पहलू ख़ान पर सड़क पर दी गयी सज़ा-ए-मौत, जेएनयू के धड़ल्ले से घूमते नक़ाबपोश हमलावर अब गोपाल के रूप में दिख रहे हैं। इन्हें परिपक्व होने में वक़्त लगा है। इन्हें WhatsApp University की अपार सामग्री से वैसे ही लम्बी प्रक्रिया के बाद सिझाया गया है, जैसे अचार को तेल में डुबोकर धूप की नरम आँच पर महीनों तक पकाया जाता है।

कसाब के मामले में किसी सबूत की ज़रूरत नहीं थी। फिर भी क़ानून का पेट भरने में क़रीब चार लग गये। उसका तो भारत में कोई हमदर्द भी नहीं था। लेकिन गोपाल के मामले में ऐसा थोड़े ही होगा। आख़िर उसे हिन्दू और भारतीय होने का क्या तब भी कोई फ़ायदा नहीं मिलेगा, जब केन्द्र में मोदी और शाह हों तथा उसके गृह राज्य में हिन्दू हृदय सम्राट हों! लानत है अगर इनके राज में किसी सिरफिरे हिन्दू का बाल भी बाँका हो जाए! गोपाल को बचाने की शुरुआत हो चुकी है। सबसे पहले तो उसकी तस्वीर पर मास्क या काली पट्टी लगाकर उसकी पहचान को धूमिल किया गया। अब उसे नाबालिग़ और मानसिक रूप से असामान्य या विक्षिप्त ठहराये जाने के लिए फ़र्ज़ी काग़ज़ात गढ़े जाएँगे।

उधर, पुलिसिया जाँच का ढोंग जारी रहेगा। महीनों की जाँच के बाद भी पुलिस को चश्मदीद नहीं मिलेंगे। सालों-साल तक आरोप-पत्र दाख़िल नहीं होगा। फिर कोई अदालत, पुलिस को फटकारेगी तो आरोप-पत्र की लीपापोती की जाएगी। इसके बाद अदालत में लम्बी-लम्बी तारीख़ें लगेंगी। क्योंकि मौजूदा सरकारें तो किसी भी सूरत में मामले को किसी फास्ट ट्रैक कोर्ट के हवाले नहीं करेंगी। यदि कर भी दिया तो सालों-साल ज़मानत का खेल चलेगा। गोपाल को अब एक से एक बीमारी होगी ताकि वो हिरासत का दौर अस्पताल में काट सके। ऐसा किये बग़ैर उसे पॉलिटिक्स एक्टिविस्ट का दर्ज़ा नहीं दिया जा सकता। इस दर्ज़े के बग़ैर गोपाल का वैसा महिमा मंडन कैसे होगा, जैसा आज गोडसे या बुरहान वानी का होता है।

कुलमिलाकर, दो-तीन दशकों तक चलने वाली मुक़दमेबाज़ी के बाद गोपाल को सांकेतिक सज़ा भी मिल गयी तो ग़नीमत है। कोर्ट में साबित किया जाएगा कि जिस शादाब को गोपाल की पिस्टल से निकली गोली से जख़्मी बताया जा रहा है, वो गोली उस पिस्टल से चली ही नहीं थी, बल्कि वो तो किसी और तमंचे से निकली थी। ये ना हुआ तो ये स्टोरी गढ़ी जाएगी कि गोपाल का मक़सद हमला करने का नहीं, बल्कि तमंचा दिखाकर लोकतांत्रिक विरोध जताने का था क्योंकि बेचारा शाहीन बाग़, जामिया और जेएनयू के टुकड़े-टुकड़े गैंग, शारजील और कन्हैया की कहानियों से बदहवास हो चुका था।

ऐसे विचित्र अफ़साने देश में पहले से मौजूद हैं। सभी जानते हैं कि जोधपुर में सिने-हस्तियों के हाथों में बन्दूक देखकर काले हिरण से साँस रोककर प्राण त्याग दिये। मुम्बई में भी सलमान ख़ान की गाड़ी के नीचे लेटकर जिस वक़्त पाँच लोगों ने मौत का आलिंगन किया उस वक़्त उसे कोई नहीं चला रहा था। बेचारी कार मृतकों का माथा चूमने के लिए मचलती हुई फुटपाथ पर जा पहुँची थी।

इसीलिए, यदि किसी भी वजह से आपके जेहन में ये सवाल अब भी कौंध रहा हो कि कसाब और गोपाल, एक ही हैं तो कृपया किसी अच्छे मनोचिकित्सक से परामर्श लें। नागपुर में प्रशिक्षित समाज सेवक भी आपके लिए बहुत उपयोगी हो सकते हैं, क्योंकि उन्हें गाँधी की हत्या को सही ठहराने, गोडसे की पैरवी करने और सावरकर को भारत रत्न से सम्मानित करने की माँग करने का कालजयी अनुभव है। भूलकर भी दिमाग़ में ये विचार नहीं लाएँ कि कसाब और गोपाल का मतलब एक ही है। आख़िर, एक मुसलमान और दूसरा हिन्दू जो है। अब हिन्दुस्तान के लिए ये कोई मामूली विशेषता नहीं है! संविधान जाए भाड़ में!

ओपिनियन

आख़िर, ये शपथ है क्या बला!

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oath taking ceremony

संवैधानिक पदों का दायित्व सम्भालने वालों के लिए संविधान में पद और गोपनीयता की शपथ लेने का विधान बनाया गया है। संविधान के अनुच्छेद 60, 69, 75(4), 99, 124(6), 148(2), 159, 164(3), 188 और 219 में इसका बाक़ायदा ज़िक्र है। इसका सम्बन्ध राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केन्द्रीय मंत्री, स्पीकर, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के चीफ़ जस्टिस और जजों, सांसदों, विधायकों और सीएजी के पदों से है। संवैधानिक पद होने के बावजूद संघ लोक सेवा आयोग के सदस्यों, राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्यों, चुनाव आयुक्तों, एटार्नी जनरल और एडवोकेट जनरल को शपथ-विधि से नहीं जोड़ा गया है। जिन पदों पर शपथ ग्रहण की अनिवार्यता है, उनके लिए शपथ की शब्दावली क्या होगी? इसका ब्यौरा संविधान के थर्ड शिड्यूल में प्रोविज़न I से लेकर VIII तक में अलग से भी दोहराया गया है।

लेकिन शपथ-ग्रहण की पूरी प्रक्रिया के साथ एक अज़ब सी विडम्बना भी जुड़ी हुई है। वो ये कि ऐसे शपथ-ग्रहण की वैधता की मियाद सिर्फ़ एक कार्यकाल तक ही होती है। नये कार्यकाल के शुरुआत से पहले इन गणमान्य व्यक्तियों को फिर से शपथ लेना पड़ता है। लेकिन जब मंत्रियों के विभाग में परिवर्तन होता था, तब उन्हें नये सिरे से शपथ की ज़रूरत नहीं पड़ती, जबकि यदि प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री उनका प्रमोशन करके उन्हें राज्यमंत्री से स्वतंत्र प्रभार वाला मंत्री बनाते हैं या फिर कैबिनेट मंत्री का दर्ज़ा दिलवाते हैं तो मंत्रि परिषद का सदस्य होने के बावजूद इन्हें भी नये सिरे से शपथ लेना पड़ता है। यही हाल जजों का भी है। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की शपथ अलग है, तो चीफ़ जस्टिस बनने पर नये सिरे से शपथ लेनी पड़ती है। यहाँ तक कि राज्यपालों का भी जब एक राज्य से दूसरे राज्य में तबादला होता है तो उन्हें नये पद के लिए नये सिरे से शपथ लेनी पड़ती है।

ये शपथ ग्रहण या तो ईश्वर के नाम पर होता है या शुद्ध अन्तःकरण के नाम पर। इन्हें संविधान और क़ानून के प्रति सच्ची निष्ठा रखने, निष्पक्ष और निर्भीक रहने तथा देश की एकता और अखंडता का बरकरार रखने की सार्वजनिक तौर पर प्रतिज्ञा की जाती है। वादा किया जाता है। शब्द कोश के मुताबिक़, शपथ-प्रतिज्ञा-वादा-सौगन्ध-हलफ़, सभी परस्पर एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं। मज़े की बात तो ये है कि शपथ, सशर्त तो हो सकती है। लेकिन इसकी कोई मियाद नहीं हो सकती। प्रतिज्ञा का सम्बन्ध पूरी ज़िन्दगी से होता है। वादे का मतलब ही है, ‘प्राण जाए पर वचन न जाए’। तो फिर ऐसा क्यों है कि शपथ के ज़रिये पद-भार सम्भालने वालों को तब भी शपथ दोहरानी होती है, जबकि वो लगातार उसी पद पर बने रहने वाले हों?

संवैधानिक पदों के लिए शपथ लेने वाले लोग यदि इसकी मर्यादा भंग करते हैं तो उन्हें उनके पद से हटाने की जटिल प्रक्रिया है। इसी प्रक्रिया को इम्पीचमेंट कहते हैं। इम्पीचमेंट तो आपराधिक सज़ा का दर्ज़ा हासिल नहीं है। अलबत्ता, यदि दुराचरण के तहत कोई आपराधिक मामला भी बने तो उनके लिए अपराध-विधान के मुताबिक़ कार्रवाई हो सकती है। मसलन, यदि किसी को ग़बन करने के मामले में इम्पीच किया गया है तो उनके ख़िलाफ़ ग़बन से जुड़ा मुक़दमा चल सकता है और उसे अदालती प्रक्रिया से सज़ा भी दी जा सकती है।

लेकिन शपथ-भंग करने, कसम तोड़ने या वादा-ख़िलाफ़ी के लिए क़ानून में कोई सज़ा नहीं है। अलबत्ता, शपथ-पत्र या हलफ़नामें पर झूठा ब्यौरा देना या कोर्ट में झूठी गवाही देना बाक़ायदा अपराध है। इसके लिए कोर्ट सज़ा देती है। लेकिन अब ज़रा उस क़सम को याद कीजिए जिसे अरविन्द केजरीवाल ने अपने बच्चों का वास्ता देकर खायी थी, या फिर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उस वादे को याद कीजिए, जब उन्होंने नोटबन्दी के वक़्त देश से 50 दिन की मोहलत माँगी थी, या जब उन्होंने विदेश से काला धन लाकर सबके खाते में 15-15 लाख रुपये डालने का वादा किया था। अब सोचिए कि यदि कसम नहीं निभाने या प्रतिज्ञा तोड़ने या वादा ख़िलाफ़ी के लिए किसी सज़ा का विधान होता तो आज क्या देश नेताओं के लिए तरस नहीं होता?

आख़िर में, मुझे शपथ की मर्यादा तोड़ने का एक प्रसंग याद आ रहा है। बात 24 या 25 अगस्त 2015 है। उस दिन एनसीपी नेता शरद पवार का एक बयान था कि उन्होंने पिछले महीने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ख़त लिखकर यूपीए सरकार के एक निर्णय को बदलने की माँग की है। पवार ने लिखा है कि उन्होंने 2009 में कैबिनेट की बैठक में अपने सहयोगी जयराम रमेश के उस प्रस्ताव का विरोध किया था जिसके तहत जयराम ने जीएम यानी जेनेटिकली मोडिफ़ाइड अथवा अनुवांशिक रूप से परिष्कृत बीजों का परीक्षण उन राज्यों में नहीं करने का नियम बना दिया जो इसकी इजाज़त ना दें। शरद पवार ने लिखा है कि वो इस नियम के ख़िलाफ़ थे। जबकि जयराम का कहना था कि कृषि राज्यों का विषय है। लिहाज़ा, ये नहीं माना जा सकता कि राज्य ये नहीं जानते कि उनके लिए क्या मुफ़ीद होगा और क्या नहीं?

शरद पवार का नरेन्द्र मोदी को ख़त लिखना कतई ग़लत नहीं है। लेकिन बड़ी बात ये है कि कैबिनेट में लिये गये फ़ैसले से असहमत होते हुए भी शरद पवार मंत्री पद पर बने रहे। जो कैबिनेट के बने सामूहिक उत्तरदायित्व का सिद्धान्त के ख़िलाफ़ था। इस सिद्धान्त का मतलब ही ये है कि कैबिनेट सभी फ़ैसले सर्वसम्मत्ति से लेगी। यदि कोई मंत्री कैबिनेट के फ़ैसले से असहमत है तो उसे इस्तीफ़ा देना होगा। वर्ना ये माना जाएगा कि फ़ैसले की पीछे उसकी चाहे जो आपत्ति रही हो, लेकिन जब फ़ैसला हो गया तो उसका भी फ़ैसला माना जाएगा।

सामूहिक उत्तरदायित्व के इस सिद्धान्त की वजह से ही राजीव गाँधी की कैबिनेट से आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने इसलिए इस्तीफ़ा दे दिया था क्योंकि वो शाह बानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को क़ानून बनाकर पलटने के ख़िलाफ़ थे। नियम ये है कि कैबिनेट से इस्तीफ़ा देने के बाद ही कोई मंत्री अपनी असहमति को सार्वजनिक कर सकता है। कैबिनेट में रहते हुए ऐसा करना सर्वथा वर्जित है। पवार का आचरण मंत्री-पद की शपथ के ख़िलाफ़ था। इस तरह उन्होंने संविधान की बुनियादी मान्यता का मखौल उड़ाया था।

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ओपिनियन

…तो क्या बीजेपी ने विधायक ओम प्रकाश शर्मा को सुपर पीएम बना दिया है?

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om prakash sharma

क्या बीजेपी ने दिल्ली में अपने पुनर्निर्वाचित विधायक ओम प्रकाश शर्मा को सुपर पीएम बना दिया है? वर्ना वो कैसे कह रहे हैं कि ‘दिल्ली में हार के बाद भी बीजेपी की नीतियों में कोई बदलाव नहीं आएगा। देश में नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) के बाद एनआरसी भी आएगा और जनसंख्या नियंत्रण क़ानून भी आएगा।’

ओम प्रकाश शर्मा का ये बयान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के उन बयानों के बाद कैसे आ सकता है जिसमें देश के ये दोनों शीर्षस्थ नेता कह चुके हैं कि फ़िलहाल देश में एनआरसी लागू करने का कोई बात नहीं है। मोदी-शाह के उपरोक्त बयान संसद की कार्यवाहियों में भी दर्ज़ हैं और चुनावी रैलियों में भी दोहराये गये हैं। तो क्या ये माना जाए कि मोदी-शाह से आगे जाकर ओम प्रकाश शर्मा ने सरकार और पार्टी में भीतरखाने चल रही गतिविधियों का ख़ुलासा कर दिया है। यदि ऐसा नहीं है, तो बीजेपी या सरकार के प्रवक्ताओं ने शर्मा के बयानों से अब तक किनारा क्यों नहीं किया?

बात यहीं नहीं थमती। ओम प्रकाश शर्मा चुनाव ख़त्म होने के बाद भी अरविन्द केजरीवाल को बार-बार आतंकवादी बताने से बाज नहीं आ रहे हैं। लिहाज़ा, ये सवाल उठना भी लाज़िमी है कि क्या बीजेपी ने उन्हें ऐसे बयानों को दोहराने के लिए अधिकृत किया है? यदि नहीं, तो फिर शर्मा जैसे बयान-वीरों की ज़ुबान पर कौन लगाम कसेगा? और, यदि बीजेपी भी शर्मा के अलावा प्रकाश जावड़ेकर, परवेश वर्मा, कपिल मिश्रा और तेजिन्दर बग्गा जैसे छोड़े-बड़े नेताओं की तरह केजरीवाल को आतंकवादी मानती है, तो फिर उन्हें जेल में क्यों नहीं डाल रही?

क्या मोदी-शाह की नाक के ठीक नीचे देश की राजधानी में 16 फरवरी को तीसरी बार एक आतंकवादी की मुख्यमंत्री के पद पर ताजपोशी होनी चाहिए? या फिर बीजेपी वास्तव में केजरीवाल को आतंकवादी नहीं मानती है बल्कि वो उन्हें प्यार से अथवा हँसी-मज़ाक में आतंकवादी कह रही है, या फिर दिल्ली में जनादेश से पिटने के बाद बीजेपी में अब आतंकवादी के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का हौसला नहीं बचा।

चुनाव आयोग ने 12 फरवरी को दिल्ली में नयी विधानसभा के गठन की अधिसूचना जारी कर दी है। इस तरह चुनाव सम्पन्न हो जाने की वजह से अब चुनाव आयोग का निष्प्रभावी हो जाना स्वाभाविक है। हालाँकि, चुनाव के दौरान जब वो बेहद शक्तिशाली था, तब भी वो बीजेपी के उन बड़बोले नेताओं को माकूल सज़ा कहाँ दे पाया, जिन्होंने अपने राष्ट्रवादी शौर्य को प्रदर्शित करते हुए अरविन्द केजरीवाल को आतंकवादी होने का ख़िताब दिया था। चुनाव आयोग ने यदि उस वक़्त समुचित सख़्ती दिखायी होती तो क्या बीजेपी के पुनर्निर्वाचित विधायक ओम प्रकाश शर्मा की इतनी ज़ुर्रत होती कि वो केजरीवाल को फिर से आतंकवादी होने का बयान दे देते?

ओम प्रकाश शर्मा ने तो बदज़ुबानी की हद्दों को भी तोड़ डाला। चुनाव ख़त्म होने के बाद भी उन्होंने बयान दिया कि ‘अरविन्द केजरीवाल एक भ्रष्ट आदमी है। आतंकवादियों के साथ उनकी सहानुभूति है। वह पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता की भूमिका निभाते हैं। टुकड़े-टुकड़े गैंग का समर्थन करते हैं और भारतीय सेना पर सवाल उठाते हैं। आतंकवादी शब्द उनके लिए सबसे उपयुक्त है।’ शर्मा यहीं नहीं रुके। उन्होंने आगे कहा कि ‘केजरीवाल ने एक बार फिर दिल्ली की जनता की आँखों में धूल झोंकी है। ये शातिर ठग है। इनकी पोल जरा देर से खुलेगी। केजरीवाल टुकड़े-टुकड़े गैंग के साथी हैं। वह आतंकी हैं और रहेंगे। अगर आतंकवाद से भी घिनौना कोई शब्द है तो वैसा काम केजरीवाल ने किया है। जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के साथ खड़े होने वाले, पाकिस्तान की सेना के प्रवक्ता का काम करने वाले को हम आतंकवादी ना कहें तो क्या कहें?’

जवाब में आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह भी बीजेपी के नेताओं ख़ासकर अमित शाह को ललकार चुके हैं कि यदि केजरीवाल आतंकवादी हैं तो सरकार उन्हें गिरफ़्तार क्यों नहीं करती, उन्हें जेल में क्यों नहीं डालती, उनके ख़िलाफ़ मुकदमा क्यों नहीं चलाती? ख़ुद केजरीवाल भी ऐसे बयानों का प्रतिकार कर चुके हैं। लेकिन नतीज़ा, वही ढाक के तीन पात। चुनाव प्रचार के दौरान चुनाव आयोग ने अनुराग ठाकुर, परवेश वर्मा और कपिल मिश्रा को उनके जीभ के लपलपाने की सज़ा तो दी लेकिन वो इतनी नाकाफ़ी थी कि उससे बीजेपी वालों ने कोई सबक नहीं लिया।

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी कह चुके हैं कि ऐसे नेताओं के ख़िलाफ़ पुलिस में भी एफआईआर दर्ज़ करवानी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। शायद इसीलिए ओम प्रकाश शर्मा और शेर हो गये। तभी तो उन्होंने आतंकवादी के अलावा केजरीवाल को भ्रष्ट, पाकिस्तानी सेना का प्रवक्ता और टुकड़े-टुकड़े गैंग का समर्थक भी बता दिया। वैसे मौजूदा संसद सत्र में ही गृह मंत्रालय ने ख़ुलासा किया कि उसके पास किसी भी ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ से सम्बन्धित कोई ब्यौरा नहीं है।

नेताओं की लपलपाती ज़ुबान के बहकने के असंख्य अफ़सानों में से ये तो महज एक और किस्सा है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि अपने राजनीतिक विरोधियों के ऐसे बिगड़े बोलों का बार-बार दोहराया जाना भी सबसे ज़्यादा उस भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की ओर से हो रहा है जो अपने नेता को मौत का सौदागर, चाय-वाला, क़ातिल, हत्यारा, चौकीदार चोर है और साइकोपैथ वग़ैरह बताये जाने से तो बेहद मर्माहत होती है, लेकिन केजरीवाल को आतंकवादी और राहुल गाँधी को शहजादा कहने में उसे गुरेज़ नहीं होता? ऐसे में क्या ये मान लिया जाए कि सियासत जमात में ‘जाके पैर न फटे बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई’ वाला मुहावरा लागू नहीं होता? यहाँ शीशे के घरों में रहने वालों को भी दूसरों के घरों पर पत्थर फेंकने का शौक़ क्यों होता है? क्या यहाँ का दस्तूर ‘आँख के बदले आँख’ और इस ‘हम्माम में सारे नंगे’ वाला ही बना रहेगा?

वैसे ख़ुद केजरीवाल भी अपने राजनीतिक विरोधियों के लिए आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल करते रहे हैं। यहाँ तक कि नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी जैसे तमाम बड़े नेताओं का ज़ुबान भी कई बार अपने विरोधियों के अमर्यादित विशेषणों का इस्तेमाल करती रही है। इनके बयानों को लेकर ख़ूब छीछालेदर भी होती रही है। अदालतों में मानहानि के मुक़दमे भी दर्ज़ हुए हैं। सज़ाएँ भी हुई हैं। ख़ेद जताने और क्षमादान की भी मिसालें भी हैं। लेकिन लपलपाती ज़ुबान की महामारी ऐसा विकराल रूप धारण कर चुकी है कि काबू में आने का नाम ही नहीं लेती। बयान-वीरों ने ख़ुद को सभी शिष्टाचार और मर्यादाओं से ऊपर मान लिया है।

यही वजह है कि नेताओं की देखादेखी हमारी पुलिस भी दिनों-दिन और बर्बर होती जा रही है। अदालतें संवेदनहीन होती जा रही हैं। सड़कों पर लिंचिंक रूपी इंसाफ़ होने लगा है। कोई भी दिन-दहाड़े हाथों में पिस्तौल लहराने और गोली चलाने लगा है तो कोई जेएनयू में नक़ाबपोश बनकर और दिल्ली के गार्गी कॉलेज में घुसकर अपराध करता है तो कभी पुलिस ही जामिया में सारे नियम-क़ायदों की धज़्ज़ियाँ उड़ा रही होती है। जेलों में विचाराधीन क़ैदियों का अम्बार होता है और क़ानून ख़र्राटे भरता रहता है। धन्ना-सेठों के बड़े-बड़े घोटालों के बाद देश से भाग निकलने की मिसालें पैदा होती रहती हैं। ऐसे और भी बहुत सारे उदाहरण हो सकते हैं, जो चीख़-चीख़कर बताते हैं कि देश में नियम-क़ायदे और उन्हें लागू करने वाली संस्थाएँ बेमानी हो चुकी हैं।

समाज से ग़लत-सही के बीच के फ़र्क़ का मिटने जाना बेहद ख़तरनाक है। इससे उन अपराधों के भी बेधड़क होने का रास्ता खुलता जा रहा है, जो अभी यदा-कदा होते हैं। लिहाज़ा, सियासी जमात को भी ये खुशफ़हमी नहीं पालनी चाहिए कि वो समाज के बाक़ी तबकों में फैल रही ग़लतफ़हमी से हमेशा सुरक्षित ही रहेंगे। वो दिन दूर नहीं जब उनका भी सीधा वास्ता तरह-तरह के सिर-फिरों से ज़रूर पड़ेगा। इसीलिए अब भी वक़्त है कि हम पुराने अनुभवों से नसीहत लें, वर्ना गाँधी या इन्दिरा के हत्यारों वाली मानसिकता का बार-बार उभरना निश्चित है।

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चुनाव

कोई बताएगा कि ‘मुफ़्तख़ोरी’, आख़िर है क्या बला!

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Amit Shah and Kejriwal

दिल्ली विधानसभा के चुनावों में अनेक भ्रष्ट narratives (कथा, कहानी) का बोलाबाला रहा। इनमें से एक है ‘मुफ़्तख़ोरी’ (Freebies)। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने आम आदमी पार्टी पर हमला करने के लिए बिजली-पानी, महिलाओं की बस-यात्रा पर मिलने वाली रियायतों को मुफ़्तख़ोरी बताने का रास्ता चुना। मुफ़्तख़ोरी की बातें ही जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के आन्दोलनरत छात्रों पर भी चस्पाँ की गयीं, क्योंकि उन्हें भी बीजेपी ने अपने विरोधियों के रूप में ही देखा। वैसे तो बीजेपी के दुष्प्रचार को ‘आलसी, गद्दार, तंग-नज़र, राष्ट्रविरोधी दिल्लीवालों’ ने ख़ारिज़ कर दिया, लेकिन मुफ़्तख़ोरी का नारा अभी मरा नहीं है, उसे सुलगाये रखने के लिए तरह-तरह से तेल डाला जा रहा है।

इसीलिए ये सवाल अब भी मौजूँ है कि आख़िर ये मुफ़्तख़ोरी किस बला का नाम है? मुफ़्तख़ोरी, होती क्या है, किसे कहते हैं? इसका मतलब है, ‘निठल्ले या निक्कमे को मिला भोजन या इनाम’। इसके लिए एक मुहावरा भी है, ‘काम के ना काज के, दुश्मन अनाज के’। मुफ़्तख़ोरी में अहसान-फ़रामोशी का भी भाव निहित है। लेकिन ये ‘रिश्वत’ की तरह अपराध नहीं है। मुफ़्तख़ोरी और हरामख़ोरी, एक-दूसरे के पर्याय हैं। लिहाज़ा, यदि जनता से मिले टैक्स को सरकार जनता पर ही खर्च करने का रास्ता चुनती है तो फिर इसे ‘मुफ़्तख़ोरी की सौदेबाज़ी’ के रूप में कैसे पेश किया जा सकता है?

यदि कुतर्क की ख़ातिर ही सही, ये मान लिया जाए कि केजरीवाल के वादे मुफ़्तख़ोरी को बढ़ावा देने वाले हैं तो क्या अब देश को ये समझ लेना चाहिए कि वो दिन दूर नहीं जब मोदी सरकार नोटबन्दी की तर्ज़ पर ‘मुफ़्तबन्दी’ का ऐलान कर देगी? केन्द्र सरकार की तमाम योजनाओं के ज़रिये जनता को दी जाने वाली तरह-तरह की सब्सिडी की सप्लाई का ‘मेन-स्विच ऑफ़’ कर दिया जाएगा? क्योंकि मुफ़्तख़ोरी की जैसी परिभाषा गढ़ी गयी है उस हिसाब से तो हरेक सब्सिडी को मुफ़्तख़ोरी ही समझा जाना चाहिए। तो क्या वो दिन लद जाएँगे जब चुनाव से पहले किसानों से क़र्ज़ माफ़ी का वादा किया जाएगा? क्या किसानों को दो हज़ार रुपये की मुफ़्तख़ोरी वाली किस्तें नहीं मिला करेंगी? खाद पर मुफ़्तख़ोरी वाली सब्सिडी नहीं मिलेगी? किसानों को मुफ़्तख़ोरी वाली रियायती बिजली मिलना बन्द हो जाएगी?

उज्ज्वला योजना का गैस कनेक्शन और सिलेंडर क्या अब पूरे दाम पर ही मिलेगा? आयुष्मान योजना के तहत मिलने वाली पाँच लाख रुपये की मुफ़्तख़ोरी का सिलसिला क्या बन्द हो जाएगा? क्या रेल किराया अब पूरी तरह व्यावसायिक बन जाएगा? क्या प्राइमरी से लेकर उच्च और तकनीकी शिक्षा तक में मिलने वाली रियायतें ख़त्म हो जाएँगी? क्या अब सरकारी अस्पतालों में भी नर्सिंग होम्स की तरह महँगा इलाज़ करवाना पड़ेगा? सस्ते राशन वाली मुफ़्तख़ोरी भी क्या बन्द हो जाएगी? क्या हरेक सड़क अब टोल रोड होगी? क्या प्रधानमंत्री आवास योजना से घर बनाने के लिए मिलने वाली सब्सिडी ख़त्म हो जाएगी? मुफ़्तख़ोरों के लिए क्या शौलाचय बनना बन्द हो जाएँगे? क्या मज़दूरों को पेंशन देने की योजना बन्द हो जाएगी?

दिल्ली का चुनाव जीतने और अपने राजनीतिक विरोधी को ठिकाने लगाने के मंशा से ‘मुफ़्तख़ोरी’ की जैसी परिभाषा बीजेपी ने गढ़ी है, उसके मुताबिक़ तो सरकार की ओर से जन-कल्याण के लिए किया जाने वाला हरेक काम अनैतिक और पतित आचरण के दायरे में आ जाएगा। ख़ुद बीजेपी के चुनावी घोषणापत्र में ऐसे दावों की भरमार है जिनसे ‘मुफ़्तख़ोरी’ का बढ़ावा मिलेगा। तो क्या ये मान लिया जाए कि बीजेपी करे तो रासलीला, केजरीवाल करे तो करेक्टर ढीला? बेशक़, मुफ़्तख़ोरी एक घटिया और अनैतिक आचरण है। लेकिन मुफ़्तख़ोरी को सही ढंग से परिभाषित करना भी ज़रूरी है।

एक सरकारी कर्मचारी को जिस काम के लिए नौकरी मिली है, उस काम को वो करता नहीं और बैठे-ठाले तनख़्वाह पाता है तो ये है मुफ़्तख़ोरी। असली मुफ़्तख़ोरी। यदि वो कर्मचारी अपना काम करने के लिए लोगों से सुविधा शुल्क ऐंठता है तो ये है रिश्वतख़ोरी। जबकि यदि वो सरकारी खर्चों पर कमीशन खाता है तो ये है भ्रष्टाचार। भ्रष्टाचार में रिश्वतख़ोरी के अलावा अमानत में खयानत का गुनाह भी शामिल होता है। लेकिन लोकतंत्र में चुनावी वादों को मुफ़्तख़ोरी, लालच या रिश्वतख़ोरी की तरह नहीं देखा जा सकता। इसीलिए ‘हरेक खाते में 15-15 लाख रुपये’ वाली बात भले ही नामुमकिन चुनावी वादा लगे, लेकिन ये आदर्श चुनाव संहिता का उल्लंघन नहीं है। दिल्ली को पेरिस बना देने का वादा भले ही अविश्वनीय हो, काशी को क्योटो बनाने का वादा भले ही ख़्याली पुलाव हो, सड़क को हेमामालिनी के गाल जैसा बनाने की बात भले ही लंतरानी लगे, लेकिन ये अनैतिक या वर्जित नहीं हो सकती। इसे झाँसा ज़रूर कह सकते हैं।

‘तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा’ का नारा लालच के दायरे में नहीं रखा जा सकता। मुझे वोट देंगे तो मैं मन्दिर बनवा दूँगा, 370 ख़त्म कर दूँगा, तीन तलाक़ ख़त्म कर दूँगा, सीएए लागू करके दिखाऊँगा। क्या इन नारों को पूरा करने में टैक्स भरने वाली जनता की ख़ून-पसीने की रक़म वैसे ही खर्च नहीं होती जैसे मुफ़्त बिजली-पानी, राशन-दवाई वग़ैरह देने पर होती है? तो क्या ये सब बातें भी मुफ़्तख़ोरी के दायरे में आ जाएँगी?

दिल्ली के चुनाव नतीज़ों के बाद चाणक्य के एक नीति-वाक्य को सोशल मीडिया पर दौड़ाया जा रहा है कि ‘जहाँ जनता लालची हो वहाँ ठगों का राज होता है।’ यहाँ चाणक्य को ढाल बनाकर लोगों के बीच लालच की भ्रष्ट परिभाषा ठेली जा रही है, क्योंकि कम समझ रखने वालों पर भ्रष्ट परिभाषाएँ तेज़ी से और भरपूर असर दिखाती हैं। इसीलिए, मुफ़्तख़ोरी के बाद लगे हाथ ये भी समझते चलें कि आख़िर, लालच क्या है? क्यों इसे बुरी बला कहते हैं?

क्या किसी स्पर्धा में स्वर्ण पदक पाने की ख़्वाहिश रखना लालच है? क्या दाम्पत्य में पति-पत्नी का एक-दूसरे के प्रति संवेदनशील होना लालच है? जी नहीं। लेकिन दूसरों की चीज़ छलपूर्वक हथियाने की कामना रखना लालच है। दूसरे के बाग़ में लगे फलों को चुराकर खाना, लालच-प्रेरित अपराध है। साफ़ है कि लालच एक प्रवृत्ति है, जो ग़लत काम की वजह बनती है। इसीलिए यदि बुरे काम से बचना है तो लालच से बचें, क्योंकि यही वो बुरी बला है, जो अपराध की ओर ढकेलती है।

लेकिन लेन-देन लालच नहीं है। सेल भी लालच नहीं है। लालच, उकसावा और प्रोत्साहन, तीनों प्रवृत्तियों में फ़र्क़ है। लालच, नकारात्मक है तो प्रोत्साहन या प्रलोभन सकारात्मक। जबकि उकसावा, उभयनिष्ठ है यानी ये सकारात्मक और नकारात्मक दोनों हो सकती है। इसीलिए लोकतंत्र में चुनावी वादों को लालच या मुफ़्तख़ोरी की तरह पेश नहीं किया जा सकता। अलबत्ता, इन्हें प्रलोभन अवश्य कहा जा सकता है। लुभाना, अशोभनीय आचरण नहीं है। ये मार्केटिंग का अस्त्र है। माँ-बाप यदि अपने बच्चे से कहें कि परीक्षा में अव्वल आये तो तुम्हें साइकिल ख़रीदकर देंगे। ये व्यवहार लालच नहीं है, बल्कि प्रोत्साहन और पुरुस्कार है। इसी तरह चुनावी वादों को पूरा करने के लिए वोट माँगना, किसी दुकान से रुपये के बदले सामान ख़रीदने जैसी सौदेबाज़ी नहीं है। वोट सौदा नहीं है। ये समर्थन है, सहयोग है। इसीलिए इसे माँगा जाता है। जनता इसे दान देती है, इसीलिए इसे मतदान यानी मत या ‘मौन-सहयोग का’ दान कहा गया है। चुनावी वादों का पूरा होना दान का फलित है। जैसे कर्मों का फल मिलता है।

इसीलिए मुफ़्तख़ोरी और लालच जैसे शब्दों को लेकर गुमराह करने वालों से पूछिए कि सबको सस्ती शिक्षा, स्वास्थ्य, राशन, बिजली, पानी वग़ैरह देने की बात करना लालच कैसे है? क्या सरकार का काम जिससे टैक्स ले, उसी पर खर्च करना होना चाहिए या फिर उसका ये दायित्व सही है कि वो जिनसे ज़्यादा ले सकती है, उनसे ज़्यादा ले, लेकिन जब देने की बारी आये तो उन्हें सबसे अधिक प्राथमिकता दे, जिन्हें सबसे ज़्यादा ज़रूरत हो? अरे, यदि कोई स्कूटी, साइकिल, टीवी, प्रेशर कूकर, लैपटॉप, स्कूल-बैग और किताबें बाँटे तो वो लालच नहीं है लेकिन यदि कोई आपके कान में आकर मुफ़्तख़ोरी की भ्रष्ट परिभाषा का मंत्र फूँक दे तो वो लालच हो गया! अफ़सोस है कि हमने अपने दिमाग़ से सोचना-समझना बन्द कर दिया है। मुफ़्तख़ोरी का नगाड़ा बजाने वालों से सवाल ज़रूर पूछिए।

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