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कहीं आपको गोपाल में कसाब तो नहीं दिख रहा?

भूलकर भी दिमाग़ में ये विचार नहीं लाएँ कि कसाब और गोपाल का मतलब एक ही है। आख़िर, एक मुसलमान और दूसरा हिन्दू जो है।

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Ram Bhakt Gopal and Kasaab

दोनों तस्वीरों में पोशाक के सिवाय बहुत सी समानता है। कसाब, आतंकवादी है। मुसलमान है। ग़ुमराह है। लेकिन गोपाल, राष्ट्रभक्त है। हिन्दू है। सच्चाई की राह पर है। दोनों के हाथ में बन्दूक है। दोनों ने इसे मासूम और निहत्थे लोगों के ख़िलाफ़ उठा रखा है। लेकिन दोनों इंसानियत के दुश्मन नहीं हैं। क्योंकि एक हिन्दू है तो दूसरा मुसलमान। एक, इस देश का जन्मजात नागरिक है और दूसरा नामुराद घुसपैठिया। दोनों अपने आकाओं के प्रति वफ़ादार हैं। वफ़ादारी की ख़ातिर अपना सर्वस्व न्यौछावर करने पर आमादा हैं। हर क़ीमत चुकाने को तैयार हैं।

देश को ऐसे दिन यूँ ही देखने को नहीं मिले। भगवा नेताओं ने इसे बड़े जतन और पीढ़ियों के ख़ून-पसीने तथा बलिदान, त्याग और तपस्या से सींचा है! रोहित की आत्महत्या, अख़लाक़ और पहलू ख़ान पर सड़क पर दी गयी सज़ा-ए-मौत, जेएनयू के धड़ल्ले से घूमते नक़ाबपोश हमलावर अब गोपाल के रूप में दिख रहे हैं। इन्हें परिपक्व होने में वक़्त लगा है। इन्हें WhatsApp University की अपार सामग्री से वैसे ही लम्बी प्रक्रिया के बाद सिझाया गया है, जैसे अचार को तेल में डुबोकर धूप की नरम आँच पर महीनों तक पकाया जाता है।

कसाब के मामले में किसी सबूत की ज़रूरत नहीं थी। फिर भी क़ानून का पेट भरने में क़रीब चार लग गये। उसका तो भारत में कोई हमदर्द भी नहीं था। लेकिन गोपाल के मामले में ऐसा थोड़े ही होगा। आख़िर उसे हिन्दू और भारतीय होने का क्या तब भी कोई फ़ायदा नहीं मिलेगा, जब केन्द्र में मोदी और शाह हों तथा उसके गृह राज्य में हिन्दू हृदय सम्राट हों! लानत है अगर इनके राज में किसी सिरफिरे हिन्दू का बाल भी बाँका हो जाए! गोपाल को बचाने की शुरुआत हो चुकी है। सबसे पहले तो उसकी तस्वीर पर मास्क या काली पट्टी लगाकर उसकी पहचान को धूमिल किया गया। अब उसे नाबालिग़ और मानसिक रूप से असामान्य या विक्षिप्त ठहराये जाने के लिए फ़र्ज़ी काग़ज़ात गढ़े जाएँगे।

उधर, पुलिसिया जाँच का ढोंग जारी रहेगा। महीनों की जाँच के बाद भी पुलिस को चश्मदीद नहीं मिलेंगे। सालों-साल तक आरोप-पत्र दाख़िल नहीं होगा। फिर कोई अदालत, पुलिस को फटकारेगी तो आरोप-पत्र की लीपापोती की जाएगी। इसके बाद अदालत में लम्बी-लम्बी तारीख़ें लगेंगी। क्योंकि मौजूदा सरकारें तो किसी भी सूरत में मामले को किसी फास्ट ट्रैक कोर्ट के हवाले नहीं करेंगी। यदि कर भी दिया तो सालों-साल ज़मानत का खेल चलेगा। गोपाल को अब एक से एक बीमारी होगी ताकि वो हिरासत का दौर अस्पताल में काट सके। ऐसा किये बग़ैर उसे पॉलिटिक्स एक्टिविस्ट का दर्ज़ा नहीं दिया जा सकता। इस दर्ज़े के बग़ैर गोपाल का वैसा महिमा मंडन कैसे होगा, जैसा आज गोडसे या बुरहान वानी का होता है।

कुलमिलाकर, दो-तीन दशकों तक चलने वाली मुक़दमेबाज़ी के बाद गोपाल को सांकेतिक सज़ा भी मिल गयी तो ग़नीमत है। कोर्ट में साबित किया जाएगा कि जिस शादाब को गोपाल की पिस्टल से निकली गोली से जख़्मी बताया जा रहा है, वो गोली उस पिस्टल से चली ही नहीं थी, बल्कि वो तो किसी और तमंचे से निकली थी। ये ना हुआ तो ये स्टोरी गढ़ी जाएगी कि गोपाल का मक़सद हमला करने का नहीं, बल्कि तमंचा दिखाकर लोकतांत्रिक विरोध जताने का था क्योंकि बेचारा शाहीन बाग़, जामिया और जेएनयू के टुकड़े-टुकड़े गैंग, शारजील और कन्हैया की कहानियों से बदहवास हो चुका था।

ऐसे विचित्र अफ़साने देश में पहले से मौजूद हैं। सभी जानते हैं कि जोधपुर में सिने-हस्तियों के हाथों में बन्दूक देखकर काले हिरण से साँस रोककर प्राण त्याग दिये। मुम्बई में भी सलमान ख़ान की गाड़ी के नीचे लेटकर जिस वक़्त पाँच लोगों ने मौत का आलिंगन किया उस वक़्त उसे कोई नहीं चला रहा था। बेचारी कार मृतकों का माथा चूमने के लिए मचलती हुई फुटपाथ पर जा पहुँची थी।

इसीलिए, यदि किसी भी वजह से आपके जेहन में ये सवाल अब भी कौंध रहा हो कि कसाब और गोपाल, एक ही हैं तो कृपया किसी अच्छे मनोचिकित्सक से परामर्श लें। नागपुर में प्रशिक्षित समाज सेवक भी आपके लिए बहुत उपयोगी हो सकते हैं, क्योंकि उन्हें गाँधी की हत्या को सही ठहराने, गोडसे की पैरवी करने और सावरकर को भारत रत्न से सम्मानित करने की माँग करने का कालजयी अनुभव है। भूलकर भी दिमाग़ में ये विचार नहीं लाएँ कि कसाब और गोपाल का मतलब एक ही है। आख़िर, एक मुसलमान और दूसरा हिन्दू जो है। अब हिन्दुस्तान के लिए ये कोई मामूली विशेषता नहीं है! संविधान जाए भाड़ में!

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पत्रकारीय तर्कों से देखें तो तीन महीने से कम नहीं रहेगा भारत में लॉकडाउन

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Lockdown Corona Covid

भारत की नौकरशाही के मुखिया कैबिनेट सचिव राजीव गौबा का 30 मार्च 2020 का बयान है, “मैं ऐसी रिपोर्टों से चकित हूँ, लॉकडाउन को आगे बढ़ाने की कोई योजना नहीं है।” अंग्रेज़ी में लिखूँ तो “I’m surprised to see such reports, there is no such plan of extending the lockdown.” लेकिन मेनस्ट्रीम मीडिया ने इसे कुछ ऐसे पेश किया कि लॉकडाउन की मियाद आगे नहीं बढ़ने वाली, क्योंकि कैबिनेट सचिव ने कहा कि ‘इसे आगे बढ़ाने की कोई योजना नहीं है।’

मेनस्ट्रीम मीडिया ने जनता को इस बयान की तकनीकी बारीकियों को ठीक से नहीं समझाया और बात ये उड़ी कि लॉकडाउन का वक़्त 14 अप्रैल से आगे नहीं बढ़ेगा क्योंकि 21 दिन की मियाद इसी दिन तक है। ज़्यादातर लोगों और यहाँ तक कि सचिव स्तरीय अफ़सरों ने भी उड़ी-उड़ाई व्याख्या को ही सही समझ लिया। दो-एक पारिवारिक सरकारी अफ़सरों ने फ़ोन पर हुई बातों से भी लगा कि उन्होंने भी ख़बर को हूबहू वैसे ही समझा जैसा ऊपर लिखा है। ऐसे में साधारण लोगों की ग़लतफ़हमियाँ समझ से परे नहीं हैं।

दरअसल, जनता को गूढ़ बातों को बताना और समझाना पत्रकारों का काम है, मीडिया का फ़र्ज़ है। लेकिन पत्रकार भी तो अपना कर्तव्य तो तभी निभाएँगे, जब वो ऐसे बयानों को परखना जानेंगे। पेशेवर काबलियत के पतन को देखकर अक्सर लगता है कि कैसे हमारी बिरादरी बौद्धिक रूप से दिवालिया हो चुकी है! चौथा खम्भा तो अपने नसीब पर रो ही रहा है। वर्ना, मेनस्ट्रीम मीडिया का फ़र्ज़ था कि वो कैबिनेट सचिव के एक लाइन के बयान की ठीक से समीक्षा करता।

कहता कि ‘बेशक़, सरकार कह रही है कि उसका अभी लॉकडाउन की मियाद को बढ़ाने का कोई इरादा नहीं है। लेकिन अभी इरादा नहीं होने का ये मतलब हर्ग़िज़ न समझें कि आगे चलकर हालात का जायज़ा लेने के बाद भी सरकार मियाद को नहीं बढ़ाएगी। इसका इरादा बनाने और लॉकडाउन की मियाद को आगे बढ़ाने का फ़ैसला लेने के लिए अभी सरकार के पास दो हफ़्ते का समय है। क्योंकि प्रधानमंत्री ने 21 दिन के जिस राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन का ऐलान किया है उसकी मियाद 25 मार्च से लेकर 14 अप्रैल तक है। लिहाज़ा, लॉकडाउन को लेकर कोई भी राय बनाने से पहले 14 अप्रैल का इन्तज़ार करें।’

यदि ख़बर को उपरोक्त ढंग से पेश होती तो क्या लोग ग़लतफ़हमी के शिकार होते या अफ़वाहों के सन्देश वाहक बनते? अरे, तकनीकी रूप से भले ही कैबिनेट सचिव ने सच नहीं बताया, लेकिन उन्होंने झूठ भी तो नहीं बोला। नौकरशाह ऐसे तरक़ीबों के खिलाड़ी होते हैं। उनकी छिपी हुई या अन्तर्निहित बातों को ख़ुद समझना और दर्शकों तथा पाठकों को समझाना पत्रकारों यानी रिपोर्टरों और न्यूज़ रूप में बैठे सम्पादकों का काम है। लेकिन मेनस्ट्रीम मीडिया से इस काम में कसर रह गयी।

पत्रकारिता का वैश्विक सिद्धान्त है कि “जब घटना को भाँपने वाली पत्रकारिता की दक्षता नष्ट हो जाती है तो वो घटना का ब्यौरा देने की ताक़त भी खो देता है। यही उसकी नियति है!” यहाँ कैबिनेट सचिव के बयान से जुड़ी घटनाओं और अनुभवों को सही ढंग से भाँपा ही नहीं गया। वर्ना, कौन नहीं जानता कि सर्वप्रथम लॉकडाउन 23 जनवरी को वुहान में लागू हुआ। इसे 8 अप्रैल को ख़त्म होना है। वुहान ने ही सबसे प्रभावी ढंग से लॉकडाउन को लागू करके दिखाया। फिर भी उसे 76 दिन के लॉकडाउन की ज़रूरत पड़ी तो भारत में इसके महज 21 दिनों में ख़त्म होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। लिहाज़ा, लॉकडाउन को सख़्ती से लागू रखते हुए घर में रहिए और एहतियातों का कड़ाई से पालन कीजिए।

ख़बर से जुड़ी अतिरिक्त जानकारियों के रूप में जनता को ये समझाना चाहिए कि अभी दुनिया की 40 फ़ीसदी आबादी लॉकडाउन में है। भारत में रहने वाली विश्व की 17 फ़ीसदी आबादी भी इसमें शामिल है। लॉकडाउन के अभी तक के अनुभवों पर ग़ौर करें तो हम पाएँगे कि इसका सिलसिला ख़ासा लम्बा खिंच सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रम्प ने पहले अप्रैल के आख़िर तक लॉकडाउन के जारी रहने की थी, लेकिन अब वो इसके पूरे मई तक खिंचने और जून से ही हालात में सुधार दिखने की उम्मीद जता रहे हैं। समाचार एजेंसी एएफपी के मुताबिक़, कल तक बड़े दावे करने वाले ट्रम्प अब पलट चुके हैं। अब उनका कहना है कि ‘जीत से पहले जीत का ऐलान करने से ख़राब और कुछ नहीं हो सकता।’

इटली और स्पेन जैसे सर्वाधिक पीड़ित देशों को लगता है कि वो कोरोना के कहर की चोटी तक पहुँच चुके हैं और जल्द ही उनका नीचे उतरना शुरू हो जाएगा। कई देशों ने अपने नागरिकों को चेतावनी दी है कि लॉकडाउन अनिश्चितकाल के लिए ‘न्यू नार्मल’ बनने वाला है। स्पेन ने कहा है कि वहाँ लोगों के आने-जाने पर रोक जारी रहेगी। इटली ने भी लॉकडाउन की मियाद को 3 अप्रैल से आगे बढ़ाने की बातें की हैं। ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने कहा है कि “संकट का दौर लम्बा चलेगा। अभी इतना ही समझ सकते हैं कि हालात सुधरने से पहले हमें और तबाही देखनी होगी।”

ब्रिटेन के शीर्ष चिकित्सा अधिकारी ने चेताया कि ज़िन्दगी को पटरी पर लौटने में छह महीने से ज़्यादा भी लग सकते हैं। इरान के राष्ट्रपति हसन रौहानी ने कहा है कि आने वाले महीनों में ‘ज़िन्दगी के नये ढर्रों’ को अपनाना होगा। रूस ने अपनी सीमाएँ सील की हैं तो मास्को के मेयर ने शहर में हफ़्ते भर की छुट्टी घोषित करके लोगों से घर में ही रहने को कहा है। अफ्रीका में नाइजीरिया ने लागोस और अबुजा में दो हफ़्ते का लॉकडाउन किया है तो बेनिन के राष्ट्रपति का कहना है कि उनके पास अमीर देशों जैसे संसाधन नहीं है, इसीलिए वो लॉकडाउन को कारगर नहीं बना सकते।

उधर, कोविड-19 की जन्मस्थली वुहान में ज़िन्दगी अब पटरी पर लौटने लगी है। हालाँकि, उन्हें विदेश से कोरोना के लौटने का डर भी सता रहा है। वुहान में जब कोरोना फैला तो वहाँ के लोगों को लगा कि शायद वो दूसरे देशों में ज़्यादा सुरक्षित रहेंगे। लेकिन अब उन्हें लगता है कि वो चीन में ही सबसे अधिक सुरक्षित हैं। यही दुनिया के सबसे सफल लॉकडाउन का नतीज़ा है।

आख़िर में, यदि सरकार लॉकडाउन को लेकर तस्वीर साफ़ करने से परहेज़ कर रही है तो पत्रकार क्या करें? कैसे इस सवाल का उत्तर दें कि क्या लॉकडाउन की मियाद बढ़ेगी या नहीं? इस सवाल का उत्तर कहीं उपरोक्त अनुभवों और अब तक हासिल पुख्ता जानकारियों में तो नहीं छिपा है? और यदि छिपा है तो उसे हम कैसे पढ़ें? इसका तरीका भी बहुत आसान है। हमें जितना पता है, उसे ही समझने की क्षमता होनी चाहिए। जैसे, जिस तरह से वित्त मंत्री और रिज़र्व बैंक के गर्वनर ने कोरोना को देखते हुए अपनी सारी रियायतों की मियाद को कम से कम तीन महीने के लिए तय किया है, उससे साफ़ है कि सरकार अच्छी तरह जानती है कि तीन महीने तक तो हालात सामान्य नहीं होने वाले।

भारत में कोरोना का ज्वालामुखी अब फटना शुरू हुआ है। विकसित देशों की तरह ये यहाँ भी सुनामी की तरह तबाही मचाएगा। ज़ाहिर है, तीन महीने तक तो इसके उफ़ान थमने से रहा। 22 मार्च के जनता कर्फ़्यू से शुरू हुआ तीन महीना 21 मई तक तो चलेगा ही। लिहाज़ा, 130 करोड़ की ग़रीब बहुल आबादी में लॉकडाउन की मियाद यदि जून तक भी खिंच जाए तो ताज़्ज़ुब मत कीजिएगा।

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कोरोना की ग़लतियाँ तब क्यों न गिनाएँ जब हो रही हैं?

मैं ‘राष्ट्रद्रोही-लिबरल-सेक्यूलर’ मौजूदा दौर में क्या करूँ? पत्रकारिता का धर्म कैसे निभाऊँ? कैसे कहूँ कि “हुज़ूर, वज़ीर-ए-आज़म आपने ‘जनता कर्फ़्यू’ और ‘टोटल लॉकडाउन’ का फ़ैसला लेने में बहुत देर कर दी। जिस वक़्त आप अपने प्रिय दोस्त डोनॉल्ड ट्रम्प के स्वागत वाले ‘इवेंट मैनेजमेंट’ में मशगूल थे, उसी वक़्त आपको भारत को सील कर देना चाहिए था।

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Narendra Modi
Indian Prime Minister Narendra Modi participates in a Bharatiya Janata Party (BJP) parliamentary committee meeting in New Delhi on Tuesday. Credit: Prakash Singh/AFP/Getty Images

22 मार्च की शाम के बाद जब ताली-थाली वादन और शंखनाद वाले तरह-तरह के मूर्खतापूर्ण वीडियो वायरल होने लगे तब ‘इवेंट मैनेजमेंट’ के साधकों ने नया शिगूफ़ा छोड़ा कि “फ़िलहाल हालात इमरजेंसी वाले हैं। लिहाज़ा, अभी सरकारों की ग़लतियाँ गिनाने की बजाय कोरोना वायरस से लड़ने के तरीक़े सुझाये जाने चाहिए।” ये ग़ज़ब का फलसफ़ा है कि अभी ग़लतियाँ मत गिनाओ। सिर्फ़ सुझाव दो। मानो, देश में कोई ऐसा भी है जो सुझावों पर ग़ौर करेगा।

अगले ही दिन ज्ञान का दूसरा प्रवाह उस माननीय सुप्रीम कोर्ट के प्रांगण से प्रस्फुटित हुआ जो अब बाक़ायदा सत्ता पक्ष का घटक दल बन चुका है। वहाँ एक भक्त ये जनहित याचिका लेकर पहुँचा कि कोविड-19 के संदिग्ध मामलों को जाँचने वाली प्रयोगशालाओं की संख्या बढ़ाने के लिए फ़ौरन अदालती फ़रमान जारी हों। गुहार ये भी थी कि कोरोना के संदिग्धों को अलग रखने के लिए बने केन्द्रों की संख्या भी बढ़ाने का हुक़्म सरकारों को दिया जाए।

लेकिन सारे क़ायदे-क़ानूनों और परम्पराओं के विद्वान जजों ने फ़रियादी की दलीलों पर ख़ूब माथापच्ची की और आख़िरकार, मोदी सरकार की जयजयकार करने लगे। जनहित याचिका ख़ारिज कर दी गयी। फ़रियादी को हिदायत मिली कि वो अपनी माँगों को लेकर सरकार के पास जाए। लगे हाथ प्रधान न्यायाधीश एस ए बोबड़े, न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति सूर्यकांत की पीठ ने अपनी प्रिय मोदी सरकार के लिए एक प्रशंसापत्र भी जारी कर दिया।

इसमें लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट की प्रथम पीठ इस बात से “सन्तुष्ट है कि सरकार मौजूदा स्थिति से निपटने के लिए बहुत सक्रिय हो गयी है और उसके आलोचक भी कह रहे हैं कि वो अच्छा काम कर रहे हैं।” वैसे सच्चाई ये है कि लेख लिखे जाने तक 135 करोड़ की आबादी वाले भारत में कोरोना के जाँच केन्द्रों की संख्या बढ़ते-बढ़ते 118 हो चुकी है। इन केन्द्रों में रोज़ाना 12 हज़ार नमूनों की जाँच करने की क्षमता है। अब ये बताकर आपको डराने से कोई फ़ायदा नहीं है कि ये पर्याप्त है या नहीं? इसके बारे में 24 मार्च वाला प्रधानमंत्री का द्वितीय राष्ट्रीय सम्बोधन काफ़ी कुछ बता चुका है।

बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के उपरोक्त आँकलन या बयान से साफ़ है कि कोरोना से महाभारत लड़ने में सरकार का काम ‘लल्लनटाप’ है। यदि किसी को इसमें कोई कमी दिखती है तो वो फ़ौरन उस हिदायत पर अमल करे जो कहता है कि “फ़िलहाल हालात इमरजेंसी वाले हैं। लिहाज़ा, अभी सरकारों की ग़लतियाँ गिनाने की बजाय कोरोना वायरस से लड़ने के तरीक़े सुझाये जाने चाहिए।” हालाँकि, सुझावों को सुनने, उन पर मनन करने और पते की बात पर अमल करने वाला कौन है? इसे मनुष्य तो क्या देवता भी शायद ही जानते हों। ‘देवौ ना जानाति कुतो मनुष्यः’।

यही वजह है कि अब हमारा मेनस्ट्रीम मीडिया विपक्ष की आलोचनाओं को नज़रअन्दाज़ कर देता है। वो ज़माना भी इतिहास बन चुका है कि जब मीडिया और विपक्ष मिलजुलकर समाज-सत्ता और व्यवस्था के लिए ‘निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय’ वाली भूमिका निभाते थे। अब तो चाटुकार युग है, इसमें नवरत्न सिर्फ़ वही बनते हैं जो बात-बात पर ‘अहो रुपं अहो ध्वनि’ वाला मनभावन राग सुनाते हैं।

जिस युग में अटल बिहारी वाजपेयी ने राज-धर्म की दुहाई दी थी, उसी दौर में बीजेपी के चहेते पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल क़लाम ने एक बार भारत के नियंत्रक और लेखा परीक्षक (CAG) से कहा था कि ‘उसे सरकार की ग़लतियों को जितनी जल्दी हो सके, बताना चाहिए। ताकि ग़लतियों को वक़्त रहते सुधारा जा सके और बारम्बार दोहराने से बचा जा सके।’ मैं दिवंगत क़लाम साहब के इस नज़रिये का कायल हूँ।

लेकिन मेरी दुविधा विचित्र है। मैं ‘राष्ट्रद्रोही-लिबरल-सेक्यूलर’ मौजूदा दौर में क्या करूँ? पत्रकारिता का धर्म कैसे निभाऊँ? कैसे कहूँ कि “हुज़ूर, वज़ीर-ए-आज़म आपने ‘जनता कर्फ़्यू’ और ‘टोटल लॉकडाउन’ का फ़ैसला लेने में बहुत देर कर दी। जिस वक़्त आप अपने प्रिय दोस्त डोनॉल्ड ट्रम्प के स्वागत वाले ‘इवेंट मैनेजमेंट’ में मशगूल थे, उसी वक़्त आपको भारत को सील कर देना चाहिए था। यहाँ से किसी का विदेश जाना और वहाँ से किसी का भी आना बन्द कर देना चाहिए था। यानी, जो जहाँ है, वहीं रहे और कोरोना से ख़ुद को बचाये।”

यदि भारत समेत दुनिया के तमाम शक्तिशाली देशों ने चीन और दक्षिण कोरिया के अनुभवों से नसीहत ली होती या और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की हिदायत को गम्भीरता से लिया होता तो उनके नागरिकों की इतनी छीछालेदर नहीं होती। कोरोना ने दुनिया को समझा दिया है कि अहंकारी नेतृत्व वाले देशों के लोगों की मौत तक़रीबन फोकट में ही हो जाती है। भारतीय नेतृत्व का भी किसी क्रोनोलॉजी विशेषज्ञ ने ज्ञानवर्धन नहीं किया कि 7 जनवरी को चीनी वैज्ञानिकों ने ‘वुहान वायरस’ के अवतरित होने का ख़ुलासा किया उसकी हरक़तों को देखते हुए 23 जनवरी को वुहान को ‘लॉकडाउन’ करना पड़ा।

अगले दिन राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रम्प, अहमदाबाद पहुँचे। उनके दौरे का ऐलान 11 मार्च को हुआ था। उसी दिन विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने ‘Corona Virus Disease, 2019’ को वैश्विक महामारी (pandemic) बताया था। उसी ने इसे ‘COVID-19’ का नाम दिया और बताया कि तब तक इसकी गिरफ़्त में 110 देशों में 1.18 लाख लोग आ चुके हैं। ट्रम्पोत्सव के छह दिन बाद 31 जनवरी को भारत में कोरोना के पहला पॉजिटिव केस सामने आया। यही वो पहला मौका था जब हमें फ़ौरन लॉकडाउन का रास्ता चुन लेना चाहिए था।

भले ही हमारा नेतृत्व तेज़ी से कड़े फ़ैसले लेने का अनुभवी है, लेकिन हैं तो हम लेट-लतीफ़ ही। पूरे फरवरी और मार्च तक काफ़ी कुछ बन्द होता रहा, लेकिन 4 मार्च को तो देश काँप उठा क्योंकि प्रधानमंत्री ने होली नहीं मनाने का ऐलान कर दिया था। तब लगा कि अब किसी भी वक़्त लॉकडाउन का ऐलान हो जाएगा, क्योंकि अब नेतृत्व को कोरोना की भयावहता समझ में आ चुकी है। इस बीच, कोरोना से संक्रमितों और मृतकों की तरह विदेश से वायरस लेकर आने वालों की संख्या भी बढ़ती रही।

अन्ततः 22 मार्च के ‘जनता कर्फ़्यू’ तक 70 हज़ार लोग भारत आकर कोने-कोने तक जा पहुँचे। हवाई अड्डे पर इन्हें थाम नहीं जा सका, क्योंकि दिल्ली पहुँचने से पहले ये विमान में ही पैरासेटामॉल की गोलियाँ खा लिया करते थे। ताकि थर्मल स्क्रीनिंग इन्हें पकड़ ना सके। इसके बाद राष्ट्रीय सम्बोधनों से ‘कोरोना महाभारत’ को 21 दिन में जीतने का इरादा जताया गया। राजधानी वुहान को छोड़ अब बाक़ी हुबेई प्रान्त में लॉकडाउन में राहत दी गयी है।

वुहान में अब भी 76 दिन का लॉकडाउन जारी है। ये 23 जनवरी को शुरू हुआ था तो 8 अप्रैल तक चलेगा। लेकिन भारत की तारीफ़ ही यही है कि जो काम दूसरे लोग 60 साल में करते हैं वो हम 6 साल में करके दिखा देते हैं। इसी तरह, चीन जो 76 दिन में करेगा, वही हम 21 दिन में कर देंगे। अब माननीय सुप्रीम कोर्ट ऐसे रवैये की शान में कसीदे न पढ़े तो क्या करे!

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प्रधानमंत्री को माफ़ी देकर ग़रीब तो इंसानियत से गद्दारी करने से रहा

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Narendra Modi

आपने भले ही प्रज्ञा ठाकुर को ‘कभी दिल से माफ़ नहीं करने’ का बयान देने के बावजूद माफ़ कर दिया हो, उनके ख़िलाफ़ आपकी पार्टी ने कोई कार्रवाई नहीं की हो, आपने उन्हें बहुत गर्व से अपना माननीय सांसद बनाये रखा हो, लेकिन याद रखिए प्रधानमंत्री जी, अपनी जान की बाज़ी लगाकर सड़कों पर भटक रहे लाखों ग़रीब-मज़दूर आपको कभी माफ़ नहीं कर पाएँगे। यदि दुआओं और बददुआओं का कोई असर होता है तो ऐसे लाखों लोगों और उनके परिजनों की बददुआएँ आपको भस्म करके रख देंगी। हालाँकि, आपका इतिहास बताता है कि आप बददुआओं से ख़ूब फलते-फूलते रहे हैं, लिहाज़ा आपके लिए तो सारा मौक़ा ख़ुशियाँ मनाने का है। फिर माफ़ी माँगने की नौटंकी करने की जहमत आपने क्यों उठायी? कभी मौक़ा लगे तो अपनी जीवनी में इस सवाल का ख़ुलासा ज़रूर कीजिएगा, ताकि आपके भगवा परिवार की आने वाली पीढ़ियाँ आपसे और प्रेरित हो सकें।

प्रधानमंत्री जी, आप सरासर झूठ बोलते हैं, ग़लतबयानी करते हैं कि ‘महज चार घंटे के नोटिस पर राष्ट्रीय लॉकडाउन’ का ऐलान करने के सिवाय आपके पास कोई चारा नहीं था। ऐसी सैकड़ों मिसालें हैं जब आपने ख़ूब आगा-पीछा सोचकर मुस्तैदी से ‘कड़े फ़ैसले’ लेकर दिखाये हैं। लिहाज़ा, ये आपकी सोची-समझी रणनीति है कि आपने कोरोना से निपटने में आकंठ ढिलाई दिखायी। दुविधा और संशय का भरपूर माहौल बनाये रखा। वुहान में 17 नवम्बर को जब नोवेल कोरोना वायरस का पहला मामला सामने आया तब चीन भी इसे पहचान नहीं सका। वहाँ हड़कम्प मचा 31 दिसम्बर को जब एक साथ दर्ज़नों लोग एक जैसी तकलीफ़ों के साथ अस्पताल पहुँचने लगे।

चीनी वैज्ञानिकों और डॉक्टरों ने हफ़्ते भर की जाँच से 7 जनवरी को पता लगा लिया है कि एक नये वायरस ने अवतार ले लिया है। अगले दिन इसे नोवेल कोरोना वायरस का नाम मिला और फ़ौरन इसकी जेनेटिक सिक्वेन्सिंग और इसके इंसान से इंसान में संक्रमित होने की जानकारी विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) को दी गयी। 11 जनवरी को WHO ने इसे वैश्विक महामारी (pandemic) का दर्ज़ा और COVID-19 (Corona Virus Disease, 2019) का नाम दिया। 18 जनवरी को भारत सरकार ने भी अपने हवाई अड्डों पर चीन से आने वालों की जाँच शुरू कर दी। 30 जनवरी को केरल में पहला कोरोना पॉज़िटिव सामने आया।

लेकिन तब तो आप अपनी सियासी तिकड़मों में इस क़दर मशग़ूल थे प्रधानमंत्री जी कि आपको दिल्ली चुनाव, दिल्ली दंगे, बजट, संसद, गोली मारो, शाहीनबाग़, मध्य प्रदेश की सौदेबाज़ी और असंख्य भाषणबाज़ी से ही फ़ुर्सत नहीं थी। पूरे फरवरी के बाद 4 मार्च को जैसे ही आपको दम लिया वैसे ही ऐलान कर दिया कि होली नहीं मनाऊँगा। अगले दिन आपके विदेश दौरे रद्द हुए। यानी, अब तक आप अच्छी तरह से कोरोना की भयावहता से वाकिफ़ हो चुके थे। इसके बावजूद आपने 24 मार्च की रात 8 बजे घोषणा की कि चार घंटे बाद से तीन हफ़्ते के लिए लॉकडाउन शुरू हो जाएगा।

इससे पहले 22 मार्च को आपने थाली-ताली वादन और शंखनाद का आयोजन करवाकर दुनिया तो अपने विलक्षण इवेंट मैनेज़र का पुनः अहसास करवा दिया था। इस वक़्त तक भी आपने कोरोना को अवैध रूप से आयात करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ा। बकौल कैबिनेट सेक्रेट्री राजीव गौबा, आपने 18 जनवरी से 23 मार्च के दौरान विदेश से आने वाले 15 लाख लोगों को कोराना लाने का भरपूर मौक़ा दिया। देश आपकी ऐसी सूझबूझ का प्रदर्शन जम्मू-कश्मीर के विभाजन, 370 के ख़ात्मे, तीन तलाक़, बालाकोट, 1.76 लाख करोड़ के रिज़र्व कैपिटल फंड के इस्तेमाल सम्बन्धी फ़ैसलों में देख चुका है। सभी जानते हैं कि आपके तेज़ी से लिये गये कड़े फ़ैसले आनन-फ़ानन वाले नहीं होते। अन्दर ख़ाने हरेक बारीक़ तैयारी की जाती है।

प्रधानमंत्री जी, अब ये किसी से छिपा नहीं है कि नोटबन्दी और जीएसटी के बाद लॉकडॉउन के लिए भी आपने जो ‘एक क़दम आगे, दो क़दम पीछे’ वाली रणनीति बनायी है, उसमें हीलाहवाली के हालात अनचाहे नहीं, बल्कि जानबूझकर बनाये गये हैं। इसीलिए आपके फ़ैसलों में आपकी राजनीतिक लिप्साओं की भरपूर छाप दिखती है। हमेशा की तरह इस बार भी आप भावुकता का मुखौटा ओढ़कर अमीरों के फ़ायदे की लड़ाई में जुटे हुए हैं। इसीलिए आपकी ऐसी बेशर्मी देखकर हैरानी नहीं होती कि ‘आपके पास कोई चारा नहीं था’। कोई कैसे यक़ीन कर सकता है कि ज़मीन से जुड़ा एक दयालु राजनेता होने के बावजूद आपको ये अन्दाज़ा नहीं था कि लॉकडॉउन के हालात में लाखों प्रवासी और दिहाड़ी मज़दूर कैसे पेट भरेंगे, कहाँ जाएँगे? सुखद सिर्फ़ इतना है कि आपके भक्तों को ये तथ्य चौंकाते नहीं हैं।

प्रधानमंत्री जी, दरअसल आपको ये चिन्ता खाये जा रही थी कि कमबख़्त कोरोना, हिन्दू-मुसलमान क्यों नहीं कर रहा। आपकी तरह ग़रीबों की बातें बनाकर अमीरों के लिए काम क्यों नहीं कर रहा। आपकी ‘फूट डालो और राज करो’ वाली राजनीति को कोरोना ने नंगा कर दिया है। अब लोगों को भी पता चल चुका है कि आप ग़रीब का मुखौटा लगाकर पूंजीपतियों के हितों को साधने वाली आर्थिक नीतियाँ लागू करते हैं।

आपको चौंकाने वाले फ़ैसले लेने में मज़ा आता है। तभी तो आपने अपने राजनीतिक प्रतिद्वन्द्वियों और उनके राजनीतिक दलों की जेबें खाली करने के लिए ही नोटबन्दी की थी। आपके पास अपने शत्रुओं को पहचानकर उन्हें नोट-बदली से रोकने के लिए हर कड़े क़दम उठाने की ज़ोरदार तैयारी थी। तभी तो आपके अपने दल वाले लोगों के लिए नोट-बदली नेटवर्क खुलकर काम करता रहा। आपने मध्यम वर्ग को कंगाल बनाया तो निम्न वर्ग को दूसरों की कंगाली पर हँसना सिखाया। इसके लिए आपने ख़ुद ‘मिमिक्री’ करके परपीड़क हँसी वाली शैली में कितनी बार जनता को बताया कि जब हमने 8 बजे ऐलान किया तो लोगों की क्या दशा हुई!

प्रधानमंत्री जी, ये आपके व्यक्तित्व का ही करिश्मा था कि किसी को ताज्ज़ुब नहीं हुआ कि सबसे बड़े पद पर बैठा व्यक्ति कैसे आम लोगों की तकलीफ़ पर अट्हास कर सकता है। इसीलिए आपका कभी बाल तक बाँका नहीं हुआ। आपने मध्य वर्ग और निम्न वर्ग के बीच बैर-भाव को ही अपना ब्रह्मास्त्र बनाकर दिखा दिया। तभी तो आप लघु और मध्यम उद्योगों में तालाबन्दियाँ करवाकर लाखों-करोड़ों मज़दूरों को सड़कों पर ला पटकने में सफल हुए। उस वक़्त भी उन्हें ज़िन्दा रहने के लिए अपने उसी गाँव-घर लौटना पड़ा था, जहाँ से वो कुछ बेहतर ज़िन्दगी की तलाश में शहरों में आये थे। जबकि आपके पास पठानकोट था, राष्ट्रवाद था, बेजुबान जानवर जैसा पाकिस्तान था, जिस पर गरज-गरजकर आप लोगों में देशभक्ति का उन्माद भरते रहे। पुलवामा का सच, आपने आज तक सामने आने नहीं दिया।

प्रधानमंत्री जी, देश की मासूम जनता को आपने जीएसटी लागू करने के वक़्त भी कोई मामूली धोखा नहीं दिया। इसके लिए संसद में आधी रात को आज़ादी हासिल करने जैसा जश्न मनाया गया। जवाहर लाल नेहरू नहीं बन पाने को लेकर दिखायी गयी आपकी ऐसी कुंठा से देश को क्या मिला? ऐसी आर्थिक मन्दी जिसके आँकड़े छिपाने के लिए आपके जैसे ‘योद्धा’ को भी मज़बूर होना पड़ा। हालाँकि, वो मज़बूरी भी ऐसी नहीं थी जिसे लेकर आप कह पाते कि ‘आपके पास कोई चारा नहीं था’। मन्दी को भी आप कभी हिन्दू-मुसलमान नहीं बना सके। लेकिन इसके लिए आपने कभी किसी से माफ़ी नहीं माँगी, आँसू नहीं बहाये।

प्रधानमंत्री जी, आपकी कार्यशैली की वजह से ही आज सुप्रीम कोर्ट सरकार का घटक दल बनकर कहने लगा है कि कोरोना पर मोदी सरकार ने सन्तोषजनक काम किया है। ऐसा कि सरकार के आलोचक भी उसकी प्रशंसा कर रहे हैं। हालाँकि, इससे पहले आपकी आर्थिक दिव्य-दृष्टि को देखकर कई आर्थिक विशेषज्ञ और रिज़र्व बैंक के दो गर्वनरों ने इस्तीफा देकर चले जाने में ही अपनी ख़ैर समझी। MSME सेक्टर की दुर्दशा और असंगठित क्षेत्र की बेरोज़गारी आपके उन्हीं तेवरों की देन है। आपने हर साल दो करोड़ नौकरी का वादा किया, लेकिन वो मुंगेरी लाल के सपने साबित हुए। उल्टा हक़ीक़त में हर साल लोगों ने एक करोड़ नौकरियों की बलि चढ़ती चली गयी।

प्रधानमंत्री जी, शायद आप जानते नहीं कि ज्यों-ज्यों आपका ‘हार्ड वर्क’ वाला गुरूर बढ़ता गया त्यों-त्यों सुरसा राक्षसी के मुँह की तरह आपकी कुंठाएँ भी बेहिसाब बढ़ती रहीं। तभी तो आपने जनता पर एक नहीं निजी कुंठाओं से भरपूर अनेक फ़ैसले थोपे। इन पर राष्ट्रवाद, महान हिन्दू धर्म, देश-प्रेम वगैरह का मुलम्मा चढ़ा दिया। विरोध को दबाने के लिए आपने मीडिया हॉउसेज़ को ख़रीद डाला। बड़े मीडिया घरानों ने प्रादेशिक संस्करण शुरू करके केन्द्र सरकार से ख़ूब सरकारी मदद भी पायी। आपने मीडिया के हरेक पिरामिड पर खुलकर ताली और थाली बजाने वालों को बिठा दिया। बदले में मालिकों को मालामाल करने का भरोसा दिया। देखते ही देखते देश के मीडिया की डोर प्रधानमंत्री कार्यालय से घूमायी जाने लगी। यही नहीं, सोशल मीडिया के न्यूज़ ऑउटलेट्स में भी हर सुबह कम से कम दो-तीन हेडलाइन्स तय की जाने लगीं।

प्रधानमंत्री जी, हमें याद है आप कहा करते थे कि अगर देश के मीडिया से तालमेल कर लिया जाए तो मुल्क पर कोई भी 50 साल तक राज कर सकता है। हालाँकि, कभी ये बातें आपने काँग्रेस के परिप्रेक्ष्य में कही थीं, लेकिन आपने तो क्रूरता में काँग्रेस के 60 सालों के रिकार्ड को चन्द महीनों में ही ध्वस्त करके दिखा दिया। प्रशान्त किशोर जैसे रणनीतिकारों की ज़रूरत को मिटाकर आपने 2019 का चुनाव विशुद्ध रूप से TINA (There is no alternative) फ़ैक्टर पर लड़ा और विजयी हुए। इसके लिए ये मानते हुए कि आप नाक़ाबिल हैं, प्रचार यही किया गया कि दूसरा भी कोई क़ाबिल नहीं है। आप लगातार यही बेच रहे हैं प्रधानमंत्री जी, तभी तो आज भी आप यही कहते हैं कि कोई चारा नहीं था।

प्रधानमंत्री जी, कोई कैसे ये मान लेगा कि आप मुस्तैदी से फ़ैसले नहीं लेते। अपने चहेते कॉरपोरेट्स के हितों की ख़ातिर किसी सीमा तक जा सकते हैं। इसीलिए आपको जनता पर छपाक से तमाचे जड़ते वक़्त ज़रा सी भी दया नहीं आती। रिज़र्व बैंक को घुटनों पर बिठाकर आपने जो 1.76 लाख करोड़ रुपये ऐंठे थे, उससे जनता को लगा था कि शायद, ये रकम अर्थव्यवस्था को सम्भालने पर ख़र्च होगी, ताकि बाज़ार में माँग बढ़ सके, लेकिन आपने तो सारा पैसा अपने कॉरपोरेट दोस्तों की मदद में झोंक दिया। अब देश स्तब्ध और बेबस है कि आप सार्वजनिक उपक्रमों की खुली बोलियाँ लगवाकर अपने दोस्तों को निहाल करने में जुट गये हैं।

रेल, विमानन, पेट्रोलियम, टेलीकॉम क्षेत्र वाली सरकारी कम्पनियों को औने-पौने में ख़रीदने के लिए आपके यहाँ दोस्त आपके पास यूँ ही लाइन लगाये नहीं खड़े थे। आप भी मुग़ल बादशाहों की तरह कुछेक हज़ार करोड़ रुपये के ख़र्च की आड़ में लाखों करोड़ रुपये वाली कम्पनियों का सौदा कर रहे हैं। विदेश में भारत से बड़ी माली हैसियत वाले देशों को भी मदद की पेशकश करके आपको बादशाहत का अहसास कराने में बहुत सुकून मिलता है।

जम्मू-कश्मीर में अभी तक इंटरनेट सेवाएँ बहाल नहीं हुई हैं। वहाँ के दो करोड़ लोगों को आपने सात महीने से इसलिए लॉकडाउन में रखा है क्योंकि आपने इसे जम्मू-कश्मीर को फ़तह करने की तरह पेश किया। आपको पता है कि वहाँ की मेजॉरिटी पॉपुलेशन आपके फ़ैसले से सहमत नहीं है। लेकिन ऐसे असहमत लोगों पर फ़तह के ज़रिये आप अपने हिन्दू भक्तों को परपीड़ा का सुख देने में सफल हो जाते हैं। आप जानते हैं कि ऐसे फ़ैसलों से कश्मीर में भले ही बीजेपी को भला नहीं हो, लेकिन इससे आप ज़्यादातर मतान्ध हिन्दुओं को सालों-साल तक बरगला सकते हैं। क्योंकि आपने पीढ़ियों से उनमें इस ख़ास कुंठा को ठूँस-ठूँसकर भरा है कि उसे विशेष राज्य का दर्ज़ा सिर्फ़ इसलिए मिला क्योंकि वो मुस्लिम बहुल राज्य है और सरकार के क़ानून के बजाय शरियत से चलती थी।

प्रधानमंत्री जी, आपने पूरे कौशल से मुस्लिम कट्टरपन्थियों की तरह हिन्दू कट्टरपन्थियों की राजनीति को भी स्थायी बना दिया। कभी भारत के अधिकतर हिन्दुओं को इस बात का गर्व होता था कि वो किसी भी प्रगतिशील धर्म से ज़्यादा प्रगतिशील हैं। लेकिन आपने पुरातनवादी रूढियों, धर्म और ध्वजा को देश की राजनीति के केन्द्र में लाकर खड़ाकर दिया। ऐसे में आपको किसी तरह का भेदभाव नहीं करने वाली कोरोना महामारी कतई रास नहीं आ रही। आप समझ नहीं पा रहे हैं कि ऐसे में हिन्दू वोटों की एकजुटता के लिए क्या कदम उठाए जाएँ जिससे आपके कॉरपोरेट मित्रों का और वारा-न्यारा हो सके।

प्रधानमंत्री जी, आपकी विचित्र किस्म की लाचारी है कि कोरोना के रूप में प्रकृति का सन्देश है कि उसके लिए सब बराबर हैं। न कोई अमीर, ना ग़रीब। न हिन्दू, ना मुसलमान। इसीलिए ग़रीब आपकी प्राथमिकता में नहीं हो सकते, क्योंकि उन्हें मज़हब के आधार पर बाँटना असम्भव है। इसीलिए आप उनके प्राणों की एवज में कोरोना से लड़ने से ज़्यादा तरह-तरह का ढोंग कर रहे हैं। अब कोरोना चाहे तो आपको भले माफ़ कर दे, लेकिन ग़रीब-मज़दूर आपको कभी माफ़ नहीं कर पाएगा, क्योंकि आपको माफ़ करना इंसानियत के साथ धोखा होगा, गद्दारी होगी।

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