सिन्धु का पानी तो भारत सिर के बल खड़े होकर भी नहीं रोक सकता! | WeForNewsHindi | Latest, News Update, -Top Story
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पुलवामा हमले के बाद देश में राष्ट्रभक्ति का उन्माद है। कोई युद्ध की दुन्दुभि बजा रहा है, तो कोई पाकिस्तान को दिये गये मोस्ट फ़ेवर्ड नेशन (MFN) के दर्ज़े को ख़त्म करने को निर्णायक कार्रवाई के रूप में पेश कर रहा है। उन्माद की आग इतना प्रचंड है कि पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने पाकिस्तान को जा रहे सिन्धु नदी के पानी को रोकने का मशविरा दे डाला। उरी हमले (18 सितम्बर 2016) के हफ़्ते भर बाद ख़ुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी ये जुमला छोड़ चुके हैं कि पानी और ख़ून एक साथ नहीं बह सकता। हालाँकि, सिन्धु नदी की भौगोलिक सच्चाई ऐसी है कि भारत यदि सिर के बल खड़ा हो जाए तो भी उसका पानी नहीं रोक सकता।

पुलवामा हमले के बाद अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में विदेश सचिव रहे कंवल सिब्बल ने कहा कि “भारत को जितना सख़्त होना चाहिए, वो नहीं हो पा रहा है। भारत को सिन्धु जल सन्धि को तोड़ देना चाहिए। इससे पाकिस्तान सीधा हो जाएगा।” उरी हमले के 27 जनवरी 2017 को प्रधानमंत्री ने जालन्धर की एक चुनावी रैली में ऐलान किया कि “पंजाब के किसानों को ज़्यादा पानी मिलना चाहिए। इसके लिए हमने फैसला किया है कि सिन्धु नदी का जो पानी पाकिस्तान को चला जाता है, वो भारत को मिलना चाहिए।” इससे पहले 25 नवम्बर 2016 को भी मोदी ने बठिंडा की रैली में कहा था, “सिन्धु नदी का पानी भारतीय किसानों का है। हमारे किसानों को पर्याप्त पानी मुहैया कराने के लिए हम कुछ भी करेंगे।”

नामुमकिन है सिन्धु को रोकना

प्रधानमंत्री होने के नाते नरेन्द्र मोदी को अच्छी तरह से मालूम था कि पाकिस्तान के हिस्से वाले सिन्धु के पानी को रोकना तक़रीबन नामुमकिन है। सच्चाई तो ये है कि 1960 में दोनों पड़ोसियों के बीच हुए सिन्धु नदी जल समझौते के मुताबिक़, भारत को जो 20 फ़ीसदी पानी मिला था, उसके दोहन के लिए भी हम आज तक कोई ख़ास इन्तज़ाम नहीं कर पाये। कश्मीर के गुरेज़ सेक्टर में किशनगंगा नदी पर एक बड़ी पनबिजली परियोजना ज़रूर चल रही है, लेकिन एक तो इसके बनकर तैयार होने में अभी दसियों साल और लगेंगे तथा दूसरा इससे बन जाने के बाद भी सिन्धु बेसिन के कुल पानी के मुक़ाबले उसके मामूली सा हिस्से का ही दोहन हो पाएगा।

ऐसा नहीं है कि भारत की पूर्ववर्ती सरकारें सिन्धु नदी के पानी की अहमियत से अनजान थीं। बल्कि सच्चाई तो ये है कि सिन्धु के बेशुमार पानी को रोकना भारत के बूते का ही नहीं है। इसके लिए जितनी बड़ी इंज़ीनियरिंग और जितने अधिक धन का ज़रूरत होगी, उसे जुटाना भारत के लिए बहुत टेढ़ी खीर है। सिन्धु नदी का उद्गम चीन के क़ब्ज़े वाले तिब्बत से होता है। लेकिन महाशक्ति होने के बावजूद चीन चाहकर भी सिन्धु के पानी को अपने ही देश में नहीं रोक सकता। दरअसल, मनुष्य कितना भी बलशाली हो जाए, वो हरेक क़ुदरती ताक़त या भौगोलिक परिस्थिति को ठेंगा नहीं दिखा सकता। ग्लेशियरों (हिमनद) से निकलने वाली हिमालय की बारहमासी नदियाँ अपने साथ बहुत बड़ा पर्यावरण भी बनाती हैं। नदी के क़ुदरती मार्ग में बड़े फ़ेरबदल का सीधा मतलब है कि उसका सारा पर्यावरण भी बदलना होगा। यही पहलू हरेक कल्पना को सीमित करने के लिए काफ़ी है।

गंगा से भी बड़ी है सिन्धु

भारत, चीन और पाकिस्तान के बीच सिन्धु बेसिन क़रीब 11.5 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला है। ये अपनी पाँच सहायक नदियों चिनाब, झेलम, सतलज, राबी और ब्यास के बेसिनों से मिलकर बना है। ये भारत के गंगा बेसिन से भी बड़ा है। उत्तर प्रदेश जैसे चार राज्य सिन्धु बेसिन में समा सकते हैं। सिन्धु की लम्बाई गंगा से भी अधिक यानी 3 हज़ार किलोमीटर से ज़्यादा है। सिन्धु के अलावा सतलज भी चीन से निकलती है। जबकि बाक़ी चारों नदियों का उद्गम स्थल भारतीय सीमा में ही है। कराची और कच्छ के रन के बीच सभी सहायक नदियाँ सिन्धु के डेल्टा में मिलते हुए अरब सागर में विलीन होती हैं।

1960 की सिन्धु जल सन्धि की बदौलत भारत और पाकिस्तान के बीच तीन-तीन नदियों का बँटवारा हुआ। सिन्धु, चिनाब और झेलम जैसी पश्चिमी नदियों का 80 फ़ीसदी पानी पाकिस्तान के और बाक़ी 20 फ़ीसदी पानी भारत के हिस्से में आया। इस पानी का इस्तेमाल सिंचाई और पनबिजली उत्पादन के लिए हो सकता है। बशर्ते, भारत नदी के दुर्गम रास्तों में ऐसे-ऐसे बाँध और बिजलीघर बना सकें जिससे नदी का प्रवाह एक सीमा से ज़्यादा बाधित नहीं हो। ऐसी परियोजनाओं को ‘Run of the river projects’ कहते हैं।

सिन्धु की आड़ में झाँसा

कश्मीर के दुर्गम पहाड़ी और बर्फ़ीले इलाकों की तो छोड़िए, अन्य क्षेत्रों में भी किसी एक नदी बेसिन के पानी को दूसरे नदी बेसिन की ओर ले जाना बहुत मुश्किल काम है। इसमें बड़े पैमाने पर आबादी के विस्थापन की नौबत भी आती है। सबसे बड़ी चुनौती ये है कि क़ुदरत ने किसी भी बेसिन को ऐसा नहीं बनाया है कि वो अपने पड़ोसी बेसिन के अधिकतर पानी को भी सम्भाल सके। वैसे नदियों को जोड़ने की योजना के तहत एक नदी के पानी को दूसरे नदी के बेसिन में भेजने की कल्पना को साकार करने का काम देश के एकाध राज्यों के बीच शुरू हुआ है। लेकिन इससे सम्बन्धित नदियाँ बहुत छोटी हैं।

ज़रा सोचिए कि इन तथ्यों को अच्छी तरह से जानने-समझने के बावजूद देश के महत्वपूर्ण लोग भारतवासियों को कैसी अज्ञानता में ढकेलना चाहते हैं! ऐसे लोगों की मंशा को बेनक़ाब करना ही असली राष्ट्रभक्ति है जो जनता की आँखों में धूल झोंककर अपना सियासी उल्लू सीधा करना चाहते हैं। ऐसा नहीं होने की वजह से ही अन्ध-भक्तों की टोली उन्माद फ़ैलाने लगती हैं। मानों, सिन्धु नदी का पानी रोकना किसी बहते नल को बन्द कर देने जैसा आसान काम है।

भारत में भी तबाही लाएगी सिन्धु

भौगोलिक दृष्टि से देखें तो दो-तिहाई पाकिस्तान सिन्धु बेसिन में बसा है। पाकिस्तान ने सिन्धु पर कई बाँध, सिंचाई के लिए नहरें और पनबिजलीघर बनाये हैं। सिन्धु नदी के अपने ही हिस्से का पानी रोकने के लिए भी भारत को कई विशाल बाँध, विकराल सुरंगें, नहरों का व्यापक जाल तैयार करना होगा। इतना होने के बाद ही सिन्धु जल सन्धि को तोड़ने की बात हो सकती है। कल्पना कीजिए कि जब पाकिस्तान को सिन्धु का पानी नहीं मिलेगा, वहाँ पानी के लिए हाहाकार मचेगा तो क्या दुनिया की महाशक्तियाँ मानवाधिकारों की दुहाई देते हुए दख़ल नहीं देंगी? क्या इससे ऐसा तनाव नहीं पैदा होगा कि युद्ध की नौबत आ जाएगी? युद्ध की दशा में विशाल बाँधों की सुरक्षा असम्भव हो जाएगी। बाँधों के टूटने से पाकिस्तान में तबाही तो बाद में होगी, पहले तो भारत पर क़हर बरपा होगा।

साफ़ है कि जो भी सिन्धु के पानी को रोकने की बातें करने वाले सिर्फ़ हवाई क़िले बनाते हैं। ज़मीनी हक़ीक़त तो ये है कि आज भारत के अधिकतर राज्य अपनी नदियों के पानी को लेकर आपस में ऐसे झगड़ते हैं, मानों वो नेक-दिल पड़ोसी नहीं बल्कि एक-दूसरे के जानी-दुश्मन हों। पंजाब और हरियाणा भी दशकों से यमुना लिंक नहर की मसला नहीं सुलझा सके। पंजाब के लोग किसी भी क़ीमत पर हरियाणा को पानी नहीं देना चाहते। भले ही वो समुन्दर में ही बहकर क्यों न चला जाए! इस जल-विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट के कड़े रवैये से भी आजकल कुछ भी हासिल नहीं हुआ।

राज्यों और केन्द्र में चाहे क्षेत्रीय दलों की सरकारें रही हों या बीजेपी-काँग्रेस जैसे राष्ट्रीय दलों की, देश में अभी तक तो अपनी नदियों के पानी से जुड़े झगड़ों के समाधान की संस्कृति विकसित नहीं हो सकी। फिर भी तुर्रा ये कि हम सिन्धु को मुट्ठी में बाँध लेंगे! काश! ढींगे हाकनें की भी कोई सीमा होती।

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सेना ने माना, आईएलएंडएफएस बांड में फंसा एजीआईएफ का पैसा

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Indian Army insurance ILFS bonds

नई दिल्ली, 18 मार्च | भारतीय सेना जो पहले यह मानने को तैयार नहीं थी कि उनके कल्याण की निधि का पैसा आईएनएंडएफएस के विषैले बांड में फंस गया है, जबकि आईएनएस इस बात को बार-बार दोहराता रहा, लेकिन अब वह स्वीकार करती है कि भारत की एकमात्र निष्पक्ष न्यूज वायर का विश्लेषण सही है।

सेना के पीआरओ ने आखिरकार सवालों का जबाव देते हुए कहा कि आर्मी ग्रुप इंश्योरेंस फंड (एजीआईएफ) के काफी सख्त निवेश नियम हैं। देश के अत्यंत सम्मानित व प्रख्यात वित्तीय शख्सियतों की सलाह पर निवेश किया जाता है। इससे पहले सेना के पीआरओ लेफ्टिनेंट कर्नल मोहित वैष्णव मसले को उलझाते रहे और जवाब नहीं दिए थे। सेना का हालिया बयान आईएएनएस के तथ्यों के साथ इस प्रकार है :

एजीआईएफ का वर्षो से रिटर्न निर्धारित जोखिम लाभ सांचे में काफी बेहतर रहा। आईएएनएस ने इसपर कभी संदेह नहीं किया।

एजीआईएफ को 200 से कोई एनपीए नहीं रहा। इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज (आईएनएंडएफएस) ट्रिपल ‘ए’ रेटेड कंपनी थी और जब एजीआईएफ का निवेश हुआ उस समय उसे केंद्र व राज्य सरकारों दोनों की मदद मिली थी। कंपनी अगस्त 2018 में अचानक चूक के कारण ट्रिपल ‘ए’ से नीचे आ गई।

आईएएलएंडएफएस के 91,000 करोड़ के कर्ज में बैंकों का 63 फीसदी, म्यूचुअल फंड का तीन फीसदी से ज्यादा और बीमा कंपनियों, ईपीएफ वे पेंशन निधि का पांच फीसदी से ज्यादा फंस गया है।

बैंक/एएमसी/पेंशन निधि के मुकाबले एजीआईएफ की रकम अत्यल्प (0.5 फीसदी से कम) है। (सारा कुछ सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है और आईएएनएस का कहना है कि विषैले आईएलएंडएफएस बांड में एजीआईएफ की 210 करोड़ रुपये की रकम फंस गई है।)

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राफ़ेल सौदे में सीएजी ने उड़ाई पारदर्शिता की धज़्ज़ियाँ

राफ़ेल रिपोर्ट में सीएजी ने अपनी प्रतिष्ठा गँवाई, इसने जितने सवालों के जबाब दिये उसके ज़्यादा तो प्रश्न खड़े किये

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Rafale deal scam

राफ़ेल विमानों की ख़रीदारी के लिए भारत और फ़्राँस के बीच हुए सौदे को अन्तर-सरकारी क़रार (आईजीए) कहा गया। आईजीए के इस नामकरण को समझना बहुत मुश्किल है। ख़ासकर, उस घटनाक्रम को देखते हुए जो 10 अप्रैल 2015 से पहले का रहा है। इस दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने फ़्राँसिसी कम्पनी डसॉल्ट से 36 विमान ख़रीदने के फ़ैसले का ऐलान किया था।

यूपीए सरकार ने ग्लोबल टेंडर के ज़रिये दो विमानों के चुना था। पहला, डसॉल्ट कम्पनी का राफ़ेल और दूसरा, चार यूरोपीय देशों में बनने वाला यूरोफ़ाईटर टाइफून। टेंडर में राफ़ेल का दाम कम था। तब यूपीए ने 126 राफ़ेल विमानों की ख़रीदारी के लिए सौदेबाज़ी शुरू की।

ये क़रार दो सरकारों के बीच होने वाला जी-टू-जी समझौता नहीं था। क्योंकि ग्लोबल टेंडर को इस ढाँचे में नहीं रखा जा सकता। यही वजह है कि यूपीए सरकार ने जब रूस या अमेरिका से रक्षा उपकरणों की ख़रीदारी की तभी जी-टू-जी क़रार किये गये। यूपीए ने डसॉल्ट से जिस सौदे की बातचीत की थी, उसके तहत 18 विमानों का निर्माण सीधे डसॉल्ट को करना था और बाक़ी 108 का निर्माण हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) को करना था और डलॉल्ट को इसकी तकनीक मुहैया करवानी थी।

मार्च 2015 में डसॉल्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) ने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि एचएएल के साथ हो रहा समझौता 95 फ़ीसदी पूरा हो चुका है और बाक़ी भी जल्द ही पूरा हो जाएगा। लेकिन प्रधानमंत्री ने उस समझौते को ख़त्म कर दिया और उसकी जगह डसॉल्ट से सीधे 36 विमान ख़रीदने का सौदा किया। इस समझौते से एचएएल को बाहर कर दिया गया। साफ़ है कि अब भी राफ़ेल विमानों की आपूर्ति का ज़िम्मा डसॉल्ट पर ही है, फ़्राँसिसी सरकार पर नहीं। इसके बावजूद, नये सौदे को ‘सरकार से सरकार के बीच’ (जी-टू-जी) नहीं, बल्कि ‘अन्तर-सरकारी क़रार’ (आईजीए) कहा जा रहा है।

नये सौदे की आड़

प्रधानमंत्री की घोषणा का अंज़ाम ये हुआ कि पुराने समझौते से जुड़ी वो सारे शर्ते ख़त्म हो गयीं जिनका ताल्लुक राफ़ेल के दाम से था और जिसे इसे रक्षा ख़रीद प्रक्रिया यानी डिफ़ेंस प्रोक्योरमेंट प्रोसिज़र्स (डीपीपी) के तहत तय किया गया था। दूसरे शब्दों में, अब पुराना क़रार ख़त्म हो गया और उसकी जगह 36 विमानों की पूरी तरह से नयी डील (सौदे) ने ले ली। 2015 में फ़्राँस की धरती पर किये गये प्रधानमंत्री के ऐलान से भारत सरकार पशोपेश में फँस गयी, क्योंकि ये प्रधानमंत्री का एकतरफ़ा फ़ैसला था। अब आगे की बातचीत का दारोमदार सीधे-सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) पर आ गया।

नये सौदे की शर्तों पर बातचीत करने का जो रास्ता प्रधानमंत्री कार्यालय ने चुना वो रक्षा ख़रीद प्रक्रिया (डीपीपी) और रक्षा ख़रीद परिषद (डिफ़ेंस एक्वीज़ीशन काउन्सिल – डीएसी) के दायरे से बाहर था। क्योंकि रक्षा ख़रीद के लिए सौदेबाज़ी करने का काम डीपीपी को करना होता है। ये उसी का क्षेत्राधिकार है। इसीलिए राफ़ेल की फ़ाइल में रक्षा मंत्रालय के अफ़सरों की टिप्पणी ने प्रधानमंत्री कार्यालय पर सीधा-सीधा आक्षेप किया। दस्तावेज़ों से साबित हो गया कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने सौदेबाज़ी में रक्षा मंत्रालय की रसूख़ को गिरा दिया। दिलचस्प ये भी रहा कि नये सौदे में दो नयी बातें हुईं। पहला, एक ऑफ़सेट पार्टनर का जुड़ना और दूसरा, हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के हाथों से 108 विमानों के निर्माण की शर्ते का ख़त्म होना।

नया क़रार ‘अन्तर-सरकारी’ (आईजीए) नहीं है। क्योंकि डसॉल्ट एक निजी कम्पनी है। ये फ़्रेंच सरकार की भी कम्पनी नहीं है। इसीलिए फ़्रेंच सरकार ने 36 विमानों की सप्लाई की गारंटी लेने वाली शर्त से अपना पल्ला झाड़ लिया। फिर सप्लायर होने के नाते डसॉल्ट को गोपनीयता और कमीशन की शर्तों से छुटकारा दिलाने के लिए ज़ुर्माने और भ्रष्टाचार से जुड़े प्रावधानों को हटाया गया। ये काम प्रधानमंत्री कार्यालय की शह के बग़ैर कैसे मुमकिन हुआ? इसकी क्या वजह रही और ऐसा किससे कहने से हुआ? इन सवालों का कोई जबाब नहीं मिला।

रक्षा ख़रीद परिषद (डीएसी) को दरकिनार करने के लिए ऐसी शर्तें तैयार की गयीं जिससे प्रधानमंत्री और फ़्रेंच सरकार के लिए मुश्किलें पैदा नहीं हों। गारंटी की जगह उस ‘लेटर ऑफ़ कम्फर्ट’ (सहुलियत पत्र) ने ले ली जिसका कोई क़ानूनी प्रभाव नहीं होता। यहाँ तक कि फ़्रेंच सरकार ने डसॉस्ट को भुगतान करने के लिए अपने ‘स्क्रू खाते’ की सुविधा भी नहीं दी। शायद इसीलिए, क्योंकि फ़्रेंच सरकार इस सौदे की किसी भी ज़िम्मेदारी लेने से बचना चाहती थी। स्क्रू खाते के ज़रिये फ़्रेंच सरकार को ये सुनिश्चित करना होता कि डसॉल्ट ने अपनी शर्तों को निभाया, तभी उसे भुगतान हुआ।

ख़ामियों भरी रिपोर्ट

सीएजी ने कई तरह से देश को गच्चा दिया। पहला, इसकी रिपोर्ट 36 विमानों के दाम तक सीमित रही। इसका कहना है कि यूपीए के दौर वाले क़रार के मुक़ाबले नया सौदा 2.86% सस्ता है। लेकिन इस नतीज़े पर पहुँचने से पहले सीएजी ने सभी तथ्यों का ख़ुलासा नहीं किया। कहना मुश्किल है कि सीएजी ऐसा कैसे कर सकता है! दूसरा, सीएजी ने ये नहीं बताया कि प्रधानमंत्री ने किस आधार पर 36 विमानों की सीधी ख़रीदारी का साहसिक फ़ैसला लिया। तीसरा, सीएजी रिपोर्ट ने 2013 से लागू रक्षा ख़रीद प्रक्रिया (डीपीपी) को दरकिनार किये जाने के प्रति अपने नज़रें पूरी तरह से फेर लीं।

चौथा, सीएजी रिपोर्ट में इस तथ्य के प्रति भी उदासीनता दिखायी गयी है कि भारत की सौदेबाज़ी टीम ने एक ऐतराज़ ज़ाहिर किया है और उसे ठुकराने या ख़ारिज़ करने के लिए क्या दलीलें हैं। पाँचवाँ, सीएजी रिपोर्ट ने ये भी साफ़ नहीं किया कि नये क़रार के मसौदे से भ्रष्टाचार-विरोधी प्रावधान ग़ायब क्यों हैं। छठा, सीएजी रिपोर्ट ये तो बताती है कि गारंटी नहीं मिलने का कोई वित्तीय नुकसान नहीं होगा, लेकिन रिपोर्ट ये साफ़ नहीं करती कि गारंटी का प्रावधान क्यों नहीं है।

सबसे आश्चर्यजनक तो ये रहा कि सीएजी ने राफ़ेल के चयन के लिए यूपीए की आलोचना की, लेकिन उसी विमान को जब प्रधानमंत्री ने चुनने का फ़ैसला किया तो सीएजी की बोलती बन्द थी। इतना ही नहीं, राफ़ेल विमानों की संख्या को 126 से घटाकर 36 करने को लेकर भी जो उद्देश्य बताया गया वो ये कि भारतीय वायुसेना में विमानों की भारी कमी है जिसे यथाशीघ्र पूरा करना ज़रूरी था। लेकिन जब यूपीए के सौदे की तुलना मोदी सरकार के क़रार से की गयी तो पता चला कि नये सौदे में सिर्फ़ एक महीने की बचत होगी।

साफ़ है कि मौके की नज़ाक़त को देखते सीएजी अपनी अपेक्षाओं पर ख़रा नहीं उतरा। उसने अपने दायरे से बाहर जाकर सरकार की सुरक्षा करने का रास्ता चुना। अब तो सीएजी की प्रतिष्ठा को भी सुरक्षित करना होगा।

(लेखक, राज्यसभा सांसद, पूर्व केन्द्रीय मंत्री और वरिष्ठ काँग्रेस नेता हैं।)
(साभार: TheHindu)

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सरकार और मीडिया ही बने लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक

लोकतांत्रिक संस्थाओं के पतन का सबसे बड़ा सबूत है, ग़लत जानकारियों को ही विश्वसनीय बनाकर पेश करना

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Modi on TV

ज़माना बदल गया। हमारा राष्ट्रीय संवाद अब पक्ष-विपक्ष का नहीं रहा, बल्कि दोस्तों और दुश्मनों का हो चुका है। चर्चा और बहस की गुंज़ाइश नहीं रही। आज जो सरकार या उसके बैठे लोगों के विरोध में हो, उसे देशद्रोही कहा जाता है। ऐसा माहौल बना दिया गया है कि पाकिस्तान से सम्बन्धित सरकार के हरेक क़दम का समर्थन करना ज़रूरी है। यदि विपक्ष ऐसे सवाल पूछता है, जिन्हें पूछा ही जाना चाहिए तो उस पर राष्ट्रविरोधी होने का आरोप मढ़ दिया जाता है। फ़ेसबुक औऱ ट्वीटर जैसे सोशल मीडिया के माध्यमों पर भी यदि कोई सरकार की आलोचना करता है तो उसके ख़िलाफ़ देशद्रोह का मुक़दमा ठोंक दिया जाता है।

लोकसभा के चुनाव सामने पाकर जन-संवाद को इतना हानिकारक बना दिया गया है कि बात बर्दाश्त से बाहर हो गयी है। प्रधानमंत्री कुछ भी बोलें लेकिन उनके गुणगान के लिए इलेक्ट्रानिक मीडिया ने चीयरलीडर्स या भाँडों की भूमिका थाम ली है। जब ‘द हिन्दू’ अख़बार ने बोफ़ोर्स ख़ुलासा किया था, तब विपक्ष ने राजीव गाँधी से सवाल पूछे थे। लेकिन जब उसी ‘द हिन्दू’ ने राफ़ेल सौदे का भाँडाफोड़ किया तो सरकार ने ‘द हिन्दू’ को ही कठघरे में खड़ा कर दिया। विपक्ष के सवालों को ऐसे पेश किया गया जिनसे सुरक्षा बल कमज़ोर पड़ जाएँगे।

मुझे अच्छी तरह से याद है कि जब 26 नवम्बर 2008 को मुम्बई पर आतंकी हमला हुआ था, तब मुठभेड़ के दौरान ही गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मुम्बई पहुँचकर केन्द्र सरकार को नकारा होने और राष्ट्रीय सुरक्षा में नाकाम रहने का तमग़ा दे दिया। लेकिन जब पुलवामा हमला हुआ तो सरकार ने उन्हीं लोगों पर सवाल दाग़ने शुरू कर दिये जो उससे सवाल पूछ रहे थे। लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी की यादाश्त बहुत कमज़ोर है। मोदी उस वक़्त देश की सरकार के समर्थन में नहीं खड़े जब मुम्बई में आतंकी तबाही मचा रहे थे। शायद, उन्हें उस वक़्त अपनी कथनी और करनी में राष्ट्रभक्ति की छटा दिखायी दे रही थी।

ऐसी वारदातों के सामने मीडिया का दोहरा चरित्र बेनक़ाब हो गया है, क्योंकि अब उसके पास प्रधानमंत्री के दोमुँही बातों को उजागर करने का वक़्त नहीं है। ये मिसाल है कि हमारी लोकतांत्रिक संस्थाएँ अब कहाँ से कहाँ पहुँच चुकी हैं। 2014 से पहले पहले प्रेस और इलेक्ट्रानिक मीडिया ने संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन (यूपीए) की क़दम-क़दम पर चीड़फाड़ की। आज वही लोग इस सरकार के लिए भाँड या चीयरलीडर्स बन गये हैं। हालाँकि, ये बात मीडिया का सभी वर्गों पर लागू नहीं होती है। आज विपक्षी नेताओं के तक़रीबन सारे बयानों को तोड़-मरोड़कर पेश किया जाता है। आज सरकार के हर क़दम को राष्ट्रभक्ति बताकर उसका स्तुतिगान किया जाता है। प्रधानमंत्री और इस सरकार के हरेक मंत्री के बयान को अक्षरशः सत्य बनाकर पेश किया जाता है। उन आँकड़ों को लेकर कोई सवाल नहीं पूछे जाते जिन्हें राष्ट्रीय सैम्पल सर्वे (एनएसएसओ) जारी करता है। कोई सरकार से ये नहीं पूछ रहा कि वो किस आधार पर बालाकोट में 300-400 आतंकियों के सफ़ाये का दावा कर रही है। पत्रकारों और टीवी के एंकरों में प्रधानमंत्री को उनकी हैसियत से बड़े से बड़ा करके दिखाने की होड़ मची हुई है।

कई योजनाओं के नाम बदलकर उनकी उपलब्धियों के बारे में सरकार जो आँकड़े पेश करती है, कोई उसकी सच्चाई को जाँचने वाला नहीं है। जो लोग सच्चाई को सामने रखते हैं उनके साथ दक्षिण-पन्थी भक्तों की टोली ग़ाली-गलौज़ करती है। विपक्ष के नेताओं को फ़र्ज़ी बयान को जोड़कर उन्हें वायरल करवाया जाता है, ताकि उनका चरित्र-हनन किया जा सके। लेकिन दूसरी ओर, फ़ेसबुक और ट्वीटर के अफ़सरों को बुलाकर सरकार तलाड़ती है कि वो उसके क़रीबियों के चुनिन्दा पोस्ट को क्यों हटा रही है। सरकार को उन फ़ेक-पोस्ट की परवाह नहीं है, जिनमें विपक्षियों को निशाना बनाया जाता है। भ्रष्ट जानकारियों को आज विश्वसनीय सूचनाएँ बनाकर पेश किया जाता है। हर तरफ़ से ये झूठ फ़ैलाया जा रहा है कि मोदी सरकार ने भारत की दिशा ही बदल दी है।

अख़बारों में प्रधानमंत्री के विज्ञापन भरे पड़े हैं। इन पर जनता का पैसा बहाया जा रहा है, लेकिन कोई सवाल उठाने वाला नहीं है। मुट्ठीभर सम्पादकों ने सरकार को आड़े हाथों लेने का साहस दिखाया है। वो बधाई के पात्र हैं। लेकिन लोकतंत्र के चौथे खम्भे का ज़्यादातर हिस्सा सरकार की जाग़ीर बन चुका है। मीडिया की साख़ इतनी गिर चुकी है कि समाज के बहुत बड़े तबक़े ने टेलीविज़न देखना बन्द कर दिया है, क्योंकि अब वो इसे ख़बरें देने वाले माध्यम के रूप में नहीं पाते हैं। हर शाम को कुछ चैनलों पर कुछ ख़ास लोगों की साउंड बाइट सर्कस करते नज़र आती है। इनके ज़रिये समाज में ज़हर परोसा जाता है। ये लोकतंत्र का अराजक चेहरा है, जो सिर्फ़ झूठ और दुष्प्रचार के भरोसे क़ायम है।

यदि सरकार और चौथा खम्भा यानी मीडिया, एक ही चट्टा-बट्टा बन चुके हैं तो लोकतंत्र भारी ख़तरे में है। इसीलिए बहुत महत्वपूर्ण है कि वो लोग आगे आयें जो अपनी बातों को प्रभावी तरह से रखना जानते हैं। यदि ऐसे लोग मुखर नहीं होंगे तो झूठ और अफ़वाह को कौन चुनौती देगा। सच को कौन सामने लाएगा। हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं को संविधान से जो ज़िम्मेदारियाँ मिली हैं, उसे लेकर उन्हें सरकार के प्रति नहीं बल्कि देश के प्रति जबाबदेह होना चाहिए। उन्हें सरकार की रखैल बनने के बजाय अपने विवेक के काम लेना चाहिए। चाहे केन्द्रीय हो या प्रादेशिक, जाँच एजेंसियों को चाहिए कि वो डर और पक्षपात के बग़ैर क़सूरवार लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करें। लेकिन ये बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि जाँच एजेंसियाँ चुन-चुनकर उन लोगों को निशाना बना रही हैं, जो सरकार के विरोधी हैं, जबकि उन लोगों को नज़रअन्दाज़ किया जाता है जो या तो सरकार के क़रीबी हैं और फिर उसका हिस्सा हैं। न्यायपालिका को भी ये समझना होगा कि यदि वो बेक़सूर लोगों के हक़ में नहीं खड़ी होती तो उसे निष्पक्ष नहीं माना जा सकता।

ख़ुशहाली और अच्छे दिन के लिए शान्ति, सद्भाव और लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा ज़रूरी है। ऐसा लगता है कि आज हम ऐसे अन्यायपूर्ण भारत में रह रहे हैं, जहाँ कमज़ोर तबकों के लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ सपने हैं। मुट्ठी भर लोगों को छोड़कर चारों ओर नाउम्मीदी नज़र आती है।

(लेखक, राज्यसभा सांसद, पूर्व केन्द्रीय मंत्री और वरिष्ठ काँग्रेस नेता हैं।)
(साभार: द टेलिग्राफ)

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