Connect with us

ब्लॉग

‘नये भारत’ में गेरुआ रंग त्याग-तपस्या का नहीं बल्कि आतंकियों का हुलिया बना

Published

on

Kanwariyas vandalise vehicle

महज 50 महीने में ही नरेन्द्र मोदी के सपनों का ‘नया भारत’ बनकर तैयार हो चुका है! बीजेपी के आलीशान मुख्यालय के डेढ़ साल में बनकर तैयार होने के बाद 50 महीने की अल्पावधि में ‘नये भारत’ का निर्माण हर मायने में ऐतिहासिक उपलब्धि है! इस ‘नये भारत’ में उत्तर प्रदेश पुलिस के अतिरिक्त महानिदेशक प्रशान्त कुमार जहाँ काँवड़ियों पर हेलिकॉप्टर से पुष्प वर्षा करते हैं, वही काँवड़िये कभी बुलन्दशहर में पुलिस के वाहन में तोड़फोड़ करते हैं, तो कभी मेरठ में इसलिए बलवा किया जाता है कि वहाँ काँवड़ियों को एक मीट की दुकान खुली दिख गयी।

बरेली के खेलुम गाँव से 250 स्थानीय हिन्दुओं और मुसलमानों ने इसलिए पलायन कर लिया कि वहाँ से शिवभक्त काँवड़ियों का जुलूस गुज़रने वाला है। ग्रेटर नोएडा में काँवड़ियों के दो गुटों के बीच हुई हिंसक झड़प को भी ‘नये भारत’ की गौरवशाली घटना के रूप में देखा जा सकता है। गोरखपुर में एक दारोगा का वर्दी में योगी आदित्यनाथ को शाष्टांग करना भी ‘नये भारत’ की अद्भुत उपलब्धि है। साध्वी प्राची जैसे भगवा प्रचारक ने तो ये माँग करके ‘नये भारत’ में चार चाँद जड़ दिये कि काँवड़-यात्रा को देखते हुए मस्जिदों के लाउडस्पीकरों पर रोक लगा दी जाए। दिल्ली में भी काँवड़ियों ने एक कार को अपना ताँडव रूप दिखाकर ‘नये भारत’ का जश्न मनाया।

‘नये भारत’ का ही जश्न मुज़फ़्फ़रपुर और देवरिया के बालिका आश्रय गृहों में रहने वाली बच्चियों को देह-व्यापार में ढकेलकर मनाया गया। इसे भी उन्हीं हिन्दुओं ने अन्ज़ाम दिया जो नवरात्रियों में कन्या-पूजन का पुण्य बटोरते हैं। हरदोई में भी ऐसे ही एक नारी निकेतन पर ज़िलाधिकारी की गाज़ गिरी जहाँ सरकारी अनुदान की बन्दरबाँट के लिए रिकॉर्ड में महिलाओं की संख्या को बढ़ाचढ़ाकर दिखाया गया था। ‘नये भारत’ की ऐसी तमाम उपलब्धियों में लिंचिंग की अनेक गौरवशाली घटनाएँ भी शामिल हैं। मुमकिन है कि ऐसे पाप मोदी युग से पहले भी होते रहे होंगे, लेकिन मौजूदा ‘नये भारत’ में बीते ज़माने के पापों का उद्धार करके उन्हें पुण्य का जामा पहनाया जा चुका है। इसीलिए मोदी राज का ‘नया भारत’ अद्भुत है! अतुलनीय है!

‘नये भारत’ की इन ताज़ातरीन उपलब्धियों के केन्द्र में काँवड़ियों का वो गेरुआ या भगवा रंग भी है जो कभी त्याग और वैराग्य का प्रतीक होता था। लेकिन 1990 के दशक वाले अयोध्या कांड के दौर के बाद यही गेरुआ रंग उन्मादी, दंगाई, बलवाई, व्याभिचारी और आतंकवादियों की रंगत बन गया। कालान्तर में गेरुआ की आड़ में हरेक कुकर्म होने लगे। शिवसैनिकों और बजरंगदलियों को भी गेरुआ रंग बहुत प्रिय रहा है। गेरुआ धारण करते ही उनका ख़ून भी वैसे ही उबलता है, जैसे काँवड़ियों का रक्तचाप और मानसिक सन्तुलन बेक़ाबू हो जाता है। इसीलिए ‘नये भारत’ में गेरुआ रंग त्याग-तपस्या का नहीं बल्कि हिन्दू आतंकवादियों का पसन्दीदा हुलिया बन चुका है। काँवड़िये जब हाथों में तिरंगा थाम लेते हैं तो वो ऐसे और उदंड हो जाते हैं, जैसे राष्ट्रसेवा की तीर्थयात्रा कर रहे हों!

मोदी राज के ‘नये भारत’ में हिन्दू आतंकियों को हिन्दू तालिबानी भी कह सकते हैं और हिन्दुत्व के क्रान्तिकारी भी! इन गेरुआधारियों को संघ-बीजेपी की खुली शह हासिल है। लिंचिंग इनकी भाषा का बुनियादी व्याकरण है। मौजूदा दौर में यही राष्ट्रभक्त और धर्मभीरू लोगों की जमात भी है। यही सोशल मीडिया वाले पालतू ट्रोलर भी हैं। इनकी मानसिकता ही अब पुलिस की वर्दी में घूमते सुपारीबाज़ हत्यारों में भी देखी जा सकती है। गेरुआ से ओतप्रोत सत्ता प्रतिष्ठान ऐसे पुलिसवालों को भी वैसे ही अपनी भ्रष्ट जाँच एजेंसियों से सुरक्षा प्रदान करवाता है, जैसे काँवड़ियों को अभय-दान हासिल होता है। यही लिंचिंग-वीर कभी-कभार मीडिया के स्टिंग ऑपरेशन में अपनी वीरगाथा सुनाते हुए भी दिख जाते हैं!

अब सवाल ये है कि क्या ये उत्पाती गेरुआधारी हमारे-आपके परिवारों के ही भटके हुए, अल्प-शिक्षित, आंशिक रोज़गारधारी लोग नहीं हैं? क्या इनके दिमाग़ को ही वैसे विषाक्त (indoctrinated) नहीं किया गया है, जैसा हम पाकिस्तान से आने वाले आतंकियों के मामले में देखते आये हैं? गेरुआधारी हिन्दू आतंकियों को पाकिस्तान, सीमापार के शिविरों से नहीं भेजता। इन्हें तो नागपुर अकादमी की शाखाएँ दिन-रात भारत के ही कोने-कोने में दीक्षित और प्रशिक्षित करती रहती हैं। यही गेरुआधारी थोड़े दिनों बाद गणेश-उत्सव और फिर दुर्गापूजा और कालीपूजा के वक़्त भी उन्माद फैलाते नज़र आएँगे। यही लोग मोदी-राज की पकौड़ा-योजना को भी सफलता की नयी बुलन्दियों पर पहुँचा रहे हैं, ताकि मोदी-शाह के ‘नये भारत’ को यथाशीघ्र संघ प्रमुख मोहन भागवत के सपनों वाला ‘विश्व-गुरु’ बनाया जा सके!

अगला सवाल है कि विश्व-गुरु के गेरुआधारी परम शिष्यों की करतूतों को शर्मनाक या दुःखद कैसे कहा जा सकता है? जिस दिन बहुसंख्यक-मध्यमवर्गीय-मन्दबुद्धि-सवर्ण हिन्दू समाज इन सवालों का जबाब जान जाएगा, उसी दिन मक्कारों का राज ख़त्म हो जाएगा। हालात वैसे ही अपने आप सुधरने लगेंगे, जैसे ज्वलनशील पर्दाथों के जलकर खाक़ हो जाने के बाद बड़ी से बड़ी आग भी अपने आप शान्त हो जाती है!

फ़िलहाल, आप चौकन्ना रहकर इस बात का हिसाब रख सकते हैं कि किन-किन नेताओं ने गेरुआ परिधानों में घूम रहे काँवड़ियों के उत्पातों की निन्दा की और उनके ख़िलाफ़ ‘कड़ी कार्रवाई’ की दुहाई दी! ग़ौर कीजिएगा कि कितने भगवा बयान-वीर ये कहने का साहस जुटा पाते हैं कि ‘क़ानून अपना काम करेगा!’ अरे, क़ानून कहीं होगा, तभी तो कुछ करेगा! अभी तो आप क़ानून-रहित भारत में आनन्दित होने का सुख लीजिए, यदि ले सकें तो!

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

ब्लॉग

अटल जी ने कुछ बहुत अच्छा दिया तो कुछ बहुत ख़राब भी!

आज़ादी से पहले जहाँ वो अँग्रेज़ों की मुख़बिरी करने और उनका वादा-माफ़ गवाह बनने की ख़ता कर चुके थे। वहीं आज़ादी के बाद उन्होंने अपने लड़कपन की उन ग़लतियों को दुरुस्त किया। उन्होंने हमेशा अपने विरोधियों पर व्यक्तिगत हमलों से परहेज़ किया।

Published

on

Atal Bihar Vajpaeee

अटल बिहारी वाजपेयी नहीं रहे! कई वर्षों से अपनी नश्वर काया ढो रहे थे। गिरती सेहत उन्हें 2009 में राजनीति से दूर ले गयी। अपनी विनम्रता की वजह से महाप्रयाण के बाद उन्हें करोड़ों लोगों की श्रद्धा मिल रही है। वो इसके सच्चे हक़दार भी हैं। अटल जी, गाँधी-नेहरू युग के नेता थे। इन महान हस्तियों के व्यक्तित्व की छाप हमेशा उन पर दिखायी दी। वो महात्मा गाँधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे के ख़ानदान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से सम्बद्ध अवश्य थे, लेकिन उन्होंने हमेशा अपनी उदार, प्रगतिशील और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति आस्थावान नेता की छवि को बनाये रखा। वो दशकों तक उस कट्टर और साम्प्रदायिक संगठन में शीर्ष पर भी रहे, जहाँ वो अक्सर अटपटे भी लगते थे।

अटल जी की सबसे बड़ी उपलब्धि ये रही कि उन्होंने भारत को गठबन्धन की राजनीति को सफल बनाने का गुरुमंत्र दिया। इस हुनर को उन्होंने अपनी विफलताओं से ही निखारा था। संघी होने के बावजूद अटल जी प्रगतिशील और प्रयोगधर्मी थे। प्रयोगधर्मिता ने ही उन्हें विनम्र और शालीन बनाया था। इससे वो अपने क़रीब आने वालों के लिए सहज सुलभ हो पाते थे। इसी वजह से लाखों लोगों के पास अटल जी से जुड़े सुहाने संस्मरण हैं। किसी जन-नायक की यही सबसे बड़ी पूँजी है। 93 वर्ष की परिपूर्ण आयु के साथ विदा लेने पर जनमानस में पसरा अफ़सोस भी उसी पूँजी की वजह से है। उसी पूँजी के लाभांश की वजह से आज भारत के करोड़ों लोगों आँखें डबडबायी हुई हैं।

आज़ादी के बाद अटल जी के व्यक्ति ने बड़ी करवट ली। आज़ादी से पहले जहाँ वो अँग्रेज़ों की मुख़बिरी करने और उनका वादा-माफ़ गवाह बनने की ख़ता कर चुके थे। वहीं आज़ादी के बाद उन्होंने अपने लड़कपन की उन ग़लतियों को दुरुस्त किया। उन्होंने हमेशा अपने विरोधियों पर व्यक्तिगत हमलों से परहेज़ किया। सरकार की नीतियों की ज़ोरदार आलोचना ही उनका हथियार था। कालान्तर में इसी सिलसिले ने अटल जी के व्यक्तित्व में लोकतांत्रिक उदारवाद को स्थापित किया।

Image result for atal bihari vajpayee 7 race course

अटल जी के प्रधानमंत्रित्व काल में मैंने प्रधानमंत्री कार्यालय, संसद, बीजेपी और संघ की बीट पर टीवी चैनल्स के लिए ख़ूब रिपोर्टिंग की। इसी वजह से सैकड़ों बार अटल जी को क़रीब से देखने और उनसे सवाल पूछने के अवसर मिले। प्रधानमंत्री निवास के समारोहों में सैंकड़ों बार शिरकत करने का मौका मिला। हरेक मौसम में हज़ारों घंटे 7 रेसकोर्स पर बने मीडिया स्टैंड पर बिताये। सैकड़ों बार वहाँ से घंटों-घंटों की लाइव रिपोर्टिंग भी की। उस दौर में स्तरीय पत्रकारिता पर कोई अंकुश नहीं था। सम्पादक भी सच्ची और तेज़ ख़बर के मुरीद होते थे। उस दौर का रोमांच ही निराला था! इसमें अटल जी जैसे उदार राजनेता और पत्रकारों के प्रति सहृदय व्यवहार रखने वाली शख़्सियत का सबसे बड़ा योगदान था।

विरोधियों की नज़र में आदर योग्य बनना किसी भी राजनेता का सबसे बड़ी उपलब्धि होती है। अटल जी के सन्तुलित व्यक्तित्व की वजह से ही विरोधी भी उनका आदर करते थे। वो उस नस्ल के नेता थे, जो अपशब्दों के बग़ैर कड़े प्रहार करना जानते थे। इस लिहाज़ से अटल जी को जवाहर लाल नेहरू, राम मनोहर लोहिया, मधु दंडवते और सोमनाथ चटर्जी जैसे नायकों की श्रेणी में रखा जा सकता है। ज़िन्दगी भर संघ जैसे पुरातनपन्थी और हिन्दुत्ववादी घराने में रहने के बावजूद अटल जी मानवीय मूल्यों के संरक्षक थे। नागरिकों के मूल अधिकारों के समर्थक थे। हालाँकि, इसी मोर्चे पर उन्हें सबसे ज़्यादा आघात भी लगे। लेकिन आलोचकों ने हमेशा इसके लिए उन्हें कम और उनकी संगत को ज़्यादा कसूरवार माना।

Image result for atal bihari vajpayee 7 race course media stand

In Pic : Chandrashekhar, Atal Bihari Vajpayee and PV Narsimha Rao

प्रधानमंत्री बनने के बाद अटल जी ने कई ऐतिहासिक फ़ैसले लिये। पोखरण-2 की वजह से भारत पर आर्थिक प्रतिबन्ध लगा। तब अपनी और वित्त मंत्री यशवन्त सिन्हा की सूझ-बूझ से अटल जी झंझावात को बख़ूबी पार किया। नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह की विरासत वाली अर्थनीति में उन्होंने सुधारों को आगे बढ़ाया। बाल्को, माडर्न ब्रेड और आईटीडीसी जैसे विनिवेश के फ़ैसले ख़ासे विवादित हुए। लेकिन प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, नैशनल हाईवे प्रोजेक्ट से अटल जी का प्रशासनिक और राजनीतिक कौशल साफ़ नज़र आया। लेकिन कारगिल युद्ध, आतंकवादियों को कन्धार पहुँचाना और तलहका कांड में बीजेपी अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण और एनडीए के संयोजक जॉर्ज फर्नांडिस का लपेटे में आना भी अटल-युग का स्याह पक्ष बना।

Image result for atal bihari vajpayee gujarat riots

Narendra Modi with Atal Bihari Vajpayee

कश्मीर के मोर्चे पर अटल-नीति सफल नहीं हुई। लेकिन 2002 में साफ़-सुथरे चुनाव करवाने से भारत सरकार की प्रतिष्ठा में काफ़ी इज़ाफ़ा हुआ। उसी साल अटल जी की राजनीतिक कमज़ोरी भी दिखायी दी। गुजरात बीजेपी में गुटबाज़ी और भ्रष्टाचार से ऐसी उथल-पुथल मची कि नहीं चाहते हुए भी अटल जी को गुजरात की क़मान नरेन्द्र मोदी जैसे नीयतख़ोर कार्यकर्ता के हवाले करनी पड़ी। मोदी ने झूठ, दुष्प्रचार, नफ़रत और धार्मिक कट्टरवाद को हवा दी और तरह-तरह की साज़िशें रची गयीं। नतीज़तन, गोधरा और गुजरात का कलंक भी अटल जी के मत्थे ही आया। उन्होंने ‘राजधर्म’ की दुहाई दी, लेकिन मोदी को हासिल संघ की खुली शह के आगे उसे अनसुना कर दिया गया। कालान्तर में चुनावी जीत की आड़े में मोदी के पापों पर लगातार पर्दा पड़ता चला गया।

Image result for atal bihari vajpayee babri masjid speech

लेकिन अटल जी को गुजरात दंगों की भारी क़ीमत चुकानी पड़ी। 1992 में बाबरी मस्जिद के ढहाये जाने के बाद ये दूसरा मौका था, जब अटल जी को अपनी उदार छवि की वजह से उस बीजेपी और संघ में मुँह की खानी पड़ी, जिसके वो ख़ुद एक कारिन्दा या स्वयंसेवक थे। संघ ने उनकी नरम छवि को भी जमकर भुनाया। 2002 के गुजरात दंगों की कालिख ने जहाँ 2004 में अटल जी को सत्ता से बेदख़ल कर दिया, वहीं चुनाव हारते ही संघ ने अटल जी के प्रति बेरुखी दिखानी शुरू कर दी। तब शायद, वक़्त का निर्मम पहिया अटल जी से जनसंघ के पहले अध्यक्ष बलराज मधोक के साथ जो गुज़री, उसका हिसाब ले रहा था।

2004 की हार से आहत अटल बिहारी वाजपेयी जून 2004 में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी से पहले मनाली चले गये। वहाँ से उन्होंने दो-टूक बयान दिया कि गुजरात दंगों की वजह से हार हुई है। लिहाज़ा, कार्यकारिणी को नरेन्द्र मोदी पर फ़ैसला करना होगा। अगले दिन इस बयान की सुर्ख़ियाँ बनते ही अहमदाबाद में इशरत जहाँ मार गिरायी गयी। बस, उसी दिन बीजेपी में अटल युग समाप्त हो गया। 2004 में अटल जी लोकसभा पहुँचे, लेकिन विपक्ष के नेता की क़मान लाल कृष्ण आडवाणी को मिल गयी। 2009 में लौह पुरुष आडवाणी जी चुनावों में खेत रहे तो संघ ने उनकी जगह सुषमा स्वराज ने दे दी।

2014 के चुनाव तक तो संघ ने अटल-आडवाणी और सुषमा, तीनों को निपटा दिया। अब इनके जैसी गति ही 2019 में नरेन्द्र मोदी, अमित शाह और अरूण जेटली की भी होगी। इन तीनों का भी वही हश्र होगा जो उन तीनों का हुआ। यहाँ तक कि मोदी की सरकार बनवाने के वक़्त तो संघ ने क़रीब दर्जन भर वरिष्ठ नेताओं को एक झटके में दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंका। संघियों की बुनियादी रवायत है कि अपने कार्यकर्ताओं को इस्तेमाल के बाद नष्ट कर दो। यही बीजेपी के तमाम नेताओं के साथ हुआ है। इन नेताओं ने भी ‘बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से खाय!’ अटल जी में काँटों के बीच फूल की तरह रहने की अद्भुत कला थी। वो इसलिए भी लम्बे अरसे तक याद रखे जाएँगे! उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि!

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

Continue Reading

ओपिनियन

अटल बिहारी वाजपेयी : नए भारत के सारथी और सूत्रधार

Published

on

Atal-Bihari-Vajpayee

नई दिल्ली, 16 अगस्त (आईएएनएस)| भारत रत्न, सरस्वती पुत्र एवं देश की राजनीति के युगवाहक पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का संपूर्ण जीवन राष्ट्रसेवा और जनसेवा को समर्पित रहा। वे सच्चे अर्थों में नवीन भारत के सारथी और सूत्रधार थे। वे एक ऐसे युग मनीषी थे, जिनके हाथों में काल के कपाल पर लिखने व मिटाने का अमरत्व था। ओजस्वी वक्ता विराट व्यक्तित्व और बहुआयामी प्रतिभा के धनी वाजपेयी की जीवन यात्रा आजाद भारत के अभ्युदय के साथ शुरू होती है और विश्व पटल पर भारत को विश्वगुरु के पद पर पुन: प्रतिष्ठित करने की आकांक्षा के साथ कई पड़ावों को जीते हुए आगे बढ़ती है। वे भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्य थे। वे 1968 से 1973 तक भारतीय जन संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने अटल बिहारी वाजपेयी में भारत का भविष्य देखा था। वाजपेयी 10 बार लोक सभा सांसद रहे। वहीं वे दो बार 1962 और 1986 में राज्यसभा सांसद भी रहे। वाजपेयी जी देश के एक मात्र सांसद थे, जिन्होंने देश की छह अलग-अलग सीटों से चुनाव जीता था। सन 1957 से 1977 तक वे लगातार बीस वर्षो तक जन संघ के संसदीय दल के नेता रहे। आपातकाल के बाद देश की जनता द्वारा चुने गए मोरार जी देसाई जी की सरकार में वे विदेश मंत्री बने और विश्व में भारत की एक अलग छवि का निर्माण किया।

इस दौरान संयुक्त राष्ट्र संघ में पहली बार हिंदी में ओजस्वी उद्बोधन देकर वाजपेयी ने विश्व में मातृभाषा को पहचान दिलाई और भारत की एक अलग छाप छोड़ी। आपातकाल के दौरान उन्हें भी लोकतंत्र की हत्यारी सरकार की प्रताड़ना झेलनी पड़ी। उन्हें जेल में डाल दिया गया लेकिन उन्होंने जेल से ही कलम के सहारे अनुशासन के नाम पर अनुशासन का खून लिख कर राष्ट्र को एकजुट रखने की कवायद जारी रखी।

सिद्धांतों पर अडिग रहते हुए विचारधारा की राजनीति करने वाले वाजपेयी भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के बाद पहले अध्यक्ष बने। उन्होंने तीन बार 1996, 1998-99 और 1999-2004 में प्रधानमंत्री के रूप में देश का प्रतिनिधित्व किया। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय फलक पर देश को नई ऊंचाइयों पर प्रतिष्ठित करने वाले वाजपेयी के कार्यकाल में देश ने प्रगति के अनेक आयाम छुए।

अजातशत्रु अटल बिहारी वाजपेयी ने पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के नारे को आगे बढ़ाते हुए ‘जय जवान-जय किसान- जय विज्ञान’ का नारा दिया। देश की सामरिक सुरक्षा पर उन्हें समझौता बिलकुल भी गंवारा नहीं था। वैश्विक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने 1998 में पोखरण में पांच भूमिगत परमाणु परीक्षण किए। इस परीक्षण के बाद कई अंतर्राष्ट्रीय शक्तियों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के बावजूद वाजपेयी की दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति ने इन परिस्थितियों में भी उन्हें अटल स्तंभ के रूप में अडिग रखा। कारगिल युद्ध की भयावहता का उन्होंने डट कर मुकाबला किया और पाकिस्तान को राजनीतिक, कूटनीतिक, रणनीतिक और सामरिक सभी स्तरों पर धूल चटाई।

वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में देश में विकास के स्वर्णिम अध्याय की शुरूआत हुई। वे देश के चारों कोनों को जोड़ने वाली स्वर्णिम चतुर्भुज जैसी अविस्मरणीय योजना के शिल्पी थे। नदियों के एकीकरण जैसे कालजयी स्वप्न के द्रष्टा थे। मानव के रूप में वे महामानव थे। सर्व शिक्षा अभियान, संरचनात्मक ढांचे के सुधार की योजना, सॉफ्टवेयर विकास के लिए सूचना एवं प्रौद्योगिकी कार्यदल का निर्माण और विद्युतीकरण में गति लाने के लिए केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग आदि योजनाओं की शुरुआत कर देश को प्रगति के पथ पर अग्रसर करने में उनकी भूमिका काफी अनुकरणीय रही। वाजपेयी सरकार की विदेश नीति ने दुनिया में भारत को एक नेतृत्वकर्ता के रूप में प्रतिष्ठित रहा।

अपनी ओजस्वी भाषण शैली, लेखन व विचारधारा के प्रति निष्ठा तथा ठोस फैसले लेने के लिए विख्यात वाजपेयी को कई पुरस्कारों से नवाजा गया। उन्हें 1992 में पद्म विभूषण 1994 में लोकमान्य तिलक पुरस्कार, 1994 में ही श्रेष्ठ सांसद पुरस्कार, भारत रत्न पंडित गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कार और 2015 में उन्हें बांग्लादेश के सर्वोच्च अवार्ड फ्रेंड्स ऑफ बांग्लादेश लिबरेशन वार अवॉर्ड से उन्हें सम्मानित किया गया। देश के विकास में अमूल्य योगदान देने एवं अंतर्राष्ट्रीय फलक पर देश को सम्मान दिलाने के लिए वाजपेयी को 2015 में देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से अलंकृत किया गया।

— आईएएनएस

Continue Reading

ब्लॉग

अटल थे, अटल हैं, अटल रहेंगे!

Published

on

Atal Behari Atal

वे साधारण परिवार में जन्मे, साधारण से प्राइमरी स्कूल में पढ़े और साधारण से प्राइमरी स्कूल टीचर के बच्चे हैं। उनके पिता का नाम कृष्ण विहारी वाजपेयी और दादा थे पंडित श्याम लाल वाजपेयी। उन्होंने सारे देश के सामने एक बार कहा था- ‘मैं अटल तो हूं पर ‘बिहारी’ नहीं हूं। तब लोगों ने इसे अजीब ढंग से लिया था।

लोगों को लगा कि वे ‘बिहार’ का अपमान कर रहे हैं। वस्तुत: उन्होंने कहा था कि असल में उनके पिता का नाम ‘वसंत – विहार’, ‘श्याम-विहार’, ‘यमुना विहार’ की तरह ही ‘विहार’ है, तो उनका मूल नाम है- अटल विहारी। ये तो बीबीसी लंदन ने शुरू कर दिया ‘ए.बी.वाजपेयी’ तो सब इसी पर चल पड़े।

संसद में एक बार अटल जी के लिए किसी ने कहा कि ‘वे आदमी तो अच्छे हैं लेकिन पार्टी ठीक नहीं है।’ इस पर अटल जी ने अपने भाषण में कहा भी था कि, ‘मुझसे कहा जाता है कि मैं आदमी तो अच्छा हूं, लेकिन पार्टी ठीक नहीं है, मैं कहता हूं कि मैं भी कांग्रेस में होता अगर वह विभाजन की जिम्मेदार नहीं होती।’

यूं तो वे भी पुराने कांग्रेसी थे। पहले सभी कांग्रेसी थे। आरंभिक दिनों में विजय राजे सिंधिया भी कांग्रेस में थी, जिवाजी राव सिंधिया भी कांग्रेस में थे। कांग्रेसी इस आरोप का उत्तर नहीं दे पाएंगे, क्योंकि कांग्रेस ही शायद कांग्रेस का इतिहास नहीं जानती। उन पर जो सबसे पहला आरंभिक प्रभाव था वो कई कवियों का रहा। मध्य प्रदेश के ही कई कवि अटल विहारी वाजपेयी के कालेज में थे।

डॉक्टर शिव मंगल सिंह ‘सुमन’ एक प्रगतिशील कवि और लेखक भी थे। अटल जी ने लाल किले से उनकी कविताएं भी पढ़ी हैं और अटल जी की जो बहुत मशहूर कविता है- ‘हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा, और ‘काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूं.’. उस पर ‘सुमन जी’ का प्रभाव है। इसी तरह की एक और कविता- ‘गीत नया गाता हूं’।

Image result for atal bihari vajpayee

उनकी भाषा पर भी ‘सुमन जी’ का प्रभाव है। दिलचस्प बात ये है कि ‘सुमन जी’ की भाषण शैली और कविता पाठ में ‘निराला जी’ का प्रभाव है। ये बात मुझे नीरज जी ने एक बार बताई थी कि सुमन जी निराला जी की शैली में कविता पढ़ते हैं।

महत्वपूर्ण बात ये है कि अटल जी भारतीय राजनीति में नेहरू जी के बाद एक अनूठे नक्षत्र हैं। यहां तक कि जब अटल जी पहली बार संसद में पहुंचे तो उनका भाषण सुन कर नेहरू जी ने कहा था- यह नौजवान नहीं मैं भारत के ‘भावी प्रधानमंत्री’ का भाषण सुन रहा हूं। ये बात उनके ‘बॉयोडाटा’ में लिखी हुई है। ये बात कहना कोई साधारण बात नहीं है। यह एक द्रष्टा की दृष्टि है। हीरे की परख जौहरी ही कर सकता है। बात ये है कि प्रतिभा की परख ही प्रतिभा ही कर सकती है।

नेहरू जी ने पहले ही दिन देख लिया कि भारत का भावी प्रधानमंत्री बोल रहा है। अटल जी प्रधानमंत्री बने, एक बार नहीं, दो बार नहीं, तीन बार प्रधानमंत्री बने। उन्होंने जवाहर लाल जी और इंदिरा जी के रिकॉर्ड को भी तोड़ा। भारत में ऐसा कोई प्रधानमंत्री नहीं हुआ, शायद कोई हो, जो तीन – तीन बार प्रधानमंत्री बने। अटल जी का राजनीति में कभी कोई ‘ग्रुप’ था ही नहीं।

अटल जी तो ‘भगवान राम’ की तरह हैं, जिनके पास ‘हनुमान’ भी अपना नहीं किसी और का है। हनुमान ‘सुग्रीव’ के थे। मसलन- प्रमोद महाजन थे, जो लालकृष्ण आडवाणी के आदमी माने जाते थे, मगर भगत रहे अटलजी के। आप अटल जी की एक और विशेषता देखें, अटल जी के जो सबसे बड़े सलाहकार थे वे कांग्रेस के दिग्गज नेता द्वारका प्रसाद मिश्र के बेटे हैं। अटल जी के सबसे अच्छे मित्र थे शहाबुद्दीन, जिन्हें अटल जी राजनीति में लाए, वे आईएफएस और मुसलमान हैं। विश्व में किसी राजनेता का ऐसा नैतिक साहस है कि, बिल क्लिंटन का भी नहीं, कि किसी से उनके क्या संबंध हैं, आध्यात्मिक संबंध, प्रेम संबंध या भावनात्मक संबंध, वे सब जग जाहिर है।

शीला कौल जो उनके साथ रहती थीं.. आप इसे मित्रता कहे, प्रेम संबंध कहें, मीरा का संबंध कहें, या फिर राधा का संबंध कहें, लिव इन रिलेशन कहें, लेकिन मैं इससे पूरी तरह सहमत हूं कि वे जो करते थे खुलकर करते, वही करते जो उन्हें उचित लगता। कृष्ण की तरह करते, जैसे कृष्ण ने सत्यभामा और रुक्मिणी के होते हुए राधा के संबंध को छुपाया नहीं।

जब वे कष्ट में रहे तब तो मैंने उन्हें रायसीना रोड के सुधीर के ढाबे से ‘दाल’ मंगाकर भी खाते देखा है। तब तो भारत वर्ष में कहीं से उनका कोई रिश्तेदार नहीं आया। अब तो अनूप मिश्रा और करुणा शर्मा भी देखी जाती हैं, जो रिश्तेदार हैं। परिवार जन भी आ गए, प्रधानमंत्री जो बन गए। पर तब एक मात्र शीला जी रही जो सुख दुख में उनके साथ खड़ी थी। लेकिन किसी ने इसे देखा नहीं। हिंदुस्तान के किसी राजनीतिज्ञ ने, प्रेस ने इस विषय को उठाया भी नहीं, कि प्रधानमंत्री आवास में एक महिला भी रहती है।

मुझे याद है पहली बार प्रधानमंत्री बनने पर जब मैं उन्हें बधाई देने गया था तो सो ‘ऊषा सिंहल’ के साथ गया था। ऊषा दीदी माननीय अशोक सिंहल जी की इकलौती बहन थीं। इनके सात भाई थे, अशोक भैया, आनंद भैया, पूर्व डीजी पुलिस और ब्लड प्रेशर सिंहल के नाम से मशहूर भारतेंदु प्रकाश सिंहल, विचारक, चिंतक और लेखक, उद्योग पति विवेक सिंहल, और अब नहीं रहे पीयूष सिंहल- इन सात भाइयों की एक बहन। वे कहती थीं, ‘ये सात भैया एक तरफ और राज भैया एक तरफ’।

मुझे उषा जी अपना भाई मानती थी और राखी बांधती रही। ऊषा जी अटल जी को भी राखी बांधती रही हैं। उन्हें पतरकु (दुबले पतले वाले) भैया कहती रहीं। उस समय अटल जी के सेवक सर्वस्व थे शिवकुमार ‘मूंछड़ जी’। दीदी ने शिवकुमार जी के सामने ही एक बार पूछ लिया अटल जी से कि ‘क्या शीला जी भी यहीं रहती है पतरकू भैया!’ तो अटल जी शर्माने लगे और कहने लगे- ‘हां, यहीं रहती है ऊषा बहिन’।

लेकिन ये विश्व के इतिहास की एक अनोखी घटना है। क्या कोई ऐसी और घटना बता सकता है, जहां प्रधानमंत्री के घर में एक अनजान महिला जो उनकी पत्नी नहीं हो उसके बाद भी अपने दत्तक दामाद के साथ वहीं रहती हो। रंजन भट्टाचार्य के साथ दत्तक बेटी भी। तो प्रेस ने क्यों नहीं उठाया ये सवाल। कभी किसी ने ध्यान भी नहीं दिया।

जब मैंने प्रभाष जोशी जी पर लेख लिखा तो करीब 160 से ज्यादा पत्र मेरे पास आए। इनमें शरद पवार और काजमी जैसे लोगों के पत्र भी हैं, जिनमें लिखा है कि आप में अपने पिता की ही तरह हंस की प्रवृत्ति है कि दूध और जल को अलग कर देते हैं। कंकड़ से मोती चुनने और नीर क्षीर विवेक का।

Image result for atal bihari vajpayee

ये सब जो तुलनात्मक अध्ययन है वो मैं इसलिए बता रहा हूं कि कांग्रेस क्या, कोई पार्टी क्या, कोई मीडिया क्या, ये मुद्दा कोई इसलिए नहीं उठा पाया क्योंकि ये जो सज्जन थे जवाहर लाल नेहरू के साले, कमला नेहरू जी के भाई थे। उन्हीं की पत्नी थीं शीला कौल। कांग्रेस इस मुद्दे को उठा नहीं सकती थी, लेकिन प्रेस ने भी नहीं उठाया। इसकी वजह आपने नहीं सोची होगी।

विचार करें, क्योंकि अटल जी का ‘चरित्र’ सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा था। उनके चरित्र पर कोई धब्बा नहीं है। उसके बावजूद उन्होंने अशोक सिंहल जी के डांटने पर एक बार संसद में कहा था, ” मैं कुंआरा तो हूं, ब्रह्मचारी नहीं।” इसे कहने के लिए बेहद नैतिक साहस चाहिए। प्रो.रज्जू भैया ने भी कहा था कि ये कहने के लिए बहुत नैतिक साहस चाहिए। लेकिन अशोक सिंहल जी को ये बात बुरी लगी थी।

उन्होंने कहा- ये क्या कोई कहने वाली बात है कि ‘मैं कुआंरा तो हूं, ब्रह्मचारी नहीं, यानी चरित्रहीन हूं।’ मगर ये बात नहीं है। जयप्रकाश नारायण ने एक बार गांधी जी के सामने शपथ ली, मैं प्रभावती जी के साथ बिस्तर पर नहीं सोऊंगा। बह्मचर्य का पालन करूंगा। पर प्रकाश झा ने एक लंबी फिल्म जयप्रकाश जी पर बनाई थी। उस पर मैंने पचासों आपत्तियां की थीं और बहुत अखबारबाजी भी हुई। पार्लियामेंट में भी हंगामा हुआ। इस फिल्म में एक इंटरव्यू में प्रकाश झा ने जयप्रकाश जी के मुंह से कहलवाया कि -‘मैं ऐसा नहीं रह पाया। बह्मचर्य का वैसा पालन नहीं कर पाया जैसा प्रभावती करती रहीं’। इसका आशय था कि जय बाबू कहीं-कहीं स्खलित भी हुए। मैंने इस पर आपत्ति भी की थी। लेकिन अटल जी का ये नैतिक साहस।

गांधी जी को हम लोग बहुत ज्यादा मानते हैं। उनके इस बात के लिए बहुत सम्मान देते हैं। उनके नैतिक साहस का सम्मान करते हैं। गांधी जी की आत्मकथा की बात करते हैं। उनके ‘सत्य के प्रयोग’ की बहुत बात करते हैं, लेकिन अटल जी के अनुभव या कहें कि एक्सपीरिएंस विद ट्रुथ पर आज तक कोई बात नहीं हुई। शायद ही कोई कर पाए। फिर भी उन्होंने देखा जाएतो ये सब कहा।

ये हिम्मत की बात है। साहस का विषय है कि भारत की राजनीति में पहला पुरुष है जिसके घर में एक महिला मित्र है। जो महिला है उनसे उनका क्या रिश्ता है ये पूछने का साहस किसी के पास नहीं है!

राजनीति में उनका कोई गुरु नहीं है। हालांकि लोग कहते हैं कि उनके गुरु ‘अमुक’ रहे हैं। कभी लोग बलराज मधोक को बता देते हैं, लोग कहते हैं कि मधोक जी ही उन्हें जनसंघ में ले आए। जबकि पहले से ही बलराज मधोक उन पर आरोप लगाते रहे कि वे जनसंघ में ‘कांग्रेस के एजेंट’ थे। जनसंघ में वे ‘जवाहर लाल नेहरू के आदमी’ हैं। पर आज बलराज मधोक दिल्ली में किसी को हैंड पंप से पानी खीचते नजर आते हैं। जनसंघ के संस्थापक मधोक जी रहे और तीन बार प्रधानमंत्री बने अटल जी! तो इस आदमी में कोई न कोई खूबी तो ऐसी होगी।

इन खूबियों को जरा देखिए और सोचिए। सबसे बड़ी खूबी कि गोविंदाचार्य ने कह दिया कि आप उन्हें ‘मुखौटा’ कह सकते हैं। वे ‘मुखौटा’ थे कि नहीं, इस बारे में आगे जाकर भारतीय जनता विश्लेषण करे। इसलिए ये बात तो आप इतिहास पर छोड़िए।

(लेखक दूरदर्शन महानिदेशालय में अपर महानिदेशक हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

By : राजशेखर व्यास

–आईएएनएस

Continue Reading
Advertisement
kerala flood
राष्ट्रीय7 hours ago

केरल में बाढ़ से 174 मरे, 12 जिलों में रेड अलर्ट

Kerala Flood Baby
शहर8 hours ago

केरल बाढ़ : हेलीकाप्टर से बचाई गई महिला ने बच्चे को जन्म दिया

amrinder
राष्ट्रीय9 hours ago

केरल बाढ़ राहत के लिए 10 करोड़ रुपये देगा पंजाब

virat kohli
खेल9 hours ago

जीत के अलावा किसी और बारे में सोचने का विकल्प नहीं : विराट कोहली

foreign-capital-reserves
व्यापार9 hours ago

देश का विदेशी पूंजी भंडार 1.82 अरब डॉलर घटा

Atal Bihar Vajpaeee
ब्लॉग9 hours ago

अटल जी ने कुछ बहुत अच्छा दिया तो कुछ बहुत ख़राब भी!

akhilesh yadav
राजनीति11 hours ago

विरोधियों को पूरा सम्मान देते थे अटल बिहारी: अखिलेश

sensex-min
व्यापार12 hours ago

सेंसेक्स में 284 अंकों की तेजी

Go Edition
टेक12 hours ago

एंट्री लेवल फोन्स के लिए Android 9 Pie गो एडिशन लॉन्च

atal bihari
राष्ट्रीय13 hours ago

पंचतत्व में विलीन हुआ अटल बिहारी का पार्थिव शरीर

chili-
स्वास्थ्य3 weeks ago

हरी मिर्च खाने के 7 फायदे

School Compound
ओपिनियन4 weeks ago

स्कूली छात्रों में क्यों पनप रही हिंसक प्रवृत्ति?

pimple
लाइफस्टाइल3 weeks ago

मुँहासों को दूर करने के लिए अपनाएंं ये 6 टिप्स…

Kapil Sibal
ब्लॉग3 weeks ago

लिंचिंग के ख़िलाफ़ राजनीतिक एकजुटता ज़रूरी

Mob Lynching
ब्लॉग4 weeks ago

जो लिंचिंग के पीछे हैं, वही उसे कैसे रोकेंगे!

Gopaldas Neeraj
ज़रा हटके4 weeks ago

अब कौन कहेगा, ‘ऐ भाई! जरा देख के चलो’

Kashmir Vally
ब्लॉग2 weeks ago

कश्मीर में नफरत, हिंसा के बीच सद्भाव-भाईचारे की उम्मीद

Indresh Kumar
ओपिनियन3 weeks ago

संघ का अद्भुत शोध: बीफ़ का सेवन जारी रहने तक होती रहेगी लिंचिंग!

Bundelkhand Farmer
ब्लॉग3 weeks ago

शिवराज से ‘अनशनकारी किसान की मौत’ का जवाब मांगेगा बुंदेलखंड

No-trust motion Parliament
ब्लॉग4 weeks ago

बस, एक-एक बार ही जीते विश्वास और अविश्वास

sui-dhaga--
मनोरंजन5 days ago

वरुण धवन की फिल्म ‘सुई धागा’ का ट्रेलर रिलीज

pm modi
ब्लॉग1 week ago

70 साल में पहली बार किसी प्रधानमंत्री के शब्द संसद की कार्रवाई से हटाये गये

flower-min
शहर1 week ago

योगी सरकार कांवड़ियों पर मेहरबान, हेलीकॉप्टर से पुष्प वर्षा

Loveratri-
मनोरंजन2 weeks ago

आयुष शर्मा की फिल्म ‘लवरात्र‍ि’ का ट्रेलर रिलीज

-fanney khan-
मनोरंजन3 weeks ago

मोहम्मद रफी की पुण्यतिथि पर रिलीज हुआ ‘बदन पे सितारे’ का रीमेक

tej pratap-min
राजनीति3 weeks ago

तेज प्रताप का शिव अवतार…देखें वीडियो

nawal kishor yadav-min
राजनीति3 weeks ago

शर्मनाक: बीजेपी विधायक ने गवर्नर को मारने की दी धमकी

Dr Kafeel Khan
शहर3 weeks ago

आर्थिक तंगी से जूझ रहे गोरखपुर के त्रासदी के हीरो डॉक्टर कफील

sonakshi-
मनोरंजन3 weeks ago

डायना पेंटी की फिल्म ‘हैप्पी फिर भाग जाएगी’ का ट्रेलर रिलीज

Lag Ja Gale-
मनोरंजन4 weeks ago

‘साहेब, बीवी और गैंगस्टर 3’ का गाना रिलीज

Most Popular