Connect with us

ब्लॉग

‘नये भारत’ में गेरुआ रंग त्याग-तपस्या का नहीं बल्कि आतंकियों का हुलिया बना

Published

on

Kanwariyas vandalise vehicle

महज 50 महीने में ही नरेन्द्र मोदी के सपनों का ‘नया भारत’ बनकर तैयार हो चुका है! बीजेपी के आलीशान मुख्यालय के डेढ़ साल में बनकर तैयार होने के बाद 50 महीने की अल्पावधि में ‘नये भारत’ का निर्माण हर मायने में ऐतिहासिक उपलब्धि है! इस ‘नये भारत’ में उत्तर प्रदेश पुलिस के अतिरिक्त महानिदेशक प्रशान्त कुमार जहाँ काँवड़ियों पर हेलिकॉप्टर से पुष्प वर्षा करते हैं, वही काँवड़िये कभी बुलन्दशहर में पुलिस के वाहन में तोड़फोड़ करते हैं, तो कभी मेरठ में इसलिए बलवा किया जाता है कि वहाँ काँवड़ियों को एक मीट की दुकान खुली दिख गयी।

बरेली के खेलुम गाँव से 250 स्थानीय हिन्दुओं और मुसलमानों ने इसलिए पलायन कर लिया कि वहाँ से शिवभक्त काँवड़ियों का जुलूस गुज़रने वाला है। ग्रेटर नोएडा में काँवड़ियों के दो गुटों के बीच हुई हिंसक झड़प को भी ‘नये भारत’ की गौरवशाली घटना के रूप में देखा जा सकता है। गोरखपुर में एक दारोगा का वर्दी में योगी आदित्यनाथ को शाष्टांग करना भी ‘नये भारत’ की अद्भुत उपलब्धि है। साध्वी प्राची जैसे भगवा प्रचारक ने तो ये माँग करके ‘नये भारत’ में चार चाँद जड़ दिये कि काँवड़-यात्रा को देखते हुए मस्जिदों के लाउडस्पीकरों पर रोक लगा दी जाए। दिल्ली में भी काँवड़ियों ने एक कार को अपना ताँडव रूप दिखाकर ‘नये भारत’ का जश्न मनाया।

‘नये भारत’ का ही जश्न मुज़फ़्फ़रपुर और देवरिया के बालिका आश्रय गृहों में रहने वाली बच्चियों को देह-व्यापार में ढकेलकर मनाया गया। इसे भी उन्हीं हिन्दुओं ने अन्ज़ाम दिया जो नवरात्रियों में कन्या-पूजन का पुण्य बटोरते हैं। हरदोई में भी ऐसे ही एक नारी निकेतन पर ज़िलाधिकारी की गाज़ गिरी जहाँ सरकारी अनुदान की बन्दरबाँट के लिए रिकॉर्ड में महिलाओं की संख्या को बढ़ाचढ़ाकर दिखाया गया था। ‘नये भारत’ की ऐसी तमाम उपलब्धियों में लिंचिंग की अनेक गौरवशाली घटनाएँ भी शामिल हैं। मुमकिन है कि ऐसे पाप मोदी युग से पहले भी होते रहे होंगे, लेकिन मौजूदा ‘नये भारत’ में बीते ज़माने के पापों का उद्धार करके उन्हें पुण्य का जामा पहनाया जा चुका है। इसीलिए मोदी राज का ‘नया भारत’ अद्भुत है! अतुलनीय है!

‘नये भारत’ की इन ताज़ातरीन उपलब्धियों के केन्द्र में काँवड़ियों का वो गेरुआ या भगवा रंग भी है जो कभी त्याग और वैराग्य का प्रतीक होता था। लेकिन 1990 के दशक वाले अयोध्या कांड के दौर के बाद यही गेरुआ रंग उन्मादी, दंगाई, बलवाई, व्याभिचारी और आतंकवादियों की रंगत बन गया। कालान्तर में गेरुआ की आड़ में हरेक कुकर्म होने लगे। शिवसैनिकों और बजरंगदलियों को भी गेरुआ रंग बहुत प्रिय रहा है। गेरुआ धारण करते ही उनका ख़ून भी वैसे ही उबलता है, जैसे काँवड़ियों का रक्तचाप और मानसिक सन्तुलन बेक़ाबू हो जाता है। इसीलिए ‘नये भारत’ में गेरुआ रंग त्याग-तपस्या का नहीं बल्कि हिन्दू आतंकवादियों का पसन्दीदा हुलिया बन चुका है। काँवड़िये जब हाथों में तिरंगा थाम लेते हैं तो वो ऐसे और उदंड हो जाते हैं, जैसे राष्ट्रसेवा की तीर्थयात्रा कर रहे हों!

मोदी राज के ‘नये भारत’ में हिन्दू आतंकियों को हिन्दू तालिबानी भी कह सकते हैं और हिन्दुत्व के क्रान्तिकारी भी! इन गेरुआधारियों को संघ-बीजेपी की खुली शह हासिल है। लिंचिंग इनकी भाषा का बुनियादी व्याकरण है। मौजूदा दौर में यही राष्ट्रभक्त और धर्मभीरू लोगों की जमात भी है। यही सोशल मीडिया वाले पालतू ट्रोलर भी हैं। इनकी मानसिकता ही अब पुलिस की वर्दी में घूमते सुपारीबाज़ हत्यारों में भी देखी जा सकती है। गेरुआ से ओतप्रोत सत्ता प्रतिष्ठान ऐसे पुलिसवालों को भी वैसे ही अपनी भ्रष्ट जाँच एजेंसियों से सुरक्षा प्रदान करवाता है, जैसे काँवड़ियों को अभय-दान हासिल होता है। यही लिंचिंग-वीर कभी-कभार मीडिया के स्टिंग ऑपरेशन में अपनी वीरगाथा सुनाते हुए भी दिख जाते हैं!

अब सवाल ये है कि क्या ये उत्पाती गेरुआधारी हमारे-आपके परिवारों के ही भटके हुए, अल्प-शिक्षित, आंशिक रोज़गारधारी लोग नहीं हैं? क्या इनके दिमाग़ को ही वैसे विषाक्त (indoctrinated) नहीं किया गया है, जैसा हम पाकिस्तान से आने वाले आतंकियों के मामले में देखते आये हैं? गेरुआधारी हिन्दू आतंकियों को पाकिस्तान, सीमापार के शिविरों से नहीं भेजता। इन्हें तो नागपुर अकादमी की शाखाएँ दिन-रात भारत के ही कोने-कोने में दीक्षित और प्रशिक्षित करती रहती हैं। यही गेरुआधारी थोड़े दिनों बाद गणेश-उत्सव और फिर दुर्गापूजा और कालीपूजा के वक़्त भी उन्माद फैलाते नज़र आएँगे। यही लोग मोदी-राज की पकौड़ा-योजना को भी सफलता की नयी बुलन्दियों पर पहुँचा रहे हैं, ताकि मोदी-शाह के ‘नये भारत’ को यथाशीघ्र संघ प्रमुख मोहन भागवत के सपनों वाला ‘विश्व-गुरु’ बनाया जा सके!

अगला सवाल है कि विश्व-गुरु के गेरुआधारी परम शिष्यों की करतूतों को शर्मनाक या दुःखद कैसे कहा जा सकता है? जिस दिन बहुसंख्यक-मध्यमवर्गीय-मन्दबुद्धि-सवर्ण हिन्दू समाज इन सवालों का जबाब जान जाएगा, उसी दिन मक्कारों का राज ख़त्म हो जाएगा। हालात वैसे ही अपने आप सुधरने लगेंगे, जैसे ज्वलनशील पर्दाथों के जलकर खाक़ हो जाने के बाद बड़ी से बड़ी आग भी अपने आप शान्त हो जाती है!

फ़िलहाल, आप चौकन्ना रहकर इस बात का हिसाब रख सकते हैं कि किन-किन नेताओं ने गेरुआ परिधानों में घूम रहे काँवड़ियों के उत्पातों की निन्दा की और उनके ख़िलाफ़ ‘कड़ी कार्रवाई’ की दुहाई दी! ग़ौर कीजिएगा कि कितने भगवा बयान-वीर ये कहने का साहस जुटा पाते हैं कि ‘क़ानून अपना काम करेगा!’ अरे, क़ानून कहीं होगा, तभी तो कुछ करेगा! अभी तो आप क़ानून-रहित भारत में आनन्दित होने का सुख लीजिए, यदि ले सकें तो!

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

ब्लॉग

अनुभव आगे, युवा पीछे : कांग्रेस की 2019 की रणनीति?

“2019 का चुनाव मोदी बनाम राहुल होने जा रहा है। इसमें कोई दोराय नहीं है। सचिन पायलट और सिंधिया की पैठ महज अपने-अपने राज्यों में है, इसलिए इनकी तुलना राहुल से करना ठीक नहीं होगा।”

Published

on

By

Kamal Nath Sciendia

नई दिल्ली, 17 दिसंबर | राजस्थान और मध्य प्रदेश में सत्ता की चाबी अशोक गहलोत और कमलनाथ के हाथों में थमा दी गई है, दोनों ही पार्टी के अनुभवी और वरिष्ठ नेता हैं। गांधी परिवार के विश्वासपात्र हैं, लेकिन एक सवाल जो अभी भी दिमाग में कौंध रहा है कि युवाओं को तरजीह देने वाले राहुल गांधी ने इन पदों के लिए दौड़ में शामिल युवा चेहरों- सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया को मौका क्यों नहीं दिया?

राहुल अपनी सक्रिय राजनीति के शुरुआती दिनों से ही युवाओं को ज्यादा मौके दिए जाने की पैरवी करते रहे हैं। क्या ऐसा किसी सोची-समझी रणनीति के तहत किया गया या वाकई ‘युवा जोश’ पर ‘अनुभव’ भारी पड़ गया? ऐसी क्या वजह रही कि राहुल कांग्रेस पार्टी के पुराने र्ढे को तोड़कर नया उदाहरण पेश नहीं कर पाए?

राजस्थान के गांवों और दूरदराज के क्षेत्रों का सफर कर चुकीं राजनीतिक विश्लेषक निकिता चावला ने आईएएनएस से कहा, “इसे 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस की रणनीति कह सकते हैं। कांग्रेस अपनी लय धीरे-धीरे फिर से हासिल कर रही है। अगले साल लोकसभा चुनाव जीतने के लिए उन्हें अनुभव की सख्त जरूरत पड़ेगी। अशोक गहलोत और कमलनाथ बहुत ही परिपक्व नेता हैं, अपने-अपने राज्यों में इनकी एक छाप है, जो लोकसभा चुनाव में बहुत मदद करेगी। इसलिए कांग्रेस फिलहाल हर चीज को 2019 के नजरिए से देख रही है।”

वह कहती हैं, “मैं राजस्थान घूमी हूं, वहां की राजनीति से वाकिफ हूं तो कह सकती हूं कि सचिन पायलट ने बीते कई वर्षो में ग्रासरूट पर बहुत काम किया है। पायलट की लोकप्रियता में भी काफी तेजी से इजाफा हो रहा है। अशोक गहलोत ने एक बार कहीं कहा था कि यह शायद उनका ‘आखिरी मौका’ हो सकता है तो उनका यह बयान शायद काम कर गया। गहलोत और कमलनाथ, सोनिया गांधी के कंटेम्परेरी नेता भी हैं, इस बात को ध्यान में रखना चाहिए। 2019 का लोकसभा चुनाव जीतने के लिए पार्टी को अनुभव चाहिए, जो कमलनाथ और गहलोत के पास है। सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाकर पार्टी अंदरखाने खुद को कमजोर नहीं करना चाहेगी।”

राहुल की युवाओं को तरजीह देने के सवाल पर कांग्रेस पार्टी की प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी पार्टी कहती हैं, “कांग्रेस एक लोकतांत्रिक पार्टी है। यहां हर फैसला गहन विचार-विमर्श के बाद ही होता है। पार्टी में वही फैसले होते हैं, जिस पर सभी की एकराय होती है। गहलोत और कमलनाथ पर एकराय बनी।”

राजस्थान की राजनीति पर नजर रखने वाले पत्रकार शिवओम गोयल कहते हैं, “2019 का चुनाव मोदी बनाम राहुल होने जा रहा है। इसमें कोई दोराय नहीं है। सचिन पायलट और सिंधिया की पैठ महज अपने-अपने राज्यों में है, इसलिए इनकी तुलना राहुल से करना ठीक नहीं होगा।”

राजस्थान की राजनीति में सचिन पायलट की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है और ठीक ऐसा ही मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया को लेकर है। क्या इससे भी कुछ लोग सकपकाए हुए हैं? इसका जवाब देते हुए राजनीतिक विश्लेषक संदीप शास्त्री कहते हैं, “इसका एक मायना यह भी है कि सचिन पायलट के पास मौके बहुत हैं, वह अभी सिर्फ 41 साल के हैं। उनके पास अथाह समय बचा है, लेकिन 67 साल के गहलोत और 72 साल के कमलनाथ को शायद आगे इस तरह का मौका नहीं मिल पाए। इसलिए उनके अनुभव और उम्र को देखते हुए उन्हें मौका दिया गया है।”

हालांकि, निकिता एक सुझाव देते हुए कहती हैं, “मेरा मानना है कि राजस्थान में सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाया जाना चाहिए था और गहलोत को चाणक्य की भूमिका में रखना चाहिए था, इससे लोकसभा चुनाव में पार्टी को ज्यादा फायदा पहुंचता।”

–आईएएनएस

Continue Reading

ब्लॉग

2018 In Retrospect : पूरे साल छाया रहा कृषि-संकट का मसला

पूरे साल कई ऐसे वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए हैं, जिनमें सड़कों पर फसल और दूध फेंककर किसानों का गुस्सा दिखा गया है। किसानों ने उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिलने को लेकर अपनी नाराजगी दिखाई है।

Published

on

By

Farmers Protest

नई दिल्ली, 18 दिसंबर | देश के किसानों के बुनियादी सवाल वर्ष 2018 में प्रमुख राजनीतिक मुद्दे बनकर उभरे, जो आगे अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में भी छाए रह सकते हैं।

खासतौर से किसानों को उनकी फसलों का वाजिब दाम नहीं मिलने और अनाजों की सरकारी खरीद की प्रक्रिया दुरुस्त नहीं होने को विपक्ष आगामी आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के खिलाफ अहम मसला बनाना चाहेगा।

हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में हिंदीभाषी तीन प्रमुख प्रदेशों में भाजपा का सत्ता से बेदखल हो जाना इस बात की तस्दीक करता है कि ग्रामीण इलाकों में लोग सरकार की नीतियों और काम से खुश नहीं थे।

बीते एक साल में देश की राजधानी में ही किसानों की पांच बड़ी रैलियां हुईं, जबकि केंद्र में भाजपा की अगुवाई वाली सरकार ने प्रमुख फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) निर्धारण में नए फॉर्मूले का उपयोग किया। साथ ही, सरकार ने किसानों को खुश करने के लिए कई योजनाएं लाई हैं।

मध्यप्रदेश के मंदसौर में पिछले साल पुलिस की गोली से छह किसानों की मौत हो जाने के बाद देशभर में मसला गरमा गया था और किसानों का विरोध-प्रदर्शन तेज हो गया था। किसानों का मसला इस साल एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मसला बना रहा।

विभिन्न राजनीतिक दल आज भले ही अलग-अगल मुद्दों को लेकर अपनी आवाज बुलंद करें, मगर किसानों के मसले को लेकर उनमें एका है। इसकी एक मिसाल दिल्ली में 30 नवंबर की किसान रैली में देखने को मिली जब किसानों उनकी फसलों का बेहतर दाम दिलाने और उनका कर्ज माफ मरने के मसले पर राजनीतिक दलों ने अपनी एकजुटता दिखाई थी।

उसी रैली में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा, “पूरे देश में अब जो आवाज गूंज रही है वह किसानों की है जो गंभीर विपदा व संकट में हैं।”

स्वराज इंडिया के योगेंद्र यादव ने कहा, “लोकसभा चुनाव 2019 में ग्रामीण क्षेत्र के संकट से संबंधित मसले छाए रहेंगे।” किसानों के 200 से अधिक संगठनों को अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (एआईकेएससीसी) के बैनर तले लाने का श्रेय योगेंद्र यादव को ही जाता है।

यादव ने आईएएनएस से बातचीत में कहा, “देश में हमेशा कृषि संकट रहा है। लेकिन यह कभी चुनावों में प्रमुख मुद्दा नहीं बना। विधानसभा चुनावों में भाजपा की हार और किसानों बनी नई एकता से यह सुनिश्चित हुआ है कि कृषि क्षेत्र का संकट लोकसभा चुनाव-2019 में केंद्रीय मसला बनेगा।”

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भाजपा का शासन स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे ज्यादा किसान विरोधी रहा है, क्योंकि पिछले साढ़े चार साल के शासन काल में किसानों के साथ असहानुभूति का रवैया रहा है।

पूरे साल कई ऐसे वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए हैं, जिनमें सड़कों पर फसल और दूध फेंककर किसानों का गुस्सा दिखा गया है। किसानों ने उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिलने को लेकर अपनी नाराजगी दिखाई है।

किसानों का विरोध-प्रदर्शनों के बीच सरकार ने कुछ फसलों के एमएसपी में बढ़ोतरी की। हालांकि किसानों ने इस बढ़ोतरी को अपनी मांगों व अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं पाया।

जिन सब्जियों के दाम प्रमुख शहरों में 20-30 रुपये प्रति किलों हैं, किसानों को वहीं सब्जियां औने-पौने भाव बेचना पड़ता है।

किसानों के मुद्दों को प्रमुखता से उठाने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि कृषि मंत्रालय सुधार तंत्र विकसित करने में अप्रभावी प्रतीत होता है, जबकि सरकार ने खरीद की तीन योजनाएं लाईं।

गौरतलब है कि केंद्रीय मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता नितिन गडकरी ने जून में यह स्वीकार किया था कि उत्पादन आधिक्य के कारण कृषि संकट है और उन्होंने इस समस्या के समाधान के लिए कदम उठाने की मांग की थी।

स्वाभिमान शेतकरी संगठन के नेता और लोकसभा सदस्य राजू शेट्टी ने कहा कि फिर भी भाजपा सरकार मांग और आपूर्ति का विश्लेषण कर सुधार के कदम उठाने में विफल रही।

किसानों के मसले को लेकर ही राजू शेट्टी ने पिछले साल भाजपा की अगुवाई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार से इस्तीफा दे दिया था।

कृषि विज्ञानी अशोक गुलाटी ने कहा कि वर्तमान भाजपा सरकार में समझ और दूरर्शिता का अभाव है। उन्होंने कहा कि सरकार ने जरूरी बाजार सुधार नहीं किया, बल्कि सिर्फ नारे दिए और घोषणाएं कीं।

हैरानी की बात यह है कि मंदसौर की घटना के समय केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह किसानों के मसले को तवज्जो न देकर बाबा रामदेव के साथ बिहार में दो दिवसीय योग सत्र में हिस्सा लेने पहुंचे थे।

Continue Reading

ब्लॉग

क्या कांग्रेस मप्र की जनता की आवाज सुनेगी?

राज्य की जनता ने भाजपा को सत्ता से उतारकर कांग्रेस को सरकार बनाने का मौका दिया है। कांग्रेस क्या वास्तव में जनता की मंशा और भाव को समझ पा रही है? इस पर थोड़े सवाल उठ रहे हैं

Published

on

By

farmer strike in madhya pradesh

मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में जनता ने किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं दिया है, मगर कांग्रेस को बहुमत के करीब लाकर खड़ा कर दिया है। कांग्रेस सरकार बनाने जा रही है, बस सवाल एक ही उठ रहा है कि क्या कांग्रेस आलाकमान जनता की आवाज सुनेगी या राजनीतिक गणित के चलते अपना फैसला सुनाएगी।

राज्य के विधानसभा चुनाव के 11 दिसंबर की देर रात तक नतीजे आ गए, उसके बाद बुधवार को कांग्रेस विधायकों की भोपाल में बैठक बुलाई गई। इस बैठक में केंद्रीय पर्यवेक्षक के तौर पर ए.के. एंटनी आए, उन्होंने विधायकों की बैठक की, एक लाइन का प्रस्ताव पारित किया गया, जिसके जरिए मुख्यमंत्री चुनने का अधिकार पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी को दिया गया। उसके बाद गुरुवार को प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ और प्रचार अभियान समिति के अध्यक्ष ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने कई दौर की बात की।

कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि राहुल गांधी ने पर्यवेक्षक बनाकर भेजे गए एंटोनी की रिपोर्ट, शक्ति एप के जरिए पार्टी कार्यकर्ताओं से ली गई राय और नेताओं के प्रभाव वाले क्षेत्रों से आए नतीजों के साथ आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर रखकर कमलनाथ व सिंधिया की मौजूदगी में सभी प्रमुख नेताओं से चर्चा की। राहुल गांधी के साथ हुई बैठक में कमलनाथ, सिंधिया, एंटनी, प्रदेश प्रभारी दीपक बावरिया मौजूद रहे।

इतना ही नहीं, मप्र में मुख्यमंत्री को लेकर चल रही खींचतान के बीच सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी भी राहुल गांधी के आवास पर पहुंचीं। कहा जा रहा है कि मप्र के मुख्यमंत्री के मसले पर राहुल गांधी से सोनिया और प्रियंका ने भी चर्चा की।

वरिष्ठ पत्रकार रवींद्र व्यास का कहना है कि राज्य की जनता ने भाजपा को सत्ता से उतारकर कांग्रेस को सरकार बनाने का मौका दिया है। कांग्रेस क्या वास्तव में जनता की मंशा और भाव को समझ पा रही है? इस पर थोड़े सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि दिल्ली में मुख्यमंत्री के नाम को लेकर कई घंटों तक माथापच्ची चली।

व्यास ने आगे कहा कि पार्टी हाईकमान कोई ऐसा फैसला भी नहीं करना चाहती, जिससे प्रदेश के मतदाताओं में नकारात्मक संदेश जाए। कांग्रेस को अंदेशा है कि अगर नकारात्मक संदेश चला गया, कार्यकर्ताओं में असंतोष बढ़ गया तो लोकसभा चुनाव में संभावनाओं को बनाए रखना आसान नहीं होगा।

विधानसभा चुनाव में सफलता मिलने से कार्यकर्ताओं का उत्साह उफान पर है। राज्य के विभिन्न हिस्सों से सैकड़ों की तादाद में कार्यकर्ता राजधानी पहुंच चुके हैं। प्रदेश कार्यालय के बाहर सुबह से ही कार्यकर्ताओं का जमावड़ा है, कमलनाथ और सिंधिया के कटआउट, पोस्टर हाथ में थामे कार्यकर्ता जिंदाबाद के नारे लगाने में लगे हैं।

By : संदीप पौराणिक

Continue Reading
Advertisement
Congress-reuters
राजनीति4 weeks ago

संघ का सर्वे- ‘कांग्रेस सत्ता की तरफ बढ़ रही’

Sara Pilot
ओपिनियन3 weeks ago

महिलाओं का आत्मनिर्भर बनना बेहद जरूरी : सारा पायलट

Phoolwaalon Ki Sair
ब्लॉग4 weeks ago

फूलवालों की सैर : सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतीक

Bindeshwar Pathak
ज़रा हटके4 weeks ago

‘होप’ दिलाएगा मैन्युअल सफाई की समस्या से छुटकारा : बिंदेश्वर पाठक

Toilets
ब्लॉग3 weeks ago

लड़कियों के नाम, नंबर शौचालयों में क्यों?

bundelkhand water crisis
ब्लॉग3 weeks ago

बुंदेलखंड में प्रधानमंत्री के दावे से तस्वीर उलट

Ranveer singh-
मनोरंजन2 weeks ago

दीपिका-रणवीर के रिसेप्शन में पहुंचे बॉलीवुड के ये सितारे, देखें तस्वीरें

ATM
ब्लॉग3 weeks ago

देश के आधे एटीएम बंद हुए तो होंगे नोटबंदी जैसे हालात!

Tigress Avni
ब्लॉग4 weeks ago

अवनि मामले में महाराष्ट्र सरकार ने हर मानक का उल्लंघन किया : सरिता सुब्रमण्यम

PM Modi Rajnath Jaitley
ब्लॉग3 weeks ago

लोकतांत्रिक संस्थाओं को उन शासकों की परवाह क्यों है जो क़ानून को ही ठेंगा दिखाते हैं?

Kangana Runout
मनोरंजन19 hours ago

फिल्म “मणिकर्ण‍िका” का ट्रेलर लॉन्च

RAHUL
राजनीति23 hours ago

कर्ज माफी पर बोले राहुल- ‘जो वादा किया, निभाया’

bjp
राजनीति1 day ago

बीजेपी विधायक की महिला एसडीएम को धमकी

Jammu-Kashmir
शहर2 days ago

कश्मीर में शीतलहर का प्रकोप जारी

delhi-bus--
मनोरंजन3 days ago

निर्भया पर बनी फिल्म ‘दिल्ली बस’, इस दिन होगी र‍िलीज

Kapil Sibal
राष्ट्रीय5 days ago

राफेल पर सिब्‍बल का शाह को जवाब- ‘जेपीसी जांच से ही सामने आएगा सच’

Rajinikanth-
मनोरंजन7 days ago

रजनीकांत के जन्मदिन पर ‘पेट्टा’ का टीजर रिलीज

Jammu And Kashmir
शहर1 week ago

जम्मू-कश्मीर के राजौरी में बर्फबारी

Rajasthan
चुनाव2 weeks ago

राजस्थान में सड़क पर ईवीएम मिलने से मचा हड़कंप, दो अफसर सस्पेंड

ISRO
राष्ट्रीय2 weeks ago

भारत का सबसे भारी संचार उपग्रह कक्षा में स्थापित

Most Popular