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ओपिनियन

दमनकारी विचारधारा के ज़रिये आस्था के नाम पर भय फैलाना बेहद ख़तरनाक है

हिन्दूवाद एक जीवनशैली है। इसीलिए इसे विचारधारा के दायरे में नहीं बाँधा जा सकता। जब भी ऐसा करने की कोशिश की जाएगी, तब हिन्दूवाद की आत्मा नष्ट हो जाएगी।

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लोगों को नफ़रत करना पसन्द है। लेकिन जब उन्हें लगता है कि ईश्वर उनके साथ है तो उनकी आस्थाएँ भी घृणा पैदा करती है। इसी से हिंसा के अंकुर फूटते हैं। तीस वर्षीय युद्ध, सदियों से जारी शिया-सुन्नी टकराव और यहूदियों का क़त्लेआम जहाँ बीते ज़माने की बातें हैं, वहीं तालिबान का उदय, हक्कानी नेटवर्क और इस्लामिक स्टेट की विचारधारा का फैलाव भी तो घृणा आधारित आस्था का ही तो नतीज़ा है।

हिंसा को किसी भी तर्क के आधार पर वाज़िब नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन इसे भी फलने-फूलने के लिए माकूल माहौल की ज़रूरत होती है। लेकिन जब हिंसा को दैवीय शक्तियों से जोड़कर देखने को विचारधारा की संज्ञा दी जाती है तो वो अमानवीय बन जाती है। हिन्दू दर्शन इसके बिल्कुल विपरीत है। इसीलिए कुरुक्षेत्र के मैदान में कृष्ण को अर्जुन को उपदेश देकर समझाना पड़ा कि क्यों उसका अपने ही चचेरे भाईयों को मारना ज़रूरी है। कृष्ण, पूर्णता के प्रतीक हैं। वो किसी आस्था का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे थे, इसीलिए उन्होंने तर्कों से अर्जुन को अपना कर्म करने के लिए प्रेरित किया। कर्म की अवधारणा का आस्था से कोई नाता नहीं है। अर्जुन ने अपने ही भाईयों के प्रति हिंसक होने से इनकार करके अपने शस्त्र त्याग दिये थे। सदियों से न्यायोचित आचरण ही हिन्दू जीवनशैली के केन्द्र में रहा है। इस जीवनशैली में हमारे सामने तरह-तरह के विकल्प होते हैं और हमें अपने कर्तव्यों को ध्यान में रखकर अपना सही रास्ता चुनना होता है।

यहाँ बुराई पर अच्छाई की जीत में भी विजय-उल्लास नहीं होता है। इसीलिए हिंसा, अन्तिम विकल्प है और आत्मरक्षा के लिए ही हथियार का इस्तेमाल हो। सत्य की हमारी तलाश उन कर्मों से शुरू होती है जो कर्तव्य हैं। लेकिन इससे पहले हम आत्म-निरीक्षण करके समस्या का विश्लेषण करते हैं, बातचीत का रास्ता अपनाते हैं। यही वजह है कि हिन्दूवादी दर्शन में सहिष्णुता और विचारों की विविधता हमेशा से मौजूद रहती है। इसीलिए ये जीवनशैली सदियों से बरकरार है। लेकिन दुर्भाग्य से हाल के वर्षों में हिन्दू धर्म के कुछ मठाधीश अपनी बुनियादी दिशा से भटककर असहिष्णु, अतार्किक और हिंसक तरीकों से अपने नज़रियों को औरों पर थोपने की राह पर चल निकले। सबको साथ लेकर चलने का दर्शन कमज़ोर पड़ने लगा।

चूँकि हिन्दूवाद एक जीवनशैली है। इसीलिए इसे विचारधारा के दायरे में नहीं बाँधा जा सकता। जब भी ऐसा करने की कोशिश की जाएगी, तब हिन्दूवाद की आत्मा नष्ट हो जाएगी। विचारधारा के ज़रिये शक्ति प्रदर्शन, दमन, भय और ज़बरन आज्ञाकारी बनाने का काम तो हो सकता है, लेकिन उसमें संवाद का कोई गुंजाइश नहीं होती।

हिन्दू (सनातन) धर्म के बुनियादी दर्शन को दरकिनार करके बनायी गयी हिन्दुत्व की विचारधारा, किसी भी सच्चे हिन्दू की जीवनशैली हो ही नहीं सकती। इसीलिए हिन्दुत्व ब्रिगेड के रूप में जो उन्मादी चेहरा हमें देश भर में दिखायी देता है वो असली हिन्दू हो ही नहीं सकता। ये ऐसे लोग हैं जिन्हें लगता है कि सबके जीवन और संस्कृति को निर्धारित करने का अधिकार बहुसंख्यकों को अपने आप ही मिल जाता है। बहुसंख्यवाद का ये स्वभाव होता है कि वो सभी पर अपनी धारणाओं को ज़बरन थोपे। जैसे, ये धारणा है कि गाय पवित्र है और गौरक्षकों को गाय का व्यापार करने वालों को पीट-पीटकर मान डालने का अधिकार है। इसी धारणा की आड़ में दलितों और अल्पसंख्यकों पर ज़ुल्म और ज़्यादती को भी सही ठहरा दिया जाता है।

गौरक्षकों को क़ानून की कोई परवाह नहीं होती। वो इसके उल्लंघन को बहादुरी समझते हैं। यही हिन्दुत्ववादी तत्व उस वक़्त भी बहुत उग्र होने को अपना धर्म समझते हैं, जब एक मुस्लिम लड़का, एक हिन्दू लड़की से शादी कर लेता है। वो इसे अपवित्र गठजोड़ मानते हैं और इसे ‘लव जिहाद’ का नाम दे देते हैं। उनके हिन्दुत्व की विचारधारा में ‘प्यार’ किसी की निजी पसन्द नहीं हो सकती। आलम यहाँ तक जा पहुँचा है कि एक बालिग लड़की के विवाह को अवैध ठहराकर बन्धक बना लिया जाता है और उसे मुक्त करवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट को बन्दी-प्रत्यक्षीकरण (हैबीस कॉर्पस) याचिका पर कार्रवाई करनी पड़ती है। माज़रा तब और भी भयावह हो जाता है जब ऐसे बहुसंख्यकवादी तत्वों को सरकारों का प्रत्यक्ष और परोक्ष समर्थन मिलता है।

धर्म एक निजी आस्था की चीज़ है। इसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं हो सकती। लेकिन मौजूदा हुक़ूमत के साये तले हिन्दुत्व को ‘दंड मुक्त’ एजेंडा की तरह पेश किया जा रहा है। हिन्दुत्व में निहित उदारता की जगह बहुसंख्यकवाद की असहिष्णुता का स्थापित किया जा रहा है। ये ताकतें हरेक व्यक्ति के जीवन के हरेक पहलू का दायरा तय करना चाहती हैं। हमारे लोकतंत्र की विविधता को मिटाकर एकरूपता को थोपने का काम पूरी बेशर्मी से किया जा रहा है। हिन्दूवादी संस्कृति के नाम पर ये ज़बरन निर्धारित किया जा रहा है कि हम क्या पहनें, क्या खायें, हमारे बच्चे क्या पढ़ें, क्या सीखें!

मेरे जैसे जो लोग इस नज़रिये से इत्तेफ़ाक नहीं रखते, उन्हें नेस्तनाबूद करने की चुनौती मिल रही है। इस चुनौती ये हम कैसे निपटेंगे? इस सवाल के जबाव से ही हमारे उस लोकतंत्र का भविष्य तय होगा, जो अपने मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं के लिए पहचाना जाता था। हमें न सिर्फ़ इसका संरक्षण करना होगा, बल्कि हमारे पास ये विकल्प ही नहीं है कि हम विफल हो सकें।

(साभार: द हिन्दू। लेखक, वरिष्ठ काँग्रेस नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री हैं।)

ओपिनियन

2019 में भी मोदी जीते तो 36 नहीं बल्कि 72 राफ़ेल मिलेंगे और वो भी बिल्कुल मुफ़्त!

अब तक सवा सौ करोड़ भारतवासियों के सामने 9, 20, 26 और 40 फ़ीसदी कम पर राफ़ेल सौदा करने का दावा किया जा चुका है! इसमें ग़ौर करने वाली सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि जैसे-जैसे वक़्त बीत रहा है, वैसे-वैसे राफ़ेल सौदे पर हुई बचत का आँकड़ा भी विकास के नये-नये कीर्तिमान बना रहा है! बिल्कुल पेट्रोल-डीज़ल, सीएनजी और रसोई गैस के क़ीमतों की तरह!

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Rafale deal scam

क्या आप जानते हैं कि फ़्राँस से अन्ततः भारत को 36 राफ़ेल विमान बिल्कुल मुफ़्त मिलने वाले हैं! जानकारों का तो यहाँ तक कहना है कि नरेन्द्र मोदी सरकार की राष्ट्रभक्ति और ईमानदारी को देखते हुए मुमकिन है कि भारतीय वायु सेना को आख़िरकार 36 की जगह 72 राफ़ेल हासिल हो जाएँ! और, वो भी बिल्कुल मुफ़्त! जी हाँ, ‘एक के साथ एक फ़्री’ के रूप में! मुमकिन है कि आपको ये ख़बर फ़ेक लगे! लेकिन ये फ़ेक नहीं हो सकती क्योंकि राफ़ेल सौदे के बारे में मोदी सरकार के मंत्री जिस तरह से आये-दिन सनसनीखेज़ ख़ुलासे कर रहे हैं, उसे देखते हुए वो दिन दूर नहीं जब परम माननीय प्रधानसेवक श्रीमान नरेन्द्र मोदी जी महाराज की ओर से ऐलान कर दिया जाए कि वास्तव में पूरा का पूरा राफ़ेल सौदा ही सवा सौ करोड़ भारतवासियों को मुफ़्त में हासिल होने वाला है!

विदेश राज्यमंत्री जनरल वीके सिंह ने शनिवार 30 सितम्बर 2018 को दुबई में भारतीय वाणिज्य दूतावास में जुटे भारतीय समुदाय के सामने दावा किया कि “संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन सरकार ने 126 विमानों के लिए जिस मूल क़ीमत को लेकर बातचीत की थी और उड़ान की स्थिति आते-आते राफ़ेल विमान की जो प्रभावी क़ीमत बैठेगी, यदि दोनों की तुलना की जाए तो मोदी सरकार ने राफ़ेल सौदा 40 प्रतिशत कम में किया है।”

मुमकिन है कि इतना पढ़ते ही आप उछल पड़े हों, क्योंकि अभी तक तो आपको यही बताया गया था कि मनमोहन सिंह सरकार के मुक़ाबले मोदी सरकार ने राफ़ेल सौदे में 20 फ़ीसदी की बचत हासिल करके दिखाया है। 29 अगस्त 2018 को भारत के सबसे बड़े गणितज्ञ और वित्त मंत्री अरूण जेटली ने रहस्योद्घाटन किया था कि “राफ़ेल डील की तुलना यदि 2007 की क़ीमतों से की जाए तो साल 2016 में हुई डील 20 फ़ीसदी कम क़ीमत पर की गयी है। दरअसल, एनडीए सरकार की डील, लोडेड एयरक्राफ्ट की है, जो हथियारों से लैस है। जबकि काँग्रेस ने सिर्फ़ बेसिक या ढाँचा एयरक्राफ्ट का सौदा किया था।”

उसी वक़्त जेटली ने कृतज्ञ राष्ट्र को ये भी समझाया कि राफ़ेल की क़ीमत में जो अन्तर है वो बेसिक और लोडेड की वजह से है। लेकिन देश की सबसे पुरानी पार्टी, काँग्रेस को इतनी सी बात भी समझने की अक़्ल नहीं है। इसीलिए उसके अध्यक्ष राहुल गाँधी सवा सौ करोड़ भारतवासियों को ग़ुमराह कर रहे हैं और पूर्व फ़्राँसिसी राष्ट्रपति फ्रॉस्वा ओलांद के साथ साज़िश रचकर मोदी सरकार को दुनिया भर में बदनाम कर रहे हैं। राफ़ेल सौदे की अद्भुत विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए जेटली ने बताया था कि “2007 के लोडेड एयरक्राफ्ट की तुलना यदि 2016 के लोडेड एयरक्राफ्ट से की जाए तो मोदी सरकार ने क़रीब 20 फ़ीसदी पैसा बचाया है।”

अब ज़रा और पीछे चलिए। 24 जुलाई 2018 को मोदी सरकार के एक और बेहद विद्वान, ईमानदार, निष्ठावान और साहसी मंत्री श्रीमान रविशंकर प्रसाद जी ने दुनिया भर में बिखरे हुए भारतवंशियों को ज्ञानालोकित किया था कि “2011 में काँग्रेस के शासन में हुई डील में एक राफ़ेल जेट की क़ीमत 813 करोड़ रुपये रखी गयी थी। 2016 में हमारी सरकार के दौरान हुए समझौते में इसकी क़ीमत 739 करोड़ रुपये तय हुई। जो यूपीए सरकार की कुल क़ीमत से 9% कम है।”

इसके एक दिन पहले यानी 23 जुलाई 2018 को केन्द्रीय क़ानून और सूचना-प्रौद्योगिकी मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने राष्ट्रसेवा की बड़ी मिसाल पेश करते हुए ट्वीट करके एक ही झटके में कई लोगों को चरित्र प्रमाणपत्र बाँट दिया। उन्होंने लिखा कि “एके एंटनी 8 साल तक देश के रक्षामंत्री थे। वो देश के रक्षा क्षेत्रों से जुड़े संवेदनशील मुद्दों को समझते हैं। लेकिन जब एक पार्टी किसी परिवार के इर्द-गिर्द हो जाती है, तो सभी नेताओं को भीड़ की तरह ही बोलना पड़ता है। 2004 से 2014 तक काँग्रेस की सरकार भ्रष्टाचार से ग्रस्त थी। आज जब हम ईमानदारी से काम कर रहे हैं। देश विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्था बन रही है। राहुल गाँधी ने राफ़ेल डील के बारे में लोकसभा में झूठ बोला। फ़्राँस के राष्ट्रपति से बातचीत को लेकर बोले गये झूठ ने तो मनमोहन सिंह और आनन्द शर्मा को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। राहुल गाँधी को देश के संवेदनशील मुद्दों की कितनी समझ है? जनता ये समझ गयी है।”

मोदी सरकार में रविशंकर प्रसाद से कोई कम समझदार और विदुषी नहीं हैं माननीय रक्षा मंत्री सुश्री निर्मला सीतारमन! ये देवी भी नारी-शक्ति की महान भारतीय परम्पराओं को निभाते हुए 18 सितम्बर 2018 को दोहराती हैं कि “यूपीए के मुक़ाबले एनडीए का सौदा 9 प्रतिशत सस्ता है।” हालाँकि, सीतारमन के 9 फ़ीसदी के दावे को उनके महकमे के ही वायु सैनिक अधिकारी एयर मार्शल रघुनाथ नाम्बियार ने भी फ़ुस्स साबित कर दिया। वायुसेना के उपप्रमुख नाम्बियार कह चुके हैं कि 2008 में जिस स्तर से यूपीए सरकार ने सौदेबाज़ी या मोलतोल शुरू की थी, उसके मुक़ाबले मोदी सरकार ने 40 फ़ीसदी कम दाम पर सौदा किया है।

इसी तरह, आपको ये जानकर भी शायद ही आश्चर्य हो कि संसद में राफ़ेल सौदे को गोपनीय बताने वाली मोदी सरकार ने 19 अप्रैल 2016 को बेहद की कलात्मक ब्यौरे के साथ ट्वीट करके विश्व को बताया था कि ‘मोदी सरकार ने 12 अरब डॉलर के सौदे में 3.2 अरब डॉलर बचा लिये हैं।’ हिसाब लगाएँ तो ये बचत 26 फ़ीसदी से ऊपर बैठती है! यानी, अब तक सवा सौ करोड़ भारतवासियों के सामने 9, 20, 26 और 40 फ़ीसदी कम पर राफ़ेल सौदा करने का दावा किया जा चुका है! इसमें ग़ौर करने वाली सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि जैसे-जैसे वक़्त बीत रहा है, वैसे-वैसे राफ़ेल सौदे पर हुई बचत का आँकड़ा भी विकास के नये-नये कीर्तिमान बना रहा है! बिल्कुल पेट्रोल-डीज़ल, सीएनजी और रसोई गैस के क़ीमतों की तरह!

विकास की ऐसी ऐतिहासिक लीला कोई साधारण बात नहीं है। 70 साल में कभी इतना शानदार विकास, देखा था किसी ने? राफ़ेल सौदे से जुड़ी ये उपलब्धि इसलिए भी मामूली नहीं है, क्योंकि ये जानकारियाँ भारतवर्ष की उन जीती-जागती महान विभूतियों के हवाले से है जो हमारे संवैधानिक पदों पर आसीन हैं और जिनके चाल-चरित्र और चेहरे की सौगन्ध खाकर देवलोक के देवतागण भी अपनी सत्ता संचालित करते हैं! बहरहाल, अब जल्द ही आपको एक और परम विदुषी और नाट्य शास्त्र के प्रणेता भरत मुनि की वंशज सुश्री स्मृति इरानी का ये बयान सुनने को मिलेगा कि राफ़ेल सौदे पर मोदी सरकार ने 60 फ़ीसदी का बचत की है!

इसके कुछ समय बाद महान शिक्षा शास्त्री और समाज सुधारक श्रीमान प्रकाश जावड़ेकर का ये ख़ुलासा सामने होगा कि मोदी सरकार ने राफ़ेल सौदे में मनमोहन सिंह सरकार के मुक़ाबले 80 फ़ीसदी की बचत की है! इसीलिए ये सारी की सारी रक़म भारत के एक अन्य महान सपूत और कर्ज़ों में डूबे हुए उद्योगपति अनिल अम्बानी को तोहफ़े के रूप में दे दी जाएगी! इसके भी कुछ वक़्त बाद, सदाचार के सबसे बड़े पुरोधा श्रीमान राजनाथ सिंह का बयान आएगा कि पाकिस्तान को मुँहतोड़ जबाब देने के संकल्प को देखते हुए फ़्राँस की डसॉल्ट एविएशन कम्पनी ने फ़ैसला किया है कि वो भारत को 36 लोडेड राफ़ेल बिल्कुल मुफ़्त देगा!

फिर 2019 का चुनाव नज़दीक आते-आते बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का बयान आएगा कि फ़्राँस के मौजूदा राष्ट्रपति इम्मुअल मैक्रों ने प्रस्ताव भेजा है कि युगपुरुष नरेन्द्र मोदी जी की चतुर्दिक तपस्या को देखते हुए भारत को ‘एक के साथ एक फ़्री’ वाला ऑफ़र दिया जाएगा! इसके लिए बस एक ही शर्ते होगी कि 2019 में मोदी को फिर से प्रधानमंत्री बनवाया जाए! यदि मोदी प्रधानमंत्री बने तो पाकिस्तान में दिवाली मनायी जाएगी, क्योंकि आख़िर राफ़ेल के रूप में आने वाले 72 विमानों से पाकिस्तान का ही तो काम तमाम होना है!

अमित शाह, तब देश को ये भी बताएँगे कि संयुक्त राष्ट्र से सम्मानित नरेन्द्र मोदी, भारत के लिए तभी 72 आँधियाँ या राफ़ेल (फ़्रेंच शब्द राफ़ेल का हिन्दी में अर्थ आँधी या तेज़ हवा होता है) ला पाएँगे, जब जनता बीजेपी को 350 सीटें जिताएगी! आख़िर में, धुआँधार चुनाव प्रचार करते हुए नरेन्द्र मोदी ख़ुलासा करेंगे कि राहुल गाँधी जानना चाहते हैं कि मैंने अनिल भाई को फ़ायदा क्यों पहुँचाया? तो जान लीजिए कि अनिल के अलावा राफ़ेल का मेल और किसी से हो ही नहीं सकता! क्योंकि अनिल का मतलब भी वही है जो राफ़ेल का है। यानी, ‘पवन, वायु, हवा’!

फिर मोदी गरजेंगे कि भाईयों-बहनों, मैं पूछना चाहता हूँ कि अनिल और राफ़ेल के मेल को कोई तेल और पानी का मिलन कह सकता है क्या? लेकिन नामदार को इतनी समझ कहाँ है! इसीलिए वो कहते फिरते हैं कि राफ़ेल सौदा दुनिया का सबसे बड़ा घोटाला है! मैं पूछता हूँ कि 70 साल में काँग्रेस एक भी ऐसा घोटाला क्यों नहीं कर सकी? क्योंकि इसकी नीयत ठीक नहीं थी। जबकि मेरी नीयत पहले दिन से साफ़ थी। इसीलिए आज तक काले धन का एक रुपया भी विदेश से नहीं आया। अच्छे दिन तो बस, आते ही रह गये।

भाईयों-बहनों,

नोटबन्दी और 2000 के नोट के ज़रिये मैंने काला धन रखने वालों की कितनी बड़ी मुसीबत दूर कर दी, ये उनसे पूछिए जिनके पास काला धन है और जिन्हें काले कारोबार में महारत हासिल है! नोटबन्दी में मैंने पूरे देश को लाइन में लगा दिया। लेकिन क्या कहीं किसी को कोई धन्ना सेठ या अफ़सर कभी लाइन में दिखायी दिया? नहीं ना! ऐसा सिर्फ़ इसलिए हुआ कि मेरे दोस्तों को पता था नोटबन्दी का असली मक़सद ही सारे काले धन को सफ़ेद बनाना था! इस काम को काँग्रेस 70 साल में भी नहीं कर पायी, लेकिन मैंने 50 दिन से भी कम में करके दिखा दिया! ये कोई मामूली उपलब्धि नहीं है। इसकी वजह से किसी भी रईस व्यक्ति ने ख़ुदकुशी क्यों नहीं की? क्योंकि उसे मालूम था कि नोटबन्दी का मक़सद, ग़रीबों को सबक सिखाना था, उनके पास दबे रुपयों को बाहर निकालना था!

भाईयों-बहनों,

ऐसी ही गर्व करने वाली कहानी जीएसटी की भी है। लेकिन इसकी बात फिर कभी। अभी तो आप से जानकार गदगद रहिए कि राफ़ेल दिनों-दिन सस्ता होते-होते, कैसे नसीबवालों की वजह से बिल्कुल मुफ़्त मिलने वाला है। वो भी ‘एक के साथ एक फ़्री’! अलबत्ता, इतना ज़रूर है कि मैं अनिल भाई से कह दूँगा कि वो काँग्रेस को 36 करोड़ रुपये का चन्दा पेटीएम से भेज दें, ताकि 2019 में काँग्रेस भी 44 से घटकर 36 पर ही सिमट जाए!

भाईयों-बहनों,

आपको मेरे मंत्रियों की देश भक्ति की ख़ास तौर पर दाद देनी चाहिए क्योंकि दिन-रात तरह-तरह की बयानबाज़ी करने में निपुण मेरे किसी भी मंत्री को, कभी नहीं लगा कि राफ़ेल सौदा करके मैंने काँग्रेस को भारी नुक़सान नहीं पहुँचाया है! राहुल गाँधी और उनके सहयोगी दलों को तथा यशवन्त सिन्हा और अरूण शौरी जैसे लोगों को भले ही राफेल सौदे में भारी घोटाले की बू आ रही हो, लेकिन देशप्रेम और राष्ट्रभक्ति के सबसे बड़े मन्दिर तथा मेरे प्रिय गुरुकुल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हरेक सिपाही राफ़ेल की सुगन्ध से गदगद है!

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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ओपिनियन

संशय भरे आधुनिक युग में हिंदू आदर्श धर्म : थरूर

वह धर्म जो सर्वज्ञानी सृजनकर्ता पर सवाल करता हो वह मेरे विचार से आधुनिक और उत्तर आधुनिक चैतन्य के लिए अनोखा धर्म है।

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Shashi-Tharoor

न्यूयॉर्क, 21 सितंबर | कांग्रेस सांसद व लेखक शशि थरूर के अनुसार, हिंदू एक अनोखा धर्म है और यह संशय के मौजूदा दौर के लिए अनुकूल है। थरूर ने धर्म के राजनीतिकरण की बखिया भी उधेड़ी।

न्यूयॉर्क में जयपुर साहित्य महोत्सव के एक संस्करण में के बातचीत सत्र के दौरान गुरुवार को थरूर ने कहा, “हिंदूधर्म इस तथ्य पर निर्भर करता है कि कई सारी बातें ऐसी हैं जिनके बारे में हम नहीं जानते हैं।”

मौजूदा दौर में इसके अनुकूल होने को लेकर उन्होंने कहा, “पहली बात यह अनोखा तथ्य है कि अनिश्चितता व संशय के युग में आपके पास एक विलक्षण प्रकार का धर्म है जिसमें संशय का विशेष लाभ है।”

सृजन के संबंध में उन्होंने कहा, “ऋग्वेद वस्तुत: बताता है कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति कहां से हुई, किसने आकाश और धरती सबको बनाया, शायद स्वर्ग में वह जानता हो या नहीं भी जानता हो।”

उन्होंने कहा, “वह धर्म जो सर्वज्ञानी सृजनकर्ता पर सवाल करता हो वह मेरे विचार से आधुनिक और उत्तर आधुनिक चैतन्य के लिए अनोखा धर्म है।”

उन्होंने कहा, “उससे भी बढ़कर आपके पास असाधारण दर्शनग्रहण है और चूंकि कोई नहीं जानता कि भगवान किस तरह दिखते हैं इसलिए हिंदूधर्म में हर कोई भगवान की कल्पना करने को लेकर स्वतंत्र है।”

कांग्रस सांसद और ‘व्हाइ आई एम हिंदू’ के लेखक ने उन लोगों का मसला उठाया जो स्त्री-द्वेष और भेदभाव आधारित धर्म की निंदा करते हैं।

मनु की आचार संहिता के बारे में उन्होंने कहा, “इस बात के बहुत कम साक्ष्य हैं। क्या उसका पालन किया गया और इसके अनेक सूत्र विद्यमान हैं।”

उन्होंने उपहास करते हुए कहा, “इन सूत्रों में मुझे नहीं लगता कि हर हिंदू कामसूत्र की भी सलाह मानते हैं।”

थरूर ने कहा, “प्रत्येक स्त्री विरोधी या जातीयता कथन (हिंदू धर्मग्रंथ में) के लिए मैं आपको समान रूप से पवित्र ग्रंथ दे सकता हूं, जिसमें जातीयता के विरुद्ध उपदेश दिया गया है।”

–आईएएनएस

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ओपिनियन

जानिये क्यों गिर रहा है रुपया

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Rupee Fall

नई दिल्ली, 13 सितम्बर | केंद्र सरकार ने रुपये की गिरावट को थामने की हरसंभव कोशिश करने का भरोसा दिलाया है। इसका असर पिछले सत्र में तत्काल देखने को मिला कि डॉलर के मुकाबले रुपये में जबरदस्त रिकवरी देखने को मिली। हालांकि रुपये में और रिकवरी की अभी दरकार है।

डॉलर के मुकाबले रुपया बुधवार को रिकॉर्ड 72.91 के स्तर तक लुढ़कने के बाद संभला और 72.19 रुपये प्रति डॉलर के मूल्य पर बंद हुआ। इससे पहले मंगलवार को 72.69 पर बंद हुआ था।

रुपये की गिरावट से अभिप्राय डॉलर के मुकाबले रुपये में कमजोरी आना है। सरल भाषा में कहें तो इस साल जनवरी में जहां एक डॉलर के लिए 63.64 रुपये देने होते थे वहां अब 72 रुपये देने होते हैं। इस तरह रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ है।

शेष दुनिया के देशों से लेन-देन के लिए प्राय: डॉलर की जरूरत होती है ऐसे में डॉलर की मांग बढ़ने और आपूर्ति कम होने पर देशी मुद्रा कमजोर होती है।

एंजेल ब्रोकिंग के करेंसी एनालिस्ट अनुज गुप्ता ने रुपये में आई हालिया गिरावट पर कहा, “भारत को कच्चे तेल का आयात करने के लिए काफी डॉलर की जरूरत होती है और हाल में तेल की कीमतों में जोरदार तेजी आई है जिससे डॉलर की मांग बढ़ गई है। वहीं, विदेशी निवेशकों द्वारा निवेश में कटौती करने से देश से डॉलर का आउट फ्लो यानी बहिगार्मी प्रवाह बढ़ गया है। इससे डॉलर की आपूर्ति घट गई है।”

उन्होंने बताया कि आयात ज्यादा होने और निर्यात कम होने से चालू खाते का घाटा बढ़ गया है, जोकि रुपये की कमजोरी की बड़ी वजह है।

ताजा आंकड़ों के अनुसार, चालू खाते का घाटा तकरीबन 18 अरब डॉलर हो गया है। जुलाई में भारत का आयात बिल 43.79 अरब डॉलर और निर्यात 25.77 अरब डॉलर रहा।

वहीं, विदेशी मुद्रा का भंडार लगातार घटता जा रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार 31 अगस्त को समाप्त हुए सप्ताह को 1.19 अरब डॉलर घटकर 400.10 अरब डॉलर रह गया।

गुप्ता बताते हैं, “राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बनने से भी रुपये में कमजोरी आई है। आर्थिक विकास के आंकड़े कमजोर रहने की आशंकाओं का भी असर है कि देशी मुद्रा डॉलर के मुकाबले कमजोर हो रही है। जबकि विश्व व्यापार जंग के तनाव में दुनिया की कई उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राएं डॉलर के मुकाबले कमजोर हुई हैं।”

अमेरिकी अर्थव्यवस्था में लगातार मजबूती के संकेत मिल रहे हैं जिससे डॉलर दुनिया की प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले मजबूत हुआ है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में मजबूती आने से विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से अपना पैसा निकाल कर ले जा रहे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि संरक्षणवादी नीतियों और व्यापारिक हितों के टकराव के कारण अमेरिका और चीन के बीच पैदा हुई व्यापारिक जंग से वैश्विक व्यापार पर असर पड़ा है।

–आईएएनएस

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