Connect with us
Kapil Sibal Kapil Sibal

ओपिनियन

दमनकारी विचारधारा के ज़रिये आस्था के नाम पर भय फैलाना बेहद ख़तरनाक है

हिन्दूवाद एक जीवनशैली है। इसीलिए इसे विचारधारा के दायरे में नहीं बाँधा जा सकता। जब भी ऐसा करने की कोशिश की जाएगी, तब हिन्दूवाद की आत्मा नष्ट हो जाएगी।

Published

on

लोगों को नफ़रत करना पसन्द है। लेकिन जब उन्हें लगता है कि ईश्वर उनके साथ है तो उनकी आस्थाएँ भी घृणा पैदा करती है। इसी से हिंसा के अंकुर फूटते हैं। तीस वर्षीय युद्ध, सदियों से जारी शिया-सुन्नी टकराव और यहूदियों का क़त्लेआम जहाँ बीते ज़माने की बातें हैं, वहीं तालिबान का उदय, हक्कानी नेटवर्क और इस्लामिक स्टेट की विचारधारा का फैलाव भी तो घृणा आधारित आस्था का ही तो नतीज़ा है।

हिंसा को किसी भी तर्क के आधार पर वाज़िब नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन इसे भी फलने-फूलने के लिए माकूल माहौल की ज़रूरत होती है। लेकिन जब हिंसा को दैवीय शक्तियों से जोड़कर देखने को विचारधारा की संज्ञा दी जाती है तो वो अमानवीय बन जाती है। हिन्दू दर्शन इसके बिल्कुल विपरीत है। इसीलिए कुरुक्षेत्र के मैदान में कृष्ण को अर्जुन को उपदेश देकर समझाना पड़ा कि क्यों उसका अपने ही चचेरे भाईयों को मारना ज़रूरी है। कृष्ण, पूर्णता के प्रतीक हैं। वो किसी आस्था का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे थे, इसीलिए उन्होंने तर्कों से अर्जुन को अपना कर्म करने के लिए प्रेरित किया। कर्म की अवधारणा का आस्था से कोई नाता नहीं है। अर्जुन ने अपने ही भाईयों के प्रति हिंसक होने से इनकार करके अपने शस्त्र त्याग दिये थे। सदियों से न्यायोचित आचरण ही हिन्दू जीवनशैली के केन्द्र में रहा है। इस जीवनशैली में हमारे सामने तरह-तरह के विकल्प होते हैं और हमें अपने कर्तव्यों को ध्यान में रखकर अपना सही रास्ता चुनना होता है।

यहाँ बुराई पर अच्छाई की जीत में भी विजय-उल्लास नहीं होता है। इसीलिए हिंसा, अन्तिम विकल्प है और आत्मरक्षा के लिए ही हथियार का इस्तेमाल हो। सत्य की हमारी तलाश उन कर्मों से शुरू होती है जो कर्तव्य हैं। लेकिन इससे पहले हम आत्म-निरीक्षण करके समस्या का विश्लेषण करते हैं, बातचीत का रास्ता अपनाते हैं। यही वजह है कि हिन्दूवादी दर्शन में सहिष्णुता और विचारों की विविधता हमेशा से मौजूद रहती है। इसीलिए ये जीवनशैली सदियों से बरकरार है। लेकिन दुर्भाग्य से हाल के वर्षों में हिन्दू धर्म के कुछ मठाधीश अपनी बुनियादी दिशा से भटककर असहिष्णु, अतार्किक और हिंसक तरीकों से अपने नज़रियों को औरों पर थोपने की राह पर चल निकले। सबको साथ लेकर चलने का दर्शन कमज़ोर पड़ने लगा।

चूँकि हिन्दूवाद एक जीवनशैली है। इसीलिए इसे विचारधारा के दायरे में नहीं बाँधा जा सकता। जब भी ऐसा करने की कोशिश की जाएगी, तब हिन्दूवाद की आत्मा नष्ट हो जाएगी। विचारधारा के ज़रिये शक्ति प्रदर्शन, दमन, भय और ज़बरन आज्ञाकारी बनाने का काम तो हो सकता है, लेकिन उसमें संवाद का कोई गुंजाइश नहीं होती।

हिन्दू (सनातन) धर्म के बुनियादी दर्शन को दरकिनार करके बनायी गयी हिन्दुत्व की विचारधारा, किसी भी सच्चे हिन्दू की जीवनशैली हो ही नहीं सकती। इसीलिए हिन्दुत्व ब्रिगेड के रूप में जो उन्मादी चेहरा हमें देश भर में दिखायी देता है वो असली हिन्दू हो ही नहीं सकता। ये ऐसे लोग हैं जिन्हें लगता है कि सबके जीवन और संस्कृति को निर्धारित करने का अधिकार बहुसंख्यकों को अपने आप ही मिल जाता है। बहुसंख्यवाद का ये स्वभाव होता है कि वो सभी पर अपनी धारणाओं को ज़बरन थोपे। जैसे, ये धारणा है कि गाय पवित्र है और गौरक्षकों को गाय का व्यापार करने वालों को पीट-पीटकर मान डालने का अधिकार है। इसी धारणा की आड़ में दलितों और अल्पसंख्यकों पर ज़ुल्म और ज़्यादती को भी सही ठहरा दिया जाता है।

गौरक्षकों को क़ानून की कोई परवाह नहीं होती। वो इसके उल्लंघन को बहादुरी समझते हैं। यही हिन्दुत्ववादी तत्व उस वक़्त भी बहुत उग्र होने को अपना धर्म समझते हैं, जब एक मुस्लिम लड़का, एक हिन्दू लड़की से शादी कर लेता है। वो इसे अपवित्र गठजोड़ मानते हैं और इसे ‘लव जिहाद’ का नाम दे देते हैं। उनके हिन्दुत्व की विचारधारा में ‘प्यार’ किसी की निजी पसन्द नहीं हो सकती। आलम यहाँ तक जा पहुँचा है कि एक बालिग लड़की के विवाह को अवैध ठहराकर बन्धक बना लिया जाता है और उसे मुक्त करवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट को बन्दी-प्रत्यक्षीकरण (हैबीस कॉर्पस) याचिका पर कार्रवाई करनी पड़ती है। माज़रा तब और भी भयावह हो जाता है जब ऐसे बहुसंख्यकवादी तत्वों को सरकारों का प्रत्यक्ष और परोक्ष समर्थन मिलता है।

धर्म एक निजी आस्था की चीज़ है। इसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं हो सकती। लेकिन मौजूदा हुक़ूमत के साये तले हिन्दुत्व को ‘दंड मुक्त’ एजेंडा की तरह पेश किया जा रहा है। हिन्दुत्व में निहित उदारता की जगह बहुसंख्यकवाद की असहिष्णुता का स्थापित किया जा रहा है। ये ताकतें हरेक व्यक्ति के जीवन के हरेक पहलू का दायरा तय करना चाहती हैं। हमारे लोकतंत्र की विविधता को मिटाकर एकरूपता को थोपने का काम पूरी बेशर्मी से किया जा रहा है। हिन्दूवादी संस्कृति के नाम पर ये ज़बरन निर्धारित किया जा रहा है कि हम क्या पहनें, क्या खायें, हमारे बच्चे क्या पढ़ें, क्या सीखें!

मेरे जैसे जो लोग इस नज़रिये से इत्तेफ़ाक नहीं रखते, उन्हें नेस्तनाबूद करने की चुनौती मिल रही है। इस चुनौती ये हम कैसे निपटेंगे? इस सवाल के जबाव से ही हमारे उस लोकतंत्र का भविष्य तय होगा, जो अपने मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं के लिए पहचाना जाता था। हमें न सिर्फ़ इसका संरक्षण करना होगा, बल्कि हमारे पास ये विकल्प ही नहीं है कि हम विफल हो सकें।

(साभार: द हिन्दू। लेखक, वरिष्ठ काँग्रेस नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री हैं।)

ओपिनियन

साफ़ दिख रहा है कि गुजरात की बयार देख बदहवास हो गये हैं मोदी…!

असली हिन्दू और नकली हिन्दू, हिन्दू या ग़ैर-हिन्दू जैसी फ़िज़ूल की बातों में लोगों को उलझाया जाता है। झूठ फैलाया जाता है कि सरदार पटेल और सुभाष चन्द्र बोस से नेहरू की ठनी रहती थी। इन्हें पता ही नहीं है कि उस दौर के नेताओं में मतभेदों के बावजूद साथ चलने, एक-दूसरे का आदर करने तथा सही मायने में देश को आगे रखने का बेजोड़ संस्कार था। इन्हीं संस्कारों की वजह से काँग्रेस पार्टी दशकों तक जनता की चहेती बनी रही।

Published

on

Narendra Modi

पिछले कई चुनावों की तरह गुजरात में भी नरेन्द्र मोदी ताबड़तोड़ रैलियाँ कर रहे हैं। हालाँकि, ज़मीनी स्तर पर उन्होंने साफ़ दिख रहा है कि नोटबन्दी, जीएसटी, बेरोज़गारी और महँगाई जैसी अर्थतंत्र को चौपट कर देने वाली उनकी नीतियों की वजह से उनके गृह राज्य में बीजेपी के प्रति हवा बहुत ख़िलाफ़ हो चुकी है। मोदी और उनके सहयोगी नेताओं की विशाल चांडाल-चौकड़ी भी इस हवा का रुख़ नहीं मोड़ पा रही है। इसीलिए मोदी के भाषणों में बदहवासी और खिसियाहट न सिर्फ़ साफ़ नज़र आती है। बल्कि ये इस क़दर बढ़ चुकी है जैसे गुजरात में 22 साल से काँग्रेस ही सत्ता में हो और बीजेपी उसे उखाड़ फेंकने के लिए प्राण-प्रण से जुटी है।

जगज़ाहिर रहा कि मोदी, देश के ऐसे अनोखे नेता हैं जिन्हें सवालों से अज़ीब-ओ-ग़रीब किस्म की एलर्ज़ी है। उन्हें दूसरों से सवाल पूछने में तो ख़ूब मज़ा आता है कि लेकिन दूसरों के सवालों का जबाव देना उन्हें कतई गँवारा नहीं। मोदी को गौरक्षा, बीफ़, दलित उत्पीड़न जैसे बेहद शर्मनाक और देश को झकझोर रहे मुद्दों पर त्वरित प्रतिक्रिया देना भी पसन्द नहीं है। भले ही देश उनसे अति-संवेदनशील रवैये की अपेक्षा रखता हो। इसीलिए, दिन-रात भाषण देने वाले, काँग्रेस से असंख्य सवाल पूछने के अभ्यस्त नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद कभी पत्रकारों के सवालों का सामना नहीं किया। इसके अलावा, संघ परिवार के संस्कारों के मुताबिक़, मोदी को भी अपने विरोधियों का झूठा चरित्रहनन करने में बहुत मज़ा आता है।

गुजरात की बयार को देख मोदी अब बेहद गुस्से में नॹर आते हैं। बौखलाहट, खिसियाहट, बदहवासी, बेचैनी को अब वो छिपा नहीं पा रहे। उनकी तकलीफ़ में काँग्रेस रोज़ाना नये-नये सवाल पूछकर आग में घी डाल रही है। इससे मोदी बुरी तरह से तिलमिला गये हैं। काँग्रेस ने उनसे पूछ लिया कि 2012 में उन्होंने ग़रीबों को 50 लाख नये घर बनाकर देने का वादा किया था, लेकिन पाँच साल में भी सिर्फ़ 4.72 लाख घर ही क्यों बन पाये? क्या ये गुजरात मॉडल की हक़ीक़त नहीं है! मोदी की दिक्कत ये भी है कि अब कौन उनकी ओर से गुजरातियों को बताएगा कि ‘अच्छे दिन’ और हर खाते में 15-15 लाख रुपये की तरह 50 लाख घरों को बनाने का वादा भी एक जुमला ही था! और, जनता को तो ये देखकर ही निहाल हो जाना चाहिए कि गुजरात के बेटे ने ग़रीबों के लिए 4.72 लाख घर बनवाए! 70 साल में यदि ऐसा हुआ होता तो उनके पास करने के लिए कुछ बचता ही नहीं!

दरअसल, #मोदीजी_बदहवास हो गये हैं! उन्हें समझ में आ गया है कि गुजरात का व्यापारी समाज उनके खोटे जीएसटी की वजह से बेहद ख़फ़ा है। इसीलिए वो जनता को बरगलाने के लिए बेहद मूर्खतापूर्ण दलीलें भी गढ़ लेते हैं। वो कहते हैं, ‘नमक और कार पर एक जैसा GST कैसे हो सकता है?’ ताज़्ज़ुब की बात तो ये है कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बाँधे की तर्ज़ पर मोदी को ये कौन समझाये कि 18 रुपये प्रति किलो बिकने वाले साधारण नमक पर 18% जीएसटी होगा 3.24 रुपये। जबकि 5 करोड़ रुपये की कार पर यही टैक्स 90 लाख रुपये का होगा। लिहाज़ा, दोनों की तुलना करना ही सर्वथा बेमानी है! लेकिन मोदी यही नहीं रुके। उन्होंने जीएसटी की दर को एक समान 18% रखने की बात करने वालों को ‘ग्रांड स्टुपिड थॉट’ यानी ‘महामूर्खतापूर्ण विचार’ तक कह दिया। अब मोदी जी ये तो बताने से रहे कि क्या सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविन्द सुब्रमण्यम और उन तमाम अर्थशास्त्रियों का ये नज़रिया ‘महामूर्खतापूर्ण विचार’ कहा जा सकता है क्योंकि वो जीएसटी को अधिकतम 18 फ़ीसदी रखने की पैरोकारी करते रहे हैं?

#मोदीजी_बदहवास हो गये हैं! क्योंकि वो कहते हैं, ‘लोग जानते हैं कि काँग्रेस ने गुजरात के बेटों सरदार पटेल और मोरारजी के साथ कैसा व्यवहार किया था? उसी सोच की वजह से अब कथित तौर पर मोदी भी काँग्रेस के निशाने पर है।’ मज़े की बात ये है कि मोदी को अब ये कैसे याद रह सकता है कि भगवा ख़ानदान ने अपने ही बड़े नेताओं जैसे बलराज मधोक, लाल कृष्ण आडवाणी, गोविन्दाचार्य, यशवन्त सिन्हा, अरूण शौरी, नवजोत सिंह सिद्धू, कीर्ति आज़ाद, केशुभाई पटेल, शंकर सिंह वाघेला, सुरेश मेहता, आनन्दीबेन पटेल और शत्रुघ्न सिन्हा के साथ कैसा व्यवहार किया है, ये किससे छिपा है!

#मोदीजी_बदहवास हो गये हैं! तभी तो वो सोमनाथ मन्दिर में राहुल गाँधी के जाने से तिलमिला गये। कहने लगे, ‘आज जिन लोगों को सोमनाथ याद आ रहे हैं, इनसे एक बार पूछिए कि तुम्हें इतिहास पता है? तुम्हारे परनाना, तुम्हारे पिताजी के नाना, तुम्हारी दादी माँ के पिताजी, जो तब देश के पहले प्रधानमंत्री थे, जब सरदार पटेल सोमनाथ का उद्धार करा रहे थे। तब उनकी भौहें तन गयीं थीं। तब सरदार पटेल ने भारत के राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को उद्घाटन के लिए सोमनाथ आने का न्योता दिया था। तब तुम्हारे परनाना पंडित जवाहर लाल नेहरू ने डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को पत्र लिखकर सोमनाथ मन्दिर के कार्यक्रम में जाने पर नाराज़गी व्यक्त की थी।’

सोमनाथ मन्दिर से जुड़ा ये प्रसंग तो सही है। लेकिन मोदी ने इसका निहायत भ्रष्ट ब्यौरा दिया है। 2 मार्च 1951 को नेहरू ने राजेन्द्र प्रसाद को भेजे अपने ख़त में लिखा है कि जनता के चन्दे से हुए सोमनाथ मन्दिर के जीर्णोद्धार के लिए पटेल या राष्ट्रपति को सरकारी तौर पर अपनी मौज़ूदगी से परहेज़ करना चाहिए। वर्ना, इस दुष्प्रचार का जोख़िम पैदा होगा कि शीर्ष पदों पर बैठे नेता ही संविधान के उन धर्मनिरपेक्ष मूल्यों का आदर नहीं कर रहे, जो धर्म और धार्मिक आस्थाओं को निहायत निजी चीज़ समझने की पैरवी करता है। दिलचस्प ये भी है कि नेहरू को तब जिन बातों का शक़ था, आज बिल्कुल वही काम नरेन्द्र मोदी और उनका संघ परिवार कर रहा है!

भगवा ख़ानदान हमेशा से ख़ुद को हिन्दुओं का इकलौता ख़ैरख़्वाह दिखाना चाहता है। इसीलिए गुजरात के प्रसिद्ध मन्दिरों में जाने पर राहुल गाँधी की खिल्ली उड़ाई जाती है। इसे नाटक बताया जाता है। असली हिन्दू और नकली हिन्दू, हिन्दू या ग़ैर-हिन्दू जैसी फ़िज़ूल की बातों में लोगों को उलझाया जाता है। झूठ फैलाया जाता है कि सरदार पटेल और सुभाष चन्द्र बोस से नेहरू की ठनी रहती थी। इन्हें पता ही नहीं है कि उस दौर के नेताओं में मतभेदों के बावजूद साथ चलने, एक-दूसरे का आदर करने तथा सही मायने में देश को आगे रखने का बेजोड़ संस्कार था। इन्हीं संस्कारों की वजह से काँग्रेस पार्टी दशकों तक जनता की चहेती बनी रही। उस दौर के नेता छिटपुट मतभेद के बावजूद एक-दूसरे के गुणों का बहुत आदर करते थे। तभी तो सुभाष चन्द्र बोस ने आज़ादी मिलने से काफ़ी पहले महात्मा गाँधी से कह दिया था कि आज़ाद हिन्दुस्तान का पहला प्रधानमंत्री बनने की सर्वोच्च क्षमता जवाहर लाला नेहरू में ही है!

सचमुच, #मोदीजी_बदहवास हो गये हैं! इसीलिए वो सच्चाई को ऐसे तोड़-मरोड़ पेश करते हैं, जिसे विरोधियों का चरित्रहनन किया जा सके। गुजरातियों को मोदी बरगला रहे हैं कि इन्दिरा गाँधी उनके राज्य को इस क़दर नापसन्द करती थीं कि 1979 में वो जब मोरबी शहर में पहुँची तो उन्होंने मुँह पर रूमाल रख लिया था। मोदी ने इस मिसाल को जैसे पेश किया वो निहायत शर्मनाक और गरिमा-रहित है। क्योंकि सच्चाई ये है कि मच्छू डैम टूटने (1979) के वक़्त मोरबी में बहुत बदबू फैली हुई थी। क्योंकि हज़ारों इंसान और पशु हादसे में मारे गये थे। चारों ओर लाशें सड़ रही थीं। महामारी का ख़तरा था। तब सरकार ने राहत और बचाव के काम में सभी लोगों के लिए मुँह पर रूमाल बाँधकर रखना अनिवार्य कर दिया था। इसी वजह से तब स्वयंसेवकों को भी मुँह पर रूमाल बाँधना पड़ा था। दिलचस्प ये भी है कि ख़ुद नरेन्द्र मोदी भी तब गुजरात में ही थे और एक स्वयंसेवक थे।

Continue Reading

ओपिनियन

बिरसा मुंडा यदि इस समय में होते तो यकीनन उनकी गिनती नक्सलियों में होती

Published

on

Birsa Munda
आज बिरसामुंडा की विरासत का उत्‍तराधिकारी बताकर सत्‍ता का सुख भोग रहे राजनेता सच्‍चाई से बहुत दूर हैं। (फाइल फोटो)

15 नवंबर को भारत, झारखंड स्थापना दिवस के तौर पर मना रहा है, इससे भी ज्‍यादा जरूरी है कि वो झारखंड किन चुनौतियों औऱ किस कीमत पर मिला है एक बार उस इतिहास को भी कुरेदने की जरूरत है।

दिलचस्प बात ये है कि इस इतिहास को आप कहीं न कहीं आज से जुड़ा हुआ महसूस करेंगे। बिरसा मुंडा की लड़ाई तब शुरू हुई थी, जब अंग्रेजी हुकूमत ने आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन पर जबरन कब्जा करने की कोशिश की। 18वीं और 19वीं शताब्दी का यह वो दौर था, जब अंग्रेज भारत में जमींदारी व्यवस्था के प्रसार में जुटे थे, इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि अंग्रेज बड़ी चालाकी से आदिवासियों को विकसित करने के नाम पर उनकी जमीन हथिया रहे थे।

साथ ही यह वो दौर भी था, जब ईसाई मिशनरियों को भारत में अपने धर्म का प्रचार करने की अनुमति भी मिल गई थी। बिरसा मुंडा ने कुछ समय तक मिशनरियों द्वारा स्थापित संस्थानों में शिक्षा भी ग्रहण की लेकिन बाद में अपने जल, जंगल और जमीन की लड़ाई के लिए उसे छोड़ दिया। 1895 के आसपास बिरसा मुंडा ने सूदखोरों, जमींदारों और अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व किया।

आज यदि उसी झारखंड की वर्तमान झारखंड से तुलना की जाए तो काफी कुछ वैसा ही मिलेगा। देश को सबसे ज्यादा खनिज पदार्थ देने वाला झारखंड आज खुद किस स्थिति में है। इसका इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि कुल जनसंख्या के लगभग 40 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं, प्रदेश के 19.6 प्रतिशत पांच साल से कम उम्र के बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। झारखंड का अबुआ दिशुम, अबुआ राज ( अपना देस, अपना राज) का सपना अब बुरे सपने में तब्दील हो चुका है। चूंकि बड़ी कंपनियां खनिज पदार्थों के खनन के लिए जंगलों को खत्म करती जा रही हैं, कंपनियां सरकार द्वारा तय किए गए मापदंडों को ताक पर ऱखकर यहां रहने वाले लोगों के अस्तित्‍व के साथ खिलवाड़ कर रही हैं।

अधिकतर खनिज पदार्थ आदिवासी इलाकों में हैं, जिन्‍हें कंपनियां और सरकारें देश के विकास के नाम पर कुछ ही दाम में उनसे जमीन ले लेती हैं, जिसके बाद इन्हें विस्थापन का दंश झेलना पड़ता है। यूरेनियम के खनन के दौरान होने वाली रेडिएशन से लोगों के स्वास्थ पर बहुत गहरा असर पड़ता है, जिसकी भरपाई न कोई कंपनी करती है और न ही सरकारें।

यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया अपनी 6 खदानों से कई टन यूरेनियम का खनन कर रही है जो जादुगोड़ा की पहाड़ियों के पास स्थित है। अंग्रेजी न्‍यूज वेबसाइट स्क्रोल में विस्तार से इसके खनन से निकलने वाली रेडिएशन के असर को बताया गया है। जादुगोड़ा इलाके में जब पानी के सैंपल की जांच की गई तो पाया कि इसके 70 प्रतिशत सैंपल में मरकरी और लेड जैसे खतरनाक तत्व मौजूद हैं।

आज देश के कई हिस्से नक्सलवाद से प्रभावित हैं, भारत में नक्सलवाद का जन्म उस समय हुआ जब नक्सलबाड़ी में अपना हक लेने के लिए मजदूरों ने चारू मजूमदार और कानू सान्याल के नेतृत्व में हिंसक आंदोलन छेड़ा। आज भारत में नकस्लवाद को आतंकवाद की तरह परिभाषित किया जाता है, भले ही ये आंदोलन लोगों ने अपने अधिकारों के लिए किए थे। इस बात में कोई शक नहीं है कि वो हिंसक आंदोलन गलत था और नक्सलबाड़ी से जुड़े लोगों ने अपनी मांगों के लिए गलत रास्ता चुना था, लेकिन क्या इसे हल करने में सरकारों ने उचित कदम उठाए। आज जो हालत नक्सलवाद से जूझते सबसे बड़े राज्य झारखंड की है, उसे देखकर बिरसा मुंडा खामोश रहते? और यदि वो झारखंड को बचाने के लिए हथियार उठाते तो देश की सरकारें उन्‍हें आज की तरह सम्मानित करती?

WeForNews Bureau

Continue Reading

ओपिनियन

जबतक भारत का अस्तित्‍व रहेगा, तबतक नेहरू जिंदा रहेंगे

Published

on

jawaharlal-nehru
नेहरू ने देश की प्रगति केे लिए कुछ ही मुद्दों को इर्द-गिर्द न घुमाकर एक आधुनिक देश की हर जरूरत पर विचार किया। (फोटो क्रेडिट: मिड-डे डॉट कॉम)

भारत के ऐतिहासिक तथ्यों के साथ छेड़छाड़ कोई नई बात नहीं है, 19वीं शताब्दी में जब खुद को प्रगतिशील कहने वाले यूरोपीय देश उपनिवेशवाद के जरिए दूसरे देशों पर कब्जा करने के लिए जिन वजहों को गिना रहे थे, उनमें एक वजह सभी उपनिवेशों का अपने इतिहास के प्रति अज्ञात होना भी था। हालांकि एक तथ्य ये भी था कि भारत के मामले में ये बात झूठ थी। भारत में जितनी भी सभ्यताएं रहीं, जितने भी साम्राज्य रहे, उन सभी ने अपने अस्तित्व के कई प्रमाण छोड़े। अंग्रेजी हुकूमत ने भारत के इतिहास को कई तरह से तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया, जिससे उन्हें भारत पर अपनी हूकूमत बनाए रखने में खूब सहारा मिला।

यदि गौर किया जाए तो इतिहास के साथ खिलवाड़ आज भी ज्यों का त्यों है, फर्क सिर्फ इतना है कि उस समय ये खिलवाड़ बाहरी हुकूमत कर रही थी औऱ अब सत्ता पाने के लिए खुद देश की राजनैतिक पार्टियां कर रही हैं। तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किए जा रहे इतिहास में सबसे ज्यादा नुकसान इतिहास के उस पल या उस पल से जुड़े व्यक्ति का नहीं होता है, बल्कि आने वाले भविष्य का होता है। देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू इतिहास के उन लोगों में से हैं जिनकी छवि को तरह-तरह से कलंकित किया जा रहा है, यहां इस बात को ध्यान में रखना जरूरी है कि किसी से वैचारिक मतभेद होने से उसकी निंदा करना अलग बात है और किसी के विचारों को गलत तरीके से दूसरों के सामने परोसना अलग।

देश के पहले प्रधानमंत्री होने के नाते उन्होंने देश के लिए वो सब कुछ किया, जिसकी उनसे उम्मीद की गई थी, हालांकि कई मामलों में कई लोगों के साथ उनके मतभेद भी रहे, लेकिन शायद आधुनिक भारत के सपने को साकार करने के लिए दूसरों की बजाए उन्हें अपने फैसले उचित लगे। जो काफी हद तक उचित साबित भी हुए।

नेहरू ने भारत के लिए इतना कुछ किया है कि जब तक भारत का अस्तित्व रहेगा, तब तक नेहरू भी जिंदा रहेंगे। आजादी के बाद पश्चिमी देशों को लगा था कि भारत में कई और देशों की तरह तानाशाही जन्म लेगी लेकिन इसके विपरीत नेहरू के नेतृत्व में भारत ने लोकतंत्र का रास्ता चुना। लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता देश के लिए दो ऐसे वरदान हैं, जिनका नेहरू के बिना अस्तित्व शायद ही मुमकिन हो पाता।

आजादी के बाद लगभग 37 करोड़ की आबादी का जिम्मा, देश को प्रगति की राह पर ले जाना, रोजगार उत्पन्न करना, खाद्य आपूर्ति के सामान का उत्पादन और एक व्यवस्थित सेना के साथ-साथ उत्पादन करने के लिए मशीनों की जरूरत को पूरा करना, ये सब नेहरू और उनके मंत्री मंडल के सामने एक बड़ी चुनौती थी। नेहरू जिनके समाजवाद की ओर झुकाव का अंदाजा सभी को था उन्होंने देश के लिए पूंजीवाद औऱ समाजवाद के बीच का रास्ता अपनाया जो आज भी देश में बढ़ती आर्थिक असमानता में कारगर साबित हो सकता है। वहीं नेहरू में वो सब खूबियां थी जो भारत के पहले प्रधानमंत्री मे होनी चाहिए थी। कि उन्होंने देश की प्रगति केे लिए कुछ ही मुद्दों के इर्द-गिर्द न घुमाकर एक आधुनिक देश की हर जरूरत पर विचार किया। देश में वैज्ञानिक मनोवृत्तति को  बढ़ावा देने के लिए स्पेस रिसर्च प्रोग्राम, बाकी वैज्ञानिक खोजों के लिए Council for Science and Industrial Research (CSIR)  कई ऐसे क्षेत्र थे, जिनकी स्थापना में नेहरू ने बड़ी भूमिका निभाई।

परमाणु संबंधी रिसर्च में खुद पंडित नेहरू ने भौतिक वैज्ञानिक होमी भाभा से मिलकर कमिटी का गठन किया, हालांकि नेहरू परमाणु हथियारों के इस्तेमाल और उत्पादन को विश्व शांति के लिए खतरा मानते थे लेकिन भारत के परमाणु परिक्षण के जरिए उन्होंने इसके शांतिपूर्वक प्रयास पर बल दिया। देश में स्वदेशी को बढ़ावा देने के लिए पंडित नेहरू ने राउरकेला, दुर्गापुर और भिलाई स्टील प्लांट की नींव रखी। कई राजनैतिक पार्टियां उन पर सत्ता के लालच का आरोप लगाती हैं लेकिन ये आरोप तब धूमिल हो जाते हैं, जब आप उस समय के लोगों में नेहरू के प्रति दिवानगी को देखते हैं।

तीन मूर्ति में बने संग्रहालय में एक दस्तावेज बताता है कि चुनाव के दौरान दो अंधे लोगों ने ये मांग की थी की यदि बैलेट पेपर पर नेहरू का ही नाम लिखा होगा तो ही वो मतदान करेंगे।

वहीं जाने माने शायर साहिर लुधियानवी ने भी नेहरू की भारत पर छाप को लेकर कविता लिखी जो कुछ इस तरह है।

जिस्म की मौत, कोई मौत नहीं होती,
जिस्म मिट जाने से इंसान नहीं मिट जाते ।
धड़कने-रूकने से अरमान नहीं मर जाते ,
सांस थम जाने से ऐलान नहीं मर जाते ।
होंठ जम जाने से फरमान नहीं मर जाते,
जिस्म की मौत कोई मौत नहीं होती।

WeForNews Bureau

Continue Reading
Advertisement
Election Himachal
चुनाव41 mins ago

हिमाचल चुनाव : कई सीटों पर कांटे की टक्कर के बाद जीते नेता

satti dhumal
चुनाव1 hour ago

हिमाचल चुनाव : भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष व मुख्यमंत्री उम्मीदवार हारे

Himachal Pradesh Assembly Election
चुनाव2 hours ago

हिमाचल चुनाव : 2 निर्दलियों ने भाजपा उम्मीदवारों को हराया

Mamata Banerjee
राजनीति2 hours ago

गुजरात की जीत भाजपा की ‘नैतिक हार’ : ममता

Banarasi saree
व्यापार2 hours ago

बनारसी साड़ी व कालीन उद्योग पर जीएसटी का कहर

PM Modi
राजनीति2 hours ago

गुजरात चुनाव में जीत के बाद मोदी ने दिया नारा, ‘जीतेगा भाई जीतेगा विकास ही जीतेगा’

arun-yadav
चुनाव3 hours ago

जनादेश स्वीकार्य, मगर मोदी का तिलिस्म टूटा : कांग्रेस

gujrat election
राजनीति3 hours ago

मोदी के गृहनगर में बीजेपी को मिली हार

sanjay raut
राजनीति3 hours ago

गुजरात चुनाव में बीजेपी की जीत पर शिवसेना ने कसा तंज, कहा पार्टी की अपेक्षा के मुकाबले जीत नहीं

rahul-gandhi
राजनीति4 hours ago

कांग्रेस की सबसे बड़ी ताकत उसकी शालीनता और साहस है: राहुल गांधी

श्रीनगर
अंतरराष्ट्रीय2 weeks ago

श्रीनगर में अमेरिका के विरोध में प्रदर्शनों के मद्देनजर आंशिक प्रतिबंध

redlipstick
लाइफस्टाइल3 days ago

चाहिए स्‍मार्ट लुक तो ट्राई करें ये लिपशेड…

pr
लाइफस्टाइल3 days ago

इस अंडरग्राउंड शहर में उठाएं जिंदगी का लुत्फ

makeup
लाइफस्टाइल4 weeks ago

सर्दियों में यूं करें मेकअप

लाइफस्टाइल4 weeks ago

पुरानी साड़ी का ऐसे करें दोबारा इस्तेमाल

Kapil Sibal
ओपिनियन3 weeks ago

दमनकारी विचारधारा के ज़रिये आस्था के नाम पर भय फैलाना बेहद ख़तरनाक है

modi-narendra-gujarat
ब्लॉग3 weeks ago

गुजरात में दिख रहे संघियों के दोमुँही बातों का इतिहास भी बेहद शर्मनाक रहा है!

Narendra Modi
ब्लॉग2 weeks ago

ज़िम्मेदारी लेने के नाम पर भी देश को बेवकूफ़ ही बना रहे हैं नरेन्द्र मोदी…!

india vs srilanka1
खेल2 weeks ago

दिल्‍ली टेस्‍ट ड्रा, भारत ने जीती 1-0 से सीरीज

Narendra Modi
ओपिनियन2 weeks ago

साफ़ दिख रहा है कि गुजरात की बयार देख बदहवास हो गये हैं मोदी…!

मनोरंजन3 days ago

अक्षय की फिल्म पैडमैन का ट्रेलर रिलीज

jammu and kashmir snowfall
राष्ट्रीय6 days ago

बारिश और बर्फबारी के बाद जम्मू-श्रीनगर राजमार्ग बंद

saif-ali-khan
मनोरंजन2 weeks ago

सैफ की फिल्म ‘कालाकांडी’ का ट्रेलर रिलीज

bharuch rally
चुनाव2 weeks ago

पीएम की रैली में खाली पड़ी रहीं कुर्सियां!

kirron kher
शहर3 weeks ago

चंडीगढ़ रेप केस पर सांसद किरण खेर का बेतुका बयान, देखें वीडियो

sibal3
राजनीति3 weeks ago

असली हिन्‍दू नहीं हैं पीएम मोदी, उन्‍होंने सिर्फ हिन्‍दुत्‍व को अपनाया: कपिल सिब्‍बल

West Bengal
शहर3 weeks ago

कोलकाता के कारखाने में आग, कोई हताहत नहीं

NASA Super sonic parachute
टेक4 weeks ago

देखें मंगल 2020 मिशन के लिए नासा का पहला सफल पैराशूट परीक्षण

fukry
मनोरंजन4 weeks ago

‘फुकरे रिटर्न्स’ का दूसरा गाना रिलीज

Jammu Kashmir
शहर1 month ago

जम्मू कश्मीर: पीर पंजाल में भारी बर्फबारी, कई रास्ते बाधित

Most Popular