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स्वास्थ्य

नींद में बड़बड़ाने की आदत है तो करें ये उपाय…

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कुछ लोग नींद में बड़बड़ाने लगते हैं जिससे ना सिर्फ उनकी नींद टूटती है बल्कि कमरे में सो रहे बाकी लोग भी बड़बड़ाने की इस आदत से परेशान हो जाते हैं।

लेकिन नींद में बड़बड़ाना कोई बीमारी नही है, इससे ये पता चलता है कि आपकी सेहत कुछ ठीक नहीं है। नींद में बोलने को बड़बड़ाना कहते हैं क्योंकि जब आप बड़बड़ाते हैं, आधी-अधूरी बातें करने लगते हैं। ये एक प्रकार का पैरासोमनिया है जिसका मतलब होता है सोते समय अननेचुरल बिहेव करना।

लेकिन इसे बीमारी नहीं माना जाता। रात में बड़बड़ाते हुए आप कभी-कभी ख़ुद से ही बात करने लगते हैं जो जाहिर है सुनने वाले को अजीब या थोड़ा बुरा लग सकता है।

आइए हम आपको बताते हैं, नींद में बड़बड़ाने से छुटकारा पाने का इलाज। नींद में बड़बड़ाने की इस आदत से निपटने का वैसे तो कोई खास इलाज नहीं होता है लेकिन तनाव की कमी और योग करके आप अपना मन शांत कर सकते है। इससे आपको नींद में बोलने की प्रॉब्लम कम हो जाएगी।

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इसके अलावा आप स्लीप डायरी बनाए। आप दो हफ्ते का पूरा डिटेल उसमें लिखें, जैसे कितने बजे आप सोने गए, कब सोए, कब उठे, कब बड़बड़ाए, आप कौन सी दवा खा रहे हैं, ये सब चीजें नोट करें।

इससे आपको डॉक्टर को समझाने में भी हेल्प मिलेगी। इसमें आप अपने फ्रेंड या फैमिली की भी हेल्प लें सकते है। खासतौर साथ सोने जाते समय चाय, कॉफी आदि चीजों का सेवन करने से बचें।

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राष्ट्रीय

15 अगस्त को भारत में लॉन्च हो सकती है कोरोना की वैक्सीन

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नई दिल्ली, कोरोना के बढ़ते कहर के बीच एक अच्छी खबर आ रही है।15 अगस्त को कोरोना की वैक्सीन कोवैक्सीन (COVAXIN) लॉन्च हो सकती है। इस वैक्सीन को फार्मास्यूटिकल कंपनी भारत बायोटेक ने तैयार किया है। भारत बायोटेक और आईसीएमआर की तरफ से वैक्सीन लॉन्चिंग संभव है।

हाल ही में कोवैक्सीन को ह्यूमन ट्रायल की इजाजत मिली है। आईसीएमआर की ओर से जारी लेटर के मुताबिक, 7 जुलाई से ह्यूमन ट्रायल के लिए इनरोलमेंट शुरू हो जाएगा। इसके बाद अगर सभी ट्रायल सही हुए थे तो आशा है कि 15 अगस्त तक कोवैक्सीन को लॉन्च किया जा सकता है। सबसे पहले भारत बायोटेक की वैक्सीन मार्केट में आ सकती है।

इस लेटर को आईसीएमआर और सभी स्टेकहोल्डर (जिसमें एम्स के डॉक्टर भी शामिल हैं) ने जारी किया है। उनका कहना है कि अगर ट्रायल हर चरण में सफल हुआ तो 15 अगस्त तक कोरोना की वैक्सीन कोवैक्सीन मार्केट में आ सकती है। आईसीएमआर की ओर से फिलहाल यह अनुमान लगाया गया है।


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लाइफस्टाइल

कंप्यूटर, रसायन, फार्मेसी, बायोटेक्नोलॉजी के छात्र ढूढ़ेंगे कोरोना की दवा

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नई दिल्ली। देश में तेजी से फैल रहे कोरोना वायरस की दवा तैयार करने में अब कंप्यूटर विज्ञान, रसायन विज्ञान, फार्मेसी, चिकित्सा और जैव प्रौद्योगिकी (बायोटेक्नोलॉजी) जैसे विभिन्न क्षेत्रों के पेशेवर, शिक्षक, शोधकर्ता और छात्र भी हिस्सा लेंगे।

किसी दवा की खोज में हो रहे प्रयासों को संबल देने के लिए यह अपने आप में एक अनोखी राष्ट्रीय पहल है। इस विषय पर केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने कहा, किसी दवा की खोज करना एक बेहद जटिल और महंगी प्रक्रिया है।

इस प्रक्रिया को कम समय में और कम लागत में पूरा करने के लिए कम्प्यूटेशनल ड्रग डिजाइन प्रक्रिया का उपयोग किया जा रहा है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय मंत्री ने कहा, इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह पहल दुनिया भर के शोधकर्ताओं के लिए है क्योंकि हम अपने प्रयासों में अंतरराष्ट्रीय प्रतिभाओं को शामिल करने के लिए भी इच्छुक हैं।

इस कार्य योजना के लिए गुरुवार को केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक और केन्द्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने संयुक्त रूप से ड्रग डिस्कवरी हैकाथॉन लांच किया।

इसमें अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) और वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) भी शामिल हैं। इस हैकाथॉन को तीन ट्रैक्स में पूरा किया जायेगा। पहले ट्रैक में ड्रग डिजाइन के लिए कम्प्यूटेशनल मॉडल का इस्तेमाल किया जायेगा या मौजूदा डाटाबेस से ऐसे कंपाउंड की पहचान की जाएगी जिसमें कि सार्स-कोव-2 को रोकने की क्षमता हो।

दूसरे ट्रैक में प्रतिभागियों को डाटा एनालिटिक्स और आर्टिफिशल इंटेलिजेंस एवं मशीन लनिर्ंग का उपयोग करके नए उपकरण और एल्गोरिदम विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया जायेगा ताकि न्यूनतम विषाक्तता और अधिकतम विशिष्टता के साथ दवा जैसे कंपाउंड को ढूंढा जा सके। तीसरे ट्रैक में मून-शॉट दृष्टिकोण के द्वारा केवल नए और अनूठे विचारों को देखा व समझा जायेगा। यह हैकाथॉन सीडैक (सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग), मायगाव, श्रोडिंगर और केमाक्सोन द्वारा समर्थित है।

आईएएनएस

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स्वास्थ्य

कोरोना का टीका विकसित करने की दिशा में फिजर और बायोएनटेक कंपनी

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नई दिल्ली, अमेरिकी फार्मा कंपनी फाइजर और यूरोपीय जैव प्रौद्योगिकी कंपनी बायोएनटेक एसई ने कोविड-19 के एक टीके का प्रायोगिक परीक्षण किया है। जिसके नतीजे में टीके को सुरक्षित और मरीजों में एंटीबॉडी बनाने में सक्षम पाया गया। विशेषज्ञों द्वारा अध्ययन की समीक्षा किया जाना अभी बाकी है।

अध्ययन के अनुसार मरीजों को टीके की दो खुराक दिए जाने के बाद उनके भीतर बनने वाले एंटीबॉडी की संख्या उन मरीजों में पैदा हुए एंटीबाडी से अधिक पाई गई जिन्हें कोविड-19 से ठीक हो चुके लोगों का प्लाज्मा दिया गया था। अध्ययन में शामिल अमेरिका के न्यूयार्क विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ताओं ने कहा कि वे चार प्रायोगिक टीके का परीक्षण कर रहे हैं।

फिजर की ओर से जारी एक वक्तव्य के अनुसार अध्ययन के शुरुआती हिस्से में 18 से 55 वर्ष की आयु के 45 स्वस्थ पुरुषों ने भाग लिया। अध्ययन में मरीजों पर टीके के कोई गंभीर दुष्प्रभाव नहीं देखा गया। वक्तव्य के अनुसार दोनों कंपनियां टीके की खुराक तय करेंगी और बड़े स्तर पर परीक्षण करने की अनुमति मिलने के बाद तीस हजार लोगों पर टीके का अध्ययन किया जा सकता है।

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