केरल की ब्राह्मण महिला गोपाल‍िका अंतरजन्‍म ने 27 साल तक पढ़ाई अरबी ज़बान | WeForNewsHindi | Latest, News Update, -Top Story
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केरल की ब्राह्मण महिला गोपाल‍िका अंतरजन्‍म ने 27 साल तक पढ़ाई अरबी ज़बान

BHU में अपने ही छात्रों का विरोध झेल रहे प्रोफेसर फिरोज खान एक तरह से अंडरग्राउंड हो गए। वह हैरान हैं कि पूरी उम्र उन्‍होंने संस्‍कृत पढ़ी तो क‍िसी ने मुसलमान होने का अहसास नहीं दिलाया, जब पढ़ाने जा रहे हैं तो मुसलमान बता कर उनका व‍िरोध हो रहा है।

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बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में फिरोज खान को संस्‍कृत का असिस्टेंट प्रोफेसर बनाए जाने को लेकर बड़े पैमाने पर विरोध हो रहा है। कारण उनका मुसलमान होना है। कभी केरल में एक ब्राह्मण महिला गोपालिका अंतरजन्‍म ने 27 साल तक अरबी पढ़ाई। उनका भी विरोध हुआ, पर वह डरी नहीं बल्कि लड़ते हुए अरबी ज़बान पढ़ाती रहीं।

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में करीब 15 दिन से अपने ही छात्रों का विरोध झेल रहे प्रोफेसर फिरोज खान एक तरह से अंडरग्राउंड हो गए। वह हैरान हैं कि पूरी उम्र उन्‍होंने संस्‍कृत पढ़ी तो क‍िसी ने मुसलमान होने का अहसास नहीं दिलाया, जब पढ़ाने जा रहे हैं तो मुसलमान बता कर उनका व‍िरोध हो रहा है। व‍िरोध करने वाले छात्रों का कहना है क‍ि एक मुसलमान हमारी संस्‍कृत‍ि कैसे समझ सकता है और जब वह हमारी संस्‍कृत‍ि नहीं समझेगा तो हमें पढ़ाएगा कैसे?

बॉलीवुड एक्‍टर व पूूर्व बीजेपी सांसद परेश रावल ने इस व‍िरोध को गलत बताते हुए कहा क‍ि ऐसी दलील के आधार पर तो हिंदुस्तान के महान गायक मोहम्मद रफी साहब को भजन नहीं गाने चाहिए औऱ नौशाद साहब को इन्हें कंपोज भी नहीं करना चाहिए था। उनके इस ट्वीट पर काफी लोगों ने पूछा- क्‍या मक्‍का में कोई ह‍िंदू अरबी पढ़ा सकता है? लेक‍िन, यह सवाल करने वालों को यह नहीं पता क‍ि मक्‍का क्‍या, केरल में ही एक ब्राह्मण महि‍ला ने 27 साल तक अरबी पढ़ाई। वह संभवत: अरबी पढ़ाने वाली पहली ब्राह्मण समाज से आती हैं।

गोपाल‍िका अंतरजन्‍म ने 1987 से अरबी पढ़ाना शुरू क‍िया था। 2016 में वह 29 साल की सेवा के बाद र‍िटायर हुई थीं। उनका मानना है क‍ि अरबी बेहद खूबसूरत भाषा है। गोपाल‍िका के पर‍िवार के वंशज कोट्ट‍ियूर मंद‍िर के पारंपर‍िक पुजारी रहे हैं। खुद गोपाल‍िका ने भी शुरू में संस्‍कृत की ही पढ़ाई की थी। लेक‍िन, 17 साल की उम्र में वह अरबी सीखने चली गईं।

ज‍िस इंस्‍टीट्यूट में वह गईं, वहां कुछ और भी ब्राह्मण व‍िद्यार्थी थे। जब उनकी शादी हुई तो वह मल्‍लापुरम ज‍िले में रहने के ल‍िए चली गईं। वहां जब उन्‍होंने अरबी पढ़ाना शुरू क‍िया तो उनकी न‍ियुक्‍त‍ि का व‍िरोध हुआ था। व‍िरोध के बाद उन्‍हें नौकरी से न‍िकाल द‍िया गया। गोपाल‍िका ने इसके ख‍िलाफ लड़ाई लड़ी। केरल हाईकोर्ट तक गईं। 1989 में कोर्ट ने उनके हक में फैसला सुनाया।

कोर्ट का फैसला आने के बाद गोपाल‍िका ने केरल लोक सेवा आयोग के जर‍िए परीक्षा पास कर मल्‍लापुरम के एक अन्‍य स्‍कूल में अरबी श‍िक्षक की नौकरी शुरू की। तब इस पूरे घटनाक्रम पर केरल में खूब चर्चा हुई । लेक‍िन, गोपाल‍िका के खुद के जुनून और पत‍ि सह‍ित पूरे पर‍िवार के साथ के चलते उनका हौसला कभी कम नहीं हुआ। 2015 में उनके काम का सम्‍मान करते हुए व‍िश्‍व अरबी द‍िवस पर एक मुस्‍ल‍िम संगठन ने उन्‍हें सम्‍मान‍ित क‍िया था।

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के संस्‍कृत व‍िद्या धर्म व‍िज्ञान (SVDV) में अस‍िस्‍टेंट प्रोफेसर बहाल हुए फ‍िरोज खान ने अंग्रेजी अख़बार इंड‍ियन एक्‍सप्रेस से कहा है क‍ि मैंने ताउम्र संस्‍कृत की पढाई की, पढाई के दौरान कभी मुझे मुसलमान होने का अहसास नहीं कराया गया, लेक‍िन अब जब मैं पढ़ाने जा रहा हूं तो मेरा मुस्‍ल‍िम होना ही एक मुद्दा बन गया है।

खान दूसरी जमात से ही संस्‍कृत पढ़ रहे हैं। सबसे बरी बात यह है कि उनके प‍िता भी भजन गाते हैं और संस्‍कृत के ज्ञाता हैं। लेक‍िन, BHU में व‍िरोध का नेृतत्‍व करने वाले SVDV के शोध छात्र कृष्‍णा कुमार का कहना है क‍ि अगर कोई व्‍यक्‍त‍ि हमारी भावानाओं और संस्‍कृत‍ि से जुड़ा नहीं होगा तो वह हमें और हमारे धर्म को समझ नहीं पाएगा।

फ‍िरोज ने 7 नवंबर को ही BHU जॉयन क‍िया है। तब से SVDV में कोई कक्षा नहीं लगी है। व‍िरोध करने वालेे छात्रों का कहना है क‍ि उनका व‍िरोध क‍िसी राजनीत‍िक संगठन से प्रेर‍ित नहीं है। लेक‍िन, यह एक सच्‍चाई है क‍ि कृष्‍णा और उनके तीन साथ‍ियों का संबंध आरएसएस और ABVP (भाजपा से संबद्ध छात्रों का संगठन) से रहा है। ऐसे में व‍िरोध का अंजाम क्‍या होगा और फ‍िरोज खान इसका सामना क‍िस तरह करेंगे, अभी इस बारे में कुछ कहना बहुत मुश्किल है।

ओपिनियन

गाय, गधा, ग़ालिब और दिलीप घोष की मज़ेदार जुगलबन्दी

दिलीप घोष ने बीते नवम्बर में रहस्योद्घाटन किया था कि ‘भारतीय नस्ल की गायों में एक खासियत होती है। इनके दूध में सोना मिला होता है और इसी वजह से उनके दूध का रंग सुनहरा होता है। उनके एक नाड़ी होती है जो सूर्य की रोशनी की मदद से सोने का उत्पादन करने में सहायक होती है। इसलिए हमें देसी गायें पालनी चाहिए।

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बात बहुत मज़ेदार है। मज़ेदार बातें करने में बीजेपी के नेताओं का कोई सानी नहीं। फिर यदि बात गाय की हो तो बीजेपी के नेता किसी भी सीमा तक चले जाते हैं। अब ज़रा पश्चिम बंगाल का मुख्यमंत्री बनने के लिए आतुर बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष के एक और मज़ेदार तथा ताज़ा बयान पर ग़ौर करें कि ‘…गधे कभी भी गाय की अहमियत नहीं समझेंगे। …हमें स्वस्थ रहने के लिए गोमूत्र पीना चाहिए। जो शराब पीते हैं वो कैसे एक गाय की अहमियत को समझेंगे।’ संघियों ने गोमूत्र की अवैज्ञानिक महिमा का बातें तो पहले भी ख़ूब की हैं, लेकिन दिलीप घोष ने अब ‘गधे’ को गाय से जोड़कर गज़ब कर दिया है।

इन्हीं दिलीप घोष ने बीते नवम्बर में रहस्योद्घाटन किया था कि ‘भारतीय नस्ल की गायों में एक खासियत होती है। इनके दूध में गोल्ड मिला होता है और इसी वजह से उनके दूध का रंग सुनहरा होता है। उनके एक नाड़ी होती है, जो सूर्य की रोशनी की मदद से सोने का उत्पादन करने में सहायक होती है। इसलिए हमें ऐसी देसी गायें पालनी चाहिए। अगर हम देसी गाय का दूध पिएंगे तो स्वस्थ रहेंगे और बीमारियों से भी बचाव होगा।’

घोष बाबू के ऐसे बयान सहसा राजस्थान हाईकोर्ट के जज महेश शर्मा की उस बयान की याद ताज़ा कर देते हैं कि ‘मोर ज़िन्दगी भर ब्रह्मचारी रहता है। उसके आँसू चुगकर मोरनी गर्भवती होती है। इसीलिए मोर को राष्ट्रीय पक्षी बनाया गया। मोर पंख को भगवान कृष्ण ने इसलिए सिर में लगाया क्योंकि वह ब्रह्मचारी है। साधु-सन्त भी इसीलिए मोर पंख का इस्तेमाल करते हैं। मन्दिरों में भी इसीलिए मोर पंख लगाया जाता है। ठीक इसी तरह गाय के अन्दर भी इतने गुण हैं कि उसे राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाना चाहिए।’

दिलीप घोष और जस्टिस महेश शर्मा की तरह ही त्रिपुरा के मुख्यमंत्री विप्लव देव भी अपने विचित्र बयानों को लेकर ही पहचाने गये, भले ही इससे उनका ख़ूब उपहास हुआ हो। मैकेनिकल इंज़ीनियर की डिग्रीधारी विप्लव देव बता चुके हैं कि ‘महाभारत के दौरान संजय ने हस्तिनापुर में बैठकर धृतराष्ट्र को बताया था कि कुरुक्षेत्र के मैदान में युद्ध में क्या हो रहा है। संजय इतनी दूर रहकर आँख से कैसे देख सकते हैं। सो, इसका मतलब है कि उस समय भी तकनीक, इंटरनेट और सैटेलाइट था।’

इसी तरह, विप्लव देव ने रहस्योद्घाटन किया था कि ‘’जब बतख पानी में तैरते हैं, तो जलाशय में ऑक्सीजन का स्तर अपने आप बढ़ जाता है। इससे ऑक्सीजन रिसाइकिल होता है। पानी में रहने वाली मछलियों को ज़्यादा ऑक्सीजन मिलता है। इस तरह मछलियाँ तेज़ी से बढ़ती हैं और ऑर्गनिक तरीके से मत्स्यपालन को बढ़ावा मिलता है।’ उनके सामाजिक ज्ञान की झलक भी कई बयानों से मिली। जैसे, ‘युवा नौकरी पाने के पीछे नहीं भागें बल्कि पान की दुकान खोंले और गाय पालें।’ या फिर ‘मॉब लिंचिग की वारदातों के पीछे अन्तरराष्ट्रीय षड्यंत्र है।’ या, ‘डायना हेडन इंडियन ब्यूटी नहीं हैं। डायना हेडन की जीत फ़िक्स थी। क्योंकि डायना हेडन भारतीय महिलाओं की सुन्दरता की नुमाइन्दगी नहीं करतीं।’ और ये भी कि ‘मैकेनिकल इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि वाले लोगों को सिविल सेवाओं का चयन नहीं करना चाहिए।’

यदि आप ऐसे सिरफिरे बयानों को लेकर अपना सिर धुनना चाहते हैं तो धुनते रहें, लेकिन बीजेपी के बड़े-बड़े नेताओं को ऐसे ही सियायी बयानों को फ़ायदा मिलता रहा है। याद है न कि 2014 में 35 रुपये लीटर पेट्रोल बेचने का सपना बेचकर बीजेपी ने मनमोहन सरकार का तख़्ता पटल दिया था। यही हाल ‘काला धन’ और ‘अच्छे दिन’ का भी रहा। इसी तरह 50 दिन में नोटबन्दी के कष्टों से उबारने की बात की गयी थी, तो 18 दिन चले महाभारत के युद्ध का वास्ता देकर 21 दिन में कोरोना के सफ़ाया का सब्ज़बाग़ भी दिखाया गया था।

इसी तरह, जब ‘विकास’ लापता हो गया तो ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ से उसे ढूँढ़ निकालने को कहा गया। इसी तर्ज़ पर कहा गया कि “पूर्वी लद्दाख में न तो कोई हमारी सीमा में घुस आया है, न ही कोई घुसा हुआ है और ना ही हमारी कोई पोस्ट किसी दूसरे के कब्ज़े में है।” उधर, रक्षामंत्री भी लद्दाख जाकर भाषण दे आये कि ‘भारत ने कभी किसी देश की एक इंच ज़मीन भी नहीं हथियाई।’ अब किससे पूछें कि गोवा और पांडिचेरी से पुर्तगालियों और फ्रांसीसियों की विदाई की ख़ातिर हो सैनिक कार्रवाई हुई थी, क्या उससे क्या भारत का क्षेत्रफल नहीं बढ़ा था?

ऐसे ही एक से बढ़कर एक मज़ेदार बयानों को देखकर कभी-कभार तो शक़ होता है कि क्या जनता ने ऐसे ही मज़ेदार बयान सुनने के लिए बीजेपी को सत्ता दी है? बहरहाल, दिलीप घोष की मज़ेदार बातों को सुनकर ये कौतूहल क्या लाज़िमी नहीं है कि यदि गाय के दूध में सोना होता है तो दुनिया भर में सोने की खदानों से इसके अयस्क (Ore) का खनन क्यों होता है? क्यों दुनिया भर में धरती को खोदकर इसे क्षत-विक्षत किया जाता है? भारत में भी बीजेपी शासित कर्नाटक के कोलार ज़िले में सोने की खदानें हैं। इन्हें अब तक बन्द क्यों नहीं किया गया? देसी गाय के दूध में यदि सोना है तो सोने का आयात और तस्करी क्यों होती है? गायों को सड़कों पर घूम-घूमकर कूड़ा-कचरा और पॉलीथीन क्यों खाना पड़ता है? गाय को माता बताकर उसे पूजने वालों, गऊदान रूपी सनातनी कर्मकांड का महिमामंडन करने वालों के सत्ता-काल में भी गौवंश के प्रति ऐसा सतत अनर्थ आख़िर क़ायम कैसे है?

ये कैसी विचित्र बात है कि जो शराब पीते हैं वो गाय की अहमियत को नहीं समझ सकते? मुझे कूड़ा-कचरा खाने वाली गायों के मूत्र के सेवन से सख़्त आपत्ति और परहेज़ है। लेकिन मेरी आपत्ति से उन्हें क्या? बाबू मोशाय के जीवन का तो बस एक ही लक्ष्य है कि बंगाल के हिन्दुओं में धार्मिक अन्धविश्वास और भ्रान्तियों को फैलाकर ममता दीदी को सत्ता से बाहर करना और यदि मोदी-शाह की कृपा हो जाए तो सूबे का अगला मुख्यमंत्री बनना। बाक़ी मेरे जैसों को तो उन्होंने अस्वस्थ का सर्टिफ़िकेट भी इसलिए दे दिया है क्योंकि मैं गोमूत्र नहीं पीता। अब यदि उनके बयान से किसी की मानहानि हुई है तो हुआ करे, उनकी बला से। वो तो हर क़ानून और संविधान से ऊपर हैं।

रही बात गधे की विशेषता बताने की तो इसे लेकर मुझे मिर्ज़ा असदउल्ला बेग़ ख़ान उर्फ़ ग़ालिब के चर्चित किस्सों की याद अनायस ही आ गयी। हुआ यूँ कि ग़ालिब को आम बहुत पसन्द थे। इतने कि उन्हें आम के आगे गन्ने की मिठास भी कमतर लगती थी। उन्होंने एक दोस्त से कहा था कि ‘मुझसे पूछो तुम्हें ख़बर क्या है, आम के आगे नेशकर क्या है’। नेशकर यानी गन्ना। आम के प्रति ग़ालिब की चाहत को देखते हुए ही गर्मी के मौसम में उनके दोस्त उन्हें तरह-तरह के आमों की टोकरियाँ भिजवाया करते थे। लेकिन ग़ालिब के एक अज़ीज़ दोस्त हकीम रज़ी उद्दीन ख़ान को आम बिल्कुल पसन्द नहीं थे।

एक दफ़ा ग़ालिब और हकीम रज़ी उद्दीन अपने घर के बरामदे में बैठे थे। आम को लेकर दोनों एक-दूसरे की पसन्द-नापसन्द से बख़ूबी वाक़िफ़ थे। इसके बावजूद, उनकी गुफ़्तगूँ के दौरान, जैसे ही घर के सामने से एक गधा-गाड़ी गुज़री तो इसके गधे ने रास्ते में पड़े आम के छिलके को सूँघा और अपना मुँह हटाकर चलता बना। ये देख हकीम साहब ने अचानक विषयान्तर करते हुए चुहल की कि ‘आप भले ही आम के दीवाने हैं लेकिन देखिए कि एक गधा भी आम नहीं खाता!’ इस पर हाज़िर-जबाब ग़ालिब ने कहा कि ‘जी हाँ, इसमें कोई शक़ नहीं कि गधे आम नहीं खाते!’

अब मैं जनाब दिलीप घोष से कैसे पूछूँ कि भले ही मैं गोमूत्र नहीं पीता कि लेकिन मुझे भी ग़ालिब की तरह आम बहुत पसन्द हैं, लिहाज़ा, मुझे ‘गधा’ माना जाएगा या नहीं? मज़ेदार बात ये भी है कि गोबरपट्टी में गधे को महज एक पशु के नाम की तरह ही नहीं बल्कि मूर्खता की एक उपमा के रूप में भी पेश किया जाता है। अब मैं घोष बाबू को मूर्ख कहकर उनकी हेठी करने की हिमाक़त तो करने से रहा कि अनर्थ से हमेशा डरना चाहिए। बहरहाल, जब ग़ालिब और आम की बात हुई है तो ग़ालिब के आम-प्रेम से जुड़े एक और मशहूर किस्से का ज़िक्र भी लाज़िमी है।

हुआ यूँ कि एक बार ग़ालिब और बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र अपने कुछ साथियों के साथ दिल्ली के लाल क़िला यानी क़िला-ए-मुबारक़ के बाग़-ए-हयात बख़्श में टहल रहे थे। इस बाग़ में कई किस्म के आम के पेड़ थे। लेकिन इसके आम सिर्फ़ बादशाह, शहज़ादों और हरम की औरतों के लिए होते थे। बाग़ के टहल-क़दमी के दौरान ग़ालिब हरेक पेड़ पर झूल रहे आमों को बड़े ध्यान से देख रहे थे। ये देख बादशाह ने उनसे पूछ लिया कि ‘अमां, आप हर आम को इतने ध्यान से क्यों देख रहे हैं?’

जबाब में ग़ालिब ने बेहद संजीदगी से कहा कि ‘मेरे मालिक और मेरे रहनुमा, एक बार किसी शायर ने कहा था कि हर आम पर, उसके खाने वाले का नाम लिखा होता है। मैं अपने दादा, अब्बा और अपना नाम तलाश रहा हूँ।’ बादशाह, ये सुनकर मुस्कुराये। फिर ग़ालिब की हाज़िर जबाबी की दाद देते हुए उन्होंने पुराने दस्तूर को तोड़कर शाम तक मिर्ज़ा के घर बाग़ के आमों की टोकरी भिजवा दी।

आख़िर में, फिर से रुख़ करते हैं दिलीप घोष के गाय-ज्ञान की ओर। ताकि इनका अहम गाय-सिद्धान्त एक जगह मिल सके। गाय तो लेकर दिलीप घोष के दो अन्य बयान भी कोई कम दिलचस्प या हास्यास्पद नहीं है। पहला बयान है कि ‘विदेश से जिन नस्लों की गायें हम लाते हैं, वे गाय नहीं हैं। वे एक तरह के जानवर हैं। ये विदेशी नस्लें गायों की तरह आवाज़ नहीं निकालती हैं। वे हमारी गोमाता नहीं बल्कि हमारी आँटी हैं। अगर हम ऐसी आँटियों की पूजा करेंगे तो देश के लिए अच्छा नहीं होगा।’ और दूसरा बयान है कि ‘कुछ बुद्धिजीवी सड़कों पर गोमाँस खाते हैं, मैं उनसे कहता हूं कि वे कुत्ते का माँस भी खाएँ, जिससे उनका स्वास्थ्य ठीक रहेगा। उन्हें जिस भी जानवर का माँस खाना हो खाएँ लेकिन सड़कों पर क्यों, अपने घर पर खाएँ?’

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‘ग़रीब कल्याण रोज़गार’ के तमाशे के पीछे अभी तो बस बिहार चुनाव ही है

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गरीब-कल्याण-रोजगार-योजना

मेरा 30 साल का सारा पत्रकारीय अनुभव और कौशल ये पता नहीं लगा पाया कि बिहार और बंगाल की चुनावी बेला को ध्यान में रखकर घोषित हुआ केन्द्र सरकार का चमत्कारी ‘ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान’ वास्तव में ज़मीन पर कब से और कितना चमत्कार दिखा पाएगा? कोरोना की मार खाकर बदहवासी के साथ अपने गाँवों को लौटे कितने स्किल्ड (हुनरमन्द) प्रवासी मज़दूरों को, कितने दिनों का, कितनी आमदनी वाला और कैसा रोज़गार देकर उनका उद्धार करके उन्हें और उनके गाँवों को ख़ुशहाल बना पाएगा?

कृपया मेरी इस वेदना पर यक़ीन करें कि 30 साल के अपने पत्रकारीय जीवन में मैंने कभी किसी एक ख़बर का ब्यौरा जानने के लिए इतनी मगज़मारी या इतनी मेहनत नहीं की, जितना बीते चार दिनों में की। जब से वित्तमंत्री ने इस अभियान का एलान किया, और इसके शुभारम्भ के लिए बिहार के खगड़िया ज़िले को चुना गया, तभी से मैं इस सरकारी योजना का पूरा ब्यौरा जानने के लिए बेताब था। क्योंकि तमाम सरकारी शोर-शराबे और डुगडुगी बजाकर मुनादी करवाने वाले चिरपरिचित अन्दाज़ के साथ शुरू हुई 50,000 करोड़ रुपये के अभियान का वास्ता जिस ‘ग़रीब’, ‘कल्याण’ और ‘रोज़गार’ से है, वहीं तीनों मिलकर ही को असली ‘भारत’ बनाते हैं।

लिहाज़ा, ‘इंडिया’ वाली कोरोना और भारत-चीन सीमा विवाद के सच-झूठ पर नज़र रखते हुए मैं ‘ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान’ की बारीकियाँ जानने में भी जुटा रहा। केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के कुछेक आला अफ़सरों से भी सम्पर्क किया, लेकिन सरकारी प्रेस विज्ञप्तियों, ट्वीटर-फ़ेसबुक के ढकोसलों और पॉवर प्लाइंट प्रेज़ेंटेशन वाले ऑडियो-वीडियो भाषणबाज़ी के सिवाय और कुछ भी हाथ नहीं लगा।

दरअसल, किसी भी सरकारी योजना को तमाम बन्दिशों से गुज़रना पड़ता है। जैसे, यदि सरकार एक बाँध बनाना चाहे तो महज इसका एलान होने या बजट आबंटन होने या शिलान्यास होने से काम शुरू नहीं हो जाता। ज़मीन पर काम शुरू होने की प्रक्रिया ख़ासी लम्बी और जटिल होती है। मसलन, बाँध कहाँ बनेगा, वहाँ का नक्शा बनाने के लिए सर्वे होगा, सर्वे से विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) बनेगी, फिर तरह-तरह के टेंडर होंगे और टेंडर अवार्ड होने के बाद बाँध के निर्माण का काम शुरू होगा। इसके साथ ही ये पता लगाया जाएगा कि बाँध में कितना इलाका डूबेगा, वहाँ के लोगों का पुर्नवास कहाँ और कैसे होगा, इसकी लागत और अन्य झंझट क्या-क्या होंगे? इसके बाद भी सारा मामला इतना जटिल होता है कि दस साल की परियोजना, अनुमानित लागत के मुकाबले पाँच गुना ज़्यादा वास्तविक लागत से तीस साल में तैयार हो पाती है।

इसी तरह ये जानना भी ज़रूरी है कि सरकार 50,000 करोड़ रुपये की जिस ‘ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान’ की बात कर रही है, उसके विभिन्न आयाम क्या-क्या हैं? क्योंकि अभी तक सरकार ने इस अभियान को ‘गड्ढे खोलने वाली’ मनरेगा से अलग बताया है। मनरेगा में 202 रुपये मज़दूरी और साल के 365 दिनों में से कम से कम 100 दिन काम की गारंटी की बातें हैं। अब चूँकि कोरोना की वजह से शहरों से गाँवों को लौटे प्रवासी मज़दूरों की ‘स्किल मैपिंग’ करवाने की बातें भी हुई हैं तो क्या अलग-अलग स्किल के हिसाब से लोगों को अलग-अलग मज़दूरी भी मिल जाएगी? इस सवाल का कहीं कोई ब्यौरा नहीं है।

इसी तरह, ‘ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान’ को लेकर फ़िलहाल, इतना ही बताया गया है कि इसे प्रवासी मज़दूरों की सहायता के लिए देश के 733 में से 116 ज़िलों में 125 दिनों तक मिशन मोड में चलाया जाएगा। ये ज़िले 6 राज्यों – बिहार (32), उत्तर प्रदेश (31), मध्य प्रदेश (24), राजस्थान (22), ओडिशा (4) और झारखंड (3) के हैं। इनमें से बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश तो ऐसे हैं जिन्हें 1980 में बीमारू राज्य का ख़िताब मिला था। बीते 40 वर्षों में इन बीमारू राज्यों ने विकास के एक से बढ़कर एक अद्भुत ध्वजवाहकों की सरकारें देखीं, लेकिन कोई भी अपने राज्य को बीमारू के कलंक से उबार नहीं सका। उल्टा जिन आधारों पर ये बीमारू बताये गये थे, उसके मुताबिक इनसे अलग हुए झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड भी बीमारू राज्यों की श्रेणी में ही जा पहुँचे।

अगली ज्ञात जानकारी है कि ‘ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान’ को 12 विभिन्न मंत्रालयों का साझा कार्यक्रम बनाया जाएगा। इनके नाम हैं – ग्रामीण विकास, पंचायती राज, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग, खान, पेयजल और स्वच्छता, पर्यावरण, रेलवे, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस, नयी और नवीकरणीय ऊर्जा, सीमा सड़क, दूरसंचार और कृषि मंत्रालय। इन सभी की अफ़सरशाही के बीच समन्वय की ज़िम्मेदारी ग्रामीण विकास मंत्रालय की होगी। अभियान के तहत कम्युनिटी सैनिटाइजेशन कॉम्पलेक्स, ग्राम पंचायत भवन, वित्त आयोग के फंड के तहत आने वाले काम, नेशनल हाइवे वर्क्स, जल संरक्षण और सिंचाई, कुएँ की खुदाई, वृक्षारोपण, हॉर्टिकल्चर, आंगनवाड़ी केन्द्र, प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण), प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, रेलवे, श्यामा प्रसाद मुखर्जी RURBAN मिशन, PMKUSUM, भारत नेट के फाइबर ऑप्टिक बिछाने, जल जीवन मिशन आदि 25 स्कीम्स में काम कराये जाएँगे।

लेकिन अभी कोई नहीं जानता कि इन दर्जन भर मंत्रालयों को अपनी-अपनी योजनाओं के लिए ‘स्किल्ड प्रवासी मज़दूर’ क्या ग्रामीण विकास मंत्रालय सुलभ करवाएगा या फिर उनके बजट को लेकर उन्हें सिर्फ़ वाहवाही देने की कोई ख़ुफ़िया रणनीति है? हालाँकि, जितनी जानकारी अभी तक सामने आयी है, उसके आधार पर इसे ‘अच्छे दिन’ की एक और उपलब्धि बताना जल्दबाज़ी होगी। लेकिन ये मानने का भी कोई आधार तो हो ही नहीं सकता कि सरकारी अमला इस अभियान को ज़मीन पर उतारने में महीनों से पहले कामयाब हो जाएगा। ध्यान रहे कि सरकार का पहिया बहुत भारी होता है और काफ़ी मुश्किल से घूम पाता है।

अब ज़रा 50,000 करोड़ रुपये की भारी भरकम रकम की महिमा को भी खंगाल लिया जाए। एक मोटा अनुमान है कि किसी भी सरकारी निर्माण पर क़रीब आधी रकम मज़दूरी पर खर्च होती है। इसका मतलब ये हुआ कि ‘ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान’ के तहत ताज़ा एलान में मज़दूरी का हिस्सा क़रीब 25,000 करोड़ रुपये होगा। इसे यदि 125 से विभाजित करें तो रोज़ाना का 200 करोड़ रुपये बैठेगा। इसे 116 ख़ुशनसीब ज़िलों से विभाजित करें तो हरेक ज़िले के हिस्से में रोज़ाना के 1.72 करोड़ रुपये आएँगे। अब यदि हम ये मान लें कि स्किल्ड प्रवासी मज़दूरों को मनरेगा के मज़दूरों के मुकाबले डेढ गुना वेतन भी मिला तो इसका औसत रोज़ाना 300 रुपये बैठेगा। इस 300 रुपये से यदि 1.72 करोड़ रुपये को विभाजित करें तो हम पाएँगे कि 125 दिनों में हरेक लाभान्वित ज़िले में 57,471 प्रवासी मज़दूरों की ही किस्मत सँवर पाएँगी।

अलबत्ता, यदि मज़दूरी 300 रुपये से ज़्यादा हुई तो मज़दूरों की संख्या उसी अनुपात में घटती जाएगी। अब ज़रा सोचिए कि इस अभियान से उन एक करोड़ से ज़्यादा प्रवासी मज़दूरों में से कितनों का पेट भरेगा, जिन्हें रेलवे की श्रमिक स्पेशल ट्रेनों के ज़रिये शहरों से उनके गाँवों को भेजा गया है। यहाँ उन अभागे प्रवासी मज़दूरों का तो कोई हिसाब ही नहीं है जो चिलचिलाती धूप में सैकड़ों किलोमीटर लम्बी सड़कों को पैदल नापकर या रेल की पटरियों पर चलकर अपने गाँवों को पहुँचे हैं।

ज़रा तस्वीर का दूसरा पहलू भी देखिए कि वित्त मंत्रालय ने 2016 के आर्थिक सर्वेक्षण में बताया था कि देश में कुल कामगार 48 करोड़ से ज़्यादा हैं और हरेक तीसरा कामगार प्रवासी मज़दूर है। यानी, प्रवासी मज़दूरों की संख्या 16 करोड़ बैठी। हालाँकि, महीने भर पहले जब वित्त मंत्री ने 21 लाख करोड़ रुपये के पैकेज़ का ब्यौरा दिया तो उन्होंने प्रवासी मज़दूरों की संख्या को 8 करोड़ मानते हुए उन्हें तीन महीने तक 5 किलो चावल या गेहूँ मुफ़्त देने के बजट का वास्ता दिया था। साफ़ है कि ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान के असली लाभार्थियों की संख्या जितनी बड़ी है, उसके लिए 50,000 करोड़ रुपये और 12 मंत्रालयों की सारी क़वायद ऊँट के मुँह में जीरा ही साबित होगी।

फ़िलहाल, इतना ज़रूर है कि अक्टूबर-नवम्बर में होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव से पहले सत्ता पक्ष इस अभियान को लेकर ख़ूब ढोल पीटता रहेगा। 25 अक्टूबर को बिहार में दुर्गापूजा की धूम रहेगी, फिर 14 नवम्बर को दिवाली और 20 नवम्बर को छठ पूजा की। बिहार की मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल 29 नवम्बर तक है। इससे पहले जनादेश आ ही जाएगा। और हाँ, ‘ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान’ की 125 दिनों की मियाद 26 अक्टूबर को ख़त्म हो जाएगी। हालाँकि, सरकार का कहना है कि वो इस अभियान को आगे भी जारी रख सकती है। लेकिन बात कैसे और कब आगे बढ़ेगी? इसे जानने के लिए तो इन्तज़ार करना ही होगा।

तब तक यदि प्रवासी मज़दूरों के सामने भूखों मरने की नौबत आ गयी तो सरकार का वैसे ही कोई दोष नहीं होगा, जैसे कोरोना संक्रमितों की संख्या का रोज़ाना अपना ही रिकॉर्ड तोड़ने का सिलसिला जारी है। या फिर, जैसे विकास का सारा बोझ अपने कन्धों पर उठाये पेट्रोल-डीज़ल के दाम रोज़ाना नये रिकार्ड बनाने में जुटे हुए हैं। या फिर, लद्दाख में भारत-चीन सीमा पर बग़ैर किसी घुसपैठ के बावजूद भारतीय सैनिक ख़ुद को शहीद करने पर आमादा रहे हैं, वायुसेना के लड़ाकू विमानों की अग्रिम अड्डों पर तैनाती और ‘फ़्लाई पास्ट’ हो रहा है तथा शान्ति का नारा लगा रहे चीनी सेना के जबाब में हमारी थल सेना भारतीय इलाके में मज़मा लगाकर और तालियाँ बजाकर उनका अभिनन्दन कर रही है। ज़ाहिर है, 130 करोड़ भारतीयों में से जितने भी ‘नासमझ’ हैं वो ‘झुकने और बिकने’ का मतलब तो बहुत अच्छी तरह से समझ चुके हैं!

Mukesh Kumar Singh मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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ब्लॉग

शेयर बाजार में पूरे सप्ताह रहा उतार-चढ़ाव, 1.5 फीसदी टूटे सेंसेक्स, निफ्टी

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Stock Market Down

मुंबई, 13 जून (आईएएनएस)। घरेलू शेयर बाजार में इस सप्ताह भारी उतार-चढ़ाव का दौर लगातार जारी रहा, लेकिन लगातार दो सप्ताह बढ़त कायम नहीं रह पाई। घरेलू कारकों और कमजोर विदेशी संकेतों से सेंसेक्स और निफ्टी दोनों पिछले सप्ताह के मुकाबले करीब 1.5 फीसदी की गिरावट के साथ बंद हुए।

बंबई स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) के 30 शेयरों पर आधारित संवेदी सूचकांक सेंसेक्स पिछले सप्ताह के मुकाबले 506.35 अंकों यानी 1.48 फीसदी की गिरावट के साथ 33,780.89 पर बंद हुआ।

नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) के 50 शेयरों पर आधारित संवेदी सूचकांक निफ्टी पिछले सप्ताह के मुकाबले 169.25 अंकों यानी 1.67 फीसदी की कमजोरी के साथ 9972.90 पर ठहरा।

बीएसई मिडकैप सूचकांक पिछले सप्ताह से 45.99 अंकों यानी 0.37 फीसदी की कमजोरी के साथ 12,600.15 पर जबकि स्मॉलकैप सूचकांक 9.90 अंक फिसलकर 11,845.27 पर रूका।

सप्ताह के आरंभ में हालांकि सोमवार को सेंसक्स 83.34 अंकों की बढ़त बनाकर 34370.58 पर रूका और निफ्टी 25.30 अंक चढ़कर 10,167.45 पर बंद हुआ, लेकिन अगले सत्र में मंगलवार को गिरावट आ गई और सेंसक्स पिछले सत्र से 413.89 अंक यानी 1.20 फीसदी की कमजोरी के साथ 33956.69 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 120.80 अंकों यानी 1.19 फीसदी की गिरावट के साथ 10,046.65 पर ठहरा।

घरेलू बाजार में बुधवार को फिर रिकवरी आ गई और सेंसेक्स 290.35 अंक चढ़कर 34,247.05 पर ठहरा, जबकि निफ्टी 69.50 अंकों की बढ़त के साथ 10,116.15 पर रूका। अगले दिन फिर बाजार में बिकवाली के भारी दबाव में सेंसेक्स पिछले सत्र से 708.68 यानी 2.07 फीसदी लुढ़ककर 33,538.37 पर बंद हुआ। निफ्टी भी पिछले सत्र से 214.15 अंकों यानी 2.12 फीसदी की गिरावट के साथ 9,902 पर बंद हुआ।

सप्ताह के आखिरी सत्र में हालांकि काफी उतार-चढ़ाव रहा, लेकिन आखिर में जबरदस्त रिकवरी के साथ सेंसेक्स पिछले सत्र से 242.52 अंक चढ़कर 33,780.89 पर ठहरा और निफ्टी ने भी 70.90 अंकों की बढ़त बनाई फिर भी 10,000 के मनोवैज्ञानिक स्तर को बनाए रखने में नाकाम रहा।

कोरोनावायरस का संक्रमण गहराने और प्रमुख टेलीकॉम कंपनियों को एजीआर बकाया मामले में सर्वोच्च न्यायालय से राहत नहीं मिलने से घरेलू बाजार में कारोबारी रुझान कमजोर हुआ। वहीं, अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था में सुधार को लेकर जो संकेत दिया है वह आशावादी नहीं है, इसलिए विदेशी बाजारों में कमजोरी आई ,जिसका असर भारतीय शेयर बाजार पर भी दिखा।

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