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आखिर क्यों गोरखपुर के अस्पताल में 30 मासूम बच्चों की मौत पर हो रही लीपा-पोती?

सरकार भले ही मासूम बच्चों की मौत की वजह अलग-अलग बता रहीं हो लेकिन इतना तो साफ है कि सरकार इस पूरे घटना से मूंह मोड़ और बीआरडी कॉलेज के प्रिंसिपल को सस्पेंड कर मामले की लीपा-पोती में लगी है।

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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह क्षेत्र के बीआरडी मेडिकर कॉलेज में महज 36 घंटे के भीतर 30 मासूम बच्चों की मौत ने सबको झकझोंर कर रख दिया है। ऑक्सीजन की कमी के चलते इन बच्चों की मौत की वजह सामने आ रही है लेकिन प्रदेश सरकार इस मामले की लीपापोती कर रही है। इस बात का खुलासा तब हुआ जब अस्पताल में ऑक्सीजन सिलिंडर सप्लाई करने वाली कंपनी ने 1 अगस्त को लिखी अपनी चिट्ठी में इस बात का जिक्र किया की वो अब ऑक्सीजन की सप्लाई नही कर पाएंगे क्योंकि 63 लाख रुपये से ज्यादा का बकाया है। ये चिट्ठी बीआर मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल के साथ साथ गोरखपुर डीएम और उत्तर प्रदेश के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवा विभाग महानिदेशक को भेजी गई है।

लेकिन चिट्ठी मिलने के बाद भी प्रशासन नही जागा तब फिर दूसरी चिट्ठी 10 अगस्त को फिर से ऑक्सीजन सिलिंडर सप्लाई करने वाली कंपनी के कर्मचारियों ने लिखी थी जो कर्मचारी अस्पताल में सिलिंडर देने का काम करते थे। ये चिट्ठी अस्पताल के बाल रोग विभाग के प्रमुख को संबोधित करते हुए एक चिट्ठी लिखी गई थी जिसमें ऑक्सीजन सिलिंडर सप्लाई कम होने की जानकारी दी गई है। बावजूद इसके प्रशासन के कानों तक जूं तक नही रेंगा। और तो और राज्य सरकार और प्रशासन ये बात मानने को राजी नही है कि मौत ऑक्सीजन की कमी के चलते हुई। पिछले पांच दिनों में जिले में अब तक 60 से ज्यादा बच्चों की मौत ने राज्य सरकार समेत तमाम प्रशासन की पोल खोल के रख दी है।

Gorakhpur Letter from Pushpa

This the Oxygen Supply Company letter for payment of due in Gorakhpur Hospital

लेकिन सरकार इस पूरे मामले पर सफाई देते हुए गोरखपुर में यूपी के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ सिंह ने कहा कि जो मौतें हुई हैं वो ऑक्सीजन की कमी के चलते नहीं हुई हैं। उन्होंने बताया कि सीएम योगी आदित्यनाथ के दौरे के वक्त किसी ने ऑक्सीजन सप्लाई का मुद्दा नहीं बताया था। स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि इस मामले में गोरखपुर बीआरडी कॉलेज के प्रिंसिपल को सस्पेंड किया गया है साथ ही मुख्य सचिव की अध्यक्षता में जांच कराई जाएगी। यूपी के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह ने दावा किया कि बच्चों की मौत गैस की वजह से नहीं हुई। हालांकि उन्होंने माना कि दो बार गैस सप्लाई में रुकावट आई थी सिद्धार्थ नाथ ने कहा कि हम बच्चों की मौतों को कम नहीं आंक रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस कॉलेज में मरीज लास्ट स्टेज में आते हैं जिस कारण भी मौत का आंकड़ा ज्यादा है। सिद्धार्थ नाथ सिंह ने सफाई देते हुए कहा कि अगर पुराने आंकड़ें देखें तो इस अस्पताल में औसतन 17-18 बच्चों की मौतें होती हैं। कुछ आकड़े पेश करते हुए उन्होंने कहा कि 2014 के अगस्त में औसतन में 5 से 7 मौतें हुई थी वहीं 2015 अगस्त में बच्चों की मौत का आकड़ा 22 पहुंच गया था। गोरखपुर के बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज में पिछले 48 घंटों के भीतर 33 की मौत हो गई है। सिद्धार्थ सिंह ने सफाई देते हुए बताया कि बच्चों की मौतों का कारण अलग-अलग है।

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सरकार भले ही मासूम बच्चों की मौत की वजह अलग-अलग बता रहीं हो लेकिन इतना तो साफ है कि सरकार इस पूरे घटना से मूंह मोड़ और बीआरडी कॉलेज के प्रिंसिपल को सस्पेंड कर मामले की लीपा-पोती में लगी है।

बीजेपी सरकार के मुखिया योगी आदित्यनाथ ने अपने 100 दिनों के कार्यकाल का ढिढोरा पीटा और सरकार की कामयाबी पर जमकर गाल बजाई। सबसे चौका देने वाली बात तो ये है कि इस घटना से कुछ दिन पहले ही राज्य के मुख्यमंत्री ने बीआरडी अस्पताल का जायजा लिया था। लेकिन इन मासूम मौतों पर न सिर्फ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मौन है। बीजेपी के राज में लापरवाही से इतनी तादाद में बच्चों की मौत ने सरकार की कलई खोल कर रख दी है।

सत्ता में आते ही योगी सरकार कानून-व्यवस्था को लेकर पहले सी ही विपक्ष के निशाने पर थी चाहे मामला एंटी रोमियो स्क्वायड का हो या फिर बुचरखानों को बंद करने का। अब राज्य में मुख्य विपक्षी सपा के साथ बसपा और कांग्रेस के बड़े नेताओं ने इस घटना पर दुख जताने के साथ-साथ योगी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। विपक्ष के सारे नेता एकजुट होकर मुख्यमंत्री से पूछ रहे हैं कि जब योगी ने तीन दिन पहले ही बीआरडी मेडिकल कॉलेज का दौरा किया था तो वहां इतनी बड़ी लापरवाही कैसे हुई?

प्रदेश सरकार की इस बड़ी चूक को देखते हुए विपक्ष कहां पिछे रहने वाला था पूर्व मुख्यमंत्री सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा, ‘बीआरडी मेडिकल कॉलेज में बच्चों की मौत ऑक्सीजन की कमी से हुई है लेकिन राज्य सरकार अपनी गलती सुधारने के बजाय झूठ बोलने में लगी है। गलती छुपाने के लिए परिजनों को बच्चों का शव देकर भगा दिया गया, मृतक बच्चों का पोस्टमार्टम तक नहीं हुआ है।’

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वहीं बसपा सुप्रीमों मायावती ने भी प्रदेश सरकार पर झूठ छुपाने का आरोप लगाते हुए दोषियों के खिलाफ ठोस कार्रवाई करने की वकालत की है। मायावती ने कहा, ‘मासूमों की मौत के लिए यूपी सरकार जिम्मेदार है। मासूमों के परिजनों को न्याय दिलवाने के लिए हम आगे आए हैं। राज्य सरकार अपनी गलती छुपाने के बजाय दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करने में अपनी ताकत लगाए।’

कांग्रेस ने इस मामले में सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का इस्तीफा मांगा है। अध्यक्ष सोनिया गांधी के कहने पर पार्टी के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद, आरपीएन सिंह, राज बब्बवर और प्रमोद तिवारी गोरखपुर मेडिकल कॉलेज का जायजा लिया। इस घटना पर गुलाम नबी आजाद ने कहा, ‘योगी सरकार की नाकामी और लापरवाही से ये दर्दनाक हादसा हुआ है। इस घटना की जिम्मेदारी लेते हुए मुख्यमंत्री आदित्यनाथ समेत स्वास्थ्य मंत्री और अन्य जिम्मेदार लोगों को इस्तीफा दें देना चाहिए।

वहीं इस घटना से बैकफुट पर आई सत्ता पक्ष के न खाते निगल रहा न उगलते। फिर भी सत्ता पक्ष विपक्ष की आवाज को बंद कर अपनी मनमानी करने पर लगा है। प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने कहा, ‘विपक्ष हड़बड़ी में है और प्रदेश की सरकार जनता की सेवा के लिए प्रतिबद्ध है। दोषियों के खिलाफ यूपी सरकार कड़ी कार्रवाई करेगी।’ लेकिन सच तो ये है कि विपक्ष की हड़बड़ाहट उपमुख्यमंत्री को दिखाई दे रही है लेकिन खूद सरकार अगर इस मामले में हड़बड़ी दिखाता तो शायद ऑक्सीजन की कमी के मासूम बच्चों की मौत नही होती। लेकिन योगी सरकार ने ऐसा नही किया।

बच्चों का बचपन संवारने और नोबेल पुरुस्कार पाने वाले कैलाश सत्यार्थी ने तो इस घटना को हादसा नहीं बल्कि हत्या करार दिया है। सत्यार्थी ने कहा, बगैर ऑक्सीजन के 30 बच्चों की मौत हादसा नहीं, हत्या है। उन्होंने कहा कि क्या हमारे बच्चों के लिए आजादी के 70 सालों का यही मतलब है।’

लेकिन इस घटना से क्या राज्य सरकार कोई सीख लेगी, इन मौतों को लेकर जिम्मेदारी किस पर तय होगी? ये एक बड़ा सवाल है। लेकिन इतना तो तय है कि, इस मामले की भी जांच होगी, रिपोर्ट आएगी, रिपोर्ट में किसे गुनहगार ठहराया जाएगा, नहीं ठहराया जाएगा, क्लीन चिट दे दी जाएगी, जो होगा सो होगा, जो नहीं होगा वह यह कि ऐसी घटनाओं से कोई सबक नहीं लिया जाएगा, आखिर में होगा वही ढाक के तीन पात, स्वास्थ्य सेवाओं से जूड़े लापरवाही के मामले सामने आते रहेंगे लेकिन हम सबक नहीं लेंगे। और जनता के बीच सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर जो धारणाएं बनी हुई है कि वहां न जाया जाय, वहां जाने का मतलब मौत को दावत देना है।

Arvind Pandey

Arvind Pandey

(ये लेखक के निजी विचार है।)

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विज्ञापनबाज़ी की लत: मोदी के व्यक्तित्व का सबसे घातक पहलू

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Narendra Modi

पुरखों को कोसने की बीमारी

उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर में बाणसागर नहर परियोजना का लोकार्पण करते हुआ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी चिर-परिचित विज्ञापन-शैली में विपक्षी दलों पर निशाना साधा। लेकिन अफ़सोस कि जिस भाषण से मोदी अपने सियासी विरोधियों पर निशाना साध रहे थे, उसी भाषण से वो अपने सियासी ख़ानदान की बखिया भी उधेड़ रहे थे। मिसाल के तौर पर जब मोदी कहते हैं कि ‘यदि पहले की सरकारों से अपना काम ठीक से किया होता तो इतनी उपयोगी परियोजना का लाभ वर्षों पहले से मिलने लगता।’ ये बयान बिल्कुल सही है। लेकिन पिछली सरकारों को कोसते वक़्त मोदी भूल जाते हैं कि ख़ुद उनके उदय से पहले भी देश में बीजेपी की सरकारें रही हैं।

मोदी ये क्यों भूल जाते हैं कि उनके दिल्ली आने से पहले मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में सिर्फ़ काँग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल की ही सरकारें नहीं थीं, बल्कि कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह, राम प्रकाश गुप्ता, कैलाश चन्द्र जोशी, वीरेन्द्र कुमार सकलेचा, सुन्दर लाल पटवा, उमा भारती, बाबू लाल गौर और शिवराज सिंह चौहान वाली भगवा सरकारें भी सत्ता में रह चुकी हैं। लिहाज़ा, पिछली सरकारों को कोसते वक़्त मोदी ये क्यों नहीं कहते कि पिछली सरकारों में बीजेपी की भी सरकारें भी शामिल हैं! मोदी का ये नहीं कहना ही वो झूठ है, जो उनके भाषणों को विज्ञापन बनाता है।

नरेन्द्र मोदी को अपनी ब्रॉन्डिंग के लिए अपना विज्ञापन करने और अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनने के अलावा पुरखों को कोसने की ऐसी बीमारी है, जो उनसे पहले देश के किसी मुखिया की कभी नहीं रही! मोदी के व्यक्तित्व का ये सबसे ख़राब और घातक पहलू है! क्योंकि बीजेपी के नव-निर्मित मुख्यालय के अलावा देश में शायद ही कोई ऐसी योजना हो जो अपने निर्धारित वक़्त में पूरी हुई हो! भारत की सरकारी कार्यप्रणाली कई मायने में हमेशा से ही बेहद शर्मनाक रही है। मोदी-युग में भी योजनाओं के समय पर पूरा नहीं होने के सैंकड़ों उदाहरण हैं। इसीलिए जब मोदी पिछली सरकारों पर हमला करते हैं, तब वो ख़ुद अपना और अपने पद की गरिमा की खिल्ली उड़ाते हैं।

बाणसागर की हक़ीक़त

लगे हाथ बाणसागर परियोजना के इतिहास को भी जान लीजिए। 1956 में पहली बार केन्द्रीय जल आयोग ने इसकी परिकल्पना की थी। तब इसका नाम ‘डिम्बा प्रोजेक्ट’ था। इसे सोन और बनास नदी के संगम पर शिकारगंज के पास बनाया जाना था। बाद में इसे वहाँ से 30 किलोमीटर दूर मौजूदा जगह यानी शहडोल ज़िले में देवलोंद ले जाना का फ़ैसला हुआ। 1973 में इसके लिए मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार की सरकारों के बीच अन्तर्राज्जीय जल समझौता हुआ। तब संस्कृत के प्राचीन विद्वान बाण भट्ट के नाम पर इसे बाणसागर नाम दिया गया। समझौते के बावजूद शिलान्यास की नौबत आने तक पाँच साल और बीत गये।

Bansagar Dam

14 मई 1978 को प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने बाणसागर परियोजना का शिलान्यास किया। जनता पार्टी की उस सरकार में जनसंघ की ओर से अटल-आडवाणी मंत्री थे। तब बीजेपी ही नहीं, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल का भी जन्म नहीं हुआ था। इसके बावजूद, 1973 में जिस परियोजना की अनुमानित लागत 91.31 करोड़ रुपये थी, उसके शिलान्यास के वक़्त 322.2 करोड़ रुपये मंज़ूर किये गये। शिलान्यास के 14 महीने बाद मोरारजी सरकार गिरी। लेकिन तब तक परियोजना का निर्माण शुरू नहीं हो पाया। लिहाज़ा, क्या मोदी बताएँगे कि उस ज़माने की देरी का ठीकरा किससे सिर फोड़ा जाए!

बाणसागर का श्रेय सिर्फ़ बीजेपी को क्यों?

विंध्य क्षेत्र से जुड़े मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार के सर्वाधिक सूखाग्रस्त इलाके की अनियमित वर्षा को देखते हुए सोन नदी के पानी के इस्तेमाल के लिए बनी बाणसागर परियोजना के जलाशय के पानी को तीन हिस्से में बाँटने की योजना बनी। लाभार्थी राज्यों के जल अनुपात के मुताबिक ही बाणसागर की 50 फ़ीसदी लागत मध्यप्रदेश को और बाक़ी 25-25 फ़ीसदी उत्तर प्रदेश तथा बिहार को देना था। लेकिन समय रहते राज्यों से वित्तीय अंशदान नहीं मिला और परियोजना लटकती चली गयी। इन अड़चनों को दूर करने के बाद निर्माण का असली काम 1997 में शुरू हो पाया। हालाँकि, 1998 तक संशोधित लागत 1055 करोड़ रुपये को पार कर चुकी थी।

निर्माण शुरू होने के वक़्त अटल जी प्रधानमंत्री थे, तो मध्य प्रदेश में दिग्विजय सिंह, उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह और बिहार में राबड़ी देवी की सरकारें थीं। दिग्विजय सरकार दिसम्बर 2003 तक रही। फिर उमा भारती, बाबू लाल गौर और शिवराज सिंह की सरकारें बनीं। ज़ाहिर है, बाणसागर का श्रेय किसी अकेले को नहीं मिल सकता। बहरहाल, शिवराज के वक़्त बाणसागर का मध्य प्रदेश वाला हिस्सा बन गया और 25 सितम्बर 2006 को अटल जी ने उसका लोकार्पण किया। इस दौरान 1997 में उत्तर प्रदेश के हिस्से वाली 172 किलोमीटर लम्बी बाणसागर नहर परियोजना का काम शुरू हुआ। इसी का लोकार्पण मोदी ने अभी किया है।

आख़िरकार, 3500 करोड़ रुपये की लागत और दशकों की देरी के बाद विंध्य पर्वत में सुरंग बनाकर सोन नदी के पानी को मध्य प्रदेश से उत्तर प्रदेश की ओर लाने का सपना साकार हुआ। लेकिन नरेन्द्र मोदी ने पिछली पीढ़ियों की मेहनत का सेहरा जिस ढंग से अपने सिर बाँध लिया, उसके बाद ये पूछना लाज़िमी हो गया है कि क्या बाणसागर का सपना उन्होंने देखा था? क्या सिर्फ़ उनकी सरकार ने इसके लिए रात-दिन एक कर दिया? क्या इतनी बड़ी परियोजना योगी-मोदी राज की कोशिशों से ही चालू हो पायी? सच्चाई तो ये है कि जुलाई 2015 में आयी प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना से जोड़े जाने तक बाणसागर का 90 फ़ीसदी काम हो चुका था। दशकों की देरी के बावजूद यदि मोदी श्रेय के हक़दार हैं तो फिर पुरानी सरकारें क्यों नहीं!

मुफ़्त की वाहवाही का नशा

दरअसल, मोदी को मुफ़्त की वाहवाही बेहद पसन्द है। किस्मत में उन्हें ऐसे कई मेगा-प्रोजेक्ट्स का लोकार्पण करने का सौभाग्य भी मिलता रहा, जिसके लिए सारी जद्दोज़हद पिछली सरकारों ने की। मिसाल के तौर पर, 4 जून 2016 को मोदी, अफ़ग़ानिस्तान को जिस सलमा बाँध का तोहफ़ा देने गये थे, उसकी व्यावहारिकता (Feasibility) रिपोर्ट 1957 में बनी थी और निर्माण 1976 में शुरू हुआ था। इससे पहले 25 दिसम्बर 2015 को मोदी ने अफ़ग़ानिस्तान के नये संसद भवन का लोकार्पण किया, उसका शिलान्यास भी अगस्त 2005 में मनमोहन सिंह ने किया था।

जम्मू-कश्मीर को हर मौसम में सड़क मार्ग से जोड़ने वाली 10 किलोमीटर लम्बी चेनानी-नाशरी (पटनीटॉप) सुरंग का लोकार्पण मोदी ने 2 अप्रैल 2017 को किया। इस हाईटेक प्रोजेक्ट का निर्माण 2011 में शुरू हुआ। लेकिन उद्घाटन के वक़्त सारा श्रेय मोदी ने ऐसे लपक लिया, मानों ये उनकी नोटबन्दी की उपलब्धि रही हो। दूसरी ओर, मोदी राज की कार्यशैली की पोल ज़ोजीला सुरंग की योजना ने खोल दी।

हक़ीक़त ये है कि कश्मीर को लेह से जोड़ने वाली ज़ोजीला सुरंग के निर्माण को मनमोहन कैबिनेट की मंज़ूरी अक्टूबर 2013 में मिली। इसके बावजूद शिलान्यास मई 2018 में हो सका। इसी तरह, असम को अरूणाचल से जोड़ने वाले ब्रह्मपुत्र पर बने जिस सबसे लम्बे ढोला-सादिया या भूपेन हज़ारिका पुल का उद्घाटन नरेन्द्र मोदी ने 26 मई 2017 को किया, उसके सर्वेक्षण का काम 2003 में शुरू हुआ था। जनवरी 2009 में मनमोहन सिंह सरकार ने इस परियोजना को मंज़ूरी दी थी।

जुमला बना घड़ियाली आँसू

मिर्ज़ापुर की जनसभा में ही मोदी कहते हैं कि “जो लोग आजकल किसानों के लिए घड़ियाली आँसू बहाते हैं, उनसे आपको पूछना चाहिए कि आख़िर क्यों उन्हें अपने शासनकाल में देश भर में फैली इस तरह की अधूरी सिंचाई परियोजनाएँ नहीं दिखाई दीं? पिछली सरकार ने कभी किसानों की चिन्ता नहीं की। जो लोग किसानों के नाम पर राजनीति कर रहे हैं उनके पास न्यूनतम समर्थन मूल्य की कीमत को बढ़ाने का समय नहीं था।”

अरे मोदी जी, किसानों के नाम पर कथित घड़ियाली आँसू बहाने वालों से तो जनता देर-सबेर जबाब तलब करती ही रही है, लेकिन क्या आपको पता है कि आपने तो ख़ुद कभी भी जनता के सवालों का सामना नहीं किया! अब यदि हिम्मत हो तो देश को ये बताइए कि आपके शासनकाल में अब तक कितनी सिंचाई परियोजनाओं को मंज़ूरी मिली? उनमें से कितनों पर काम चालू हुआ? और, उनमें से कितनी परियोजनाओं का लोकार्पण मई 2019 तक होने वाला है? इसके अलावा, क्या आप कह सकते हैं कि आपके पाँच साल पूरे होने तक देश की कोई सिंचाई परियोजना देरी से नहीं चल रही होगी?

नौकरशाही का ढर्रा

अरे, पिछली सरकारों को तो छोड़िए, आपकी सरकार की सैंकड़ों महत्वाकाँक्षी योजनाएँ या तो बेहद देरी से चल रही हैं या फिर उनकी उपलब्धि शर्मनाक है। सच्चाई तो ये है कि आपके मातहत काम कर रहे अलग-अलग मंत्रालय भी अब भी वैसे ही अड़ंगा लगाते हैं, जैसा वो पिछली सरकारों के ज़माने में होता था! ज़ाहिर है कि आप दावे चाहे जितने कर लें, लेकिन आपके राज में भी नौकरशाही का ढर्रा बिल्कुल पहले जैसा ही है। और हाँ, यदि आपको पता हो तो ज़रा देश को बताइएगा कि क्या आपसे पहले किसी सरकार ने कभी न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाया था या नहीं? या फिर 70 साल में क्या ये पहला मौका है जब किसानों पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वालों ने न्यूनतम समर्थन मूल्य में क्रान्तिकारी इज़ाफ़ा करके किसानों को निहाल कर दिया है!

इसी तरह, प्रधानमंत्री ने उस वक़्त भी सिर्फ़ लफ़्फ़ाज़ी ही की, जब उन्होंने कहा कि “हम अमीर और ग़रीब के बीच की खाई को कम करना चाहते हैं। इसका परिणाम जल्द ही आपको दिखने लगेगा। क्योंकि पहली बार विकास न सिर्फ़ हो रहा है, बल्कि दिख भी रहा है! [इसी विकास को] ग़रीब अब आपकी आँखों में आँखें डालकर विश्वास से देख सकता है। क्योंकि मोदी ग़रीब को इस लायक बनाने के लिए काम कर रहे हैं।” अरे मोदी जी, जब आप कहते है कि अमीर-ग़रीब की खाई कम होने वाली है तब डर लगता है कि कहीं आप नीरव-मेहुल जैसे कई और दोस्तों पर भी मेहरबान ना हो जाएँ! आपको ये कौन बताएगा कि बैंकों में रखा ग़रीबों का पैसा वहाँ से दिन-दहाड़े लूटकर देश से फ़ुर्र हो जाने से ही अमीर-ग़रीब की खाई मिट नहीं रही, बल्कि और चौड़ी तथा गहरी हो रही है!

मोदी बने विज्ञापन

दरअसल, नरेन्द्र मोदी की शख़्सियत में एक प्रधानमंत्री या प्रधानसेवक या चौकीदार या एक शिक्षित, समझदार और गरिमावान राजनेता का अक़्स बेहद कम है। उनमें एक विज्ञापन की ख़ूबियाँ कहीं ज़्यादा नज़र आती हैं! मोदी में वो सभी गुण हैं, जो किसी विज्ञापन में होते हैं! विज्ञापनों में जिस तरह से सच के मामूली से अंश को बेहद बढ़ा-चढ़ाकर और आकर्षक ढंग से पेश किया जाता है, वैसे ही मोदी अपनी चौतरफ़ा नाकामी पर पर्दा डालने के लिए अपने मामूली से योगदान को भी बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं।

Modi Baan Sagar AD

मोदी भूल चुके हैं कि सच की महिमा निराली है! सच, निष्कपट होता है। सच जितना होता है, उतना ही नज़र आता है। कम-ज़्यादा नहीं। यही ब्रह्म सत्य है! सच को आप जितना बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना चाहेंगे, आपको उसमें उतना ही झूठ मिलाना पड़ेगा! झूठ को आँख बन्द करके नहीं मिलाया जा सकता। इसीलिए विज्ञापनों में किसी उत्पाद की विशेषताओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते वक़्त कई तरक़ीबें अपनायी जाती हैं। जैसे जिंगल, मॉडलिंग, संवाद, अभिनय, फ़ोटोग्राफ़ी, रोशनी, सेट वग़ैरह-वग़ैरह। ये आकर्षण परस्पर मिलकर झूठ का मेकअप या शृंगार करते हैं। झूठ को शृंगार की ज़रूरत इसलिए है, क्योंकि वो बुनियादी तौर पर कुरूप होता है!

हरेक भाषण विज्ञापन

नरेन्द्र मोदी का हरेक भाषण, सिर्फ़ उनका विज्ञापन है। बीते पाँच साल में, मोदी देश में हो या विदेश में, लेकिन शायद ही कोई दिन ऐसा बीता हो जब मोदी ने भाषणबाज़ी नहीं की। मौका जो भी हो, लेकिन उनका भाषण हमेशा चुनावी और वीर-रस से ओत-प्रोत ही रहता है। इसीलिए उन्हें हक वक़्त ‘अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनने’ की लत पड़ गयी है। जब हमेशा अपना गुणगान करने की लाचारी होगी तो हमेशा विज्ञापन की तरह सच-कम और झूठ-ज़्यादा तो बोलना ही पड़ेगा। अपनी इसी लाचारी की वजह से वो ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं, जिन्हें फेंकूँ का ख़िताब मिला!

विज्ञापन की तरह झूठ को बार-बार फैलाना ही ब्रॉन्ड मोदी की सबसे बड़ी ख़ासियत है। काश! कोई उन्हें समझा पाता कि झूठ का मोटा पलेथन लगाकर भी सच की छोटी लोई से बड़ी रोटी नहीं बेली जा सकती! काश! कोई उन्हें बता पाता कि सार्वजनिक जीवन में विरोधियों पर हमला करने से पहले हमेशा तथ्यों को ठोक-बजाकर देख लेना चाहिए। वर्ना, आपको जितना सियासी फ़ायदा होगा, उससे कहीं ज़्यादा आप हँसी के पात्र बनेंगे। शीर्ष पदों पर बैठे लोगों के लिए व्यंग्य और मसख़रापन में मामूली फ़र्क़ ही होता है!

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ओपिनियन

भारत कई आर्थिक संकेतकों में बांग्लादेश से भी काफी पीछे

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Amartya Sen

नई दिल्ली, 15 जुलाई | दुनिया की सर्वाधिक तीव्र दर से आर्थिक विकास वाली भारतीय अर्थव्यवस्था विकास के कई संकेतकों में बांग्लादेश से भी काफी पीछे है। मसलन, महिला कामगार भागीदारी दर 2010 में भारत 29 फीसदी थी तो बांग्लादेश में 57 फीसदी। यह चौंकाने वाली बात नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अर्मत्य सेन और ज्यां द्रेंज ने अपनी किताब ‘भारत और उसके विरोधाभास’ में बताई है।

मूल अंग्रेजी कृति ‘एन अनसर्टेन ग्लोरी : इंडिया एंड इट्स कंट्राडिक्शन’ का यह हिंदी रूपांतर है, जिसका प्रकाशन इसी साल हुआ है। मूल पुस्तक 2013 में ही प्रकाशित हुई थी।

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लेखक द्वय ने किताब में इस तल्ख सच्चाई को रेखांकित किया है कि लाभ अर्जित करने के मकसद से शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में जो निजी पूंजी निवेश होता है, उससे तब्दीली तो आती है, मगर उसका लाभ सबको नहीं मिल पाता, क्योंकि वह निवेश जनहित के उद्देश्य से कम, लाभ कमाने के लिए ज्यादा होता है।

किताब में तीव्र आर्थिक विकास के पथ पर अग्रसर भारत की वास्तविक तस्वीर पेश की गई है, जिसमें उपलब्धियों के साथ-साथ कई विफलताएं भी शामिल हैं, जिन्हें नजरंदाज नहीं किया जा सकता।

लेखक द्वय ने यह बताने का प्रयास किया है कि आर्थिक विकास का फायदा अगर समाज में कमजोर तबकों और वंचितों को नहीं मिल रहा है तो फिर देश के आर्थिक विकास के कोई मायने नहीं हैं। इनके कहने का अभिप्राय यह है कि आर्थिक विकास के लाभ का पुनर्वितरण सुविधाओं से महरूम लोगों के बीच होना जरूरी है।

दोनों अर्थशास्त्री आर्थिक विकास के लिए सार्वजनिक व्यय को जरूरी मानते हैं। इनके मुताबिक शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार सृजन के लिए सार्वजनिक व्यय जरूरी है, जिससे आर्थिक विकास को भी रफ्तार मिलती है।

किताब में मीडिया की जवाबदेही पर भी सवाल किया गया है। लेखक द्वय के अनुसार, भारतीय मीडिया रूपहले पर्दे, खान-पान और जीवन पद्धति और खेल जैसे मनोरंजन की खबरों में ज्यादा अभिरुचि दिखाता है, जबकि विकास के मसलों में उसकी दिलचस्पी कम देखी गई है।

इन्होंने किताब में योजना आयोग की एक रिपोर्ट का जिक्र किया है, जिसमें आयोग ने कहा है कि 2011-12 में देश की 1.2 अरब आबादी का एक चौथाई से कम निर्धनता रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहा है।

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि 1990 से 2010 के दौरान दुनियाभर में निर्धनता में कमी आई, जो आर्थिक विकास का परिणाम है। बाद के वर्षो में दुनिया के विकासशील देशों में एक चौथाई आबादी नितांत गरीबी का जीवन बसर करने को मजबूर थी और भारत में 40 फीसदी से ज्यादा लोग इस हालत में थे।

आर्थिक उदारीकरण के कारण भारत में 1990 के बाद गरीबी में कमी जरूर आई लेकिन इसमें सत्ता में बैठे लोगों की कोई कृपा नहीं थी। जिन लोगों ने उदारीकरण का विरोध किया वे 1991 के पूर्व की नीतियों में विश्वास करते थे।

लेखकों ने किताब की भूमिका में हालिया घटनाओं का भी जिक्र किया है, जिनमें 8 नवंबर, 2016 को भारत सरकार द्वारा की गई नोटबंदी की भर्सना की गई है। लेखक द्वय ने सरकार ने बेरोजगारों को रोजगार देने के बजाय अचानक नोटबंदी कर 86 फीसदी नकदी को गैरकानूनी घोषित कर दिया।

किताब में तुलनात्मक आंकड़े भारतीय अर्थव्यवस्था को बेहतर ढंग से समझने में सहायक हैं। हालांकि अनूदित रचना होने के कारण संप्रेषणीयता का प्रवाह कहीं-कहीं अवरुद्ध होता है। इसमें कहीं दो राय नहीं कि अनुवादक ने मूल पाठ और लक्षित पाठ के बीच तारतम्य बनाने की पूरी चेष्टा की है। पुस्तक पठनीय है, खासतौर से आंकड़ों और तथ्यों का तुलनात्मक अध्ययन अर्थशास्त्र के विद्यार्थियों के लिए लाभकारी हो सकता है।

किताब : भारत और उसके विरोधाभास

लेखक : अर्मत्य सेन, ज्यां द्रेंज

अनुवादक : अशोक कुमार

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली

मूल्य : 399 रुपये

–आईएएनएस

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ओपिनियन

गौ रक्षकों का मोदी की बात न सुनना चिंताजनक : हामिद अंसारी

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Hamid Ansari

नई दिल्ली, 15 जुलाई | पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी का कहना है कि देश में ‘अतिसतर्कता’ उफान पर है और यदि गौ रक्षक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बात भी नहीं सुनते हैं तो यह चिंता का विषय है।

अंसारी ने अपनी नई किताब ‘डेयर आई क्वेस्चन’ के विमोचन से पहले आईएएनएस से विशेष बातचीत में कहा, “मोदी एक मजबूत नेता हैं। वह अपनी पार्टी के निर्विवाद नेता हैं। अगर उनकी बात नहीं सुनी जा रही है, तो यह गंभीर चिंता का विषय है। यह कहने की कोई जरूरत नहीं कि उनकी पार्टी के ही लोग उनकी बात नहीं मान रहे हैं। यह निष्कर्ष मैं नहीं निकाल रहा हूं।”

यह पुस्तक विभिन्न अवसरों पर अलग-अलग विषयों पर अंसारी द्वारा दिए गए भाषणों का संकलन है। उन्होंने कहा, “मैंने पुस्तक में विभिन्न मुद्दों पर प्रकाश डाला है, जैसे भारतीय होना क्या है, भारतीय राष्ट्रवाद क्या है या हम खुद को बहुलवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक क्यों कहते हैं।”

अंसारी ने जोर देकर कहा कि समाज में अहिष्णुता बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं कहा जा सकता कि मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद ही सांप्रदायिक विभाजन उभरा, बल्कि यह काफी लंबे समय से है।

उन्होंने कहा, “असहिष्णुता लंबे समय से हमारे समाज में रही है। लेकिन मुझे लगता है कि जब पानी का स्तर बढ़ता है, तो आप प्रारंभ में उसपर गौर नहीं करते हैं और यह बढ़ता जाता है। उसके बाद आपकी नजर उसपर पड़ती हैं, और आज यही हो रहा है।”

उन्होंने आईएएनएस से कहा, “हां, अतिसतर्कता (विजिलैंटिज्म) उफान पर है। इस बारे में राष्ट्रीय स्तर के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लिखा गया है। अंतर्राष्ट्रीय समाचार पत्रों ने कहा है कि इसमें वृद्धि हुई है। मैं कोई सटीक तारीख (कि पहली बार इसपर कब गौर किया गया था) .. विभिन्न अवसर, विभिन्न स्थान नहीं बता सकता । यह कई वर्षो से चल रहा है।”

कुछ राज्यों में गाय की तस्करी के संदेह में या गोमांस खाने के नाम पर अल्पसंख्यक समुदाय से संबंधित लोगों पर गैर कानूनी ढंग से हमले करने और उन्हें पीट-पीट कर मार डालने जैसी कई घटनाएं घटित हुई हैं।

क्या मोदी के सत्ता में आने के बाद इस तरह की घटनाएं बढ़ी हैं?

अंसारी ने कहा, “नहीं, नहीं। विफलता की दोषी हर सरकार रही है। हर बार कहीं न कहीं कोई सांप्रदायिक दंगा हुआ है, यह असहिष्णुता की अभिव्यक्ति है और दूसरा प्रशासन की विफलता है।”

अंसारी ने कहा, “आप देखिए कि दो लोगों के बीच हमेशा असहमति हो सकती है। सड़क पर दो साइकिलें आपस में टकराती हैं और वहां गाली-गलौच शुरू हो जाता है। लेकिन एक छोटी असहमति सांप्रदायिक दंगे का रूप ले ले, इसके लिए सोच और साजिश रचनी पड़ती है। और जहां भी इस तरह की साजिश होती है, समझिए कि वहां कानून-व्यवस्था विफल हुई है।”

तो क्या वह विलिलैंटिज्म में वृद्धि के लिए खासतौर से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली राज्य सरकारों की ओर इशारा कर रहे हैं? पूर्व राष्ट्रपति ने कहा, “देखिए, जहां भी ऐसा है, मैं वहां की सरकार की तरफ इशारा कर रहा हूं। चाहे यह असम, केरल में हो या पंजाब में। यह कोई मायने नहीं रखता। मैं राजनीतिक दलों को निशाना नहीं बना रहा, मैं प्रशासन को निशाना बना रहा हूं।”

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के एक कार्यक्रम में दो मई को अंसारी वहां मौजूद थे, और उस दौरान वहां हिंदूवादी गुंडे घुस गए थे। तो क्या उस घटना में स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत थी? अंसारी ने कहा कि वह इस तरह का निष्कर्ष निकालने से बचना चाहेंगे, लेकिन उन्होंने यह जरूर स्पष्ट किया कि जिन्ना का चित्र तो वहां व्यवधान पैदा करने का बहाना भर था।

उन्होंने कहा, “मैं उस तरह का निष्कर्ष नहीं निकालना चाहता। लेकिन मैं इतना जानता हूं कि मुझे वहां आमंत्रित किया गया था, और वहां व्यवधान पैदा किया गया। कार्यक्रम नहीं हो सका था। जिले के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने अगले दिन स्वीकार किया था कि बंदोबस्त विफल रहा और वह इसकी जांच करने जा रहे हैं।”

उन्होंने कहा, “मैं यह निष्कर्ष नहीं निकाल रहा हूं कि उपद्रवियों के साथ स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत थी। लेकिन मैं इसे शुद्ध रूप से प्रशासनिक विफलता मानता हूं। अब यह विफलता क्यों हुई, जांच से यह पता किया जाए।”

अंसारी ने कहा, “लेकिन हां, जिन्ना का चित्र मात्र बहाना था। यह लंबे समय से वहां है। जिस सज्जन ने चित्र पर आपत्ति खड़ा की, वह तीन साल तक एएमयू कोर्ट के सदस्य थे। आपने इसके बारे में क्या किया?”

एएमयू और जामिया मिलिया इस्लामिया का अल्पसंख्यक दर्जा समाप्त करने की दक्षिणपंथी नेताओं की मांग पर अंसारी ने कहा कि चूंकि सर्वोच्च न्यायालय में मामले की सुनवाई चल रही है, इसलिए उन्हें और अन्य किसी को भी इस पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए।

अगला लोकसभा चुनाव निकट है, लिहाजा वर्तमान सरकार की उपलब्धियों और विफलताओं को जांचना-परखना जरूरी लगता है। प्रधानमंत्री मोदी पाकिस्तान को लेकर एक कठोर नीति न अपनाने के लिए पूर्व की मनमोहन सिंह सरकार पर हमला बोलेते रहे हैं, तो क्या मौजूदा सरकार ने अपने चार साल के कार्यकाल के दौरान पाकिस्तान पर कोई ठोस, प्रभावी नीति बना पाई है?

पेशेवर राजनयिक रह चुके अंसारी ने कहा, “जहां तक मेरी समझ है पाकिस्तान को लेकर हमारी नीति ढुलमुल हैं। हम पेंडुलम की तरह एक बार इस तरफ जाते हैं फिर दूसरी तरफ चले जाते हैं। अगर यह नीति है, तो मान लीजिए कि हमारे पास एक नीति है। आप इसके बारे में क्या कर सकते हैं?”

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के समय अपनाई गई भारत की गुटनिरपेक्षता की पारंपरिक नीति बिल्कुल सही थी और इस नीति से दुनिया में देश को इज्जत भी मिली थी, लेकिन हाल के वर्षो में पड़ोसियों को लेकर भारत की नीति बुरी हालत में है।

उन्होंने कहा, “इस समय पड़ोसी देशों को लेकर हमारी नीति तनाव में नजर आती है। जो लोग इसके जानकार हैं, उन्होंने इस बारे में लिखा भी है।”

चीन के बढ़ते रसूख से निपटने के लिए क्या भारत पर्याप्त कोशिश कर रहा है?

अंसारी ने कहा, “यहां आईं सभी सरकारें इस बारे में बहुत सचेत रही हैं। चीन एक बड़ा पड़ोसी है। और चीन के साथ हमारे संबंध हैं, विभिन्न तरह के संबंध – राजनीतिक, सांस्कृतिक और यहां तक कि सैन्य संबंध भी। दोनों देश इस बात को समझते हैं कि हमारे बीच समस्याएं भी हैं, और हमारे बीच सकारात्मक संबंध भी हैं।”

–आईएएनएस

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