Gorakhpur Hospital Tragedy
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विपक्ष मान क्यों नहीं लेता कि योगी की शान में मासूमों ने बलिदान दिया?

यही वो सबसे शानदार मौका है, जब मोदी-योगी सरकार को लगे हाथ ये अध्यादेश जारी कर देना चाहिए कि चाहे कुछ भी हो जाए, किसी भी विरोधी नेता को भगवा ख़ानदान के नेताओं से इस्तीफ़ा माँगने का अधिकार नहीं होना चाहिए।

वक़्त से बड़ा ईमानदार और पारदर्शी मुंसिफ कोई और नहीं हो सकता! इसीलिए उत्तर प्रदेश की योगी सरकार अपनी शान में चाहे जितने क़सीदे गढ़े, लेकिन बेरहम वक़्त ने चुटकी बजाकर उनकी पोल खोल दी। मुख्यमंत्री के गृहनगर गोरखपुर के सबसे बड़े अस्पताल में मासूमों बच्चों की जान जाती रही, लेकिन बेशर्म सरकार के तमाम कर्ता-धर्ता इसकी ज़िम्मेदारी लेने के बजाय, ख़ुद के ख़िलाफ़ कार्रवाई करते हुए कम से कम इस्तीफ़ा देने जैसा काम करते तो एक बार को लगता कि उनका क़सूर कम है। लेकिन सरकार में बैठे बेहद ज़िम्मेदार लोगों ने सिर्फ़ दो मोर्चों पर अपने कर्तव्यों का सम्यक निर्वहन किया। पहला, राजनीतिक लीपा-पोती की सारी सीमाएँ लाँघ लो और दूसरा अपनी ख़ामियों के लिए भी विरोधियों में खोट ढूँढ़ने और उन पर ठीकरा फोड़ने की करतूतें करो।

चौतरफ़ा बेशर्मी के मौजूदा दौर में यक्ष प्रश्न तो ये खड़ा हो गया है कि योगी सरकार अभी तक ये हिम्मत क्यों नहीं जुटा सकी कि 63 मासूम बच्चों की मौत सरकार के शानदार कामकाज़ की वजह से हुई? अस्पताल में कोई अव्यवस्था और भ्रष्टाचार नहीं है। ये तथ्य मृतक बच्चों को बर्दाश्त नहीं हुआ। लिहाज़ा, उन्होंने अपने प्राणों की आहुति देने का मार्ग चुन लिया। विपक्ष को देश-प्रेम से ओत-प्रोत इन तथ्यों को समझना चाहिए और मौतों पर राजनीति करने से बाज़ आना चाहिए। विपक्ष को समझना चाहिए कि उसका काम राजनीति करना नहीं है, सरकार पर दबाव बनाना नहीं है, उसे भी योगी सरकार की तरह खुश और सन्तुष्ट होना चाहिए और मासूमों के बलिदान के प्रति आभारी होना चाहिए।

यही वो सबसे शानदार मौका है, जब मोदी-योगी सरकार को लगे हाथ ये अध्यादेश जारी कर देना चाहिए कि चाहे कुछ भी हो जाए, किसी भी विरोधी नेता को भगवा ख़ानदान के नेताओं से इस्तीफ़ा माँगने का अधिकार नहीं होना चाहिए। क्योंकि वो बाक़ायदा जनादेश लेकर सत्ता में पहुँचे हैं। ये बात अलग है कि बीते तीन सालों में बीजेपी ने कई बार जनादेश पर डकैती डालकर सत्ता हथियाई है। क़ानून ये भी बनना चाहिए कि यदि किसी भी मामले में किसी ग़ैर-भगवा नेता या सरकार का झूठा नाम भी उछले तो उसे फ़ौरन इस्तीफ़ा देकर सार्वजनिक जीवन में उच्च आदर्शों को स्थापित करना चाहिए।

शायद, यही वो असली वजह है जिसने दुनिया के सर्वश्रेष्ठ ट्वीटरबाज़ यानी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को खट से ट्वीट करने के लिए प्रेरित नहीं किया। वर्ना, हर छोटी-बड़ी बात पर सोशल मीडिया पर झूमने-नाचने की जो बीमारी नरेन्द्र मोदी को है, उसे देखते हुए तो अब तक मासूमों की मौत पर इत्मिनान होने के दर्जनों ट्वीट क्यों नहीं आ जाते? यही ग़ौर करने की बात ये भी है कि जब-जब भी मोदी सरकार के लिए शर्मिन्दगी की ख़बरें आती हैं, तब-तब प्रधान सेवक महाशय को साँप सूँघ जाता है। गोरक्षों के ताडंव और किसानों पर चली गोलियों के मामले में भी मोदी के बोल नहीं फूट पाये थे।

उत्तर प्रदेश की बागडोर जिस ढोंगी मुख्यमंत्री के हाथ में है, क्या अभी किसी ने उन्हें वैसे ही घड़ियाली आँसू बहाते देखा है, जैसा वो लोकसभा में बहा दिया करते थे। तब सांसद योगी पर कथित ज़ुल्म हो रहे थे।इसीलिए उन्होंने लोकसभा में पीड़ित होने का शानदार अभिनय किया था। योगी के खाते में आँसू बहाने की कई मिसाल है। लेकिन गोरखपुर में हुई मासूमों की मौत को लेकर उनकी अन्तरात्मा को कोई पीड़ा नहीं हुई। बीजेपी में अपनी कद्दावर हैसियत को लेकर अहंकार में जी रहे योगी आदित्यनाथ की हिम्मत नहीं है कि वो अपने स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह और उच्च शिक्षा मंत्री आशुतोष टंडन से इस्तीफ़ा ले सकें या उन्हें हटा सकें।

बीजेपी में सिद्धार्थ नाथ सिंह का खूँटा ख़ासा मज़बूत है। वो काँग्रेसी पृष्ठभूमि से भगवा बने नेता हैं। पार्टी के तमाम केन्द्रीय वो पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के नाती हैं, पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुनील शास्त्री के भाँजे हैं, इलाहाबाद में काँग्रेस के बड़े नेता रहे चौधरी नौनिहाल सिंह के पोते हैं। मोदी, जेटली, वेंकैया, अमित शाह जैसे बीजेपी के शीर्ष नेताओं से सिद्धार्थ की नज़दीकी रही है। इसीलिए योगी आदित्य नाथ के बस का नहीं है कि वो केन्द्रीय नेताओं के इशारे के बग़ैर उनका बाल भी बाँका कर सकें। यही हाल, आशुतोष टंडन का है, जो बीजेपी के वरिष्ठ नेता लाल जी टंडन के बेटे हैं। लाल जी टंडन सांसद तो रहे ही, उत्तर प्रदेश में बनी बीजेपी के हरेक सरकार में मंत्री भी रहे। लिहाज़ा, योगी के बूते का नहीं है कि वो आशुतोष के गिरेबान में हाथ डालने की सोच भी सकें।

इसीलिए, यदि किसी को ये अपेक्षा है कि गोरखपुर में हुए सरकारी हादसे की भेंट चढ़े मासूमों के मामले में योगी सरकार ज़रा भी पारदर्शिता से पेश आएगी तो आप उसके विवेक और बुद्धिमत्ता पर तरस खा सकते हैं। ऐसे लोगों को ये समझना पड़ेगा कि बीजेपी के नेता की चाहे जैसी करतूत की पोल खुल जाए, चाहे वो जैसे घोटालों या दुराचार में लिप्त पाये जाएँ, उनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं होती। मोदी सरकार के शुरुआती दौर में ही इससे सम्बन्धित नीति का ख़ुलासा वरिष्ठ नेता राजनाथ सिंह ने ये कहकर दिया था कि “एनडीए में नेताओं के इस्तीफ़े नहीं होते।” राजनाथ ने ये बयान तब दिया था, जब विपक्ष ने ललित मोदी कांड में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के इस्तीफ़े की माँग उठायी थी।

ललित मोदी प्रसंग के बाद भी दर्जनों घोटालों और भ्रष्टाचार के आरोप बीजेपी के मुख्यमंत्रियों और छोटे-बड़े मंत्रियों पर लगे। क़ानून और व्यवस्था की बदहाली के खूब मामले सामने आये, किसानों पर गोली बरसायी गयी, नोटबन्दी ने सौ से अधिक लोगों की जान ली, आन्तरिक सुरक्षा के लिहाज़ से ऐतिहासिक हमले हुए, दंगे और उपद्रव हुए, बाढ़ में सैंकड़ों लोग मारे गये, यहाँ तक कि मध्य प्रदेश में तो नरोत्तम मिश्रा जैसे नेता आज भी मंत्री है, जबकि उनके चुनाव को अवैध करार दिया जा चुका है। ऐसे असंख्य उदाहरण हैं। लेकिन जब इस्तीफ़ा माँगने की बात होगी तो लालू यादव के बेटों की ही बात होगी। जब क़ानून-व्यवस्था की बात होगी तो ममता बनर्जी सरकार को भंग कर वहाँ राष्ट्रपति शासन लगाने की बात होगी। लेकिन कभी किसी भगवा सरकार में कोई ख़ोट नज़र नहीं आएगा।

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