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मोदी राज की अद्भुत देन: ग्वालियर में ‘राष्ट्रभक्त’ बनाएँगे ‘भगवान गोडसे’ का मन्दिर!

उस दौर में इंडिया में अपनी कमज़ोर होती सत्ता को बचाने के लिए अँग्रेज़ों ने ‘फूट डालो और राज करो’ यानी Divide & Rule की नीति बनायी थी। इसके लिए वीर सावरकर के नेतृत्व वाले हिन्दू कट्टरपन्थियों और मोहम्मद अली जिन्ना की अगुवाई में मुस्लिम कट्टरपन्थियों का जमकर इस्तेमाल किया। दोनों संगठनों ने तब दुश्मनों के साथ मिलकर भारत माता को इतने गहरे ज़ख़्म दिये, जो मुल्क के बँटवारे के बाद भी कभी नहीं भर पाये।

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, ‘बापू! बापू! बापू!’ का जाप करने का कोई मौक़ा नहीं चूकते, लेकिन मोदी राज में ही महात्मा गाँधी के हत्यारे नाथू राम गोडसे की प्रतिमा पूज्यनीय हो जाती है…! यही है संघियों का रामराज्य और उनका दोग़लापन…! ये चले तो थे अयोध्या में राममन्दिर बनाने, वो भी ‘विकास’ के विकल्प के रूप में। लेकिन इन पर अब ग्वालियर में नाथू राम गोडसे का मन्दिर बनवाने का पाग़लपन सवार हो चुका है। सवा सौ करोड़ भारतवासियों को गोडसे के प्रस्तावित मन्दिर के ज़रिये ‘विकास की सुनामी’ से रूबरू करवाया जाएगा…!

हिन्दू महासभा के ग्वालियर स्थित देशभक्तों ने मध्य प्रदेश सरकार से नाथू राम गोडसे का भव्य मन्दिर बनवाने के लिए ज़मीन आबंटित करने की माँग की है। इस सारे प्रसंग ने ये साफ़ कर दिया है कि मोदी राज में सरकार, सत्ता, व्यवस्था, नियम, क़ायदा, क़ानून, शर्म-ओ-हया, नैतिकता, उसूल… सबका इक़बाल ख़त्म हो चुका है! इसीलिए तो अब भारतवर्ष में डंके की चोट पर गोडसे को ही पूजा जाएगा!

भारतीयों को संविधान में मूल अधिकारों की तहत धर्म और उपासना से सम्बन्धित जो आज़ादी दी गयी है, उसी के आधार पर जिसके जो जी में आये उसे वो अपनी आस्था बना सकता है! गाय तो कब की पशु से आस्था और आराध्य बन चुकी है! उसके गोबर का मान-सम्मान तो सदियों से है, लेकिन उसका मूत्र अब गंगा जल का दर्जा पा चुका है। तभी तो उसके घी से ऑक्सीजन पैदा हो रही है! मोर-मोरनी का वंश तो आँसुओं से बढ़ ही रहा है! धर्म-निरपेक्षता, एक झूठी धारणा है! भगवा ख़ानदान को ये सारा अलौकिक ज्ञान तो है लेकिन ये नहीं पता है कि समाज में बच्चों के प्रति होने वाले अपराधों में बाढ़ आयी हुई है। भ्रष्टाचार का तो देश से कब का सफ़ाया हो चुका है! अब तो सिर्फ़ ग़ैर-बीजेपी शासित राज्यों में ही उसके खंडहर नज़र आते हैं! अर्थव्यवस्था भले ही औंधे मुँह गिरी हुई हो, लेकिन भारतवासी बहुत ख़ुशहाल हैं, क्योंकि पहली बार देश में विकासोन्मुख सरकार का राज चल रहा है!

अभी बीजेपी की हरेक सरकार अपने-अपने क्षेत्र में ऐतिहासिक काम कर रही है। भले ही नज़र नहीं आये! जिन्हें ये दिखता नहीं वो काँग्रेसी दलाल हैं, भ्रष्ट हैं, राष्ट्रद्रोही हैं! देश में नोटबन्दी और खोटे जीएसटी के लागू होने से भले ही 20 लाख लोग बेरोज़गार हो गये लेकिन संघियों का दुष्प्रचार तो यही है कि भारत मज़बूत और ख़ुशहाल हो चुका है। इसीलिए, बेरोज़गार हुए लोग और उनके परिवार न तो भूखमरी से मर रहे हैं और ना ही किसानों की तरह आत्महत्या कर रहे हैं! वो तो पीढ़ियों से इतने सम्पन्न हैं कि उन्हें कमाने की ज़रूरत ही कहाँ है! इसीलिए नाथू राम गोडसे का भव्य मन्दिर बनवाने का अभी से बेहतर कोई और वक़्त नहीं हो सकता!

लेकिन गोडसे का मन्दिर बनाना ही पर्याप्त नहीं हो सकता। उसे जल्द से जल्द ‘भारत रत्न’ दिया जाना चाहिए। हिन्दुत्ववादियों की मोदी सरकार यदि ये नहीं करेगी तो फिर कौन करेगा! यही नहीं, महात्मा गाँधी को दिया गया ‘राष्ट्रपिता’ का सम्मान भी वापस ले लिया जाना चाहिए! भारतीय रुपये पर दिखने वाली महात्मा गाँधी की तस्वीर की जगह गोडसे की तस्वीर लगाने का वक़्त भी आ चुका है! यही वक़्त है जब महात्मा गाँधी के सहयोगियों जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल, सुभाष चन्द्र बोस, भीमराव आम्बेडकर वग़ैरह को व्याभिचारी बताया जाए! ये बातें आपको कपोल-कल्पना लग सकती हैं! लेकिन मोदी राज में जो हवा बह रही है, उसमें वो दिन दूर नहीं जब भाई-बहन, माँ-बेटा, बाप-बेटी सभी आपस में नर-मादा की तरह यौन सम्बन्ध रख सकेंगे और किसी न किसी कुतर्क की बदौलत हिन्दुत्ववादी उसे भी सही ठहराने लगेंगे! ये वही लोग हैं, जिन्हें जवाहर लाल नेहरू और उनकी बहन विजय लक्ष्मी पंडित में भी अवैध सम्बन्ध की बू लग जाती है, वो भी किसी सीडी के बग़ैर! ऐसी मानसिकताएँ ही इस तरह की दलीलें गढ़ सकती हैं कि भारत माता का असली सपूत तो नाथू राम गोडसे ही था! उसे हत्यारा नहीं कह सकते। क्योंकि ऐसे तो हमारे सारे देवी-देवता भी हत्यारे ही कहलाएँगे!

बात यहीं ख़त्म क्यों होंगी! गोडसे को महिमामंडित करते हुए भारत का राष्ट्रगान भी क्यों नहीं बदला जाना चाहिए? देश की असली प्रार्थना तो गोडसे-चालीसा होनी चाहिए! देश की जितनी भी सड़कों, भवनों, योजनाओं के नाम महात्मा गाँधी के नाम पर आधारित हैं, उन सबको भी बदलकर नाथू राम गोडसे के नाम पर किया जाना चाहिए! इतिहास में बदलाव लाकर ये लिखा जाना चाहिए कि नाथू राम गोडसे ही कलियुग का विष्णु अवतार यानी राम और कृष्ण का नया अवतार था! उसने गाँधी की हत्या इसीलिए की थी क्योंकि गाँधी ने भारत को आज़ाद करवाया था! गाँधी का ये आचरण देश, समाज, दुनिया और मानवता के लिए धिक्कार था। इसीलिए भगवान विष्णु ने गोडसे अवतार लेकर गाँधी का वध किया! यही वजह है कि गोडसे का मन्दिर बनाया जाना बेहद ज़रूरी है, ताकि संघी वहाँ पूजा-अर्चना करके सदियों से जारी चार-धाम यात्रा जैसा पुण्य बटोर सकें! लिहाज़ा, यदि आप सच्चे राष्ट्रभक्त हैं तो भव्य गोडसे मन्दिर के लिए अपना तन-मन-धन अर्पित कर दें!

यदि आपको लगता है कि गोडसे का भव्य मन्दिर बनाने को लेकर मोदी सरकार या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओर से कोई प्रतिक्रिया आएगी तो आप ग़लतफ़हमी के शिकार हैं! क्योंकि आपको मानकर चलना चाहिए कि सारे सत्ता प्रतिष्ठान की मौन-सहमति उन लोगों के साथ है, जो भगवान गोडसे का मन्दिर बनाना चाहते हैं! वैसे यदि मोदीजी आगामी चुनाव में सफ़ल हो गये तो जल्द ही आसाराम, राम रहीम जैसे दुष्कर्मी बाबाओं के भी भव्य मन्दिर बनवाएँ जाएँगे! ‘विकास’ का अगला सोपान यही होगा, क्योंकि इसी की बदौलत आपका महान भारत अब ‘विश्व गुरु’ बनने के क़गार पर है!

Image result for Quit India Movement mumbai 1942

बहरहाल, इतिहास साक्षी है कि जब काँग्रेस के बम्बई अधिवेशन में जब 8 अगस्त 1942 तो अँग्रेज़ों भारत छोड़ो (Quit India Movement) का नारा बुलन्द हुआ तो हिन्दू महासभा के अध्यक्ष विनायक दामोदर सावरकर ने देश भर के नगर निकायों और विधानसभाओं में विभिन्न पदों पर बैठे महासभा के कार्यकर्ता को एक पत्र लिखकर ‘Stick to Your Post’ यानी ‘अपने पद पर बने रहो’ का गुरुमंत्र दिया था! इसका मतलब है कि स्वतंत्रता आन्दोलन से दूर रहो! तब हिन्दू महासभा के नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी, बंगाल प्रोविन्स में फ़ज़लुल हक़ की कृषक प्रजा पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल थे। मुखर्जी ने तो भारत छोड़ो आन्दोलन के आग़ाज़ से ऐन पहले 26 जुलाई 1942 को ब्रिटिश सरकार को पत्र लिखकर उनसे हिदायत माँगी थी कि अगर काँग्रेस ने Quit India Movement का कॉल दे दिया तो उनकी सरकार को क्या करना चाहिए? भारत को आज़ाद करवाने में ऐसी ही सर्वश्रेष्ठ संघियों की भूमिका!

एक प्रसंग ये भी है कि जब काँग्रेस ने धर्म के आधार पर देश के बँटवारे के मोहम्मद अली जिन्ना के प्रस्ताव को नकार दिया था, तब वीर सावरकर, जिन्ना के फ़ॉर्मूले के समर्थक थे। इस फ़ॉर्मूले और मुल्क़ के बँटवारे के तरीक़े को लेकर महात्मा गाँधी और वीर सावरकर के बीच ज़ोरदार विरोधाभास पैदा हो गया। यही विरोध इतना प्रचंड और नृशंस था कि 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने हिन्दू महासभा के अन्य नेताओं जैसे दिगम्बर बड़गे, गोपाल गोडसे, नारायण आप्टे, विष्णु करकरे और मदनलाल पठवा के साथ मिलकर महात्मा गाँधी की हत्या को अंज़ाम दिया।

दरअसल, उस दौर में इंडिया में अपनी कमज़ोर होती सत्ता को बचाने के लिए अँग्रेज़ों ने ‘फूट डालो और राज करो’ यानी Divide & Rule की नीति बनायी थी। इसके लिए वीर सावरकर के नेतृत्व वाले हिन्दू कट्टरपन्थियों और मोहम्मद अली जिन्ना की अगुवाई में मुस्लिम कट्टरपन्थियों का जमकर इस्तेमाल किया। दोनों संगठनों ने तब दुश्मनों के साथ मिलकर भारत माता को इतने गहरे ज़ख़्म दिये, जो मुल्क के बँटवारे के बाद भी कभी नहीं भर पाये। गाँधी की हत्या के बाद सरदार पटेल ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को देश की एकता और अखंडता के लिए ख़तरनाक़ बताते हुए, इस पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। जो कई सालों बाद संघियों के उस माफ़ीनामे के बाद हटाया गया, जिसमें ये लिखकर दिया गया कि संघ, भारत के संविधान के प्रति निष्ठावान रहेगा। संघ पर लगे प्रतिबन्ध और महात्मा गाँधी की हत्या को लेकर पनपे राष्ट्रव्यापी आक्रोश की वजह से हिन्दू महासभा तक़रीबन विलुप्तप्राय हो गयी थी। लेकिन मोदी सरकार में हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण को भड़काने के लिए संघ की ओर से हिन्दू महासभा को ख़ासतौर पर प्राणवायु दी जा रही है। इसी रणनीति के तहत कट्टर हिन्दुत्ववादी लोग ‘गोडसे’ का महिमामंडन कर रहे हैं। लेकिन अफ़सोस कि मौजूदा युवा पीढ़ी न तो प्रमाणिक इतिहास पढ़ती है और न ही तथ्यों पर बहस करती है। इसीलिए, संघ जैसी दोगली शक्तियाँ भारत को तोड़ने में सफल हो रही हैं!

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‘मी टू मूवमेंट’ का एकजुट होकर समर्थन करना चाहिए : महेश भट्ट

“हमने यहां ‘जन्नत 2’ भी शूट की थी जिसके निर्देशक कुणाल देशमुख थे। वह बहुत काबिल निर्देशक हैं, मगर उन्होंने दिल्ली को पर्दे पर उस तरह से पेश नहीं किया जिस तरह पुष्पद्वीप ने किया है, क्योंकि इन्होंने उसे जिया है, और जब आप किसी चीज को महसूस करके फिल्माते हैं तो उसमें आपकी एक तड़प या महक आ जाती है।”

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नई दिल्ली, 16 अक्टूबर | फिल्मों के जरिए बेबाकी से सामाजिक मुद्दों को सुनहरे पर्दे पर उतारने वाले निर्माता-निर्देशक महेश भट्ट ने देश में चल रहे ‘मी टू मूवमेंट’ पर भी बेबाकी से अपनी राय दी है। उन्होंने कहा है कि यह कुछ ऐसा है, जिससे हम अलग-अलग विचार रखकर नहीं निपट सकते हैं। हमें पूरी जिम्मेदारी व एकजुटता के साथ इसका समर्थन करना चाहिए।

महेश भट्ट 12 अक्टूबर को रिलीज हुई अपनी होम प्रोडक्शन की फिल्म ‘जलेबी’ के प्रचार के लिए दिल्ली आए थे। उन्होंने बताया कि उनकी फिल्म में दिखाया गया प्यार किस तरह हिंदी फिल्मों में दिखाए जाने वाले पारंपरिक प्यार से अलग है।

महेश से जब पूछा गया कि फिल्म की कहानी अन्य प्रेम कहानियों से कितनी अलग है तो उन्होंने आईएएनएस को बताया, “हमारी फिल्म प्यार के उतार-चढ़ावों और उसकी बारीकियों से बड़ी हिम्मत से आंख मिलाती है। यह पारंपरिक हिंदी फिल्मों से इतर है। इसके अंत में लिखा आता है ‘एंड दे लिव्ड हैपिली एवर आफ्टर’। लेकिन वास्तव में प्यार परियों की कहानी से परे है। इंसानी सोच ने प्यार को शादी की परंपरा से जोड़ दिया, लेकिन प्यार तो कुदरत की देन है।

उन्होंने कहा, “आप देखें कि इस देश में राधा-कृष्ण के प्रेम को मंदिरों में बिठाया गया है, जबकि राधा-कृष्ण का प्यार शादी के बंधन तक सीमित नहीं था। हमारी फिल्म एक तरह से इसी तरह के प्यार और दो इंसानों की भावनाओं को पेश करती है।”

महेश कहते हैं, “फिल्म की सबसे खास बात यह है कि इसने नौजवान पीढ़ी को बहुत सम्मान दिया है। फिल्म के माध्यम से बताया गया है कि यह आज के दौर के जो युवा हैं या दर्शक हैं, वे जिंदगी से जुड़ी इस गहरी बात को समझेंगे।”

‘जलेबी’ के पोस्टर ने सुर्खियां और विवाद दोनों बटोरे थे। इसमें फिल्म की हीरोइन ट्रेन की खिड़की से चेहरा निकालकर हीरो को ‘किस’ करती नजर आती है। इसका जिक्र करने पर महेश हंसते हुए कहते हैं, “यह मार्केटिंग की जरूरत थी कि हम फिल्म की पहली ऐसी तस्वीर जारी करें, जिससे हल्ला मच जाए और देखिए आज आप भी यही सवाल पूछ रही हैं।..दरअसल, जब से हमारे संचार के माध्यम बदले हैं और हम शब्दों से तस्वीरों पर आए हैं, तब से अभिव्यक्ति ज्यादा असरदार हो गई है। तस्वीरों का असर ज्यादा होता है..उसका मिजाज कुछ अलग होता है। वास्तव में यह तस्वीर महिलाओं की आजादी को प्रतिबिंबित करती है।”

फिल्म की पृष्ठभूमि पुरानी दिल्ली है। इसके पीछे की वजह पूछे जाने पर महेश ने कहा, “इसका श्रेय फिल्म के निर्देशक (पुष्पदीप भारद्वाज) को जाता है। इनकी परवरिश पुरानी दिल्ली की जिन गलियों में हुई है, उन्होंने उन्हीं गलियों को पर्दे पर उतारा है। कोई शख्स जब किसी दौर में जिन पलों को जीता है तो जब वह उन्हें पर्दे पर उतारता है तो उसकी अदा कुछ और होती है।

महेश कहते हैं, “हमने यहां ‘जन्नत 2’ भी शूट की थी जिसके निर्देशक कुणाल देशमुख थे। वह बहुत काबिल निर्देशक हैं, मगर उन्होंने दिल्ली को पर्दे पर उस तरह से पेश नहीं किया जिस तरह पुष्पद्वीप ने किया है, क्योंकि इन्होंने उसे जिया है, और जब आप किसी चीज को महसूस करके फिल्माते हैं तो उसमें आपकी एक तड़प या महक आ जाती है।”

‘मी टू मूवमेंट’ के बारे में आलिया भट्ट के पापा ने कहा, “हमें इस पहल का समर्थन करना चाहिए। यहां हमें अपनी जिम्मेदारी भी निभाने की जरूरत है। हम अलग-अलग राय रखकर इस समस्या का हल नहीं निकाल सकते, हम संवेदना और समझदारी के साथ इसका समाधान तलाशना होगा।”

–आईएएनएस

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‘आयुष्मान योजना काफी नहीं, लोगों को मिले स्वास्थ्य का अधिकार’

मेट्रो शहरों में इसकी स्थिति अलग होगी क्योंकि गांवों और छोटे शहरों की तुलना में इन शहरों में महिलाओं और पुरुषों की आमदनी अधिक है।

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Picture Credit : Quartz

नई दिल्ली, 17 अक्टूबर | देश में एक तरफ जहां महिला सशक्तिकरण का बड़ा जोरो-शोरो से ढिंढोरा पीटा जाता है, वहीं एक विश्वविद्यालय की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, देश में कामकाजी 92 प्रतिशत महिलाओं को प्रति माह 10,000 रुपये से भी कम की तनख्वाह मिलती है। इस मामले में पुरुष थोड़ा बेहतर स्थिति में हैं। लेकिन हैरत की बात यह है कि 82 प्रतिशत पुरुषों को भी 10,000 रुपये प्रति माह से कम की तनख्वाह मिलती है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के सतत रोजगार केंद्र ने श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) पर आधार पर स्टेट ऑफ वर्किं ग इंडिया, 2018 एक रिपोर्ट तैयार की है, जिसमें उन्होंने देश में कामकाजी पुरुषों और महिलाओं पर आंकड़े तैयार किए हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2015 में राष्ट्रीय स्तर पर 67 प्रतिशत परिवारों की मासिक आमदनी 10,000 रुपये थी जबकि सातवें केंद्रीय वेतन आयोग (सीपीसी) द्वारा अनुशंसित न्यूनतम वेतन 18,000 रुपये प्रति माह है। इससे साफ होता है कि भारत में एक बड़े तबके को मजदूरी के रूप में उचित भुगतान नहीं मिल रहा है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लिबरल स्टडीज, अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर और देश में बढ़ती बेरोजगारी पर से पर्दा उठाने वाली स्टेट ऑफ वर्किं ग इंडिया, 2018 रिपोर्ट के मुख्य लेखक अमित बसोले ने बेंगलुरू से आईएएनएस को ई-मेल के माध्यम से बताया, “यह आंकड़े श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) पर आधारित है। यह आंकड़े पूरे भारत के हैं।”

उन्होंने कहा, “मेट्रो शहरों में इसकी स्थिति अलग होगी क्योंकि गांवों और छोटे शहरों की तुलना में इन शहरों में महिलाओं और पुरुषों की आमदनी अधिक है।”

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया, 2018 रिपोर्ट के मुताबिक, चिंता की बात यह है कि विनिर्माण क्षेत्र में भी 90 प्रतिशत उद्योग मजदूरों को न्यूनतम वेतन से नीचे मजदूरी का भुगतान करते हैं। असंगठित क्षेत्र की हालत और भी ज्यादा खराब है। अध्ययन के मुताबिक, तीन दशकों में संगठित क्षेत्र की उत्पादक कंपनियों में श्रमिकों की उत्पादकता छह प्रतिशत तक बढ़ी है, जबकि उनके वेतन में मात्र 1.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

क्या आप मानते हैं कि शिक्षित युवाओं के लिए वर्तमान हालात काफी खराब हो चुके हैं, जिस पर सहायक प्रोफेसर अमित बसोले ने कहा, “आज की स्थिति निश्चित रूप से काफी खराब है, खासकर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में। हमें उन कॉलेजों से बाहर आने वाले बड़ी संख्या में शिक्षित युवाओं का बेहतर उपयोग करने की आवश्यकता है।”

इस स्थिति को कैसे बेहतर बनाया जा सकता है, के सवाल पर उन्होंने आईएएनएस को बताया, “स्थिति को बेहतर बनाने के लिए कुछ उपाय किए जा सकते हैं, जैसे अगर सरकार सीधे गांवों व छोटे शहरों में रोजगार पैदा करे, इसके साथ ही बेहतर बुनियादी ढांचे (बिजली, सड़कों) उपलब्ध कराएं और युवाओं को कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध को सुनिश्चित करें, जिससे कुछ हद तक हालात सुधर सकते हैं।”

श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) के मुताबिक, 2015-16 के दौरान, भारत की बेरोजगारी दर पांच प्रतिशत थी जबकि 2013-14 में यह 4.9 फीसदी थी। रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि बेरोजगारी दर शहरी क्षेत्रों (4.9 फीसदी) की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों (5.1 फीसदी) नें मामूली रूप से अधिक है।

अध्ययन के मुताबिक, पुरुषों की तुलना में महिलाओं के बीच बेरोजगारी दर अधिक है। राष्ट्रीय स्तर पर महिला बेरोजगारी दर जहां 8.7 प्रतिशत है वहीं पुरुषों के बीच यह दर चार प्रतिशत है। काम में लगे हुए व्यक्तियों में से अधिकांश व्यक्ति स्वयं रोजगार में लगे हुए हैं। राष्ट्र स्तर पर 46.6 प्रतिशत श्रमिकों स्वयं रोजगार में लगे हुए हैं, इसके बाद 32.8 प्रतिशत सामयिक मजदूर हैं।

अध्ययन के मुताबिक, भारत में केवल 17 प्रतिशत व्यक्ति वेतन पर कार्य करते हैं और शेष 3.7 प्रतिशत संविदा कर्मी हैं।

–आईएएनएस

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नई नौकरियां नहीं पैदा हुई, देश में बढ़ी बेरोजगारी दर

श्रम मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, कई सालों तक बेरोजगारी दर दो से तीन प्रतिशत के आसपास रहने के बाद साल 2015 में पांच प्रतिशत पर पहुंच गई, इसके साथ ही युवाओं में बेरोजगारी की दर 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

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unemployment in India

नई दिल्ली/बेंगलुरू, 16 अक्टूबर | अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के सतत रोजगार केंद्र की एक हालिया रिपोर्ट में बेरोजगारी दर के 20 वर्षो में सबसे अधिक होने की बात कही गई है। रिपोर्ट के मुख्य लेखक ने भारत में बेरोजगारी दर के बढ़ने की वजह नौकरियों के सृजन की गति धीमी होना, कार्यबल बढ़ने के बजाए कम होना और शिक्षित युवाओं के तेजी से श्रमबल में शामिल होने को बताया है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लिबरल स्टडीज, अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर और देश में बढ़ती बेरोजगारी पर से पर्दा उठाने वाली स्टेट ऑफ वर्किं ग इंडिया, 2018 रिपोर्ट के मुख्य लेखक अमित बसोले ने बेंगलुरू से आईएएनएस को ई-मेल के माध्यम से बताया, “यह आंकड़े श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) पर आधारित है।”

श्रम मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, कई सालों तक बेरोजगारी दर दो से तीन प्रतिशत के आसपास रहने के बाद साल 2015 में पांच प्रतिशत पर पहुंच गई, इसके साथ ही युवाओं में बेरोजगारी की दर 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

अमित बसोले ने कहा, “देश में बढ़ती बेरोजगारी के पीछे दो कारक हैं, पहला 2013 से 2015 के बीच नौकरियों के सृजन की गति धीमी होना, कार्यबल बढ़ने के बजाए कम होना क्योंकि कुल कार्यबल (नौकरियों में लगे लोगों की संख्या) बढ़ने की बजाय घट गया है। दूसरा कारक यह है कि श्रम बल में प्रवेश करने वाले अधिक शिक्षित युवा, जो उपलब्ध किसी भी काम को करने के बजाय सही नौकरी की प्रतीक्षा करना पसंद करते हैं।”

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया, 2018 रिपोर्ट में कहा गया है कि 2015 में बेरोजगारी दर पांच प्रतिशत थी, जो पिछले 20 वर्षो में सबसे ज्यादा देखी गई है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वृद्धि के परिणामस्वरूप रोजगार में वृद्धि नहीं हुई है। अध्ययन के मुताबिक, जीडीपी में 10 फीसदी की वृद्धि के परिणामस्वरूप रोजगार में एक प्रतिशत से भी कम की वृद्धि हुई है। रिपोर्ट में बढ़ती बेरोजगारी को भारत के लिए एक नई समस्या बताया गया है।

इन हालात से निपटने के लिए क्या सरकार ने पर्याप्त कदम उठाए हैं, इस पर अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर अमित बसोले ने बताया, “इन हालात पर सरकार के प्रदर्शन का मूल्यांकन करना थोड़ा मुश्किल है, विशेष रूप से 2015 के बाद क्योंकि उसके बाद से सरकार ने समग्र रोजगार की स्थिति पर कोई डेटा जारी नहीं किया है। सेंटर फॉर मॉनीटरिंग द इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) जैसे निजी स्रोतों के उपलब्ध डेटा से पता चलता है कि नौकरियों का सृजन कमजोर ही बना रहेगा। सीएमआईई डेटा यह भी इंगित करता है कि नोटबंदी के परिणामस्वरूप नौकरियों में कमी आई है, सरकार ने इस पर भी कोई डेटा जारी नहीं किया है।”

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2018 की रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में अंडर एंप्लॉयमेंट और कम मजदूरी की भी समस्या हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त और युवाओं में बेरोजगारी 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है। बेरोजगारी पूरे देश में हैं, लेकिन इससे सबसे ज्यादा प्रभावित देश के उत्तरी राज्य हैं।

अमित बसोले ने यह भी कहा कि भारत के नौकरी बाजार की प्रकृति बदल गई है क्योंकि बाजार में अब अधिक शिक्षित लोग आ चुके हैं, वह उपलब्ध किसी भी काम को करने के बजाय सही नौकरी की प्रतीक्षा करना पसंद करते हैं। उन्होंने कहा, “पिछले दशक में श्रम बाजार बदल गया है, विभिन्न डिग्रियों के अनुरूप रोजगार पैदा नहीं हुए हैं।”

हालात को सामान्य बनाने के लिए किस तरह के कदम उठाए जाने चाहिए, इस सवाल पर रिपोर्ट के मुख्य लेखक ने आईएएनएस को बताया, “यह हालात को सामान्य बनाने का सवाल नहीं है। इसके बजाय, हमें एक उचित राष्ट्रीय रोजगार नीति विकसित करने की आवश्यकता है, जो केंद्र द्वारा आर्थिक नीति बनाने में नौकरियों का सृजन करेगी।”

–आईएएनएस

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