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मोदी राज की अद्भुत देन: ग्वालियर में ‘राष्ट्रभक्त’ बनाएँगे ‘भगवान गोडसे’ का मन्दिर!

उस दौर में इंडिया में अपनी कमज़ोर होती सत्ता को बचाने के लिए अँग्रेज़ों ने ‘फूट डालो और राज करो’ यानी Divide & Rule की नीति बनायी थी। इसके लिए वीर सावरकर के नेतृत्व वाले हिन्दू कट्टरपन्थियों और मोहम्मद अली जिन्ना की अगुवाई में मुस्लिम कट्टरपन्थियों का जमकर इस्तेमाल किया। दोनों संगठनों ने तब दुश्मनों के साथ मिलकर भारत माता को इतने गहरे ज़ख़्म दिये, जो मुल्क के बँटवारे के बाद भी कभी नहीं भर पाये।

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, ‘बापू! बापू! बापू!’ का जाप करने का कोई मौक़ा नहीं चूकते, लेकिन मोदी राज में ही महात्मा गाँधी के हत्यारे नाथू राम गोडसे की प्रतिमा पूज्यनीय हो जाती है…! यही है संघियों का रामराज्य और उनका दोग़लापन…! ये चले तो थे अयोध्या में राममन्दिर बनाने, वो भी ‘विकास’ के विकल्प के रूप में। लेकिन इन पर अब ग्वालियर में नाथू राम गोडसे का मन्दिर बनवाने का पाग़लपन सवार हो चुका है। सवा सौ करोड़ भारतवासियों को गोडसे के प्रस्तावित मन्दिर के ज़रिये ‘विकास की सुनामी’ से रूबरू करवाया जाएगा…!

हिन्दू महासभा के ग्वालियर स्थित देशभक्तों ने मध्य प्रदेश सरकार से नाथू राम गोडसे का भव्य मन्दिर बनवाने के लिए ज़मीन आबंटित करने की माँग की है। इस सारे प्रसंग ने ये साफ़ कर दिया है कि मोदी राज में सरकार, सत्ता, व्यवस्था, नियम, क़ायदा, क़ानून, शर्म-ओ-हया, नैतिकता, उसूल… सबका इक़बाल ख़त्म हो चुका है! इसीलिए तो अब भारतवर्ष में डंके की चोट पर गोडसे को ही पूजा जाएगा!

भारतीयों को संविधान में मूल अधिकारों की तहत धर्म और उपासना से सम्बन्धित जो आज़ादी दी गयी है, उसी के आधार पर जिसके जो जी में आये उसे वो अपनी आस्था बना सकता है! गाय तो कब की पशु से आस्था और आराध्य बन चुकी है! उसके गोबर का मान-सम्मान तो सदियों से है, लेकिन उसका मूत्र अब गंगा जल का दर्जा पा चुका है। तभी तो उसके घी से ऑक्सीजन पैदा हो रही है! मोर-मोरनी का वंश तो आँसुओं से बढ़ ही रहा है! धर्म-निरपेक्षता, एक झूठी धारणा है! भगवा ख़ानदान को ये सारा अलौकिक ज्ञान तो है लेकिन ये नहीं पता है कि समाज में बच्चों के प्रति होने वाले अपराधों में बाढ़ आयी हुई है। भ्रष्टाचार का तो देश से कब का सफ़ाया हो चुका है! अब तो सिर्फ़ ग़ैर-बीजेपी शासित राज्यों में ही उसके खंडहर नज़र आते हैं! अर्थव्यवस्था भले ही औंधे मुँह गिरी हुई हो, लेकिन भारतवासी बहुत ख़ुशहाल हैं, क्योंकि पहली बार देश में विकासोन्मुख सरकार का राज चल रहा है!

अभी बीजेपी की हरेक सरकार अपने-अपने क्षेत्र में ऐतिहासिक काम कर रही है। भले ही नज़र नहीं आये! जिन्हें ये दिखता नहीं वो काँग्रेसी दलाल हैं, भ्रष्ट हैं, राष्ट्रद्रोही हैं! देश में नोटबन्दी और खोटे जीएसटी के लागू होने से भले ही 20 लाख लोग बेरोज़गार हो गये लेकिन संघियों का दुष्प्रचार तो यही है कि भारत मज़बूत और ख़ुशहाल हो चुका है। इसीलिए, बेरोज़गार हुए लोग और उनके परिवार न तो भूखमरी से मर रहे हैं और ना ही किसानों की तरह आत्महत्या कर रहे हैं! वो तो पीढ़ियों से इतने सम्पन्न हैं कि उन्हें कमाने की ज़रूरत ही कहाँ है! इसीलिए नाथू राम गोडसे का भव्य मन्दिर बनवाने का अभी से बेहतर कोई और वक़्त नहीं हो सकता!

लेकिन गोडसे का मन्दिर बनाना ही पर्याप्त नहीं हो सकता। उसे जल्द से जल्द ‘भारत रत्न’ दिया जाना चाहिए। हिन्दुत्ववादियों की मोदी सरकार यदि ये नहीं करेगी तो फिर कौन करेगा! यही नहीं, महात्मा गाँधी को दिया गया ‘राष्ट्रपिता’ का सम्मान भी वापस ले लिया जाना चाहिए! भारतीय रुपये पर दिखने वाली महात्मा गाँधी की तस्वीर की जगह गोडसे की तस्वीर लगाने का वक़्त भी आ चुका है! यही वक़्त है जब महात्मा गाँधी के सहयोगियों जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल, सुभाष चन्द्र बोस, भीमराव आम्बेडकर वग़ैरह को व्याभिचारी बताया जाए! ये बातें आपको कपोल-कल्पना लग सकती हैं! लेकिन मोदी राज में जो हवा बह रही है, उसमें वो दिन दूर नहीं जब भाई-बहन, माँ-बेटा, बाप-बेटी सभी आपस में नर-मादा की तरह यौन सम्बन्ध रख सकेंगे और किसी न किसी कुतर्क की बदौलत हिन्दुत्ववादी उसे भी सही ठहराने लगेंगे! ये वही लोग हैं, जिन्हें जवाहर लाल नेहरू और उनकी बहन विजय लक्ष्मी पंडित में भी अवैध सम्बन्ध की बू लग जाती है, वो भी किसी सीडी के बग़ैर! ऐसी मानसिकताएँ ही इस तरह की दलीलें गढ़ सकती हैं कि भारत माता का असली सपूत तो नाथू राम गोडसे ही था! उसे हत्यारा नहीं कह सकते। क्योंकि ऐसे तो हमारे सारे देवी-देवता भी हत्यारे ही कहलाएँगे!

बात यहीं ख़त्म क्यों होंगी! गोडसे को महिमामंडित करते हुए भारत का राष्ट्रगान भी क्यों नहीं बदला जाना चाहिए? देश की असली प्रार्थना तो गोडसे-चालीसा होनी चाहिए! देश की जितनी भी सड़कों, भवनों, योजनाओं के नाम महात्मा गाँधी के नाम पर आधारित हैं, उन सबको भी बदलकर नाथू राम गोडसे के नाम पर किया जाना चाहिए! इतिहास में बदलाव लाकर ये लिखा जाना चाहिए कि नाथू राम गोडसे ही कलियुग का विष्णु अवतार यानी राम और कृष्ण का नया अवतार था! उसने गाँधी की हत्या इसीलिए की थी क्योंकि गाँधी ने भारत को आज़ाद करवाया था! गाँधी का ये आचरण देश, समाज, दुनिया और मानवता के लिए धिक्कार था। इसीलिए भगवान विष्णु ने गोडसे अवतार लेकर गाँधी का वध किया! यही वजह है कि गोडसे का मन्दिर बनाया जाना बेहद ज़रूरी है, ताकि संघी वहाँ पूजा-अर्चना करके सदियों से जारी चार-धाम यात्रा जैसा पुण्य बटोर सकें! लिहाज़ा, यदि आप सच्चे राष्ट्रभक्त हैं तो भव्य गोडसे मन्दिर के लिए अपना तन-मन-धन अर्पित कर दें!

यदि आपको लगता है कि गोडसे का भव्य मन्दिर बनाने को लेकर मोदी सरकार या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओर से कोई प्रतिक्रिया आएगी तो आप ग़लतफ़हमी के शिकार हैं! क्योंकि आपको मानकर चलना चाहिए कि सारे सत्ता प्रतिष्ठान की मौन-सहमति उन लोगों के साथ है, जो भगवान गोडसे का मन्दिर बनाना चाहते हैं! वैसे यदि मोदीजी आगामी चुनाव में सफ़ल हो गये तो जल्द ही आसाराम, राम रहीम जैसे दुष्कर्मी बाबाओं के भी भव्य मन्दिर बनवाएँ जाएँगे! ‘विकास’ का अगला सोपान यही होगा, क्योंकि इसी की बदौलत आपका महान भारत अब ‘विश्व गुरु’ बनने के क़गार पर है!

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बहरहाल, इतिहास साक्षी है कि जब काँग्रेस के बम्बई अधिवेशन में जब 8 अगस्त 1942 तो अँग्रेज़ों भारत छोड़ो (Quit India Movement) का नारा बुलन्द हुआ तो हिन्दू महासभा के अध्यक्ष विनायक दामोदर सावरकर ने देश भर के नगर निकायों और विधानसभाओं में विभिन्न पदों पर बैठे महासभा के कार्यकर्ता को एक पत्र लिखकर ‘Stick to Your Post’ यानी ‘अपने पद पर बने रहो’ का गुरुमंत्र दिया था! इसका मतलब है कि स्वतंत्रता आन्दोलन से दूर रहो! तब हिन्दू महासभा के नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी, बंगाल प्रोविन्स में फ़ज़लुल हक़ की कृषक प्रजा पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल थे। मुखर्जी ने तो भारत छोड़ो आन्दोलन के आग़ाज़ से ऐन पहले 26 जुलाई 1942 को ब्रिटिश सरकार को पत्र लिखकर उनसे हिदायत माँगी थी कि अगर काँग्रेस ने Quit India Movement का कॉल दे दिया तो उनकी सरकार को क्या करना चाहिए? भारत को आज़ाद करवाने में ऐसी ही सर्वश्रेष्ठ संघियों की भूमिका!

एक प्रसंग ये भी है कि जब काँग्रेस ने धर्म के आधार पर देश के बँटवारे के मोहम्मद अली जिन्ना के प्रस्ताव को नकार दिया था, तब वीर सावरकर, जिन्ना के फ़ॉर्मूले के समर्थक थे। इस फ़ॉर्मूले और मुल्क़ के बँटवारे के तरीक़े को लेकर महात्मा गाँधी और वीर सावरकर के बीच ज़ोरदार विरोधाभास पैदा हो गया। यही विरोध इतना प्रचंड और नृशंस था कि 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने हिन्दू महासभा के अन्य नेताओं जैसे दिगम्बर बड़गे, गोपाल गोडसे, नारायण आप्टे, विष्णु करकरे और मदनलाल पठवा के साथ मिलकर महात्मा गाँधी की हत्या को अंज़ाम दिया।

दरअसल, उस दौर में इंडिया में अपनी कमज़ोर होती सत्ता को बचाने के लिए अँग्रेज़ों ने ‘फूट डालो और राज करो’ यानी Divide & Rule की नीति बनायी थी। इसके लिए वीर सावरकर के नेतृत्व वाले हिन्दू कट्टरपन्थियों और मोहम्मद अली जिन्ना की अगुवाई में मुस्लिम कट्टरपन्थियों का जमकर इस्तेमाल किया। दोनों संगठनों ने तब दुश्मनों के साथ मिलकर भारत माता को इतने गहरे ज़ख़्म दिये, जो मुल्क के बँटवारे के बाद भी कभी नहीं भर पाये। गाँधी की हत्या के बाद सरदार पटेल ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को देश की एकता और अखंडता के लिए ख़तरनाक़ बताते हुए, इस पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। जो कई सालों बाद संघियों के उस माफ़ीनामे के बाद हटाया गया, जिसमें ये लिखकर दिया गया कि संघ, भारत के संविधान के प्रति निष्ठावान रहेगा। संघ पर लगे प्रतिबन्ध और महात्मा गाँधी की हत्या को लेकर पनपे राष्ट्रव्यापी आक्रोश की वजह से हिन्दू महासभा तक़रीबन विलुप्तप्राय हो गयी थी। लेकिन मोदी सरकार में हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण को भड़काने के लिए संघ की ओर से हिन्दू महासभा को ख़ासतौर पर प्राणवायु दी जा रही है। इसी रणनीति के तहत कट्टर हिन्दुत्ववादी लोग ‘गोडसे’ का महिमामंडन कर रहे हैं। लेकिन अफ़सोस कि मौजूदा युवा पीढ़ी न तो प्रमाणिक इतिहास पढ़ती है और न ही तथ्यों पर बहस करती है। इसीलिए, संघ जैसी दोगली शक्तियाँ भारत को तोड़ने में सफल हो रही हैं!

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लोकतंत्र से बची है भारत की राजनीतिक अस्मिता

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भारत में विरोध और किसी न किसी हिस्से में लगातार दंगे-फसाद के बावजूद देश की एक राजनीतिक सत्ता क्यों बरकरार है? एक शब्द में उत्तर है, लोकतंत्र।

भारत में लोकतंत्र का प्रयोग अप्रतिम रहा है। यह न सिर्फ निर्वाचक वर्ग के आकार और राजनीतिक दलों की संख्या को लेकर है, बल्कि यह उपयोगी बन गया है और इसका भारतीयकरण हो चुका है। संसदीय लोकतंत्र का वेस्टमिन्स्टर मॉडल रायसीना मॉडल में परिवर्तित हो गया है। चुनाव प्रक्रिया व वोट बैंकों के जरिये सुधार लाकर सामाजिक समता का लक्ष्य का हासिल किया गया न कि प्रत्यक्ष व एकपक्षीय शासनात्मक कार्रवाई की गई, जोकि इतिहास में आमतौर पर देखने को मिलता है। मिसाल के तौर पर तुकी के राष्ट्रपति कमाल अतातुर्क ने अपने कार्यकाल में तुर्की में सुधार लाया था।

प्राचीन भारत में लोकतंत्र के अस्तित्व का कोई प्रमाण नहीं है। आज के उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ हिस्सों में उस समय गणतंत्र थे। उन राज्यों में कोई राजा नहीं, बल्कि शासक हुआ करते थे, जोकि एक प्रकार का कुलीनतंत्र था। वहां सारी जनता शासकों को नहीं चुनती थी।

वाकई वर्गीकृत सामाजिक व्यवस्था में शासकों के चुनाव का समान अधिकार का विचार अनोखा होगा। वे राजतंत्र के बजाय कुलीन तंत्र और लोकतंत्र के बजाय गणतंत्र थे। पचायतों में भी, चाहे वह किसी जाति की पंचायत हो या फिर गांव की, वृद्ध एवं ज्यादा शक्तिशाली आदमी पंच होते थे। आज हम वैसा ही खाप पंचायतों में देखते हैं। खाप पंचायतें एक जाति के बुजुर्गो व श्रेष्ठ लोगों की कमेटियां हैं जो उस जाति के सदस्यों के अच्छे व्यवहार के दस्तूर तय करती हैं। लोकतंत्र गंणतंत्रवाद से बिल्कुल अलग है। ग्रेट ब्रिटेन गणतंत्र होने के बावजूद एक लोकतंत्र है।

संविधानसभा के सदस्यों का सबसे विलक्षण कार्य सर्वजनीन वयस्क मताधिकार प्रदान करने का फैसला था। सदस्य खुद भी एक निर्वाचक मंडल के जरिये चुने गए थे, जो बहुत ज्यादा प्रतिबंधित था। सर्वजनीन वयस्क मताधिकार के विरुद्ध कई दलीलें दी गईं।

उदारण के तौर पर निरक्षरता, क्योंकि स्वतंत्रता के समय भारत में महज 12 फीसदी लोग ही साक्षर थे। वर्तमान में देश की साक्षरता दर 75 फीसदी है। इसके अलावा 1947 तक पूरी दुनिया में कुछ ही देशों ने महिलाओं को वोट देने का अधिकार दिया था। यूके में 1928 में महिलाओं को पूरा मताधिकार प्रदान किया गया था, जबकि फ्रांस में 1946 में दिया गया। भारत ने शीघ्र ही महिलाओं को मताधिकार प्रदान किया, जबकि इससे पहले उनके पास कोई तजुर्बा नहीं था।

उच्च या निम्न जाति, सवर्ण और दलित, आदिवासी देश के सभी नागरिकों को वयस्क होने पर मताधिकार प्रदान किया गया। रामराज्य की पुरानपंथी कल्पना में कभी ऐसी समानता को स्वीकृति नहीं दी गई होगी। यह एक बड़ा समतावादी कदम था।

पूर्ण वयस्क मताधिकार के साथ लोकतंत्र को तरजीह देना कोई एक हादसा नहीं था। आधिकारिक सुधारों में मताधिकार को प्रतिबंधित रखा गया था। लेकिन 1921 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष बनने के बाद महात्मा गांधी ने इस पार्टी को विशिष्ट वर्गो की पार्टी से बदलकर जनसामान्य की पार्टी बना दी थी। उनके संचालन में कांग्रेस ने स्थानीय स्तर पर पार्टी के सभी सदस्यों को उच्च पदों पर अपने प्रतिनिधि चुनने के लिए वोट डालने का अधिकार प्रदान किया था। कांग्रेस ने अपने सदस्यों से को चार आना यानी 24 पैसे की सदस्यता शुल्क लेकर उन्हें वयस्क मताधिकार प्रदान किया था। जाहिर है कि जब कांग्रेस सत्ता में आई तो यह (वयस्क मताधिकार) सबको प्रदान किया गया।

दूसरा कारक भी था, जिसे स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में कम महत्व दिया गया। यह राजनीतिक दलों के नेताओं अनुभव था, जो उन्होंने आधिकारिक विधानमंडलों में हिस्सा लेने से प्राप्त किया था। उनमें गोपाल कृष्ण गोखले, सर श्रीनिवास शास्त्री, चित्तरंजन दास, मोतीलाल नेहरू, तेज बहादुर सप्रू और विट्ठलभाई पटेल जैसे अनुभवी व संसदीय मामलों में दक्ष व्यक्ति थे।

निर्वाचक वर्ग छोटे थे और चयनित भारतीय लोगों के पास कम शक्ति थी। एजेंडा कार्यकारिणी के नियंत्रण में होता था (जो स्वतंत्र भारत में अभी भी बरकरार है)। लेकिन संसदीय कार्य में हिस्से लेने वाले नेताओं ने विधेयक बनाने, पास करने, बजट पर बहस करने जैसे और भी कई प्रकार की जानकारी हासिल की थी। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान 1921 में संवैधानिक व आंदोलनकारी पक्षों के बीच अल्पकालिक बिखराब हुआ था, जब गांधी ने अहसयोग का आह्वान किया और 1937 में कांग्रेस ने विधानमंडल में हिस्सा लिया था।

उस दौरान कांग्रेस नेता सी. आर. दास और मोतीलाल नेहरू ने स्वराज पार्टी का गठन करने के बाद निर्वाचन में हिस्सा लिया था। दरअसल, स्वतंत्रता प्राप्त के समय अनेक नेता संसदीय मामलों में अनुभवी हो गए थे। जैसे हर बिलास सारडा ने अधिनियम पार करवाकर समाजिक सुधार का लक्ष्य हासिल किया था। सारडा विधेयक केंद्रीय विधानसभा में 1927 में प्रस्तुत किया गया था और उसे 1929 में पास किया गया, जिसके माध्यम से बाल विवाह पर रोक लगाई गई। भारत ब्रिटिश संसदीय लोकतंत्र को अपनाने के लिए तैयार था।

(लेखक प्रख्यात बुद्धिजीवी, अर्थशास्त्र के प्रोफेसर और 1971 से ब्रिटिश लेबर पार्टी के सदस्य हैं। पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया की अनुमति से देसाई की पुस्तक ‘द रायसीना मॉडल’ का अंश)

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भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी समस्या: तुम करो तो रासलीला, हम करें तो कैरेक्टर ढीला!

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जिन लोगों ने भारत को आज़ाद करवाने के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया, उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि आज़ादी के महज 70 साल बाद ही उनके वंशजों की राजनीति का सबसे बड़ा सूक्ति वाक्य होगा, ‘तुम करो तो रासलीला, हम करें तो कैरेक्टर ढीला!’ इसे ही शायर अकबर इलाहाबादी (1846-1921) ने कहा कि ‘वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती, हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम!’ दरअसल, भारतीय राजनीति अब बात का बतंगड़ बनाने की सारे सीमाएँ तोड़ चुकी है।

प्रधानमंत्री को ‘नीच’ कहा गया, लेकिन उन्होंने उसे ‘नीच कुल’ बना दिया। मणि शंकर अय्यर के बयान से मोदी इतनी बुरी तरह आहत हुए कि वो गुजरात की जनता के आगे वैसे ही सुबकते हुए अपनी चोट दिखाने लगे जैसे कोई छोटा बच्चे रोते हुए अपने भाई-बहनों या संगी-साथी से झगड़े की शिकायतें परिवार के बड़ों से करता है! इसकी पृष्ठभूमि वो झुझलाहट है जो मोदी को गुजरात के चुनावी माहौल में झेलनी पड़ रही है। इसीलिए चुनावी रैली में मोदी कहते हैं कि ‘श्रीमान मणिशंकर अय्यर ने आज कहा कि मोदी नीच है। मोदी नीच जाति का है। क्या यही भारत की महान परम्परा है? ये गुजरात का अपमान है। मुझे तो मौत का सौदागर तक कहा जा चुका है। गुजरात की सन्तानें इस तरह की भाषा का तब जवाब दे देगी, जब चुनाव के दौरान कमल का बटन दबेगा। मुझे भले ही नीच कहा है। लेकिन आप लोग अपनी गरिमा मत छोड़िएगा।’

मोदी का ये बयान एक-पक्षीय है। उनकी पार्टी का प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हा, जहाँ उन्हीं के नक्शे-क़दम पर चलते हुए टीवी कैमरे के सामने भावुकता के आँसू बहाता नज़र आता है, वहीं इसी शख़्स को काँग्रेस और राहुल गाँधी को ‘बाबर भक्त’ और ‘ख़िलज़ी के रिश्तेदार’ कहते शर्म नहीं आयी। अभी-अभी गुजरात में ही राहुल को ढोंगी हिन्दू, नकली जनेऊधारी कहने वालों को क्या नरेन्द्र मोदी ने लताड़ लगायी? मोदी ये करते कैसे! वो तो ख़ुद अव्वल दर्जे के बड़बोले हैं। उन्होंने राहुल के शिव-भक्त होने पर चटकारें लीं। काँग्रेस के संगठन चुनाव और राहुल गाँधी के नामांकन को ‘औरंगज़ेब राज’ कहा। ये मोदी ही थे जिन्होंने शशि थरूर की पत्नी को 50 करोड़ की गर्लफ्रेंड कहा था।

अभी-अभी केन्द्रीय खेल मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने काँग्रेस पार्टी को ‘ईस्ट इंडिया कम्पनी’ कह डाला। इससे पहले सोनिया गाँधी को विदेशी, इटालियन जैसी कितनी ही बातें संघियों ने बोली। सुषमा स्वराज ने भी 2004 में अपना सिर मुड़ाने की धमकी दी थी। अभी-अभी अमित शाह ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को ‘नमूना’ कहा। उन्हें देहाती औरत, मौनी बाबा, नपुसंक, साला, नामर्द वग़ैरह कितने ही विशेषणों से यही संघी नवाज़ चुके हैं। अमित शाह ने ही महात्मा गाँधी के लिए ‘चतुर बनिया’ जैसे बाज़ारू शब्दों का इस्तेमाल किया। तब भगवा ख़ानदान के बुज़ुर्गों और संस्कारी लोगों ने अपने चेले-चपाटियों को भाषायी संयम के उपदेश क्यों नहीं दिये? सच्चाई ये है कि संघियों के गन्दे बोल ने भारतीय राजनीति से सौहार्द ख़त्म कर दिया।

ऐसा भी नहीं है कि बीजेपी के छुटभैय्ये नेताओं के अंटशंट बयान को काँग्रेसी नेताओं की ओर से प्रतिक्रियात्मक जबाव नहीं मिला। गुजरात दंगों पर जिस तरह से लीपापोती की गयी उसे देखते हुए नरेन्द्र मोदी को ‘मौत का सौदागर’ कहा गया। 2014 के चुनाव से पहले मणिशंकर अय्यर ने कहा था कि ‘मोदी चुनाव नहीं जीतने वाले। अलबत्ता, वो चाहें तो यहाँ काँग्रेस के अधिवेशन में आकर चाय ज़रूर बेच सकते हैं।’ इस बयान को तोड़मरोड़कर मोदी ने ख़ुद को ‘चायवाला’ बना लिया। अभी गुजरात की रैली में ही मोदी ने मणिशंकर अय्यर के हमले का जबाव देते हुए कहा कि ‘उनमें मुग़लों के संस्कार हैं। इसलिए वह इस तरह की बातें करते हैं। देश के पीएम के लिए ऐसे शब्द सिर्फ़ ऐसा ही व्यक्ति कह सकता है, जिसके संस्कारों में खोट हो।’ यहाँ मोदी ने अय्यर के संस्कारों पर हमला किया वो तो ठीक है, लेकिन उन्हें मुग़लों के संस्कार वाला बताने की क्या ज़रूरत थी?

यहाँ ये भी समझना बहुत ज़रूरी है कि आख़िर मणिशंकर अय्यर ने ऐसा क्या कहा था कि उन्हें राहुल गाँधी के दख़ल के बाद माफ़ी भी माँगनी पड़ी  और 75 साल की उम्र में पार्टी से निलम्बित होने की सज़ा भी मिली। अय्यर ने कहा था कि ‘मोदी को गाँधी परिवार के बारे में उस वक़्त ऐसी गन्दी बातें करने की क्या ज़रूरत थी जब दिल्ली में आम्बेडकर की याद में एक बड़े भवन का शुभारम्भ हो रहा है। इससे तो मुझे लगता है कि ये (मोदी) बहुत नीच किस्म का आदमी है। इसमें कोई सभ्यता नहीं है। ऐसे मौके पर ऐसी गन्दी राजनीति की क्या आवश्यकता है?’ यहाँ ये जानना भी दिलचस्प है कि ‘नीच’ स्वभाव को ज़ाहिर करने के लिए शब्दकोष में दर्जनों समानार्थी शब्द हैं। अँग्रेज़ी में तो इसके लिए कम से कम 74 शब्द हैं, जिन्हें इस लेख में अन्त में दिया भी गया है।

इससे पहले समारोह में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जवाहर लाल नेहरू पर भीमराव आम्बेडकर के साथ पक्षपात करने और उनकी भूमिका को कम करके दिखाने का आरोप मढ़े थे। उससे पहले मोदी ने सरदार पटेल और सुभाष चन्द्र बोस जैसे काँग्रेस के बड़े नेताओं को लेकर भी ख़ूब झूठी बातें की हैं। सच तो ये भी है कि संघ-बीजेपी के नेताओं की एक स्थायी नीति रही है ‘विरोधियों का चरित्रहनन’ करने की। बीजेपी के कुछ नेताओं ख़ासकर साक्षी महाराज, गिरिराज सिंह और विनय कटियार जैसे लोगों की तो पहचान की सिर्फ़ बिगड़े बोलों की वजह से है। संघ-बीजेपी के लिए सैकड़ों लोगों को बाक़ायदा ग़ालियाँ और अपशब्द लिखने के लिए भर्ती किया गया है। इनका काम ही है ‘विरोधियों का चरित्रहनन करना’ और उसे सोशल मीडिया पर फैलाना।

समाज में भी अब ऐसा नहीं रहा कि आप किसी को अपशब्द बोलेंगे और उससे प्रतिक्रिया नहीं मिलेगी। कभी ‘ग़ाली’ का जबाव ‘बड़ी ग़ाली’ बनता है, तो कभी ग़ाली-गलौज़ की वजह से ही मारपीट की नौबत आ जाती है। लगातार लोगों के दिमाग़ में जहर भरने से एक उन्मादी फ़ौज तैयार हो जाती है, जो ज़रा सा इशारा मिलने ही साम्प्रदायिक दंगों को जन्म देती है। ज़रूरत पड़ने पर इसी उन्मादी मानसिकता से वो कारसेवक पैदा होते हैं, जो कुछ ही घंटों में बाबरी मस्जिद को नेस्तनाबूद कर देते हैं। यही मानसिकता कुछ लोगों को आतंकवाद की ओर भी ले जाती है। लगातार लोगों के दिमाग़ में ज़हर भरने के नतीज़े वैसे ही भयावह होते हैं, जैसा हमने अभी-अभी मेवाड़ के राजसमन्द ज़िले में मेवाड़ी युवक शम्भू लाला रेगर की बर्बरता के रूप में देखा है, जिसने माल्दा के 50 वर्षीय मज़बूर अफ़राज़ुल को पीट-पीटते मार जाने के बाद उस पर पेट्रोल डालकर आग लगा दी। इसीलिए राजनीति के इतने छिछोरे स्तर तक गिर जाने को यदि आप हँसी-मज़ाक या लतीफ़ेबाज़ी समझकर नज़रअन्दाज़ करना चाहते हैं, तो याद रखिए कि लोकतंत्र के लिए अमर्यादित शब्द बेहद घातक साबित हो रहे हैं। क्योंकि यदि जहरीली बयानबाज़ियाँ बन्द नहीं हुईं तो वो दिन भी दूर नहीं जब हम अपने नेताओं को एक-दूसरे के ख़ून का प्यासा बनकर हाथों में नंगी तलवार लिये घूमता देखेंगे। यदि किसी को ये लगता है कि बयान-वीरों को सुधारने का काम उनकी पार्टियाँ ही कर लेंगी तो वो मुग़ालते में है। यदि ये मुमकिन होता तो राजनीति के अपराधीकरण पर भी नकेल कस ली जाती। नेताओं को सुधारने का काम जनता को ही करना होगा। चाहे इसमें वक़्त जो भी लगे। जनता को अनर्गल बयान देने वालों से नफ़रत करना सीखना होगा। चुनाव में उन्हें हराना होगा।

Hindi to English with Synonyms

– नीच

[neech]

1. lowly: नीच, नम्र, अधीन, नीचा, अधम

2. wretched: नीच, अतिदुखी, घृणायोग्य, निकम्मा, अधम

3. low: निम्न, नीच, हल्का, सामान्य

4. cowardly: कायर, नीच

5. craven: डरपोक, नीच, उत्साहहीन

6. degenerate: भ्रष्ट, कुलाचार, अपकृष्ट, अधम, नीच

7. demiss: आत्‍म-समर्पणशील, नीच, अघम, पतित

8. execrable: घृणित, गर्हणीय, नीच, अधम

9. hang dog: कमीना, नीच, अधम

10. humble: नीच, क्षुद्र, अल्पमति, विनयशील

11. low clown: दीनहीन, नीच, कमीना

12. mingy: नीच, कमीना

13. pleb: नीच, घटिया व्यक्ति, निम्‍न वर्ग का व्‍यक्ति

14. proletarian: साधारण, नीच

15. sorry: नीच, दुःखी, शोकार्त, अधम

16. slavish: कमीना, दासवत, दास सम्बन्धी, नीच, परिश्रमी

17. sneak: नीच, अधम मनुष्य, मुखबिर, चुगलखोर

18. lousy: घटिया, गंदा, नीच, घिनावना, बीभत्स से भरपूर

– नीच

adjective

1. vile: नीच, घिनौना, नीचतापूर्ण, पाजी

2. despicable: नीच, घिनौना, कुत्सित, नफ़रत पैदा करनेवाला, तिरस्कार-योग्य

3. dishonorable: नीच, लज्जाजनक, अपमानपूर्ण, बेइज़्ज़त

4. ignoble: नीच, अकुलीन, अप्रतिष्ठित

5. sneaky: डरपोक, नीच, चापलूस, पाजी, ख़ुशामदी

6. sordid: घिनौना, नीच, पतित

7. moldy: खोटा, फफूंदी लगा हुआ, पुराने ढंग का, नीच, बुरा, पुराने फ़ैशन का

8. reprobate: नीच, पाजी, नीचतापूर्ण

9. poky: सँकरा, नीच, तंग, तुच्छ, गंदा, कम

10. miscreant: नीच, भ्रष्ट, पाजी

11. fiendish: पैशाचिक, नीच, दुष्ट

12. shabby: जर्जर, नीच, दरिद्र, कंजूस, मलीन, अन्यायी

13. mean: नीच, मध्य, तुच्छ, बीच का, मंझला, अधम

14. pitchy: नीच, रालयुक्त, राल का, रालदार, चिपचिपा, लसदार

15. sneaking: चापलूस, छिपा हुआ, नीच, पाजी, गुप्त

16. base: आधारभूत, बुनियादी, नीच, खोटा, क्षुद्र

17. villainous: शरारतपूर्ण, नीच, दुर्जनोचित, घिनौना, बुरा

18. ribald: नीच, अशिष्ट

19. dirty: गंदा, मैला, मलिन, नीच, मैली, गंदला

20. pitiful: दयापूर्ण, रहमदिल, कृपालु, दयालू, नीच, पाजी

21. ghoulish: घृणास्पद, घिनौना, शैतान का, दुष्ट, नीच, पिशाच का

22. dastardly: कायर, नीच, नीचतापूर्ण, डरपोक

23. scabby: खुजलीवाला, नीच, खुजली का, पपड़ीदार, रूखा

24. nasty: बुरा, दुष्ट, नीच, घिनौना, घृणास्पद

25. hangdog: नीच, पाजी, नीचतापूर्ण

26. picayune: छोटा, निकम्मा, नीच, पाजी, तुच्छ

27. unblooded: नीचा, नीच, अशुद्ध, अधम, ख़राब

28. scurvy: रूसीदार, पाजी, अशिष्ट, बेअदब, रक्तस्राव रोग का, नीच

29. nefarious: कुटिल, बेईमान, नीच, खोटा

30. abject: अधम, नीच

31. meanspirited: कंजूस, पाजी, लोभी, नीच, नीचतापूर्ण

32. scummy: झागदार, फेनिल, नीच, पाजी

33. paltry: तुच्छ, क्षुद्र, निकम्मा, नीच

34. shocking: भयानक, घिनौना, दिल दहलानेवाला, घृणाजनक, बीभत्स, नीच

35. unroyal: नीच

36. plebeian: लौकिक, असभ्य, नीच, अशिष्ट, सामान्य मनुष्य-संबंधी

37. bass: नीच

38. scoundrelly: नीच, अधम, पाजी, दुष्ट

39. undeveloped: अविकसित, पिछड़ा हुआ, अधकचरा, अनुन्नत, नीच

40. doggerel: खोटा, भद्दा, बेजोड़, असंगत, बेहूदा, नीच

41. rotting: पाजी, नीच, नीचतापूर्ण

42. stingy: कंजूस, नीच, मक्खीचूस, डंक मारनेवाला

43. third-rate: ख़राब, बुरा, नीच

44. dishonourable: नीच, लज्जाजनक, अपमानपूर्ण, बेइज़्ज़त

45. mouldy: खोटा, फफूंदी लगा हुआ, पुराने ढंग का, नीच, बुरा, पुराने फ़ैशन का

46. noun – नीच

47. reprobate: नीच, बदमाश, पाजी, कापुस्र्ष

48. miscreant: नीच, बदमाश, कापुस्र्ष, पाषंडी, नीच मनुष्य, विधर्मी

49. scoundrel: बदमाश, लुच्चा, दुष्ट, नीच, लफ़ंगा, दुरात्मा

50. rascal: दुष्ट, पापी, नीच, धूर्त व्यक्ति

51. rotter: बदमाश, कापुस्र्ष, पाजी, नीच

52. dog: कुत्ता, नीच, शूर, पाजी, बदमाश, लौंडा

53. pimp: दलाल, कुटना, भड़ुआ, पाजी, नीच, बदमाश

54. sycophant: चापलूस, अति अनुरोधी, चुगलखोर, नीच

55. groveller: अधम, नीच

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गुजरात में साम्प्रदायिक कार्ड खेलने के लिए ही नरेन्द्र मोदी को याद आया औरंगज़ेब

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modi

आख़िरकार, नरेन्द्र मोदी ने काँग्रेस की तुलना औरंगज़ेब से कर ही दी। 4 दिसम्बर को मोदी ने गुजरात के धरमपुर की चुनावी रैली में कहा, ‘जहाँगीर की जगह जब शाहजहाँ आये, क्या तब इलेक्शन हुआ था? शाहजहाँ की जगह जब औरंगज़ेब आये, क्या तब कोई इलेक्शन हुआ था? बादशाह हैं, उनकी औलाद को ही सत्ता मिलेगी। ये औरंगज़ेब राज उनको मुबारक़!’ लगता है, बड़बोले मोदी ने अपना ये वाहियात बयान पहले से तैयार कर रखा था।

मोदी ने जिन वंशवादी मुस्लिम शासकों जहाँगीर और शाहजहाँ का नाम लिया, उनकी छवि इंसाफ़-पसन्द और कुशल-प्रशासक की रही है। वैसे तो ये गुण औरंगज़ेब में भी थे। लेकिन अपनी धार्मिक असहिष्णुता की नीति की वजह से इतिहास में औरंगज़ेब की छवि एक क्रूर शासक की बनी। ख़ासकर, इसलिए भी, क्योंकि उसके बाप-दादा-परदादा का इक़बाल उदार और समावेशी मुस्लिम शासकों का था। हिन्दुओं पर धार्मिक टैक्स ‘जजिया’ लगाकर औरंगज़ेब ने ख़ूब बदनामी बटोरी। सत्ता संघर्ष की ख़ातिर अपने पिता को क़ैद करने और भाईयों को मौत के घाट उतारने के लिए भी वो कुख़्यात रहा। हालाँकि, प्राचीन हिन्दू शासक अशोक महान ने भी अपने पिता जरासन्ध की हत्या करके सत्ता हथियाई थी, तो मध्यकाल में दर्जनों हिन्दू-मुसलिम राजवंशों में भी क़रीबी रिश्तेदारों ने बग़ावतबाज़ी की थी। लेकिन संघियों को हिन्दू अशोक की महत्वाकांक्षा जहाँ स्वाभाविक लगती है, वहीं औरंगज़ेब जैसे मुस्लिम शासकों के मामले में उसका रवैया बिल्कुल उल्टा रहा है। इतना ही नहीं, देश में असंख्य हिन्दू राजवंश भी रहे हैं, लेकिन वंशवाद को कोसने ने लिए मोदी ने इरादतन हिन्दू राजाओं का ज़िक्र नहीं करके, मुसलिम औरंगज़ेब की ही बात की। ये पूरी तरह से सियासी दाँव है। इसका मक़सद साम्प्रदायिक नफ़रत को फ़ैलाना है, ताकि गुजरात की बिगड़ी हवा में बीजेपी के लिए कुछ फ़ायदा बटोरा जा सके।

मुग़लिया इतिहास में औरंगज़ेब को रावण की तरह सबसे घटिया स्थान मिला। वो बात अलग है कि सीता रूपी नारी की इज़्ज़त से खेलने वाले करोड़ों लुच्चे-लफ़ंगे रूपी रावण आज भी हमें ग़ली-ग़ली में दिखते रहते हैं। लेकिन जनता को इनमें उस रावण का अक्स नहीं दिखायी देता, जिसका हरेक दशहरे पर तमाम पाखंडों के साथ दहन किया जाता है! वो रावण, विद्वान, शिवभक्त और ब्राह्मण था। सीता के प्रति उसके बर्ताव ने उसे बुराई का सबसे बड़ा प्रतीक बना दिया। उसी तरह, क्रूरता और असहिष्णुता का सर्वोच्च तमग़ा, औरंगज़ेब के ख़ाते में आया। रावण की तरह औरंगजेब की ख़ूबियाँ भी उसे कोई सम्मान नहीं दिला सकीं। मसलन, औरंगज़ेब बहुत साधारण जीवन जीता था। वो सरकारी ख़जाने की एक पाई का भी निजी इस्तेमाल नहीं करता था। अपनी निजी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए औरंगज़ेब छिपकर जालीदार टोपियाँ बनाता था। फिर उन टोपियों को भेष-बदलकर ज़ायरीनों को बेचता था। इससे होने वाली कमाई से ही वो अपना निजी ख़र्च चलाता था। यही नहीं, मुग़ल परम्परा से उलट औरंगज़ेब की ख़्वाहिश थी कि उसे खुले आकाश के नीचे ही दफ़नाया जाए और उसका कोई मक़बरा वगैरह नहीं बने। ऐसा ही हुआ भी।

उसी औरंगज़ेब की कट्टर मुसलमान वाली छवि को नरेन्द्र मोदी ने बहुत चतुराई से राहुल गाँधी और काँग्रेस पर चस्पाँ किया है। ऐसा करके वो काँग्रेस की कथित हिन्दू विरोधी और मुसलिम-परस्त छवि को हवा देना चाहते हैं। ताकि, ‘संघी ट्रोल’ तरह-तरह का जहर उगलकर उनके मंसूबों को पूरा करते रहें। गुजरात चुनाव को देखते हुए संघ-बीजेपी की यही सोच धार्मिक ध्रुवीकरण को उकसाने के लिए उपयोगी साबित हो सकती है। लेकिन किसी भी क़ीमत पर चुनावी जंग को जीतने के लक्ष्य की वजह से प्रधानमंत्री को इस बात का कोई अख़्तियार नहीं हो सकता कि वो अपने प्रतिद्वन्दी का चरित्रहनन करने के लिए किसी भी सीमा को पार कर जाएँ।

मोदी का बयान राजनीतिक शिष्टाचार के भी सर्वथा ख़िलाफ़ है। काँग्रेस पार्टी के गौरवशाली इतिहास पर वंशवाद की आड़ में ‘औरंगज़ेब-राज’ की कालिख़ पोतना भी उम्दा शील-स्वभाव का प्रतीक नहीं हो सकता। आने वाले दिनों में यही गन्दगी कई और रूपों में दिखायी देगी, क्योंकि जब प्रधानमंत्री अपने विरोधी के लिए अशिष्ट शब्दावली अपनाएँगे तो उनकी पार्टी के बाक़ी नेता तो उनसे भी चार क़दम आगे निकलने की कोशिश करेंगे। लिहाज़ा, आने वाले दिनों में और सिरफिरे तथा जहरीले बयान सुनने के लिए तैयार रहिए!

संघियों को अपने विरोधियों के चरित्रहनन का चस्का इन्दिरा गाँधी के ज़माने में लगा। इन्दिरा का चरित्रहनन करने के लिए संघियों ने उन्हें वंशवादी कहना शुरू किया। हालाँकि, नेहरू और शास्त्री के ज़माने में काँग्रेस के अलग-अलग लोग अध्यक्ष बने। तब काँग्रेस का सांगठनिक ढाँचा तमाम क्षेत्रीय क्षत्रपों के इक़बाल से मिलकर बनता था। हालाँकि, आगामी पीढ़ियों में ये बदलता चला गया। ये भी जगज़ाहिर सच है कि महात्मा गाँधी, सरदार बल्लभभाई पटेल, भीम राव आम्बेडकर, लाल बहादुर शास्त्री, सुभाष चन्द्र बोस, राजेन्द्र प्रसाद वग़ैरह की तरह जवाहर लाल नेहरू ने भी अपने जीते-जी अपनी सन्तानों को पिता के नाम पर राजनीति चमकाने पर मौक़ा नहीं दिया। वो भी तब जबकि इन सभी नेताओं की सन्तानों ने भी आज़ादी की लड़ाई में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया था।

नेहरू के ज़िन्दा रहते इन्दिरा सक्रिय राजनीति में आना चाहती थीं लेकिन नेहरू ने उन्हें टिकट नहीं पाने दिया। यही हाल सरदार पटेल की बेटी-बेटे का भी था। पटेल के निधन के बाद नेहरू ने उनकी सन्तानों को सांसद बनवाया। लाल बहादुर शास्त्री के आकस्मिक निधन के बाद, काँग्रेस के संगठन पर क़ाबिज़ कद्दावर नेताओं ने ‘गूंगी गुड़िया’ इन्दिरा गाँधी को प्रधानमंत्री बनवा दिया। लेकिन सरकार के काम में संगठन की दख़लंदाज़ी को लेकर इन्दिरा की अपने ही नेताओं से दूरी बनती गयी। ये कटुता इतनी बढ़ी कि 1969 में इन्दिरा को काँग्रेस से निकाल भी दिया गया।

1971 के चुनाव में इन्दिरा सबसे बड़ी नेता बनकर उभरीं। लेकिन 1977 में जनता पार्टी से मिली क़रारी शिकस्त के बाद एक बार फिर उनकी पार्टी ने उनसे दामन छुड़ा लिया। फिर 1980 में इन्दिरा गाँधी पुनर्जीवित होकर सत्ता में लौटीं। तब तक राजनीति में विचारधारा और वफ़ादारी कई करवटें ले चुकी थी। तब काँग्रेस ऐसी पार्टी बन गयी जिसकी इन्दिरा, सिर्फ़ आलाक़मान ही नहीं बल्कि सर्वे-सर्वा थीं। 1984 में इन्दिरा गाँधी की हत्या तक काँग्रेस ने तरह-तरह के परिवर्तन देखे। इसीलिए उनकी मृत्यु के वक़्त उनके इर्द-गिर्द रहने वाले वफ़ादारों ने राजीव गाँधी को उनका उत्तराधिकारी बना दिया।

इस वंशवादी उत्तराधिकार की सबसे बड़ी वजह ये थी कि इन्दिरा काल में ही भारतीय राजनीति को करिश्माई नेताओं के पीछे चलने की लत लग चुकी थी। इसीलिए वफ़ादारों ने राजीव को ऐसे नेता के रूप में स्थापित किया जिसमें नेहरू और इन्दिरा का असली अक्स हो। राजीव के काँग्रेस अध्यक्ष और प्रधानमंत्री बनते ही संघियों ने वंशवाद के पुराने ढोल को और ज़ोर-ज़ोर से पीटना शुरू कर दिया। वही सिलसिला आज तक बदस्तूर ज़ारी है। मज़े की बात ये है कि इन्दिरा-राजीव के दौर में ही बीजेपी और कम्युनिस्टों को छोड़ देश की हरेक छोटी-बड़ी पार्टी में वंशवादी प्रवृत्ति स्थापित हो चुकी थी। यही ढर्रा आज भी है।

वंशवाद को लेकर संघ-बीजेपी हमेशा मुखर रहे हैं। हालाँकि, भगवा ख़ानदान में भी बाप की विरासत को भुनाने की प्रथा अब अच्छी तरह से स्थापित हो चुकी है। तकनीकी रूप से इसमें कोई बुराई नहीं है। भारतीय जनमानस ने भी वंशवाद को कभी ख़राब नहीं माना। बशर्ते, वंशवादी वारिसों में जनसमर्थन पाने का माद्दा हो। आज़ादी के बाद से अब तक हज़ारों मंत्रियों ने अपनी औलादों को राजनीति में आगे बढ़ाने की कोशिश की। लेकिन कामयाबी सिर्फ़ मुट्ठी भर नेताओं की औलादों के ही हाथ लगी। जनता ने हर नेता के बेटे-बेटी को पसन्द नहीं किया। बहुत सारी नेता-संतति धूल-धूसरित हो गयी और आगे भी होती रहेगी।

लोकतंत्र में माँ-बाप की वजह से किसी की पहचान बनना तो आसान है, लेकिन उसे भी चुनाव और जनता की कसौटी पर ख़रा तो उतरना ही होगा। अभी राहुल गाँधी, काँग्रेस अध्यक्ष बने। लेकिन उनका दबदबा अनन्तकाल तक नहीं रह सकता। राहुल भी तब तक ही सहूलियत से शीर्ष पर रह पाएँगे, जब तक उनमें अपने उम्मीदवारों को जिताने की क्षमता दिखायी देती रहेगी। राजीव और सोनिया को भी ऐसी ही अग्निपरीक्षा से गुज़रना पड़ा था। राहुल भी इससे बच नहीं सकते। हाँ, इतना ज़रूर है कि गाँधी परिवार के वारिसों को नरसिम्हा राव और सीता राम केसरी जैसे परिवार के बाहर के नेताओं के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा मौके मिलते रहेंगे! इसे वंशवाद की वजह से हासिल विशेषाधिकार की तरह देखा जा सकता है। लेकिन यदि काँग्रेसी, राहुल गाँधी को अपना नेता मानने को तैयार हैं, तो इसके लिए बीजेपी के पेट में दर्द क्यों होना चाहिए? अरे संधियों, जैसे तुम्हें अपना संघ-परिवार पसन्द है, वैसे ही काँग्रेसियों को उनका गाँधी-परिवार प्रिय है! तो फिर परिवारवाद के नाम पर विधवा-विलाप क्यों?

दरअसल, बीजेपी चाहे जितना ढोल पीटे कि उसने ‘काँग्रेस मुक्त भारत’ बना दिया है। लेकिन संघ-बीजेपी को भी अच्छी तरह से पता है कि वो काँग्रेसियों की तरह सबको साथ लेकर राज करने का कौशल नहीं रखते। उन्हें अपने अस्तित्व के लिए साम्प्रदायिक उन्माद का सहारा लेना ही पड़ेगा। यदि साम्प्रदायिकता की भट्ठी नहीं धधकेगी तो बीजेपी का वज़ूद ही ख़तरे में पड़ जाएगा। इन्दिरा, राजीव और सोनिया काल के कटु अनुभवों से बीजेपी बख़ूबी जानती है कि देश में सिर्फ़ काँग्रेस और गाँधी परिवार में उसके वर्चस्व को ख़त्म करने का दमख़म है। क्योंकि काँग्रेस चाहे जितनी कमज़ोर दिखती हो, देश भर में इसकी जड़ें सबसे गहरी हैं। इसीलिए चरित्रहनन रूपी संघियों की चिर-परिचित तोप का मुँह फ़िलहाल राहुल गाँधी की तरफ़ है। इसीलिए उन्हें ‘पप्पू’ बनाकर वैसे ही पेश किया जाता है, जैसे सोनिया गाँधी को विदेशी और राजीव को अनाड़ी बनाकर पेश किया गया था। इसी साज़िश  के तहत, मनमोहन सिंह जैसे दक्ष नेता को भी कभी गूँगा, तो कभी दस जनपथ का तनख़्यया, तो कभी रबर स्टैम्प, तो कभी मुखौटा और कभी ‘नमूना’ कहा जाता है।

संघियों की ओर से ढोल पीटा जाता है कि नरेन्द्र मोदी की कोई औलाद नहीं है तो वो किसके लिए भ्रष्टाचार करेंगे। यह दुर्भावनापूर्ण दुष्प्रचार है। मनमोहन सिंह, दस साल प्रधानमंत्री रहे। क्या कभी उन पर अपना घर भर लेने का लाँछन लगा? उनकी सरकार पर असंख्य आरोप लगे। लेकिन कितने साबित हुए? कितनों आरोपियों को, 42 महीने से सत्ता पर क़ाबिज़ मोदी सरकार ने सलाखों के पीछे पहुँचाया? यदि मोदी ऐसा नहीं कर सके, तो क्यों? कहीं ऐसा तो नहीं कि वो झूठे आरोपों को ही हवा देकर अपना सियासी उल्लू सीधा करते रहने में ही अपनी भलाई समझ रहे हैं!

लोकतंत्र के लिए ये बेहद दुर्भाग्यपूर्ण दशा है कि चुनाव के नतीज़ों को जाँच-मुकदमा और कोर्ट-कचहरी के विकल्प की तरह पेश किया जाता है। हरेक पार्टी ऐसा करती है। इसीलिए नेताओं से जुड़े आपराधिक मामलों को बिल्कुल अलग ढंग से देखना ज़रूरी है। दुर्भाग्यवश, मोदी सरकार ने भी इस लिहाज़ से बयानबाज़ी के सिवाय और कुछ नहीं किया। मज़े की बात ये भी है कि जिन लोगों ने काँग्रेसियों पर भ्रष्टाचार के असंख्य आरोप लगाये, आज वो भी आरोपों के कठघरे में ही खड़े हैं। जय अमित शाह, शौर्य डोभाल, अभिषेक सिंह (रमन सिंह का बेटा) जैसे दर्जनों भगवा नेताओं और उनकी सन्तानों पर गम्भीर आरोप हैं। कीर्ति आज़ाद ने अरूण जेटली पर कोई मामूली आरोप नहीं लगाया था। नितिन गडकरी, राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज, पीयूष गोयल जैसे तमाम नेताओं पर भी गम्भीर आरोप हैं। लेकिन यदि जाँच नहीं होगी, लोकपाल नहीं बनेगा तो सभी सत्यवादी बनकर ही मौज़ करेंगे। इसीलिए कोई नहीं जानता कि सरकार में बैठे ‘कलाकारों’ की जाँच कब होगी, कैसे होगी और उसका अंज़ाम क्या निकलेगा?  भ्रष्टाचार और वंशवादी डीएनए का दबदबा भगवा ख़ानदान में भी कोई कम नहीं है। तमाम बड़े नेताओं की औलादें बाप की हैसियत की वजह से मज़े लूट रही हैं। शीशे के घर में बैठकर औरों पर पत्थर फेंकना संघ-बीजेपी का पैदाइशी शग़ल रहा है!

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