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मोदी राज के 4 साल में जनता के सुख बढ़े या दुःख ?

अब मोदी राज की चौथी सालगिरह के मौके पर सबसे अहम यक्ष-प्रश्न यही है कि क्या 2014 में मोदी को पूर्ण बहुमत देने से जनता के दिन फिरने जैसा कुछ हुआ या उसकी हालत पहले से बद्तर हो गयी?

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Narendra Modi

लोकतंत्र में जनता की सरकार से अपेक्षा होती है कि वो उनकी ज़िन्दगी के कष्टों को दूर करेगी और इसे सुखमय बनाएगी। इसी मकसद को हासिल करने के लिए जनता की ओर से सरकार को ‘सर्वाधिकार सुरक्षित’ बनाया जाता है। सरकार को अपने वादों को निभाने के लिए मनमाफ़िक क़ानून बनाने और उसे लागू करने की छूट होती है। जनता से वो मनमाफ़िक टैक्स वसूलती है। इसी से उसे सारी व्यवस्था को इस ढंग से चलाना होता है जिससे जनता की ज़िन्दगी ख़ुशगवार बन सके। अब मोदी राज की चौथी सालगिरह के मौके पर सबसे अहम यक्ष-प्रश्न यही है कि क्या 2014 में मोदी को पूर्ण बहुमत देने से जनता के दिन फिरने जैसा कुछ हुआ या उसकी हालत पहले से बद्तर हो गयी?

मज़े की बात ये है कि इस आसान से सवाल का जबाब हर कोई जानता है! फिर चाहे वो भक्त हो या अभक्त! मोदी समर्थक हो या विरोधी! लेकिन अफ़सोस कि सच बोलने और बताने वालों की संख्या आज अँगुलियों पर गिनी जा सकती है। क्योंकि मोदी राज ने उस मीडिया को अपना भोंपू बना लिया है, जिसका पहला फ़र्ज़ है जनसरोकारों को लेकर सरकारों को झकझोरना और व्यवस्था में जबाबदेही तथा पारदर्शिता को बढ़ाना। इसीलिए मीडिया को लोकतंत्र की इमारत का चौथा खम्भा कहा जाता है। लेकिन आज आपको देश में एक भी ऐसा समझदार व्यक्ति नहीं मिलेगा जिसे लगता हो कि मोदी राज में मीडिया अपना काम ठीक से कर रहा है। वो उन मुद्दों और मसलों पर अपनी संवेदनशीलता दिखा रहा है, जो किसी स्वस्थ लोकतंत्र में जबाबददेह मीडिया से अपेक्षित है। मीडिया की ऐसी दुर्दशा से लोकतंत्र का चौथा खम्भा ख़ुद को कोस रहा है। मोदी राज की पहली और सबसे बड़ी दुःखद देन है!

लोकतंत्र अपनी संस्थाओं और क़ानून के राज से चलता है। इस मोर्चे पर भी मोदी राज के चार सालों ने भारत की छवि पर ऐसा बट्टा लगाया है, जो पहले कभी नहीं दिखा। सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस हर मायने में ना सिर्फ़ ऐतिहासिक है, बल्कि वो जीता-जागता सबूत भी है कि कैसे सियासी दख़ल की वजह हमारी न्यायपालिका सिसक रही है! जो लोग इसे मामूली खींचतान के रूप में देखते हैं, उन्हें पता ही नहीं है कि न्यायपालिका को मुट्ठी में रखने के लिए मोदी सरकार ने चार साल में क्या-क्या खिचड़ी पकायी है! जनता को सच्चाई का पता इसलिए भी नहीं चल रहा क्योंकि मीडिया अपना काम नहीं कर रहा। यहाँ तक कि वो विपक्ष की आवाज़ को भी जनता तक नहीं पहुँचने दे रहा। न्यायपालिका का गला घोटना, मोदी राज की दूसरी सबसे दुःखद और विनाशकारी देन है।

चुनाव आयोग की गरिमा का पतन! ये मोदी राज की तीसरी सबसे दुःखद उपलब्धि है। चुनाव आयोग के रूप में मोदी सरकार ने जिन लोगों को वहाँ नियुक्त किया, उनकी निष्ठा देश के संविधान के प्रति नहीं, बल्कि अपने सियासी आकाओं के प्रति है। यही वजह है कि मोदी राज में चुनाव आयोग ने एक से बढ़कर एक, ऐसे फ़ैसले लिये, जिससे उसकी निष्पक्षता तार-तार हो गयी। मिसाल के तौर पर हिमाचल और गुजरात विधानसभा चुनावों के कार्यक्रम को अलग-अलग करना, चुनाव की तारीख़ों का लीक होना। आयोग के ईवीएम पर उठे सवालों ने तो उसकी सारी प्रतिष्ठा को ही मिट्टी में मिला दिया।

सीएजी यानी भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक भी देश की अहम संवैधानिक संस्था है। इसका काम सरकारी पैसे के सही इस्तेमाल पर नज़र रखना है। लेकिन मोदी राज में ये संस्था भी रीढ़-विहीन हो गयी। पूर्व सीएजी विनोद राय ने मनमोहन सिंह सरकार को बदनाम करने के लिए संघ की कठपुतली का काम किया। उन्होंने तमाम मनगढ़न्त घोटालों की बातें कीं। लेकिन मोदी राज के चार साल में एक भी कथित घोटाले के आरोपियों के ख़िलाफ़ आरोपपत्र तक दाख़िल नहीं हो सका। 2जी और आदर्श मामले में तो बाक़ायदा अदालतों ने फ़ैसला सुनाया है कि कोई घोटाला नहीं हुआ। लेकिन सीएजी के क़ायदे उस वक़्त बदल गये, जब उससे नोटबन्दी के फ़ैसले से हुए नफ़ा-नुकसान का पता लगाने की माँग की गयी। यानी, इस अहम संवैधानिक संस्था का हाल ये हो चुका है कि व्यक्ति के बदलने से उसकी नीतियाँ बदल गयीं! सीएजी का पतन, मोदी राज की चौथी सबसे दुःखद उपलब्धि है।

संसद देश की सर्वोच्च संवैधानिक संस्था है। लेकिन पूर्ण बहुमत वाली मोदी राज में भी संसद की गरिमा की धज़्ज़ियाँ उड़ती रहीं। और, इससे भी दुःखद ये है कि इस कुकर्म को सीधे-सीधे सरकार में बैठे लोगों में डंके की चोट पर अंज़ाम दिया। सरकार ने उस विश्वास मत का सामना करने की भी हिम्मत नहीं दिखायी, जिसमें उसके गिरने की कोई आशंका तक नहीं थी। बीते चार साल में मोदी सरकार के पास कभी ऐसी लचीलापन नज़र नहीं आया, जब ये लगा हो कि वो विपक्ष को भी साथ लेकर चलने का जज़्बा, लचीलापन और दूरदर्शिता रखती है।

सरकार ने विपक्ष के अंकुश से बचने के लिए स्पीकर की संवैधानिक संस्था का भी बेज़ा इस्तेमाल किया। इससे विधेयकों को भी वित्तीय विधेयक बना दिया, जो इसके दायरे में नहीं आते थे, ताकि वो राज्यसभा की ताक़त से बचाये जा सकें। क्योंकि तब राज्यसभा में मोदी सरकार के पास बहुमत नहीं था। लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति मोदी सरकार में निष्ठा के नदारद होने की वजह से ही अब संसद सत्र की मियाद अपने निम्नतम स्तर पर आ चुकी है। संसद की दुर्दशा, मोदी राज की पाँचवी सबसे दुःखद उपलब्धि है।

विपक्ष की ओर से मोदी राज की होने वाली सटीक आलोचनाओं को भी राजनीति से प्रेरित बताया जा सकता है। लेकिन यही बात बीजेपी के वरिष्ठ नेता रहे यशवन्त सिन्हा, अरूण शौरी, शत्रुघ्न सिन्हा और राम जेठमलानी जैसे लोगों की आलोचना पर लागू नहीं हो सकती। इन्होंने बीजेपी में रहते हुए मोदी राज की इतनी तीख़ी आलोचनाएँ की हैं, जिसकी कोई और मिसाल नहीं है। यही वजह है कि चाल-चरित्र और चेहरा की बातें करने वाले सत्ता की ख़ातिर किसी भी स्तर तक न सिर्फ़ ख़ुद गिरने को तैयार हो जाते हैं बल्कि अपने निहित स्वार्थों की ख़ातिर वो राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद को भी कलंकित करने से बाज़ नहीं आते।

अब बात मोदी सरकार की आर्थिक उपलब्धियों की। इसका सिर्फ़ एकलौता सुखद पहलू ये रहा है कि मोदी सरकार ने देश में आयकर रिटर्न भरने वालों की संख्या में इज़ाफ़ा हासिल किया है। हालाँकि, आयकर जैसे प्रत्यक्ष करों से सरकारी ख़ज़ाने को होने वाली आमदनी में कोई ख़ास बढ़ोत्तरी नहीं हुई। दूसरी ओर मोदी राज में अप्रत्यक्ष करों की दरों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। अप्रत्यक्ष करों की मार ग़रीबों पर ज़्यादा पड़ती है। पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतों में लगी आग से भी सबसे अधिक ग़रीबों को ही चोट पहुँची है। क्योंकि हमारे देश में ग़रीबों और निम्न आयवर्ग के लोगों की तादाद बहुत अधिक है। ईंधन के महँगा होने का भारी असर उन सभी चीज़ों पर कहीं अधिक पड़ता है, जिनका ताल्लुक इन कमज़ोर तबकों से होता है।

अन्य आर्थिक नीतियों के लिहाज़ से देखें तो नोटबन्दी की नीति न सिर्फ़ हर मायने में फेल रही है, बल्कि इसने अर्थव्यवस्था का भट्टा बिठाने का काम किया है। मोदी राज में सरकारी बैंकों ने सुनियोजित लूट की ऐसी वारदातें हुई, जिनसे पता चलता है कि सरकार अपना काम ठीक से करने में पूरी तरह विफल रही है। रिकॉर्ड-तोड़ एनपीए की वजह से हमारे ज़्यादातर बैंकों की हालत तो ये हो चुकी है कि यदि उनमें जनता के गाढ़े ख़ून-पसीने की कमाई को नहीं ठूँसा गया तो वो दम तोड़ देंगे। नोटबन्दी ने उद्योग-व्यापार की कमर तोड़ दी। इससे बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी पैदा हुई। इसकी सबसे तगड़ी मार तो देश के उस असंगठित क्षेत्र पर पड़ी, जिसमें देश की 90 फ़ीसदी आबादी रहती है और जिसकी दुर्दशा के बारे में सरकार के पास कोई आँकड़ा तक नहीं है। जीएसटी एक अच्छा आर्थिक सुधार साबित हो सकता था। लेकिन मोदी राज ने जिस तरह से पर्याप्त तैयारी किये बग़ैर इसे लागू किया, उससे नकारात्मक नतीज़े ही हासिल हुए।

मोदी सरकार ने जनहित से जुड़ी बहुत सारी पुरानी योजनाओं के नाम बदलकर उन्हें अपनी कामयाबी के रूप में पेश किया। लेकिन हरेक योजना के मोर्चे पर सरकार के दावों और सच्चाई में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ है। इसीलिए अपनी उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने के लिए मोदी सरकार ने क़रीब साढ़े चार हज़ार करोड़ रुपये प्रचार और विज्ञापनों पर बहा दिये।

संचार भी पूरी तरह से केन्द्र सरकार का विषय है। ये किसी से छिपा नहीं है कि यदि आज हरेक व्यक्ति के हाथ में मोबाइल है तो ये पिछली सरकार की देन है। लेकिन यदि आज हरेक व्यक्ति चरमरा चुकी मोबाइल व्यवस्था से पीड़ित है तो वो पूरी तरह से मोदी सरकार की नाकामी की कहानी ही कहता है। कॉल ड्रॉप और डाटा स्पीड की समस्या देशव्यापी है और बीते चार साल में ये बद से बदतर ही होती रही।

रक्षा क्षेत्र में भी मोदी सरकार का प्रदर्शन बहुत दुःखद रहा है। कश्मीर के हालात मोदी राज में और बिगड़े हैं। अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने और कश्मीरी पंडितों की घर-वापसी के बेहद अहम वादों पर मोदी राज की कोई उपलब्धि नहीं है। सीमा पर होने वाली गोलीबारी और कश्मीर में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद की वजह से मोदी राज में सैनिकों और नागरिकों दोनों को हुए नुकसान ने कीर्तिमान बनाया है।

विदेश नीति के मोर्चे पर भी मोदी सरकार को चौतरफ़ा नाकामी ही हाथ लगी है। मोदी राज में भारत के अपने सभी पड़ोसियों से रिश्ते मज़बूत नहीं बल्कि कमज़ोर हुए हैं। यही वजह है कि मोदी सरकार को विदेश में भी अपनी ब्रॉन्डिंग पर पानी की तरह पैसा बहाना पड़ता है। जबकि दूसरी ओर, देश का विदेशी व्यापार, निर्यात, विदेश निवेश सभी अहम क्षेत्रों की गिरावट का दौर रुकने का नाम नहीं ले रहा। इन क्षेत्रों की दशा कितनी ख़राब है, इसे डॉलर के मुक़ाबले लगातार और तेज़ी से गिर रहे रुपये की दशा से बहुत ही आसानी से समझा जा सकता है।

कुलमिलाकर, चार साल में मोदी राज ने तक़रीबन हर मोर्चे पर नाकाम किया है। अलबत्ता, अपने झूठ फैलाने वाली नीति और संघ जैसे फासिस्ट संगठन की बदौलत मोदी सरकार ने जनता में अपनी ऐसी छवि ज़रूर बनायी जिसमें उसे चुनावों में भरपूर कामयाबी मिली। इसीलिए, मोदी सरकार के कामकाज़ को यदि आप उसके झूठे दावों के आईने में देखेंगे तो आप धोखे में ही रहेंगे। सच्चाई को जानने के लिए आपको, अपने आप से, बस एक लाइन का सवाल पूछना चाहिए कि क्या मोदी राज के 4 साल में आपकी तकलीफ़ों में इज़ाफ़ा हुआ है या नहीं? इस राज में आप ज़्यादा सुखी बने हैं या ज़्यादा दुःखी? आपके अनुभव आपको सच के सिवाय और कुछ नहीं बताएँगे। फिर आपको किसी और की बातों में आने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी!

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पर्यावरण के लिए सबसे बड़ा ख़तरा: 90% प्लास्टिक कचरा रिसाइकिलिंग नहीं होता

केमिकल से बनी प्लास्टिक की बोतलों में केमिकल मिलना शुरू हो जाता है और सारा केमिकल पानी या कोल्ड ड्रिंक में मिल जाता है और वह पानी जहर हो जाता है और वहीं पानी हम पी भी रहे हैं।

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Plastic Water Bottles

नई दिल्ली, 24 जून | भारत के अधिकांश राज्यों में प्लास्टिक कंपनियां स्कूली बच्चों के प्रयोग में आने वाली प्लास्टिक की बोतलों में पीवीसी (पाइपों में प्रयोग होने वाला प्लास्टिक) और बीपीए (बिसफेनोल ए नामक एक रसायन) जैसे रसायनों का प्रयोग करती हैं, जो उनकी सेहत के लिए बहुत ही हानिकारक है। इन बोतलों में पानी या फिर कोल्ड ड्रिंक पीने लायक न रहकर जहर बन जाता है, जिसका सेवन मासूम बच्चे ही नहीं बल्कि युवा भी दिन ब दिन अपने दैनिक जीवन में कर रहे हैं।

‘माई राइट टू ब्रीथ’ के संस्थापक सदस्य और पर्यावरणविद् जयधर गुप्ता ने आईएएनएस के साथ बातचीत में कहा, “गर्मी के दिनों में इनका प्रयोग अधिक होता है और जब यह बोतले कंपनियों से निकलकर दुकानों और गोदामों में जाने के लिए ट्रकों में लोड होती हैं तो उस वक्त बाहर का तापमान अगर 35-40 डिग्री है तो ट्रक के अंदर का तापमान 50 से 60 डिग्री होता है, इस दौरान विभिन्न केमिकल से बनी प्लास्टिक की बोतलों में केमिकल मिलना शुरू हो जाता है और सारा केमिकल पानी या कोल्ड ड्रिंक में मिल जाता है और वह पानी जहर हो जाता है और वहीं पानी हम पी भी रहे हैं।”

उन्होंने कहा, “खाने से लेकर पीने की हर चीज में प्लास्टिक का उपयोग हो रहा है। हैरत की बात यह है कि प्रयोग होने वाली इस प्लास्टिक में 90 फीसदी से ज्यादा प्लास्टिक रिसाइकिल होने के लायक ही नहीं है। लोगों ने खुद ही इस हानिकारक चीज को अपने दैनिक जीवन में अपनाया है। पूरे भारत में हम रोजाना दो करोड़ प्लास्टिक की बोतलें कचरे में फेंकते हैं चाहे आप कहीं भी जाओं चाहे वह राजमार्ग हो, घूमने फिरने की जगह हो आपको हर जगह यह प्लास्टिक की बोतलें मिलेंगी।

जयधर गुप्ता ने कहा कि आठ से 10 प्रतिशत ही यह बोतलें रिसाइकिल होती हैं बाकी लैंडफिल साइटों पर फेंक दी जाती हैं। यह प्लास्टिक बायोडिग्रेडबल नहीं है यह हजारों साल तक हमारी दुनिया में रहेंगी।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की 2015 में आई रिपोर्ट बताती है कि भारत के प्रमुख 60 बड़े नगरों में प्रति दिन करीब 4,059 टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है। इस सूची में दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरू और हैदराबाद जैसे शहर शीर्ष पर हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि देश में प्रति दिन करीब 25,940 टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है।

जयधर ने कहा, “पैकेजिंग उद्योग सबसे ज्यादा प्लास्टिक कचरा उत्पादित करते हैं। इनमें बोतल, कैप, खाने का पैकेट, प्लास्टिक बैग आदि शामिल हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार समुद्र को प्रदूषित करने वाले शीर्ष पांच प्रदूषकों में से चार पैकेजिंग उद्योग से निकलने वाला प्लास्टिक है।”

प्लास्टिक के विकल्प के सवाल पर जयधर गुप्ता ने कहा, “सबसे अच्छा विकल्प है कि जैसे हम पुराने जमाने में करते थे कि स्टील की बोतलें, थरमस इत्यादि। जब भी हम कहीं भी चले तो घर से इन्हें आप अपने साथ रखें। समस्या यहीं है कि हम लोग सहुलियतों के चक्कर में मारे जा रहे हैं जैसे जैसे लोग अमीर होते जाएंगे वह सहुलियतों के जाल में फंसते जाएंगे। यह बहुत आसान चीज है कौन ले जाएगा। इस सहुलियतों के कारण लोगों ने पर्यावरण की दुर्दशा कर दी है।”

उन्होंने कहा, “आज से 20 से 25 साल पहले लोग बाजार से सामना लेने के लिए घर के थैले, बर्तन, इत्यादि चीजें ले जाया करते थे लेकिन आज के वक्त में लोगों ने इन चीजों को अपने साथ ले जाना बंद कर दिया है। वह बाजारों से सामना प्लास्टिक की थैलियों में लाते हैं, जिन्हें रिसाइकिल किया ही नहीं जा सकता। लोगों को जानने की जरूरत है कि यह प्लास्टिक उनके लिए खतरा है।”

जयधर गुप्ता ने बाजारों में बिकने वाली प्लास्टिक की थैलियों पर उदाहरण देते हुए कहा कि कोई भी सब्जी वाला, छोटे दर्जे का दुकानदार प्लास्टिक में प्रयोग होने वाला माइक्रोन जैसी चीजों को नहीं समझता। प्लास्टिक में वही माइक्रोन काफी घातक सिद्ध होते हैं और आगे जाकर प्रदूषण बढ़ाते हैं।

प्लास्टिक की बोतलों की गुणवत्ता में सुधार के सवाल पर उन्होंने कहा, “इसमें सुधार की गुंजाइश नहीं है, इसमें सुधार करने से यह सिर्फ महंगी ही होगी। सबसे पहले तो हमें इन सबसे खुद को अलग करना है, हमें हर उस चीज को न कहना है, जिसे एक बार प्रयोग कर कूड़े में फेंक दिया जाता है। विदेशों में भी जब कागज की थैलियों का प्रयोग किया जा सकता है तो भारत में क्यों नहीं। विदेशों में उन थैलियों के लिए पैसा लिया जाता है इसलिए लोगों ने अपनी आदत में सुधार किया है। विदेशों ने प्लास्टिक को खत्म करने का संकल्प लिया है और वह कर भी रहे हैं। सरकार को इसे समाप्त करने के लिए कानून बनाना चाहिए।”

प्लास्टिक पर लगाम लगाने के सवाल पर उन्होंने कहा, “सरकार को चाहिए कि प्लास्टिक को एक लग्जरी चीज घोषित करें ताकि लोगों की इसकी खरीद से बचें। सिंगापुर में इस तरह की योजना है कि अगर आपको प्रदूषण करना है तो इसका पैसा दो। यह बहुत ही आसान फार्मूला है। इसे भारत में लागू किया जाना चाहिए।”

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि गोवा में सभी लोग अपने अपने घरों से कूड़ा निकालकर हर रात उसमें आग लगा देते हैं, यहां हर घर में धुआं ही धुआं है। यहां पर भी किसान अपनी फसल जला रहा हैं और हर घर अपना कूड़ा जला रहा है। यहां कोई रोक नहीं है हर रेहड़ी वाला, सब्जी वाला प्लास्टिक की थैलियों में सामान बेच रहा है, वह कहां जाएंगी। उन्हें या तो समुद्र में बहा दिया जाएगा या फिर जला दिया जाएगा।

–आईएएनएस

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ज़रा हटके

मधुबनी पेंटिंग से बदली पटना के विद्यापति भवन की रंगत

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Madhubani Painting

पटना, 24 जून | बिहार के मुख्यमंत्री आवास पहुंचने वाला कोई भी व्यक्ति अब दुनियाभर में विख्यात लोक कला मधुबनी पेंटिंग की विविध कलाकृतियों को देख यहां की प्राचीन कला-संस्कृति से न केवल रूबरू होगा बल्कि उनकी बारिकियों को भी समझेगा।

बिहार के मधुबनी स्टेशन परिसर को मधुबनी पेंटिंग से सजाने-संवारने के बाद गांव के कलाकर अब राजधानी पटना तक की दीवारों पर अपनी कला को उकेर कर उन्हें खूबसूरत बनाने में जुटे हैं। पटना स्थित प्रसिद्घ विद्यापति भवन की दीवारों पर भी कलाकार मधुबनी पेंटिंग उकेर कर इस भवन की रौनक बढ़ा रहे हैं।

बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र खासकर दरभंगा और मधुबनी के अलावा नेपाल के कुछ क्षेत्रों में मधुबनी पेंटिंग की खास पहचान है। रंगोली के रूप में शुरू हुई यह कला धीरे-धीरे आधुनिक रूप में कपड़ों, दीवारों एवं कागज पर उतर आई है। मिथिला की महिलाओं द्वारा शुरू की गई इस घरेलू चित्रकला को पिछले कुछ दशकों में पुरुषों ने भी अपना लिया है।

मधुबनी पेंटिंग को बिहार की गलियों और घरों तक पहुंचाने का संकल्प लिए स्वयंसेवी संस्था ‘क्राफ्टवाला’ के कलाकार अब राजधानी पटना पहुंचे हैं। पटना के विद्यापति मार्ग स्थित चेतना समिति के विद्यापति भवन में मिथिला चित्रकला की आर्ट गैलरी का निर्माण ‘क्राफ्ट विलेज’ जितवारपुर से आए कलाकारों की टीम द्वारा किया जा रहा है।

क्राफ्टवाला के संस्थापक राकेश झा आईएएनएस को बताते हैं, “इस कार्य का उद्देश्य विद्यापति भवन में मधुबनी पेंटिंग के परम्परागत स्वरूप को प्रदर्शित करना है, जिसके तहत मिथिला क्षेत्र के लोक संस्कारों जैसे विवाह, मुंडन, जनेऊ आदि में प्रयुक्त विभिन्न प्रकार के अल्पना (अरिपन), कोहबर (कोबर), सीतायन (सीता का जीवन चरित्र), लोक नायकों की गाथा आदि का चित्रण मधुबनी पेंटिंग शैली में किया जा रहा है।”

उन्होंने कहा कि चेतना समिति वषोर्र् से मिथिला की लोक कला संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए प्रयत्नशील रही है। ऐसे में विद्यापति भवन को बिहार का पहला मधुबनी पेंटिंग आर्ट गैलरी बनाने का दायित्व क्राफ्टवाला को सौंप समिति ने हमें गर्व का पल प्रदान किया है।

चेतना समिति के उमेश मिश्र बताते हैं कि विद्यापति भवन को मधुबनी पेंटिंग से सजाने का उद्देश्य आने वाली पीढी को मिथिला पेंटिंग से केवल रूबरू कराना है।

राकेश झा कहते हैं कि क्राफ्टवाला की टीम ने मधुबनी पेंटिंग को जगह-जगह बढ़ाने की कोशिश की है। उन्होंने कहा कि इसके तहत मधुबनी स्टेशन से मधुबनी पेंटिंग की शुरूआत की गई थी, उसे देखकर लोग अब कई स्थानों पर मधुबनी पेंटिंग बनाने लगे हैं।

पटना के 1 अणे मार्ग मुख्यमंत्री आवास परिसर की दीवारों पर भी मधुबनी पेंटिंग बनाई गई है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पेंटिंग की तस्वीर ट्विटर पर साझा भी की है।

विद्यापति भवन में क्राफ्टवाला के प्रोजेक्ट प्रमुख कौशल कहते हैं, “विद्यापति भवन की दीवारों पर करीब 20 कलाकारों द्वारा मधुबनी पेंटिंग बनाई जा रही हैं। भवन में विद्यापति के चित्रण के अलावे राम-सीता, राधा-कृष्ण और बिहार के अन्य संस्कृतियों को भी चित्र के जरिए प्रस्तुत किया जाएगा।”

इधर, भवन की दीवारों में पेंटिंग करने में जुटी कलाकार रेणु देवी कहती हैं, इस कार्य से न केवल अपनी कला दिखाने का अवसर मिलता है बल्कि मधुबनी पेंटिंग को भी राज्य के लोगों तक पहुंचाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इस संदर्भ में महाकवि विद्यापति और मिथिला लोक नृत्य, मिथिला लोककलाओं को भी प्रदर्शित किया जा रहा है।

मधुबनी पेंटिंग को मिथिला पेंटिंग भी कहा जाता है। किंवदंतियों के मुताबिक यह कला मिथिला नरेश राजा जनक के समय से ही मिथिलांचल में चली आ रही है। आधुनिक समय में मधुबनी चित्रकला को पहचान बिहार के मधुबनी जिले के जितवारपुर गांव की रहने वाली सीता देवी ने दिलाई। इस गांव की तीन कलाकारों जगदंबा देवी, सीता देवी और बौआ देवी को पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।

–आईएएनएस

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दुनिया के सबसे रोमांटिक डेस्टीनेशंस में से एक है सैंटा मोनिका

सैंटा मोनिका आपको पूरे दिन व्यस्त रखने और आपका मनोरंजन करने वाले आकर्षणों से भरपूर है।

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Santa Monica Pier Area-Ocean Ave

सैंटा मोनिका का नाम सुनते ही एक ऐसा समुद्रतटीय शहर जेहन में घूमने लगता है, जो अपने अंदर कई तरह के विशेषताएं और आकर्षण समाए हुए हो। मालिबू या फिर वेनिस बीच से अलग सैंटा मोनिका समुद्रतटीय आकर्षण और तटीय इलाकों की परिष्कृत जीवनशैली का शानदार संतुलन पेश करता है। इसी कारण यह जोड़ों के लिए एक बेहद खास गंतव्य बन जाता है। इस शहर में आकर्षणों की भरमार है। अगर आप सैंटा मोनिका घूमने का मन बना रहे हैं तो आपका दिन वैश्विक ब्रांडों के बीच खरीददारी के साथ-साथ समुद्रतट पर रिलैक्स करने और दुनिया को निहारने में कब बीत जाएगा, आपको पता भी नहीं चलेगा। इसका कारण यह है कि सैंटा मोनिका आपको पूरे दिन व्यस्त रखने और आपका मनोरंजन करने वाले आकर्षणों से भरपूर है।

पेश हैं कुछ एसे ही आकर्षण के केंद्र :

सैंटा मोनिका पीयर

सैंटा मोनिका की बात हो तो सैंटा मोनिका पीयर का जिक्र न हो, ऐसा भला कैसा हो सकता है। इसकी लाल और पीले रंग की फेरीज शहर की पहचान बन चुकी हैं। पीयर में पैसिफिक पार्क के अलावा, एक फुल सर्विस एम्यूजमेंट पार्क, कई तरह के रेस्टोरेंट, बार और ऐसी कई दुकाने हैं, जहां से आप अपने लिए यागदार निशानी खरीद सकते हैं। इसके अलावा सैंटा मोनिका पीयर में 200 से अधिक गेम्स से सज्जित एर्केड है। सोलर पावर से चलने वाले पैसेफिक पार्क की फेरी व्हील अद्वीतीय अनुभव प्रदान करती है।

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दिन में यहां का पूरा आकर्षण लूफ हिप्पोड्रोम कोलोजियल में शिफ्ट हो जाता है, जहां स्ट्रीय परफारमेंस होते हैं। यहां आप काटन कैंडी का भी आनंद ले सकते हैं। हाथ में बीयर लिए जब आप यहां से मालिबू और साउथ बे का नजारा लेते हैं तो यह शानदार अनुभव प्रदान करता है। सूर्यास्त के समय आप समुद्रतट पर जाकर स्थानीय संगीत का आनंद ले सकते हैं। लहरों के बीच संगीत की धुनें कानों में रस घोल देती हैं। सैंटा मोनिका पीयर एक एसा डेल्टीनेशन है, जिसे आप कतई नहीं चूकना चाहेंगे क्योंकि यह हर उमर के लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है।

सैंटा मोनिका बीच पर साल के 300 दिन खिली रहती है धूप

सैंटा मोनिका बीच अपने आप में बेहद खास है। यहां साल के 300 दिन धूप खिली रहती है और यही कारण है कि नेशनल ज्योग्राफिक ने सैंटा मोनिका को टाप-10 बीच सटीज इन द वलर्ड में शामिल किया है। प्रशांत महासागर पर स्थित सैंटा मोनिका में साढ़े तीन मील लम्बा चमकता हुआ कोस्टलाइन है। सैंटा मोनिका बीच यहां आने वाले लोगों को यहां रमने और यहां की लाइफस्टाइल को अपनाने और उसमें खो जाने के अनंत अवसर प्रदान करता है। सैंटा मोनिका आने वाले पर्यटकों को बीच पर पैर रखने के साथ सबसे आकर्षक गतिविधियों का दीदार होता है और वे सबकुछ भूलकर उसमें खो जाते हैं।

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सैंटा मोनिका बीच की खोज 1875 में जान पी. जोंस ने किया था। जोंस ने इस स्थान को खरीद लिया और 8.3 वर्ग मील क्षेत्रफल वाले इस शहर की नींव रखी। तब से लेकर आज तक सैंटा मोनिका दुनिया की सबसे आकर्षक बीच डेस्टीनेशंस में जगह बना चुका है। 1909 में यहां पहला प्लेजर पीयर खुला और इसके बाद से यह स्थान हालीवुड स्टार्स के लिए पसंदीदा बन गया। साथ ही 1920 के दशक में यह इंटरनेशनल फिटनेस क्रेजी लोगों का पसंदीदा डेस्टीनेशन बना और फिर 1980 के दशक में यहां लेजेंड्री होटल कलेक्शन खुले। सैंटा मोनिका के साथ एक समृद्ध इतिहास जुड़ा है और यही कारण है कि यह लगातार दुनिया भर के पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता रहता है।

शापिंग के लिए भी परफेक्ट डेस्टीनेशन

अगर आपको समुद्रतट के अलावा शापिंग पसंद है तो सैंटा मोनिका आपके लिए परफेक्ट डेस्टीनेशन है। यहां काफी कम दूरी पर कई शापिंग डेस्टीनेशन हैं, जहां आपको शानदार सेल और काफी सस्ते में डिजाइनर मटेरियल मिल जाएंगे। आप दुनिया भर में मशहूर जिस किसी ब्रांड का नाम आप लेंगे, वह यहां मिल जाएगा। मोंटाना एवेन्यू से लेकर ब्लूमिंगडेल और नार्डस्ट्राम तक, हर जगह आपको बेहतरीन ब्रांड काफी सस्ती कीमत में मिल जाएंगे। सैंटा मोनिका में आप जहां चाहें शापिंग कर सकते हैं क्योंकि यहां आब्शंस की कोई कमी नहीं।

सबको आकर्षित करता है मोंटाना एवेन्यू

सैंटा मोनिका के उत्तरी इलाके में स्थित मोंटाना एवेन्यू सबको अपनी ओर आकर्षित करता है। यह 150 से अधिक रेस्टोरेंट्स और रीटेलर्स का घर है। डाउनटाउन सैंटा मोनिका से थोड़ी दूरी पर स्थित मोंटाना एवेन्यू प्रोमेनेड और पीयर की गहमागहमी से दूर एक शांत स्थान है। यह स्थान लेट नाइट शापिंग के लिए भले ही उपयुक्त न हो लेकिन सनराइज से लेकर सनसेट तक यह शापिंग के लिए परफेक्ट डेस्टीनेशन है। यहां शापिंग के समय ए-लिस्ट सेलीब्रिटीज, शहर से बाहर के लोग, स्ट्रालर्स लिए टहलते स्थानीय लोग दिख जाते हैं। यहां आने वाला क्राउड काफी रिलैक्स रहता है क्योंकि यहां शापिंग के अलावा खाने-पीने के भरपूर आब्शन हैं।

देसी और विदेशी पर्यटक जमकर लेते हैं नाइटलाइफ का लुत्फ

सैंटा मोनिका लाइटलाइफ न सिर्फ स्थानीय लोगों को अपनी ओर खींचता है बल्कि यहां देश और दुनिया से रात की मस्ती के लिए यहां पहुंचते हैं। लास एंजेलिस इलाके से हजारों लोग रोजाना सैंटा मोनिका आते हैं और जमकर मौज मस्ती करते हैं। सैंटा मोनिका में रात में मौज-मस्ती के कई साधन हैं। प्रशांत महासागर का रुख किए यहां के रूफटॉप रेस्टोरेंट और बार्स सबको अपनी ओर खींचते हैं।

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शांगरीला का ओएनवाईएक्स या फिर सैंटा मोनिका का सोनोमना वाइन गार्डन बार काफी लोकप्रिय हैं। रात भर चुस्कीयां लेते हुए नाचते हुए सुबह कर देने के लिए सर्किल बार या फिर बार कोपा अपने आप में खास तरह का आकर्षण है। इसके अलावा शहर में कई डाइव बार्स भी हैं, जिनमें चेज जे काफी फेमस है।

सैंटा मोनिका खाने-पीने के शौकीनों के लिए भी है शानदार जगह

सैंटा मोनिका में कई मशहूर रेस्टोरेंट हैं। यहां कई शेफ अपनी कला से लोगों के अच्छे भोजन की चाह को शांत करते हैं। फिग, हकलबरी कैफे एंड बेकरी, टार एंड रोजेज जैसे रेस्टोरेंट यहां हैं और इनके यहां आने का कारण यह है कि सैंटा मोनिका का लोकेशन शानदार है। सैंटा मोनिका फ्यूजन क्यूजीन का जन्मदाता है। यह अमेरिका का इंटरनेशनल डाइनिंग डेस्टीनेशन है क्योंकि दुनिया भर के रेस्टोरेंट चेन और शेफ यहां आकर अपनी पाककला दिखाते हैं और ढेरों धन कमाते हैं।

लक्जरी होटल्स, रेजाट्स और स्पा की है भरमार

सैंटा मोनिका में लक्जरी होटल्स, रेजाट्स और स्पा की भरमार है। इसका कारण यह है कि यह एक इंटरनेशनल डेस्टीनेशन है। यहां के होटल हालीवुड के होटलों से बिल्कुल अलग हैं। यहां के होटल सीफेसिंग हैं और लोकल टच लिए हुए हैं। यहां बीच पर अनेकों होटल और रेजाट्स मिल जाएंगे, जहां हालीवुड के इलीट लोग आराम करते देखे जा सकते हैं। होटलों और रेजार्टस के अलावा कई ऐसे बंग्लो हैं, जहां रात की जिंदगी बड़ी सुकून भरी होती है।

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साथ ही साथ यहां अनेकों स्पा हैं, जो दिन भर मौज-मस्ती करते, बीच पर खेलकर और सर्फि ग करते थके लोगों को सुकून देते हैं। यहां के स्पा, योगा स्टुडियोज जूसिंग बार्स काफी लोकप्रिय हैं।

कला और संस्कृति का अद्भुत संगम

सैंटा मोनिका लॉस एंजेलिस काउंटी का हिस्सा है लेकिन यह दक्षिणी केलीफोर्निया में कला और सांस्कृतिक जीवनशैली के लिए अहम किरदार निभाता रहा है। असल में यहां के आधे के करीब लोग किसी ने किसी रूप में कला से जुड़े हुए हैं। सैंटा मोनिका में अनेकों राष्ट्रीय स्तर की आर्ट गैलरियां, पब्लिक आर्ट सेंटर्स, प्रमुख म्यूजियम, थिएटर हैं जहां हमेशा कुछ न कुछ चलता रहा है और स्थानीय तथा बाहर से आए लोग परफामिर्ंग आर्ट, प्ले और कंसटर्स का लुत्फ लेते रहते हैं।

–आईएएनएस

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