Connect with us

ब्लॉग

मोदी राज के 4 साल में जनता के सुख बढ़े या दुःख ?

अब मोदी राज की चौथी सालगिरह के मौके पर सबसे अहम यक्ष-प्रश्न यही है कि क्या 2014 में मोदी को पूर्ण बहुमत देने से जनता के दिन फिरने जैसा कुछ हुआ या उसकी हालत पहले से बद्तर हो गयी?

Published

on

Narendra Modi

लोकतंत्र में जनता की सरकार से अपेक्षा होती है कि वो उनकी ज़िन्दगी के कष्टों को दूर करेगी और इसे सुखमय बनाएगी। इसी मकसद को हासिल करने के लिए जनता की ओर से सरकार को ‘सर्वाधिकार सुरक्षित’ बनाया जाता है। सरकार को अपने वादों को निभाने के लिए मनमाफ़िक क़ानून बनाने और उसे लागू करने की छूट होती है। जनता से वो मनमाफ़िक टैक्स वसूलती है। इसी से उसे सारी व्यवस्था को इस ढंग से चलाना होता है जिससे जनता की ज़िन्दगी ख़ुशगवार बन सके। अब मोदी राज की चौथी सालगिरह के मौके पर सबसे अहम यक्ष-प्रश्न यही है कि क्या 2014 में मोदी को पूर्ण बहुमत देने से जनता के दिन फिरने जैसा कुछ हुआ या उसकी हालत पहले से बद्तर हो गयी?

मज़े की बात ये है कि इस आसान से सवाल का जबाब हर कोई जानता है! फिर चाहे वो भक्त हो या अभक्त! मोदी समर्थक हो या विरोधी! लेकिन अफ़सोस कि सच बोलने और बताने वालों की संख्या आज अँगुलियों पर गिनी जा सकती है। क्योंकि मोदी राज ने उस मीडिया को अपना भोंपू बना लिया है, जिसका पहला फ़र्ज़ है जनसरोकारों को लेकर सरकारों को झकझोरना और व्यवस्था में जबाबदेही तथा पारदर्शिता को बढ़ाना। इसीलिए मीडिया को लोकतंत्र की इमारत का चौथा खम्भा कहा जाता है। लेकिन आज आपको देश में एक भी ऐसा समझदार व्यक्ति नहीं मिलेगा जिसे लगता हो कि मोदी राज में मीडिया अपना काम ठीक से कर रहा है। वो उन मुद्दों और मसलों पर अपनी संवेदनशीलता दिखा रहा है, जो किसी स्वस्थ लोकतंत्र में जबाबददेह मीडिया से अपेक्षित है। मीडिया की ऐसी दुर्दशा से लोकतंत्र का चौथा खम्भा ख़ुद को कोस रहा है। मोदी राज की पहली और सबसे बड़ी दुःखद देन है!

लोकतंत्र अपनी संस्थाओं और क़ानून के राज से चलता है। इस मोर्चे पर भी मोदी राज के चार सालों ने भारत की छवि पर ऐसा बट्टा लगाया है, जो पहले कभी नहीं दिखा। सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस हर मायने में ना सिर्फ़ ऐतिहासिक है, बल्कि वो जीता-जागता सबूत भी है कि कैसे सियासी दख़ल की वजह हमारी न्यायपालिका सिसक रही है! जो लोग इसे मामूली खींचतान के रूप में देखते हैं, उन्हें पता ही नहीं है कि न्यायपालिका को मुट्ठी में रखने के लिए मोदी सरकार ने चार साल में क्या-क्या खिचड़ी पकायी है! जनता को सच्चाई का पता इसलिए भी नहीं चल रहा क्योंकि मीडिया अपना काम नहीं कर रहा। यहाँ तक कि वो विपक्ष की आवाज़ को भी जनता तक नहीं पहुँचने दे रहा। न्यायपालिका का गला घोटना, मोदी राज की दूसरी सबसे दुःखद और विनाशकारी देन है।

चुनाव आयोग की गरिमा का पतन! ये मोदी राज की तीसरी सबसे दुःखद उपलब्धि है। चुनाव आयोग के रूप में मोदी सरकार ने जिन लोगों को वहाँ नियुक्त किया, उनकी निष्ठा देश के संविधान के प्रति नहीं, बल्कि अपने सियासी आकाओं के प्रति है। यही वजह है कि मोदी राज में चुनाव आयोग ने एक से बढ़कर एक, ऐसे फ़ैसले लिये, जिससे उसकी निष्पक्षता तार-तार हो गयी। मिसाल के तौर पर हिमाचल और गुजरात विधानसभा चुनावों के कार्यक्रम को अलग-अलग करना, चुनाव की तारीख़ों का लीक होना। आयोग के ईवीएम पर उठे सवालों ने तो उसकी सारी प्रतिष्ठा को ही मिट्टी में मिला दिया।

सीएजी यानी भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक भी देश की अहम संवैधानिक संस्था है। इसका काम सरकारी पैसे के सही इस्तेमाल पर नज़र रखना है। लेकिन मोदी राज में ये संस्था भी रीढ़-विहीन हो गयी। पूर्व सीएजी विनोद राय ने मनमोहन सिंह सरकार को बदनाम करने के लिए संघ की कठपुतली का काम किया। उन्होंने तमाम मनगढ़न्त घोटालों की बातें कीं। लेकिन मोदी राज के चार साल में एक भी कथित घोटाले के आरोपियों के ख़िलाफ़ आरोपपत्र तक दाख़िल नहीं हो सका। 2जी और आदर्श मामले में तो बाक़ायदा अदालतों ने फ़ैसला सुनाया है कि कोई घोटाला नहीं हुआ। लेकिन सीएजी के क़ायदे उस वक़्त बदल गये, जब उससे नोटबन्दी के फ़ैसले से हुए नफ़ा-नुकसान का पता लगाने की माँग की गयी। यानी, इस अहम संवैधानिक संस्था का हाल ये हो चुका है कि व्यक्ति के बदलने से उसकी नीतियाँ बदल गयीं! सीएजी का पतन, मोदी राज की चौथी सबसे दुःखद उपलब्धि है।

संसद देश की सर्वोच्च संवैधानिक संस्था है। लेकिन पूर्ण बहुमत वाली मोदी राज में भी संसद की गरिमा की धज़्ज़ियाँ उड़ती रहीं। और, इससे भी दुःखद ये है कि इस कुकर्म को सीधे-सीधे सरकार में बैठे लोगों में डंके की चोट पर अंज़ाम दिया। सरकार ने उस विश्वास मत का सामना करने की भी हिम्मत नहीं दिखायी, जिसमें उसके गिरने की कोई आशंका तक नहीं थी। बीते चार साल में मोदी सरकार के पास कभी ऐसी लचीलापन नज़र नहीं आया, जब ये लगा हो कि वो विपक्ष को भी साथ लेकर चलने का जज़्बा, लचीलापन और दूरदर्शिता रखती है।

सरकार ने विपक्ष के अंकुश से बचने के लिए स्पीकर की संवैधानिक संस्था का भी बेज़ा इस्तेमाल किया। इससे विधेयकों को भी वित्तीय विधेयक बना दिया, जो इसके दायरे में नहीं आते थे, ताकि वो राज्यसभा की ताक़त से बचाये जा सकें। क्योंकि तब राज्यसभा में मोदी सरकार के पास बहुमत नहीं था। लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति मोदी सरकार में निष्ठा के नदारद होने की वजह से ही अब संसद सत्र की मियाद अपने निम्नतम स्तर पर आ चुकी है। संसद की दुर्दशा, मोदी राज की पाँचवी सबसे दुःखद उपलब्धि है।

विपक्ष की ओर से मोदी राज की होने वाली सटीक आलोचनाओं को भी राजनीति से प्रेरित बताया जा सकता है। लेकिन यही बात बीजेपी के वरिष्ठ नेता रहे यशवन्त सिन्हा, अरूण शौरी, शत्रुघ्न सिन्हा और राम जेठमलानी जैसे लोगों की आलोचना पर लागू नहीं हो सकती। इन्होंने बीजेपी में रहते हुए मोदी राज की इतनी तीख़ी आलोचनाएँ की हैं, जिसकी कोई और मिसाल नहीं है। यही वजह है कि चाल-चरित्र और चेहरा की बातें करने वाले सत्ता की ख़ातिर किसी भी स्तर तक न सिर्फ़ ख़ुद गिरने को तैयार हो जाते हैं बल्कि अपने निहित स्वार्थों की ख़ातिर वो राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद को भी कलंकित करने से बाज़ नहीं आते।

अब बात मोदी सरकार की आर्थिक उपलब्धियों की। इसका सिर्फ़ एकलौता सुखद पहलू ये रहा है कि मोदी सरकार ने देश में आयकर रिटर्न भरने वालों की संख्या में इज़ाफ़ा हासिल किया है। हालाँकि, आयकर जैसे प्रत्यक्ष करों से सरकारी ख़ज़ाने को होने वाली आमदनी में कोई ख़ास बढ़ोत्तरी नहीं हुई। दूसरी ओर मोदी राज में अप्रत्यक्ष करों की दरों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। अप्रत्यक्ष करों की मार ग़रीबों पर ज़्यादा पड़ती है। पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतों में लगी आग से भी सबसे अधिक ग़रीबों को ही चोट पहुँची है। क्योंकि हमारे देश में ग़रीबों और निम्न आयवर्ग के लोगों की तादाद बहुत अधिक है। ईंधन के महँगा होने का भारी असर उन सभी चीज़ों पर कहीं अधिक पड़ता है, जिनका ताल्लुक इन कमज़ोर तबकों से होता है।

अन्य आर्थिक नीतियों के लिहाज़ से देखें तो नोटबन्दी की नीति न सिर्फ़ हर मायने में फेल रही है, बल्कि इसने अर्थव्यवस्था का भट्टा बिठाने का काम किया है। मोदी राज में सरकारी बैंकों ने सुनियोजित लूट की ऐसी वारदातें हुई, जिनसे पता चलता है कि सरकार अपना काम ठीक से करने में पूरी तरह विफल रही है। रिकॉर्ड-तोड़ एनपीए की वजह से हमारे ज़्यादातर बैंकों की हालत तो ये हो चुकी है कि यदि उनमें जनता के गाढ़े ख़ून-पसीने की कमाई को नहीं ठूँसा गया तो वो दम तोड़ देंगे। नोटबन्दी ने उद्योग-व्यापार की कमर तोड़ दी। इससे बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी पैदा हुई। इसकी सबसे तगड़ी मार तो देश के उस असंगठित क्षेत्र पर पड़ी, जिसमें देश की 90 फ़ीसदी आबादी रहती है और जिसकी दुर्दशा के बारे में सरकार के पास कोई आँकड़ा तक नहीं है। जीएसटी एक अच्छा आर्थिक सुधार साबित हो सकता था। लेकिन मोदी राज ने जिस तरह से पर्याप्त तैयारी किये बग़ैर इसे लागू किया, उससे नकारात्मक नतीज़े ही हासिल हुए।

मोदी सरकार ने जनहित से जुड़ी बहुत सारी पुरानी योजनाओं के नाम बदलकर उन्हें अपनी कामयाबी के रूप में पेश किया। लेकिन हरेक योजना के मोर्चे पर सरकार के दावों और सच्चाई में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ है। इसीलिए अपनी उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने के लिए मोदी सरकार ने क़रीब साढ़े चार हज़ार करोड़ रुपये प्रचार और विज्ञापनों पर बहा दिये।

संचार भी पूरी तरह से केन्द्र सरकार का विषय है। ये किसी से छिपा नहीं है कि यदि आज हरेक व्यक्ति के हाथ में मोबाइल है तो ये पिछली सरकार की देन है। लेकिन यदि आज हरेक व्यक्ति चरमरा चुकी मोबाइल व्यवस्था से पीड़ित है तो वो पूरी तरह से मोदी सरकार की नाकामी की कहानी ही कहता है। कॉल ड्रॉप और डाटा स्पीड की समस्या देशव्यापी है और बीते चार साल में ये बद से बदतर ही होती रही।

रक्षा क्षेत्र में भी मोदी सरकार का प्रदर्शन बहुत दुःखद रहा है। कश्मीर के हालात मोदी राज में और बिगड़े हैं। अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने और कश्मीरी पंडितों की घर-वापसी के बेहद अहम वादों पर मोदी राज की कोई उपलब्धि नहीं है। सीमा पर होने वाली गोलीबारी और कश्मीर में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद की वजह से मोदी राज में सैनिकों और नागरिकों दोनों को हुए नुकसान ने कीर्तिमान बनाया है।

विदेश नीति के मोर्चे पर भी मोदी सरकार को चौतरफ़ा नाकामी ही हाथ लगी है। मोदी राज में भारत के अपने सभी पड़ोसियों से रिश्ते मज़बूत नहीं बल्कि कमज़ोर हुए हैं। यही वजह है कि मोदी सरकार को विदेश में भी अपनी ब्रॉन्डिंग पर पानी की तरह पैसा बहाना पड़ता है। जबकि दूसरी ओर, देश का विदेशी व्यापार, निर्यात, विदेश निवेश सभी अहम क्षेत्रों की गिरावट का दौर रुकने का नाम नहीं ले रहा। इन क्षेत्रों की दशा कितनी ख़राब है, इसे डॉलर के मुक़ाबले लगातार और तेज़ी से गिर रहे रुपये की दशा से बहुत ही आसानी से समझा जा सकता है।

कुलमिलाकर, चार साल में मोदी राज ने तक़रीबन हर मोर्चे पर नाकाम किया है। अलबत्ता, अपने झूठ फैलाने वाली नीति और संघ जैसे फासिस्ट संगठन की बदौलत मोदी सरकार ने जनता में अपनी ऐसी छवि ज़रूर बनायी जिसमें उसे चुनावों में भरपूर कामयाबी मिली। इसीलिए, मोदी सरकार के कामकाज़ को यदि आप उसके झूठे दावों के आईने में देखेंगे तो आप धोखे में ही रहेंगे। सच्चाई को जानने के लिए आपको, अपने आप से, बस एक लाइन का सवाल पूछना चाहिए कि क्या मोदी राज के 4 साल में आपकी तकलीफ़ों में इज़ाफ़ा हुआ है या नहीं? इस राज में आप ज़्यादा सुखी बने हैं या ज़्यादा दुःखी? आपके अनुभव आपको सच के सिवाय और कुछ नहीं बताएँगे। फिर आपको किसी और की बातों में आने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी!

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

ब्लॉग

कैग ने रक्षा मंत्रालय के बेंचमार्क मूल्य अनुमान में खामियां पाईं

Published

on

By

Rafale deal scam

नई दिल्ली, 13 फरवरी | भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (कैग) ने 36 राफेल विमान समेत प्रस्तावित रक्षा खरीद के चार सौदों के बेंचमार्क मूल्य अनुमान में खामियां पाईं हैं।

कैग ने वायुसेना की हालिया 11 अधिग्रहणों पर अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है, “लगातार बेंचमार्क के गलत होने से रक्षा रखीद प्रणाली में लागत निर्धारण विशेषज्ञता की कमी का पता चलता है।”

कैग ने कहा कि रक्षा मंत्रालय का बेंचमार्क मूल्य अनुमान और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार द्वारा 126 राफेल विमान सौदे में प्रस्तावित वास्तविक कीमत में 47 फीसदी का अंतर है।

मोदी सरकार द्वारा 36 राफेल विमान के लिए किए गए करार में बेंचमार्क और वास्तविक कीमत में 56.67 फीसदी का अंतर है। रिपोर्ट में वास्तविक राशि को गुप्त रखा गया है।

रक्षा मंत्रालय ने 15 चिनूक हेवी लिफ्ट हेलीकॉप्टर की खरीद में अनुमानित बेंचमार्क कीमत 4,119.72 करोड़ रुपये रखी है, लेकिन निविदा मूल्य 6,473.91 करोड़ रुपये है।

पांच फुल मिशन सिम्युलेटर्स की खरीद में रक्षा मंत्रालय की अनुमानित लागत 444.8 लाख डॉलर थी, लेकिन वास्तविक कीमत 796.1 लाख डॉलर थी।

कैग ने कहा कि अंतिम खरीदों की कीमतें प्राय: अनुमान के लिए लगाई गई थीं। रिपोर्ट में कैग ने कहा है, “अंतिम खरीद बहुत पुरानी थी, उत्पादन भी एक जैसे नहीं थे।”

लेखापरीक्षक ने कहा है कि ज्यादातर लागत निर्धारण, मूल्य अनुमान और कीमतों की तुलना प्राय: वायुसेना के मुख्यालय में रक्षा मंत्रालय के लागत सलाहकारों की मदद से या उनकी मदद के बिना की गई।

Continue Reading

ब्लॉग

अब इमामी, अपोलो के निवेशकों का धन डूबने का खतरा

जैसा कि जी के मामले में हुआ था, एमएफ्स ने गिरवी रखे शेयरों को इसलिए नहीं बेचा था कि इससे शेयरों के दाम तेजी से गिर जाएंगे और मूल रकम की वसूली नहीं हो पाएगी। इससे यह सवाल उठ खड़ा होता है कि जब गिरवी रखे शेयरों को भुनाकर कर्ज की वसूली नहीं की जा सकती तो एमएफ्स ने क्या सोचकर इतनी भारी-भरकम रकम का कर्ज शेयरों को गिरवी रखकर दिया।

Published

on

By

apoll hospital

नई दिल्ली, 11 फरवरी | जी के शेयरों के पतन के बाद म्यूचुअल फंड्स (एमएफ्स) और एनबीएफसीज की नसों में पहले से ही सिहरन दौड़ रही है। इस बीच सोमवार को एक नया नाम सामने आया है, जो ताजा झटके देनेवाला है। कोलकाता की कंपनी इमामी लि. पर एमएफ्स का भारी-भरकम 2,000 करोड़ रुपये का कर्ज है, जो कंपनी के प्रमोटरों को इमामी के सूचीबद्ध शेयरों को गिरवी रखकर दिया गया था। इमामी समूह पर गैर-एमएफ्स कर्जदाताओं के भी शेयरों को गिरवी रखकर बड़ी रकम का कर्ज दिया गया (प्रतिभूतियों के बदले कर्ज) है। इमामी के प्रमोटरों की कंपनी में 72 फीसदी हिस्सेदारी है, जिसमें से आधा कर्ज के बदले गिरवी रखा हुआ है।

समस्या यह है कि इमामी के शेयरों की दैनिक ट्रेडिंग की मात्रा मुश्किल से 10-12 करोड़ रुपये है। इमामी के शेयर अपने उच्च स्तर से फिलहाल आधी कीमत पर हैं और आगे कभी भी भरभराकर गिर सकते हैं। साल 2015 में इमामी ने केश किंग का 1,684 करोड़ रुपये में अधिग्रहण किया था और इसके लिए 950 करोड़ रुपये शेयर गिरवी रखकर कर्ज के रूप में जुटाए थे। उसने केश किंग और संबंधित ब्रांड्स को एसबीएस बॉयोटेक से खरीदा था, जिस सौदे को विश्लेषकों ने उस वक्त काफी महंगा करार दिया था।

सोमवार को इंट्राडे कारोबार में कंपनी के शेयरों में 11 फीसदी गिरावट दर्ज की गई, जो कि चार सालों के न्यूनतम स्तर 336 रुपये प्रति शेयर रही, हालांकि बाद में कुछ सुधार देखा गया और चार फीसदी की गिरावट के साथ 368 रुपये प्रति शेयर की दर पर बंद हुए।

जैसा कि जी के मामले में हुआ था, एमएफ्स ने गिरवी रखे शेयरों को इसलिए नहीं बेचा था कि इससे शेयरों के दाम तेजी से गिर जाएंगे और मूल रकम की वसूली नहीं हो पाएगी। इससे यह सवाल उठ खड़ा होता है कि जब गिरवी रखे शेयरों को भुनाकर कर्ज की वसूली नहीं की जा सकती तो एमएफ्स ने क्या सोचकर इतनी भारी-भरकम रकम का कर्ज शेयरों को गिरवी रखकर दिया।

इसके अलावा अपोलो हॉस्पिटल के शेयरों की कीमत में सोमवार को कारोबार में 11 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। यह कंपनी के शेयरों में पिछले सात सालों में किसी एक दिन हुई सबसे बड़ी गिरावट है, जिससे निवेशक घबराए हुए हैं। कंपनी में प्रमोटरों की 34 फीसदी हिस्सेदारी है और उन्होंने अपने करीब 75 फीसदी शेयर गिरवी रखे हैं, जिससे निवेशक समुदाय में भय का माहौल है।

सोमवार को कंपनी के शेयरों में आई भारी गिरावट के पीछे मद्रास उच्च न्यायालय का अपोलो की उस याचिका पर अंतरिम आदेश पारित करने से इनकार करना है, जिसमें मांग की गई थी कि तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे. जयललिता को 2016 में उनकी मृत्यु से पहले अपोलो अस्पताल में किए गए इलाज की शुद्धता और पर्याप्तता को देखने के लिए एक जांच आयोग के गठन पर रोक लगाई जाए।

Continue Reading

ओपिनियन

काले धन को सफेद करने के लिए भावांतर योजना शुरू की गई थी : कमलनाथ

Published

on

kamal nath

प्रमुख राज्यों और सहयोगियों को संभालने वाले एक सशक्त कैबिनेट मंत्री और कांग्रेस महासचिव कमलनाथ ने मध्यप्रदेश की सत्ता के केंद्र भोपाल को बखूबी अपना लिया है। विशुद्ध राजनीति की कला में माहिर राज्य के 18वें मुख्यमंत्री जिन्होंने भारत को कांग्रेस मुक्त करने की भाजपा के विजय रथ को रोक दिया है, उन पर अब एक बड़ी जिम्मेदारी है। जन्मजात रणनीतिक और सामरिक सोच के धनी नेता अब राज्य में हर उस चीज को दुरुस्त करने के काम में जुट गए हैं जो गड़बड़ाई हुई है।

राज्य में खेती और ग्रामीण संकट के साथ ही संभवत: बेरोजगारी वह एकमात्र सबसे बड़ा कारण रही, जिसने कांग्रेस को जीत दिलाई।

इस संकट की गंभीरता के बारे में पूछे जाने पर नाथ ने इसके उन्मूलन के उपायों पर बात करते हुए कहा, “राज्य में रोजगार की स्थिति बहुत बुरी है। जिन संसाधनों का प्रयोग राज्य के विकास को गति देने के लिए किया जा सकता था, उनका व्यर्थ जाना बेहद दुखद है। पद संभालने के पहले दिन ही, मैंने राज्य में 70 प्रतिशत स्थानीय युवाओं को उद्यमों में रोजगार देना अनिवार्य कर दिया ताकि उन्हें औद्योगिक प्रोत्साहन मिले।”

उन्होंने कहा, “समय के साथ हम ऐसी और योजनाएं लेकर आएंगे, जिनसे रोजगार पैदा होंगे और उद्यमों के सशक्तीकरण के लिए काम करेंगे। हमारी सरकार युवाओं के कौशल विकास, रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए उद्यमों के विकास और शिक्षा की गुणवत्ता पर ध्यान दे रही है। गणतंत्र दिवस के मौके पर हमने एक नई योजना ‘युवा स्वाभिमान योजना’ की घोषणा की। इसके तहत हम साल में पूरे 100 दिन राज्य के युवाओं को काम देंगे। कृषि संकट के मामले में, पिछले कुछ सालों में मंदसौर दो बार किसानों के लिए कृषि संकट के क्षेत्र में भाजपा की नीतियों के खिलाफ मोर्चा खोलने का मुख्य केंद्र बना।”

दिल्ली में बैठे हुए भी, हर किसी ने मध्यप्रदेश में कृषि संकट और किस प्रकार मंदसौर इसके खिलाफ विरोध का केंद्र बना, इस बारे में सुना।

कमलनाथ ने भाजपा सरकार की भावांतर योजना शुरू होने और फिर उसे बंद करने के बारे में बात करते हुए कहा, “मध्यप्रदेश भारत के सबसे बड़े कृषि प्रधान राज्यों में से एक है। इसकी करीब 70 फीसदी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर कृषि से जुड़ी है। यह बेहद दुख की बात है कि किसानों की आत्महत्या के मामले में मध्यप्रदेश देश में सबसे ऊपर है। अगर राज्य किसानों के लिए किसी आदर्श स्थिति में होता, जैसा कि पिछली भाजपा सरकार द्वारा कहा जा रहा था, तो स्थिति काफी अलग होती।”

उन्होंने कहा, “किसानों का आक्रोश और उनके प्रति सरकार की बेरुखी मंदसौर की घटना से ही स्पष्ट है। कृषि संकट का एक बड़ा कारण यह है कि किसानों को उनकी फसलों का उचित मूल्य नहीं मिलता। भावांतर योजना केवल काले धन को सफेद करने के लिए शुरू की गई थी, इस संकट को दूर करने के लिए नहीं। यह पूरी तरह त्रुटिपूर्ण थी और इसलिए इसका विफल होना तय था।”

कमलनाथ ने कहा, “हम ‘भावांतर योजना’ को नए रूप में पेश करने जा रहे हैं और ऐसे उपाय लेकर आ रहे हैं, जिनसे किसानों को उनका हक मिलेगा। अपने वादे पर कायम रहते हुए हमने सरकार में आते ही किसानों के ऋण माफ कर दिए और राज्य के किसानों के कल्याण के लिए ऐसी और भी नीतियां बनाएंगे।”

फिर से कांग्रेस के केंद्र की सत्ता में आने के सवाल पर कमलनाथ ने कहा, “मुझे पूरा भरोसा है कि हम बहुमत के साथ सत्ता में आएंगे। पिछले चुनाव में भाजपा की जीत और कुछ नहीं, बस एक संयोग था। हालांकि आप लोगों को लंबे समय तक मूर्ख नहीं बना सकते। नोटबंदी और जीएसटी जैसी चीजें पूरी तरह विफल हुई हैं और लोग अब बदलाव चाहते हैं।”

उन्होंने कहा, “लोगों में भाजपा विरोधी भावना है और हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव के परिणामों में यह साफ दिखाई दे रहा है। अगर हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता की बात करें तो यह कम होने लगी है। हमारे प्रधानमंत्री की लोकप्रियता का ग्राफ जहां नीचे गिर रहा है, राहुल गांधी का ऊपर बढ़ रहा है।”

भाजपा और कांग्रेस का वोट शेयर काफी ज्यादा था और अंत में केवल मामूली अंतर से ही कांग्रेस को जीत हासिल हुई। कांग्रेस के पक्ष में बाजी जाने में किस चीज की भूमिका रही?

इस सवाल पर दून स्कूल और कोलकाता के सेंट जेवियर स्कूल से शिक्षित कमलनाथ ने कहा, “वक्त है बदलाव का। राज्य के लोग विकास की धीमी गति से थक चुके थे और बदलाव चाहते थे। हमारी रैलियों में भी सरकार विरोधी भावना साफ नजर आई।”

उन्होंने कहा, “अब राज्य के लोग दोनों सरकारों के बीच के अंतर को साफ महसूस कर रहे हैं। एक प्रदर्शन कर रही है और दूसरी ने कभी नहीं किया। मुझे पूरा भरोसा है कि लोग कांग्रेस को समर्थन देंगे जिसकी राज्य के विकास और सम्पन्नता के लिए काम करने की मजबूत इच्छाशक्ति है।”

Continue Reading
Advertisement
Bihar Candle March on Terror Attack
शहर7 hours ago

कश्मीर में आतंकी हमले से बिहार में आक्रोश

Junaid Khan Marry transgender
ज़रा हटके7 hours ago

इंदौर में युवक ने किन्नर से रचाया ब्याह

pulwama terror attack
राष्ट्रीय8 hours ago

सप्ताह भर पहले सीआरपीएफ, अन्य एजेंसियों को दी गई थी आईईडी हमले की चेतावनी

pulwama attack-min
राष्ट्रीय9 hours ago

पुलवामा हमले में शहीद होने वालों की संख्या हुई बढ़कर 49

Hina Jaiswal-min
राष्ट्रीय9 hours ago

हिना जायसवाल बनीं भारतीय वायु सेना की पहली महिला फ्लाइट इंजीनियर

nasscomm-min
टेक10 hours ago

देश में कुशल आईटी कर्मियों की कमी : नासकॉम

team india-min
खेल10 hours ago

आस्ट्रेलिया के खिलाफ भारतीय टीम की घोषणा

Sohail Mahmood
राष्ट्रीय10 hours ago

पुलवामा हमले पर पाक उच्चायुक्त तलब

sensex-min
व्यापार10 hours ago

शेयर बाजारों में गिरावट, सेंसेक्स 67 अंक नीचे

Theresa May-min
अंतरराष्ट्रीय11 hours ago

ब्रेक्सिट को लेकर हाउस ऑफ कॉमन्स में फिर हारीं थेरेसा मे

rose day-
लाइफस्टाइल1 week ago

Happy Rose Day 2019: करना हो प्यार का इजहार तो दें इस रंग का गुलाब…

Teddy Day
लाइफस्टाइल6 days ago

Happy Teddy Day 2019: अपने पार्टनर को अनोखे अंदाज में गिफ्ट करें ‘टेडी बियर’

mehul-choksi
राष्ट्रीय4 weeks ago

मेहुल चोकसी ने छोड़ी भारतीय नागरिकता

vailtine day
लाइफस्टाइल2 days ago

Valentines Day 2019 : इस वैलेंटाइन टैटू के जरिए करें प्यार का इजहार

dairy products
ब्लॉग4 weeks ago

बिहार : समस्तीपुर में डेयरी संयंत्र, भोजपुर में पशु आहार कारखाना लगेंगे

mukesh ambani
ब्लॉग4 weeks ago

मुकेश अंबानी ने ‘डेटा औपनिवेशीकरण’ के खिलाफ अभियान का आह्वान किया

Priyanka Gandhi
ओपिनियन3 weeks ago

प्रियंका के आगमन से चुनाव-पूर्व त्रिकोणीय हलचल

Digital Revolution
ज़रा हटके3 weeks ago

अरबपति बनिया कैसे बन गए डिजिटल दिशा प्रवर्तक

Priyanka Gandhi Congress
ओपिनियन3 weeks ago

क्या प्रियंका मोदी की वाक्पटुता का मुकाबला कर पाएंगी?

Priyanka Gandhi
चुनाव3 weeks ago

प्रियंका की ‘संजीवनी’ से उप्र में जिंदा हो सकती है कांग्रेस!

Most Popular