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मोदी राज के 4 साल में जनता के सुख बढ़े या दुःख ?

अब मोदी राज की चौथी सालगिरह के मौके पर सबसे अहम यक्ष-प्रश्न यही है कि क्या 2014 में मोदी को पूर्ण बहुमत देने से जनता के दिन फिरने जैसा कुछ हुआ या उसकी हालत पहले से बद्तर हो गयी?

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Narendra Modi

लोकतंत्र में जनता की सरकार से अपेक्षा होती है कि वो उनकी ज़िन्दगी के कष्टों को दूर करेगी और इसे सुखमय बनाएगी। इसी मकसद को हासिल करने के लिए जनता की ओर से सरकार को ‘सर्वाधिकार सुरक्षित’ बनाया जाता है। सरकार को अपने वादों को निभाने के लिए मनमाफ़िक क़ानून बनाने और उसे लागू करने की छूट होती है। जनता से वो मनमाफ़िक टैक्स वसूलती है। इसी से उसे सारी व्यवस्था को इस ढंग से चलाना होता है जिससे जनता की ज़िन्दगी ख़ुशगवार बन सके। अब मोदी राज की चौथी सालगिरह के मौके पर सबसे अहम यक्ष-प्रश्न यही है कि क्या 2014 में मोदी को पूर्ण बहुमत देने से जनता के दिन फिरने जैसा कुछ हुआ या उसकी हालत पहले से बद्तर हो गयी?

मज़े की बात ये है कि इस आसान से सवाल का जबाब हर कोई जानता है! फिर चाहे वो भक्त हो या अभक्त! मोदी समर्थक हो या विरोधी! लेकिन अफ़सोस कि सच बोलने और बताने वालों की संख्या आज अँगुलियों पर गिनी जा सकती है। क्योंकि मोदी राज ने उस मीडिया को अपना भोंपू बना लिया है, जिसका पहला फ़र्ज़ है जनसरोकारों को लेकर सरकारों को झकझोरना और व्यवस्था में जबाबदेही तथा पारदर्शिता को बढ़ाना। इसीलिए मीडिया को लोकतंत्र की इमारत का चौथा खम्भा कहा जाता है। लेकिन आज आपको देश में एक भी ऐसा समझदार व्यक्ति नहीं मिलेगा जिसे लगता हो कि मोदी राज में मीडिया अपना काम ठीक से कर रहा है। वो उन मुद्दों और मसलों पर अपनी संवेदनशीलता दिखा रहा है, जो किसी स्वस्थ लोकतंत्र में जबाबददेह मीडिया से अपेक्षित है। मीडिया की ऐसी दुर्दशा से लोकतंत्र का चौथा खम्भा ख़ुद को कोस रहा है। मोदी राज की पहली और सबसे बड़ी दुःखद देन है!

लोकतंत्र अपनी संस्थाओं और क़ानून के राज से चलता है। इस मोर्चे पर भी मोदी राज के चार सालों ने भारत की छवि पर ऐसा बट्टा लगाया है, जो पहले कभी नहीं दिखा। सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस हर मायने में ना सिर्फ़ ऐतिहासिक है, बल्कि वो जीता-जागता सबूत भी है कि कैसे सियासी दख़ल की वजह हमारी न्यायपालिका सिसक रही है! जो लोग इसे मामूली खींचतान के रूप में देखते हैं, उन्हें पता ही नहीं है कि न्यायपालिका को मुट्ठी में रखने के लिए मोदी सरकार ने चार साल में क्या-क्या खिचड़ी पकायी है! जनता को सच्चाई का पता इसलिए भी नहीं चल रहा क्योंकि मीडिया अपना काम नहीं कर रहा। यहाँ तक कि वो विपक्ष की आवाज़ को भी जनता तक नहीं पहुँचने दे रहा। न्यायपालिका का गला घोटना, मोदी राज की दूसरी सबसे दुःखद और विनाशकारी देन है।

चुनाव आयोग की गरिमा का पतन! ये मोदी राज की तीसरी सबसे दुःखद उपलब्धि है। चुनाव आयोग के रूप में मोदी सरकार ने जिन लोगों को वहाँ नियुक्त किया, उनकी निष्ठा देश के संविधान के प्रति नहीं, बल्कि अपने सियासी आकाओं के प्रति है। यही वजह है कि मोदी राज में चुनाव आयोग ने एक से बढ़कर एक, ऐसे फ़ैसले लिये, जिससे उसकी निष्पक्षता तार-तार हो गयी। मिसाल के तौर पर हिमाचल और गुजरात विधानसभा चुनावों के कार्यक्रम को अलग-अलग करना, चुनाव की तारीख़ों का लीक होना। आयोग के ईवीएम पर उठे सवालों ने तो उसकी सारी प्रतिष्ठा को ही मिट्टी में मिला दिया।

सीएजी यानी भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक भी देश की अहम संवैधानिक संस्था है। इसका काम सरकारी पैसे के सही इस्तेमाल पर नज़र रखना है। लेकिन मोदी राज में ये संस्था भी रीढ़-विहीन हो गयी। पूर्व सीएजी विनोद राय ने मनमोहन सिंह सरकार को बदनाम करने के लिए संघ की कठपुतली का काम किया। उन्होंने तमाम मनगढ़न्त घोटालों की बातें कीं। लेकिन मोदी राज के चार साल में एक भी कथित घोटाले के आरोपियों के ख़िलाफ़ आरोपपत्र तक दाख़िल नहीं हो सका। 2जी और आदर्श मामले में तो बाक़ायदा अदालतों ने फ़ैसला सुनाया है कि कोई घोटाला नहीं हुआ। लेकिन सीएजी के क़ायदे उस वक़्त बदल गये, जब उससे नोटबन्दी के फ़ैसले से हुए नफ़ा-नुकसान का पता लगाने की माँग की गयी। यानी, इस अहम संवैधानिक संस्था का हाल ये हो चुका है कि व्यक्ति के बदलने से उसकी नीतियाँ बदल गयीं! सीएजी का पतन, मोदी राज की चौथी सबसे दुःखद उपलब्धि है।

संसद देश की सर्वोच्च संवैधानिक संस्था है। लेकिन पूर्ण बहुमत वाली मोदी राज में भी संसद की गरिमा की धज़्ज़ियाँ उड़ती रहीं। और, इससे भी दुःखद ये है कि इस कुकर्म को सीधे-सीधे सरकार में बैठे लोगों में डंके की चोट पर अंज़ाम दिया। सरकार ने उस विश्वास मत का सामना करने की भी हिम्मत नहीं दिखायी, जिसमें उसके गिरने की कोई आशंका तक नहीं थी। बीते चार साल में मोदी सरकार के पास कभी ऐसी लचीलापन नज़र नहीं आया, जब ये लगा हो कि वो विपक्ष को भी साथ लेकर चलने का जज़्बा, लचीलापन और दूरदर्शिता रखती है।

सरकार ने विपक्ष के अंकुश से बचने के लिए स्पीकर की संवैधानिक संस्था का भी बेज़ा इस्तेमाल किया। इससे विधेयकों को भी वित्तीय विधेयक बना दिया, जो इसके दायरे में नहीं आते थे, ताकि वो राज्यसभा की ताक़त से बचाये जा सकें। क्योंकि तब राज्यसभा में मोदी सरकार के पास बहुमत नहीं था। लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति मोदी सरकार में निष्ठा के नदारद होने की वजह से ही अब संसद सत्र की मियाद अपने निम्नतम स्तर पर आ चुकी है। संसद की दुर्दशा, मोदी राज की पाँचवी सबसे दुःखद उपलब्धि है।

विपक्ष की ओर से मोदी राज की होने वाली सटीक आलोचनाओं को भी राजनीति से प्रेरित बताया जा सकता है। लेकिन यही बात बीजेपी के वरिष्ठ नेता रहे यशवन्त सिन्हा, अरूण शौरी, शत्रुघ्न सिन्हा और राम जेठमलानी जैसे लोगों की आलोचना पर लागू नहीं हो सकती। इन्होंने बीजेपी में रहते हुए मोदी राज की इतनी तीख़ी आलोचनाएँ की हैं, जिसकी कोई और मिसाल नहीं है। यही वजह है कि चाल-चरित्र और चेहरा की बातें करने वाले सत्ता की ख़ातिर किसी भी स्तर तक न सिर्फ़ ख़ुद गिरने को तैयार हो जाते हैं बल्कि अपने निहित स्वार्थों की ख़ातिर वो राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद को भी कलंकित करने से बाज़ नहीं आते।

अब बात मोदी सरकार की आर्थिक उपलब्धियों की। इसका सिर्फ़ एकलौता सुखद पहलू ये रहा है कि मोदी सरकार ने देश में आयकर रिटर्न भरने वालों की संख्या में इज़ाफ़ा हासिल किया है। हालाँकि, आयकर जैसे प्रत्यक्ष करों से सरकारी ख़ज़ाने को होने वाली आमदनी में कोई ख़ास बढ़ोत्तरी नहीं हुई। दूसरी ओर मोदी राज में अप्रत्यक्ष करों की दरों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। अप्रत्यक्ष करों की मार ग़रीबों पर ज़्यादा पड़ती है। पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतों में लगी आग से भी सबसे अधिक ग़रीबों को ही चोट पहुँची है। क्योंकि हमारे देश में ग़रीबों और निम्न आयवर्ग के लोगों की तादाद बहुत अधिक है। ईंधन के महँगा होने का भारी असर उन सभी चीज़ों पर कहीं अधिक पड़ता है, जिनका ताल्लुक इन कमज़ोर तबकों से होता है।

अन्य आर्थिक नीतियों के लिहाज़ से देखें तो नोटबन्दी की नीति न सिर्फ़ हर मायने में फेल रही है, बल्कि इसने अर्थव्यवस्था का भट्टा बिठाने का काम किया है। मोदी राज में सरकारी बैंकों ने सुनियोजित लूट की ऐसी वारदातें हुई, जिनसे पता चलता है कि सरकार अपना काम ठीक से करने में पूरी तरह विफल रही है। रिकॉर्ड-तोड़ एनपीए की वजह से हमारे ज़्यादातर बैंकों की हालत तो ये हो चुकी है कि यदि उनमें जनता के गाढ़े ख़ून-पसीने की कमाई को नहीं ठूँसा गया तो वो दम तोड़ देंगे। नोटबन्दी ने उद्योग-व्यापार की कमर तोड़ दी। इससे बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी पैदा हुई। इसकी सबसे तगड़ी मार तो देश के उस असंगठित क्षेत्र पर पड़ी, जिसमें देश की 90 फ़ीसदी आबादी रहती है और जिसकी दुर्दशा के बारे में सरकार के पास कोई आँकड़ा तक नहीं है। जीएसटी एक अच्छा आर्थिक सुधार साबित हो सकता था। लेकिन मोदी राज ने जिस तरह से पर्याप्त तैयारी किये बग़ैर इसे लागू किया, उससे नकारात्मक नतीज़े ही हासिल हुए।

मोदी सरकार ने जनहित से जुड़ी बहुत सारी पुरानी योजनाओं के नाम बदलकर उन्हें अपनी कामयाबी के रूप में पेश किया। लेकिन हरेक योजना के मोर्चे पर सरकार के दावों और सच्चाई में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ है। इसीलिए अपनी उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने के लिए मोदी सरकार ने क़रीब साढ़े चार हज़ार करोड़ रुपये प्रचार और विज्ञापनों पर बहा दिये।

संचार भी पूरी तरह से केन्द्र सरकार का विषय है। ये किसी से छिपा नहीं है कि यदि आज हरेक व्यक्ति के हाथ में मोबाइल है तो ये पिछली सरकार की देन है। लेकिन यदि आज हरेक व्यक्ति चरमरा चुकी मोबाइल व्यवस्था से पीड़ित है तो वो पूरी तरह से मोदी सरकार की नाकामी की कहानी ही कहता है। कॉल ड्रॉप और डाटा स्पीड की समस्या देशव्यापी है और बीते चार साल में ये बद से बदतर ही होती रही।

रक्षा क्षेत्र में भी मोदी सरकार का प्रदर्शन बहुत दुःखद रहा है। कश्मीर के हालात मोदी राज में और बिगड़े हैं। अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने और कश्मीरी पंडितों की घर-वापसी के बेहद अहम वादों पर मोदी राज की कोई उपलब्धि नहीं है। सीमा पर होने वाली गोलीबारी और कश्मीर में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद की वजह से मोदी राज में सैनिकों और नागरिकों दोनों को हुए नुकसान ने कीर्तिमान बनाया है।

विदेश नीति के मोर्चे पर भी मोदी सरकार को चौतरफ़ा नाकामी ही हाथ लगी है। मोदी राज में भारत के अपने सभी पड़ोसियों से रिश्ते मज़बूत नहीं बल्कि कमज़ोर हुए हैं। यही वजह है कि मोदी सरकार को विदेश में भी अपनी ब्रॉन्डिंग पर पानी की तरह पैसा बहाना पड़ता है। जबकि दूसरी ओर, देश का विदेशी व्यापार, निर्यात, विदेश निवेश सभी अहम क्षेत्रों की गिरावट का दौर रुकने का नाम नहीं ले रहा। इन क्षेत्रों की दशा कितनी ख़राब है, इसे डॉलर के मुक़ाबले लगातार और तेज़ी से गिर रहे रुपये की दशा से बहुत ही आसानी से समझा जा सकता है।

कुलमिलाकर, चार साल में मोदी राज ने तक़रीबन हर मोर्चे पर नाकाम किया है। अलबत्ता, अपने झूठ फैलाने वाली नीति और संघ जैसे फासिस्ट संगठन की बदौलत मोदी सरकार ने जनता में अपनी ऐसी छवि ज़रूर बनायी जिसमें उसे चुनावों में भरपूर कामयाबी मिली। इसीलिए, मोदी सरकार के कामकाज़ को यदि आप उसके झूठे दावों के आईने में देखेंगे तो आप धोखे में ही रहेंगे। सच्चाई को जानने के लिए आपको, अपने आप से, बस एक लाइन का सवाल पूछना चाहिए कि क्या मोदी राज के 4 साल में आपकी तकलीफ़ों में इज़ाफ़ा हुआ है या नहीं? इस राज में आप ज़्यादा सुखी बने हैं या ज़्यादा दुःखी? आपके अनुभव आपको सच के सिवाय और कुछ नहीं बताएँगे। फिर आपको किसी और की बातों में आने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी!

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

चुनाव

मप्र में शिवराज के दांव पर कांग्रेस ने फेंका जाल

कांग्रेस का वचनपत्र मध्यप्रदेश की समृद्धि का नया इतिहास लिखेगा। यह विकास के साथ-साथ प्रदेश के हर नागरिक, चाहे वह किसान हो, युवा हो, गरीब मजदूर हो, महिला हो, इससे सभी वर्गो की तरक्की का मार्ग प्रशस्त होगा।

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Shivraj-Ajay

भोपाल, 10 नवंबर | मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के ‘किसानपुत्र’, ‘महिला हितैषी’ और ‘युवाओं के हमदर्द’ होने के दांव पर कांग्रेस ने ‘वचनपत्र’ के जरिए ऐसा जाल फेंका है, जो शिवराज की बीते डेढ़ दशक में बनी छवि पर चादर डालता दिख रहा है।

शिवराज की अगुवाई में भाजपा तीसरा विधानसभा चुनाव लड़ने जा रही है। पिछले दो चुनावों में शिवराज की जीत में किसानों और महिलाओं की बड़ी भूमिका रही है। लाडली लक्ष्मी योजना और किसानों के लिए बनी योजनाओं ने शिवराज के सिर जीत का सेहरा बांधा था। शिवराज और भाजपा इस बार भी जीतने की रणनीति में व्यस्त है, मगर इसी बीच शनिवार को कांग्रेस ने ऐसा ‘वचनपत्र’ जारी किया, जिसमें सरकार बनने पर किसानों, युवाओं और महिलाओं के जीवन में बड़ा बदलाव लाने के वादे किए गए हैं।

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक साजी थॉमस कहते हैं कि शिवराज बीते डेढ़ दशक में राज्य में खुद को किसानपुत्र, महिलाओं का भाई, लड़कियों का मामा और युवाओं के आदर्श के तौर पर स्थापित हो चुके हैं। कांग्रेस ने अपने वचनपत्र में उन्हीं वर्गो के जीवन को बदलने का वादा किया है, जो शिवराज के निशाने पर और उनका सबसे बड़ा वोट बैंक रहा है। कांग्रेस के वादे पर यह वर्ग कितना भरोसा करता है, यह तो समय ही बताएगा।

विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने कहा, “कांग्रेस का वचनपत्र मध्यप्रदेश की समृद्धि का नया इतिहास लिखेगा। यह विकास के साथ-साथ प्रदेश के हर नागरिक, चाहे वह किसान हो, युवा हो, गरीब मजदूर हो, महिला हो, इससे सभी वर्गो की तरक्की का मार्ग प्रशस्त होगा।”

वहीं कांग्रेस के वचनपत्र पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने चुटकी लेते हुए कहा कि कांग्रेस वचन तो देती है, मगर उसे पूरा कभी नहीं करती। इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाने का वचन दिया था, मगर गरीबी नहीं हटी। राजीव गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था, मगर गरीबी की जगह गरीब ही हटा दिए।

सच तो यह है कि भाजपा किसानों की आय दोगुनी करने और उन्हें फसल का उचित दाम दिलाने के वादे करती रही, मगर सरकार की ये कोशिशें जमीनी स्तर पर रंग नहीं ला पाईं। बीते दो साल में किसानों के कई आंदोलनों ने सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया है।

वहीं उद्योगों की स्थापना के बावजूद पर्याप्त संख्या में युवाओं को रोजगार नहीं मिला, साथ ही महिला असुरक्षा की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई। इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखकर कांग्रेस ने वचनपत्र तैयार किया है, और सभी वर्गो से वादे किए हैं कि उनके कल्याण की योजनाएं तो बनेंगी ही, साथ ही शिक्षा और स्वास्थ्य के हालात में बदलाव आाएगा।

बहरहाल, कांग्रेस का वचनपत्र तो आ गया है, अब भाजपा का घोषणापत्र आने वाला है। अब देखना होगा कि भाजपा की क्या रणनीति होती है और वह कांग्रेस के वादों का किस तरह जवाब देती है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने तो मीडिया के सामने कह दिया है कि भाजपा संकल्पपत्र बनाती है, जो महज ‘जुमलापत्र’ बनकर रह जाता है।

–आईएएनएस

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ब्लॉग

व्यंग्य – जन-गण नामकरण आन्दोलन: मुसलमान मंत्री बदलें नाम, अब ‘पक्षीफल’ कहलाएगा अंडा

भगवा ख़ानदान का इरादा है कि ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ को राम मन्दिर आन्दोलन से भी बड़ा और विश्वव्यापी बनाया जाएगा! हिन्दुत्व के नायकों का मानना है कि ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ के आगे बढ़ने से मुसलमानों में गुस्सा पैदा होगा। यदि इस गुस्से को और भड़का दिया जाए तो जहाँ-तहाँ साम्प्रदायिक दंगों की आग भड़क जाएगी।

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Politicians Cartoon

अभी-अभी केन्द्रीय कैबिनेट की एक आपात और बेहद ख़ुफ़िया बैठक हुई है! इसमें पहली बार संघ, विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल के शीर्ष पदाधिकारी भी शामिल हुए! महामहिम चौकीदार महोदय ने सर्वोच्च स्तर की इस रणनीतिक मंत्रणा में अपने मंत्रियों को पीछे बैठाया और हिन्दू हित के संरक्षक महापुरुषों को अगली पंक्ति में बैठाया गया! बैठक में कई क्रान्तिकारी फ़ैसले लिये गये, लेकिन ये भी तय हुआ कि इनका औपचारिक ऐलान नहीं होगा! लिहाज़ा, सोशल मीडिया पर प्रकाशित इस पोस्ट को आप बड़ी ब्रेकिंग न्यूज़ मान सकते हैं!

सरकार ने तय किया है कि अब देश में ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ चलाया जाएगा! चुनाव आचार संहिता को देखते हुए अभी इस आन्दोलन का ऐलान नहीं किया जाएगा, लेकिन भगवा ख़ानदान का इरादा है कि ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ को राम मन्दिर आन्दोलन से भी बड़ा और विश्वव्यापी बनाया जाएगा! हिन्दुत्व के नायकों का मानना है कि ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ के आगे बढ़ने से मुसलमानों में गुस्सा पैदा होगा। यदि इस गुस्से को और भड़का दिया जाए तो जहाँ-तहाँ साम्प्रदायिक दंगों की आग भड़क जाएगी। और, ऐसा होते ही जहाँ मुसलमानों का क़त्लेआम शुरू हो जाएगा, वहीं हिन्दुओं के ध्रुवीकरण इतना ज़ोर पकड़ लेगा, जैसे जंगल की बेक़ाबू आग!

भगवा ख़ानदान का यक़ीन है कि यदि उसकी ये रणनीति परवान चढ़ गयी तो न सिर्फ़ आगामी विधानसभा चुनावों में बीजेपी को ऐतिहासिक कामयाबी मिलेगी, बल्कि 2019 के आम चुनाव में भी पार्टी कम से कम 350 सीटें जीतने में सफल होगी! कैबिनेट की विशेष बैठक में ये भी तय हुआ कि भगवा ख़ानदान के जुड़े लोग बड़े पैमाने पर शहरों, जगहों और भवनों के नाम बदलने की माँग करने वाले बयान देने पर ज़ोर दें। ताकि मीडिया में उन्हें भरपूर सुर्ख़ियाँ मिलती रहें। इसका सबसे बड़ा फ़ायदा ये होगा कि जनता का ध्यान राफ़ेल और नोटबन्दी जैसे विश्वस्तरीय घोटालों से हट जाएगा और वो मूर्खों की तरह से इस झाँसे में फँस जाएगी कि मोदी का कोई विकल्प नहीं है! मोदी अजेय है!

  1. मुसलमान मंत्री बदले नाम

भगवा ख़ानदान के आग्रह पर ढोंगी सरकार ने तय किया है कि देश भर में बीजेपी की सरकारों में जो भी इक्का-दुक्का मुसलमान मंत्री हैं, उनके नाम फ़ौरन बदले जाएँ! वर्ना, इन मुसलमानों को मंत्री पद गँवाना होगा!

  1. ‘पक्षीफल’ कहलाएगा अंडा

भगवान ख़ानदान ने तय किया है कि अब अंडे को ‘पक्षीफल’ कहा जाएगा! इस फल से न सिर्फ़ मन्दिरों में भगवान का भोग लगाया जा सकेगा, बल्कि व्रत-उपवास में इसे फलाहार के रूप में इस्तेमाल करना होगा!

  1. वीर सावरकर पक्षीपालक योजना

वीर सावरकर पक्षीपालक योजना की आत्मा को मेक इन इंडिया की आत्मा से जोड़ा जाएगा। भगवा ख़ानदान को यक़ीन है कि आत्माओं के मिलन वाली इस क्रान्तिकारी नीति से पक्षीफलों की माँग में ज़बरदस्त उछाल आएगा और पक्षीपालकों के रूप में कम से कम 10 करोड़ युवाओं के लिए रोज़गार के अवसर खुलेंगे। इसे वीर सावरकर पक्षीपालक योजना कहा जाएगा। प्रधानमंत्री फ़सल बीमा की सुविधा भी आरक्षण की तरह इस अद्भुत योजना के तहत में पहले दस साल तक मुफ़्त मिलेगी और भविष्य में भी इसे आरक्षण की ही तरह दस-दस वर्षों के लिए बढ़ाया जा सकेगा।

  1. दीनदयाल पकौड़ा योजना

वीर सावरकर पक्षीपालक योजना में उन लोगों को वरीयता मिलेगी जो अपने ‘भक्त होने का आधार कार्ड’ दिखा सकें और जो ‘दीनदयाल पकौड़ा योजना’ के लाभार्थी नहीं हो! ग़ौरतलब है कि प्रधानमंत्री पकौड़ा रोज़गार योजना का भी नया नामकरण कर दिया गया है! उसे अब ‘दीनदयाल पकौड़ा योजना’ कहा जाएगा!

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ओपिनियन

अंतिम सांस तक कांग्रेसी, मगर बेटे का साथ दूंगा : सत्यव्रत चतुर्वेदी

सत्यव्रत चतुर्वेदी के पिता बाबूराम चतुर्वेदी और मां विद्यावती चतुर्वेदी कांग्रेस की प्रमुख नेताओं में रही हैं। दोनों ने आजादी की लड़ाई लड़ी, इंदिरा गांधी के काफी नजदीक रहे।

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Satyavrat Chaturvedi

छतरपुर, 9 नवंबर | कांग्रेस के पूर्व प्रवक्ता और पूर्व राज्यसभा सदस्य सत्यव्रत चतुर्वेदी के बेटे नितिन बंटी चतुर्वेदी ने बगावत कर समाजवादी पार्टी का दामन थामकर छतरपुर जिले के राजनगर विधानसभा क्षेत्र से नामांकनपत्र भरा है। चतुर्वेदी का कहना है कि वे अंतिम सांस तक कांग्रेसी हैं, मगर एक पिता के तौर पर बेटे का हर संभव साथ देंगे, क्योंकि छुपकर राजनीति करना उनकी आदत में नहीं है।

नितिन बंटी चतुर्वेदी राजनगर विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के दावेदार थे, मगर कांग्रेस ने अंतिम समय में उसका टिकट काट दिया। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के कहने पर नितिन ने सपा का दामन थामकर चुनाव लड़ने का फैसला लिया।

सत्यव्रत चतुर्वेदी ने आईएएनएस से खास बातचीत में कहा, “नितिन बालिग है, उसे अपने फैसले करने का हक है, पिछले दो चुनाव से वह कांग्रेस से टिकट मांग रहा था, पार्टी ने हर बार अगले चुनाव का भरोसा दिलाया, मगर इस बार फिर वही हुआ। पार्टी ने टिकट नहीं दिया, इन स्थितियों में बंटी ने सपा से चुनाव लड़ने का फैसला लिया, यह उसका व्यक्तिगत फैसला है। मैं तो अंतिम सांस तक कांग्रेसी रहूंगा। हां, पिता के नाते बंटी का साथ दूंगा। छुपकर कहने और राजनीति करना आदत में नहीं है, जो करना है वह कहकर करता हूं, छुपाता नहीं हूं।”

चतुर्वेदी से जब पूछा गया कि बेटा सपा से चुनाव लड़ रहा है, पार्टी आप पर कार्रवाई कर सकती है, तो उनका जवाब था, “मैं कांग्रेस में जन्मा हूं, कांग्रेसी रक्त मेरी नसों में प्रवाहित होता है, दिल में कांग्रेस है, पार्टी को फैसले लेने का अधिकार है, मगर मेरे दिल से कोई कांग्रेस को नहीं निकाल सकता। अंतिम सांस भी कांग्रेस के लिए होगी।”

सत्यव्रत चतुर्वेदी के पिता बाबूराम चतुर्वेदी और मां विद्यावती चतुर्वेदी कांग्रेस की प्रमुख नेताओं में रही हैं। दोनों ने आजादी की लड़ाई लड़ी, इंदिरा गांधी के काफी नजदीक रहे। बाबूराम चतुर्वेदी राज्य सरकार में मंत्री रहे और विद्यावती कई बार सांसद का चुनाव जीतीं। बुंदेलखंड में उनकी हैसियत दूसरी इंदिरा गांधी के तौर पर रही है।

चतुर्वेदी के समकालीन नेताओं में शामिल दिग्विजय सिंह, कांतिलाल भूरिया, सुभाष यादव आदि ऐसे नेता हैं, जिनके परिवार में एक और एक से ज्यादा सदस्यों को कांग्रेस ने उम्मीदवार बनाया है, मगर चतुर्वेदी के बेटे को पार्टी ने टिकट देना उचित नहीं समझा। इसी के चलते उनके बेटे बंटी ने बगावत कर दी।

अन्य नेताओं के परिजनों को टिकट दिए जाने के सवाल पर चतुर्वेदी का कहना है, “इस सवाल का जवाब तो मैं नहीं दे सकता, यह जवाब तो पार्टी के बड़े नेता और टिकटों का वितरण करने वाले ही दे सकते हैं, जहां तक बात मेरी है, मन में तो मेरे भी सवाल आता है कि आखिर ऐसा हुआ क्यों।”

कांग्रेस में टिकट वितरण की कवायद छह माह पहले ही शुरू करने का ऐलान कर दिया गया था, जगह जगह पर्यवेक्षक भेजे गए, सर्वे का दौर चला, नेताओं की टीमों ने डेरा डाला और वादा किया गया कि न तो पैराशूट वाले नेता चुनाव मैदान में उतारे जाएंगे और न ही बीते चुनावों में भारी मतों से हारे उम्मीदवारों को मौका दिया जाएगा। मगर उम्मीदवारों की सूचियां इन सारे दावे और वादे की पोल खोलने के लिए काफी है।

चतुर्वेदी भी इस बात से हैरान हैं कि जो व्यक्ति पिछला चुनाव 38 और 40 हजार से हारा, उसे उम्मीदवार बना दिया गया। आखिर किसने और कैसा सर्वे किया, यह वे समझ नहीं पा रहे हैं। अब तो चुनाव के बाद ही पार्टी को इन हालात की समीक्षा करनी चाहिए, आखिर किसने किस तरह का खेल ख्ेाला।

–आईएएनएस

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