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मोदी सरकार के 4 साल में भारत हुआ पड़ोसियों से दूर

हमारा पड़ोसी श्रीलंका पाला बदलकर अब चीन के ज्यादा नजदीक हो गया है। चीन और श्रीलंका के बीच हम्बनटोटा को लेकर हुए समझौते ने भारत को श्रीलंका से दूर कर दिया। चीन ने अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना ‘वन बेल्ट, वन रोड’ के जरिए भारत को उसके पड़ोसी देशों से दूर करने की कूटनीतिक चाल चली, जिससे बेपरवाह मोदी ब्रिटेन और अमेरिका सहित यूरोपीय देशों का दौरा करने में मशगूल रहे।

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Narendra Modi

नई दिल्ली, 24 मई | आज से लगभग चार साल पहले जब भाजपा सत्ता में आई थी, तो सरकार ने ‘पड़ोसी प्रथम’ का नारा दिया था। सरकार की मंशा पड़ोसियों को अधिक तवज्जो देकर रिश्ते बेहतर करने की थी, लेकिन अब जब सरकार अपने कार्यकाल के चार साल पूरे करने जा रही है तो पलटकर देखने की जरूरत है कि हमारे पड़ोसियों ने हमसे दूरी क्यों बना ली?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में सार्क देशों के प्रमुखों को न्योता दिया था, जिसमें बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना को छोड़कर बाकी देशों के प्रमुखों ने शिरकत भी की थी। मोदी की ‘नेबर डिप्लोमेसी’ शुरुआती साल में चर्चा का विषय भी रही, लेकिन आज की तारीख में पाकिस्तान के साथ नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार, बांग्लादेश और भूटान के साथ भी भारत के संबंधों में तल्खी आ गई है।

हमारा पड़ोसी श्रीलंका पाला बदलकर अब चीन के ज्यादा नजदीक हो गया है। चीन और श्रीलंका के बीच हम्बनटोटा को लेकर हुए समझौते ने भारत को श्रीलंका से दूर कर दिया। चीन ने अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना ‘वन बेल्ट, वन रोड’ के जरिए भारत को उसके पड़ोसी देशों से दूर करने की कूटनीतिक चाल चली, जिससे बेपरवाह मोदी ब्रिटेन और अमेरिका सहित यूरोपीय देशों का दौरा करने में मशगूल रहे।

राजनीतिक मामलों के जानकार पुष्पेश पंत कहते हैं, “चीन एक सोची-समझी राजनीति के जरिए भारत के पड़ोसी देशों में अपना प्रभुत्व बढ़ा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी के दौरे अपनी छवि चमकाने के मकसद से अधिक हो रहे हैं। किसी देश का दौरा करने मात्र से संबंध नहीं सुधरते। आप पड़ोसी देशों की किस तरह से मदद करते हैं, यह अधिक मायने रखता है।”

हालांकि, श्रीलंका में चीन की चाल को नाकाम करने के लिए सेना प्रमुख ने कोलंबो का दौरा किया था, लेकिन श्रीलंका में चीन के लगातार निवेश के कारण यह दूरी कम नहीं हो पाई।

मोदी ने हमेशा से अपनी ‘पड़ोसी प्रथम’ की नीति में नेपाल को प्राथमिकता देने की बात कही। नेपाल में 2015 में भीषण भूकंप के बाद भारत ने बढ़-चढ़कर मदद भी की थी, जिससे नेपाल में मोदी की छवि को जबरदस्त लाभ पहुंचा लेकिन नेपाल में नए संविधान निर्माण के बाद मधेशियों की उपेक्षा से दोनों देशों के संबंधों में तल्खी बढ़ा दी।

इस दौरान नेपाल ने भारत पर आर्थिक नाकेबंदी का आरोप लगाया। इस आर्थिक नाकेबंदी के बीच नेपाल ने चीन से उम्मीदें लगाईं। इस आर्थिक नाकेबंदी के बाद ही नेपाल ने विचार किया कि यदि भविष्य में इस तरह की स्थिति उत्पन्न हो जाए तो भारत का विकल्प तो होना ही चाहिए और वह विकल्प नेपाल को चीन में नजर आया। भारत और नेपाल के बीच 2016 में संबंध उस समय निचले स्तरों तक पहुंच गए थे, जब नेपाली की राष्ट्रपति बिद्यादेवी भंडारी ने भारत दौरा रद्द कर अपने राजदूत को वापस बुला लिया था।

अब एक अन्य पड़ोसी म्यांमार की बात करें, तो म्यांमार में लगभग चार लाख भारतीय मूल के लोग रहते हैं। हाल के दिनों में म्यांमार और बांग्लादेश के बीच रोहिंग्या शरणार्थियों को लेकर विवाद रहा, लेकिन भाजपा के नेतृत्व वाली राजग सरकार ने इस विवाद को धार्मिक चोला पहनाकर खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली और चीन तीन सूत्रीय सुलह का फॉर्मूला सुझाकर म्यांमार के करीब पहुंच गया।

बांग्लादेश और भारत के बीच संबंध 2014 में हुए कुछ समझौतों के साथ सही दिशा में आगे चल रहे थे, लेकिन तीस्ता जल समझौते को लेकर दोनों देशों के बीच कुछ खटास देखने को मिली। बांग्लादेशी घुसपैठियों को लेकर भी भारत और पड़ोसी देश बांग्लादेश के बीच संबंधों में तल्खी बढ़ी।

मालदीव की संसद में आधीरात के समय चीन का विवादित ‘फ्री ट्रेड समझौता’ पारित होने से मालदीव चीन के करीब पहुंच गया। मालदीव ने भारत के राजदूत से मिलने वाले अपने तीन स्थानीय काउंसिलर को बर्खास्त करने से मामला और पेचीदा हो गया। यह भी सोचने की बात है कि नेपाल का चार बार दौरा कर चुके मोदी ने पद संभालने के बाद से एक बार भी मालदीव का दौरा नहीं किया है।

पाकिस्तान के साथ भारत के संबंध किसी से छिपे नहीं है तो ऐसे में सरकार अपने पड़ोसियों को लेकर कहां चूक कर रहा है?

चीन और पाकिस्तान की दोस्ती भारत के लिए सिरदर्द से कम नहीं है। इन चार वर्षों में सरकार पाकिस्तान के साथ टकराव की स्थिति को कम नहीं कर सकी। सर्जिकल स्ट्राइक से जरूर सरकार ने दुश्मन के घर में घुसकर उसे सबक सिखाने का ढोल पीटा हो, लेकिन उसके बाद सीमा पर किस तरह का माहौल रहा, वह किसी से छिपा नहीं है।

चीन के साथ रिश्ते खट्टे हुए, उसी का नतीजा रहा कि चीन ने एनएसजी में भारत की स्थायी सदस्यता में रोड़े अटकाए तो मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित होने से बचाने के लिए अपने वीटो का इस्तेमाल किया। डोकलाम विवाद इसका ज्वलंत उदाहरण है। डोकलाम विवाद के समय भारत-चीन युद्ध का अंदेशा तक जताए जाने लगा था।

By : रीतू तोमर

–आईएएनएस

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‘एक देश एक चुनाव’ यानी जनता को उल्लू बनाने के लिए नयी बोतल में पुरानी शराब

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MODI-SHAH

आज देश की बड़ी चुनौतियों में से प्रमुख है कि ये कैसे तय हो कि ‘जनता को उल्लू बनाने वाले नेता’ या ‘उल्लू बनने वाले लोगों’ में से कौन बड़ा बेवकूफ़ है? ये सवाल खड़ा होता है बीजेपी के उस ताज़ा शिगूफ़े से, जिसे ‘एक देश एक चुनाव’ के ढोल के रूप में पीटा जा रहा है। हालाँकि, इस लिहाज़ से बयानबाज़ी के सिवाय कुछ नहीं हो रहा। कुछ होगा भी नहीं। कुछ होना भी नहीं है। 2019 में तो हर्ग़िज़ नहीं! क्योंकि ‘एक देश एक चुनाव’ की कल्पना को हवा देने वालों का असली मक़सद बदलाव लाना नहीं बल्कि इसकी आड़ में सियासी रोटियाँ सेंकना है। इसीलिए सारे प्रसंग को ‘जनता को उल्लू बनाने’ की कवायद भी कह सकते हैं।

हम देख चुके हैं कि बीजेपी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में जितनी बातें की थी, उनमें से ज़्यादातर का ताल्लुक ‘जनता को उल्लू बनाने’ से ही रहा है। याद है ना कि इन्होंने कश्मीरी पंडितों की घर वापसी के लिए कितना ढोल पीटा था! लेकिन हुआ क्या? एक भी कश्मीरी पंडित की आज तक घर वापसी नहीं हुई। मोदी राज से पहले भी बेचारे कश्मीरी पंडित अपने ही देश में ‘शरणार्थी’ थे और आज भी हैं! यही आलम अच्छे दिन, कालाधन वापसी, हर खाते में 15-15 लाख, सालाना दो करोड़ रोज़गार के अवसर, किसानों की आमदनी दोगुनी करने, महँगाई, पेट्रोल-डीज़ल-रसोई गैस के दाम, रुपये की गिरती क़ीमत, गंगा की सफ़ाई, बेटी बचाओ जैसे असंख्य जुमलों का भी रहा है।

लोकसभा के चुनाव महज नौ महीने दूर हैं। 2014 में जैसी हवा बीजेपी के पक्ष में बनी थी, उससे कहीं अधिक तीखी हवा अब बीजेपी के ख़िलाफ़ बह रही है। जनता मोदी राज की निपट जुमलेबाज़ी से तंग आ चुकी है। नोटबन्दी और जीएसटी जैसी नीतियों ने हरेक व्यक्ति को तकलीफ़ें दी हैं। इन्हें लेकर जितने सब्जबाग़ सजाये गये थे, वो सभी खोखले साबित हुए हैं। उल्टा साम्प्रदायिकता, गाय-गोबर-बीफ़-लिंचिंग और हिन्दू-मुसलमान के रूप में  नफ़रत का जैसा माहौल बीजेपी ने देश को दिया है, उससे आम जनता बेहद ख़फ़ा है। इसी से जनता का ध्यान भटकाने के लिए ‘एक देश एक चुनाव’ का पासा फेंका गया है।

झूठ फैलाया जा रहा है कि लोकसभा के साथ कम से कम 11 राज्यों के चुनाव तो संविधान में संशोधन किये बग़ैर ही करवाये जा सकते हैं। यदि ऐसा हो सकता है कि सरकार वैसे ही ताल ठोंककर ऐसा करने का ऐलान क्यों नहीं करती, जैसे बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने ऐलान कर दिया कि उन बाँग्लादेशी घुसपैठियों को कोई दिक्कत नहीं होगी, जो हिन्दू हैं। इसे ‘हिन्दू अन्दर मुसलमान बाहर’ कह सकते हैं। ये बात भी कभी लागू नहीं होगी। क्योंकि मोदी सरकार जिन-जिन कामों को नहीं करना चाहती है, उसके लिए विपक्ष पर ठीकरा फोड़ती है।

सत्ता में आप हैं। ‘एक देश एक चुनाव’ को लागू करने से आपको कोई नहीं रोक रहा। कोई रोक भी नहीं सकता। लिहाज़ा, करके दिखाइए। अपनी नाकामी का दारोमदार विपक्ष पर थोपने का कोई तुक़ नहीं हो सकता। सलाह-मशविरे की नौटंकी आप सिर्फ़ इसलिए करना चाहते हैं क्योंकि आपको सिर्फ़ जनता को उल्लू बनाना है कि आप देश में सुधार लाना चाहते हैं और विपक्ष ऐसा नहीं चाहता। आपको देशहित की परवाह है, जबकि विपक्ष देशहित के ख़िलाफ़ है। क्या नोटबन्दी से पहले, सर्ज़िकल हमले से पहले, पठानकोट में आईएसआई को बुलाने से पहले, बैंक लुटवाने से पहले, राफेल सौदे से पहले आपने विपक्ष से मशविरा किया था? नहीं ना! इन मोर्चों पर आप जो करना चाहते थे, वो आपने किया। वो बात अलग है कि आपको करने का शऊर नहीं था। इसीलिए आपकी नीयतख़ोरी की कलई खुलती चली गयी!

‘एक देश एक चुनाव’ को लेकर विधि आयोग से मुलाक़ात का कोई तुक़ नहीं है। विधि आयोग को इस लिहाज़ से कुछ नहीं करना है। चुनाव करवाने का काम चुनाव आयोग का है। वो जन-प्रतिनिधित्व क़ानून और संविधान से बँधा है। संविधान ने संसद और विधानसभाओं की मियाद पाँच साल तय कर रखी है। आप इस प्रावधान को बदल दीजिए। बस, हो गया काम। समस्या ख़त्म। फिर करवाइए ‘एक देश एक चुनाव’! हिम्मत है तो सारा ज़ोर संविधान संशोधन पर लगाइए। विपक्ष यदि रोड़ा अटकाएगा तो ख़ुद बेनक़ाब होगा। जनता है ना, उससे निपटने के लिए।

अरे यदि आपकी मंशा सही होती तो अब तक ‘एक देश एक चुनाव’ का रास्ता साफ़ हो चुका होता। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह को शायद ही याद हो कि बीजेपी ने 2014 के चुनाव घोषणापत्र में ‘एक देश एक चुनाव’ के सिद्धान्त को अपनाने का वादा किया था। उसके बाद मोदी राज में ही, 2015 में, संसद की स्थायी समिति की 79वीं रिपोर्ट में ‘एक देश एक चुनाव’ के सिद्धान्त की पुरज़ोर सिफ़ारिश की। अब तो अब जबाब दीजिए कि 51 महीने बीतने के बावजूद ‘एक देश एक चुनाव’ का वादा लागू क्यों नहीं हुआ? सरकार बताये कि उसने सवा चार साल तक अपने घोषणापत्र और संसदीय रिपोर्ट को लेकर किया क्या?

सवा चार साल में भी बस, बयानबाज़ी होती रही। मोदी-शाह ख़ुद भी जहाँ-तहाँ बस बोलते ही रहे। 5 सितम्बर 2016 को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से भी बोलवाया। लेकिन ज़मीन पर हुआ कुछ भी नहीं। एक इंच भी बात आगे नहीं बढ़ी। संसद से पहले 1983 में निर्वाचन आयोग की सालाना रिपोर्ट में भी ‘एक देश एक चुनाव’ की पैरवी की गयी थी। मोदी-शाह कह सकते हैं कि ‘एक देश एक चुनाव’ को पहले की सरकारों को ही लागू कर देना चाहिए था। ये बात सही है। लेकिन यदि सारे काम पिछली सरकारें ही कर पातीं तो नयी सरकारें क्या करतीं! उन्होंने नहीं किया तो जनता ने उनका हिसाब किया। आप नहीं करेंगे तो क्या जनता आपको बख़्श देगी!

अभी आपके इशारे पर, भक्त मीडिया ये फैला रहा है कि आप ‘एक देश एक चुनाव’ को सर्वसम्मति से लागू करना चाहते हैं। इसके लिए सर्वदलीय बैठक बुलाना चाहते हैं। लगे हाथ ये भी बता दीजिए कि क्या बीजेपी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में ये शर्त रखी थी कि वो ‘एक देश एक चुनाव’ का वादा तभी निभाएगी जब सभी राजनीतिक दल सर्वसम्मति पैदा करके उससे इसे लागू करने की फ़रियाद करेंगे? अरे, आप किसे उल्लू बनाना चाहते हैं! सर्वदलीय बैठक के लिए आपको विधि आयोग की किसी सिफ़ारिश की ज़रूरत नहीं है। ये सरकार का काम है। लेकिन सरकार का इरादा तो जनता को ग़ुमराह करने का है, इसीलिए बीजेपी के प्रतिनिधिमंडल ने विधि आयोग से मुलाक़ात का स्वाँग बिल्कुल ऐसे रचा, जैसे ‘नयी बोतल में पुरानी शराब!’ जनता को उल्लू बनाने के लिए चुनाव तक आये दिन इसी शराब को परोसा जाएगा!

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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अरे, ये ‘तेल-पानी का मिलन’ नहीं, मोदी राज का मर्सिया है!

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MODI-SHAH

बेशक़, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को विपक्षी एकजुटता ने बेचैन कर दिया है। इससे तिलमिलाए मोदी ने अपने चिर-परिचित अन्दाज़ में ताबड़तोड़ और लम्बी-चौड़ी फेंकने का रास्ता थाम लिया। उनकी ताज़ा पेशकश है कि विपक्ष का निर्माणाधीन गठबन्धन, जो ‘तेल-पानी का बेमेल संगम है, जिसके बाद न तेल काम का रहता है और ना पानी!’ शायद, मोदी भूल चुके हैं कि वो ख़ुद भी तेल-पानी के बेमेल संगम वाली उस नाँव पर सवार हैं, जिसे एनडीए यानी राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबन्धन कहते हैं।

दरअसल, संघ-बीजेपी और मोदी-शाह इस ख़ुशफ़हमी में हैं कि एनडीए के दल एक-दूसरे के साथ इसलिए गलबहियाँ डाले हुए हैं क्योंकि वो प्राकृतिक गठबन्धन है। जबकि ज़मीनी सच्चाई इससे बिल्कुल उलट है। उद्धव की शिवसेना, महबूबा की पीडीपी और चन्द्रबाबू की टीडीपी का अफ़साना सबके सामने है! ये नये किस्से हैं। पुराने तज़ुर्बों की बातें तो बहुत लम्बी-चौड़ी हैं। अटल बिहारी वाजपेयी आज इस हालत में नहीं हैं कि वो अपने सियासी वंशजों को गठबन्धन पर मुँह निपोड़ने से आगाह कर सकें। दरअसल, मोदी-शाह को ये समझना होगा कि गठबन्धन कभी प्राकृतिक नहीं होता।

मजबूरी और आपसी निर्भरता हरेक गठबन्धन की बुनियादी शर्त है। फिर भी कुछ गठबन्धन स्वाभाविक होते हैं तो कुछ सत्तालोलुप और मौक़ापरस्त। अच्छा हो या बुरा, हरेक गठबन्धन सियासी ही होता है। वाम मोर्चा और शिवसेना-अकाली-बीजेपी के गठबन्धन को स्वाभाविक माना जा सकता है। जबकि नीतीश, पासवान और महबूबा जैसों की नज़दीकी विशुद्ध रूप से सत्तालोलुप और मौक़ापरस्त गठबन्धन की श्रेणी में आएगी। इसीलिए मौक़ापरस्तों को बार-बार दावा करना पड़ता है कि वो बीजेपी के साम्प्रदायिक एजेंडे के ख़िलाफ़ हैं। इनके पास कभी इस सवाल का जबाब नहीं होता कि यदि वो संघियों की साम्प्रदायिकता ख़िलाफ़ हैं तो उस पर नकेल कसने के लिए करते क्या हैं?

गठबन्धन की एक और किस्म उन दलों से जुड़ी है जिनका अपने मुख्य विरोधी के रूप में काँग्रेस या बीजेपी से मुक़ाबला होता है। पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी ने टिकाऊ गठबन्धन की मिसाल क़ायम की, तो उन्हें सत्ता से बेदख़ल भी गठबन्धन ने ही किया। ऐसे दोनों गठबन्धनों यानी एनडीए और यूपीए के जन्म के दरम्यान वाजपेयी के कई सहयोगी पाला बदल चुके थे। गठबन्धनों में आना-जाना भले ही सामान्य हो, लेकिन बीजेपी से छिटकने वाले दलों की संख्या काँग्रेस के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा रही है। एक दौर था जब करूणानिधि, नवीन पटनायक, ममता बनर्जी, मायावती, फ़ारूख़ अब्दुल्ला, ओम प्रकाश चौटाला और चन्द्रबाबू नायडू ने बीजेपी की मदद से सत्ता-सुख भोगा। बीजेपी से गलबहियाँ का इनका तज़ुर्बा ऐसा रहा कि अगली बार इन्होंने भगवा गोदी से तौबा कर ली। जयललिता और नवीन पटनायक ने भले ही समय-समय पर एनडीए की मदद की, लेकिन दोनों ने बीजेपी से ख़ासी दूरी भी बनाये रखी।

Opposition leaders

In Pics: Opposition unity on display for 2019 as HD Kumaraswamy sworn in as Karnataka Chief Minister

इसीलिए जिन्हें विपक्षी दलों का निर्माणाधीन महागठबन्धन, ‘तेल और पानी के मेल’ जैसा दिख रहा है, उन्हें ज़रा अपने गठबन्धन के गिरेबान में भी झाँक लेना चाहिए। अरे, गठबन्धन का अर्थ ही है बेमेल को मेल बनाने का कौशल! दूसरों पर ‘तेल और पानी के मेल’ का कीचड़ फेंकने वाले नरेन्द्र मोदी को क्या याद है कि बेमेल जोड़-तोड़ की सबसे बड़ी मिसाल तो वो ख़ुद हैं! पवित्र अग्नि को साक्षी मानकर उन्होंने ऐसा बेमेल गठजोड़ बनाया कि वो न तो वर के काम आया और ना वधू के! उस गठबन्धन की गाँठ भी इतनी वाहियात निकली कि वर-वधू में से कोई भी उससे पिंड छुड़ाने नहीं गया। दोनों अभी तक गाँठ को दुम में लटकाये ढो रहे हैं!

धार्मिक अनुष्ठान के तहत वैदिक मंत्रोचार के बीच स्थापित वो गठबन्धन तकनीकी रूप से आज भी जीवित है। लेकिन जनाब नरेन्द्र मोदी और उनके प्रथम भक्त अमित शाह ने तो कभी उस गठबन्धन को तेल-पानी का संगम नहीं कहा। कभी उस नारी के हक़, गरिमा और स्वाभिमान की परवाह नहीं की जिसे बाक़ायदा, विधि-विधान से और गाजे-बाजे के साथ ब्याह कर लाया गया था। इसीलिए इन्हें जितनी परवाह तीन तलाक़ और हलाला से पीड़ित महिलाओं के अधिकारों की होती है, उतनी मुज़फ़्फ़रपुर, देवरिया, हरदोई, पटना जैसी जगहों पर रहने वाली बेसहारा महिलाओं के लिए क्यों नहीं होती?

बीजेपी की नैतिकता में यदि ज़रा भी दम होता तो इन दुष्कर्मों और बर्बरता की वारदातों के बाद वहाँ की सरकारें एक पल भी सत्ता में नहीं रह पातीं। ऐसे मामलों में प्रधानमंत्री को ‘तेल और पानी का बेमेल संगम’ कहीं नज़र नहीं आता। इसी तरह, बंगाल में दुर्गा पूजा में ख़लल पड़ने पर अमित शाह, सचिवालय की ईंट से ईंट बजा देने की धमकी तो देते हैं, लेकिन बेसहारा नारियों के ठिकानों पर साक्षात दुर्गाओं के साथ हो रहे ज़ुल्म को लेकर ना तो उनका ख़ून खौलता है और न ही उन्हें कहीं कोई ईंट दिखायी देती है।

भगवा ख़ानदान से जुड़ा एक भी नेता, कार्यकर्ता या ट्रोल ऐसा नहीं है, जिसे इस बात की चिन्ता खाये जा रही हो कि मोदी सरकार ने अभी तक अपना एक भी वादा निभाकर नहीं दिखाया! किसी मोदी भक्त को परवाह नहीं है कि चुनाव में विकास और अच्छे दिन की छटा को जनता को कैसे दिखाया जाएगा? हिन्दू-मुसलमान में उलझे भक्तों को अब एनआरसी के रूप में नया शिगूफ़ा मिल गया है। गाय-गोबर-बीफ़-लिंचिंग, लव-जिहाद, एंटी रोमियो, दलित उत्पीड़न जैसे कारतूसों को फ़ुस्स होता देख भगवा ख़ेमे में बेहद मायूसी है। इसीलिए विपक्षी एकजुटता का मज़ाक उड़ाया जा रहा है।

विपक्षी एकता के अलावा बीजेपी के हरेक नेता को एनआरसी यानी नैशनल रज़िस्टर ऑफ़ सिटीजन्स की चिन्ता भी बहुत सता रही है। भगवा ख़ानदान को लगता है कि एनआरसी के रूप में उसे अलाद्दीन का चिराग़ या हर मर्ज़ की दवा मिल गयी है! दरअसल, कल तक जो भारत को काँग्रेस मुक्त करने का दावा कर रहे थे, उसे मरा हुआ बता रहे हैं, उन्हें अब ‘मरी हुई काँग्रेस और ज़िन्दा मुसलमानों’ का ख़ौफ़ जीने नहीं दे रहा। मोदी बेचैन हैं कि वो जिस काँग्रेस को मृतप्राय बताते नहीं अघाते थे, जनता उसे पुनर्जीवित कर रही है। तमाम विपक्षी दिग्गज काँग्रेस के साथ लामबन्द होकर उस फिर से सत्ता में लाना चाहते हैं, जिसे बड़ी मुश्किल से, असंख्य से झूठ फैलाकर मोदी की बीजेपी और एनडीए ने सत्ता से बाहर किया था।

अपने जुमलेबाज़ और अहंकारी स्वभाव की वजह से मोदी ये समझने में असमर्थ हैं कि देश को उनसे मुक्ति दिलाने के लिए शेर और बकरी भी एक घाट पर पानी पीने के लिए तैयार हो गये हैं। सियासत, इसीलिए अनन्त सम्भावनाओं की विधा है! इसीलिए, कल तक विकास की बाँसुरी बजा रहे अमित शाह अब बौराये हुए हैं कि मुसलमानों के ख़िलाफ़ ज़हर उगले बग़ैर हिन्दुओं को झाँसा कैसे देंगे? उनकी इसी दुविधा को देखते हुए संघ ने बाँग्लादेशी घुसपैठियों के लिए ‘हिन्दू अन्दर, मुस्लिम बाहर’ की नीति बनायी है। जो भी इस नीति में साम्प्रदायिकता, हिन्दू तुष्टिकरण या हिन्दू राष्ट्र जैसी बातों की बू सूँघने की ज़ुर्रत करेगा, उसे देशद्रोही माना जाएगा और फ़ौरन लिंचिंग की सज़ा मिलेगी!

2019 में बीजेपी ने 350 सीटें जीतने वाला मुँगेरी लाल का अद्भुत सपना देखा है। इस सपने का झाँसा देने के लिए फेंकने की आदत से लाचार होने अनिवार्य है। इसीलिए नरेन्द्र मोदी को रोज़ाना कुछ न कुछ फेंके बग़ैर चैन नहीं मिलता। वो देश में हों या विदेश में, फेंकने का योगाभ्यास जारी रहता है। फेंकना अब उनके लिए शौक़ नहीं बल्कि नशा बन चुका है। एकजुट विपक्ष उन्हें नशामुक्त कर देगा, इसीलिए वो अपने विरोधियों के लिए हमेशा उटपटांग शब्द ही ढूँढ़ते रहते हैं। अभी राज्यसभा में इसी नशे की वजह से उन्होंने ‘बीके’ में ‘बिके’ बना दिया। इससे प्रधानमंत्री की गरिमा को ऐसी चोट पहुँची जैसा 70 साल में कभी नहीं हुआ। इतिहास में पहली बार प्रधानमंत्री के शब्द सदन की कार्यवाही से बाहर किये गये।

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नरेन्द्र मोदी अपनी छीछालेदर से कभी शर्मिन्दा नहीं होते। शायद, कम शिक्षित होने की वजह से ऐसा होता हो। मुमकिन है कि कामदार और चौकीदार जैसे जुमलों के अति-इस्तेमाल की वजह से उनका मन-मस्तिष्क वैसे ही ढीठ हो गया हो जैसे कई किस्म के एंटीबायटिक असरहीन बन जाते हैं। मोदी की तरह अमित शाह को भी ‘लपलपाती जीभ’ वाले असाध्य रोग ने जकड़ रखा है। इस रोग के लक्षणों ने 2013 में ही उस वक़्त महामारी का रूप ले लिया था जब गुजरात मॉडल, अच्छे दिन, महँगाई की मार, पेट्रोल और डॉलर के भाव, काला धन वापस लाने, सबको 15–15 लाख रुपये देने जैसे जुमलों ने धमाका किया था। तब भारत की भोली-भाली जनता समझ नहीं पायी कि उन्हें उल्लू बनाया गया है।

मज़े की बात ये है कि 2014 के बाद तीन साल तक जनता के उल्लू बनने का संक्रमण राज्य दर राज्य फैलता गया। संघी मदमस्त थे कि जनता में इस बात की होड़ लग चुकी है कि अन्य राज्यों की तरह हम भी कम से कम एक बार तो बीजेपी के झूठे वादों और इरादों को चखकर ज़रूर देखेंगे। लेकिन जिस तरह से तमाम विपक्षी नेताओं ने बीजेपी को एक बार आज़माने के बाद उसे अगली बार के लिए भरोसेमन्द नहीं पाया, उसी तरह से तमाम उपचुनावों में जनता भी उस बीजेपी से अपना दामन छुड़ाने लगी, जिसे थोड़े वक़्त पहले उसने चुना था।

इसीलिए, विपक्षी एकता को ‘तेल-पानी का मिलन’ बताने वाले गाँठ बाँध लें कि उनका नज़रिया ‘दिल बहलाने को ग़ालिब ख़्याल अच्छा है’ के सिवाय और कुछ नहीं है! यही मोदी राज का मर्सिया है! फ़िलहाल, बीजेपी की झूठ फैलाने वाली महामारी का प्रकोप देश को अभी और नौ महीने तक सताता रहेगा। तब तक जनता को ‘तेल-पानी के बेमेल मिलन’, ‘हिन्दू अन्दर, मुस्लिम बाहर’ जैसी असंख्य बातें वैसे ही बतायी जाएँगी जैसे ‘अच्छे दिन’ का खेल हुआ था!

मुकेश कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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70 साल में पहली बार किसी प्रधानमंत्री के शब्द संसद की कार्रवाई से हटाये गये

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भारत के संसदीय इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि प्रधानमंत्री के शब्दों को आपत्तिजनक, अमर्यादित और अवांछित मानते हुए उसे सदन कार्यवाही से हटा दिया गया है! गुरुवार, 9 अगस्त को राज्यसभा के उपसभापति के चुनाव हुआ। इसमें विजयी हुए एनडीए के उम्मीदवार हरिवंश नारायण सिंह को बधाई देने के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जो भाषण दिया, उसके एक अंश को सदन की कार्यवाही से हटा दिया गया है। प्रधानमंत्री के शब्दों पर राष्ट्रीय जनता दल के सदस्य मनोज झा ने सख़्त ऐतराज़ जताया था। उन आपत्तियों को सही पाने के बाद सभापति वेंकैया नायडू ने मोदी के शब्दों को राज्यसभा की कार्यवाही से बाहर कर दिया।

मोदी ने कहा था कि “ये ऐसा चुनाव था, जिसमें दोनों तरफ ‘हरि’ थे, लेकिन एक के नाम के आगे बी.के. था – ‘बी.के. हरि’, कोई न बिके। इधर भी हरि थे, लेकिन नाम के आगे कोई बी.के., वी.के. नहीं था। मैं श्री बी.के. हरिप्रसाद जी को भी…।” इसी बयान से वेंकैया नायडू ने ‘कोई न बिके’ वाले शब्दों को राज्यसभा की कार्यवाही से निकाल दिया है। क्योंकि मनोज झा का कहना था कि ‘बिके, बिका, बिकना’ जैसे शब्द का इस्तेमाल ग़लत मंशा से किया गया है। इसीलिए उसे दुर्भावनापूर्ण और आपत्तिजनक मानते हुए सदन की कार्यवाही से बाहर किया जाए।

सभापति वेंकैया नायडू ने इस पर ग़ौर फ़रमाने का वादा किया। इसके बाद राज्यसभा सचिवालय की ओर से जानकारी दी गयी कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, मनोज झा और केन्द्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्यमंत्री रामदास अठावले के भी आपत्तिजनक शब्दों को सदन की कार्यवाही से बाहर कर दिया गया है। इसी प्रसंग में रामदास अठावले से तुकबन्दी भरी कविता सुनाते हुए कहा था कि “लेकिन हरिप्रसाद को काँग्रेस ने दे दिया है धोखा”। इस वाक्य से ‘धोखा’ शब्द को कार्यवाही से हटा दिया। राम दास अठावले के बेतुके और आपत्तिजनक शब्दों को पहले भी कई बार संसद की कार्यवाही से हटाया गया है। लेकिन किसी प्रधानमंत्री के शब्द को ग़लत पाये जाने का ये अपनी तरह का पहला मामला है।

दरअसल, नरेन्द्र मोदी अक्सर ही अपनी लपलपाती ज़ुबान की वजह से विपक्ष के निशाने पर रहते हैं। उन्हें अपने राजनीतिक विरोधियों के लिए अमर्यादित और अनुपयुक्त शब्दों के इस्तेमाल से कभी गुरेज नहीं होता। विरोधियों से चुटकी लेने की आड़ में मोदी शब्दों की लक्ष्मण रेखा को अक्सर तोड़ते नज़र आते हैं। उन्हें इसमें बहुत मज़ा आता है। वो इसे अपनी बहादुरी समझते हैं। तभी तो उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को ‘रेनकोट पहनकर नहाने वाला’ और ‘देशद्रोही’ कहने में अपार आनन्द की अनुभूति होती है। मोदी ने राहुल, सोनिया, ममता, लालू, नीतीश, मायावती, मुलायम जैसे अपने हरेक राजनीतिक विरोधी के लिए अक्सर ही निम्नस्तरीय शब्दों का इस्तेमाल किया है।

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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