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स्वास्थ्य

पटाखे बच्चों के फेफड़े के लिए खतरनाक

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दिवाली पर पटाखे फोड़ते वक्त भले ही बच्चों के चेहरे पर हंसी हो, लेकिन वही पटाखे उनकी सेहत के लिए नुकसानदायक होते हैं। पटाखों से निकलने वाला जहरीला धुआं सभी के लिए घातक है, लेकिन पांच साल से कम उम्र के बच्चों और 60 साल से अधिक उम्र के लोगों के इससे बीमार पड़ने की संभावना अधिक होती है।

इसके अलावा गर्भवती महिलाओं को भी बहुत सावधानी बरतने की जरूरत होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि पटाखों से निकले जहरीले धुएं का स्वस्थ लोगों पर भी बुरा असर देखने को मिल रहा है। बच्चों पर पटाखों का जहरीला धुंआ उनके दिमाग के विकास में रोड़ा अटका सकता है। साथ ही उनकी याददाश्त, समझने की क्षमता, फेफड़ों और दिल के ऊपर भी बुरा असर डाल सकता है। समस्या यह है कि इन हानिकारक पदार्थो को शरीर से बाहर निकालने की कोई तरकीब फिलहाल नहीं है।

पुष्पावती सिंघानिया अस्पताल एवं रिसर्च सेंटर में पल्मोनोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. जी. सी. खिलनानी के अनुसार, “पटाखों में इस्तेमाल होने वाले रंग और भारी धातुओं से उत्पन्न पीएम 2.5 पार्टिकल्स स्ट्रॉन्टसियम, एल्युमीनियम, आर्सेनिक, चारकोल आदि से बनते हैं और बच्चों के फेफड़ों और शरीर के सबसे निचले भागों में जाकर जमा हो जाते हैं और तरह-तरह की बीमारियां जन्म लेती हैं। छोटे बच्चे और गर्भवती महिलाओं को इनसे ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है।”

धर्मशिला नारायणा सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में पल्मोनोलॉजी विभाग के सीनियर कंसलटेंट डॉ. नवनीत सूद ने बताया, “पटाखों के धुंए से दमे और सांस के मरीजों को भी काफी खतरा है। पटाखे जलाने से हवा में बारूद के छोटे कण फैल जाते हैं, जिससे लोगों को सिरदर्द, सांस लेने में दिक्कत, घबराहट और आंखों तथा नाक में जलन की समस्या हो सकती है। यही नहीं, पटाखे जलाते समय आंखों को लेकर भी खास सतर्कता बरती जानी चाहिए, क्योंकि आंखों में बारूद की चिंगारी चले जाने पर आंखों की रोशनी तक जा सकती है।”

श्री बालाजी एक्शन मेडिकल इंस्टीट्यूट के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग में सीनियर कंसल्टेंट, डॉ. अनिमेष आर्य बताते हैं, “दिल्ली एक गैस चैम्बर का रूप ले चुकी है। प्रदूषित हवा और पटाखों के जहरीले धुंए के असर से ब्रौंकियल अस्थमा, क्रोनिक ब्रौंकाइटिस, क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज, एलर्जिक राइनिटिस आदि की परेशानी काफी बढ़ जाती है।

ऐसे में लोगों को ज्यादा प्रदूषित जगह पर जाने से बचना चाहिए, नाक और मुंह को मास्क से ढक कर रखना चाहिए। अस्थमा ग्रस्त लोग अपना इन्हेलर हमेशा अपने पास रखे। दिल के मरीज सुबह-सुबह या देर रात खुले में न जाएं। सुबह जॉगिंग पर जाने से बेहतर घर पर या जिम में व्यायाम करें।”

–आईएएनएस

स्वास्थ्य

सावधान ! जले हुए ब्रेड खाने से हो सकता है कैंसर

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आज की भागदौड़ की ज़िंदगी मे इंसान अपने खाने पीने ज्यादा ध्यान नही दे पाता है। इसी करण से आपको गंभीर बीमारीयों का सामना करना पड़ता है।

बता दें खाने पीने की चीज़ों से ही इंसान बीमार होता है और फिट भी रहता हैं। अब ये इंसान के ऊपर निर्भर होता है कि वह खाने पीने के मामले कैसे सावधानी बरते।

किस तरह उसे एक नियमित रूप से स्वस्थ रहने के लिए खाने की जरुरत है।आज हम ऐसे ही एक खाने पीने की चीज़ की चर्चा करेंगे जो आज की ज़िंदगी मे इंसान की जरूरत बन चुकी है। ज्यादातर लोग सुबह कॉलेज या आफिस जाते वक्त ब्रेड से नाश्ता करते हैं।

इतना ही नही उसे बटर के साथ खाकर सुबह का नाश्ता करते है । लेकिन क्या आपको पता है कि ज्यादा जले हुए ब्रेड से हमे भयंकर बीमारी हो सकती है। जले हुए ब्रेड खाने से हमे कैंसर जैसी बीमारी हो सकती है । जी हां आपने सही सुना हमे जले हुए ब्रेड खाने से कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी हो सकती है ।

कैसे हो सकती है कैंसर जैसी बीमारी

जले हुए ब्रेड में न्यूट्रोटक्सिन नामक पदार्थ होता है जो शरीर मे जाकर कैंसर जैसी बीमारी को जन्म देता है । एक शोध में पाया गया है कि जल हुए खाने के पदार्थ शरीर के लिए नुकसान देय होते है ।

जला हुआ खाना भी हमारे शरीर के लिए हानिकारक होता है । अगर हमें इस गभीर बीमारी से बचना है तो इसके लिए आपको ब्रेड जालाकर नही बल्कि सही ढंग से खानी चहिये।

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ज़रा हटके

मध्य प्रदेश : बापू की याद में कांग्रेस विधायक ने छोड़ी तंबाकू!

“बापू नशे के सख्त विरोधी थे, इसलिए मैं भी संकल्प लेता हूं कि आज के बाद गुटखा नहीं खाऊंगा।”

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श्योपुर, 12 फरवरी | मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले में तीन नदियों के संगम पर महात्मा गांधी की स्मृति में मंगलवार को आयोजित एक कार्यक्रम में कांग्रेस विधायक बाबू सिंह जंडेल ने तंबाकू सेवन न करने का संकल्प लिया।

महात्मा गांधी सेवा आश्रम श्योपुर के प्रबंधक जय सिंह जादौन ने आईएएनएस को बताया, “बीते 71 सालों से तीन नदियों -चंबल, बनास और सीप- के संगम स्थल पर स्मृति दिवस का आयोजन किया जा रहा है। मंगलवार को 72वें आयोजन समारोह में विधायक जंडेल ने जहां महात्मा गांधी स्मृति द्वार बनाने के लिए विधायक निधि से पांच लाख रुपये देने का ऐलान किया, वहीं उन्होंने तंबाकू त्यागने का संकल्प भी लिया।”

बकौल जादौन, जंडेल ने कहा, “बापू नशे के सख्त विरोधी थे, इसलिए मैं भी संकल्प लेता हूं कि आज के बाद गुटखा नहीं खाऊंगा।” उन्होंने वहां मौजूद लोगों से भी नशा त्यागने का आह्वान किया।

जादौन के मुताबिक, महात्मा गांधी की हत्या के बाद 12 फरवरी, 1948 को श्योपुर में अस्थियों का विसर्जन किया गया था। उसके बाद से ही यहां हर साल 12 फरवरी को महात्मा गांधी स्मृति दिवस समारोह आयोजित किया जाता है। इस मौके पर विधायक जंडेल सहित बड़ी संख्या में गांधीवादी मौजूद रहे।

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स्वास्थ्य

अब सिर्फ 1 कैप्सूल से कंट्रोल होगी डायबिटीज

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कुछ सालों से डायबिटीज के मरीजों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। इस बीमारी से पीड़त लोगों को अपना ब्लड शुगर कंट्रोल करने के लिए दिनभर में कम से कम इंसुलिन के 2 इंजेक्शन लगाने की जरूरत पड़ती है।

लेकिन वैज्ञानिकों ने अब इंसुलिन इंजेक्शन का दूसरा विक्लप ढूंढ लिया है। अब डायबिटीज से जूझ रहे व्यक्ति को इंसुलिन के इंजेक्शन लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि अब सिर्फ एक गोली खाकर डायबिटीज को कंट्रोल करेगा। एक नई स्टडी में इस बात की जानकारी सामने आई है।

स्टडी की रिपोर्ट के मुताबिक, कैप्सूल में एक छोटी सुई मौजूद है, जिसे फ्रीज़ किए गए इंसुलिन से बनाया गया है, और एक स्प्रिंग भी है, जिन्हें शुगर की एक डिस्क द्वारा रखा गया है। कैप्सूल को खाने के बाद जैसे ही ये पेट में पहुंचता है, तो पेट में मौजूद पानी डिस्क को डिजॉल्व कर देता है।

जिसकी वजह से स्प्रिंग निकल जाता है। इसके बाद इंसुलिन डाइजेस्टिव सिस्ट में ब्रेक हो जाता है। ब्रिघम और वूमेन हॉस्पिटल और मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी की टीम ने बताया, कैप्सूल लेना इंसुलिन के इंजेक्शन लेने से ज्यादा आसान होता है।

इसकी खास बात ये है कि यह दूसरे इंजेक्शन के मुकाबले ज्यादा सस्ता है। सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के मुताबिक, अमेरिका की लगभग 9.4 फीसदी आबादी डायबिटीज बीमारी से जूझ रही है। स्टडी के मुताबिक, पैंक्रियाज में जब बहुत कम मात्रा में बीटा सेल्स मौजूद होते हैं, जिस कारण वो या तो इंसुलिन बना नहीं पाते हैं या बहुत ही कम मात्रा में बनाते हैं, तो डायबिटीज की समस्या हो जाती है।

डायबिटीज का अगर समय रहते इलाज ना किया जाए तो इससे किडनी, आंखें और दिल भी डैमेज हो सकता है। आमतौर पर इस बीमारी से पीड़ित लोगों को इंसुलिन के इंजेक्शन दिए जाते हैं।

शोधकर्ताओं ने बताया कि कैप्सूल बायोडिग्रेडेबल पॉलीमर और कुछ स्टेनलेस स्टील की मदद से बनाया गया है। उन्होंने कहा कि जब डायबिटीज का कोई मरीज ये कैप्सूल खाएगा तो शुगर डिस्क पेट में घुल जाएगी और स्प्रिंग को छोड़ देगी। स्प्रिंग के निकलने के बाद इसमें से एक प्रकार की काइनेटिक एनर्जी निकलेगी।

स्टडी के लेखक Dr. Traverso ने कहा, ‘लिक्विड के बजाए हम सॉलिड रसायन इस्तेमाल करना चाहते थे। क्योंकि कैप्सूल के अंदर सॉलिड रसायन लिक्विड से ज्यादा बेहतर तरीके से फिट होता है। बता दें, शोधकर्ताओं की टीम ने सबसे पहला टेस्ट पिग जानवर पर किया। उनके मुताबिक, एक

कैप्सूल से पिग को लगभग 300 माइक्रोग्राम इंसुलिन मिला। लेकिन हालिया टेस्ट में इंसुलिन की मात्रा को 300 माइक्रोग्राम से बढ़ाकर 5 मिलीग्राम किया गया है। बता दें, टाइप-2 डायबिटीज के मरीज को इतने इंसुलिन की जरूरत पड़ती है।

शोधकर्ताओं ने बताया कि पेट में घुलने के बाद ये कैप्सूल बिना किसी साइड इफेक्ट के डाइजेस्टिव सिस्टम द्वारा शरीर से बाहर निकल जाता है।

बता दें, शोधकर्ता इस कैप्सूल को फार्मेसी कंपनी नोवो नॉर्डिस्क (Novo Nordisk) के साथ मिलकर इस कैप्सूल को बनाने का काम कर रहे हैं। शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि आने वाले 3 सालों के अंदर वो इस कैप्सूल का इंसानों पर ट्रायल कर सकेंगे।

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