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कहीं फ़ारूक़ अब्दुल्ला ये तो नहीं कह रहे कि ‘कमबख़्त, चुनाव बड़ी क़मीनी चीज़ है!’

farooq-abdullah

कश्मीर घाटी के तमाम नेताओं की तरह फ़ारूक़ अब्दुल्ला की सियासी विचारधारा भी हमेशा बेपेंदी के लोटा वाली रही है। अपने प्रतिद्वन्दी महबूबा मुफ़्ती की तरह वो भी जब सत्ता से बाहर होते हैं तो अलगाववादियों के हिमायती बन जाते हैं। जबकि सत्ता में रहने पर दोनों ही प्रतिद्वन्दियों को भारत के संविधान के प्रति निष्ठा दिखाने की शपथ से बँधकर चलना पड़ता है। कमबख़्त! ये चुनाव, है ही ऐसी क़मीनी चीज़ कि वोट की ख़ातिर दोनों ही पार्टियों को कश्मीर घाटी और ख़ासकर दक्षिण कश्मीर में पसरी अलगाववादी मानसिकता के प्रति हमदर्दी दिखानी पड़ती है। कश्मीर घाटी में सियासी जमात की यही सबसे बड़ी लाचारी है। क्योंकि ऐसी हमदर्दी की बदौलत उन लोगों का वोट पाना आसान हो जाता है, जो कमोबेश अलगाववाद के समर्थक हैं।

जम्मू-कश्मीर की दो लोकसभा सीटों श्रीनगर और अनन्तनाग के उपचुनाव के लिए क्रमशः 9 और 12 अप्रैल को मतदान होना है। 80 वर्षीय फ़ारूक़ अब्दुल्ला इस बार भी श्रीनगर सीट से उम्मीदवार हैं। हालाँकि, 2014 में उन्हें इसी सीट पर पीडीपी के तारिक़ अहमद कर्रा ने 40 हज़ार वोटों से हराया था। लेकिन तीन साल में झेलम में काफ़ी पानी बह चुका है। पिछले साल 8 जुलाई को हिज़बुल मुज़ाहिद्दीन के कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद से कश्मीर का उबाल लगातार जारी है। इसी वजह से घाटी ने दुनिया का सबसे लम्बा कर्फ़्यू भी झेला। मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने बीजेपी और संघ से जो ज़ुगलबन्दी की है, उसकी सबसे अहम अग्नि-परीक्षा इसी उपचुनाव में होने वाली है। इसीलिए फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने कश्मीर के पत्थरबाज़ों के प्रति अपना सुर बदल लिया है।

अब्दुल्ला ने अपनी चुनावी रैली में कहा, “यदि वो (पथराव करने वाला युवक) अपनी जान दे रहा है, तो वो पर्यटन के लिए नहीं कर रहा है। वो अपनी जान इसलिए दे रहा है ताकि इस देश के भाग्य का निर्णय हो सके जो इस स्थान के लोगों को स्वीकार्य हो। इसे समझने की ज़रूरत है। हाल में सुरंग चालू हुई है। जहाँ उन्होंने (प्रधानमंत्री) कहा कि यहाँ के युवाओं को सोचना होगा कि उन्हें पर्यटन चाहिए या आतंकवाद। मैं मोदी साहब से कहना चाहता हूँ कि पर्यटन हमारी जीवन-रेखा है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। लेकिन पथराव करने वालों का पर्यटन से कोई लेना देना नहीं है, क्योंकि वो भूखा मर जाएगा। लेकिन जो अपने देश के लिए पथराव कर रहा है, उसे समझने की ज़रूरत है।”

फ़ारूक़ अब्दुल्ला ये भी कहा कि यदि भारत और पाकिस्तान अपने मुद्दे नहीं सुलझा सकते तो अमेरिका को आगे आना चाहिए और द्विपक्षीय मुद्दों को सुलझाने में तीसरा पक्ष बनकर मदद करनी चाहिए। साफ़ तौर पर, चुनाव को सामने देखकर फ़ारूक़ अब्दुल्ला के सुर बदल गये हैं। क्योंकि 18 सितम्बर 2010 को उन्होंने ही कहा था, “यहाँ कुछ लोग सोच रहे हैं कि पत्थर फेंक-फेंककर कश्मीर को भारत से अलग कर लेंगे। वो लोग पहले बम और बन्दूकें भी ला चुके हैं। लेकिन भारत को नहीं झुका पाये। मैं वादा करता हूँ कि भारत इस बार भी नहीं हारेगा। ये लोग कामयाब नहीं हो पाएँगे। इस तरह हिंसा फैलाकर ये लोग सिर्फ़ अपनी क़ब्रें खोद रहे हैं। घाटी में हो रही पत्थरबाज़ी निन्दनीय है। बढ़ती हिंसा के बीच सरकार को इनसे निपटने की रणनीति ढूँढ़नी पड़ेगी।”

जब फ़ारूक़ अब्दुल्ला पत्थरबाज़ों की निन्दा कर रहे थे, तब उनके बेटे उमर अब्दुल्ला की सरकार थी और महबूबा मुफ़्ती की पार्टी विपक्ष में थी। तब महबूबा की अलगाववादियों के प्रति हमदर्दी हुआ करती थी। लेकिन अब महबूबा, पत्थरबाज़ों की निन्दा करती हैं और अब्दुल्ला उनके हमदर्द बने फिर रहे हैं। इसी तरह से अभी बीजेपी, फ़ारूक़ अब्दुल्ला के बयान को चिन्ताजनक बता रही है। तो पीडीपी को इसमें ‘राजनीतिक अवसरवाद’ दिख रहा है, क्योंकि अभी उसका बीजेपी से गठबन्धन है। फ़ारूक़ अब्दुल्ला अभी यूपीए में हैं। लेकिन वो एनडीए में भी रह चुके हैं। साफ़ है कि राजनीतिक निष्ठा या विचारधारा के टकराव की कश्मीर में कोई अहमियत नहीं है। वहाँ हरेक नेता को सिर्फ़ वोट की पड़ी है। शायद, सभी नेताओं की नज़र में ‘कमबख़्त, चुनाव बड़ी क़मीनी चीज़ है!’

बदले माहौल को देखते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री जीतेन्द्र सिंह ने फ़ारूक़ अब्दुल्ला को आड़े हाथों लिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि अब्दुल्ला के क़द का नेता भी चुनाव के दबाव में आ गया है। इसीलिए उनका झुकाव अलगाववादियों की भाषा बोलने की ओर बढ़ रहा है। सिंह ने 1994 में संसद से पारित हुए उस प्रस्ताव का वास्ता दिया जिसका अब्दुल्ला की पार्टी ने समर्थन किया था। प्रस्ताव में कहा गया था कि भारत को पाक अधिकृत कश्मीर को उसके कब्ज़े से आज़ाद कराकर उसका देश में विलय किया जाना चाहिए। अब्दुल्ला ये भी कहते रहे हैं कि भारत को पाकिस्तानी धरती से संचालित हो रहे आतंकियों के ठिकानों पर बमबारी करनी चाहिए। इसीलिए ऐसा लगता है कि पत्थरबाज़ों की पैरोकारी करके अब्दुल्ला कुछ ख़ास मतदाताओं को रिझाना चाहते हैं।

श्रीनगर सीट पर अब्दुल्ला, नैशनल कान्फेंस और काँग्रेस के साझा उम्मीदवार हैं। उनके सामने हैं पीडीपी के नाज़िर अहमद ख़ान। उधर, अनन्तनाग की सीट पर महबूबा ने अपने भाई तस्सदुक़ मुफ़्ती को काँग्रेस के ग़ुलाम अहमद मीर के ख़िलाफ़ मैदान में उतारा है। इस सीट को पिछले साल अप्रैल में मुख्यमंत्री बनने के बाद महबूबा ने खाली किया था। इस तरह, दोनों ही सीटों पर महबूबा की साख दाँव पर है। बहरहाल, ये देखना दिलचस्प होगा कि पत्थरबाज़ों की हिमायत करने से फ़ारूक़ अब्दुल्ला जैसे अनुभवी नेता को क्या हासिल होगा!

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