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फ़र्ज़ी ख़बरें: कल्पनाओं का सच

आज भ्रामक तस्वीरों या वीडियो या ‘टेक्स्ट’ को इस ढंग से फैलाया जा सकता है कि उसके दर्शक या पाठक उसे ही सच समझने लगें।

जो दुनिया सच से परे होती है, उसमें ये पता लगाना बेहद मुश्किल होता है कि हक़ीक़त और कल्पना में क्या फ़र्क़ है? अफ़वाह फ़ैलाने वालों की सूचनाएँ बेहद घातक होती हैं। इनके ज़हर की तुलना आज डिज़ीटल मंचों पर फैलाये जा रहे उस झूठ से भी कई गुना ज़्यादा ख़तरनाक है जो नाज़ी जर्मनी के दौर में उसके प्रचार मंत्री पॉल जोसेफ़ गोब्बेल्स की ओर से फैलायी जाती थी। आज भ्रामक तस्वीरों या वीडियो या ‘टेक्स्ट’ को इस ढंग से फैलाया जा सकता है कि उसके दर्शक या पाठक उसे ही सच समझने लगें। ऐसे आपराधिक तत्व समाज में अफ़वाह फैलाकर ज़हर उगलते हैं, ताकि हिंसा और वैमनस्य को बढ़ावा देकर वो अपना राजनीतिक उल्लू सीधा कर सकें। ऐसे लोग सच को तोड़ने-मरोड़ने के लिए टेक्नोलॉज़ी का इस्तेमाल करते हैं। ऐसी सारी करतूतें छद्म वेश या पहचान के ज़रिये की जाती है। इन्हें ही बोलचाल की भाषा में ‘फ़ेक न्यूज़’ या ‘फ़र्ज़ी ख़बरें’ या ‘निपट झूठ’ कहते हैं।

‘निपट झूठ’ के ज़रिये प्रचलित मान्यताओं को चुनौती दी जा सकती है। इसीलिए ‘फ़ेक न्यूज़’ जैसे महाविनाशकारी हथियार को करोड़ों लोगों की धारणाओं का बदलने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। याद कीजिए कि कैसे सद्दाम हुसैन के पास भारी विनाश के हथियारों के होने की आड़ में अमेरिका ने इराक़ पर हमला कर दिया था! टेलीविज़न पर लगातार इराक़ में मौजूद विध्वंसक हथियारों को लेकर ऐसा झूठ फैलाया गया कि वो तबाह हो गया। किसी ने उसका साथ नहीं दिया। न सिर्फ़ इराक़ी लोग बल्कि सारी दुनिया ने उस तबाही को देखा, जिसे ‘फ़र्ज़ी ख़बरों’ की बदौलत पैदा किया गया था।

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2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में ‘फ़र्ज़ी ख़बरों’ ने वैश्विक मुक़ाम हासिल कर लिया। द न्यूयार्क टाइम्स या सीएनएन या द वॉल स्ट्रीट जर्नल की ख़बरों के मुक़ाबले फ़ेसबुक पर परोसी गये ‘निपट झूठ’ को कहीं ज़्यादा लोगों ने देखा। ‘निपट झूठ’ को फैलाने वाली प्रवृत्ति की बदौलत व्हाट्सअप पर मोदी को विश्व का सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्री और जन-गण-मन को सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रगान घोषित कर दिया गया। इन झूठों की तरह ही यूनेस्को को इस दुष्प्रचार का भी खंडन करना पड़ा कि 2000 रुपये का नया नोट, दुनिया की सर्वश्रेष्ठ मुद्रा है।

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मुमकिन है कि ऐसे ‘निपट झूठ’, राजनीतिक प्रचार का ही हिस्सा हों। हमें इससे सख़्ती से निपटना होगा। सबसे ख़तरनाक़ वो ‘फ़ेक न्यूज़’ हैं, जो दंगे फैलाती हैं। बीजेपी ने गुजरात के दंगों एक वीडियो को ये कहकर फैलाया कि पश्चिम बंगाल में प्रशासनिक ढाँचा चरमरा गया है। 15 साल पहले गुजरात में जलाये गये इस वाहन की तस्वीरों को भी इसी साज़िश के तहत बंगाल का बताकर फैलाया गया। गुजरात की तस्वीर को बशीरहाट की बताना और उसमें भी ‘सेव बंगाल’ का हैशटैग लगाना, साफ़ बताता है कि कैसे सोशल मीडिया का राजनीतिक हथकंडे की तरह इस्तेमाल हो रहा है। इसी तरह, अप्रैल 2015 में नफ़रत फैलाने की राजनीति करने वालों ने बांग्लादेश के एक वीडियो के ज़रिये बिहार में हिन्दू-विरोधी अफ़वाहें फैलायी ताकि मुसलमानों के प्रति नफ़रत फैलायी जा सके।

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‘फ़ेक न्यूज़’ का प्रसार उस वक़्त तो क़तई क़ाबिल-ए-माफ़ी नहीं हो सकता, जब उसका मक़सद हिंसा और उन्माद फैलाना हो। ‘फ़ेक न्यूज़’ की महामारी ने आज़ाद हिन्दुस्तान के सामाजिक-राजनीतिक ताने-बाने को भारी आघात पहुँचाया है और ये हमारे लोकतंत्र के लिए महाविनाशकारी साबित हो रहा है। यदि ‘फ़ेक न्यूज़’ का उद्देश्य साम्प्रदायिक हिंसा फैलाकर चुनावी नतीज़ों को प्रभावित करना है तो हमें इस चुनौती से सर्वोच्च प्राथमिकता से निपटना चाहिए। दुर्भाग्यवश, आज ट्वीटर पर अराजकता फैलाने वालों की ‘सेना’ मौजूद है। ये पलक झपकते ही राजनीतिक मोर्चा सम्भाल लेते हैं। यही हाल रहा तो वो दिन दूर नहीं, जब चुनावी मुक़ाबला भी सोशल मीडिया पर अफ़वाह-फैलाने वालों के बीच ही तय होगा। हर व्यक्ति को उसके घर में ही निशाना बनाया जाएगा।

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नौ करोड़ लोगों के हाथ में मौजूद मोबाइल फ़ोन आज महज कल्पनाओं पर आधारित फ़र्ज़ी ख़बरों का दमदार प्रचारक बन गया है। ये और भी ख़तरनाक है कि सरकारी तंत्र अपनी उपलब्धियों के प्रचार के लिए ‘फ़ेक न्यूज़’ का तरीक़ा अपनाता है। इसका जीता-जागता प्रमाण है, सरकार का वो दावा जिसमें वो कहती है कि पूरी बांग्लादेश सीमा को ‘फ़्लड लाइट्स’ से गुलज़ार कर दिया गया है। इसके लिए स्पेन-मोरक्को सीमा की उस तस्वीर का इस्तेमाल किया जाता है, जिसे स्पेनिश फ़ोटोग्राफर जेवियर ओयान ने 2006 में खींचा था। इसी तरह, 2015 में ही सूचना और प्रसारण मंत्रालय से जुड़े प्रेस सूचना ब्यूरो ने प्रधानमंत्री की उस फ़ोटो में छेड़छाड़ करके प्रसारित कर दिया था, जिसमें वो चेन्नई के बाढ़-प्रभावित इलाकों का हवाई दौरा कर रहे थे।

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सरकारी संस्थाओं के अलावा, ‘फ़ेक न्यूज़’ फैलाने वाली वेबसाइट्स की रणनीति अफ़वाह, दुष्प्रचार, दुर्भावनापूर्ण सामग्री, फ़रेबी जोड़-तोड़ और प्रेरक सन्देशों के प्रसारण की होती है। वो सच बताने की आड़ में ऐसी बातें फैलाते हैं, जिनका कोई वजूद ही नहीं होता। जो झूठ फैलाकर तथ्यों के ऐसे तोड़ते-मरोड़ते हैं, जिससे वो अपने छद्म एजेंडा के प्रति लोगों को प्रेरित कर सकें। ऐसी हक़ीक़त को हर्ग़िज़ बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।

हमें सोशल मीडिया से पैदा हुई इन चुनौतियों का मुक़ाबला करना ही होगा। हमें सच्चाई को फैलाने तथा इसे ही स्वीकार करने वाले समाज को बनाना ही होगा। अभिव्यक्ति की आज़ादी हमें समाज को विकृत, प्रदूषित और तबाह करने की छूट नहीं दे सकती। हमें ऐसी प्रवृत्तियों का जवाब नैतिक और क़ानूनी, दोनों तरीक़े से देना होगा। वक़्त की माँग है कि हम सोशल मीडिया को नियंत्रित करें। उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है कि हम लोगों को जागरूक करें। वक़्त की माँग है कि सोशल मीडिया पर परोसी जा रही फ़र्ज़ी ख़बरों और जानकारी की महामारी से निपटने के लिए सख़्त क़ानून बनाये जाएँ, ताकि इनका बेज़ा इस्तेमाल करने वाले बेख़ौफ़ न रह सकें। तकनीक हमें सामर्थ्यवान बनाती है, लेकिन यही हमें तबाह भी कर सकती है। सही वक़्त पर सही क़दम उठाकर ही हम लोकतंत्र को बचा सकते हैं।

(अख़बार डीएनए से साभार। लेखक, राज्यसभा सदस्य और वरिष्ठ काँग्रेस नेता हैं।)

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