Connect with us
kapil sibal kapil sibal

ब्लॉग

फ़र्ज़ी ख़बरें: कल्पनाओं का सच

आज भ्रामक तस्वीरों या वीडियो या ‘टेक्स्ट’ को इस ढंग से फैलाया जा सकता है कि उसके दर्शक या पाठक उसे ही सच समझने लगें।

Published

on

जो दुनिया सच से परे होती है, उसमें ये पता लगाना बेहद मुश्किल होता है कि हक़ीक़त और कल्पना में क्या फ़र्क़ है? अफ़वाह फ़ैलाने वालों की सूचनाएँ बेहद घातक होती हैं। इनके ज़हर की तुलना आज डिज़ीटल मंचों पर फैलाये जा रहे उस झूठ से भी कई गुना ज़्यादा ख़तरनाक है जो नाज़ी जर्मनी के दौर में उसके प्रचार मंत्री पॉल जोसेफ़ गोब्बेल्स की ओर से फैलायी जाती थी। आज भ्रामक तस्वीरों या वीडियो या ‘टेक्स्ट’ को इस ढंग से फैलाया जा सकता है कि उसके दर्शक या पाठक उसे ही सच समझने लगें। ऐसे आपराधिक तत्व समाज में अफ़वाह फैलाकर ज़हर उगलते हैं, ताकि हिंसा और वैमनस्य को बढ़ावा देकर वो अपना राजनीतिक उल्लू सीधा कर सकें। ऐसे लोग सच को तोड़ने-मरोड़ने के लिए टेक्नोलॉज़ी का इस्तेमाल करते हैं। ऐसी सारी करतूतें छद्म वेश या पहचान के ज़रिये की जाती है। इन्हें ही बोलचाल की भाषा में ‘फ़ेक न्यूज़’ या ‘फ़र्ज़ी ख़बरें’ या ‘निपट झूठ’ कहते हैं।

‘निपट झूठ’ के ज़रिये प्रचलित मान्यताओं को चुनौती दी जा सकती है। इसीलिए ‘फ़ेक न्यूज़’ जैसे महाविनाशकारी हथियार को करोड़ों लोगों की धारणाओं का बदलने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। याद कीजिए कि कैसे सद्दाम हुसैन के पास भारी विनाश के हथियारों के होने की आड़ में अमेरिका ने इराक़ पर हमला कर दिया था! टेलीविज़न पर लगातार इराक़ में मौजूद विध्वंसक हथियारों को लेकर ऐसा झूठ फैलाया गया कि वो तबाह हो गया। किसी ने उसका साथ नहीं दिया। न सिर्फ़ इराक़ी लोग बल्कि सारी दुनिया ने उस तबाही को देखा, जिसे ‘फ़र्ज़ी ख़बरों’ की बदौलत पैदा किया गया था।

Image result for indian fake news

2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में ‘फ़र्ज़ी ख़बरों’ ने वैश्विक मुक़ाम हासिल कर लिया। द न्यूयार्क टाइम्स या सीएनएन या द वॉल स्ट्रीट जर्नल की ख़बरों के मुक़ाबले फ़ेसबुक पर परोसी गये ‘निपट झूठ’ को कहीं ज़्यादा लोगों ने देखा। ‘निपट झूठ’ को फैलाने वाली प्रवृत्ति की बदौलत व्हाट्सअप पर मोदी को विश्व का सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्री और जन-गण-मन को सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रगान घोषित कर दिया गया। इन झूठों की तरह ही यूनेस्को को इस दुष्प्रचार का भी खंडन करना पड़ा कि 2000 रुपये का नया नोट, दुनिया की सर्वश्रेष्ठ मुद्रा है।

The original picture, left, and a Photoshopped mock up, right

मुमकिन है कि ऐसे ‘निपट झूठ’, राजनीतिक प्रचार का ही हिस्सा हों। हमें इससे सख़्ती से निपटना होगा। सबसे ख़तरनाक़ वो ‘फ़ेक न्यूज़’ हैं, जो दंगे फैलाती हैं। बीजेपी ने गुजरात के दंगों एक वीडियो को ये कहकर फैलाया कि पश्चिम बंगाल में प्रशासनिक ढाँचा चरमरा गया है। 15 साल पहले गुजरात में जलाये गये इस वाहन की तस्वीरों को भी इसी साज़िश के तहत बंगाल का बताकर फैलाया गया। गुजरात की तस्वीर को बशीरहाट की बताना और उसमें भी ‘सेव बंगाल’ का हैशटैग लगाना, साफ़ बताता है कि कैसे सोशल मीडिया का राजनीतिक हथकंडे की तरह इस्तेमाल हो रहा है। इसी तरह, अप्रैल 2015 में नफ़रत फैलाने की राजनीति करने वालों ने बांग्लादेश के एक वीडियो के ज़रिये बिहार में हिन्दू-विरोधी अफ़वाहें फैलायी ताकि मुसलमानों के प्रति नफ़रत फैलायी जा सके।

Image result for indian fake news save bengal

‘फ़ेक न्यूज़’ का प्रसार उस वक़्त तो क़तई क़ाबिल-ए-माफ़ी नहीं हो सकता, जब उसका मक़सद हिंसा और उन्माद फैलाना हो। ‘फ़ेक न्यूज़’ की महामारी ने आज़ाद हिन्दुस्तान के सामाजिक-राजनीतिक ताने-बाने को भारी आघात पहुँचाया है और ये हमारे लोकतंत्र के लिए महाविनाशकारी साबित हो रहा है। यदि ‘फ़ेक न्यूज़’ का उद्देश्य साम्प्रदायिक हिंसा फैलाकर चुनावी नतीज़ों को प्रभावित करना है तो हमें इस चुनौती से सर्वोच्च प्राथमिकता से निपटना चाहिए। दुर्भाग्यवश, आज ट्वीटर पर अराजकता फैलाने वालों की ‘सेना’ मौजूद है। ये पलक झपकते ही राजनीतिक मोर्चा सम्भाल लेते हैं। यही हाल रहा तो वो दिन दूर नहीं, जब चुनावी मुक़ाबला भी सोशल मीडिया पर अफ़वाह-फैलाने वालों के बीच ही तय होगा। हर व्यक्ति को उसके घर में ही निशाना बनाया जाएगा।

Image result for indian fake news morocco border

नौ करोड़ लोगों के हाथ में मौजूद मोबाइल फ़ोन आज महज कल्पनाओं पर आधारित फ़र्ज़ी ख़बरों का दमदार प्रचारक बन गया है। ये और भी ख़तरनाक है कि सरकारी तंत्र अपनी उपलब्धियों के प्रचार के लिए ‘फ़ेक न्यूज़’ का तरीक़ा अपनाता है। इसका जीता-जागता प्रमाण है, सरकार का वो दावा जिसमें वो कहती है कि पूरी बांग्लादेश सीमा को ‘फ़्लड लाइट्स’ से गुलज़ार कर दिया गया है। इसके लिए स्पेन-मोरक्को सीमा की उस तस्वीर का इस्तेमाल किया जाता है, जिसे स्पेनिश फ़ोटोग्राफर जेवियर ओयान ने 2006 में खींचा था। इसी तरह, 2015 में ही सूचना और प्रसारण मंत्रालय से जुड़े प्रेस सूचना ब्यूरो ने प्रधानमंत्री की उस फ़ोटो में छेड़छाड़ करके प्रसारित कर दिया था, जिसमें वो चेन्नई के बाढ़-प्रभावित इलाकों का हवाई दौरा कर रहे थे।

Image result for indian fake news morocco border

सरकारी संस्थाओं के अलावा, ‘फ़ेक न्यूज़’ फैलाने वाली वेबसाइट्स की रणनीति अफ़वाह, दुष्प्रचार, दुर्भावनापूर्ण सामग्री, फ़रेबी जोड़-तोड़ और प्रेरक सन्देशों के प्रसारण की होती है। वो सच बताने की आड़ में ऐसी बातें फैलाते हैं, जिनका कोई वजूद ही नहीं होता। जो झूठ फैलाकर तथ्यों के ऐसे तोड़ते-मरोड़ते हैं, जिससे वो अपने छद्म एजेंडा के प्रति लोगों को प्रेरित कर सकें। ऐसी हक़ीक़त को हर्ग़िज़ बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।

हमें सोशल मीडिया से पैदा हुई इन चुनौतियों का मुक़ाबला करना ही होगा। हमें सच्चाई को फैलाने तथा इसे ही स्वीकार करने वाले समाज को बनाना ही होगा। अभिव्यक्ति की आज़ादी हमें समाज को विकृत, प्रदूषित और तबाह करने की छूट नहीं दे सकती। हमें ऐसी प्रवृत्तियों का जवाब नैतिक और क़ानूनी, दोनों तरीक़े से देना होगा। वक़्त की माँग है कि हम सोशल मीडिया को नियंत्रित करें। उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है कि हम लोगों को जागरूक करें। वक़्त की माँग है कि सोशल मीडिया पर परोसी जा रही फ़र्ज़ी ख़बरों और जानकारी की महामारी से निपटने के लिए सख़्त क़ानून बनाये जाएँ, ताकि इनका बेज़ा इस्तेमाल करने वाले बेख़ौफ़ न रह सकें। तकनीक हमें सामर्थ्यवान बनाती है, लेकिन यही हमें तबाह भी कर सकती है। सही वक़्त पर सही क़दम उठाकर ही हम लोकतंत्र को बचा सकते हैं।

(अख़बार डीएनए से साभार। लेखक, राज्यसभा सदस्य और वरिष्ठ काँग्रेस नेता हैं।)

Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

ब्लॉग

कश्मीर को हमने हिंदू-मुसलमान का मसला बना दिया

कश्मीर में 2010 से लेकर 2014 तक आतंकवाद नियंत्रित था, लेकिन अचानक हिरोइज्म की शुरुआत हुई और काफी सारे लोग सड़कों पर आने शुरू हो गए।

Published

on

india-kashmir-protest

कश्मीर समस्या अब तक इसलिए नहीं सुलझ पाई, क्योंकि हमने इसे हमेशा जमीन के एक टुकड़े की तरह देखा है। हमने कश्मीरियों को कभी भारत का नागरिक माना ही नहीं। दोनों देशों ने कश्मीर को अपने ‘अहं’ का सवाल बना लिया है। आम कश्मीरी पाकिस्तान को पसंद नहीं करता, उसकी पैन इस्लामिज्म में कोई दिलचस्पी नहीं है। वह रोजगार और शांति से जीना चाहता है। यह कहना है ‘कश्मीरनामा’ के लेखक अशोक कुमार पांडेय का।

कश्मीर की नब्ज समझने वाले लेखक कहते हैं कि कश्मीरी लोगों को लेकर हमारे अंदर मोहब्बत नहीं, संशय बना हुआ है। वह कहते हैं, “कश्मीर को हमने हिंदू-मुसलमान का मसला बना दिया है। मेरा मानना है कि यदि कश्मीर को अपना मानना है, तो वहां के लोगों की परेशानियों को अपनी परेशानियां समझना होगा। जैसे देखिए, अभी कश्मीर का एक लड़का शताब्दी एक्सप्रेस में बिना टिकट यात्रा करते पाया गया और उसे आतंकवादी और पता नहीं क्या-क्या कह दिया गया, यह सोच खत्म करने की जरूरत है।”

अशोक कुमार पांडेय की किताब ‘कश्मीरनामा’ कश्मीर के भारत में विलय और उसकी परिस्थितियों को बयां करती है। वह कहते हैं, “जब मैं कश्मीर का अध्ययन कर रहा था, तो कश्मीर का मतलब मेरे लिए सिर्फ एक जगह नहीं थी, बल्कि वहां के लोग थे। पिछले कुछ दशकों में कश्मीर का मामला सुलझने की बजाय और उलझ गया है।”

वह कहते हैं कि कश्मीर के लोग परेशान हैं कि उनसे जो वादे किए गए थे, उन्हें निभाया नहीं गया। सारी समस्याओं की जड़ यही है कि भारत और पाकिस्तान दोनों कश्मीर पर अपना हक जताना चाहते हैं। पांडेय कहते हैं, “अगर आप कानूनी रूप से देखें, तो कश्मीर और हिंदुस्तान के बीच संधि हुई थी, तो इस लिहाज से कश्मीर पर भारत का हक बनता है। लेकिन पाकिस्तान इसे अलग तरह से परिभाषित करता है। दोनों देशों ने इसे अपने अहं का सवाल बना लिया है।”

उन्होंने कहा, “इन सभी उलझनों के बीच में पैन इस्लामिज्म ने प्रवेश किया। पैन इस्लामिज्म के बाद यह पूरा मूवमेंट ही बदल गया। सच्चाई यह है कि आम कश्मीरी पाकिस्तान को पसंद नहीं करता। पैन इस्लामिज्म में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है। वह चैन की जिंदगी गुजर-बसर करना चाहता है। वह चाहता है कि कश्मीर में तैनात सुरक्षाबलों की संख्या में घटाई जाए। नौकरियां दी जाएं और वह हिंदुस्तान में शांति से रह सके।”

अशोक पांडेय की इस किताब का आज प्रगति मैदान में विश्व पुस्तक मेले में औपचारिक लोकार्पण हुआ। किताब के बारे में वह कहते हैं, “इस किताब को पूरा करने में उन्हें चार साल लगे। इनमें से दो साल शोध कार्यो में, जबकि दो साल लेखन में लगे। इस दौरान मैंने 125 किताबों की मदद ली, जिसमें आठ से नौ शोधग्रंथ भी हैं। इस सिलसिले में चार बार कश्मीर जाना हुआ।”

उन्होंने कहा, “यह शोधकार्य था। इसलिए जरूरी था दस्तावेज इकट्ठा करना। इसे लेकर मैंने श्रीनगर विश्वविद्यालय, जम्मू और कश्मीर के शोपियां और कई गांवों की खाक छानी। इंटरनेट से भी काफी मदद ली। कुछ ऐसे लोगों से भी मिला, जो पहले आतंकवादी थे लेकिन अब मुख्यधारा में शामिल हो गए हैं।”

पांडेय कहते हैं, “कश्मीर की एक समस्या यह भी है कि यहां कभी जनमत संग्रह नहीं हो पाया और इसके लिए हिंदुस्तान अकेला जिम्मेदार नहीं है, पाकिस्तान भी उतना ही जिम्मेदार है। हमने कश्मीर की समस्या को हिंदू-मुसलमान समस्या में तब्दील कर दिया है। दूसरी बात है कि कश्मीर लोग सिर्फ घूमने जाते हैं। यह सिर्फ पर्यटन तक सिमट गया है, कश्मीरियों से कोई संवाद नहीं है। दोनों के बीच में संवाद बेहद जरूरी है। मैंने किताब के अंत में यही बात लिखी है कि यदि कश्मीर के स्कूली बच्चे अन्य राज्यों में जाएं और वहां के छात्र यहां आएं तो संवाद की स्थिति बेहतर हो सकती है।”

वह कहते हैं, “कश्मीर में जिस तरह का माहौल है, उस पर लेबल चिपकाना बहुत गलत है। हम किसी को देशद्रोही या देशभक्त नहीं कह सकते। कश्मीर के साथ दिक्कत यही है कि वहां उद्योग-कारखाने नहीं हैं, लोगों के पास नौकरियां नहीं हैं, कहीं विकास नहीं है और ऊपर से कश्मीरियों का अपमान अलग से। मेरे लिए विकास का सीधा मतलब है कि लोगों को रोजगार मिले। लोगों को पढ़ने का मौका मिले।”

पांडेय कहते हैं, “कश्मीर के मसले पर सभी सरकारों ने कोई न कोई गलती की है। इंदिरा गांधी की अपनी गलतियां थीं, राजीव गांधी की अपनी और वाजपेयी जी के समय में कुछ काम जरूर हुआ, लेकिन वो कहीं पहुंच नहीं पाया। उसके बाद की सरकार की अपनी गलतियां और इस सरकार की अपनी गलतियां हैं। दिक्कत यही है कि कश्मीर को हमने कभी अपना नहीं समझा। हम सिर्फ यह मान बैठे हैं कि यह एक ऐसा इलाका है, जिस पर हमें कब्जा रखना है। इस मानसिकता को खत्म करना होगा। “

वह कहते हैं कि देश में हर जगह बवाल हो रहा है, हरियाणा में आरक्षण को लेकर कितनी हिंसा हुई। बिहार में जमकर बवाल हुआ। दलितों को छोटी सी बातों पर उन्हें मार दिया जाता है, खाप पंचायतों की करनी किसी से छिपी हुई न हीं है, लेकिन वे देशविरोधी नहीं कहलाते। वहीं, जब बात कश्मीर की आती है तो बलवा करने वाले को फौरन देशद्रोही बता दिया जाता है। हम कश्मीर को गैर मानकर चलते हैं। वे नाराज हैं और अपनी बात कहते हैं तो समझा जाता है कि वे पाकिस्तान का समर्थन कर रहे हैं। यही मानसिकता उन्हें एक दिन पाकिस्तान के पक्ष में धकेल देगी।

पांडेय कहते हैं, “नरेंद्र मोदी जब गुजरात में भाजपा के महासचिव थे तो उन्होंने कहा था कि कश्मीर समस्या के समाधान के लिए तीन ‘डी’ सूत्र जरूरी है- डेवलपमेंट, डेमोक्रेसी और डायलॉग और जब ये तीनों असफल रहें तो चौथे डी ‘डिफेंस’ का प्रयोग करना चाहिए, लेकिन दिक्कत यह है कि कश्मीर में अक्सर चौथा डी पहले प्रयोग में लाया जाता है। अगर पहले तीनों डी का सही तरीके से उपयोग किया जाए, थोड़ा धीरज रखा जाए, सेना को नियंत्रण में रखा जाए और लोगों का विश्वास जीता जाए तो एक दशक में ही कश्मीर में काफी हद तक आतंकवाद खत्म हो जाएगा।”

वह आगे कहते हैं, “कश्मीर में 2010 से लेकर 2014 तक आतंकवाद नियंत्रित था, लेकिन अचानक हिरोइज्म की शुरुआत हुई और काफी सारे लोग सड़कों पर आने शुरू हो गए।”

By : रीतू तोमर

Continue Reading

ब्लॉग

‘स्लोगन बाबा’ ने गंगा प्रेमियों को भी ठगा : राजेंद्र सिंह

गंगा पर बैराज बनाए जा रहे हैं, गंदे नाले मिल रहे हैं, इससे गंगा तो और खत्म होने के कगार पर पहुंच जाएगी। लिहाजा, अब तो वर्तमान सरकार पुरानी सरकार से ज्यादा संवेदनहीन दिखाई देने लगी है।

Published

on

Ganga Polluton

लगभग पौने चार वर्षो में केंद्र सरकार गंगा नदी की अविरलता और इसे प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए कोई सार्थक काम कर पाने में नाकाम रही। इससे गंगा प्रेमी नाराज हैं। दुनिया में ‘जलपुरुष’ के नाम से विख्यात राजेंद्र सिंह का तो यहां तक कहना है कि ‘स्लोगन बाबा (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी) ने गंगा प्रेमियों को भी ठगने में कसर नहीं छोड़ी है।’

स्टॉकहोम वॉटर प्राइज से सम्मानित राजेंद्र सिंह ने आईएएनएस से फोन पर चर्चा के दौरान कहा, “वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में जब केंद्र में नई सरकार आई थी, तो इस बात की आस बंधी थी कि गंगा नदी का रूप व स्वरूप बदलेगा, क्योंकि प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी ने कहा था- ‘गंगा मां ने मुझे बुलाया है।’ उनकी इस बात पर प्रो. जी.डी. गुप्ता, नदी प्रेमी और संत समाज शांत होकर बैठ गया था, बीते पौने चार साल के कार्यकाल को देखें तो पता चलता है कि केंद्र सरकार ने अपने उन वादों को ही भुला दिया है, जो चुनाव के दौरान किए गए थे, अब तो सरकार गंगा माई का नाम ही नहीं लेती।”

Image result for स्टॉकहोम वॉटर प्राइज से सम्मानित राजेंद्र सिंह

Waterman India Rajendra Singh

बीते पौने चार वर्ष तक गंगा प्रेमियों के किसी तरह की आवाज न उठाने के सवाल पर राजेंद्र सिंह ने कहा, “सभी गंगा प्रेमियों को इस बात का भरोसा था कि नई सरकार वही करेगी, जो उसने चुनाव से पहले कहा था। मगर वैसा कुछ नहीं हुआ। तीन साल तक इंतजार किया, अब गंगा प्रेमियों में बेचैनी है, क्योंकि जो वादा किया गया था, उसके ठीक उलट हो रहा है।”

उन्होंने कहा, “गंगा पर बैराज बनाए जा रहे हैं, गंदे नाले मिल रहे हैं, इससे गंगा तो और खत्म होने के कगार पर पहुंच जाएगी। लिहाजा, अब तो वर्तमान सरकार पुरानी सरकार से ज्यादा संवेदनहीन दिखाई देने लगी है।”

‘जलपुरुष’ ने याद दिलाया कि वर्तमान सरकार ने नोटीफिकेशन कर गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया था, मगर गंगा को वैसा सम्मान नहीं मिला, जैसा प्रोटोकॉल के तहत मिलना चाहिए था। गंगा को वही सम्मान दिया जाए, जो राष्ट्रंीय ध्वज को दिया जाता है।

सरकार आखिर गंगा की अविरलता के लिए काम क्यों नहीं कर रही? इस सवाल पर राजेंद्र सिंह ने कहा, “उन्हें लगता है कि गंगा माई की सफाई में कोई कमाई नहीं हो सकती, इसलिए उस काम को किया ही न जाए। ऐसा सरकार से जुड़े लोगों ने सोचा। छोटे-छोटे काम भी अपने दल से जुड़े लोगों को ही दिया गया है।”

Related image

अपनी मांगों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, “रिवर और सीवर को अलग-अलग किया जाए, हिमालय से गंगासागर तक गंगा को साफ किया जाए, गंगा के दोनों ओर की जमीन का संरक्षण हो, न कि विकास के नाम पर उद्योगपतियों को सौंपने की साजिश रची जाए।”

राजेंद्र सिंह का आरोप है, “कुछ पाखंडी गुरुओं ने नदियों की जमीन पर पौधरोपण करने के नाम पर सरकारों से जमीन और पैसे पाने के लिए सहमतिपत्र तैयार किए हैं। यह संकट पुराने संकट से बड़ा है, क्योंकि इसमें किसानी की जमीन बड़े औद्योगिक घरानों को दिलाने का षड्यंत्र नजर आता है। इस षड्यंत्र के बारे में भी गंगा के किसानों को बताना जरूरी है। इस सब संकटों के समाधान के लिए गंगा प्रेमी एक साथ बैठकर चर्चा करने की तैयारी में हैं।”

Continue Reading

ब्लॉग

लोकतांत्रिक देश में पार्टियां प्राइवेट लिमिटेड!

Published

on

Indian Politics

इसमें कोई शक नहीं कि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं, जिस पर गर्व भी है। सच्चाई भी है कि सरकार केंद्र या राज्य कहीं भी हो, पार्टियों के अंदर का लोकतंत्र दूर-दूर तक गायब है। विडंबना, कुटिलता या एकाधिकारवादी प्रवृत्ति, कुछ भी कहें, भारत में शुरू से ही राजनीतिक पार्टियां व्यक्ति के आसरे या प्रभाव से ही प्रभावित रही हैं।

फिलहाल ‘आप’ में भी इसी बात को लेकर घमासान मचा है, तो नया क्या है? रिवाज सरीखे तमाम पार्टियां ‘आम’ आदमी से ‘खास’ बन जाती हैं। गर्व कीजिए कि सरकारें तो लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई होती हैं! ऐसे में ‘आप’ पर ही तोहमत क्यों?

दरअसल, राजनीति शह-मात का खेल है। नकेल जिसके हाथ है, पार्टी उसके नाम है। पुराने दौर से अब तक कमोवेश यही सिलसिला जारी है। ऐसी विविधता दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र, यानी भारत में ही दिखती है। खुश होइए कि लोकतंत्र जिंदाबाद है।

अहम यह कि पार्टियों के भीतर लोकतंत्र रहा ही कब? गांधीजी ने कांग्रेस के लिए देशभर में सदस्य बनाए। जिले तक को तवज्जो दी। सम्मेलनों में अध्यक्ष चुनने की शुरुआत हुई। लेकिन तब भी गांधीजी की पसंद खास होती थी। वर्ष 1937 को देखिए, पहला चर्चित चुनाव हुआ, तब सरदार पटेल संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष थे, लेकिन उम्मीदवारों का चयन पूरी तरह से केंद्रीकृत रहा। कुछ लोकतंत्र बचा रहा, जिसे बाद में इंदिराजी ने खत्म कर दिया। अब अमूमन सारी पार्टियां यही व्यवहार कर रही हैं। एक-एक सीट आलाकमान से तय होती है।

प्रदेश, जिला, नगर, यहां तक कि वार्ड की अहमियत नकारा है। सुप्रीमो पद्धति जन्मी और पार्टियां एक तरह से प्राइवेट लिमिटेड बनती चली गईं। राजनैतिक अनुभव या समाजसेवा से इतर फिल्मी स्टारों ने भी बहती गंगा में गोते लगाए। दर्जनों स्टार देखते-देखते बड़े नेता बन गए, वहीं कई मुख्यमंत्री तक हुए। भला रिटायर्ड या इस्तीफा दिए नौकरशाह या सैन्य अधिकारी क्यों पीछे रहते? भारत की राजनीति सरकारी पदों की अहमियत को भुनाने का मौका जो देती है।

अभी तो आम आदमी पार्टी की बात है, धारा का रुख देख भ्रष्टाचार विरोधी गोते लगाए गए। समाज-सेवक से लेकर नौकरशाह, कवि से लेकर पत्रकार, सभी ने बहती बयार को समझा और एक आंदोलन उपजाया। भारतीय इतिहास में जितनी तेजी से इस पार्टी ने झंडा गाड़ा, यकीनन जात-पात, अगड़े-पिछड़े और फिल्मी लोकप्रियता के नाम की राजनीति भी पीछे हो गई।

आम आदमी की पार्टी कहां से चली और धीरे-धीरे कहां पहुंच गई, सबको दिख रहा है। जब बारी लोकतंत्र में आहूति देने की आई, तो उच्च सदन के खास यजमान एकाएक अवतरित हुए! कहने की जरूरत नहीं कि लोकतंत्र में मतदाता केवल एक वोट बनकर रह गया है, जिसकी अहमियत चंद सेकेंड में बटन दबाने से ज्यादा कुछ नहीं। बाद में उसकी क्या पूछ परख है, खुली किताब है।

दूसरी पार्टियां ‘आप’ के घमासान पर विलाप करें या प्रलाप, लेकिन जब बात उनकी होती है तो लोकतंत्र की दुहाई देते नहीं अघाते। पार्टी कुछ नहीं होती, होते हैं उनको चलाने वाले ही बलशाली और महारथी।

अब मोदी-शाह के कमल की बहार हो, राहुल की कांग्रेस का हाथ हो, केजरीवाल के आप की झाड़ू, अखिलेश-मुलायम की साइकिल, मायावती का हाथी, ममता के दो फूल, लालू का लालटेन, उद्धव का तीर कमान, राज ठाकरे का रेल इंजन, अभिनेत्री जयललिता के बाद पनीर सेल्वम-पलनीस्वामी की दो पत्तियां, करुणानिधि का उगता सूरज, शरद पवार की घड़ी, बीजू जनता दल का शंख, कभी जॉर्ज फर्नांडीज तो अब नीतीश के जद (यू) का तीर, अभिनेता एनटी रामाराव के बाद चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम पार्टी की साइिकल। हाल-फिलहाल रजनीकांत की दहाड़। इनके अलावा देश में न जाने कितने क्षत्रप और उनकी पार्टियां हैं, सच्चाई सबको पता है।

दलों का दलदल हो या हमाम, बस नजर का पर्दा ही है, जिसमें सब कुछ दिखकर भी कुछ नहीं दिखता। यही भारतीय लोकतंत्र है। अब इसे खूबी कहें या दाग, पार्टी तो चलाते हैं केवल सरताज। ऐसे में आम आदमी की क्या हैसियत? जो अंदर है, वह बाहर दिखता जरूर है। अब इस पर चीत्कार करें या आर्तनाद, कोई फर्क नहीं पड़ता।

कहने को कुछ भी कह लें, लेकिन हकीकत यही है कि कम से कम भारतीय राजनीति की यही सुंदरता है, उसका कलेवर हाड़-मांस का तो नहीं, कांच का भी नहीं, लेकिन फिर भी इतना कुछ पारदर्शी है कि सब कुछ दिखता है। इसे मत-मतांतर का फेर, सपनों की सौदागीरी, शब्दों की बाजीगरी कुछ भी कह लें।

लेकिन जानते, देखते और समझते हुए भी दलदल में हर बार हमारा वोट गोता खाकर रह जाता है और हम कहते हैं कि ‘अबकी बार हमारी सरकार।’ इतना कहना ही क्या कम है? तो आइए, एक बार फिर से कहें ‘लोकतंत्र जिंदाबाद’।

By : ऋतुपर्ण दवे

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार व पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

Continue Reading
Advertisement
election
चुनाव1 min ago

त्रिपुरा-नागालैंड-मेघालय में चुनाव की तारीखों का आज होगा ऐलान

अंतरराष्ट्रीय15 mins ago

जापान ने नए पृथ्वी अवलोकन उपग्रह का सफल प्रक्षेपण किया

police
शहर43 mins ago

पंजाब: लुधियाना STF ने 5 किलो हेरोइन के साथ शख्स को किया गिरफ्तार

nigeria-wefornews
अंतरराष्ट्रीय53 mins ago

नाइजीरिया में आत्मघाती बम विस्फोट, 10 की मौत

jammu and kashmir
राष्ट्रीय1 hour ago

जम्मू-कश्मीर: आरएसपुरा में फिर तोड़ा सीजफायर, 1 जवान शहीद

sushma swaraj
राष्ट्रीय1 hour ago

सारे फसाद की जड़ है आतंकवाद : सुषमा

UP Assistant Teacher Recruitment
शहर13 hours ago

Uttar Pradesh: टीचर भर्ती के लिए 68500 वैकेंसी, 25 जनवरी से करें आवेदन

शहर14 hours ago

पश्चिम बंगाल के मिदनापुर में बस पलटने से 7 की मौत, 22 घायल

10rs coin
राष्ट्रीय15 hours ago

RBI ने दी सफाई- 10 रुपये के सभी 14 तरह के सिक्के वैध और मान्य

pravin-togadia
राजनीति15 hours ago

अस्पताल से छूटते ही मोदी पर बरसे प्रवीण तोगड़िया

narottam patel
राजनीति3 weeks ago

रूपाणी कैबिनेट में दरार के आसार! नितिन पटेल के समर्थन में उतरे बीजेपी नेता नरोत्‍तम पटेल

lalu yadav
राजनीति2 weeks ago

चारा घोटाला: लालू को साढ़े तीन साल की सजा

Vinod Rai CAG
ब्लॉग4 weeks ago

संघ के 92 साल के इतिहास में विनोद राय की टक्कर का फ़रेबी और कोई नहीं हुआ!

sports
खेल1 week ago

केपटाउन टेस्‍ट: गेंदबाजों की मेहनत पर बल्‍लेबाजों ने फेरा पानी, 72 रनों से हारी टीम इंडिया

Congress party
ब्लॉग3 weeks ago

काँग्रेसियों की अग्निपरीक्षा! इन्हें ही एक बार फिर देश को आज़ाद करवाना होगा

atal bihari vajpai
ज़रा हटके3 weeks ago

आजीवन क्यों कुंवारे रह गए अटल बिहारी बाजपेयी?

ananth-kumar-hegde
ओपिनियन3 weeks ago

ज़रा सोचिए कि क्या भारत के 69 फ़ीसदी सेक्युलर ख़ुद को हरामी बताये जाने से ख़ुश होंगे!

hardik-nitin
राजनीति3 weeks ago

नितिन पटेल की नाराजगी पर हार्दिक की चुटकी, कहा- ’10 एमएलए लेकर आओ, मनमाफिक पद पाओ’

Modi Manmohan Sonia
ओपिनियन4 weeks ago

2G मामले में ट्रायल कोर्ट के फ़ैसले से सुप्रीम कोर्ट और विपक्ष दोनों ग़लत साबित हुए!

rape case
ओपिनियन4 weeks ago

2017 In Retrospect : दुष्कर्म के 5 चर्चित मामलों ने खोली महिला सुरक्षा की पोल

sitaraman
राष्ट्रीय18 hours ago

सुखोई-30 लड़ाकू विमान में उड़ान भरने वाली देश की पहली महिला रक्षा मंत्री बनीं निर्मला सीतारमण

bjp leader
शहर21 hours ago

बीजेपी नेता ने अधिकारी को जड़ा थप्पड़, देखें वीडियो…

shivraj singh chouhan
राजनीति2 days ago

शिवराज सिंह ने किसको जड़ा थप्पड़? देखें वीडियो…

अंतरराष्ट्रीय4 days ago

PoK में पाक सरकार के खिलाफ प्रदर्शन, सड़कों पर उतरे व्यापारी

Supreme Court Judges
राष्ट्रीय6 days ago

पहली बार SC के जज आए सामने, कहा- ‘हम नहीं बोले तो लोकतंत्र खत्म हो जाएगा’

gadkari
राजनीति7 days ago

नौसेना पर बरसे गडकरी, कहा- ‘दक्षिणी मुंबई में नहीं दूंगा एक इंच जमीन’

mumbai-
शहर7 days ago

मुंबई के हुक्काबार में जमकर तोड़फोड़

helicopter
शहर7 days ago

आर्मी-डे परेड की रिहर्सल के दौरान 3 जवान घायल…देखें वीडियो

Ashwini-Kumar-Chopra
राजनीति1 week ago

भाजपा सांसद का बयान- 2019 में जिताओगे तो 2014 के वादे पूरे करूंगा, देखिए वीडियो

iligaters
अन्य1 week ago

ठंड का कहर: मगरमच्छ बन गया बर्फ…देखें वीडियो

Most Popular