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Viral सच

ये सरासर झूठ है कि भारतीय अर्थव्यवस्था ने फ़्राँस को पछाड़ दिया है!

यदि भारत की जीडीपी एक दशक में दोगुनी हो गयी और वो कौन-कौन से देश हैं, जिनकी जीडीपी इसी दौरान भारत की जीडीपी से पहले दोगुनी हुई है?

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Indian economy

भारत का भक्त-मीडिया आपको ये तो बताता है कि हम अब दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में छठे स्थान पर आ चुके हैं और अब फ़्राँस से आगे हैं। लेकिन वो आपको ये नहीं बताता कि भारतीयों के मुक़ाबले फ़्राँसिसियों की प्रति व्यक्ति आय 20 गुना ज़्यादा है। आपको ये भी नहीं बताया जाता कि फ़्राँस की आबादी से ज़्यादा लोग भारत में आज भी ग़रीबी रेखा से नीचे हैं। राजा का बाजा बन चुका भारतीय मीडिया आपको ये भी नहीं समझता कि कैसे मोदी सरकार ने भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास-दर का हिसाब रखने वाले फ़ार्मूले को ही बदल दिया, जिसकी वजह से मनमोहन सरकार के मुक़ाबले अभी दर्ज होने वाली विकास-दर में दो फ़ीसदी का इज़ाफ़ा अपने आप आ जाता है।

भारतीय मीडिया अपने आप बेईमान नहीं हो गया। मोदी राज में एक बड़ी साज़िश के तहत मीडिया संस्थानों को हिदायत दी गयी कि वो ख़बरों को ऐसे तोड़-मरोड़कर पेश करें, जिससे जनता के सामने हमेशा सरकार की उपलब्धियों की झूठी तस्वीरें ही पहुँचती रहें। वर्ना, हरेक पेशेवर पत्रकार और उसके मीडिया संस्थान को अच्छी तरह पता है कि भारत का फ़्राँस से आगे निकलना सिर्फ़ एक आँकड़ा है। आँकड़ों की तुलनात्मक व्याख्या के बग़ैर वो सिर्फ़ अंक हैं और कुछ नहीं! किसी देश की अर्थव्यवस्था के मजबूत होने का मतलब है कि उसकी आबादी की ख़ुशहाली का बढ़ना। ख़ुशहाली को नापने के कई पैमाने हैं। लेकिन सबसे आसान है प्रति व्यक्ति आय। दूसरा पैमाना है कि शिक्षा-स्वास्थ्य-सड़क-पानी-बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं का स्तर और इस पर होने वाला ख़र्च।

अब ज़रा ये सोचिए कि क्या आप उस व्यक्ति को ज़्यादा धनवान मानेंगे जिसके पास ज़्यादा ज़मीन हो या फिर उसे जिसके पास ज़्यादा उपजाऊ ज़मीन हो? हो सकता है कि किसी के पास सौ बीघा ज़मीन हो, लेकिन वो बंजर हो। जबकि किसी के पास दस बीघा ही हो और वो खेतीहर हो। अब यदि आप अंक के आधार पर सोचेंगे तो ज़ाहिर है कि आप सौ को दस के मुक़ाबले दस गुना बड़ा ही मानेंगे। ऐसा ही बड़क्पन विश्व बैंक की ओर से जारी सालाना, सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का है। ये आँकड़ा कहता है कि साल 2017 में भारत की जीडीपी 2597 अरब डॉलर हो गयी, जबकि फ़्राँस की जीडीपी 2582 अरब डॉलर दर्ज की गयी। ये आँकड़ा ऊपर दिये गये उदाहरण के मुताबिक़, सकल या कुल ज़मीन जैसा है।

विश्व बैंक के आँकड़े के आधार पर ये हर्ग़िज़ नहीं कहा जा सकता कि भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है। क्योंकि फ़्राँस के 6.04 करोड़ लोगों की उत्पादकता की तुलना यदि भारत 134 करोड़ की आबादी की उत्पादकता से की जाएगी तो हम उसके मुक़ाबले बेहद बौने साबित होंगे। इसीलिए, लोगों की ख़ुशहाली जानने के लिए प्रति व्यक्ति आय को आधार माना जाता है। फ़्राँसिसियों की सालाना प्रति व्यक्ति आय जहाँ 38,477 डॉलर है, वहीं भारत के मामले में ये सिर्फ़ 1,940 डॉलर ही बैठती है। इसका मतलब ये हुआ कि एक आम फ़्राँसिसी नागरिक के मुक़ाबले एक आम भारतीय 20 गुना ग़रीब है।

लगे हाथ ग़रीबी को भी समझते चलें। वर्ल्ड पावर्टी क्लॉक और ब्रूकिंग्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अब भी भारत में 7 करोड़ लोग बेहद ग़रीबी में जी रहे हैं। भारत अब दुनिया में सबसे ज़्यादा ग़रीबों की आबादी वाला देश नहीं रहा। क्योंकि नाइजीरिया में बेहद ग़रीब लोगों की आबादी 8.7 करोड़ है। ग़रीबों की संख्या की तुलना करने वक़्त भी ये ग़ौर करना ज़रूरी होगा कि बीते दशकों में देश की कुल आबादी में बेहद ग़रीबों की संख्या और उनका अनुपात क्या रहा है? क्या मोदी राज में ग़रीब घटे हैं? कुल आबादी में ग़रीबों का अनुपात कम हुआ है? क्या ये संख्या और अनुपात मोदी राज से पहले की सरकारों के मुक़ाबले बेहतर हुआ है या बदतर? याद रखिये कि संख्या का महत्व बेहद मामूली है। असली आँकड़ा तो अनुपात का है। यदि अनुपात सुधर रहा है, तभी हम बेहतर हो रहे हैं। वर्ना, नहीं।

इसी तरह, विश्व बैंक की रिपोर्ट की आड़ में भक्त-मीडिया हमें बता रहा है कि नोटबन्दी और जीएसटी से भारतीय अर्थव्यवस्था में तेज़ी आयी है। और, बीते दशक में भारत की जीडीपी दोगुनी हो गयी है। जबकि सच्चाई ये है कि मोदी सरकार यही झूठ तो फैलाना चाहती है। सवाल है कि ये तेज़ी क्या होती है? तेज़ एक तुलनात्मक दशा है। सजातीय की तो तुलना हो सकती है, लेकिन विजातीय की नहीं। मिसाल के तौर पर, साइकिल और बाइक की रफ़्तार की तुलना नहीं हो सकती, हाथी और घोड़े की ताक़त की तुलना नहीं हो सकती, स्त्री और पुरुष की तुलना नहीं हो सकती। लिहाज़ा, जब हम विकास-दर की तेज़ी पर ग़ौर करें, तब ये देखना ज़रूरी होगा कि सम्बन्धित अर्थव्यवस्था का आकार कितना बड़ा है। चीन की अर्थव्यवस्था भारत से छह गुना बड़ी है। वास्तविक मात्रा के लिहाज़ से उनका आकार का 6 फ़ीसदी हमारे आकार के 36 फ़ीसदी के बराबर होगा।

हम देख चुके हैं कि नोटबन्दी अपने हरेक मक़सद में विफल साबित हुई है। इससे काले धन की कोई रोकथाम नहीं हो सकी। उल्टा, सारा काला धन सरकार की मिली-भगत से सफ़ेद होकर बैंकों में जा पहुँचा। आतंकवाद और नक्सलवाद पर भी नोटबन्दी ने कोई प्रभाव नहीं डाला। कैश-लेस यानी डिज़ीटाइज़ेशन के मोर्चे पर भी कोई ख़ास फ़ायदा नहीं हुआ। दूसरी ओर, नोटबन्दी का भारी-भरकम ख़र्च अर्थव्यवस्था पर पड़ा। करोड़ों लोगों का काम-धन्धा चौपट हो गया। रोज़गार-व्यापार पर ऐसा असर पड़ा कि अभी तक हालात सामान्य नहीं हो पाया है। इसी तरह, जीएसटी को भी जिस तरह से लागू किया गया, उसने महँगाई तथा जनता की मुश्किलों को बढ़ाया ही।

इस तरह, बीते एक दशक में भारत की जीडीपी के दोगुना होने की बातों को भी गहराई से समझना बेहद ज़रूरी है। दस साल की उपलब्धि में से मोदी राज के चार साल की औसत विकास-दर की तुलना मनमोहन सिंह सरकार के छह सालों की औसत विकास-दर से करने पर पता चलेगा कि मौजूदा चार साल के मुक़ाबले उससे पहले के छह साल बेहद उम्दा थे। मनमोहन सरकार में औसत विकास-दर 8.5 फ़ीसदी रही, जबकि मोदी राज में यही औसत 6.5 फ़ीसदी का रहा है। इससे दशक का औसत 7.7 फ़ीसदी बैठेगा। अब ज़रा सोचिए कि जो ख़ुद को तेज़ बता रहे हैं क्या वो अपने से पहले वालों के मुक़ाबले 1.2 अंक या 18 फ़ीसदी धीमे नहीं है!

इसी धीमेपन का दूसरे पहलू को भी हमें समझना होगा कि यदि भारत की जीडीपी एक दशक में दोगुनी हो गयी और वो कौन-कौन से देश हैं, जिनकी जीडीपी इसी दौरान भारत की जीडीपी से पहले दोगुनी हुई है? ऐसी तुलना के बग़ैर कोई कैसे कह सकता है कि हमारी उपलब्धि औरों से बेहतर है। विकास-दर की तुलना करते समय ये देखना भी ज़रूरी है कि अलग-अलग अर्थव्यवस्थाओं में महँगाई और मुद्रास्फीति का दशा क्या रही है? क्योंकि जिन देशों में महँगाई नियंत्रण में है, वहाँ ब्याज़-दरें बहुत कम हैं। उनकी मुद्रा की क्रय-शक्ति जहाँ दस साल पहले जितनी ही है, वहीं हमारे रुपये की औक़ात कहीं ज़्यादा कम हो चुकी है। लिहाज़ा, मुमकिन है कि हम रुपये ज़्यादा कमाने लगें, लेकिन ज़रूरी नहीं कि ज़्यादा रुपयों से हमारी ख़ुशहाली भी बढ़ी ही होगी। इसीलिए, हमें आँकड़ों की बाज़ीगरी को समझना आना चाहिए।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

Viral सच

ज्यादातर पाकिस्तानी नहीं जानते इंटरनेट क्या है : सर्वेक्षण

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Internet

इस्लामाबाद, 12 नवंबर | पाकिस्तान में 15 साल से लेकर 65 साल की उम्र के 69 फीसदी लोगों को नहीं मालूम है कि इंटरनेट क्या होता है। यह बात सूचना-संचार प्रौद्योगिकी है(आईसीटी) आधारित एक सर्वेक्षण में प्रकाश में आई है। श्रीलंका के थिंक टैंक लाइर्नी एशिया द्वारा करवाए गए सर्वेक्षण की रिपोर्ट सोमवार को डॉन में प्रकाशित हुई है। रिपोर्ट पाकिस्तान के 2,000 लोगों के सर्वेक्षण के आधार पर तैयार की गई है।

सर्वेक्षक थिंक टैंक ने दावा किया है कि नमूने की प्रक्रिया के तहत राष्ट्रीय स्तर पर 15 साल से 65 साल की उम्र की 98 फीसदी आबादी के प्रतिनिधित्व सुनिश्चित की गई है।

लाइनर एशिया की सीईओ हेलनी गलपाया ने कहा, “पाकिस्तान दूरसंचार प्राधिकरण (पीटीए) की वेबसाइट में 15.2 करोड़ सक्रिय सेल्युलर फोन धारक हैं। चाहे वे आदमी हो या औरत, गरीब हो या अमीर लेकिन वे नहीं एप्स का उपयोग करना नहीं जानते हैं।”

–आईएएनएस

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Viral सच

ज़हर उगलने वाले 13 सेकेंड के इस वीडियो को क्या आपने देखा!

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Flag Pakistan

जैसे शरीर के तपने का मतलब बुख़ार होता है, वैसे ही जब फेंकू ख़ानदान Fake News/Views/Video पर उतर आये तो समझ लीजिए कि अपने पतन की आहट सुनकर वो बदहवासी में झूठ तथा अफ़वाह की उल्टियाँ कर रहा है! क्योंकि झूठ किसी को हज़म नहीं होता, भक्तों का पाचन-तंत्र भी इसे हज़म नहीं कर पाता है! लिहाज़ा, भक्तों को भी उल्टी-दस्त यानी डीहाइड्रेशन की तकलीफ़ होना स्वाभाविक है! इसीलिए जैसे ही संघ परिवार के चहेते संगठनों के सर्वेक्षणों ने बताना शुरू किया कि मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में बीजेपी बुरी तरह से हारने जा रही है, वैसे ही एक ओर तो नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के भाषणों की दिशा पूरी ताक़त से काँग्रेस और राहुल गाँधी के चरित्रहनन की ओर घूम जाती है, वहीं दूसरी ओर, संघियों का अफ़वाह प्रसार तंत्र भी सक्रिय हो जाता है, ताकि समाज में वोट बैंक की सियासत को कोसते हुए ‘हिन्दू-मुसलमान’ करके हिन्दुओं को हिन्दू के नाम पर लामबन्द किया जा सके!

मोदी-शाह के दहकते हुए भाषण तो आपको बन्धक/दलाल न्यूज़ चैनल सारा दिन सुनाते ही रहते हैं! पहले भाषण का लाइव और फिर स्टोरी तथा डिबेट/बहस के रूप में! हालाँकि, इनकी गुणवत्ता को दर्शक/श्रोता/पाठक भी जल्द ही पहचान लेते हैं। इनके सही या ग़लत होने को लेकर अपनी राय भी बनाते हैं। लेकिन इसी के साथ ग़ुमनाम संघियों की ओर से WhatsApp University के ज़रिये हिन्दुओं को मूर्ख बनाकर, उन्हें मुसलमानों के ख़िलाफ़ भड़काने का शरारती खेल चालू हो जाता है! ऐसा ही एक घिनौना खेल मेरे हाथ लग गया। मेरे किसी परिचित ने मुझे 13 सेकेंड का एक वीडियो और उसके साथ निम्न टिप्पणी भी भेजी।

“कैसे सौप दे कोंग्रेस को

ये वतन हिन्दुस्तान का,

हमने देखा है तुम्हारी रेली मैं झंडा पकिस्तान का!!

ये विडिओ जरुर देखे”

इस संदेश के वर्तनी दोष की अनदेखी करके आप वीडियो देखने लगेंगे। फिर अपना सिर धुन लेंगे। आपके नथुने फूलने लगेंगे। आपके होंठ अपशब्दों को बुदबुदाने लगेंगे। फिर आप फ़ौरन काँग्रेस को कोसने लगेंगे। उन्हें देश-विरोधी, ग़द्दार और पाकिस्तान परस्त मानने लगेंगे। काँग्रेस के प्रति आपके मन में नफ़रत पैदा होगी। लेकिन अब ज़रा इस वीडियो को बार-बार देखिए। स्लो मोशन यानी धीमी रफ़्तार में भी देखिए, जैसे क्रिकेट मैच में थर्ड अम्पायर देखते हैं! क्योंकि यदि आप ऐसा नहीं करेंगे तो फ़ौरन इस वीडियो को अपने तमाम परिचितों और ख़ासकर उन लोगों को फ़ारवर्ड नहीं करेंगे जो या तो भक्त नहीं हैं या फिर काँग्रेसी हैं!

आप दोनों में से किसी भी विकल्प को चुने, तो भी उन अनाम और ग़ुमनाम ताक़तों का मक़सद पूरा हो जाता है, जिनके झूठ और दुष्प्रचार के लिए ऐसे वीडियो वायरल करवाये जाते हैं। इस काम के लिए संघ-बीजेपी ने देश भर में कम से कम 20 हज़ार लोगों को बाक़ायदा वेतन वाली नौकरी पर लगा रखा है! सोशल मीडिया की भाषा में इन बेहूदा कार्यकर्ताओं/स्वयंसेवकों को ट्रोल या भक्त कहा जाता है। इन्हें बाक़ायदा गुरिल्ला युद्ध-शैली के क्रान्तिकारियों या विषकन्याओं की तरह प्रशिक्षित किया जाता है।

संघी गुरुकुल या शाखाओं में प्रशिक्षित और संस्कारित ऐसे निपट ‘मूर्ख देशभक्तों’ यानी ट्रोल्स की बदौलत ही 2014 में बीजेपी सत्ता में आयी और अब भगवा ख़ेमे को लगता है कि यही देवदूत और ईवीएम में हेराफ़ेरी ही उसे संकट से उबार पाएगी! लेकिन बकरे की माँ कब तक ख़ैर मना पायी है! राक्षसी वृत्ति जब अति कर देती है, तो उसका पतन होता ही है। यही हाल मोदी सरकार का 2019 में होने वाला है। तभी तो इस वीडियो के बारे में आपको ये नहीं बताया जाता कि ये कहाँ का नज़ारा है? कब का नज़ारा है? क्या आयोजन था? कौन आयोजक था? यदि वीडियो आपत्तिजनक है तो पुलिस-प्रशासन, सरकार-क़ानून ने क्या कोई कार्रवाई की या नहीं? आपको कोई ये भी क्यों नहीं बताया कि जब मामला इतना गम्भीर है, तो इस वीडियो को भक्त चैनलों पर क्यों नहीं दिखाया गया? वहाँ इसे लेकर तलवारें क्यों नहीं भाँजी गयीं?

बहरहाल, मैं इन सवालों में नहीं उलझा। क्योंकि मुझे इन सभी का सही जबाब मालूम है। इसीलिए मैंने अपने उस परिचित को पाकिस्तान के झंडे की तस्वीर के साथ सन्देश भेजा कि “संघियों के झूठ ने हिन्दुओं से उनकी प्रगतिशीलता और बुद्धि-विवेक को छीनकर उन्हें मूर्खों में तब्दील कर दिया है। जैसे हर पीली चीज़ सोना नहीं होती वैसे ही हर हरा झंडा और चाँद-तारा पाकिस्तानी नहीं होता! अब ज़रा पाकिस्तान के झंडे को ग़ौर से देखिए। इसमें बायीं तरफ़ सफ़ेद पट्टी भी है। जबकि आपको गुमराह करने वाले झंडे में ये नहीं है! अब आप चाहें तो अपने पाप का प्रायश्चित करते हुए मेरे इस जबाब को वापस उस महामूर्ख को भेज सकते हैं, जिसने आपको ये वीडियो भ्रष्ट टिप्पणी के साथ भेजा है।”

पता नहीं मेरे उस परिचित ने ऐसी किया या नहीं, लेकिन यदि इतना ज़रा दिमाग़ अन्य लोग भी लगाने लगें तो इस वीडियो को फ़ैलाने वालों का मक़सद पूरा नहीं हो सकता। सोशल मीडिया के ज़रिये ज़हर उगलगर हिन्दुओं को उल्लू बनाकर अपना सियासी उल्लू सीधा करने वालों के मंसूबे पूरे नहीं होते! तब टेलिकॉम मंत्री रविशंकर प्रसाद को सोशल मीडिया में जबाबजेही की बातें करते हुए सड़क पर डंडा पटकने का मौक़ा कैसे मिलता? फ़ेसबुक, ट्वीटर और व्हाट्सअप को धमकाने की नौटंकी करके सुर्ख़ियाँ कैसे बटोरी जाती? सूचना-प्रसारण मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर को भी मीडिया संस्थानों के कार्यक्रमों में फ़ेक न्यूज़ पर चिन्ता जताने का मौका कैसे मिलता? दरअसल, संघियों की रणनीति ही यही है कि ‘स्वयंसेवकों से उपद्रव करवाओ और नेताओं से बोलो कि प्रवचन देकर जनता को ग़ुमराह करते रहे!’

हम देख चुके हैं कि दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) को लेकर कैसे झूठ फ़ैलाया गया कि वहाँ देश तोड़ने वाले अर्बन नक्सल तैयार होते हैं। ‘हमें चाहिए आज़ादी’ वाले नारे को जेएनयू में कैसे राष्ट्रविरोधी बनाया गया? इसे सबने क़रीब से देखा। जिन को क़सूरवार बताया गया, उन्हें अदालत में दोषी नहीं साबित किया गया, बल्कि इनकी सुनवाई करने जा रही अदालतों को बलवा-स्थल में बदलने का ज़िम्मा उन्हीं लोगों ने अपने हाथों में ले लिया जो संविधान की शपथ लेकर संवैधानिक पदों पर बैठे हैं। दूसरी ओर, जेएनयू में कबाड़ बन चुके टैंक को खड़ा करके छात्रों में देश भक्ति भरने का ढोंग किया गया।

फ़ेक न्यूज़ की समस्या का समाधान बहुत मुश्किल नहीं है। डिज़ीटल या साइबर जगत में डाटा की वही भूमिका है जो हमारे शरीर में ख़ून की है। इसीलिए डाटा का स्रोत ग़ुमनाम नहीं रह सकता। कम्प्यूटर की भाषा में जिसे आईपी नम्बर या इंटरनेट प्रोटोकॉल करते हैं, उससे किसी भी साइबर सामग्री के निर्माता तक पहुँचा जा सकता है, क्योंकि किसी भी डिज़ीटल उपकरण का अनोखा आईपी नम्बर होता है। ये नम्बर फ़र्ज़ी नहीं हो सकता। भले ही हैकर्स इस नम्बर के साथ कोई भी फ़र्ज़ीवाड़ा कर लें, लेकिन फ़र्ज़ी नम्बर भी डिज़ीटल की परिभाषा में फ़र्ज़ी नहीं हो सकता।

आईपी नम्बर की तह में जाकर ही आईटी विशेषज्ञ उन लोगों तक पहुँचते हैं, जहाँ वो पहुँचना चाहते हैं। कौन नहीं जानता कि हमारे देश की पुलिस जब अपराधी तक पहुँचना चाहती है तो कुछेक अपवादों को छोड़कर ज़रूर पहुँचती है। इसीलिए ये सवाल उठना लाज़िमी है कि यदि मोदी के ख़िलाफ़ अपशब्द लिखने वालों को पकड़ा जा सकता है तो राहुल के ख़िलाफ़ झूठ फ़ैलाने वालों को क्यों नहीं पकड़ा जाता? इसकी वजह ये है कि हरेक सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म के पास अपने हरेक उपभोक्ता का ब्यौरा होता है। इसी ब्यौरा को यदि हरेक सन्देश के साथ चिपकाने की शर्त अनिवार्य कर दी जाए तो फ़ेक न्यूज़ गढ़ने और उसे फ़ैलाने वालों के गिरेबान तक पहुँचा जा सकता है।

सोशल मीडिया कम्पनियों को सिर्फ़ किसी सन्देश को भेजने वाले की पहचान ज़ाहिर करने का टूल सार्वजनिक करना है। आगे का काम क़ानून और उसकी एजेंसियों का है। लेकिन गोपनीयता या इंस्क्रिप्शन के नाम पर अपराधियों को छिपाकर रखा जाता है। अब ज़रा सोचिए कि साइबर अपराधियों को छिपाकर रखने से कौन फ़ायदे में है!

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Viral सच

लोगों ने 3 महीनों में व्हाट्सएप पर बिताए 85 अरब घंटे

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WhatsApp

सैन फ्रांसिस्को, 21 अगस्त | सोशल मीडिया प्लेटफार्म व्हाट्सएप के संबंध में एक रोचक जानकारी सामने आई है। एक रपट से पता चला है कि लोगों ने बीते तीन महीनों में फेसबुक के स्वामित्व वाले व्हाट्सएप पर 85 अरब घंटे समय बिताया। फोर्ब्स की सोमवार को रपट के अनुसार, अमेरिका स्थित एप विश्लेषक कंपनी एप्पटोपिया की ओर से जारी आंकड़े में बताया गया है कि बीते तीन महीनों में लोगों ने व्हाट्सएप पर अपने 85 अरब घंटे खर्च किए। इस एप को दुनिया भर में 1.5 अरब प्रयोगकर्ता इस्तेमाल करते हैं।

इसी प्रकार, प्रयोगकर्ताओं ने इस दौरान इसकी स्वामित्व वाली कंपनी, फेसबुक पर 30 अरब घंटे का समय बिताया।

एप्पटोपिया के प्रवक्ता एडम ब्लैकर ने कहा, “यह स्पष्ट है कि व्हाट्सएप पसंद किया जाने वाला वैश्विक मैसेजिंग एप है।”

दुनियाभर में प्रयोगकर्ता जिन 10 एप पर सबसे ज्यादा समय बिताते हैं, उनमें व्हाट्सएप, वीचैट, फेसबुक, मैसेंजर, पेंडोरा, यूट्यूब, इंस्टाग्राम, ट्विटर, गूगल मैप्स और स्पॉटीफाई प्रमुख हैं।

–आईएएनएस

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