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उप्र के कर्मचारियों के पैसों को मिर्ची से जुड़ी वधावन की कंपनी में लगाया गया

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नई दिल्ली, 1 नवंबर 😐 मुंबई स्थित विवादास्पद कंपनी, दीवान हाउसिंग फायनेंस कॉरपोरेशन लिमिटेड (डीएचएफएल) के साथ उत्तर प्रदेश सरकार के कथित सौदे को लेकर लखनऊ में हड़कंप मचा हुआ है। राज्य सरकार के उप्र विद्युत निगम लिमिटेड (यूपीपीसीएल) ने एक विवादास्पद निर्णय के तहत कथित रूप से अपने कर्मचारियों के 2,600 करोड़ रुपये के फंड का डीएचएफएल में निवेश किया है। डीएचएफएल के प्रमोटरों से हाल ही में प्रवर्तन निदेशालय ने दाऊद इब्राहिम के एक पूर्व सहयोगी इकबाल मिर्ची की एक कंपनी के साथ संबंधों को लेकर पूछताछ की है।

इंजीनियरों और कर्मचारियों के संघ ने कर्मचारी भविष्य निधि के पैसे को एक विवादास्पद कंपनी में निवेश करने का मामला जोर-शोर से उठाया है। यूपीपीसीएल के चेयरमैन को लिखे एक पत्र में कर्मचारी संगठन ने कर्मचारियों के सामान्य भविष निधि (जीपीएफ) और अंशदायी भविष्य निधि (सीपीएफ) से संबंधित पैसे को निवेश करने के निर्णय पर सवाल उठाया है।

यूपी स्टेट इलेक्ट्रिीसिटी बोर्ड इंजीनियर्स एसोसिएशन (यूपीएसईबीईए) ने कहा है कि योगी आदित्यनाथ सरकार को अब यह सुनिश्चित करना चाहिए कि एक विवादास्पद कंपनी में जमा की गई हजारों कर्मचारियों की गाढ़ी कमाई वापस लाई जाए।

यूपीएसईबीईए के महासचिव राजीव कुमार सिंह ने आईएएनएस से कहा, “अभी भी 1,600 करोड़ रुपये से अधिक की राशि डीएचएफएल में फंसी हुई है। सरकार यह पैसा वापस लाए। हम सरकार से एक आश्वासन भी चाहते हैं कि जीपीएफ या सीपीएफ ट्रस्ट में मौजूद पैसों को भविष्य में इस तरह की कंपनियों में निवेश नहीं किया जाएगा।”

यूपीएसईबीईए के पत्र में कहा गया है कि (यूपी स्टेट पॉवर सेक्टर इंप्लाई ट्रस्ट के) बोर्ड ऑफ ट्रस्टी ने सरप्लस कर्मचारी निधि को डीएचएफएल की सावधि जमा योजना में मार्च 2017 से दिसंबर 2018 तक जमा कर दिया। इस बीच बंबई उच्च न्यायालय ने कई संदिग्ध कंपनियों और सौदों से उसके जुड़े होने की सूचना के मद्देनजर डीएचएफएल के भुगतान पर रोक लगा दी।

पत्र में आगे कहा गया है कि ट्रस्ट के सचिव ने फिलहाल स्वीकार किया है कि 1,600 करोड़ रुपये अभी भी डीएचएफएल में फंसा हुआ है। इंजीनियर एसोसिएशन ने आरोप लगाया है कि कर्मचारी निधि को किसी निजी कंपनी के खाते में हस्तांतरित किया जाना उन नियमों का सरासर उल्लंघन लगता है, जो कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति के बाद के लिए इस निधि को सुरक्षित करते हैं।

इस बीच, ऑल इंडिया पॉवर इंजीनियर्स फेडरेशन के चेयरमैन, शैलेंद्र दुबे ने कहा कि योगी सरकार को यह पता करने के लिए तत्काल एक जांच शुरू करनी चाहिए कि किसके निर्देश पर बोर्ड ने कर्मचारी निधि को एक संदिग्ध कंपनी में निवेश करने का निर्णय लिया।

दुबे ने आईएएनएस से कहा, “पंजाब एंड महाराष्ट्रा को-ऑपरेटिव (पीएमसी) बैंक ने डीएचएफएल के साथ जो गलती की, वही भयानक गलती बोर्ड ने की है। मेरी नजर में यह एक और घोटाला लगता है, जिसकी एक गहन जांच की जरूरत है।”

जीपीएफ और सीपीएफ निधियों को डीएचएफएल को हस्तांतरित करने के विवादास्पद निर्णय के संबंध में आईएएनएस ने उप्र के प्रमुख सचिव (ऊर्जा) और यूपीपीसीएल के चेयरमैन, आलोक कुमार से बात की। लेकिन सवालों के जवाब देने के बदले उन्होंने सवालों को उन्हें भेजने का अनुरोध किया। स्टोरी प्रकाशित करने के समय तक कुमार सवालों के जवाब नहीं दे पाए थे।

ईडी दाऊद गिरोह के भूमि सौदों का खुलासा करने के बाद सनब्लिंक रियल एस्टेट के साथ डीएचएफएल के कथित संबंधों की जांच कर रहा है। सनब्लिंक रियल एस्टेट के जरिए ही धनराधि को मिर्ची के कहने पर दुबई पहुंचाया गया था।

डीएचएफएल के चेयरमैन कपिल वधावन और उसके भाई धीरज वधावन से हाल ही में ईडी ने रियलिटी फर्म को मोर्टगेज लेंडर द्वारा दिए गए 2,186 करोड़ रुपये से अधिक के ऋण के संबंध में पूछताछ की थी।

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महाराष्ट्र : सरकार बनाने की राह में आदित्य को सीएम बनाने की मांग से बाधा

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Yuva Sena president Aditya Thackeray

नई दिल्ली, 19 नवंबर | महाराष्ट्र में सरकार गठन के लिए कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) बीच न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर चल रही बातचीत के बीच शिवसेना सुप्रीमो उद्धव ठाकरे द्वारा अपने बेटे आदित्य ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाने पर दिया जा रहा जोर, सरकार गठन की राह में सबसे बड़ी बाधा बन रहा है। राकांपा के कई नेता इसे पसंद नहीं कर रहे हैं।

एक वरिष्ठ सूत्र ने आईएएनएस से कहा कि उद्धव ठाकरे अपने बेटे आदित्य ठाकरे को सीएम बनाने की बात कह रहे हैं। इससे राकांपा के कई नेता असहज महसूस कर रहे हैं जो आदित्य जैसे नौसिखिए के साथ काम नहीं करना चाहते हैं।

इसके साथ ही राकांपा मुख्यमंत्री पद के लिए बारी-बारी से रोटेशन की बात कर रही है। वह चाहती है कि रोटेशन के तहत उसकी पार्टी का भी मुख्यमंत्री बने।

वहीं, कांग्रेस व राकांपा के नेता उद्धव ठाकरे के साथ काम करने के लिए तैयार हैं।

एक सूत्र ने कहा कि महाराष्ट्र में सरकार गठन में देरी कांग्रेस की वजह से नहीं बल्कि राकांपा प्रमुख की वजह से हो रही है जो कि कांग्रेस की तुलना में शिवसेना को लेकर ज्यादा सशंकित हैं।

एक सूत्र ने कहा कि राकांपा प्रमुख ने सही कहा है कि उन्होंने अभी तक सरकार गठन पर सोनिया गांधी से विचार विमर्श नहीं किया है।

राकांपा नेता शिवसेना की कार्यशैली व विचारधारात्मक विरोधाभासों को लेकर भी चिंतित हैं।

शिवसेना नेता संजय राउत ने भी कहा कि ‘शरद पवार के बयानों को समझना कोई आसान काम नहीं है।’

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ओवैसी की वजह से बीजेपी के चक्रव्यूह में फँसीं ममता

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Owaisi Amit Shah Mamata

राजनीति में बड़ा नेता बनने की दो तरक़ीब है। पहला, आपके पास जितना बड़ा जनाधार, आप उतने बड़े नेता। और दूसरा, आपके प्रतिद्वन्दी आपको कितना बड़ा नेता मानते हैं? विरोधी आपको कितनी गम्भीरता से लेते हैं और लेने के लिए मज़बूर होते हैं? ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी भले ही एक क्षेत्रीय पार्टी के नेता हैं, लेकिन उनके बयान उनके विरोधियों को मज़बूर करते हैं कि वो ओवैसी को गम्भीरता से लें। भारतीय राजनीति में ओवैसी को सबसे गम्भीरता से बीजेपी लेती है। अब ममता बनर्जी भी इसी जाल में उलझती दिख रही हैं। बीजेपी की तर्ज़ पर ही उन्होंने भी ओवैसी को भाव देने की राह पकड़ ली है।

तभी तो 19 नवम्बर को कूचबिहार में तृणमूल काँग्रेस के कार्यकर्ताओं की एक बैठक में ममता बनर्जी ने ओवैसी का नाम लिये बग़ैर कहा, ‘मैं देख रही हूँ कि कट्टरपन्थि हैदराबाद से हैं, वो बीजेपी की बी टीम जैसा व्यवहार कर रहे हैं।’ मतलब साफ़ है कि ममता को पश्चिम बंगाल में जहाँ बीजेपी-ए से चुनौती मिल रही है, वहीं उन्हें बीजेपी-बी के असर की भी चिन्ता सता रही है। उन्हें दिख रहा है कि उनके मुस्लिम वोट बैंक में यदि ओवैसी ज़रा सा भी सेंधमारी करने में सफल रहे तो उसका नुकसान तृणमूल को ही होगा। इसीलिए वो ओवैसी पर कट्टरपन्थी होने का तमग़ा लगाकर उसे पसन्द करने वाले मुसलमानों को आगाह करना चाहती हैं।

सियासत की ऐसी नूरा-कुश्ती से बीजेपी की मुरादें पूरी होती हैं। क्योंकि ओवैसी और ममता की तकरार से बीजेपी के हिन्दुत्ववादी एजेंडे को ऐसी हवा मिलती है कि वो एक ही तीर से दोनों पर निशाना साध लेती है। अपने हिन्दू जनाधार को संगठित करने के लिए बीजेपी की ओर से ओवैसी को ‘मुसलमानों की सबसे मुखर आवाज़’ का दर्ज़ा दे दिया जाता है। ममता पर मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप वैसे ही लगाये जाते हैं, जैसे काँग्रेस पर लगाये जाते रहे हैं। आख़िर, व्यावहारिक तौर पर बंगाल में ममता की तृणमूल ही वो असली काँग्रेस है, वो मोदी की दोनों आँधियों के बावजूद मज़बूती से खड़ी है।

ममता को हिन्दुत्व विरोधी बताकर बदनाम करने के लिए बीजेपी ने अपने सारे घोड़े खोल रखे हैं। तभी तो प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष दिलीप घोष और संघ का ज़मीनी तंत्र ये झूठ फ़ैलाता है कि ‘ममता, सरस्वती पूजा नहीं होने देती, दुर्गा पंडाल नहीं लगते देती।’ झूठ फैलाकर राजनीतिक रोटियाँ सेंकने में बीजेपी हमेशा से माहिर रही है। मौजूदा दौर में सोशल मीडिया की टेक्नोलॉज़ी की वजह बीजेपी का पौ-बारह हैं। इसीलिए ममता को साफ़ दिख रहा है कि बंगाल के मुसलमान ओवैसी को जितना ज़्यादा पसन्द करेंगे, उतना ही हिन्दू लामबन्द होंगे। इससे जहाँ हिन्दुओं में कट्टरवादी हिन्दुत्व का प्रभाव बढ़ेगा, वहीं प्रतिक्रिया स्वरूप कट्टरवादी मुसलमान और भड़केंगे। दोनों को मिला-जुला नुकसान तृणमूल को न हो जाए, इसीलिए ममता ने ओवैसी पर हमला किया है।

इसीलिए बीजेपी, ममता को डरा हुआ बता रही है। ऐसा काल्पनिक डर हिन्दुओं को जितना सच्चा लगेगा उतने हिन्दू वोट ममता के पास से छिटक सकते हैं। इसकी भरपाई मुस्लिम वोटों से नहीं हो सकती क्योंकि ओवैसी ने साफ़ कहा कि वो अप्रैल-मई 2021 में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए पश्चिम बंगाल में अपने उम्मीदवार उतारेंगे। ओवैसी के लोग कितनी सीटें जीत पाएँगे, ये तो कोई नहीं जानता लेकिन उन्हें जितने भी वोट मिलेंगे उतने का नुक़सान ममता को ही होगा। इसीलिए ममता ने ओवैसी को बीजेपी की बी-टीम कहा है।

दूसरे शब्दों में, जब बीजेपी की ए-टीम हिन्दुओं का वोट काट रही होगी, तभी बीजेपी की बी-टीम मुसलमानों का वोट काटकर अन्ततः बीजेपी को ही फ़ायदा पहुँचाएगी। यही वो सबसे बड़ी वजह है कि बीजेपी के इशारों पर नाचने वाला मीडिया भी ओवैसी जैसे नेता को बहुत गम्भीरता से लेता है। टीवी चैनलों के स्टूडियों में ओवैसी के बयानों पर चर्चाएँ होती हैं, ताकि हिन्दुत्ववादियों का पालन-पोषण होता रहे। ओवैसी इस सच्चाई के लाभार्थी हैं, वर्ना विपक्षी पार्टियों के किसी भी नेता को भारत के अख़बारों, टीवी चैनलों, वेबसाइटों और सोशल मीडिया पर इतना बढ़ावा कभी नहीं मिलता, जिसके लिए अन्य विरोधी पार्टियों के नेता तरसते हैं!

बहरहाल, उम्दा और तेज़तर्रार वक़्ता की पहचान रखने वाले ओवैसी के लिए ये बातें किसी बड़ी उपलब्धि के कम कैसे हो सकती है? रोज़ाना, कुछ न कुछ ऐसा होता रहता है, जिससे ओवैसी को नरेन्द्र मोदी और बीजेपी पर हमला करने का मसाला मिल जाता है। इसीलिए ममता के बयान की हवा से ओवैसी को अपनी पतंग को और ऊँचा उड़ाने का ईंधन मिल जाता है। ओवैसी का ये सवाल बिल्कुल सही है कि ‘हमने तो देश की सिर्फ़ तीन सीटों पर चुनाव लड़ा था, फिर बीजेपी ने 303 सीटें कैसे जीत लीं? हरियाणा में हम चुनाव नहीं लड़े तो फिर वहाँ बाक़ी दलों की सरकार क्यों नहीं बनी? महाराष्ट्र में नयी सरकार के गठन को बीजेपी की किस बी-टीम ने रोक रखा है? ज़ाहिर है, ममता बनर्जी ऐसे मुश्किल सवालों के जबाब सार्वजनिक रूप से कभी नहीं देना चाहेंगी। यही राजनीति है।

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन का गुनहगार कौन?

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Maharashtra Crisis

महाराष्ट्र ने तो 24 अक्टूबर को खंडित जनादेश दिया नहीं, तो फिर उसे लोकप्रिय सरकार पाने के संवैधानिक हक़ से दूर रखने का गुनहगार कौन है? बीजेपी या शिवसेना या फिर दोनों! लेकिन संविधान के संरक्षकों ने क़सूरवार को सज़ा देने के बजाय बेक़सूर जनता पर ही एक और सितम का रास्ता चुना! संविधान की दुहाई देकर केन्द्र सरकार ने महाराष्ट्र को अपनी मुट्ठी में कर लिया। हालाँकि, सभी जानते हैं कि राष्ट्रपति शासन के विकल्प को हड़बड़ी और खिसियाहट में चुना गया है। इसीलिए बीजेपी के सिवाय सबकी ज़ुबाँ पर बस, एक ही सवाल है यदि नये दावेदारों को थोड़ा और वक़्त दे दिया जाता तो कौन सा आकाश टूट पड़ता?

यदि माननीय संविधान साहब, इंसानों की तरह भावनाएँ ज़ाहिर कर सकते, तो अभी दहाड़े मारकर रो रहे होते! स्पष्ट जनादेश के बावजूद महाराष्ट्र में सरकार नहीं बनने की वजह से बेचारे संविधान महोदय बीमार पड़ गये। तेज़ सियासी बुख़ार की तपिस के आगे घरेलू उपचार और फ़ैमिली डॉक्टरों के इलाज़ से कोई फ़ायदा नहीं हुआ। मर्ज़ बढ़ता गया, ज्यों-ज्यों दवा की। सबसे बड़े डॉक्टर बीजेपी ने जब मरीज़ के आगे हाथ खड़े कर दिये तो रस्म-अदायगी के नाम पर गवर्नर साहब ने शिवसेना और एनसीपी जैसे अन्य राजवैद्यों को बुलाया। लेकिन इनकी दवाईयाँ असर दिखातीं, इससे पहले ही उनका सब्र टूट गया। आनन-फ़ानन में राष्ट्रपति शासन लग गया, जो एक नये संक्रमण की तरह है। अब सवाल ये है कि बीजेपी का सब्र क्यों जबाब दे गया?

आप चाहें तो बीजेपी से हमदर्दी जता सकते हैं! हालाँकि, शिवसेना ने जैसे अभी बीजेपी को गच्चा दिया है, बिल्कुल वैसा ही सलूक बीजेपी ने जम्मू-कश्मीर में महबूबा मुफ़्ती के साथ किया था। जिस नापाक राह पर अभी शिवसेना चल रही है, उसी राह पर चलकर नीतीश कुमार ने बीजेपी से दोस्ती की थी। विधायकों की जिस ख़रीद-फ़रोख्त को अभी लोकतंत्र और संविधान के लिए पतित आचरण बताया जा रहा है, उसे ही थोड़े समय पहले कर्नाटक और गोवा में अपने शबाब पर देखा गया था। लिहाज़ा, संवैधानिक सुचिता और जनादेश से धोखाधड़ी की दुहाई या तो महज घड़ियाली आँसू हैं या फिर दिखाने के दाँत।

राजनीति आज मौकापरस्ती का दूसरा नाम है। सबको पहले किसी भी क़ीमत पर टिकट, फिर वोट और आख़िर में सत्ता चाहिए। अब ज़्यादातर नेताओं, सांसदों या विधायकों का कोई वैचारिक आधार नहीं है। विचारधारा और मूल्य-सिद्धान्त की बातें सिर्फ़ तभी होती हैं, तब माज़रा ‘अंगूर खट्टे हैं’ वाला हो। वर्ना, सबको सत्ता चाहिए। अब यही राजनीति है। एक पार्टी में ज़िन्दगी ग़ुजार देने वाले जब दलबदल करते हैं तो यदि उन्हें जनता का डर नहीं सताता तो 30 साल पुराने दोस्ती को तोड़ लेने वालों को भला क्यों डर लगेगा!

बीजेपी की दशा उस भूखे जैसी है, जिसके सामने से उसके 30 साल पुराने दोस्त शिवसेना ने ही थाली खींच ली। कोई नहीं जानता कि 50-50 फ़ॉर्मूले को लेकर कौन सच्चा है और कौन झूठा? वोट माँगने से पहले महाराष्ट्र की जनता को तो किसी ने बताया नहीं कि भीतरख़ाने क्या खिचड़ी पकी थी? अब आलम ये है कि शिवसेना अपना घर बदलकर भी सत्ता में तो रहेगी ही। एनसीपी और काँग्रेस की भी लाटरी लग गयी। जनादेश था कि विपक्ष में रहो। लेकिन वक़्त ने ऐसी करवट ली कि आज सत्ता दरवाज़े पर आ खड़ी हुई है। ये बिहार का उलट है। बिहार में बीजेपी को विपक्ष में बैठने का जनादेश मिला था। लेकिन वक़्त के करवट बदलने से वो सत्ता में है। किस्मत ने साथ दिया तो हरियाणा में विरोधी को पटाकर सत्ता बचा ली। महाराष्ट्र वाली कुंडली में अभी राजयोग नहीं है।

बीजेपी की खिसियाहट को समझना मुश्किल नहीं है। चाल-चरित्र-चेहरा तो बीते ज़माने की बातें थीं। आज आलम ये है कि शिवसेना ने उसके सामने से सजी हुई थाली खींच ली। उसका खिसियाना, छटपटाना और झुँझलाना स्वाभाविक है। ऐसी दशा में कोई और भला करेगा भी तो क्या? बेशक़, खिसियाएगा। दाँत पीसेगा। गुस्से से तमतमा उठेगा। आँखें लाल-पीली करेगा। प्रतिशोध की भावना से भर उठेगा। वश चले तो सामने से थाली खींचने वाले को कच्चा चबा जाए। ये तो मुमकिन था नहीं, लिहाज़ा आव देखा न ताव और लगा दिया राष्ट्रपति शासन। कोई चारा ही नहीं बचा था। विधानसभा भंग हो नहीं सकती। बहुमत के बावजूद फड़णवीस की कुर्सी बची नहीं। एनडीए से शिवसेना निकल गयी सो अलग। यानी, ‘चले थे हरि भजन को ओटन लगे कपास’ या ‘दुविधा में दोनों गये, माया मिली न राम’!

अब कुछ दिनों तक सुप्रीम कोर्ट में ज़ोर-आज़माइश होगी। फिर विधानसभा में ही शक्ति-परीक्षण का आदेश आएगा। इस दौरान शिवसेना, एनसीपी और काँग्रेस तीनों मिलकर न्यूनतम साझा कार्यक्रम यानी कॉमन मिनिमन प्रोग्राम बना लेंगे। तय होगा कि कितने-कितने वक़्त के लिए किसका-किसका नेता मुख्यमंत्री बनेगा, किसे कौन-कौन सा मंत्रालय मिलेगा और किसे विधानसभा अध्यक्ष का पद? सत्ता की मलाई के बन्दरबाँट का फ़ॉर्मूला तैयार होते ही, वही हस्तियाँ राष्ट्रपति शासन को हटाएँगी, जिन्होंने अभी इसे महाराष्ट्र पर थोपा है। बीजेपी ने यदि अपनी खिसियाहट और झुँझलाहट पर काबू पा लिया होता तो तमाम नौटंकीबाज़ी से बचा जा सकता था। उसके विवेक को तो अहंकार ने पहले ही खा लिया था।

बीजेपी के पास अब भी धोबी-पछाड़ वाला एक दाँव बचा हुआ है। वो चाहे तो शिवसेना को ऐसा लालच देकर उसकी प्रतिष्ठा को चोट पहुँचा सकती है कि ‘अरे भाई उद्धव-आदित्य, छोड़ो गिले-शिकवे। रूठना छोड़ो और आओ तुम्हीं मुख्यमंत्री बन जाओ। हम हों या तुम, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। हम दोस्ते थे और दोस्त ही रहेंगे। हमारे रिश्ते तो बाप-दादा के ज़माने के हैं। रोटी-बेटी के सम्बन्ध ऐसे थोड़े ही टूटा करते हैं। अरे, जहाँ चार बर्तन होते हैं वहाँ आपस में टकराते भी हैं। अब नाराज़गी छोड़ो और घरवापसी करो। आख़िर, जनादेश भी तो हमारी दोस्ती को ही मिला है।’

ये बातें काल्पनिक भले लगें लेकिन असम्भव नहीं हैं। राजनीति को यूँ ही ‘सम्भावनाओं का खेल’ नहीं कहा गया। खेल का एक हथकंडा ये हो सकता है कि भले ही शिवसेना-एनसीपी-काँग्रेस की तिकड़ी सरकार बना ले, लेकिन बीजेपी ख़ामोश नहीं बैठे। पूरी ताक़त ने इन पार्टियों को तोड़ने और इनके विधायकों को ख़रीदने की वैसी ही मुहिम छेड़ दे, जैसा उसने कर्नाटक, गोवा और उत्तर पूर्वी राज्यों में किया। अन्य राज्यों में भी विरोधी पार्टियों से आये तमाम नेताओं से बीजेपी अटी पड़ी है। इसीलिए, महाराष्ट्र में भी ग़ैर-बीजेपी सरकार उतने दिन ही चल पाएगी, जितने दिन बीजेपी उसे चलने देगी!

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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