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स्वास्थ्य

डिप्रेशन से बचने के लिए खाएं अंगूर

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अगर आप डिप्रेशन जैसी परेशानी से बचना चाहते हैं तो अंगूर जरूर खाएं। अंगूर खाने से मनोविकार कम होता है। यह बात एक हालिया शोध में उजागर हुई है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि खाने  में अंगूर को शामिल करने से मानसिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जबकि अंगूर रहित आहार का सेवन करने वालों को निराशा व हताशा जैसे विकारों के लिए चिकित्सकों की शरण लेना पड़ सकती है।

ऑनलाइन ‘नेचर कम्यूनिकेशंस’ में प्रकाशित शोध के नतीजे बताते हैं कि खाने में अंगूर से मिलने वाले नैसर्गिक तत्वों से हताशा जैसे मनोविकार कम हो सकते हैं। मुख्य शोधकर्ता व न्यूयार्क के इकाह्न स्कूल ऑफ मेडिसिन में प्रोफेसर गियूलियो मारिया पसिनेत्ती ने कहा, अंगूर रहित पोलीफिनॉल कम्पाउंड उत्तेजना से जुड़े कोशिकीय व आणविक मार्ग को निशाना बनाता है।

लिहाजा इस संबंध में की गई नई खोज से निराशा व चिंताग्रस्त लोगों का इलाज संभव हो पाएगा। शोधकर्ता ने बताया कि अंगूर से तैयार बायोएक्टिव डायटरी पोलीफिनॉल तनाव प्रेरित निराशा की स्थिति से बाहर निकलने में मददगार व इस रोग के इलाज में प्रभावी हो सकता है।

शोध में इसका उपयोग चूहे पर किया गया और नतीजा सकारात्मक आया। जाहिर है भोजन से जो पोषक तत्व हमारे शरीर को मिलता है वह रोगों की रोकथाम के लिए ज्यादा कारगर होता है।

Wefornews Bureau

शहर

नागपुर में पत्रकार की मां और बेटी की मिली लाश

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NAGPUR
फोटो (ANI)

नागपुर में एक डबल मर्डर से सनसनी मच गई। एक क्राइम रिपोर्टर की मां और नाबालिग बेटी रविवार (18 फरवरी) को मृत पाईं गईं। इनकी खून से सनी हुई लाश एक बोरे में भरी हुई थी।

58 वर्षीय मां उषा एस. कांबले अपनी 18 महीने की पोती राशि को लेकर शनिवार शाम से लापता थीं। एक पोर्टल में क्राइम रिपोर्टर के तौर पर कार्यरत रविकांत कांबले ने बताया था कि दोनों शनिवार शाम रिहायशी इलाके दिघोरी स्थित बाजार गई थीं, लेकिन घर लौट कर नहीं आईं।

काफी तलाश करने के बाद उनके अगवा होने का संदेह जताया। रविवार को शहर के सिताबुल्दी इलाके में दोनों के शव मिले। दोनों की गला रेतकर हत्या की गई, उसके बाद बोरे में भरकर शवों को गटर में फेंका गया।

पुलिस को संदेह है कि पेशेवर या निजी रंजिश के चलते हत्या को अंजाम दिया गया है। इस दोहरी हत्या की वारदात में पुलिस ने दो संदिग्धों को हिरासत में लिया है।

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स्वास्थ्य

गर्भावस्था में लें विटामिन-डी, वरना बच्चे को सताएगा मोटापा

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फाइल फोटो

ऐसी महिलाएं, जो गर्भावस्था के दौरान विटामिन-डी की कमी से पीड़ित होती हैं, उनके बच्चों में जन्मजात और वयस्क होने पर मोटापा बढ़ने की अधिक संभावना रहती है।

एक शोध में यह पता चला है। ऐसी मां की कोख से जन्म लेने वाले बच्चे, जिनमें विटामिन-डी का स्तर बहुत कम है, उनकी कमर चौड़ी होने या छह वर्ष की आयु में मोटा होने की संभावना अधिक होती है। इन बच्चों में शुरुआती दौर में पर्याप्त विटामिन-डी लेने वाली मां के बच्चों की तुलना में दो प्रतिशत अधिक वसा होती है।

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अमेरिका में दक्षिणी कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर वइया लिदा चाटझी ने कहा, “ये बढ़ोतरी बहुत ज्यादा नहीं दिखती, लेकिन हम वयस्कों के बारे में बात नहीं कर रहे, जिनके शरीर में 30 प्रतिशत वसा होती है।”

विटामिन-डी की कमी को ‘सनशाइन विटामिन’ के रूप में भी जाना जाता है। इसे हृदय रोग, कैंसर, मल्टीपल स्केलेरोसिस और टाइप 1 मधुमेह के खतरे से जोड़ा जाता है।

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चाटझी ने कहा कि आपके शरीर में उत्पादित विटामिन-डी का लगभग 95 प्रतिशत धूप से आता है। शेष पांच प्रतिशत अंडे, वसा वाली मछली, फिश लिवर ऑयल, दूध, पनीर, दही और अनाज जैसे खाद्य पदार्थो से मिलता है।

पत्रिका ‘पेडिएट्रिक ओबेसिटी’ में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक, टीम ने 532 मां-बच्चों के जोड़े की जांच की, जिसमें बच्चे के जन्म से पहले मां में विटामिन-डी को मापा गया। परिणाम बताते हैं कि लगभग 66 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं में पहले त्रैमासिक में विटामिन-डी अपर्याप्त थी।

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चाटझी ने कहा, “गर्भावस्था में ओपटिमल विटामिन-डी का स्तर बचपन के मोटापे से बचा सकता है, लेकिन हमारे शोध को सुनिश्चित करने के लिए अधिक शोध आवश्यक है। गर्भावस्था के प्रारंभिक दिनों में विटामिन-डी की खुराक लेते रहना भावी पीढ़ियों को ठीक रखने का अच्छा उपाय है।”

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स्वास्थ्य

गर्भावस्था में लें विटामिन-डी, वरना बच्चे को सताएगा मोटापा

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ऐसी महिलाएं,जो गर्भावस्था के दौरान विटामिन-डी की कमी से पीड़ित होती हैं, उनके बच्चों में जन्मजात और वयस्क होने पर मोटापा बढ़ने की अधिक संभावना रहती है। एक शोध में यह पता चला है।

ऐसी मां की कोख से जन्म लेने वाले बच्चे, जिनमें विटामिन-डी का स्तर बहुत कम है, उनकी कमर चौड़ी होने या छह वर्ष की आयु में मोटा होने की संभावना अधिक होती है। इन बच्चों में शुरुआती दौर में पर्याप्त विटामिन-डी लेने वाली मां के बच्चों की तुलना में दो प्रतिशत अधिक वसा होती है।

अमेरिका में दक्षिणी कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर वइया लिदा चाटझी ने कहा, ये बढ़ोतरी बहुत ज्यादा नहीं दिखती, लेकिन हम वयस्कों के बारे में बात नहीं कर रहे, जिनके शरीर में 30 प्रतिशत वसा होती है। विटामिन-डी की कमी को ‘सनशाइन विटामिन’ के रूप में भी जाना जाता है।

इसे हृदय रोग, कैंसर, मल्टीपल स्केलेरोसिस और टाइप 1 मधुमेह के खतरे से जोड़ा जाता है। चाटझी ने कहा कि आपके शरीर में उत्पादित विटामिन-डी का लगभग 95 प्रतिशत धूप से आता है। शेष पांच प्रतिशत अंडे, वसा वाली मछली, फिश लिवर ऑयल, दूध, पनीर, दही और अनाज जैसे खाद्य पदार्थो से मिलता है।

पत्रिका ‘पेडिएट्रिक ओबेसिटी’ में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक, टीम ने 532 मां-बच्चों के जोड़े की जांच की, जिसमें बच्चे के जन्म से पहले मां में विटामिन-डी को मापा गया।परिणाम बताते हैं कि लगभग 66 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं में पहले त्रैमासिक में विटामिन-डी अपर्याप्त थी।

चाटझी ने कहा, गर्भावस्था में ओपटिमल विटामिन-डी का स्तर बचपन के मोटापे से बचा सकता है, लेकिन हमारे शोध को सुनिश्चित करने के लिए अधिक शोध आवश्यक है। गर्भावस्था के प्रारंभिक दिनों में विटामिन-डी की खुराक लेते रहना भावी पीढ़ियों को ठीक रखने का अच्छा उपाय है।

–आईएएनएस

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