Connect with us

स्वास्थ्य

डिप्रेशन से बचने के लिए खाएं अंगूर

Published

on

grapes

अगर आप डिप्रेशन जैसी परेशानी से बचना चाहते हैं तो अंगूर जरूर खाएं। अंगूर खाने से मनोविकार कम होता है। यह बात एक हालिया शोध में उजागर हुई है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि खाने  में अंगूर को शामिल करने से मानसिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जबकि अंगूर रहित आहार का सेवन करने वालों को निराशा व हताशा जैसे विकारों के लिए चिकित्सकों की शरण लेना पड़ सकती है।

ऑनलाइन ‘नेचर कम्यूनिकेशंस’ में प्रकाशित शोध के नतीजे बताते हैं कि खाने में अंगूर से मिलने वाले नैसर्गिक तत्वों से हताशा जैसे मनोविकार कम हो सकते हैं। मुख्य शोधकर्ता व न्यूयार्क के इकाह्न स्कूल ऑफ मेडिसिन में प्रोफेसर गियूलियो मारिया पसिनेत्ती ने कहा, अंगूर रहित पोलीफिनॉल कम्पाउंड उत्तेजना से जुड़े कोशिकीय व आणविक मार्ग को निशाना बनाता है।

लिहाजा इस संबंध में की गई नई खोज से निराशा व चिंताग्रस्त लोगों का इलाज संभव हो पाएगा। शोधकर्ता ने बताया कि अंगूर से तैयार बायोएक्टिव डायटरी पोलीफिनॉल तनाव प्रेरित निराशा की स्थिति से बाहर निकलने में मददगार व इस रोग के इलाज में प्रभावी हो सकता है।

शोध में इसका उपयोग चूहे पर किया गया और नतीजा सकारात्मक आया। जाहिर है भोजन से जो पोषक तत्व हमारे शरीर को मिलता है वह रोगों की रोकथाम के लिए ज्यादा कारगर होता है।

Wefornews Bureau

स्वास्थ्य

मधुमेह रोगियों में हार्ट अटैक का खतरा कम करता है आयुर्वेद

Published

on

HEART-ATTACK-wefornews

वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) द्वारा विकसित आयुर्वेदिक दवा बीजीआर-34 मधुमेह रोगियों में हार्ट अटैक के खतरे को पचास फीसदी तक कम कर देती है।

इस दवा के करीब 50 फीसदी सेवनकर्ताओं में ग्लाइकोसिलेटेड हीमोग्लोबिन का स्तर नियंत्रित पाया गया। शोध में यह बात सामने आई है। जर्नल ऑफ टड्रिशनल एंड कंप्लीमेंट्री मेडिसिन के ताजा अंक में इससे जुड़े शोध को प्रकाशित किया गया है।

रिपोर्ट के अनुसार बीजीआर-34 मधुमेह रोगियों के लिए एक कारगर दवा के रूप में पहले से ही स्थापित है। मौजूदा एलोपैथी दवाएं शर्करा का स्तर तो कम करती हैं लेकिन इससे जुड़ी अन्य दिक्कतों को ठीक नहीं कर पाती हैं। बीजीआर में इन दिक्कतों को भी दूर करने के गुण देखे गए हैं।

जर्नल के अनुसार भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के दिशा-निर्देशों के तहत एक अस्पताल में 64 मरीजों पर चार महीने तक इस दवा का परीक्षण किया गया है। इस दौरान दो किस्म के नतीजे सामने आए। 80 फीसदी तक मरीजों के शर्करा के स्तर में कमी दर्ज की गई।

दवा शुरू करने से पहले शर्करा का औसत स्तर 196 (खाली पेट) था जो चार महीने बाद घटकर 129 एमजीडीएल रह गया। जबकि भोजन के बाद यह स्तर 276 से घटकर 191 एमजीडीएल रह गया। ये नतीजे अच्छे हैं लेकिन इस प्रकार के नतीजे कई एलोपैथिक दवाएं भी देती हैं।

सीएसआईआर ने बीजीआर-34 के निर्माण की अनुमति एमिल फार्मास्युटिकल को दे रखी है। रिपोर्ट के अनुसार दूसरा उत्साहजनक नतीजा ग्लाइकोसिलेटेड हिमोग्लोबिन (एचबीए1सी) को लेकर है। 30-50 फीसदी मरीजों में इस दवा के सेवन से ग्लाइकोसिलेटेड हिमोग्लोबिन नियंत्रित हो गया जबकि बाकी मरीजों में भी इसके स्तर में दस फीसदी तक की कमी आई थी।

दरअसल, ग्लाइकोसिलेटेड हिमोग्लोबिन की रक्त में अधिकता रक्त कोशिकाओं से जुड़ी बीमारियों का कारण बनती है। जिसमें हार्ट अटैक होना और दौरे पड़ना प्रमुख है। मधुमेह रोगियों में ये दोनों ही मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।

हिमोग्लोबिन लाल रक्त कोशिकाओं के भीतर होता है। इसका कार्य आक्सीजन का संचार करना होता है। लेकिन जब हिमोग्लोबिन में शर्करा की मात्रा घुल जाती है तो हिमोग्लोबिन का कार्य बाधित हो जाता है इसे ही ग्लाइकोसिलेटेड हिमोग्लोबिन कहते हैं। इसका प्रभाव कई महीनों तक रहता है। किन्तु बीजीआर-34 से यह स्तर नियंत्रित हो रहा है।

–आईएएनएस

Continue Reading

स्वास्थ्य

निरंतर शोर से बच्चों में व्यवहार संबंधी समस्याएं

Published

on

noise-

शोर की वजह से होने वाले हृदय रोग की प्रक्रिया के विश्लेषण के अनुसार, यातायात और विमानों से उत्पन्न पर्यावरणीय शोर हृदय रोग के जोखिम कारकों को बढ़ाने के लिए, कोशिका स्तर पर शरीर को बाधित करता है।

ध्वनि प्रदूषण मैटाबोलिक कठिनाइयों और ऑटोनोमिक असंतुलन का कारण बन सकता है, जिसमें चक्कर आने लगते हैं और व्यायाम करने में परेशानी होती है। शोर के एक्सपोजर से बच्चों में व्यवहार संबंधी समस्याएं भी हो सकती हैं।

वाहनों ने निकलने वाले जहरीले धुएं के साथ मिश्रित धूल, फेफड़ों और हृदय रोगों को बढ़ा सकती है और दिल के दौरे, स्ट्रोक, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी बीमारी, फेफड़ों के संक्रमण और फेफड़ों व सांस की नली के कैंसर का खतरा रहता है।

हार्टकेअर फाउंडेशन ऑफ इंडिया (एचसीएफआई) के अध्यक्ष पद्मश्री डॉ. के.के. अग्रवाल ने कहा, “अनचाही आवाजों को शोर कहा जाता है। जोर का शोर 85 डीबी या उससे अधिक होता है यानी आवाज का वह स्तर जो तीन फीट दूर खड़े किसी व्यक्ति से बात करने के लिए उठाना पड़ता है।

शोर एक जाना-माना पर्यावरणीय तनाव है, जिसमें शारीरिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव दोनों शामिल रहते हैं। उन्होंने कहा कि यह चिंता, उच्च रक्तचाप, दिल के धड़कने की दर में वृद्धि, अनिद्रा, परेशानी, तनाव से जुड़ा हुआ है। इसके कारण सुनने में कठिनाई हो सकती है। 85 डीबी या उससे कम की आवाजों की सुरक्षित सीमा 8 घंटे का एक्सपोजर है।

जोर का शोर होने से बात समझ में नहीं आती और परिणामस्वरूप परफॉर्मेस खराब हो जाती है और त्रुटियों की संभावना बढ़ जाती है। शोर होने पर, स्पष्ट रूप से अपनी बात कहने के लिए हाई पिच पर बोलना पड़ता है।”

यातायात के अधिक शोर वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों में शांत वातावरण में रहने वालों की तुलना में उदासीनता, अकेलेपन और डिप्रेशन का 25 प्रतिशत अधिक खतरा रहता है। इन्हें ध्यान केंद्रित करने में भी समस्या होती है। डॉ. अग्रवाल ने बताया, “अस्पतालों में भी काफी शोर होता है।

रोगियों की भलाई और उपचार के लिए अस्पतालों में शोर के स्तर पर नियंत्रण बहुत महत्वपूर्ण है। शोर डॉक्टरों के लिए एक अस्वास्थ्यकर वातावरण पेश करता है। यह एकाग्रता को प्रभावित करता है और गलतियों की संभावनाओं को बढ़ाता है, जो डॉक्टरों और अस्पतालों के लिए महंगा पड़ सकता है।

एक आईसीयू में सामान्य बैकग्राउंड में शोर होने पर न तो चेतावनी सुनी जा सकती है और न ही रोगी निगरानी अलार्म, जो कि संभावित रूप से विनाशकारी साबित हो सकता है। इसके अलावा, डॉक्टरों में भी हाई बीपी और स्वास्थ्य की अन्य समस्याएं हो सकती हैं।”

शोर प्रदूषण को कम करने की सलाह :

– स्कूलों और अस्पतालों के आसपास यातायात प्रवाह जितना संभव हो कम से कम किया जाना चाहिए।

– साइलेंस जोन और नो हॉकिंग लिखे हुए साइनबोर्ड इन क्षेत्रों के नजदीक होने चाहिए।

– दोपहिया वाहनों में खराब साइलेंसर और शोर करने वाले ट्रक तथा हॉर्न के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए।

– पार्टियों और डिस्को में लाउडस्पीकरों के उपयोग के साथ-साथ सार्वजनिक घोषणा प्रणालियों की जांच होनी चाहिए।

– शोर संबंधी नियमों को साइलेंस जोन के पास सख्ती से लागू किया जाना चाहिए।

– सड़कों के दोनों ओर और आवासीय क्षेत्रों के आसपास पेड़ लगाकर ध्वनि प्रदूषण को कम किया जा सकता है।

–आईएएनएस

Continue Reading

स्वास्थ्य

खीरा खाने से होंगे ये फायदे, रहेगा वजन कंट्रोल

Published

on

cucmber-

गर्मियों में अगर सबसे ज्यादा कोई खाद्य पदार्थ खाने में पसंद किया जाता है तो वो है खीरा। खीरे में जहां कई तरह के पोषक तत्व मौजूद होते हैं वहीं इसमें कैलोरी की मात्रा का कम होने की वजह से ये सबका फेवरेट बन जाता है।

खीरे में मौजूद कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, फाइबर, विटामिन सी, विटामिन के, पोटैशियम, मैग्नीशियम और मैग्नीज हमारे शरीर के लिए भरपूर मात्रा में पोषण देता है। इसके साथ ही इसमें पानी की मात्रा खूब होती है जिससे हमारा शरीर हाईड्रेट रहता है और शरीर में पानी की कमी नहीं होती।

Image result for खीरा

इतनी सारी खासियतें तो हैं हीं वहीं खीरा हमें कुछ बीमारियों से भी बचाता है। ऐसे में अगर आप अभी भी खीरे का सेवन गर्मियों में नहीं कर रहे हैं तो किसी न किसी रूप में इसे अपनी डाइट में शामिल ज़रूर कर लें।

कैंसर से बचाव में भी है कारगर

शोध बताते हैं कि रोजाना खीरा खाने से कैंसर का खतरा भी कम हो जाता है। इसमें मौजूद तत्व सभी तरह के कैंसर की रोकथाम करते है।

वजन कंट्रोल करने में करता है मदद

खीरा आपका वजन कंट्रोल करने का कारगर उपाय है क्योंकि इसमें 96 प्रतिशत तक पानी होता है जो आपका मेटबॉलिज्म मज़बूत करता है। खीरे में ज़्यादा पानी की मात्रा होने के चलते आप कई ऐसी चीज़ों के सेवन से बच जाते हैं जिसमें वज़न बढ़ाने वाले पदार्थ ज्यादा होते हैं।

Image result for खीरा

बढ़ती है इम्युनिटी पावर

खीरा आपकी इम्यूनिटी पावर को भी मज़बूत करने का काम करता है क्योंकि इसमें विटामिन सी, बीटा कैरोटीन जैसे एंटी ऑक्सीडेंट्स होते हैं। ये आपके शरीर में मौजूद फ्री रेडिकल्स को दूर करते हैं। जिस वजह से आपकी इम्यूनिटी पावर पहले की तुलना में बेहतर होती है।

Image result for इम्यूनिटी पावर

हड्डियां रहेंगी मज़बूत

अगर आप खीरे का सेवन छिलके समेत करते हैं तो ये आपकी हड्डियों को भी फायदा पहुंचाता है। इसके छिलके में काफी मात्रा में सिलिका होता है। इसके सेवन से आपकी हड्डियों को मज़बूती मिलती है। साथ ही इसमें मौजूद कैल्शियम भी हड्डियों के स्वास्थ्य के लिए काफी कारगर साबित होता है।

नहीं होगी कब्ज की समस्या

खीरा खाने को पचाने में भी मदद करता है। ज्यादातर लोगों में डिहाईड्रेशन और पानी की कमी की वजह से खराब पाचन की समस्या हो जाती है। इसमें पानी की भरपूर मात्रा होने की वजह से आपका पाचन भी दुरुस्त रहता है।

WeForNews

Continue Reading

Most Popular