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अंबेडकर ने हर शोषित वर्ग की लड़ाई लड़ी

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babasaheb ambedkar

नई दिल्ली, 13 अप्रैल | भारतरत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर को दलितों का मसीहा माना जाता है, जबकि असलियत में उन्होंने जीवन भर दलितों की नहीं, बल्कि समाज के सभी शोषित वर्गो के अधिकारों की लड़ाई लड़ी।

भीमराव अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल, 1891 को मध्य प्रदेश के महू नामक एक गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम रामजी मालोजी सकपाल था। इनके पिता ब्रिटिश भारतीय सेना में काम करते थे। ये अपने माता-पिता की 14वीं संतान थे। ये महार जाति से ताल्लुक रखते थे, जिसे हिंदू धर्म में अछूत माना जाता था।

घर की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण इनका पालन-पोषण बड़ी मुश्किल से हो पाया। इन परिस्थितियों में ये तीन भाई- बलराम, आनंदराव और भीमराव तथा दो बहनें मंजुला और तुलसा ही जीवित बच सके। सभी भाई-बहनों में सिर्फ इन्हें ही उच्च शिक्षा मिल सकी।

हिंदू धर्म में व्याप्त चतुष्वर्णीय जाति व्यवस्था के कारण इन्हें जीवन भर छुआछूत का सामना करना पड़ा। स्कूल के सबसे मेधावी छात्रों में गिने जाने के बावजूद इन्हें पानी का गिलास छूने का अधिकार नहीं था। उच्च जाति का छात्र काफी ऊपर से हाथ में डालकर इन्हें पानी पिलाता था। बाद में इन्होंने हिंदू धर्म की कुरीतियों को समाप्त करने का जिंदगी भर प्रयास किया। जब इन्हें लगा कि ये हिंदू धर्म से कुरीतियों को नहीं मिटा पाएंगे, तब 14 अक्टूबर, 1956 में अपने लाखों समर्थकों सहित बौद्ध धर्म अपना लिया।

आज के दौर में हिंदू के नाम पर राजनीति तो की जा रही है और दलितों का वोट पाने के लिए डॉ. अंबेडकर को ‘अपना’ बताया जा रहा है, लेकिन कोई यह सोचने के लिए तैयार नहीं है कि बाबा साहेब ने हिंदू धर्म क्यों छोड़ा।

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राजनीति करने वाले आज डॉ. अंबेडकर का भी भगवाकरण करने का प्रयास करते हैं, किसी के धर्मातरण पर व्यग्र और उग्र हो उठते हैं, लेकिन अपने धर्म पर आत्मचिंतन करना, सोच बदलना, कुरीतियां मिटाना जरूरी नहीं समझते। अगर सोच बदली होती तो जगह-जगह अंबेडकर की मूर्तियां नहीं तोड़ी जातीं।

डॉ. अंबेडकर की पहली शादी नौ साल की उम्र में रमाबाई से हुई। रमाबाई की मृत्यु के बाद इन्होंने ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखने वाली सविता से विवाह कर लिया। सविता ने भी इनके साथ ही बौद्ध धर्म अपना लिया था। अंबेडकर की दूसरी पत्नी सविता का निधन वर्ष 2003 में हुआ।

भीमराव ने अपने एक ब्राह्मण दोस्त के कहने पर अपने नाम से सकपाल हटाकर अंबेडकर जोड़ लिया, जो अंबावड़े गांव से प्रेरित था।

अंबेडकर की गिनती दुनिया के सबसे मेधावी व्यक्तियों में होती थी। वे नौ भाषाओं के जानकार थे। इन्हें देश-विदेश के कई विश्वविद्यालयों से पीएचडी की कई मानद उपाधियां मिली थीं। इनके पास कुल 32 डिग्रियां थीं।

अंबेडकर को 15 अगस्त, 1947 को देश की आजादी के बाद देश के पहले देशी संविधान के निर्माण के लिए 29 अगस्त, 1947 को संविधान की प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया गया। फिर दो वर्ष, 11 माह, 18 दिन के बाद संविधान बनकर तैयार हुआ, 26 नवंबर, 1949 को इसे अपनाया गया और 26 जनवरी, 1950 को लागू कर दिया गया।

कानूनविद् अंबेडकर को प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भारत का पहला कानून मंत्री बनाया था।

डॉ. अंबेडकर ने समाज में व्याप्त बुराइयों के लिए सबसे ज्यादा महिलाओं की अशिक्षा को जिम्मेदार माना। इन्होंने महिलाओं की शिक्षा पर जोर दिया। उनके सशक्तिकरण के लिए इन्होंने हिंदू कोड अधिनियम की मांग की। तब भारी विरोध के चलते वह पारित नहीं हो सका, लेकिन बाद में वही अधिनियम हिंदू विवाह अधिनियम, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम और हिंदू विशेष विवाह अधिनियम के नाम से 1956 में पारित हुआ। इससे हिंदू महिलाओं को मजबूती मिलती थी।

बाबा साहेब ने सिर्फ अछूतों के अधिकार के लिए ही नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज के पुनर्निर्माण के लिए प्रयासरत रहे। उन्होंने मजदूर वर्ग के कल्याण के लिए भी उल्लेखनीय कार्य किया। पहले मजदूरों से प्रतिदिन 12-14 घंटों तक काम लिया जाता था। इनके प्रयासों से प्रतिदिन आठ घंटे काम करने का नियम पारित हुआ।

इसके अलावा इन्होंने मजदूरों के लिए इंडियन ट्रेड यूनियन अधिनियम, औद्योगिक विवाद अधिनियम, मुआवजा आदि सुधार भी इन्हीं के प्रयासों से हुए। उन्होंने मजदूरों को राजनीति में सक्रिय भागीदारी करने के लिए प्रेरित किया। वर्तमान के लगभग सभी श्रम कानून बाबा साहेब के ही बनाए हुए हैं।

बाबा साहेब कृषि को उद्योग का दर्जा देना चाहते थे। उन्होंने कृषि का राष्ट्रीयकरण करने का प्रयास किया। राष्ट्रीय झंडे में अशोक चक्र लगाने का श्रेय भी इन्हीं को जाता है।

ये अकेले भारतीय हैं, जिनकी प्रतिमा लंदन संग्रहालय में कार्ल मार्क्‍स के साथ लगी है। साल 1948 में डॉ. अंबेडकर मधुमेह से पीड़ित हो गए। छह दिसंबर, 1956 को इनका निधन हो गया।

डॉ. अंबेडकर को देश-विदेश के कई प्रतिष्ठित सम्मान मिले। इनके निधन के 34 साल बाद वर्ष 1990 में जनता दल की वी.पी. सिंह सरकार ने इन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान भारतरत्न से सम्मानित किया था। इस सरकार को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) बाहर से समर्थन दे रही थी। वी.पी. सिंह ने जब वी.पी. मंडल कमीशन की सिफारिश लागू कर दलितों, पिछड़ों को आरक्षण का अधिकार दिया, तब भाजपा ने समर्थन वापस लेकर सरकार गिरा दी थी और सवर्ण युवाओं को आरक्षण के खिलाफ आत्मदाह के लिए उकसाया था। देशभर में कई युवकों ने आत्मदाह कर लिया था और जातीय दंगे हुए थे, जिसे ‘मंडल-कमंडल विवाद’ नाम दिया गया था।

BY : अनुराग सक्सेना

–आईएएनएस

ओपिनियन

बधाई हो! भीड़-तंत्र ने भारत को अब भीड़-युग में पहुँचा दिया!

अब तो भीड़, पुलिस को भी पीट डालती है। क़ानून को हाथ में लेने वालों का पुलिस-अदालत कुछ नहीं बिगाड़ पाती। यही आलम दंगाइयों का भी होता है। उनके चेहरे पर भी भीड़ का मुखौटा ही होता है।

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ये विरोधी दल के किसी नेता या अवार्ड वापसी गैंग का नहीं, बल्कि माननीय सुप्रीम कोर्ट का नज़रिया है कि ‘भारत में भीड़-तंत्र की इजाज़त नहीं दी सकती। नया क़ायदा नहीं बन सकता कि भीड़ ही सड़कों पर इंसाफ़ करने लगे। कोई भी क़ानून हाथ में नहीं ले सकता। भय, अराजकता और हिंसा फ़ैलाने वालों को सख़्ती से रोकना पुलिस और राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी है। राज्यों को भीड़-तंत्र के पीड़ितों के लिए महीने भर में मुआवज़ा नीति बनानी होगी। भीड़-तंत्र की रोकथाम करने में विफल रहे पुलिस अफ़सरों के ख़िलाफ़ विभागीय कार्रवाई के अलावा सीधा ज़ुर्माना भी ठोंका जाएगा। भीड़ की अराजकता से जुड़े मामलों में अदालतों को रोज़ाना सुनवाई करके छह महीने में अपराधियों को अधिक से अधिक सज़ा देनी होगी। यही नहीं, भीड़-तंत्र यानी Mobocracy के ख़िलाफ़ संसद को भी सख़्त क़ानून बनाना चाहिए।’

यदि आप भीड़-तंत्र को भारतीय लोकतंत्र के लिए सबसे ख़तरनाक मानते हैं तो शायद आपको सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा फ़ैसले से तसल्ली मिले। हालाँकि, ये अफ़सोसनाक तो है कि लोकतंत्र के लिए सबसे ख़तरनाक प्रवृत्ति यानी भीड़-तंत्र के प्रति न्याय के सर्वोच्च मन्दिर को अपनी संवेदनशीलता ज़ाहिर करने में ख़ासा वक़्त लग गया। आप कह सकते हैं कि ‘हुज़ूर, आते-आते बहुत देर कर दी!’ क्योंकि मोदी राज में ही गोरक्षा और बच्चा चोर के नाम पर अब तक 80 से ज़्यादा हिंसक वारदातें हो चुकी हैं। भीड़-तंत्र अब तक 33 इंसानों की बलि चढ़ा चुका है! मोदी और उनकी भक्त मंडली भले ही इस दौर को आधुनिक भारत का ‘स्वर्ण-युग’ बताते ना अघाते हों, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कर दिया कि भारत अब ‘भीड़-युग’ में आ चुका है!

mob lynching

सोशल मीडिया पर तैनात ‘भक्तों’ और अफ़वाह गढ़ने और फ़ैलाने वालों के लिए सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला किसी मुबारक़बाद या बधाई से कम नहीं है। इसकी साज़िशों ने ही सवा सौ करोड़ भारतवासियों को ‘भीड़-युग’ में पहुँचाया है! भीड़-युग के शुरुआती चार वर्षों में ही आदिकाल से मौजूद ‘भीड़’ का ऐसा ज़बरदस्त और ऐतिहासिक ‘विकास’ हुआ, जैसा ‘विकास-विरोधी’ पिछली सरकारें बीते 70 वर्षों में भी नहीं कर पायीं! सदियों से शैशवकाल में मचलने वाली ‘भीड़’ ने अब चार साल में बाल-काल और यौवन को पार करके गबरू जवान वाला व्यक्तित्व पा लिया। वैसे तो आधुनिक भारत का इतिहास असंख्य साम्प्रदायिक दंगों से अटा पड़ा है। हमारा कोई सियासी दल ऐसा नहीं है, जिसके दामन पर दंगों के ख़ून के छींटे ना रंगे हों। लेकिन गोरक्षा और बच्चा चोर के नाम पर कहीं भी, कभी भी ‘भीड़’ का किसी को भी पीट-पीटकर मार डालना, भीड़-युग का अद्भुत आयाम है!

भीड़-युग में भीड़ के तुष्टिकरण की नीति लागू होना स्वाभाविक है। आप चाहें तो माननीय सुप्रीम कोर्ट की मंशा पर तरस खा सकते हैं कि उसे अब भी उम्मीद है कि उसके सख़्त तेवर से भगवा सरकारें जाग जाएँगी, संघियों का वो अफ़वाह-तंत्र ख़ुदकुशी कर लेगा, जिन्हें इसी भीड़-तंत्र की भीड़ से संजीवनी मिलती है! सकारात्मक होने की यदि कोई सीमा नहीं होगी तभी तो जिन्होंने ‘विकास’ की ख़ातिर अपने कलेज़े के टुकड़े ‘लोकपाल’ की क़ुर्बानी दे दी हो, उनसे ये अपेक्षा की जा सकती है कि वो सुप्रीम कोर्ट की तसल्ली के लिए संसद में क़ानून बनाकर भीड़-तंत्र रूपी अपनी ही धमनियों को काट डालने का फ़ैसला ले लेंगे! जिस दिन ऐसा हो जाएगा, उसी दिन से बैल भी दूध देने लगेंगे! देख लीजिएगा, मई 2019 तक भारत की संसद भीड़-युग का बाल भी बाकाँ नहीं कर पाएगी!

भीड़-तंत्र, बुनियादी तौर पर बोतल में बन्द ज़िन्न की तरह है, जो एक बार बोतल से बाहर आ जाए तो फिर उसे वापस बोतल में नहीं डाला जा सकता! ये अंडे से निकला वो चूजा है, जिसे कोई वापस अंडे में नहीं डाल सकता! इसीलिए भीड़-युग से वापसी बहुत मुश्किल है। हालाँकि, असम्भव कुछ भी नहीं होता! सम्भव बनाने के लिए सरकार को वैसे ही व्यापक उपाय करने होंगे जैसे उफ़नती नदी की बाढ़ से रोकथाम के लिए विशाल बाँधों और नहरों का नेटवर्क बनाया जाता है। इसके लिए भी सबसे पहले तो हमें ये स्वीकार करना होगा कि भीड़-राज को महज ये उपदेश देकर क़ाबू में नहीं लाया जा सकता कि ‘कोई भी क़ानून हाथ में नहीं ले सकता!’

अरे, ये किससे छिपा है कि भारत में भीड़ से बड़ा कोई क़ानून नहीं! भीड़ कब अराजक नहीं होती! भीड़ का तो स्वभाव ही है बेक़ाबू होना! इसमें नया क्या है! भीड़ तो हड़ताल, चक्का-जाम, रेल-रोको, तोड़फोड़-उपद्रव-आगजनी और हिंसा करती रही है। 70 साल में लाखों बसों और अन्य वाहनों की होली क्या भीड़ ने नहीं जलायी! तो क्या अब इंसानों की बलि ले रही भीड़, सुप्रीम कोर्ट की हाय-तौबा से अपना चरित्र बदल लेगी! किस राजनीतिक दल ने और कब ये ख़्वाहिश नहीं रखी कि उसके पीछे ‘भीड़’ खड़ी हो! राजनीति के लिए ‘भीड़’ ज़रूरी है। आमलोगों के पास ‘भीड़’ नहीं है, इसीलिए वो राजनेता नहीं हैं।

COW-VIGILANTE

भीड़ को भीड़ बनने से रोकने का काम क़ानून और संवेदनशील सरकार का है। संवेदनशील सरकार का कर्त्तव्य है कि वो छोटे-छोटे जनसमूह और संगठन की माँगों, उम्मीदों और अपेक्षाओं का वक़्त रहते निराकरण करे, ताकि वो भीड़ में तब्दील ना हों। अभी तो भारत का संस्कार ही ये हो चुका है कि सरकारें सिर्फ़ हिंसा-हड़ताल और चक्का जाम वग़ैरह की भाषा ही समझती हैं। समाज का जो तबक़ा सरकारी व्यवस्था की चूलें नहीं हिला सकता, मौजूदा व्यवस्था में उसकी तब तक कोई सुनवाई नहीं है, जब तक कि सड़कों पर हिंसा नहीं करता। ढीठ नौकरशाही और विधायिका को तो अदालतों के फ़ैसलों की भी तब तक कोई परवाह नहीं होती, जब तक कि बात अवमानना तक न पहुँच जाए।

अब तो सरकारी तंत्र को भी सड़क का अतिक्रमण हटाने के लिए भी कोर्ट के आदेश की ज़रूरत पड़ती है! नौकरशाही को अपना फ़र्ज़ निभाने के लिए अदालत की अवमानना का वास्ता देना पड़ता है। जब तक अदालत की लाठी सिर पर नहीं हो, तब तक वही सरकारी अमला अतिक्रमण को पैदा करके उगाही करता है, जिस पर अतिक्रमण ख़त्म करने का ज़िम्मा होता है। सबकी उगाही बँधी हुई है! इसीलिए जब अदालती आदेश के बग़ैर जब सरकारी तंत्र, अतिक्रमण हटाने पहुँचता है तो उसका वास्ता जनता के सहयोग और समर्थन से नहीं, बल्कि भीड़ के विरोध से पड़ता है! सबको, सब कुछ पता है! अदालतें भी अनजान नहीं हैं! जज साहब को भी सब पता है! फिर भी सिर्फ़ अदालती आदेश ही ये बोल पाता है कि ‘कोई भी क़ानून हाथ में नहीं ले सकता!’

भीड़ की असलियत भी किसी से छिपी नहीं है। भीड़, जब इंसानों की होती है तो वो वोट भी होती है। ‘जहाँ वोट, वहाँ तुष्टिकरण!’ तुष्टिकरण की विकृति से लोकतंत्र को बचाने का दारोमदार जिस क़ानून पर है, उसके तीन अंग हैं। विधायिका, पुलिस या कार्यपालिका और अदालत। पुलिस और अदालतों में पर्याप्त निवेश करके यदि उन्हें कारगर बना दिया जाए तो वो कमज़ोर क़ानून की भी भरपायी कर देंगे। अन्यथा, कठोर क़ानून भी किताबों में ही बन्द पड़े रहेंगे। हत्या, बलात्कार, दहेज-उत्पीड़न, बाल-विवाह जैसे मामलों में जो क़ानून भारत में हैं, उससे सख़्त सज़ा कहीं नहीं हो सकती।

हमारी न्याय-व्यवस्था किसी को इंसाफ़ नहीं दे पाती। हमारी अदालतों से किसी को इंसाफ़ नहीं मिलता। छोटा-बड़ा, अमीर-ग़रीब सभी अदालतों में लगने वाले असामान्य वक़्त के शिकार हैं। भारतीय जेलों में अपराधियों से दोगुनी संख्या विचाराधीन क़ैदियों की है। मुक़दमों के निपटारे में 20-25 साल लगना सामान्य बात है। पुलिस जिन मुट्ठी भर अपराधियों को पकड़ पाती है, उनमें से भी महज 6 फ़ीसदी का ज़ुर्म अदालत में साबित हो पाता है। मज़े की बात ये भी है कि क़ानून किसी के हाथ में नहीं, बल्कि कहीं है ही नहीं। आज़ाद भारत में पुलिस-अदालत की दशा हमेशा चिन्ताजनक ही रही है। भीड़-युग में फ़र्क़ सिर्फ़ इतना आया है कि ये पूरी तरह से चौपट हो चुका है। सियासत और लगातार बढ़ती आबादी ने पुलिस-अदालत को कभी सुधरने नहीं दिया। पुलिस, राज्य सरकारों की वर्दीधारी लठैत है। ये न्याय-व्यवस्था की पहली सीढ़ी है। लेकिन खंडहर से भी ज़्यादा जर्जर हो चुकी है। ये सिर्फ़ साधन-सम्पन्न लोगों का ख़्याल रख पाती है।

भीड़ को ऐतबार नहीं है कि क़ानून अपना काम ज़रूर करेगा। मोदी राज से पहले भी कभी-कभार ऐसी ख़बरें मिलती थीं कि भीड़ ने किसी चोर या जेबकतरे को रंग हाथ पकड़ लिया और फिर उसे पुलिस के हवाले करने से पहले ही भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। अब तो भीड़, पुलिस को भी पीट डालती है। क़ानून को हाथ में लेने वालों का पुलिस-अदालत कुछ नहीं बिगाड़ पाती। यही आलम दंगाइयों का भी होता है। उनके चेहरे पर भी भीड़ का मुखौटा ही होता है। कुख़्यात अपराधियों को भी ज़मानत पर ज़मानत मिलते जाना, उनका एक के बाद एक जघन्य अपराधों को करते जाना, दाग़ी लोगों का सियासी क्षेत्र में चमककर सफ़ेदपोश बनना और दशकों तक अदालत की कार्यवाही का पूरा नहीं होना भी भीड़ को यही सन्देश देता है कि पुलिस-अदालत उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी।

रही-सही क़सर तब पूरी हो जाती है, जब भीड़ को राजनीतिक आश्रय मिलने लगता है। भीड़ में से अपराधी को ढूँढ़ना और अदालत में उसका अपराध साबित करना, बेशक़ पुलिस की उपलब्धि है। लेकिन इन्हीं अपराधियों को चटपट जमानत मिल जाना और मंत्रियों की ओर से उनका माल्यार्पण होना, भीड़-युग के वैभव का गुणगान करता है। जब वाचाल प्रधानमंत्री के पास भी ऐसी प्रवृत्तियों की भर्त्सना करने का भी वक़्त नहीं हो, जब भीड़ में हिन्दू-मुसलिम ढूँढ़े जाएँ, जब भीड़ में तिरंगा, राष्ट्रवाद और देशद्रोह का तड़का लगे, जब भीड़ में पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण वाला क्षेत्रवाद घुसेड़ा जाए, तब जो भीड़-तंत्र पैदा होगा, उसे किसी अदालती फ़रमान और क़ानून से काबू में नहीं लाया जा सकता! फ़िलहाल, भारत के नसीब में यही भीड़-युग लिखा है।

रात कितनी भी लम्बी हो, वो भोर को रोक नहीं पाती! भीड़-वादियों में ग़लतफ़हमी फैलायी गयी है कि भीड़, उनके बग़ैर रह नहीं पाएगी! सत्ता तंत्र की मन्दबुद्धि सवर्ण हिन्दुओं में यही धारणा फैलायी जा रही है कि ‘जनता को कुछ याद ही नहीं रहता!’ जबकि सच्चाई ये है कि जनता ने हमेशा अपनी यादाश्त का लोहा मनवाया है। दांडी मार्च में महात्मा गाँधी की तस्वीरों में दिखने वाली जनता हाशिये पर दिखती ज़रूर है, लेकिन चुटकी बजाकर सत्ता को उखाड़ फेंकती है। इसी जनता ने इमरजेंसी और बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद संविधान की रक्षा की थी। भीड़-राज को ख़ुशफ़हमी है कि वही जनता लिंचिंग, दंगे, एनकाउंटर, कठुआ, उन्नाव रेप, ऊना कांड, महंगाई, नोटबन्दी, बेरोज़गारी सब भूल जाएगी और उसकी साज़िश के मुताबिक, फिर से साम्प्रदायिकता के नशे में टूट जाएगी। लेकिन काठ की हाँडी कब बार-बार चढ़ी है!

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लोकतंत्र के लिए सबसे ख़तरनाक है: न्यायपालिका और कार्यपालिका की मिलीभगत

सतर्क और सक्रिय न्यायपालिका की बदौलत ही नागरिकों के बुनियादी और संवैधानिक अधिकारों की हिफ़ाज़त हो पाती है। ऐसी सतर्कता के बग़ैर लोकतंत्र जीवित नहीं रह सकता।

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Supreme Court

संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए न्यायपालिका का स्वतंत्र और निर्भीक होना ज़रूरी है। संविधान की आत्मा का बसेरा न्यायपालिका में ही होता है। न्यायपालिका के बग़ैर संविधान के शब्द निर्जीव बने रहते हैं। क़ानून के मुताबिक़ इंसाफ़ करते हुए अदालतें जहाँ दुस्साहसी कार्यपालिका पर अंकुश लगाती हैं, वहीं विधायिका की सीनाज़ोरी पर भी नकेल कसती हैं। सतर्क और सक्रिय न्यायपालिका की बदौलत ही नागरिकों के बुनियादी और संवैधानिक अधिकारों की हिफ़ाज़त हो पाती है। ऐसी सतर्कता के बग़ैर लोकतंत्र जीवित नहीं रह सकता। इसीलिए जजों से ये अपेक्षा रहती है कि वो अदालतों की निष्पक्षता और निर्भीकता को क़ायम रखने के प्रति जहाँ न्यायपालिका में रहते हुए उत्साह दिखाते रहें, वहीं अन्य सभी का ये फ़र्ज़ है कि वो बाहर रहकर इस काम को आगे बढ़ाएँ।

जस्टिस राजन गोगोई को सुनना बेहद सुखद रहा। उन्होंने पिछले हफ़्ते रामनाथ गोयनका स्मृति व्याख्यान में उन मुद्दों पर अपनी बेबाक़ राय देश के सामने रखी, जो आज भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़े हैं। उनका नज़रिया लम्बे समय तक हमारे कानों में गूँजता रहेगा। हम जजों के ऐसे कारवाँ के साथ महफ़ूज़ हैं, जो अपने किस्सों के लिए नहीं जाने जाते। जस्टिस गोगोई उन जजों में से हैं जो ख़ुद को अचूक बनाने से ज़्यादा इस बात के लिए सन्तुष्ट रहना चाहते हैं कि उनके फ़ैसले से इंसाफ़ को तरज़ीह मिली। अचूक होना आदर्श स्थिति है। कोई अचूक नहीं हो सकता, फिर भी इस आदर्श को हासिल करने के लिए कोशिशें होती रहनी चाहिए। लोकतंत्र में स्वतंत्रता, बराबरी और भाईचारा, तीनों आदर्शों का संगम न्याय में होता है। बराबरी ही स्वस्थ समाज की बुनियाद है। इसीलिए हुक़ूमत से ये अपेक्षा रहती है कि वो हरेक व्यक्ति की ज़िन्दगी में इन आदर्शों की मौजूदगी को सुनिश्चित करे।

हम दो भारत में रहते हैं। दोनों एक-दूसरे से बेहद दूर हैं। एक में देश के सुविधा सम्पन्न लोग हैं तो दूसरे में वंचित। वंचित भारत आज भी उपेक्षित है और बेहद ग़रीबी में जी रहा है। उसके गरिमावान जीवन से जुड़ी बुनियादी सुविधाओं को सम्पन्न भारत हड़प लेता है, तब इंसाफ़ ही वो आदर्श होता है जो दोनों के बीच की खाई को पाटने में मददगार बनता है। कई बार सुप्रीम कोर्ट के जज अपने युगान्तरकारी फ़ैसलों के ज़रिये संविधान के महत्वपूर्ण आदर्शों को स्थापित करते हैं, तो कई बार अन्यायपूर्ण फ़ैसलों के आगे मूकदर्शक भी बने रहते हैं। कभी तो गोपनीयता को मूल अधिकार बताया जाता है, लेकिन यही गोपनीयता उस वक़्त काफ़ूर हो जाती है जब जाँच एजेंसियाँ और सरकार के बीच मिलीभगत चल रही होती है।

सोशल मीडिया के मंचों पर कितने ही मूल अधिकारों की धज़्ज़ियाँ रोज़ाना उड़ती रहती हैं। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट का इन्फ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉज़ी एक्ट, 2000 (श्रेया सिंघल) की धारा 66 ए को असंवैधानिक ठहराना बिल्कुल सही है, क्योंकि तकनीक के मौजूदा दौर में भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बहुलतावाद और मतभेद से जुड़े उन संवैधानिक अधिकारों से ऊपर नहीं माना जा सकता, जो लोकतंत्र की आत्मा हैं। इसके बावजूद रोज़ाना हमारे राजनेताओं के ख़िलाफ़ अशोभनीय टिप्पणियाँ हो रही हैं, लेकिन हुक़ूमतें हाथ पर हाथ धरे बैठी हैं। इसीलिए आये दिन सोशल मीडिया पर मनगढ़न्त तस्वीरों, फ़र्ज़ी ख़बरों और अफ़वाहों के ज़रिये साम्प्रदायिक ज़हर फैलाया जाता है। ऐसी घटनाएँ साफ़ बताती हैं कि आदर्श और ज़मीनी सच्चाई में कितना फ़र्क़ है! सत्ता इन्हें देखकर आँखें बन्द कर लेती है और जज भी नज़रें फेर लेने को ही अपना कर्त्तव्य मान लेते हैं।

यही वजह है कि जस्टिस गोगोई जिन दो भारत ही बात करते हैं, उनके बीच की खाई को पाटना बेहद मुश्किल है। इसीलिए अदालतें जिस अभिव्यक्ति की आज़ादी की बातें करती हैं, वो महत्वहीन हो जाती है। लिहाज़ा, जस्टिस गोगोई का ये कहना बिल्कुल सही है कि भारत को सिर्फ़ शोर करने वाले नहीं बल्कि स्वतंत्र पत्रकारों की ज़रूरत है। जबकि आलम ये है कि जिस चौथे खम्भे यानी मीडिया को संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए अपने पत्रकारीय मूल्यों का शोर मचाना चाहिए वो आज सरकार से गलबहियाँ कर चुका है। ये दशा वाकई में लोकतंत्र के लिए बहुत ख़तरनाक है।

क़रीब दो सदी पहले एलेक्ज़ेडर हैमिल्टन ने लोकतंत्र के लिए सबसे ख़तरनाक दशाओं की व्याख्या की थी। उसका सन्दर्भ देते हुए जस्टिस गोगोई ने बिल्कुल सही फ़रमाया कि न्यायपालिका का लोकतंत्र की बाक़ी दो में से किसी भी शाखा के साथ गठजोड़ बना लेना सबसे ख़तरनाक है। क्योंकि इससे अलग-अलग क्षेत्राधिकार वाली संविधान की मूल भावना का दमन हो जाता है। संसदीय लोकतंत्र में कार्यपालिका और विधायिका को एक-दूसरे के साथ सुर-ताल में चलना होता है, लेकिन यदि कार्यपालिका का न्यायपालिका से गठजोड़ हो जाए तो फिर लोकतंत्र के लिए इससे बड़ा ख़तरा और कुछ नहीं हो सकता। इसी गठजोड़ के ज़रिये जब अन्याय और अत्याचार को जारी रखा जाता है तब अदालती आदेश को अन्तिम मानने का सिद्धान्त बेहद घातक हो जाता है।

ये निर्विवाद सत्य है कि हमारा राजनीतिक लोकतंत्र करोड़ों लोगों को इंसाफ़ देने में नाकाम रहा है। हमारे देश में ऐसे मुद्दों की भरमार है जिसका समतामूलक समाज की अभिकल्पना से कोई वास्ता नहीं है। धार्मिक ध्रुवीकरण को पैदा करने वाली बहस, किसी ख़ास धर्म के लोगों के ख़िलाफ़ हिंसा और राजनेताओं की उस वक़्त की ख़ामोशी जब उनसे बयान की अपेक्षा हो। ऐसे मुद्दों का विकास से कोई नाता नहीं है। न्यायपालिका ने अतीत में जनहित याचिका को बेज़ुबानों की ज़ुबान बनाया था। इसके लिए हुक़ूमत को कई ऐसे क़दम उठाने के लिए मज़बूर किया गया, जिनसे वो कन्नी काट रही थी। लेकिन अब जनहित याचिका का चरित्र बदल चुका है। अब अक्सर इसका इस्तेमाल उन लोगों की रक्षा करने के लिए हो रहा है तो ख़ुद अन्यायकारी हैं।

हमारी न्यायपालिका को अपने विशिष्ट स्थान से जुड़े एक और पहलू पर भी ज़रूर ध्यान देना चाहिए। सरकारी कामकाज़ की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है। सत्ता के गलियारों में, किन मंशाओं से प्रेरित होकर फ़ैसले लिये जाते हैं, इसे सूचना के अधिकार क़ानून, 2005 के बावजूद नहीं जाना जा सकता। राजनीतिक लाभ लेने के लिए अक्सर क़ानून तक बदल दिये जाते हैं। अदालत की कार्यवाही भले ही उसी और पारदर्शी है। लेकिन ये वरदान है तो अभिश्राप भी। वरदान इसलिए क्योंकि अदालत में हुई गतिविधियों का पता उन लोगों को भी चल जाता है, जो फ़ैसले को अपना अमोघ अस्त्र बनाना चाहते हैं। इससे न्याय करने की प्रक्रिया शुद्ध बनी रही है। लेकिन अभिश्राप ये है कि संवैधानिक धारणाओं के मुताबिक़, जब जज अपने फ़ैसले की गुणवत्ता को सर्वोपरि रखने में नाकाम रहते हैं, तब वो करोड़ों लोगों की चौकस नज़रों के सामने होते हैं। इसीलिए बात तब बहुत ख़ौफ़नाक हो जाती है जब ये धारणा बनने लगे कि सुप्रीम कोर्ट से भी इंसाफ़ नहीं मिला। इस पहलू को लेकर पूरी न्यायिक बिरादरी को बेहद संवेदनशीलता दिखानी चाहिए।

जॉर्ज ओरवेल की 1984 का सन्दर्भ देते जस्टिस गोगोई ने सही कहा कि ‘स्वतंत्रता का मतलब है कि ये कहा जा सके कि दो और दो चार होते हैं’। लेकिन कई बार हमें डर लगता है कि दो और दो चार नहीं होते। ये चिन्ताजनक है।

(साभार: इंडियन एक्सप्रेस)

The writer, a senior Congress leader, is a former Union minister

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विज्ञापनबाज़ी की लत: मोदी के व्यक्तित्व का सबसे घातक पहलू

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Narendra Modi

पुरखों को कोसने की बीमारी

उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर में बाणसागर नहर परियोजना का लोकार्पण करते हुआ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी चिर-परिचित विज्ञापन-शैली में विपक्षी दलों पर निशाना साधा। लेकिन अफ़सोस कि जिस भाषण से मोदी अपने सियासी विरोधियों पर निशाना साध रहे थे, उसी भाषण से वो अपने सियासी ख़ानदान की बखिया भी उधेड़ रहे थे। मिसाल के तौर पर जब मोदी कहते हैं कि ‘यदि पहले की सरकारों से अपना काम ठीक से किया होता तो इतनी उपयोगी परियोजना का लाभ वर्षों पहले से मिलने लगता।’ ये बयान बिल्कुल सही है। लेकिन पिछली सरकारों को कोसते वक़्त मोदी भूल जाते हैं कि ख़ुद उनके उदय से पहले भी देश में बीजेपी की सरकारें रही हैं।

मोदी ये क्यों भूल जाते हैं कि उनके दिल्ली आने से पहले मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में सिर्फ़ काँग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल की ही सरकारें नहीं थीं, बल्कि कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह, राम प्रकाश गुप्ता, कैलाश चन्द्र जोशी, वीरेन्द्र कुमार सकलेचा, सुन्दर लाल पटवा, उमा भारती, बाबू लाल गौर और शिवराज सिंह चौहान वाली भगवा सरकारें भी सत्ता में रह चुकी हैं। लिहाज़ा, पिछली सरकारों को कोसते वक़्त मोदी ये क्यों नहीं कहते कि पिछली सरकारों में बीजेपी की भी सरकारें भी शामिल हैं! मोदी का ये नहीं कहना ही वो झूठ है, जो उनके भाषणों को विज्ञापन बनाता है।

नरेन्द्र मोदी को अपनी ब्रॉन्डिंग के लिए अपना विज्ञापन करने और अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनने के अलावा पुरखों को कोसने की ऐसी बीमारी है, जो उनसे पहले देश के किसी मुखिया की कभी नहीं रही! मोदी के व्यक्तित्व का ये सबसे ख़राब और घातक पहलू है! क्योंकि बीजेपी के नव-निर्मित मुख्यालय के अलावा देश में शायद ही कोई ऐसी योजना हो जो अपने निर्धारित वक़्त में पूरी हुई हो! भारत की सरकारी कार्यप्रणाली कई मायने में हमेशा से ही बेहद शर्मनाक रही है। मोदी-युग में भी योजनाओं के समय पर पूरा नहीं होने के सैंकड़ों उदाहरण हैं। इसीलिए जब मोदी पिछली सरकारों पर हमला करते हैं, तब वो ख़ुद अपना और अपने पद की गरिमा की खिल्ली उड़ाते हैं।

बाणसागर की हक़ीक़त

लगे हाथ बाणसागर परियोजना के इतिहास को भी जान लीजिए। 1956 में पहली बार केन्द्रीय जल आयोग ने इसकी परिकल्पना की थी। तब इसका नाम ‘डिम्बा प्रोजेक्ट’ था। इसे सोन और बनास नदी के संगम पर शिकारगंज के पास बनाया जाना था। बाद में इसे वहाँ से 30 किलोमीटर दूर मौजूदा जगह यानी शहडोल ज़िले में देवलोंद ले जाना का फ़ैसला हुआ। 1973 में इसके लिए मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार की सरकारों के बीच अन्तर्राज्जीय जल समझौता हुआ। तब संस्कृत के प्राचीन विद्वान बाण भट्ट के नाम पर इसे बाणसागर नाम दिया गया। समझौते के बावजूद शिलान्यास की नौबत आने तक पाँच साल और बीत गये।

Bansagar Dam

14 मई 1978 को प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने बाणसागर परियोजना का शिलान्यास किया। जनता पार्टी की उस सरकार में जनसंघ की ओर से अटल-आडवाणी मंत्री थे। तब बीजेपी ही नहीं, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल का भी जन्म नहीं हुआ था। इसके बावजूद, 1973 में जिस परियोजना की अनुमानित लागत 91.31 करोड़ रुपये थी, उसके शिलान्यास के वक़्त 322.2 करोड़ रुपये मंज़ूर किये गये। शिलान्यास के 14 महीने बाद मोरारजी सरकार गिरी। लेकिन तब तक परियोजना का निर्माण शुरू नहीं हो पाया। लिहाज़ा, क्या मोदी बताएँगे कि उस ज़माने की देरी का ठीकरा किससे सिर फोड़ा जाए!

बाणसागर का श्रेय सिर्फ़ बीजेपी को क्यों?

विंध्य क्षेत्र से जुड़े मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार के सर्वाधिक सूखाग्रस्त इलाके की अनियमित वर्षा को देखते हुए सोन नदी के पानी के इस्तेमाल के लिए बनी बाणसागर परियोजना के जलाशय के पानी को तीन हिस्से में बाँटने की योजना बनी। लाभार्थी राज्यों के जल अनुपात के मुताबिक ही बाणसागर की 50 फ़ीसदी लागत मध्यप्रदेश को और बाक़ी 25-25 फ़ीसदी उत्तर प्रदेश तथा बिहार को देना था। लेकिन समय रहते राज्यों से वित्तीय अंशदान नहीं मिला और परियोजना लटकती चली गयी। इन अड़चनों को दूर करने के बाद निर्माण का असली काम 1997 में शुरू हो पाया। हालाँकि, 1998 तक संशोधित लागत 1055 करोड़ रुपये को पार कर चुकी थी।

निर्माण शुरू होने के वक़्त अटल जी प्रधानमंत्री थे, तो मध्य प्रदेश में दिग्विजय सिंह, उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह और बिहार में राबड़ी देवी की सरकारें थीं। दिग्विजय सरकार दिसम्बर 2003 तक रही। फिर उमा भारती, बाबू लाल गौर और शिवराज सिंह की सरकारें बनीं। ज़ाहिर है, बाणसागर का श्रेय किसी अकेले को नहीं मिल सकता। बहरहाल, शिवराज के वक़्त बाणसागर का मध्य प्रदेश वाला हिस्सा बन गया और 25 सितम्बर 2006 को अटल जी ने उसका लोकार्पण किया। इस दौरान 1997 में उत्तर प्रदेश के हिस्से वाली 172 किलोमीटर लम्बी बाणसागर नहर परियोजना का काम शुरू हुआ। इसी का लोकार्पण मोदी ने अभी किया है।

आख़िरकार, 3500 करोड़ रुपये की लागत और दशकों की देरी के बाद विंध्य पर्वत में सुरंग बनाकर सोन नदी के पानी को मध्य प्रदेश से उत्तर प्रदेश की ओर लाने का सपना साकार हुआ। लेकिन नरेन्द्र मोदी ने पिछली पीढ़ियों की मेहनत का सेहरा जिस ढंग से अपने सिर बाँध लिया, उसके बाद ये पूछना लाज़िमी हो गया है कि क्या बाणसागर का सपना उन्होंने देखा था? क्या सिर्फ़ उनकी सरकार ने इसके लिए रात-दिन एक कर दिया? क्या इतनी बड़ी परियोजना योगी-मोदी राज की कोशिशों से ही चालू हो पायी? सच्चाई तो ये है कि जुलाई 2015 में आयी प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना से जोड़े जाने तक बाणसागर का 90 फ़ीसदी काम हो चुका था। दशकों की देरी के बावजूद यदि मोदी श्रेय के हक़दार हैं तो फिर पुरानी सरकारें क्यों नहीं!

मुफ़्त की वाहवाही का नशा

दरअसल, मोदी को मुफ़्त की वाहवाही बेहद पसन्द है। किस्मत में उन्हें ऐसे कई मेगा-प्रोजेक्ट्स का लोकार्पण करने का सौभाग्य भी मिलता रहा, जिसके लिए सारी जद्दोज़हद पिछली सरकारों ने की। मिसाल के तौर पर, 4 जून 2016 को मोदी, अफ़ग़ानिस्तान को जिस सलमा बाँध का तोहफ़ा देने गये थे, उसकी व्यावहारिकता (Feasibility) रिपोर्ट 1957 में बनी थी और निर्माण 1976 में शुरू हुआ था। इससे पहले 25 दिसम्बर 2015 को मोदी ने अफ़ग़ानिस्तान के नये संसद भवन का लोकार्पण किया, उसका शिलान्यास भी अगस्त 2005 में मनमोहन सिंह ने किया था।

जम्मू-कश्मीर को हर मौसम में सड़क मार्ग से जोड़ने वाली 10 किलोमीटर लम्बी चेनानी-नाशरी (पटनीटॉप) सुरंग का लोकार्पण मोदी ने 2 अप्रैल 2017 को किया। इस हाईटेक प्रोजेक्ट का निर्माण 2011 में शुरू हुआ। लेकिन उद्घाटन के वक़्त सारा श्रेय मोदी ने ऐसे लपक लिया, मानों ये उनकी नोटबन्दी की उपलब्धि रही हो। दूसरी ओर, मोदी राज की कार्यशैली की पोल ज़ोजीला सुरंग की योजना ने खोल दी।

हक़ीक़त ये है कि कश्मीर को लेह से जोड़ने वाली ज़ोजीला सुरंग के निर्माण को मनमोहन कैबिनेट की मंज़ूरी अक्टूबर 2013 में मिली। इसके बावजूद शिलान्यास मई 2018 में हो सका। इसी तरह, असम को अरूणाचल से जोड़ने वाले ब्रह्मपुत्र पर बने जिस सबसे लम्बे ढोला-सादिया या भूपेन हज़ारिका पुल का उद्घाटन नरेन्द्र मोदी ने 26 मई 2017 को किया, उसके सर्वेक्षण का काम 2003 में शुरू हुआ था। जनवरी 2009 में मनमोहन सिंह सरकार ने इस परियोजना को मंज़ूरी दी थी।

जुमला बना घड़ियाली आँसू

मिर्ज़ापुर की जनसभा में ही मोदी कहते हैं कि “जो लोग आजकल किसानों के लिए घड़ियाली आँसू बहाते हैं, उनसे आपको पूछना चाहिए कि आख़िर क्यों उन्हें अपने शासनकाल में देश भर में फैली इस तरह की अधूरी सिंचाई परियोजनाएँ नहीं दिखाई दीं? पिछली सरकार ने कभी किसानों की चिन्ता नहीं की। जो लोग किसानों के नाम पर राजनीति कर रहे हैं उनके पास न्यूनतम समर्थन मूल्य की कीमत को बढ़ाने का समय नहीं था।”

अरे मोदी जी, किसानों के नाम पर कथित घड़ियाली आँसू बहाने वालों से तो जनता देर-सबेर जबाब तलब करती ही रही है, लेकिन क्या आपको पता है कि आपने तो ख़ुद कभी भी जनता के सवालों का सामना नहीं किया! अब यदि हिम्मत हो तो देश को ये बताइए कि आपके शासनकाल में अब तक कितनी सिंचाई परियोजनाओं को मंज़ूरी मिली? उनमें से कितनों पर काम चालू हुआ? और, उनमें से कितनी परियोजनाओं का लोकार्पण मई 2019 तक होने वाला है? इसके अलावा, क्या आप कह सकते हैं कि आपके पाँच साल पूरे होने तक देश की कोई सिंचाई परियोजना देरी से नहीं चल रही होगी?

नौकरशाही का ढर्रा

अरे, पिछली सरकारों को तो छोड़िए, आपकी सरकार की सैंकड़ों महत्वाकाँक्षी योजनाएँ या तो बेहद देरी से चल रही हैं या फिर उनकी उपलब्धि शर्मनाक है। सच्चाई तो ये है कि आपके मातहत काम कर रहे अलग-अलग मंत्रालय भी अब भी वैसे ही अड़ंगा लगाते हैं, जैसा वो पिछली सरकारों के ज़माने में होता था! ज़ाहिर है कि आप दावे चाहे जितने कर लें, लेकिन आपके राज में भी नौकरशाही का ढर्रा बिल्कुल पहले जैसा ही है। और हाँ, यदि आपको पता हो तो ज़रा देश को बताइएगा कि क्या आपसे पहले किसी सरकार ने कभी न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाया था या नहीं? या फिर 70 साल में क्या ये पहला मौका है जब किसानों पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वालों ने न्यूनतम समर्थन मूल्य में क्रान्तिकारी इज़ाफ़ा करके किसानों को निहाल कर दिया है!

इसी तरह, प्रधानमंत्री ने उस वक़्त भी सिर्फ़ लफ़्फ़ाज़ी ही की, जब उन्होंने कहा कि “हम अमीर और ग़रीब के बीच की खाई को कम करना चाहते हैं। इसका परिणाम जल्द ही आपको दिखने लगेगा। क्योंकि पहली बार विकास न सिर्फ़ हो रहा है, बल्कि दिख भी रहा है! [इसी विकास को] ग़रीब अब आपकी आँखों में आँखें डालकर विश्वास से देख सकता है। क्योंकि मोदी ग़रीब को इस लायक बनाने के लिए काम कर रहे हैं।” अरे मोदी जी, जब आप कहते है कि अमीर-ग़रीब की खाई कम होने वाली है तब डर लगता है कि कहीं आप नीरव-मेहुल जैसे कई और दोस्तों पर भी मेहरबान ना हो जाएँ! आपको ये कौन बताएगा कि बैंकों में रखा ग़रीबों का पैसा वहाँ से दिन-दहाड़े लूटकर देश से फ़ुर्र हो जाने से ही अमीर-ग़रीब की खाई मिट नहीं रही, बल्कि और चौड़ी तथा गहरी हो रही है!

मोदी बने विज्ञापन

दरअसल, नरेन्द्र मोदी की शख़्सियत में एक प्रधानमंत्री या प्रधानसेवक या चौकीदार या एक शिक्षित, समझदार और गरिमावान राजनेता का अक़्स बेहद कम है। उनमें एक विज्ञापन की ख़ूबियाँ कहीं ज़्यादा नज़र आती हैं! मोदी में वो सभी गुण हैं, जो किसी विज्ञापन में होते हैं! विज्ञापनों में जिस तरह से सच के मामूली से अंश को बेहद बढ़ा-चढ़ाकर और आकर्षक ढंग से पेश किया जाता है, वैसे ही मोदी अपनी चौतरफ़ा नाकामी पर पर्दा डालने के लिए अपने मामूली से योगदान को भी बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं।

Modi Baan Sagar AD

मोदी भूल चुके हैं कि सच की महिमा निराली है! सच, निष्कपट होता है। सच जितना होता है, उतना ही नज़र आता है। कम-ज़्यादा नहीं। यही ब्रह्म सत्य है! सच को आप जितना बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना चाहेंगे, आपको उसमें उतना ही झूठ मिलाना पड़ेगा! झूठ को आँख बन्द करके नहीं मिलाया जा सकता। इसीलिए विज्ञापनों में किसी उत्पाद की विशेषताओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते वक़्त कई तरक़ीबें अपनायी जाती हैं। जैसे जिंगल, मॉडलिंग, संवाद, अभिनय, फ़ोटोग्राफ़ी, रोशनी, सेट वग़ैरह-वग़ैरह। ये आकर्षण परस्पर मिलकर झूठ का मेकअप या शृंगार करते हैं। झूठ को शृंगार की ज़रूरत इसलिए है, क्योंकि वो बुनियादी तौर पर कुरूप होता है!

हरेक भाषण विज्ञापन

नरेन्द्र मोदी का हरेक भाषण, सिर्फ़ उनका विज्ञापन है। बीते पाँच साल में, मोदी देश में हो या विदेश में, लेकिन शायद ही कोई दिन ऐसा बीता हो जब मोदी ने भाषणबाज़ी नहीं की। मौका जो भी हो, लेकिन उनका भाषण हमेशा चुनावी और वीर-रस से ओत-प्रोत ही रहता है। इसीलिए उन्हें हक वक़्त ‘अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनने’ की लत पड़ गयी है। जब हमेशा अपना गुणगान करने की लाचारी होगी तो हमेशा विज्ञापन की तरह सच-कम और झूठ-ज़्यादा तो बोलना ही पड़ेगा। अपनी इसी लाचारी की वजह से वो ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं, जिन्हें फेंकूँ का ख़िताब मिला!

विज्ञापन की तरह झूठ को बार-बार फैलाना ही ब्रॉन्ड मोदी की सबसे बड़ी ख़ासियत है। काश! कोई उन्हें समझा पाता कि झूठ का मोटा पलेथन लगाकर भी सच की छोटी लोई से बड़ी रोटी नहीं बेली जा सकती! काश! कोई उन्हें बता पाता कि सार्वजनिक जीवन में विरोधियों पर हमला करने से पहले हमेशा तथ्यों को ठोक-बजाकर देख लेना चाहिए। वर्ना, आपको जितना सियासी फ़ायदा होगा, उससे कहीं ज़्यादा आप हँसी के पात्र बनेंगे। शीर्ष पदों पर बैठे लोगों के लिए व्यंग्य और मसख़रापन में मामूली फ़र्क़ ही होता है!

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