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हिंदू राष्ट्रवाद से जुड़ा है डोकलाम सीमा विवाद

सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए यह चेतावनी जैसी होनी चाहिए, जो ऊपर से तो देश की अंदरूनी और बाह्य सुरक्षा के लिए स्पष्टत: खतरा नजर आती है, लेकिन वास्तव में यह देश की राजनीति में हिंदू राष्ट्रवाद की धाक जमाने के एजेंडे को ही पूरा करती है।

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देश के सिरमौर प्रांत जम्मू एवं कश्मीर तथा पूर्वोत्तर में भूटान के डोकलाम से लगी चीन की सीमा से आ रही तकरार की खबरें केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार की नीतियों और कार्रवाई का नतीजा हो भी सकती हैं, और नहीं भी।

सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए यह चेतावनी जैसी होनी चाहिए, जो ऊपर से तो देश की अंदरूनी और बाह्य सुरक्षा के लिए स्पष्टत: खतरा नजर आती है, लेकिन वास्तव में यह देश की राजनीति में हिंदू राष्ट्रवाद की धाक जमाने के एजेंडे को ही पूरा करती है।

डोकलाम में ही चल रहे सीमा विवाद को लें। प्रत्यक्ष तौर पर तो यह भूटान के विवादित सीमा क्षेत्र में चीन द्वारा सड़क बनाए जाने से भारत के समक्ष खड़ी हुई अप्रत्याशित चुनौती नजर आती है।

चीन से सटे पूर्वोत्तर राज्यों की सीमा पर तनाव की स्थिति वैसे तो कोई नई बात नहीं है, लेकिन 1962 में चीन से युद्ध में मिली हार से भारत को जो मूल सबक मिला है, वह चीन को युद्ध के लिए न भड़काना है।

दूसरी ओर इस बात में भी कोई संदेह नहीं है कि डोकलाम सीमा पर भारत ने उकसाने वाला कोई काम नहीं किया, हां चीन की अति महत्वाकांक्षी बेल्ड एंड रोड परियोजना का हिस्सा बनने से जरूर इंकार किया, जिसे इस सीमा विवाद के पीछे मूल कारण के तौर पर देखा जा सकता है।

ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या भारत में पनपी धार्मिक एवं राजनीतिक अस्थिरता के माहौल को देखते हुए चीन अपने चिर प्रतिद्वंद्वी भारत को पूर्वोत्तर के खूबसूरत पर्वतीय इलाके में शक्ति प्रदर्शन के लिए उकसा रहा है।

जम्मू एवं कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर और घाटी के अंदर भी सेना और अर्धसैनिक बलों को जिस तरह बढ़े हुए हिंसा के स्तर का सामना करना पड़ा है, उसे देखते हुए डोकलाम में 16 जून को भारतीय सैनिकों द्वारा चीनी सैनिकों को सड़क बनाने से रोकने से काफी पहले चीन सीमा पर तनाव भड़काने को बेसब्र रहा होगा।

कुल मिलाकर चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की रणनीति क्या है, इसका अनुमान तो मुश्किल है, लेकिन एक बात तो स्पष्ट है कि चीन को माहौल सैन्य कार्रवाई के अनुकूल लगा।

भारत के अंदर हिंदुत्ववादी एजेंडे पर चल रही सरकार, गोवध और गोरक्षा के नाम पर हो रही हिंसा और मुख्यधारा की मीडिया से लेकर सोशल नेटवर्क पर इसे लेकर मचे हंगामे के बीच राजकीय और गैर-राजकीय तत्वों द्वारा लगातार खड़ी की गई समस्याओं से घिरे भारत के इस ताकतवर पड़ोसी देश को सीमा पर तनाव की स्थिति पैदा करने का अच्छा अवसर नजर आया।

अगर डोकलाम मुद्दा देश में राष्ट्रवाद की भावना को उकसाने में कामयाब होता है तो पूर्वोत्तर में पहचान की राजनीति और ध्रुवीकरण के शब्दाडंबर से हिंदुत्व राष्ट्रवादियों को और शक्ति मिलेगी, लेकिन साथ ही इससे राष्ट्र कमजोर होगा और सीमा पर जोखिम को भी बढ़ावा देने वाला होगा।

By : अर्णब एन. सेनगुप्ता

(अर्णब एन. सेनगुप्ता कतर में पत्रकार हैं और यह उनके निजी विचार हैं)

ओपिनियन

भारत कई आर्थिक संकेतकों में बांग्लादेश से भी काफी पीछे

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Amartya Sen

नई दिल्ली, 15 जुलाई | दुनिया की सर्वाधिक तीव्र दर से आर्थिक विकास वाली भारतीय अर्थव्यवस्था विकास के कई संकेतकों में बांग्लादेश से भी काफी पीछे है। मसलन, महिला कामगार भागीदारी दर 2010 में भारत 29 फीसदी थी तो बांग्लादेश में 57 फीसदी। यह चौंकाने वाली बात नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अर्मत्य सेन और ज्यां द्रेंज ने अपनी किताब ‘भारत और उसके विरोधाभास’ में बताई है।

मूल अंग्रेजी कृति ‘एन अनसर्टेन ग्लोरी : इंडिया एंड इट्स कंट्राडिक्शन’ का यह हिंदी रूपांतर है, जिसका प्रकाशन इसी साल हुआ है। मूल पुस्तक 2013 में ही प्रकाशित हुई थी।

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लेखक द्वय ने किताब में इस तल्ख सच्चाई को रेखांकित किया है कि लाभ अर्जित करने के मकसद से शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में जो निजी पूंजी निवेश होता है, उससे तब्दीली तो आती है, मगर उसका लाभ सबको नहीं मिल पाता, क्योंकि वह निवेश जनहित के उद्देश्य से कम, लाभ कमाने के लिए ज्यादा होता है।

किताब में तीव्र आर्थिक विकास के पथ पर अग्रसर भारत की वास्तविक तस्वीर पेश की गई है, जिसमें उपलब्धियों के साथ-साथ कई विफलताएं भी शामिल हैं, जिन्हें नजरंदाज नहीं किया जा सकता।

लेखक द्वय ने यह बताने का प्रयास किया है कि आर्थिक विकास का फायदा अगर समाज में कमजोर तबकों और वंचितों को नहीं मिल रहा है तो फिर देश के आर्थिक विकास के कोई मायने नहीं हैं। इनके कहने का अभिप्राय यह है कि आर्थिक विकास के लाभ का पुनर्वितरण सुविधाओं से महरूम लोगों के बीच होना जरूरी है।

दोनों अर्थशास्त्री आर्थिक विकास के लिए सार्वजनिक व्यय को जरूरी मानते हैं। इनके मुताबिक शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार सृजन के लिए सार्वजनिक व्यय जरूरी है, जिससे आर्थिक विकास को भी रफ्तार मिलती है।

किताब में मीडिया की जवाबदेही पर भी सवाल किया गया है। लेखक द्वय के अनुसार, भारतीय मीडिया रूपहले पर्दे, खान-पान और जीवन पद्धति और खेल जैसे मनोरंजन की खबरों में ज्यादा अभिरुचि दिखाता है, जबकि विकास के मसलों में उसकी दिलचस्पी कम देखी गई है।

इन्होंने किताब में योजना आयोग की एक रिपोर्ट का जिक्र किया है, जिसमें आयोग ने कहा है कि 2011-12 में देश की 1.2 अरब आबादी का एक चौथाई से कम निर्धनता रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहा है।

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि 1990 से 2010 के दौरान दुनियाभर में निर्धनता में कमी आई, जो आर्थिक विकास का परिणाम है। बाद के वर्षो में दुनिया के विकासशील देशों में एक चौथाई आबादी नितांत गरीबी का जीवन बसर करने को मजबूर थी और भारत में 40 फीसदी से ज्यादा लोग इस हालत में थे।

आर्थिक उदारीकरण के कारण भारत में 1990 के बाद गरीबी में कमी जरूर आई लेकिन इसमें सत्ता में बैठे लोगों की कोई कृपा नहीं थी। जिन लोगों ने उदारीकरण का विरोध किया वे 1991 के पूर्व की नीतियों में विश्वास करते थे।

लेखकों ने किताब की भूमिका में हालिया घटनाओं का भी जिक्र किया है, जिनमें 8 नवंबर, 2016 को भारत सरकार द्वारा की गई नोटबंदी की भर्सना की गई है। लेखक द्वय ने सरकार ने बेरोजगारों को रोजगार देने के बजाय अचानक नोटबंदी कर 86 फीसदी नकदी को गैरकानूनी घोषित कर दिया।

किताब में तुलनात्मक आंकड़े भारतीय अर्थव्यवस्था को बेहतर ढंग से समझने में सहायक हैं। हालांकि अनूदित रचना होने के कारण संप्रेषणीयता का प्रवाह कहीं-कहीं अवरुद्ध होता है। इसमें कहीं दो राय नहीं कि अनुवादक ने मूल पाठ और लक्षित पाठ के बीच तारतम्य बनाने की पूरी चेष्टा की है। पुस्तक पठनीय है, खासतौर से आंकड़ों और तथ्यों का तुलनात्मक अध्ययन अर्थशास्त्र के विद्यार्थियों के लिए लाभकारी हो सकता है।

किताब : भारत और उसके विरोधाभास

लेखक : अर्मत्य सेन, ज्यां द्रेंज

अनुवादक : अशोक कुमार

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली

मूल्य : 399 रुपये

–आईएएनएस

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ओपिनियन

गौ रक्षकों का मोदी की बात न सुनना चिंताजनक : हामिद अंसारी

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Hamid Ansari

नई दिल्ली, 15 जुलाई | पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी का कहना है कि देश में ‘अतिसतर्कता’ उफान पर है और यदि गौ रक्षक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बात भी नहीं सुनते हैं तो यह चिंता का विषय है।

अंसारी ने अपनी नई किताब ‘डेयर आई क्वेस्चन’ के विमोचन से पहले आईएएनएस से विशेष बातचीत में कहा, “मोदी एक मजबूत नेता हैं। वह अपनी पार्टी के निर्विवाद नेता हैं। अगर उनकी बात नहीं सुनी जा रही है, तो यह गंभीर चिंता का विषय है। यह कहने की कोई जरूरत नहीं कि उनकी पार्टी के ही लोग उनकी बात नहीं मान रहे हैं। यह निष्कर्ष मैं नहीं निकाल रहा हूं।”

यह पुस्तक विभिन्न अवसरों पर अलग-अलग विषयों पर अंसारी द्वारा दिए गए भाषणों का संकलन है। उन्होंने कहा, “मैंने पुस्तक में विभिन्न मुद्दों पर प्रकाश डाला है, जैसे भारतीय होना क्या है, भारतीय राष्ट्रवाद क्या है या हम खुद को बहुलवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक क्यों कहते हैं।”

अंसारी ने जोर देकर कहा कि समाज में अहिष्णुता बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं कहा जा सकता कि मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद ही सांप्रदायिक विभाजन उभरा, बल्कि यह काफी लंबे समय से है।

उन्होंने कहा, “असहिष्णुता लंबे समय से हमारे समाज में रही है। लेकिन मुझे लगता है कि जब पानी का स्तर बढ़ता है, तो आप प्रारंभ में उसपर गौर नहीं करते हैं और यह बढ़ता जाता है। उसके बाद आपकी नजर उसपर पड़ती हैं, और आज यही हो रहा है।”

उन्होंने आईएएनएस से कहा, “हां, अतिसतर्कता (विजिलैंटिज्म) उफान पर है। इस बारे में राष्ट्रीय स्तर के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लिखा गया है। अंतर्राष्ट्रीय समाचार पत्रों ने कहा है कि इसमें वृद्धि हुई है। मैं कोई सटीक तारीख (कि पहली बार इसपर कब गौर किया गया था) .. विभिन्न अवसर, विभिन्न स्थान नहीं बता सकता । यह कई वर्षो से चल रहा है।”

कुछ राज्यों में गाय की तस्करी के संदेह में या गोमांस खाने के नाम पर अल्पसंख्यक समुदाय से संबंधित लोगों पर गैर कानूनी ढंग से हमले करने और उन्हें पीट-पीट कर मार डालने जैसी कई घटनाएं घटित हुई हैं।

क्या मोदी के सत्ता में आने के बाद इस तरह की घटनाएं बढ़ी हैं?

अंसारी ने कहा, “नहीं, नहीं। विफलता की दोषी हर सरकार रही है। हर बार कहीं न कहीं कोई सांप्रदायिक दंगा हुआ है, यह असहिष्णुता की अभिव्यक्ति है और दूसरा प्रशासन की विफलता है।”

अंसारी ने कहा, “आप देखिए कि दो लोगों के बीच हमेशा असहमति हो सकती है। सड़क पर दो साइकिलें आपस में टकराती हैं और वहां गाली-गलौच शुरू हो जाता है। लेकिन एक छोटी असहमति सांप्रदायिक दंगे का रूप ले ले, इसके लिए सोच और साजिश रचनी पड़ती है। और जहां भी इस तरह की साजिश होती है, समझिए कि वहां कानून-व्यवस्था विफल हुई है।”

तो क्या वह विलिलैंटिज्म में वृद्धि के लिए खासतौर से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली राज्य सरकारों की ओर इशारा कर रहे हैं? पूर्व राष्ट्रपति ने कहा, “देखिए, जहां भी ऐसा है, मैं वहां की सरकार की तरफ इशारा कर रहा हूं। चाहे यह असम, केरल में हो या पंजाब में। यह कोई मायने नहीं रखता। मैं राजनीतिक दलों को निशाना नहीं बना रहा, मैं प्रशासन को निशाना बना रहा हूं।”

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के एक कार्यक्रम में दो मई को अंसारी वहां मौजूद थे, और उस दौरान वहां हिंदूवादी गुंडे घुस गए थे। तो क्या उस घटना में स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत थी? अंसारी ने कहा कि वह इस तरह का निष्कर्ष निकालने से बचना चाहेंगे, लेकिन उन्होंने यह जरूर स्पष्ट किया कि जिन्ना का चित्र तो वहां व्यवधान पैदा करने का बहाना भर था।

उन्होंने कहा, “मैं उस तरह का निष्कर्ष नहीं निकालना चाहता। लेकिन मैं इतना जानता हूं कि मुझे वहां आमंत्रित किया गया था, और वहां व्यवधान पैदा किया गया। कार्यक्रम नहीं हो सका था। जिले के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने अगले दिन स्वीकार किया था कि बंदोबस्त विफल रहा और वह इसकी जांच करने जा रहे हैं।”

उन्होंने कहा, “मैं यह निष्कर्ष नहीं निकाल रहा हूं कि उपद्रवियों के साथ स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत थी। लेकिन मैं इसे शुद्ध रूप से प्रशासनिक विफलता मानता हूं। अब यह विफलता क्यों हुई, जांच से यह पता किया जाए।”

अंसारी ने कहा, “लेकिन हां, जिन्ना का चित्र मात्र बहाना था। यह लंबे समय से वहां है। जिस सज्जन ने चित्र पर आपत्ति खड़ा की, वह तीन साल तक एएमयू कोर्ट के सदस्य थे। आपने इसके बारे में क्या किया?”

एएमयू और जामिया मिलिया इस्लामिया का अल्पसंख्यक दर्जा समाप्त करने की दक्षिणपंथी नेताओं की मांग पर अंसारी ने कहा कि चूंकि सर्वोच्च न्यायालय में मामले की सुनवाई चल रही है, इसलिए उन्हें और अन्य किसी को भी इस पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए।

अगला लोकसभा चुनाव निकट है, लिहाजा वर्तमान सरकार की उपलब्धियों और विफलताओं को जांचना-परखना जरूरी लगता है। प्रधानमंत्री मोदी पाकिस्तान को लेकर एक कठोर नीति न अपनाने के लिए पूर्व की मनमोहन सिंह सरकार पर हमला बोलेते रहे हैं, तो क्या मौजूदा सरकार ने अपने चार साल के कार्यकाल के दौरान पाकिस्तान पर कोई ठोस, प्रभावी नीति बना पाई है?

पेशेवर राजनयिक रह चुके अंसारी ने कहा, “जहां तक मेरी समझ है पाकिस्तान को लेकर हमारी नीति ढुलमुल हैं। हम पेंडुलम की तरह एक बार इस तरफ जाते हैं फिर दूसरी तरफ चले जाते हैं। अगर यह नीति है, तो मान लीजिए कि हमारे पास एक नीति है। आप इसके बारे में क्या कर सकते हैं?”

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के समय अपनाई गई भारत की गुटनिरपेक्षता की पारंपरिक नीति बिल्कुल सही थी और इस नीति से दुनिया में देश को इज्जत भी मिली थी, लेकिन हाल के वर्षो में पड़ोसियों को लेकर भारत की नीति बुरी हालत में है।

उन्होंने कहा, “इस समय पड़ोसी देशों को लेकर हमारी नीति तनाव में नजर आती है। जो लोग इसके जानकार हैं, उन्होंने इस बारे में लिखा भी है।”

चीन के बढ़ते रसूख से निपटने के लिए क्या भारत पर्याप्त कोशिश कर रहा है?

अंसारी ने कहा, “यहां आईं सभी सरकारें इस बारे में बहुत सचेत रही हैं। चीन एक बड़ा पड़ोसी है। और चीन के साथ हमारे संबंध हैं, विभिन्न तरह के संबंध – राजनीतिक, सांस्कृतिक और यहां तक कि सैन्य संबंध भी। दोनों देश इस बात को समझते हैं कि हमारे बीच समस्याएं भी हैं, और हमारे बीच सकारात्मक संबंध भी हैं।”

–आईएएनएस

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Viral सच

ये सरासर झूठ है कि भारतीय अर्थव्यवस्था ने फ़्राँस को पछाड़ दिया है!

यदि भारत की जीडीपी एक दशक में दोगुनी हो गयी और वो कौन-कौन से देश हैं, जिनकी जीडीपी इसी दौरान भारत की जीडीपी से पहले दोगुनी हुई है?

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Indian economy

भारत का भक्त-मीडिया आपको ये तो बताता है कि हम अब दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में छठे स्थान पर आ चुके हैं और अब फ़्राँस से आगे हैं। लेकिन वो आपको ये नहीं बताता कि भारतीयों के मुक़ाबले फ़्राँसिसियों की प्रति व्यक्ति आय 20 गुना ज़्यादा है। आपको ये भी नहीं बताया जाता कि फ़्राँस की आबादी से ज़्यादा लोग भारत में आज भी ग़रीबी रेखा से नीचे हैं। राजा का बाजा बन चुका भारतीय मीडिया आपको ये भी नहीं समझता कि कैसे मोदी सरकार ने भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास-दर का हिसाब रखने वाले फ़ार्मूले को ही बदल दिया, जिसकी वजह से मनमोहन सरकार के मुक़ाबले अभी दर्ज होने वाली विकास-दर में दो फ़ीसदी का इज़ाफ़ा अपने आप आ जाता है।

भारतीय मीडिया अपने आप बेईमान नहीं हो गया। मोदी राज में एक बड़ी साज़िश के तहत मीडिया संस्थानों को हिदायत दी गयी कि वो ख़बरों को ऐसे तोड़-मरोड़कर पेश करें, जिससे जनता के सामने हमेशा सरकार की उपलब्धियों की झूठी तस्वीरें ही पहुँचती रहें। वर्ना, हरेक पेशेवर पत्रकार और उसके मीडिया संस्थान को अच्छी तरह पता है कि भारत का फ़्राँस से आगे निकलना सिर्फ़ एक आँकड़ा है। आँकड़ों की तुलनात्मक व्याख्या के बग़ैर वो सिर्फ़ अंक हैं और कुछ नहीं! किसी देश की अर्थव्यवस्था के मजबूत होने का मतलब है कि उसकी आबादी की ख़ुशहाली का बढ़ना। ख़ुशहाली को नापने के कई पैमाने हैं। लेकिन सबसे आसान है प्रति व्यक्ति आय। दूसरा पैमाना है कि शिक्षा-स्वास्थ्य-सड़क-पानी-बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं का स्तर और इस पर होने वाला ख़र्च।

अब ज़रा ये सोचिए कि क्या आप उस व्यक्ति को ज़्यादा धनवान मानेंगे जिसके पास ज़्यादा ज़मीन हो या फिर उसे जिसके पास ज़्यादा उपजाऊ ज़मीन हो? हो सकता है कि किसी के पास सौ बीघा ज़मीन हो, लेकिन वो बंजर हो। जबकि किसी के पास दस बीघा ही हो और वो खेतीहर हो। अब यदि आप अंक के आधार पर सोचेंगे तो ज़ाहिर है कि आप सौ को दस के मुक़ाबले दस गुना बड़ा ही मानेंगे। ऐसा ही बड़क्पन विश्व बैंक की ओर से जारी सालाना, सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का है। ये आँकड़ा कहता है कि साल 2017 में भारत की जीडीपी 2597 अरब डॉलर हो गयी, जबकि फ़्राँस की जीडीपी 2582 अरब डॉलर दर्ज की गयी। ये आँकड़ा ऊपर दिये गये उदाहरण के मुताबिक़, सकल या कुल ज़मीन जैसा है।

विश्व बैंक के आँकड़े के आधार पर ये हर्ग़िज़ नहीं कहा जा सकता कि भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है। क्योंकि फ़्राँस के 6.04 करोड़ लोगों की उत्पादकता की तुलना यदि भारत 134 करोड़ की आबादी की उत्पादकता से की जाएगी तो हम उसके मुक़ाबले बेहद बौने साबित होंगे। इसीलिए, लोगों की ख़ुशहाली जानने के लिए प्रति व्यक्ति आय को आधार माना जाता है। फ़्राँसिसियों की सालाना प्रति व्यक्ति आय जहाँ 38,477 डॉलर है, वहीं भारत के मामले में ये सिर्फ़ 1,940 डॉलर ही बैठती है। इसका मतलब ये हुआ कि एक आम फ़्राँसिसी नागरिक के मुक़ाबले एक आम भारतीय 20 गुना ग़रीब है।

लगे हाथ ग़रीबी को भी समझते चलें। वर्ल्ड पावर्टी क्लॉक और ब्रूकिंग्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अब भी भारत में 7 करोड़ लोग बेहद ग़रीबी में जी रहे हैं। भारत अब दुनिया में सबसे ज़्यादा ग़रीबों की आबादी वाला देश नहीं रहा। क्योंकि नाइजीरिया में बेहद ग़रीब लोगों की आबादी 8.7 करोड़ है। ग़रीबों की संख्या की तुलना करने वक़्त भी ये ग़ौर करना ज़रूरी होगा कि बीते दशकों में देश की कुल आबादी में बेहद ग़रीबों की संख्या और उनका अनुपात क्या रहा है? क्या मोदी राज में ग़रीब घटे हैं? कुल आबादी में ग़रीबों का अनुपात कम हुआ है? क्या ये संख्या और अनुपात मोदी राज से पहले की सरकारों के मुक़ाबले बेहतर हुआ है या बदतर? याद रखिये कि संख्या का महत्व बेहद मामूली है। असली आँकड़ा तो अनुपात का है। यदि अनुपात सुधर रहा है, तभी हम बेहतर हो रहे हैं। वर्ना, नहीं।

इसी तरह, विश्व बैंक की रिपोर्ट की आड़ में भक्त-मीडिया हमें बता रहा है कि नोटबन्दी और जीएसटी से भारतीय अर्थव्यवस्था में तेज़ी आयी है। और, बीते दशक में भारत की जीडीपी दोगुनी हो गयी है। जबकि सच्चाई ये है कि मोदी सरकार यही झूठ तो फैलाना चाहती है। सवाल है कि ये तेज़ी क्या होती है? तेज़ एक तुलनात्मक दशा है। सजातीय की तो तुलना हो सकती है, लेकिन विजातीय की नहीं। मिसाल के तौर पर, साइकिल और बाइक की रफ़्तार की तुलना नहीं हो सकती, हाथी और घोड़े की ताक़त की तुलना नहीं हो सकती, स्त्री और पुरुष की तुलना नहीं हो सकती। लिहाज़ा, जब हम विकास-दर की तेज़ी पर ग़ौर करें, तब ये देखना ज़रूरी होगा कि सम्बन्धित अर्थव्यवस्था का आकार कितना बड़ा है। चीन की अर्थव्यवस्था भारत से छह गुना बड़ी है। वास्तविक मात्रा के लिहाज़ से उनका आकार का 6 फ़ीसदी हमारे आकार के 36 फ़ीसदी के बराबर होगा।

हम देख चुके हैं कि नोटबन्दी अपने हरेक मक़सद में विफल साबित हुई है। इससे काले धन की कोई रोकथाम नहीं हो सकी। उल्टा, सारा काला धन सरकार की मिली-भगत से सफ़ेद होकर बैंकों में जा पहुँचा। आतंकवाद और नक्सलवाद पर भी नोटबन्दी ने कोई प्रभाव नहीं डाला। कैश-लेस यानी डिज़ीटाइज़ेशन के मोर्चे पर भी कोई ख़ास फ़ायदा नहीं हुआ। दूसरी ओर, नोटबन्दी का भारी-भरकम ख़र्च अर्थव्यवस्था पर पड़ा। करोड़ों लोगों का काम-धन्धा चौपट हो गया। रोज़गार-व्यापार पर ऐसा असर पड़ा कि अभी तक हालात सामान्य नहीं हो पाया है। इसी तरह, जीएसटी को भी जिस तरह से लागू किया गया, उसने महँगाई तथा जनता की मुश्किलों को बढ़ाया ही।

इस तरह, बीते एक दशक में भारत की जीडीपी के दोगुना होने की बातों को भी गहराई से समझना बेहद ज़रूरी है। दस साल की उपलब्धि में से मोदी राज के चार साल की औसत विकास-दर की तुलना मनमोहन सिंह सरकार के छह सालों की औसत विकास-दर से करने पर पता चलेगा कि मौजूदा चार साल के मुक़ाबले उससे पहले के छह साल बेहद उम्दा थे। मनमोहन सरकार में औसत विकास-दर 8.5 फ़ीसदी रही, जबकि मोदी राज में यही औसत 6.5 फ़ीसदी का रहा है। इससे दशक का औसत 7.7 फ़ीसदी बैठेगा। अब ज़रा सोचिए कि जो ख़ुद को तेज़ बता रहे हैं क्या वो अपने से पहले वालों के मुक़ाबले 1.2 अंक या 18 फ़ीसदी धीमे नहीं है!

इसी धीमेपन का दूसरे पहलू को भी हमें समझना होगा कि यदि भारत की जीडीपी एक दशक में दोगुनी हो गयी और वो कौन-कौन से देश हैं, जिनकी जीडीपी इसी दौरान भारत की जीडीपी से पहले दोगुनी हुई है? ऐसी तुलना के बग़ैर कोई कैसे कह सकता है कि हमारी उपलब्धि औरों से बेहतर है। विकास-दर की तुलना करते समय ये देखना भी ज़रूरी है कि अलग-अलग अर्थव्यवस्थाओं में महँगाई और मुद्रास्फीति का दशा क्या रही है? क्योंकि जिन देशों में महँगाई नियंत्रण में है, वहाँ ब्याज़-दरें बहुत कम हैं। उनकी मुद्रा की क्रय-शक्ति जहाँ दस साल पहले जितनी ही है, वहीं हमारे रुपये की औक़ात कहीं ज़्यादा कम हो चुकी है। लिहाज़ा, मुमकिन है कि हम रुपये ज़्यादा कमाने लगें, लेकिन ज़रूरी नहीं कि ज़्यादा रुपयों से हमारी ख़ुशहाली भी बढ़ी ही होगी। इसीलिए, हमें आँकड़ों की बाज़ीगरी को समझना आना चाहिए।

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