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स्वास्थ्य

स्वीमिंग पूल को प्रदूषित न करें : आईएमए

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इंडियन मेडिकल एसोसिएशन
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इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) का कहना है कि स्वीमिंग पूल से आने वाली जिस गंध को लोग क्लोरीन की गंध समझते हैं, अक्सर वह विभिन्न रसायनों की गंध होती है, जो क्लोरीन में मूत्र, मल, पसीना और धूल मिलने से उत्पन्न होते हैं।

आईएमए के अनुसार, पूल में नहाने के बाद यदि आपकी आंखों में लालिमा और जलन महसूस हो तो यह क्लोरीन की वजह से नहीं, बल्कि मूत्र की वजह से हो सकती है। इससे रासायनिक एलर्जी भी हो सकती है।

आईएमए के अध्यक्ष डॉ. के.के. अग्रवाल ने कहा, “क्लोरीन जब मूत्र के संपर्क में आती है तो अमोनिया तैयार होता है, जिसे क्लोरामाइन कहते हैं। इसकी एक खास गंध होती है और यह श्वसन संबंधी समस्याओं के अलावा आंखों में संक्रमण भी पैदा कर सकता है।

उन्होंने कहा, “डायरिया से पीड़ित लोग क्लोरीन का असर खत्म करने वाले एक परजीवी- क्रिप्टोस्पोरिडियम को भी पानी में फैला सकते हैं, जो नियमित रूप से पूल में नहाने वालों में जलजनित रोगों का कारण बनता है। पूल में डायरिया के लिए जिम्मेदार कुछ जीवाणु भी हो सकते हैं, जो वहां कुछ मिनट से लेकर कई दिनों तक जीवित रहते हैं।

डॉ. अग्रवाल ने कहा, “एक बार प्रदूषित होने के बाद पूल के इस पानी को यदि किसी ने थोड़ा सा भी निगल लिया तो उसे संक्रमण हो सकता है। मूत्र में मौजूद नाइट्रोजन युक्त रसायनों को निष्क्रिय करने के लिए पूल में और अधिक क्लोरीन डालने की जरूरत हो सकती है।”

आईएमए प्रमुख ने कहा कि यह आवश्यक है कि पूल में नहाते वक्त आप स्विमिंग गॉगल्स का प्रयोग करें। आजकल पानी की शुद्धता जांचने के लिए टेस्ट स्ट्रिप्स भी मिलती हैं, जिनसे रसायनों का स्तर परखा जा सकता है। पानी से निकलने के बाद आंखों में लुब्रिकेंट की कुछ बूंदें डालने से जलन कम की जा सकती है।

उन्होंने बताया, “इनडोर पूलों में अधिक खतरा रहता है, क्योंकि जलन उत्पन्न करने वाले रसायन आसपास की हवा में घुलकर खांसी, चक्कर और कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले लोगों में अस्थमा उत्पन्न कर सकते हैं। ऐसे में सभी की जिम्मेदारी होती है कि पूल प्रयोग करते समय उसे स्वच्छ रखने की कोशिश करें।”

पूल की स्वच्छता को सुनिश्चित करने के लिए निम्न बिंदुओं पर ध्यान दें :

* तेज दरुगध पर ध्यान दें। साफ स्वच्छ पूल के आसपास तीव्र गंध नहीं आनी चाहिए।

* पानी को ध्यान से देंखे कि उसमें किसी तरह की गंदगी तो नहीं।

* पानी के अंदर मूत्र त्याग न करें और अपने बच्चों को भी यह बात समझाएं।

* पानी को मुंह में न लें, न ही निगलें।

* डायरिया होने पर पूल में न जाएं।

* पूल से बाहर आकर तत्काल नहा लें।

 

–आईएएनएस

स्वास्थ्य

भोजन में कार्बोहाइड्रेड ज्यादा लेने से दोबारा कैंसर का खतरा

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डाइट
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भोजन में कार्बोहाइड्रेड और शुगर की मात्रा अधिक होने से सिर और गले के कैंसर के उपचाराधीन मरीज को दोबारा कैंसर का खतरा बढ़ सकता है और वह मौत का कारण बन सकता है।

यह बात एक शोध में सामने आई है। शोध में पाया गया है कि कैंसर का इलाज से पहले के साल में जिन्होंने कार्बोहाइड्रेट और सुक्रोज, फ्रक्टोज, लैक्टोज और माल्टोज के रूप में शुगर ज्यादा लिया, उनमें मृत्यु का खतरा अधिक होता है। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ कैंसर में प्रकाशित अध्ययन में कैंसर के 400 मरीजों में 17 फीसदी से अधिक मरीजों में कैंसर की पुनरावृत्ति दर्ज की गई, जबकि 42 फीसदी की मौत हो गई।

अरबाना शैंपैन स्थित इलिनोइस विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और प्रमुख शोधकर्ता अन्ना ई. आर्थर ने बताया कि कार्बोहाइड्रेट खाने वाले मरीजों और अन्य मरीजों में कैंसर के प्रकार और कैंसर के चरण में अंतर पाया गया। हालांकि उपचार के बाद कम मात्रा में वसा और अनाज, आलू जैसे स्टार्च वाले भोजन खाने वाले मरीजों में बीमारी की पुनरावृत्ति व मौत के खतरे कम हो सकते हैं।

–आईएएनएस

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स्वास्थ्य

भारत में प्रति 100 व्यक्तियों में से एक सीलियक रोग से ग्रस्त

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celiac--
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दुनिया की आबादी का लगभग 0.7 प्रतिशत हिस्सा सीलिएक रोग से प्रभावित है। वहीं भारत में इस बीमारी से करीब 60 से 80 लाख लोगों के ग्रसित होने का अनुमान है।

ताजा आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर भारत में प्रति 100 में एक व्यक्ति इस बीमारी से जूझ रहा है। सीलियक एक गंभीर ऑटोइम्यून डिसऑर्डर है, जो आनुवंशिक रूप से अतिसंवेदनशील लोगों में हो सकता है। आनुवंशिकी इस स्थिति के प्रसार में एक प्रमुख भूमिका निभाती है और इसलिए यह समस्या बच्चों में भी हो सकती है।

हार्ट केअर फाउंडेशन ऑफ इंडिया (एचसीएफआई) के अध्यक्ष एवं इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. के. के. अग्रवाल ने कहा, “सीलियक बीमारी से पीड़ित लोग ग्लूटेन नामक प्रोटीन को पचाने में सक्षम नहीं होते हैं, जो गेहूं व जौ के आटे में पाया जाता है।

ग्लूटेन इन रोगियों के प्रतिरक्षा तंत्र को छोटी आंत में क्षति पहुंचाने के लिए सक्रिय कर देता है। परिणामस्वरूप, रोगी भोजन से पोषक तत्वों को अवशोषित नहीं कर पाते हैं और कुपोषित रहने लगते हैं, जिससे एनीमिया हो जाता है, वजन में कमी होती है और थकान रह सकती है।”

उन्होंने कहा, “सीलियक रोगियों में वसा का ठीक से अवशोषण नहीं हो पाता है। गेहूं से एलर्जी, डमेर्टाइटिस हर्पेटिफॉर्मिस, मल्टीपल स्लेरोसिस, ऑटोइम्यून डिसऑर्डर, ऑटिज्म स्पेक्ट्रम विकार यानी एडीएचडी और कुछ व्यवहार संबंधी समस्या वाले रोगियों को ग्लूटेन फ्री आहार लेने की सिफारिश की जाती है।

ग्लूटेन युक्त अनाजों में गेहूं, जौ, राई, जई और ट्रिटिकेल प्रमुख हैं। कुछ खाद्य पदार्थों में स्वाद बढ़ाने या चिपकाने वाले एजेंट के रूप में ग्लूटेन मिला दिया जाता है। ऐसी हालत में व्यक्ति को ग्लूटेन फ्री फूड खाना चाहिए।”

आईजेसीपी के समूह संपादक डॉ. अग्रवाल ने बताया, “सीलियक बीमारी वाले व्यक्ति को गेहूं, राई, सूजी, ड्यूरम, माल्ट और जौ जैसे पदार्थों से दूर रहना चाहिए। ग्लूटेन की मौजूदगी पता करने के लिए उत्पादों के लेबल को जांच लेना चाहिए।

कुछ चीजें जिनमें ग्लूटेन हो सकता है, वे हैं- डिब्बाबंद सूप, मसाले, सलाद ड्रेसिंग, कैंडीज और पास्ता आदि। उन्होंने कहा, “हालांकि, इसका यह मतलब नहीं कि भोजन में विविधता नहीं हो सकती है। चावल, ज्वार, क्विनोआ, अमरंथ, बाजरा, रागी और बकव्हीट जैसे विकल्पों का उपयोग संभव है।”

— आईएएनएस

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स्वास्थ्य

उच्च रक्तचाप के रोगियों को कसरत से ज्यादा चाय पसंद: सर्वेक्षण

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tea
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उच्च रक्तचाप से पीड़ित अधिकांश लोग अपने रोग पर काबू पाने के लिए व्यायाम करने की तुलना में एक कप चाय और दवाई खाना ज्यादा पसंद करते हैं।

एक सर्वेक्षण में 79 फीसदी उत्तरदाताओं ने कहा कि वह एक महीना अतिरिक्त जीवन जीने के लिए दवाई खाने को तैयार हैं, जबकि 78 फीसदी लोगों ने कहा कि रोजाना चाय का एक कप पीने के लिए तैयार हैं। यहां केवल 63 प्रतिशत ने कहा कि एक अतिरिक्त महीने जीने के लिए व्यायाम करना पसंद करेंगे।

कनेक्टिकट के याले स्कूल ऑफ मेडिसिन में सहायक प्राध्यापक व इस अध्ययन की लेखिका एरिका स्पैट्स ने कहा, “हमारे निष्कर्षो से पता चलता है कि लोगों ने स्वाभाविक रूप से हृदय की सेहत में सुधार के लिए अपने-अपने स्तर पर अलग-अलग तरीके खोज लिए हैं।”

शोधार्थियों ने इस दौरान 1,500 अमेरिकी व्यस्कों से उच्च रक्तचाप से पीड़ित होने की कल्पना करने के लिए कहा था और उसके बाद पूछा था कि आप एक माह, एक साल या पांच साल अतिरिक्त जीवन जीने के लिए चारों में से कौन सा उपचार अपनाएंगे।

इन चार उपचारों में रोजाना एक कप चाय, व्यायाम, दवाएं और मासिक व अर्धमासिक इंजेक्शन के विकल्प शामिल थे। इस दौरान केवल 68 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वह अतिरिक्त जीवन जीने के लिए मासिक व अर्धमासिक इंजेक्शन के विकल्प को चुनेंगे। सर्वेक्षण में शामिल अधिकांश लोग 45 उम्र के कम थे। इनमें आधी संख्या महिलाओं की थीं, जिनमें से अधिकांश उच्च रक्तचाप से पीड़ित थीं।

–आईएएनएस

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