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‘अवैध’ या ‘मुफ़्त’, किस पर मेहरबान होगी दिल्ली?

अवैध कॉलोनियों के निवासियों के लिए ये तय करना बेहद मुश्किल होगा कि अपने वोट के ज़रिये किस पार्टी के प्रति आभार और विश्वास जताएँ? रोज़मर्रा की महत्वपूर्ण चीज़ों को मुफ़्त देने वाली पार्टी को या दशकों पुरानी फ़रमाइश को सशुल्क पूरी करने वाली पार्टी को।

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PM Modi CM Kejriwal

विधानसभा चुनाव की दहलीज़ पर खड़ी दिल्ली में फ़िलहाल जनता को लुभाने की होड़ लगी है। केजरीवाल की मुफ़्तबाज़ी का मुक़ाबला करने के लिए 20 साल से दिल्ली को वापस पाने को तरस रही मोदी सरकार ने भी ज़बरदस्त मास्टर स्ट्रोक का ऐलान किया है। राजधानी की 1,800 अवैध कॉलोनियों के 40-50 लाख लोगों को ख़ुश करने के लिए बीजेपी ने एक लॉलीपॉप ढूँढ़ लिया है।

केजरीवाल दिन-रात इसी उधेड़-बुन में रहते हैं कि दिल्ली को और क्या-क्या मुफ़्त दे दिया जाए!केजरीवाल ने मुफ़्त पानी, मुफ़्त बिजली, महिलाओं की मुफ़्त बस यात्रा, मुफ़्त सीवर कनेक्शन और सेफ़्टी टैंक की मुफ़्त सफ़ाई जैसी पॉलिसी का ऐलान बीजेपी को ऐसा ललकारा कि उसने क़ानून बनाकर राजधानी की 1,800 अवैध कॉलोनियों को वैध बनाने का ऐलान कर दिया। इसके विधेयक को केन्द्रीय कैबिनेट ने हरी झंडी दिखा दी। उम्मीद है कि संसद में मौजूदा सत्र में दशकों पुरानी माँग को पूरा कर दिया जाएगा। अवैध को वैध बनाना अनुचित भले लगे, लेकिन ये जितना विकराल और व्यापक है, उसे देखते हुए और कोई चारा भी नहीं हो सकता। बीजेपी जानती है कि अनुच्छेद 370 और राम मन्दिर की तरह कोई राजनीतिक दल अवैध का विरोध नहीं कर पाएगा।

यदि बीजेपी के इस मास्टर स्ट्रोक से दिल्लीवासी ख़ुश हो गये तो शायद जनवरी में होने वाले विधानसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन सुधार जाए। संविधान ने ज़मीन सम्बन्धी अधिकार राज्य सरकार को दिया है। लेकिन पूर्ण राज्य नहीं होने की वजह से इस केन्द्र शासित प्रदेश की ज़मीन केन्द्र सरकार की मुट्ठी में है। विधानसभा में चमत्कार करने वालों का लोकसभा में फ़िस्सडी साबित होना ही केजरीवाल की ‘मुफ़्त’ अभियान की वजह है।

माना जाता है कि दिल्ली के कमज़ोर और मेहनतकश तबकों पर केजरीवाल की अच्छी पकड़ है। यही तबका उनकी ‘मुफ़्त’ वाली योजनाओं का सबसे बड़ा लाभार्थी है और प्रशंसक भी। दूसरी ओर, अवैध कॉलोनियों के नियमित होने से सारी सहूलियत भी इसी तबके को मिलेगी। अब सवाल ये है कि जब अवैध कॉलोनियों में सड़कें और नालियाँ बनाने, सीवर लाइन बिछाने सेफ़्टी टैंक की सफाई होगी, वहाँ रहने वाली महिलाएँ बसों में मुफ़्त यात्रा करेंगी और रियायती राशन पाएँगी तो क्या केजरीवाल सरकार को वोट नहीं देंगी? इन्हीं कॉलोनियों के लोग उन सरकारी स्कूल-कॉलेजों के कायाकल्प के सबसे बड़े लाभार्थी हैं, जहाँ इनके बच्चे पढ़ते हैं।

अवैध कॉलोनियों में बसने वाले ही दिल्ली सरकार की मुफ़्त इलाज़ योजना, दुर्घटना की दशा में मुफ़्त और असीमित इलाज़ योजना के लाभार्थी हैं। सरकारी अस्पतालों और मोहल्ला क्लिनिक जैसी डिस्पेंसरियों, वहाँ से करवायी जाने वाली मुफ़्त पैथोलॉज़िकल और रेडियोलॉज़िकल जाँच वग़ैरह का फ़ायदा मुख्य रूप से इन्हीं अवैध कॉलोनियों के निवासियों के हिस्से में आता है। लिहाज़ा, अवैध कॉलोनियों के निवासियों के लिए ये तय करना बेहद मुश्किल होगा कि अपने वोट के ज़रिये किस पार्टी के प्रति आभार और विश्वास जताएँ? रोज़मर्रा की महत्वपूर्ण चीज़ों को मुफ़्त देने वाली पार्टी को या दशकों पुरानी फ़रमाइश को सशुल्क पूरी करने वाली पार्टी को।

दोनों पार्टियाँ जनता का पैसा ही ख़र्च करेंगी। कोई अपनी जेब से नहीं लगाता। उल्टा अवैध कॉलोनियों के नियमितीकरण से दिल्ली सरकार को भारी राजस्व मिलेगा, क्योंकि ज़मीन की रज़िस्ट्री के वक़्त लगने वाली स्टैम्प ड्यूटी का बहुत बड़ा हिस्सा भी घूम-फिरकर दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) के ज़रिये या तो दिल्ली राज्य में ही ख़र्च होता है। अवैध के वैध होते ही दिल्ली नगर निगम को सम्पत्ति-कर वसूलने का अधिकार मिल जाएगा। दशकों से राजधानी के नगर निगमों पर बीजेपी का एकछत्र राज है। हालाँकि, शायद ही कोई दिल्लीवासी ऐसा हो, जो इसके कर्मचारियों को, इसकी कार्य-संस्कृति को नेक, ईमानदार, निष्ठावान और जन-समस्याओं के प्रति संवेदनशील समझता हो। इसके बावजूद दिल्ली वाले दशकों से निगर निगम में बीजेपी की पौ-बारह करते रहे हैं।

केजरीवाल की दिल्ली सरकार में भी चप्पे-चप्पे पर भ्रष्टाचार का डंका वैसे ही बज रहा है जैसा काँग्रेस और बीजेपी की सरकारों के दौर में था। रिश्वतख़ोरी रूपी नदी के प्रवाह में शायद ही कोई कमी आयी हो। सरकारी बाबुओं की मनमानी बदस्तूर क़ायम है। वो हमेशा की तरह बेईमान और मक्कार बने हुए हैं। सरकारी दामाद वाला उनका स्टेटस तो कभी बदला नहीं। डिज़ीटल विस्तार से काफ़ी चीज़ें सुधरी भी हैं। फिर भी ये देखना दिलचस्प होगा कि विधानसभा चुनाव में दिल्लीवासी किस लॉलीपॉप पर अपना वोट न्यौछावर करेंगे?

बाज़ार में मुफ़्तख़ोरी कैसे-कैसे ग़ुल खिलाती है — इसकी सबसे बड़ी मिसाल है जियो का मुफ़्त डाटा प्लॉन। इसकी बदौलत आज टेलीकॉम सेक्टर में हाहाकर है? कमज़ोर तबकों की मदद करना किसी भी कल्याणकारी सरकार का बुनियादी धर्म है। लोकतंत्र में मुफ़्त की रेवड़ियाँ बाँटना पूरी तरह से नैतिक और जायज़ है। लिहाज़ा, इसमें मीन-मेख निकालना फ़िज़ूल है। बीते वर्षों का अनुभव बताता है कि अच्छी उपलब्धियों वाली सरकारें भी चुनाव हार सकती हैं और फ़र्ज़ी ढोल पीटने वाले भी सत्तानशीं हो सकते हैं। असाधारण नाकामियों के बावजूद बीजेपी फ़ैलाव इतना तो बताता ही है कि गया ज़माना जब जनता काम-काज और विचारधारा को परखकर सरकार चुनती थी।

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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राहुल गांधी वापस संभालेंगे कांग्रेस की कमान?

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Rahul gandhi

नई दिल्ली/वायनाड (केरल), 6 दिसम्बर | पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी वापस पार्टी की कमान संभालने वाले हैं। इस बात की संभावना है कि अगले साल के आरंभ में दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद वह दोबारा पार्टी की कमान संभालें। कांग्रेस महासचिव के. सी. वेणुगोपाल का कहना है कि देश अब ज्यादा चाहने लगा है कि वह नेतृत्व की भूमिका में हों।

राहुल गांधी के साथ केरल स्थित उनके संसदीय क्षेत्र वायनाड गए वेणुगोपाल ने संवाददाताओं से कहा, “देश नाजुक दौर से गुजर रहा है। पार्टी को उनके नेतृत्व की जरूरत है और पार्टी के कार्यकर्ताओं की ओर से उनकी वापसी की मांग उठने लगी है। हमें उम्मीद है कि वह उनकी बात सुनेंगे।”

अगले कुछ महीनों में कांग्रेस का अधिवेशन होने वाला है जिसमें पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी की नियुक्ति को मंजूरी प्रदान की जाएगी।

एक सूत्र ने बताया कि उस सम्मेलन में राहुल गांधी की वापसी को लेकर आवाज उठेगी क्योंकि पार्टी के युवा नेताओं ने इसकी योजना बनाई है।

पार्टी संगठन में राहुल गांधी को प्रोन्नति करने की मांग पहली बार अखिल भारतीय कांग्रेस कमेर्टी के हैदराबाद अधिवेशन में 2006 में उठी थी जहां उत्तर प्रदेश के पार्टी कार्यकर्ताओं ने उनके पक्ष में नारे बुलंद किए थे और 2007 में उनको पार्टी का महासचिव बनाया गया। उसके बाद उनको उपाध्यक्ष बनाने की मांग 2013 में जयपुर अधिवेशन में उठी।

पार्टी के विभिन्न वर्गो की मांग के बाद राहुल गांधी 2017 में निर्विरोध कांग्रेस अध्यक्ष निर्वाचित हुए, लेकिन 2019 के आम चुनाव में उनके नेतृत्व में पार्टी का प्रदर्शन खराब रहने के कारण उन्होंने उसकी जिम्मेदारी लेते हुए मई में इस्तीफा दे दिया। पार्टी की ओर से उनसे दोबारा विचार करने का आग्रह बार-बार किए जाने के बाद भी वह नहीं माने। इसके बाद अगस्त में सोनिया गांधी को पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष नियुक्त किया गया।

राहुल गांधी भले ही पार्टी के प्रमुख न हों लेकिन उनका फैसला पार्टी का फैसला होता है जैसाकि शिव सेना-कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस गठबंधन नीत महाराष्ट्र सरकार में नितिन राउत की मंत्री के रूप में नियुक्ति और नाना पटोले के विधानसभाध्यक्ष बनने से जाहिर होता है।

सूत्र ने बताया कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अधिवेशन स्थल को लेकर पार्टी अंतिम फैसला लेने वाली है जोकि कांग्रेस शासति मध्यप्रदेश या राजस्थान में जनवरी व फरवरी में होने वाली है।

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आख़िर कोई दास्तान-ए-प्याज़ बताता क्यों नहीं?

सरकार कभी अफ़ग़ानिस्तान से तो कभी मिस्र से प्याज़ के आयात का भारी-भरकम आँकड़ा देकर कहती है कि ‘देश में तो सब ठीक है’। प्याज़ का दाम न तो कोई राष्ट्रीय समस्या है और ना ही कोई प्राकृतिक आपदा। हरेक दो-तीन साल पर प्याज़ ऐसे ही और लाल हो उठता रहा है, तो प्याज़ के भाव घटने के बजाय बढ़ क्यों रहा है?

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People buy onion

प्याज़ के दाम को लेकर देशभर में हाहाकार है। इसे शतक-वीर कहा जा रहा है क्योंकि इसका दाम 100 रुपये प्रति किलोग्राम को पार कर चुका है। सरकार कहती है कि मौसम की मार की वजह से प्याज़ का उत्पादन क़रीब 28-29 फ़ीसदी गिरा है। लेकिन कोई ये बताने वाला नहीं है कि 30 प्रतिशत पैदावार घटने से दाम सामान्य के मुक़ाबले चार से पाँच गुना यानी 400 से 500 फ़ीसदी तक क्यों बढ़ गये? क्या उत्पादन में आयी गिरावट को देखते हुए जनता ने ज़्यादा प्याज़ खाना शुरू कर दिया, वो भी इतना ज़्यादा कि दाम बढ़ने के बावजूद ख़पत भी बेतहाशा बढ़ने लगे? वर्ना, दाम बढ़ने पर तो ख़पत घटनी चाहिए। वो बढ़ कैसे सकती है?

प्याज़ के दाम में ऐसी आग भी तब लगती है जब अर्थव्यवस्था की विकास दर के औधें मुँह गिरने का सिलसिला सालों-साल से जारी है। विकास दर गिरने का मतलब है — देश के सकल घरेलू उत्पादन में गिरावट। इसका स्वाभाविक असर होता है — जनता की औसत आमदनी में कमी। यानी, आम आदमी की आमदनी घट रही है, बेरोज़गारी बढ़ती ही जा रही है, तो फिर वो लोग कौन और कितने हैं जो आसमान छूती क़ीमतों के बावजूद प्याज़ पर टूटे पड़े हैं? प्याज़ को लेकर सीधा और छोटा सा सवाल सिर्फ़ इतना ही है। लेकिन सही जबाब नदारद है।

सरकार कभी अफ़ग़ानिस्तान से तो कभी मिस्र से प्याज़ के आयात का भारी-भरकम आँकड़ा देकर कहती है कि ‘देश में तो सब ठीक है’। सारा क़सूर विश्व बाज़ार की तेज़ी का है। ज़रूर होगा। सरकार भला क्यों झूठ बोलेगी? वो तो अब बस इतना बता दे कि क्या भारतीय जनता उस दौर में भी बेहद महँगे प्याज़ की बेतहाशा ख़पत कर रही है, जब उसका दाम आसमान छू रहा हो? बेशक़, प्याज़ का दाम न तो कोई राष्ट्रीय समस्या है और ना ही कोई प्राकृतिक आपदा। हरेक दो-तीन साल पर प्याज़ ऐसे ही और लाल हो उठता रहा है। पिछली सरकारों ने भी प्याज़ पर कोई कम आँसू तो बहाये नहीं। लिहाज़ा, सवाल फिर वही है कि यदि प्याज़ की राष्ट्रीय किल्लत है तो आँसुओं की सकल मात्रा घटने के बजाय बढ़ क्यों रही है?

अरे! जब प्याज़ ही कम होगा तो इसे छीला-काटा भी कम ही जाएगा। कम प्याज़ कटेंगे तो इसके काटने पर बहने वाले आँसुओं की मात्रा भी तो घटनी चाहिए या नहीं? बहरहाल, प्याज़ की किल्लत जितनी भी सच्ची या झूठी हो, लेकिन इसे लेकर होने वाली बातों में कहीं कोई कंजूसी नहीं है। हर कोई प्याज़-मर्मज्ञ बना फिरता है। आपने ज़रा सा ज़िक्र छेड़ा नहीं कि सामने वाला फ़ौरन शुरू हो जाएगा। देखते ही देखते अपनी बातों से आपको छलनी कर देगा। इसकी वजह बहुत सीधी है। लोकतंत्र में जनता अपनी सरकार के दिखाये रास्ते पर चलती है। सरकार भी ज़मीन पर कुछ करे या ना करे, बातें करने में कभी कंजूसी नहीं करती। दरअसल, ये दौर ही बातों का है। बातें करना ही असली काम है। कमर्ठता की निशानी है।

ये लेख भी तो बातें ही कर रहा है। इससे न तो प्याज़ का उत्पादन होगा और ना आयात। दाम भी कम होने से रहा। सरकार भी जागने से रही। फिर भी बातें करने का धर्म तो निभाना ही होगा। कोई अपना धर्म कैसे छोड़ सकता है भला? कुत्ते का धर्म है भौंकना, साँप का धर्म है डसना, मच्छर का धर्म है ख़ून चूसना। ऐसे ही क़ुदरत ने हर चीज़ का एक धर्म तय कर रखा है। सभी अपने-अपने धर्म का पालन करना होता है। इसीलिए जितनी बातें प्याज़ की कमी की होती है, उतनी ही इसके आयात की भी होती है। कमोबेश वैसे ही जैसे 2016-17 में दालों के आयात की अनन्त बातें हुआ करती थीं।

ज़रा उस दौर को याद करें। क्या तब सरकार ने आयात की धमकी देकर या वास्तव में दालों के आयात करके इसकी किल्लत को दूर करने और दाम को काबू में लाने की कोशिश नहीं की थी? बेशक़ की थी। सरकार कार्रवाई नहीं करती तो क्या दालें 500 रुपये प्रति किलोग्राम के दाम से नहीं बिकती? तब भी तो खाद्य आपूर्ति मंत्री की ओर से जनता को मीठी गोली दी जाती थी कि ‘दालों का ऐसा आयात किया जा रहा है, मानों सारे पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त होकर ही मानेंगे।’ बातें ख़ूब हुईं इसीलिए दाल के दाम तभी नरम पड़े जब किसानों ने बम्पर पैदाकर करके दिखाया। हालाँकि, ज़्यादा दलहन उत्पादन के बावजूद अभागे किसानों की दुर्दशा बनी ही रही, क्योंकि उनके मुनाफ़े को बिचौलियों, आढ़तियों और सूदख़ोरों की मिलीभगत ने हड़प लिया।

कालाबाज़ारियों और मिलावटख़ोरों की तब भी पौ-बारह थी और आज भी है। इनके लिए कमी दालें बहार का सबब बनती हैं तो कभी आलू-प्याज़ और टमाटर जैसी चीज़ों के दाम। केन्द्र की हो या राज्यों की, इस पार्टी की हो या उस पार्टी की, कोई भी कालाबाज़ारियों का बाल तक बाँका नहीं कर पाता। आयात करने वाली सरकारी कम्पनियों को तभी नींद से जगाया जाता है, जब चिड़ियाँ खेतों को चुग कर फ़ुर्र हो चुकी होती हैं। सौ दिन चले अढ़ाई कोस के संस्कारों में ढली सरकारी कम्पनियाँ क़ीमतों को नीचे लाने के लिए यदि एक लाख टन सामान की ज़रूरत होगी तो हज़ार टन का आयात करते-करते हाँफ़ने लगती हैं।

अब ज़रा ये समझिए कि ऐसी तमाम बातें कितनी बनावटी होती हैं? सरकार के पास एक से बढ़कर एक एक्सपर्ट यानी विशेषज्ञ होते हैं, जो वक़्त रहते आगाह करते हैं कि अति-वृष्टि यानी अत्यधिक बारिश की वजह से किसानों की किन-किन फ़सल को कैसा-कैसा नुकसान होने वाला है। इसी बुरी ख़बर से कालाबाज़ारियों में ख़ुशी की लहर दौड़ जाती है। ज़माख़ोर तैयार होकर शिकार पर निकल पड़ते हैं। सरकारी बाबुओं को भी रिश्वतख़ोरी और मक्कारी की ख़ुराक़ मिल जाती है। छापेबाज़ी का ढोंग किया जाता है। तरह-तरह की झूठी ख़बरें ‘प्लांट’ होती हैं। इससे जनता को बहकाया और बरगलाया जाता है।

वर्ना, ज़रा सोचिए कि यदि हम भारत में 80 प्रतिशत ईंधन की आपूर्ति आयातित कच्चे तेल से हमेशा कर सकते हैं कि तो वक़्त रहते प्याज़ का आयात करके क़ीमतों पर नकेल क्यों नहीं कस पाते? क्या सिर्फ़ इसलिए कि कच्चे तेल का आयात हमारी बड़ी प्राथमिकता है, क्योंकि यही केन्द्र और राज्य सरकारों की आमदनी यानी टैक्स-संग्रह का सबसे बड़ा ज़रिया है। दूसरे शब्दों में कहें तो कच्चे तेल के आयात में यदि कोताही होगी तो ये सरकार को बहुत ज़्यादा भारी पड़ेगा। उसके कर्मचारियों को तनख़्वाह के लाले पड़ने लगेंगे। सरकारी ठाठ-बाट और शान-ओ-शौक़त पर आँच आएगी। दूसरी ओर प्याज़-टमाटर, खाद्य तेल और दालों की क़ीमतों के चढ़ने-उतरने से सरकार की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ेगा। उल्टा उसके चहेते ज़माख़ोरों में हर्ष और उल्लास की लहर दौड़ने लगेगी। तभी तो ‘अच्छे दिन’ का मज़ा मिलेगा।

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किन पंच-तत्वों पर निर्भर रहेगी महाराष्ट्र के महा-प्रयोग की तक़दीर?

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Maharashtra Govt Collision

राजनीति को ‘अनन्त सम्भावनाओं का खेल’ कहा गया है। इसमें कोई भी अछूत नहीं होता। राजनीति का सत्ता और कुर्सी के पीछे भागना अनिवार्य है। राजनीतिक विचारधाराएँ सिर्फ़ मुखौटा होती हैं। विजेता ही नैतिकता को परिभाषित करता है। नहीं जीतने वाले अंगूरों को खट्टा बताते रहते हैं। राजनीति में खाने और दिखाने के दाँत हमेशा अलग ही होते हैं। राजनीति में किसी की भी कथनी और करनी हमेशा एक जैसी नहीं होती। गठबन्धन को राजनीति का प्रमुख वाद्ययंत्र कह सकते हैं। इसके साज़िदें बेमेल सुरों के तालमेल से सुरीलापन विकसित करते हैं। इसीलिए यक्ष-प्रश्न ये है कि महाराष्ट्र में सियासी सुरीलेपन की अभी जो तरंगें उभरी हैं, वो कैसे सुहानी रह पाएँगी?

चुनाव पूर्व गठबन्धन जहाँ प्रतिद्वन्दियों की ताक़त का अन्दाजा लगाकर बनते हैं, वहीं चुनाव बाद वाले गठबन्धन ‘जिसकी जितनी हिस्सेदारी, उसकी उतनी भागीदारी’ के उसूल से चलती है। गठबन्धन की बुनियाद परस्पर मान-सम्मान, सह-अस्तित्व, साफ़-सुथरा लेन-देन या हिसाब-क़िताब तथा भूल-चूक लेनी-देनी के उसूलों से चलता है। गठबन्धन तभी तक टिकाऊ रहता है जब तक कि एक-साथ हुए राजनीतिक दल अपनी-अपनी थालियों में खाकर सन्तुष्ट रहते हैं। जैसे ही दूसरे की थाली में हाथ मारने की कोशिशें होती हैं, वैसे ही गठबन्धन टूटने लगता है। गठबन्धन की समन्वय समिति ही उसे रस्सी की तरह बाँधे रखती है। ये ‘थर्ड अम्पायर या वीडियो रेफ़री’ की तरह होते हैं। इनके निष्पक्ष रहने तक ही गठबन्धन का मैच चलता है।

राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले सुधी पाठक उपरोक्त नियमों को खेल के मैदान की सीमा-रेखाओं या लक्ष्मण-रेखाओं की तरह भी देख सकते हैं। इन्हीं सरहदें अथवा चुनौतियों से तय होगा कि मुम्बई में उद्धव ठाकरे की अगुवाई में बनी महाविकास अघाड़ी सरकार कितनी टिकाऊ और सुरीली होगी? महाराष्ट्र का महा-प्रयोग अब निम्न पंच-तत्वों पर ही निर्भर रहेगा। इसे परीक्षा के उस प्रश्न-पत्र की तरह देखा जा सकता है, जिसमें सबसे ऊपर निर्देश लिखा है कि ‘प्रश्न संख्या एक अनिवार्य है!’

उदार बनाम कट्टर हिन्दुत्व

भारतीय राजनीति में हिन्दुत्व का अंश हमेशा रहा है। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि गाँधी के अनुयायी उदार वाले रास्ते पर चले और संघ के खिलाड़ियों ने कट्टर की राह थामी। एक पर अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण के आरोप लगे तो दूसरे पर बहुसंख्यकों को उकसाने के। एनसीपी और काँग्रेस की छवि जहाँ नरम हिन्दुत्व वाली है, वहीं शिवसेना की पहचान आक्रामक हिन्दुत्व वाली रही है। शिवसैनिकों के लिए विनम्र बनना भले ही बहुत मुश्किल हो, लेकिन सरकार चलानी है तो अपने तेवरों से समझौता करना ही होगा।

उद्धव का अयोध्या दौरा रद्द करना ये बताता है कि वो लचीलेपन के लिए राज़ी हैं। शिवसैनिकों को अब परप्रान्तीयों को आड़े हाथों लेने के अपने अन्दाज़ से भी परहेज़ करना होगा। गोडसे को देशभक्त बताने पर बीजेपी जैसी सख़्ती से अपनी सांसद प्रज्ञा ठाकुर के साथ पेश आयी है, उसे देखते हुए सावरकर को भारत-रत्न देने के अपने नज़रिये से शिवसेना को भी तौबा करना होगा। नाटक-फ़िल्म का हिंसक विरोध करने के पुराने रवैये से बचना होगा। क्रिकेट मैच से पहले पिच खोदने वाले आदतें छोड़नी होंगी। शिवसेना में यदि ऐसे बदलाव दिखे तभी महाविकास अघाड़ी की सरकार पाँच साल चल जाएगी।

तोड़-फोड़ से बचाव का कवच

तीनों दलों को अपने-अपने घरों को दलबदलुओं की सेंधमारी से बचाना होगा। काँग्रेस-एनसीपी को कर्नाटक, गोवा, बिहार, अरूणाचल, मेघालय, मिज़ोरम, उत्तराखंड जैसे राज्यों से मिले सबक को गाँठ बाँधकर रखना होगा। बीजेपी के मुँह में नरभक्षी का ख़ून लगा हुआ है। वो तोड़-फोड़ करके महाविकास अघाड़ी की गाड़ी को पंचर करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ने वाली, लिहाज़ा तीनों दलों को अपने असन्तुष्टों को साधने के लिए पुख़्ता कवच विकसित करना होगा। इस लिहाज़ से तीनों दलों को ही एक-दूसरे पर निगरानी रखते हुए उनकी मदद के लिए तत्पर रहना होगा। शिवसेना के लिए भी ये बेहतर होगा कि पवार परिवार की तर्ज़ पर वक़्त रहते राज ठाकरे से सुलह-सफ़ाई करके अपने परिवारिक क़िले को मज़बूत बना ले। वर्ना, परिवारिक घाव उसे बहुत भारी पड़ सकता है।

ताल-मेल की तकनीक

सरकार चलाने का असली मंत्र परस्पर ताल-मेल ही होगा। इसके कई रूप हैं। नीतियों के लिए तो ‘कॉमन मिनिमम प्रोग्राम’ बन गया, लेकिन जब तक ‘मुख्यमंत्री का फ़ैसला अन्तिम’ वाला नियम चलेगा तभी तक सरकार बग़ैर खटपट के चल पाएगी। मुख्यमंत्री को भी सहयोगियों को उनकी राजनीति के लिए पर्याप्त जगह छोड़नी होगी। जल्द ही ये ऐलान भी ज़रूरी है कि क्या शिवसेना, अब यूपीए का हिस्सा बन चुकी है? यदि हाँ, तो फिर भविष्य के चुनावों में उतरने के लिए महाविकास अघाड़ी का फ़ॉर्मूला क्या होगा? तीनों दलों के नेताओं का दावा भले ही ये हो कि सरकार के फ़ैसले आमसहमति से लिये जाएँगे, लेकिन रोज़मर्रा में यही असली अग्नि-परीक्षा होगी। अघाड़ी में उद्धव जैसे नौसिखिए को सीखना होगा कि वो अनुभवी मुख्यमंत्रियों पृथ्वीराज चाव्हाण, अशोक चाव्हाण, शरद पवार, सुशील कुमार शिन्दे जैसों को कैसे साध पाएँगे? अन्य नेताओं की महत्वाकांक्षों को काबू में रखना भी तलवार की धार पर चलने जैसा होगा।

केन्द्र से सम्बन्ध

मौजूदा केन्द्र सरकार के पास अपार बहुमत है। उसे इसका अहंकार होना स्वाभाविक है। बीजेपी को विरोधी दलों की सरकारों को अस्थिर करके गिराने का चस्का लग चुका है। चुनाव में सबसे बड़े दल के रूप में उभरी महाराष्ट्र बीजेपी विपक्ष में शान्ति से नहीं बैठने वाली। वो सरकार की नाक में दम करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ने वाली। केन्द्र सरकार से उसे पूरी शह मिलती रहेगी। ऐसे में महाराष्ट्र और केन्द्र सरकार के सम्बन्धों का हमेशा तल्ख़ रहना तथा राजभवन में सियासी साज़िशों का होना स्वाभाविक है। उद्धव इस चुनौती से अच्छी तरह से वाक़िफ़ हैं। तभी तो उन्होंने ‘मुख्यमंत्री की कुर्सी को नुकीली कीलों से भरपूर’ कहा है। उन्हें अब केन्द्र में अपनी सरकार होने का लाभ नहीं मिलेगा। ‘केन्द्र से रिश्ते की तासीर’ अब बहुत कठिन चुनौती होगी।

चुनावी वादे निभाना

हरेक सरकार अपने चुनावी वादों को ‘पहली प्राथमिकता’ भले ही बताती है, लेकिन व्यवहारिक राजनीति का तकाज़ा इसे ‘आख़िरी प्राथमिकता’ बना देता है। लिहाज़ा, जब तक महाविकास अघाड़ी उपरोक्त चारों प्रश्नों या चुनौतियों के सही-सही समाधान करने में सफल रहेगी, तभी तक इस पाँचवें मुद्दे यानी चुनावी वादों को निभाने की दिशा में आगे बढ़ने का रास्ता निकलता रहेगा। तीन दलों को मिलकर एक-दूसरे के साथ ताल-मेल बिठाकर उन चुनावी मुद्दों को अमली जामा पहनाने की कोशिश करनी होगी जिसे ‘कॉमन मिनिमम प्रोग्राम’ में जगह मिली है। तीनों दलों को बराबर से इस बात के लिए सतर्क रहना होगा कि उन पर भ्रष्टाचार के इतने गम्भीर आरोप नहीं लगें जिनका सामना करना मुश्किल हो जाए। तीनों को ये नहीं भूलना चाहिए कि सीबीआई, ईडी और आयकर विभाग, हर पल उनके शिकार की फ़िराक़ में क्यों नहीं रहेंगे?

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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