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क्या देवबन्द में धाँधली हुई या अब वोट-बैंक और तुष्टिकरण के दिन लद गये?

यदि चुनाव में धाँधली नहीं हुई है तो इसमें कोई शक़ नहीं कि मुसलिम वोट-बैंक में बीजेपी ने सफलतापूर्वक सेंध लगा दी है! यहीं ये सवाल भी उठना लाज़िमी है कि यदि बीजेपी एक साम्प्रदायिक पार्टी है तो उसकी साम्प्रदायिकता से लोहा लेना क्या सिर्फ़ मुसलमानों की ही चुनौती है! धर्मनिरपेक्षता की विचारधारा में यक़ीन रखने वाले प्रगतिशील हिन्दुओं की जवाबदेही कैसे तय होगी!

संघ परिवार और बीजेपी ने अपने जन्म से लेकर अब तक जिस मुसलिम वोट-बैंक और तुष्टिकरण का ढोल पीटा है, वो ढोल भी 2017 की मोदी-लहर में फट गया! अबकी बार बीजेपी को उन मुसलमानों ने भी ख़ूब वोट दिया है जिनसे भगवा ख़ानदान को सबसे ज़्यादा नफ़रत और शिकायत रही है! उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के इस सबसे दिलचस्प पहलू का ख़ुलासा सहारनपुर ज़िले की देवबन्द विधानसभा सीट पर दिखायी दिया। वहाँ के नतीज़े को लेकर सियासी गलियारों में भारी गहमागहमी है।

इसकी सबसे दिलचस्प वजह ये है कि देवबन्द एक ऐसा विधानसभा क्षेत्र है जहाँ मुसलमान की आबादी का अनुपात 79 प्रतिशत है। इस बार 2017 में वहाँ से बीजेपी के उम्मीदवार ब्रजेश ने चुनाव जीता है वो भी 29,400 वोटों के भारी अन्तर से! 15 फरवरी 2017 को हुए दूसरे दौर के मतदान में ब्रजेश को जहाँ 1,02,244 वोट मिले, वहीं बीएसपी के माजिद अली (72,844) दूसरे और एसपी के माविया अली (55,385) तीसरे स्थान पर रहे। इन तीनों के अलावा जिन पाँच उम्मीदवारों की जमानत ज़ब्त हुई उनमें तीन हिन्दू और दो मुसलमान हैं! इन पाँचों को कुल 3035 वोट मिले। जबकि 798 वोट NOTA (None of the above) के खाते में गये।

Deoband

Deoband Assembly Result 2017

इस तरह 2017 में देवबन्द के कुल 2,34,306 लोगों अर्थात 66.5% ने मतदान किया। जबकि 2012 के विधानसभा चुनाव में यहाँ 67.02% प्रतिशत मतदान हुआ था। मतदाताओं के लिहाज़ से देखें तो 2012 में देवबन्द विधानसभा क्षेत्र में जहाँ 2,92,273 वोटर थे, वहीं 2017 में इनकी तादाद 3,52,340 हो गयी। चुनाव आयोग के इन आँकड़ों पर बहुत बारीक़ी से ग़ौर करना ज़रूरी है। क्योंकि इन्हीं में देवबन्द की बेहद सनसनीख़ेज़ कहानी छिपी हुई है। वो ऐसे कि 2011 की जनगणना के मुताबिक, देवबन्द की आबादी में मुसलमान-71%, हिन्दू-28%, ईसाई-0.25%, सिख-0.22%, जैन-0.44% और बौद्ध-0.01% थे। इस तरह, देवबन्द के मतदाताओं में क़रीब 2,50,161 मुसलमान हैं और 1,02,179 ग़ैर-मुसलिम हैं।

Deoband

Deoband Census Figures 2011

अब चूँकि इस बार 66.5% मतदान हुआ है, लिहाज़ा देवबन्द के तक़रीबन 1,66,357 मुसलमानों और 67,949 ग़ैर-मुसलिमों ने ही अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया। इन दोनों संख्याओं का योग वही 2,34,306 है, जो चुनाव आयोग का भी अधिकृत आँकड़ा है। अब ज़रा बीजेपी के सफल उम्मीदवार ब्रजेश को मिले 1,02,244 वोटों की तुलना कुल ग़ैर-मुसलिम वोटों यानी 1,02,179 से करें तो आप पाएँगे कि…

  1. यदि सारे के सारे ग़ैर-मुसलिम वोट बीजेपी को मिले हों तो भी उसे कम से कम 65 मुसलमानों के वोट तो मिले ही हैं!
  2. यदि सारे ग़ैर-मुसलिम वोट सिर्फ़ बीजेपी को ही मिले तो मुसलमानों के 1,66,357 का बँटवारा बीएसपी के माजिद अली (72,844) और एसपी के माविया अली (55,385) के बीच हुआ होगा।
  3. साफ़ है कि मुसलमानों का वोट एसपी और बीएसपी के बीच बुरी तरह से बँट गया। वैसे ऐसा हो नहीं सकता कि एसपी और बीएसपी को ख़ासी तादाद में ग़ैर-मुसलिम वोट नहीं मिले होंगे। ये कितने होंगे? ये बता पाना तो किसी के लिए भी सम्भव नहीं है, लेकिन सहज तर्क इतना तो बताता ही है कि इन दोनों को जितने भी वोट ग़ैर-मुसलिमों के मिले होंगे, उतने और मुसलमानों के वोट बीजेपी के खाते में गये होंगे!
  4. बाक़ी बचे 3767 वोट यदि मुसलमानों के नहीं रहे होंगे तो भी इसमें से जितने ग़ैर-मुसलिम रहे होंगे उतने ही मुसलिमों के वोट बीजेपी के ख़ाते में और गये होंगे!
  5. देवबन्द के बारे में अगला रोचक तथ्य ये भी है कि इस मुसलिम बहुल निर्वाचन क्षेत्र में हुए पिछले सभी चुनावों में से ज़्यादातर मौकों पर हिन्दू उम्मीदवार ही विजयी हुए हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में यहाँ बीजेपी को पहली बार कामयाबी मिली और उसके उम्मीदवार राघव लखनपाल सांसद बने। तब वहाँ 75.4% का रिकॉर्ड मतदान हुआ था। राघव ने काँग्रेस के इमरान मसूद को 65 हज़ार मतों से हराया था।
  6. फरवरी 2016 में देवबन्द सीट पर हुए उपचुनाव को जीतकर काँग्रेस के माविया अली विधायक बने थे। लेकिन इस बार माविया यहाँ साइकिल के निशान पर लड़े थे। ये उपचुनाव इसी सीट से 2012 में विजयी रहे समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार राजेन्द्र सिंह राणा के निधन की वजह से हुआ था।

कुलमिलाकर, उपरोक्त विश्लेषण से साफ़ है कि जो लोग इस मुग़ालते में हैं कि देवबन्द के मुसलमानों ने बीजेपी को वोट नहीं दिया है, वो ग़लत साबित हो जाते हैं। और, यदि ये ग़लत नहीं हैं तो बेशक़, 2017 के विधानसभा चुनाव में धाँधली हुई है! ईवीएम में गड़बड़ी करके या और किसी तरीके से, ये तो गहन जाँच से ही साफ़ हो सकेगा। अलबत्ता, यदि चुनाव में धाँधली नहीं हुई है तो इसमें कोई शक़ नहीं कि मुसलिम वोट-बैंक में बीजेपी ने सफलतापूर्वक सेंध लगा दी है! यहीं ये सवाल भी उठना लाज़िमी है कि यदि बीजेपी एक साम्प्रदायिक पार्टी है तो उसकी साम्प्रदायिकता से लोहा लेना क्या सिर्फ़ मुसलमानों की ही चुनौती है! धर्मनिरपेक्षता की विचारधारा में यक़ीन रखने वाले प्रगतिशील हिन्दुओं की जवाबदेही कैसे तय होगी! देवबन्द के नतीज़ों में अनेक सबक छिपे हैं!

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