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स्वास्थ्य

सेहत के लिए जीवनशैली बदलना चाहते हैं दिल्लीवासी

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नई दिल्ली, 25 अप्रैल| राष्ट्रीय राजधानी में 99 प्रतिशत महिलाओं और 89 प्रतिशत पुरुषों की प्राथमिकता सेहत है और उन्हें लगता है कि स्वस्थ रहने के लिए जीवनशैली में बदलाव लाना चाहिए।

मगर विरोधाभास यह है कि भारत की कुल आबादी के करीब 28 प्रतिशत लोगों को चिकित्सा की जरूरत है, फिर भी वे समय पर चिकित्सक से नहीं मिलते। यह बात सुरक्षात्मक स्वास्थ्य प्रदाता प्रतिष्ठान ‘हेल्दी’ की रिपोर्ट ‘हेल्दी इंसाइट्स इंडिया 2017’ की रिपोर्ट में सामने आई है।

रिपोर्ट में अक्टूबर, 2015 से मार्च, 2017 तक 18 माह के दौरान 10 लाख स्वास्थ्य परीक्षणों के आंकड़े हैं, सेहत का इतिहास है और जीवनशैली का विश्लेषण भी।

रिपोर्ट में कहा गया है कि सेहतमंद होने की शुरुआत हमारी सोच से होती है। 91 प्रतिशत लोगों का विश्लेषण करने से पता चला कि वे अच्छी सेहत पाने के लिए जीवनशैली में जरूरी बदलाव लाने के रास्ते पर हैं।

बताया गया है कि दिल्ली में 18 प्रतिशत महिलाएं और 34 प्रतिशत पुरुष उच्च रक्तचाप पीड़ित हैं या इसका जोखिम है, जबकि 14 प्रतिशत महिलाएं और 32 प्रतिशत पुरुष उच्च कोलेस्ट्रोल की समस्या से ग्रसित हैं। राजधानी में सभी आयु वर्ग के लोगों में वजन की समस्या, अपर्याप्त शारीरिक श्रम, धूम्रपान, तनाव, चिंता और अवसाद आदि जीवनशैली की प्रमुख समस्याएं हैं।

अध्ययन में सभी पेशेवर कार्यक्षेत्रों को शामिल किया गया है, जैसे बीएफएसआई, सूचना प्रौद्योगिकी व इस पर निर्भर सेवाएं, निर्माण, खुदरा व गैर सूचना प्रौद्योगिकी सेवाएं।

खुदरा व्यापार क्षेत्र में कार्यरत लोगों में मोटापे की समस्या सबसे अधिक पाई गई, जिनमें 71 प्रतिशत महिलाएं और 83 प्रतिशत पुरुष शामिल हैं। उच्च रक्तचाप एक अन्य बड़ी समस्या है जो कामकाजी लोगों से जुड़ी है। यह दोषपूर्ण भोजन, तनाव, मोटापा, निरंतर बैठे रहने, धूम्रपान और मदिरा सेवन आदि से बढ़ती है।

रिपोर्ट के अनुसार, बीएफएसआई सेक्टर में 15 प्रतिशत महिलाएं व 29 प्रतिशत पुरुष, सूचना प्रौद्योगिकी व इस पर निर्भर सेवाओं के क्षेत्र में 24 प्रतिशत महिलाएं व 42 प्रतिशत पुरुष, निर्माण क्षेत्र की 12 प्रतिशत महिलाएं और 22 प्रतिशत पुरुष, खुदरा क्षेत्र में 24 प्रतिशत महिलाएं व 39 प्रतिशत पुरुष और गैर सूचना प्रौद्योगिकी सेवा क्षेत्र की 11 प्रतिशत महिलाएं व 27 प्रतिशत पुरुष में उच्च कोलेस्ट्रोल से पीड़ित पाए गए। ये लोग कभी भी मधुमेह व उच्च रक्तचाप की चपेट में आ सकते हैं।

बताया गया है कि 26 प्रतिशत से अधिक महिलाएं रक्त की कमी, 88 प्रतिशत महिलाएं विटामिन डी की कमी और 12 प्रतिशत से अधिक महिलाएं असामान्य टीएसएच लेवल से पीड़ित हैं।

अध्ययन में यह भी पाया गया कि देश की 20 प्रतिशत आबादी बैठे रहने वाला जीवन जी रही है, जिससे इन्हें रक्त नलिकाओं व हृदय रोगों का खतरा सामान्य से दोगुना अधिक है।

हेल्दी के संस्थापक, रेकुराम वरदराज एवं कृष्णा उलागारत्वगन ने संयुक्त वक्तव्य में बताया, “हेल्दी इंसाइट्स इंडिया 2017 रिपोर्ट में यह बात साफ हुई है कि इंटेलिजेंट प्रेडिक्टिव एनालिटिक्स तथा बिग डाटा मॉडल्स की मदद से बीमारियों की रोकथाम और जन स्वास्थ्य प्रबंधन में सफलता पाई जा सकती है।”

उन्होंने कहा कि यह जरूरी है कि सेहत पर ध्यान दिया जाए और प्रभावी जीवनशैली अपनाई जाए। सही समय पर सहायता लेना ही प्रमुख समाधान है।

अध्ययन में जिन शहरों को शामिल किया गया, उनमें दिल्ली व एनसीआर के अलावा बेंगलुरू, चेन्नई, हैदराबाद, मुंबई और पुणे शामिल हैं।

आईएएनएस

स्वास्थ्य

टीबी विश्व का खतरनाक संक्रामक रोग बना हुआ है : डब्ल्यूएचओ

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Tuberculosis
प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर

जेनेवा। ट्यूबरक्लोसिस(टीबी) आज भी विश्व का खतरनाक संक्रामक रोग बना हुआ है, लेकिन वर्ष 2000 के बाद वैश्विक प्रयासों की वजह से टीबी से हो सकने वाली लगभग 5.4 करोड़ मौतों को टाला जा सका है। विश्व स्वास्थ्य संगठन(डब्ल्यूएचओ) ने मंगलवार को यह जानकारी दी। समाचार एजेंसी सिन्हुआ की रपट के मुताबिक, डब्ल्यूएचओ ने अपनी नवीनतम 2018 की वैश्विक टीबी रिपोर्ट में कहा कि विभिन्न देश 2030 तक इसे समाप्त करने के लिए अब भी कुछ ज्यादा नहीं कर रहे हैं।

डब्ल्यूएचओ ने इसके साथ ही देश व सरकार के 50 प्रमुखों को इस संदर्भ में निर्णायक निर्णय लेने के लिए कहा, जोकि टीबी पर संयुक्त राष्ट्र के पहले उच्च स्तरीय बैठक में संभवत: अगले हफ्ते हिस्सा लेंगे।

रपट में बताया गया है कि पिछले वर्षो में टीबी से मरने वालों की संख्या में कुछ कमी आई है। 2017 में एक अनुमान के मुताबिक 1 करोड़ लोगों को टीबी हुआ और इससे 16 लाख मौतें हुईं, जिसमें 3 लाख एचआईवी -पॉजिटिव लोग भी शामिल हैं। टीबी के नए मामले में 2 प्रतिशत की कमी आई है।

हालांकि टीबी मामले में बिना रिपोर्ट किए (अंडररिपोर्टिग) और बिना रोग-निदान (अंडर-डाइगनोसिस) के मामले एक बड़ी चुनौती बने हुए हैं। 2017 में जिन 1 करोड़ लोगों को टीबी हुआ, उसमें केवल 64 लाख मामले ही आधिकारिक रूप से नेशनल रिपोर्टिग सिस्टम में दर्ज कराए गए, जिसमें से 36 लाख लोगों का या तो इलाज नहीं हुआ या रोग की पहचान हुई लेकिन इसकी रिपोर्ट दर्ज नहीं हुई।

रपट के अनुसार, 2030 तक टीबी समाप्त करने के लक्ष्य को पूरा करने के लिए 2025 तक ट्रीटमेंट कवरेज को बढ़ाकर 64 प्रतिशत से 90 प्रतिशत तक करना होगा।

–आईएएनएस

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स्वास्थ्य

भारतीय युवाओं में तेजी से बढ़ रही है हार्ट अटैक की समस्या

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Heart attack-
प्रतीकात्मक तस्वीर

भारतीय युवाओं में हार्ट अटैक की समस्या बढ़ती जा रही है और यदि इस समस्या पर रोक के उपाय नहीं किए गए तो यह महामारी का रूप अख्तियार कर सकती है।

यह कहना है हृदय रोग विशेषज्ञ और मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल चिकित्सक डॉ. नित्यानंद त्रिपाठी का। डॉ. त्रिपाठी ने आईएएनएस को जारी एक बयान में कहा है, “भारत में हृदय रोग की महामारी को रोकने का एकमात्र तरीका लोगों को शिक्षित करना है, वरना 2020 तक सबसे अधिक मौत हृदय रोग के कारण ही होगी।”

डॉ. त्रिपाठी ने कहा है, “दिल के दौरे का संबंध पहले बुढ़ापे से माना जाता था। लेकिन अब अधिकतर लोग उम्र के दूसरे, तीसरे और चौथे दशक के दौरान ही दिल की बीमारियों से पीड़ित हो रहे हैं। आधुनिक जीवन के बढ़ते तनाव ने युवाओं में दिल की बीमारियों के खतरे पैदा कर दिया है।

हालांकि अनुवांशिक और पारिवारिक इतिहास अब भी सबसे आम और अनियंत्रित जोखिम कारक बना हुआ है, लेकिन युवा पीढ़ी में अधिकतर हृदय रोग का कारण अत्यधिक तनाव और लगातार लंबे समय तक काम करने के साथ-साथ अनियमित नींद पैटर्न है।

धूम्रपान और आराम तलब जीवनशैली भी 20 से 30 साल के आयु वर्ग के लोगों में इसके जोखिम को बढ़ा रही है।” बयान के अनुसार, देश में हृदय अस्पतालों में दो लाख से अधिक ओपन हार्ट सर्जरी की जाती है और इसमें सालाना 25 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है। लेकिन यह सर्जरी केवल तात्कालिक लाभ के लिए होती है।

हृदय रोग के कारण होने वाली मौतों को रोकने के लिए लोगों को हृदय रोग और इसके जोखिम कारकों के बारे में अवगत कराना महत्वपूर्ण है। डॉ. त्रिपाठी के अनुसार, “कोरोनरी हृदय रोग ठीक नहीं हो सकता है, लेकिन इसके इलाज से लक्षणों का प्रबंधन करने, दिल की कार्यप्रणाली में सुधार करने और दिल के दौरे जैसी समस्याओं को कम करने में मदद मिल सकती है। इसके लिए जीवनशैली में परिवर्तन, दवाएं और नॉन-इंवैसिव उपचार शामिल हैं।

अधिक गंभीर मामलों में इंवैसिव और शल्य चिकित्सा उपचार की आवश्यकता होती है।”डॉ. त्रिपाठी ने कहा है, “सभी हृदय रोगियों में समान लक्षण नहीं होते हैं और एंजाइना छाती का दर्द इसका सबसे आम लक्षण नहीं है। कुछ लोगों को अपच की तरह असहज महसूस हो सकता है और कुछ मामलों में गंभीर दर्द, भारीपन या जकड़न हो सकता है।

आमतौर पर दर्द छाती के बीच में महसूस होता है, जो बाहों, गर्दन, जबड़े और यहां तक कि पेट तक फैलता है, और साथ ही धड़कन का बढ़ना और सांस लेने में समस्या होती है।”उन्होंने कहा है, “धमनियां पूरी तरह से अवरुद्ध हो जाती हैं, तो दिल का दौरा पड़ सकता है, जो हृदय की मांसपेशियों को स्थायी नुकसान पहुंचा सकता है। दिल के दौरे में होने वाले दर्द में पसीना आना, चक्कर आना, मतली और सांस लेने में तकलीफ जैसी समस्याएं हो सकती हैं।”

–आईएएनएस

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स्वास्थ्य

सेरिडॉन समेत तीन दवाओं से हटा बैन

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Medicines
प्रतीकात्मक तस्‍वीर

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सेरिडॉन, प्रिट्रान और डार्ट ड्रग्स दवाओं पर लगे बैन को हटा दिया। यह आदेश कोर्ट ने दवा निर्माताओं की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब देने को कहा है।

गौरतलब है, ये सभी दवाएं 328 दवाओं की उस लिस्ट में मौजूद हैंं, जिन्हें पिछले दिनों केन्द्र सरकार ने बैन कर दिया था। केन्द्र सरकार ने एक ही झटके में इन 328 फिक्स डोज कॉम्बीनेशन (एफडीसी) दवाओं की बिक्री पर रोक लगा दी थी। बता दें कि एफडीसी वे दवाएं हैं जो दो या दो से अधिक दवाओं के अवयवों (सॉल्ट) को मिलाकर बनाई जाती हैं। अधिकांश देशों में इन दवाओं के सेवन पर बैन लगा हुआ है।

जानकारी के अनुसार, ड्रग टेक्निकल अडवाइजरी बोर्ड ने इस पर एक कमिटी का गठन किया। कमिटी ने 343 दवाओं पर लगाए गए बैन को जायज ठहराया। इसके साथ ही छह दवाओं के निर्माण और बिक्री के लिए कुछ शर्तें लगा दी। सरकार ने इनमें से 328 दवाओं को बैन किया है। बैन के बाद से ही बाजार से इन दवाओं के बाहर होने का रास्ता साफ हो गया।

बता दें, देश में मौजूदा तमाम स्वास्थ्य संगठन लंबे अर्से से ये दावा करते आ रहे थे कि इन दवाओं के सेवन से मरीजों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ होता है औऱ ये जानलेवा भी साबित हो सकता है। एक ओर जहां अमेरिका, फ्रांस, जापान, जर्मनी और ब्रिटेन समेत अधिकांश देशों में एफडीसी पर बैन लगा है तो वहीं दूसरी ओर भारत सहित कई विकासशील देशों में ये बिकती हैं। देश में महज पुडुचेरी एक ऐसा राज्य है, जिसने एफडीसी पर बैन लगा दिया हैं।

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