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कोई बताएगा कि ‘मुफ़्तख़ोरी’, आख़िर है क्या बला!

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Amit Shah and Kejriwal

दिल्ली विधानसभा के चुनावों में अनेक भ्रष्ट narratives (कथा, कहानी) का बोलाबाला रहा। इनमें से एक है ‘मुफ़्तख़ोरी’ (Freebies)। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने आम आदमी पार्टी पर हमला करने के लिए बिजली-पानी, महिलाओं की बस-यात्रा पर मिलने वाली रियायतों को मुफ़्तख़ोरी बताने का रास्ता चुना। मुफ़्तख़ोरी की बातें ही जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के आन्दोलनरत छात्रों पर भी चस्पाँ की गयीं, क्योंकि उन्हें भी बीजेपी ने अपने विरोधियों के रूप में ही देखा। वैसे तो बीजेपी के दुष्प्रचार को ‘आलसी, गद्दार, तंग-नज़र, राष्ट्रविरोधी दिल्लीवालों’ ने ख़ारिज़ कर दिया, लेकिन मुफ़्तख़ोरी का नारा अभी मरा नहीं है, उसे सुलगाये रखने के लिए तरह-तरह से तेल डाला जा रहा है।

इसीलिए ये सवाल अब भी मौजूँ है कि आख़िर ये मुफ़्तख़ोरी किस बला का नाम है? मुफ़्तख़ोरी, होती क्या है, किसे कहते हैं? इसका मतलब है, ‘निठल्ले या निक्कमे को मिला भोजन या इनाम’। इसके लिए एक मुहावरा भी है, ‘काम के ना काज के, दुश्मन अनाज के’। मुफ़्तख़ोरी में अहसान-फ़रामोशी का भी भाव निहित है। लेकिन ये ‘रिश्वत’ की तरह अपराध नहीं है। मुफ़्तख़ोरी और हरामख़ोरी, एक-दूसरे के पर्याय हैं। लिहाज़ा, यदि जनता से मिले टैक्स को सरकार जनता पर ही खर्च करने का रास्ता चुनती है तो फिर इसे ‘मुफ़्तख़ोरी की सौदेबाज़ी’ के रूप में कैसे पेश किया जा सकता है?

यदि कुतर्क की ख़ातिर ही सही, ये मान लिया जाए कि केजरीवाल के वादे मुफ़्तख़ोरी को बढ़ावा देने वाले हैं तो क्या अब देश को ये समझ लेना चाहिए कि वो दिन दूर नहीं जब मोदी सरकार नोटबन्दी की तर्ज़ पर ‘मुफ़्तबन्दी’ का ऐलान कर देगी? केन्द्र सरकार की तमाम योजनाओं के ज़रिये जनता को दी जाने वाली तरह-तरह की सब्सिडी की सप्लाई का ‘मेन-स्विच ऑफ़’ कर दिया जाएगा? क्योंकि मुफ़्तख़ोरी की जैसी परिभाषा गढ़ी गयी है उस हिसाब से तो हरेक सब्सिडी को मुफ़्तख़ोरी ही समझा जाना चाहिए। तो क्या वो दिन लद जाएँगे जब चुनाव से पहले किसानों से क़र्ज़ माफ़ी का वादा किया जाएगा? क्या किसानों को दो हज़ार रुपये की मुफ़्तख़ोरी वाली किस्तें नहीं मिला करेंगी? खाद पर मुफ़्तख़ोरी वाली सब्सिडी नहीं मिलेगी? किसानों को मुफ़्तख़ोरी वाली रियायती बिजली मिलना बन्द हो जाएगी?

उज्ज्वला योजना का गैस कनेक्शन और सिलेंडर क्या अब पूरे दाम पर ही मिलेगा? आयुष्मान योजना के तहत मिलने वाली पाँच लाख रुपये की मुफ़्तख़ोरी का सिलसिला क्या बन्द हो जाएगा? क्या रेल किराया अब पूरी तरह व्यावसायिक बन जाएगा? क्या प्राइमरी से लेकर उच्च और तकनीकी शिक्षा तक में मिलने वाली रियायतें ख़त्म हो जाएँगी? क्या अब सरकारी अस्पतालों में भी नर्सिंग होम्स की तरह महँगा इलाज़ करवाना पड़ेगा? सस्ते राशन वाली मुफ़्तख़ोरी भी क्या बन्द हो जाएगी? क्या हरेक सड़क अब टोल रोड होगी? क्या प्रधानमंत्री आवास योजना से घर बनाने के लिए मिलने वाली सब्सिडी ख़त्म हो जाएगी? मुफ़्तख़ोरों के लिए क्या शौलाचय बनना बन्द हो जाएँगे? क्या मज़दूरों को पेंशन देने की योजना बन्द हो जाएगी?

दिल्ली का चुनाव जीतने और अपने राजनीतिक विरोधी को ठिकाने लगाने के मंशा से ‘मुफ़्तख़ोरी’ की जैसी परिभाषा बीजेपी ने गढ़ी है, उसके मुताबिक़ तो सरकार की ओर से जन-कल्याण के लिए किया जाने वाला हरेक काम अनैतिक और पतित आचरण के दायरे में आ जाएगा। ख़ुद बीजेपी के चुनावी घोषणापत्र में ऐसे दावों की भरमार है जिनसे ‘मुफ़्तख़ोरी’ का बढ़ावा मिलेगा। तो क्या ये मान लिया जाए कि बीजेपी करे तो रासलीला, केजरीवाल करे तो करेक्टर ढीला? बेशक़, मुफ़्तख़ोरी एक घटिया और अनैतिक आचरण है। लेकिन मुफ़्तख़ोरी को सही ढंग से परिभाषित करना भी ज़रूरी है।

एक सरकारी कर्मचारी को जिस काम के लिए नौकरी मिली है, उस काम को वो करता नहीं और बैठे-ठाले तनख़्वाह पाता है तो ये है मुफ़्तख़ोरी। असली मुफ़्तख़ोरी। यदि वो कर्मचारी अपना काम करने के लिए लोगों से सुविधा शुल्क ऐंठता है तो ये है रिश्वतख़ोरी। जबकि यदि वो सरकारी खर्चों पर कमीशन खाता है तो ये है भ्रष्टाचार। भ्रष्टाचार में रिश्वतख़ोरी के अलावा अमानत में खयानत का गुनाह भी शामिल होता है। लेकिन लोकतंत्र में चुनावी वादों को मुफ़्तख़ोरी, लालच या रिश्वतख़ोरी की तरह नहीं देखा जा सकता। इसीलिए ‘हरेक खाते में 15-15 लाख रुपये’ वाली बात भले ही नामुमकिन चुनावी वादा लगे, लेकिन ये आदर्श चुनाव संहिता का उल्लंघन नहीं है। दिल्ली को पेरिस बना देने का वादा भले ही अविश्वनीय हो, काशी को क्योटो बनाने का वादा भले ही ख़्याली पुलाव हो, सड़क को हेमामालिनी के गाल जैसा बनाने की बात भले ही लंतरानी लगे, लेकिन ये अनैतिक या वर्जित नहीं हो सकती। इसे झाँसा ज़रूर कह सकते हैं।

‘तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा’ का नारा लालच के दायरे में नहीं रखा जा सकता। मुझे वोट देंगे तो मैं मन्दिर बनवा दूँगा, 370 ख़त्म कर दूँगा, तीन तलाक़ ख़त्म कर दूँगा, सीएए लागू करके दिखाऊँगा। क्या इन नारों को पूरा करने में टैक्स भरने वाली जनता की ख़ून-पसीने की रक़म वैसे ही खर्च नहीं होती जैसे मुफ़्त बिजली-पानी, राशन-दवाई वग़ैरह देने पर होती है? तो क्या ये सब बातें भी मुफ़्तख़ोरी के दायरे में आ जाएँगी?

दिल्ली के चुनाव नतीज़ों के बाद चाणक्य के एक नीति-वाक्य को सोशल मीडिया पर दौड़ाया जा रहा है कि ‘जहाँ जनता लालची हो वहाँ ठगों का राज होता है।’ यहाँ चाणक्य को ढाल बनाकर लोगों के बीच लालच की भ्रष्ट परिभाषा ठेली जा रही है, क्योंकि कम समझ रखने वालों पर भ्रष्ट परिभाषाएँ तेज़ी से और भरपूर असर दिखाती हैं। इसीलिए, मुफ़्तख़ोरी के बाद लगे हाथ ये भी समझते चलें कि आख़िर, लालच क्या है? क्यों इसे बुरी बला कहते हैं?

क्या किसी स्पर्धा में स्वर्ण पदक पाने की ख़्वाहिश रखना लालच है? क्या दाम्पत्य में पति-पत्नी का एक-दूसरे के प्रति संवेदनशील होना लालच है? जी नहीं। लेकिन दूसरों की चीज़ छलपूर्वक हथियाने की कामना रखना लालच है। दूसरे के बाग़ में लगे फलों को चुराकर खाना, लालच-प्रेरित अपराध है। साफ़ है कि लालच एक प्रवृत्ति है, जो ग़लत काम की वजह बनती है। इसीलिए यदि बुरे काम से बचना है तो लालच से बचें, क्योंकि यही वो बुरी बला है, जो अपराध की ओर ढकेलती है।

लेकिन लेन-देन लालच नहीं है। सेल भी लालच नहीं है। लालच, उकसावा और प्रोत्साहन, तीनों प्रवृत्तियों में फ़र्क़ है। लालच, नकारात्मक है तो प्रोत्साहन या प्रलोभन सकारात्मक। जबकि उकसावा, उभयनिष्ठ है यानी ये सकारात्मक और नकारात्मक दोनों हो सकती है। इसीलिए लोकतंत्र में चुनावी वादों को लालच या मुफ़्तख़ोरी की तरह पेश नहीं किया जा सकता। अलबत्ता, इन्हें प्रलोभन अवश्य कहा जा सकता है। लुभाना, अशोभनीय आचरण नहीं है। ये मार्केटिंग का अस्त्र है। माँ-बाप यदि अपने बच्चे से कहें कि परीक्षा में अव्वल आये तो तुम्हें साइकिल ख़रीदकर देंगे। ये व्यवहार लालच नहीं है, बल्कि प्रोत्साहन और पुरुस्कार है। इसी तरह चुनावी वादों को पूरा करने के लिए वोट माँगना, किसी दुकान से रुपये के बदले सामान ख़रीदने जैसी सौदेबाज़ी नहीं है। वोट सौदा नहीं है। ये समर्थन है, सहयोग है। इसीलिए इसे माँगा जाता है। जनता इसे दान देती है, इसीलिए इसे मतदान यानी मत या ‘मौन-सहयोग का’ दान कहा गया है। चुनावी वादों का पूरा होना दान का फलित है। जैसे कर्मों का फल मिलता है।

इसीलिए मुफ़्तख़ोरी और लालच जैसे शब्दों को लेकर गुमराह करने वालों से पूछिए कि सबको सस्ती शिक्षा, स्वास्थ्य, राशन, बिजली, पानी वग़ैरह देने की बात करना लालच कैसे है? क्या सरकार का काम जिससे टैक्स ले, उसी पर खर्च करना होना चाहिए या फिर उसका ये दायित्व सही है कि वो जिनसे ज़्यादा ले सकती है, उनसे ज़्यादा ले, लेकिन जब देने की बारी आये तो उन्हें सबसे अधिक प्राथमिकता दे, जिन्हें सबसे ज़्यादा ज़रूरत हो? अरे, यदि कोई स्कूटी, साइकिल, टीवी, प्रेशर कूकर, लैपटॉप, स्कूल-बैग और किताबें बाँटे तो वो लालच नहीं है लेकिन यदि कोई आपके कान में आकर मुफ़्तख़ोरी की भ्रष्ट परिभाषा का मंत्र फूँक दे तो वो लालच हो गया! अफ़सोस है कि हमने अपने दिमाग़ से सोचना-समझना बन्द कर दिया है। मुफ़्तख़ोरी का नगाड़ा बजाने वालों से सवाल ज़रूर पूछिए।

चुनाव

महाराष्ट्र विधान परिषद की 1 सीट पर उपचुनाव टला

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Election Commission

नई दिल्ली: निर्वाचन आयोग ने महाराष्ट्र विधान परिषद की धुले-नंदूरबार स्थानीय प्रशासन सीट का 30 मार्च को प्रस्तावित उपचुनाव कोरोनावायरस के प्रकोप के कारण टाल दिया है।

महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन आयुक्त को लिखे पत्र में ईसीआई ने कहा है, “आयोग ने मामले पर विचार करते हुए महाराष्ट्र में होने वाले उपचुनाव के लिए मतदान और मतगणना की तिथि फिर से निर्धारित करने का निर्णय लिया है।”

30 मार्च को होने वाले उपचुनाव की जरूरत अमरीशभाई रसिकलाल पटेल के इस्तीफे के कारण पड़ी थी।

–आईएएनएस

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चुनाव

निर्वाचन आयोग ने राजस्थान की 3 राज्यसभा सीटों के चुनाव टाले

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ELECTION COMMISSION-min

जयपुर: निर्वाचन आयोग ने राजस्थान में राज्यसभा की तीन सीटों के लिए 26 मार्च को होने वाला चुनाव कोरोनावायरस के कारण टाल दिया है। निर्वाचन आयोग ने मंगलवार को यह जानकारी दी।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस ने इन तीन सीटों के लिए दो-दो उम्मीदवार उतारे हैं।

कांग्रेस ने एआईसीसी महासचिव के.सी. वेणुगोपाल और पीसीसी महासचिव नीरज डंग को उम्मीदवार बनाया है, जबकि भाजपा ने राजेंद्र गहलोत और ओमकार सिंह लाखावत को मैदान में उतारा है।

कोविड-19 महामारी के कारण हाल के दिनों में कोई राजनीतिक गतिविधि नहीं हुई है और भाजपा व कांग्रेस के कार्यालय बंद हैं।

ईसी के निर्णय पर राज्य कांग्रेस के अध्यक्ष और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट ने कहा कि मौजूदा परिस्थिति में चुनाव टालना जरूरी था।

भाजपा की राज्य इकाई के अध्यक्ष सतीश पुनिया ने कहा कि निर्वाचन आयोग ने सही निर्णय लिया है। उन्होंने कहा कि एक जगह पर 200 विधायकों और सैकड़ों स्टॉफ का जुटना खतरे से खाली नहीं है।

–आईएएनएस

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चुनाव

कोरोना वायरस के कारण 26 मार्च को होने वाला राज्यसभा चुनाव स्थगित

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Parliament of India
File Photo

नई दिल्ली, कोरोना वायरस के खतरे के कारण चुनाव आयोग ने राज्यसभा चुनाव स्थगित कर दिया है। सात राज्यों की 18 राज्यसभा सीटों पर 26 मार्च को मतदान होना था। माना जा रहा है कि अब देश में कोरोना वायरस की चुनौती खत्म होने के बाद ही चुनाव की नई तारीख जारी होगी।

बता दें कि 17 राज्यों की कुल 55 राज्यसभा सीटें अप्रैल में खाली हो रहीं थीं। इन सीटों पर 26 मार्च को चुनाव के लिए आयोग ने अधिसूचना जारी की थी। हरियाणा, हिमाचल प्रदेश सहित कई राज्यों की अधिकांश सीटों पर निर्विरोध निर्वाचन हु।

सिर्फ 18 राज्यसभा सीटों पर मतदान के जरिए चुनाव होना था। मगर कोरोना वायरस के कारण सोशल डिस्टैंसिंग यानी सामाजिक दूरी को बेहद जरूरी मानते हुए आयोग ने चुनाव टालने का फैसला किया।

–आईएएनएस

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