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तूतीकोरिन में प्रदर्शनकारियों की मौत से वेदांता पर सवाल

विरोध प्रदर्शन और पुलिस फायरिंग के बाद तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (टीएनपीसीबी) ने तुतीकोरिन में कंपनी की पहली इकाई को संचालित करने की मंजूरी के नवीनीकरण (2018-2023) को यह करते हुए खारिज कर दिया कि उसने निर्धारित शर्तों को पूरा नहीं किया है।

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Tuticorin protestors

चेन्नई, 25 मई (आईएएनएस)| तमिलनाडु के तूतीकोरिन में पुलिस की गोलीबारी में स्टरलाइट कॉपर स्मेल्टिंग प्लांट के खिलाफ विरोध कर रहे 13 प्रदर्शनकारियों की मौत से हालात और बिगड़ गए हैं और इसने स्टरलाइट की मूल कंपनी वेदांता द्वारा पर्यावरण नियमों के उल्लंघनों की ओर ध्यान खींचा है।

वेदांता ने कहा है कि उसने कॉपर स्मेल्टिंग प्लांट में प्रदूषण को लेकर मौजूद नियम-कानूनों का पालन किया है, लेकिन पर्यावरणविदों और अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं ने तूतीकोरिन में बड़े अनसुलझे मुद्दों पर उंगली उठाई है। वे अतीत में कंपनी द्वारा किए गए नियमों के उल्लंघन के कई अन्य उदाहरणों की ओर भी इशारा करते हैं जहां वेदांत शामिल थी।

इस बात पर जोर देते हुए कि 13 लोगों की मौत व्यर्थ नहीं जाएगी, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता नित्यानंद जयरामन ने आईएएनएस को बताया, “पुलिस गोलीबारी में 13 लोगों के विरोध और हत्या से स्टरलाइट कॉपर स्मेल्टर प्लांट (वेदांत लिमिटेड के स्वामित्व वाले) के लिए फिर से काम करना मुश्किल हो जाएगा।”

तूतीकोरिन में व्यापार संघ युवा इकाई के एस. राजा ने आईएएनएस को फोन पर आईएएनएस को बताया, “हमने पहले भी संयंत्रों को बंद होते और फिर से खुलते देखा है। स्थायी रूप से बंद होने की घोषणा तक स्मेल्टर संयंत्र के खिलाफ विरोध प्रदर्शन जारी रहेगा।”

वहीं, मुख्यमंत्री के. पलानीस्वामी कह रहे हैं कि सरकार कॉपर स्मेल्टिंग प्लांट के कामकाज के खिलाफ है। तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने संयंत्र को निर्देश दिया है कि वह उनकी सहमति के बिना उत्पादन या संचालन शुरू न करे। संयंत्र की बिजली आपूर्ति को रोक दिया गया है।

कार्यकर्ताओं और मीडिया रिपोर्टों का कहना है कि कई मामलों में वेदांता ने कई बार कानूनी दिशानिर्देशों को नजरअंदाज किया है। इस सप्ताह ‘द वायर’ ने भी अपनी एक रिपोर्ट में बताया कि कैसे कई वर्षों तक विरोध प्रदर्शनों ने कंपनी पर दबाव बनाया है।

एक समाचार पोर्टल के अनुसार, 2000 से 2010 तक लांजीगढ़ जिले और ओडिशा की नियमगिरी पहाड़ियों में कंपनी की एल्युमिना और बॉक्साइट खनन परिचालन के खिलाफ व्यापक विरोध प्रदर्शन किया और वेदांत की छवि एक बड़े प्रदूषण फैलाने वाले और आदिवासी और मानवाधिकारों के अपराधी के रूप में स्थापित हुई।

‘द वायर’ के अनुसार, इस दस साल की अवधि के दौरान वेदांता ने कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी को राजनीतिक योगदान भी दिया था, जिसे दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा भारत के विदेशी योगदान (विनियमन) अधिनियम का उल्लंघन बताया था।

कंपनी के कारनामों की तेजी से उनकी अनदेखी करना मुश्किल हो गई और न केनल स्थानीय कार्यकर्ताओं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों और संस्थानों ने भी उसकी आलोचना शुरू कर दी थी।

पोर्टल ने कहा कि 2007 में नॉर्वे के सरकारी पेंशन फंड ने ‘पर्यावरण और मानवाधिकार उल्लंघन’ का हवाला देते हुए कंपनी में अपनी हिस्सेदारी को खत्म कर दिया था। इसके तीन साल बाद प्रमुख निवेशकों जैसे चर्च ऑफ इंग्लिैंड जोसेफ रोउनट्री चैरिटेबल ट्रस्ट ने इसी तरह के कारणों से अपने शेयरों को बेच दिया था।

रिपोर्ट के अनुसार, इसी साल भारत के पर्यावरण मंत्रालय ने ओडिशा में वन संबंधिक कानूनों का उल्लंघन करने के लिए इससे ग्रीन क्लीयरेंस छीन लिया था।

समाज में अपनी छवि सुधारने के लिए वेदांता ने अपनी कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी पर काफी पैसा खर्च किया और उसके मालिक अनिल अग्रवाल जो नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार का बड़े समर्थक हैं, उन्होंने सरकार द्वारा शुरू की गई अधिकांश परियोजनाओं से खुद को शामिल कर लिया, जिसमें ‘स्वच्छ भारत’ अभियान भी शामिल है।

इसके साथ ही उन्होंने 30,000 शौचालय बनाने में मदद करने वाली समूह कंपनी के साथ खुद को शामिल किया।

मीडिया के बीच अपनी छवि को अच्छा करने के लिए कंपनी द्वारा चलाए गए अभियान पर व्यापक रूप से ध्यान दिया और इसकी आलोचना भी की गई।

‘द वायर’ के अनुसार, 2016 में लंदन में जयपुर साहित्य महोत्सव के संस्करण को कंपनी द्वारा प्रायोजित किए जाने पर इसके बहिष्कार की मांग उठी थी। सौ से अधिक शिक्षाविदों और लेखकों ने एक अभियान और ‘बायकॉट वेदांता जेएलएफ’ कार्यक्रम शुरू किया। इस अभियान में वेदांता कंपनी के कारण होने वाले प्रदूषण, बीमारी, उत्पीड़न, विस्थापन और गरीबी से पीड़ित कई समुदायों के साथ एकजुटता व्यक्त की गई थी।

तूतीकोरिन में प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उनकी आवाज को पूरी तरह से दबाने के प्रयास किए जा रहे हैं। राजा कहते हैं, “ऐसा लगता है कि पुलिस की गोलीबारी संयंत्र के खिलाफ हो रहे विरोध को दबाने के साथ-साथ तमिलनाडु में अन्य विरोधों प्रदर्शन को रोकने का तरीका है।”

तूतीकोरिन में विरोध प्रदर्शन के 100वें दिन मंगलवार को उस समय उग्र हो गया था, जब पत्थरबाजी और वाहनों में आगजनी के बाद वेदांता समूह के स्टरलाइट तांबा संयंत्र को बंद करने की मांग कर रहे सैकड़ों लोगों के समूह पर पुलिस ने गोलियां चलाई थीं।

पुलिस की गोलीबारी में 11 लोगों की मौत हो गई थी। बुधवार को ताजा गोलीबारी में एक और व्यक्ति की मौत हो गई और एक घायल हुए शख्स ने दम तोड़ दिया, जिससे मृतकों की संख्या बढ़कर 13 हो गई।

राजा से जब आगजनी के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, “इसकी जांच की जानी चाहिए। आगजनी में शामिल लोग संयंत्र के समर्थक भी हो सकते हैं।”

विरोध प्रदर्शन और पुलिस फायरिंग के बाद तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (टीएनपीसीबी) ने तुतीकोरिन में कंपनी की पहली इकाई को संचालित करने की मंजूरी के नवीनीकरण (2018-2023) को यह करते हुए खारिज कर दिया कि उसने निर्धारित शर्तों को पूरा नहीं किया है।

प्रदूषण नियंत्रण मानदंडों के उल्लंघन और अन्य मुद्दों को लेकर कंपनी के संयंत्र विवादों में रहा। 1990 के दशक में जब अन्य भारतीय राज्यों ने संभावित पर्यावरणीय क्षति के आधार पर कंपनी को इनकार कर दिया था, तब ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) सरकार ने इसके निर्माण की अनुमति दी थी।

वर्ष 2013 में सर्वोच्च अदालत ने स्टरलाइट पर तूतीकोरिन में पर्यावरण प्रदूषण के लिए 100 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था।

सामाजिक कार्यकर्ता जयरमन के अनुसार, टीएनपीसीबी और तूतीकोरिन जिला प्रशासन के मार्च 2018 में 15 भूजल के नमूनों के विश्लेषण से पता चला कि सभी जल स्रोत प्रदूषित हो गए और पीने के पानी के लिए मानदंडों का उल्लंघन किया गया था।

इस पर तैयार रिपोर्ट सूचना के अधिकार के तहत सामने आई थीं जबकि तूतीकोरिन जिला प्रशासन ने ग्रामीणों को भूजल के खिलाफ चेतावनी देने के बजाए उसे छुपा लिया था।

उन्होंने यह भी कहा कि, 2008 में तिरुनेलवेली गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज द्वारा किए गए एक अध्ययन में कॉपर स्पेलटर प्लांट के पास रहने वाले ग्रामीणों में मस्कुलोस्केलेटल विकारों के उच्च स्तर पाए गए।

एंटी-स्टरलाइट कॉपर कार्यकर्ता तमिल मंथन ने आईएएनएस को बताया कि लोगों ने इस संयंत्र के पास निवासियों ने कैंसर की घटनाओं के बढ़ने का दावा किया है। राजा के मुताबिक, तूतीकोरिन में सरकारी अस्पताल ने 550 से ज्यादा नए कैंसर के मामलों की सूचना दी थी।

–आईएएनएस

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नीरव तभी फ़ुर्र हुआ, जब नरेन्द्र ने चाहा…!

नरेन्द्र ने नीरव के भारत से फ़ुर्र होने से पहले उसे वो अद्भुत और पौराणिक कवच-कुंडल से भी सुसज्जित किया, जिसे महाभारत काल में सूर्य ने अपने पुत्र कर्ण को दिया था। और, जिसे देवराज इन्द्र ने अपने पुत्र अर्जुन की रक्षा के लिए ब्राह्मण का स्वांग रचकर कर्ण से दान में माँग लिया था।

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diamond trader Nirav Modi

यदि आपको अब भी सन्देह है कि नरेन्द्र मोदी और नीरव मोदी में साँठगाँठ थी या नहीं? जो ज़रा इंटरपोल के ताज़ा ख़ुलासे का मतलब समझ लीजिए। इंटरपोल यानी दुनिया भर के पुलिस विभागों का सामूहिक संगठन। इसने बताया है कि जब पंजाब नैशनल बैंक से 13,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा लूटकर नीरव भाई फ़ुर्र हो गया, तब भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने तेज़ी से और कड़ा फ़ैसला लेकर उसके भारतीय पासपोर्ट का रद्द करने का ऐलान कर दिया। वैसे भी मोदी राज के 48 महीनों में इतने शानदार-शानदार ऐलान हुए हैं, जितना बीते दशकों के सभी ऐलानों को मिलाकर भी नहीं हो पाया!

अब जल्द ही आपको रेडियो पर एक बच्ची की आवाज़ में ये सरकारी विज्ञापन सुनायी देगा कि मोदी जी ने नीरव मोदी को भगाकर वैसे ही बहुत अच्छा काम किया है कि जैसे स्कूलों में शौचालय बने। 48 महीने पहले क्या किसी स्कूल में शौचालय था? संस्कृति मंत्रालय को ये पता लगाने का काम पुरातत्व विभाग को फ़ौरन सौंप देना चाहिए! इसी तरह, कौन नहीं जानता कि उज्ज्वला योजना के तहत ग़रीबों को रसोई गैस के पौने चार करोड़ कनेक्शन बाँटे गये। मोदी राज के इसी प्रयास की बदौलत तो आज देश के 80 फ़ीसदी घरों तक रसोई गैस पहुँच पायी है।

48 महीने में ही देश के हर गाँव में बिजली पहुँचा दी गयी। अब वो रेडियो वाली लड़की तो ये बताने से रही कि मोदी के सत्ता में आने से पहले भारत के 6 लाख से ज़्यादा गाँवों में से 97 फ़ीसदी तक में बिजली पहुँच चुकी थी। इनके नसीब में तो सिर्फ़ 18 हज़ार गाँवों की किस्मत बदलना ही लिखा था। यदि ये नेहरू की जगह प्रधानमंत्री बने होते तो पक्का 26 जनवरी 1950 से पहले भारत का हरेक गाँव बिजली से गुलज़ार होता। प्रथम पंचवर्षीय योजना में ही सभी बेघरों को पक्का मकान दे दिया गया होता। ये मोदी राज के महान ऐलानों का ही प्रताप है कि कल तक जो लोग खाद के लिए लाठियाँ खाते थे, इसकी काली-बाज़ारी झेलते थे, वही अब गोरक्षक और हिन्दू हितों के रहबर बनकर मुसलमानों को ख़ुदागंज पहुँचाते हैं। ये भी 48 महीने की ऐसी शानदार उपलब्धि है, जैसी पिछले दशकों में कभी देखी-सुनी नहीं गयी।

ख़ैर, वापस लौटते हैं, भारत माता के ज़िगर के टुकड़ों नरेन्द्र और नीरव मोदी की ओर। जब से नीरव और उसका मामा मेहुल अपने परिवार और सम्पत्ति समेत भारत से फ़ुर्र हुए हैं, तभी से भक्तों को यक़ीन हो गया कि नरेन्द्र मोदी के रूप में देश को कितना नायाब और अद्भुत चौकीदार मिला है! इतिहास में शायद ही पहले कभी ऐसा हुआ हो किसी चौकीदार की पैनी निग़ाहों के सामने से कोई बैंक को लूटकर निकल जाए और उसे हवा तक ना लगे! कहावत है, ‘दाई से क्या पेट छिपाना!’ जब ईमानदारी के मसीहा के रूप में ‘दाई’ की निग़ाहें जनता की पाई-पाई की हिफ़ाज़त कर रही हो तो सिर्फ़ वही भ्रष्टाचारी बच सकता है, जिसे वो बचाना चाहे! नरेन्द्र मोदी का मतलब ही है, ‘जाको राखे साईयाँ मार सके ना कोय!’ वर्ना, क्या कोई ये कल्पना भी कर सकता कि नरेन्द्र से ज़्यादा शातिर नीरव रहा होगा। हर्ग़िज़ नहीं। लिहाज़ा, नीरव तभी फ़ुर्र हो सका, जब नरेन्द्र ने चाहा!

ये नरेन्द्र की ही चाहत थी कि नीरव के पासपोर्ट को रद्द करने का ऐलान तो विदेश मंत्रालय कर दे। लेकिन वास्तव में पासपोर्ट रद्द नहीं किया जाय। वक़्त आने पर नरेन्द्र मोदी या अमित शाह का ये बयान भी आपकी कानों में गूँज सकता है कि नीरव का पासपोर्ट रद्द नहीं किया गया क्योंकि कश्मीर समस्या के लिए नेहरू ज़िम्मेदार है। ज़रा सोचिए कि यदि वास्तव में ‘मोदी-रत्न’ नीरव भाई का पासपोर्ट रद्द हुआ होता तो उस बेचारे को एक देश से दूसरे देश में जाने-आने में कितनी दिक्कत होती! इसीलिए विदेश मंत्रालय से कहा गया कि वो गाना गाता रहे कि उसने नीरव का पासपोर्ट 24 फरवरी को रद्द कर दिया।

यदि वास्तव में पासपोर्ट रद्द हो जाता तो भारत के सम्मानित नागरिक के रूप में नीरव मोदी, मार्च में ही तीन महाद्वीपों; अमेरिका, यूरोप (लन्दन) और एशिया (हाँगकाँग) की परिक्रमा कैसे कर पाता! विश्व-गुरु की ये अनोखी सन्तान, तीनों महाद्वीपों में दस्तक देकर वहाँ की माटी को कैसे पवित्र कर पाती! इसीलिए जगत के कल्याणकर्ता नीरव मोदी को लन्दन में स्थायी अतिथि बनाने या फिर उसे इंग्लैंड की नागरिकता दिलवाने के लिए भी माननीय ‘मोटा भाई’ ने अपना पूरा आशीर्वाद उड़ेल दिया। करूणानिधान नरेन्द्र भाई ने ऐसा ही कल्याण ललित मोदी और विजय माल्या जैसे भारत माता के सच्चे सपूतों के लिए भी किया था। दरअसल, मोदी जी से अमीरों और लुटेरों की तकलीफ़ें देखी नहीं जातीं! उनका मानना है कि विश्व-शान्ति के लिए जितना ज़रूरी विश्व-भ्रमण है, उतनी ही ज़रूरी धर्म की रखा करना भी है। कौन नहीं जानता है कि नीरव-मेहुल-माल्या-ललित जैसी विभूतियों ने ही तो सनातनियों की धर्म-ध्वजा थाम रखी है!

तभी तो नरेन्द्र ने नीरव के भारत से फ़ुर्र होने से पहले उसे वो अद्भुत और पौराणिक कवच-कुंडल से भी सुसज्जित किया, जिसे महाभारत काल में सूर्य ने अपने पुत्र कर्ण को दिया था। और, जिसे देवराज इन्द्र ने अपने पुत्र अर्जुन की रक्षा के लिए ब्राह्मण का स्वांग रचकर कर्ण से दान में माँग लिया था। हालाँकि, निश्चित रूप से वो दान की आड़ में छलपूर्वक हड़पने जैसा ही काम था। तब भी इन्द्र के छल को कर्ण ने बख़ूबी भाँप लिया था। फिर भी वो दान देने से पीछे नहीं हटे और इतिहास में ‘दानवीर कर्ण’ के नाम से अमर हो गये। हिन्दुओं के देवताओं में इन्द्र के टक्कर का छलिया कोई और नहीं हुआ। उसी ने छलपूर्वक देवी अहिल्या का सतीत्व नष्ट किया। राम के उद्धार करने के बाद से वही देवी अहिल्या आज भारत माता के रूप में ‘शस्य, श्यामलां, मातरम्’ के रूप में विद्यमान है। जबकि पौराणिक देवराज इन्द्र ही अब कलियुग में नर रूपी इन्द्र यानी नरेन्द्र है। 2014 से इसी नर रूपी देवता के प्रति भक्तों की अलौकिक आसक्ति से आर्यावर्त धन्य हो रहा है!

ग़नीमत है कि 2019 में ये विलक्षण नक्षत्र, इतिहास के काले पन्नों में दफ़्न हो जाएगा! आमीन!

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शिगूफ़ा ही साबित होगी ‘नौकरशाही में सीधी भर्ती!’

इस फ़ैसले से संघियों ने एक ही तीर से कई निशाना साधा है। पहला, नौकरशाही को उसकी औक़ात दिखाना। दूसरा, पिछले दरवाज़े से आरक्षण को मिटाना। तीसरा, अपने अधकचरे और दिग्भ्रमित चहेतों को निहाल करना। लेकिन बदकिस्मती से संघियों को किसी भी मक़सद में सफलता नहीं मिल सकती।

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Narendra Modi

यदि आपका मक़सद ही असली मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने का हो, तो आपके आये-दिन नये-नये शिगूफ़ों को फेंकने के अलावा और कोई रास्ता नहीं हो सकता! यदि आप सिरे से नाक़ाबिल हों, यदि आपकी तमाम नीतियाँ महज ढोल का पोल हों, तो आपकी लम्बी-लम्बी छोड़ने और तरह-तरह की नौटंकियों से जनता को बरग़लाने के सिवाय और कोई रास्ता नहीं हो सकता! दुनिया के सबसे बड़े ढपोरशंखी और सबसे महँगे चौकीदार को ये ब्रह्म सत्य अच्छी तरह से पता है। इसीलिए शिगूफ़ेबाज़ी, जुमलेबाज़ी और नौटंकीबाज़ी के क्षेत्र में उन्हें कोई चुनौती नहीं मिल सकती। बीते चार साल के दौरान नरेन्द्र मोदी की ऐसी उपलब्धियों में रही-सही कसर की भरपाई अन्ध-भक्तों की भगवा मंडली बख़ूबी की है। शिगूफ़ेबाज़ी वाले मोदी की धारावाहिक की ताज़ा कड़ी नौकरशाही में संयुक्त सचिव जैसे उच्च स्तर पर सीधी भर्ती करने का फ़ैसला है।

इस फ़ैसले से संघियों ने एक ही तीर से कई निशाना साधा है। पहला, नौकरशाही को उसकी औक़ात दिखाना। दूसरा, पिछले दरवाज़े से आरक्षण को मिटाना। तीसरा, अपने अधकचरे और दिग्भ्रमित चहेतों को निहाल करना। लेकिन बदकिस्मती से संघियों को किसी भी मक़सद में सफलता नहीं मिल सकती। उल्टा, 2019 के चुनावों में नौकरशाही इन्हें इनकी औक़ात दिखा देगी। क्योंकि, बेताज बादशाह के रूप में देश का सबसे अधिक अहित करने वाली नौकरशाहों की जमात को कभी ये बात हज़म नहीं हो सकती कि कोई उनकी हस्ती को कमतर बनाकर निकल ले!

भारत की नौकरशाही बुनियादी तौर पर सामन्तवादी है। अँग्रेज़ों के जाने के बाद भी इसने उनकी हरेक बुराई को क़ायम रखा। हमारी नौकरशाही देश का सबसे संगठित शोषणकर्ता है। नेताओं को तो फिर भी जनता पाँच साल में बदल सकती है, लेकिन अफ़सर तो ज़िन्दगी भर के लिए सरकार के दामाद बनकर जीने का पट्टा लिखाकर नौकरी में आते हैं। इनकी सबसे बड़ी विशेषता किसी भी काम में अड़ंगा लगाने और उसे लटकाने की होती है। सही लोगों को परेशान करने और ग़लत लोगों को सारे सुख देने में इन्हें महारत हासिल होती है। क्योंकि ऐसा करके ही भ्रष्टाचारी बने रहते हैं। ये देश के सबसे शिक्षित, होशियार और ख़ुदगर्ज़ लोगों का सबसे छोटा समुदाय है। इनके भाईचारे जैसी मिसाल मिलना मुश्किल है। हरेक अफ़सर एक-दूसरे को यूँ ही नहीं बचाता रहता है!

हमारे सिविल सरवेंट्स को अपने ही कॉडर का प्रमोटी अफ़सर तो विजातीय लगता है। उसे ये दोयम दर्जे का तथा निकृष्ट प्राणी मानते हैं। आईएएस तो ख़ुद को भारतीय अवतार सर्विस का सदस्य मानते हैं। इन्हें सिखाया जाता है कि भारत में काबलियत के इकलौते ठेकेदार सिर्फ़ यही हैं। इनकी ये दृढ़ धारणा होती है कि ये सर्वज्ञ हैं! हर विधा के विशेषज्ञ हैं! हरेक विभाग या मंत्रालय का कर्णधार बनने की नैसर्गिक प्रतिभा सिर्फ़ इन्हीं में है। लिहाज़ा, सभी तरह के शीर्ष पदों का दावेदार इनके अलावा और कोई नहीं हो सकता। अब मोदी सरकार ने नौकरशाहों के ऐसे ही अभेद्य क़िले में सेंधमारी की नीति अपनाने का फ़ैसला किया है। लेकिन गाँठ बाँध लीजिए कि महज दस लोगों की संयुक्त सचिव के स्तर पर सीधी भर्ती से सरकार का कोई भला नहीं होगा।

नौकरशाही इस प्रयोग को कभी सफल नहीं होने देगी। बाहर से नियुक्त होने वालों पर राजनीतिक पसन्द का ठप्पा लगाया जाना स्वाभाविक है। ऐसे लोगों को घाघ नौकरशाह अपने विजिलेंस, ऑडिट, छापा, हनी-ट्रैप वग़ैरह से डराएँगे और फँसवाएँगे। क्योंकि यदि मोदी सरकार का ये प्रयोग विफल नहीं हुआ तो कालान्तर में इसी हथकंडे से नौकरशाही की सारी तरस्वीर बदली जा सकती है। सीनियॉरिटी को अपना सबसे बड़ा सुरक्षा कवच और हथियार समझने वाले अफ़सर ये कैसे बर्दाश्त करेंगे कि निजी, कॉरपोरेट, विदेश या तकनीकी संस्थाओं से विशेषज्ञता हासिल करने वाले लोगों के मातहत वो काम कर लेंगे।

लैटरल इंट्री या ‘तिर्यक भर्ती’ वाला ये तरीक़ा इसलिए भी फ़ेल होगा क्योंकि ये नियुक्ति स्थायी नहीं बल्कि अल्पकालिक होगी। इसकी मियाद को तीन से पाँच साल तक रखने का प्रस्ताव है। सरकारी बाबू तो उन लोगों को भी महत्वहीन मानते हैं जो अन्य विभागों से डेपुटेशन या प्रतिनियुक्ति पर आते हैं। ऐसे में उन्हें कौन पूछेगा जो हमेशा इस मुग़ालते में ही रहेंगे कि वो सरकारी गधे नहीं, बल्कि उम्दा नस्ल वाले अरबी घोड़े हैं। घोड़ों का लाया जाएगा, दौड़ने के लिए। लेकिन उन्हें सरकारी ढर्रे और नियम-क़ायदों के जाल में उलझाकर रखा जाएगा। ताकि वो ठीक से दौड़ ही ना सकें। वैसे यदि कोई घोड़ा, खूँटा तोड़कर दौड़ने में कामयाब भी हो गया तो उसे आगे खड़ी गधों की फ़ौज घेर लेगी। इससे थोड़े वक़्त बाद ही घोड़े की सारी तेज़ी ग़ायब हो जाएगी।

अगला तकनीकी मुद्दा आरक्षण को लेकर फँसेगा। प्रस्तावित नियुक्तियों पर कोटे का कोई असर नहीं होगा। ये निश्चित रूप से संविधान के ख़िलाफ़ होगा। लिहाज़ा, देर-सबेर ऐसी नियुक्ति को या तो अदालत में चुनौती दी जाएगी या फिर समाज में ये प्रचार किया जाएगा कि मोदी सरकार पिछले दरवाज़े से आरक्षण को प्रभावहीन बना रही है। आज संयुक्त सचिव जैसे पदों पर चहेतों की सीधी भर्ती हो रही है, तो कल बाकी पर क्यों नहीं होगी! सरकार लाख सफ़ाई देगी, लेकिन आरक्षण के लाभार्थियों को उसकी बात पर यक़ीन नहीं होगा। दूसरी ओर, आरक्षण के संवैधानिक प्रावधानों से नफ़रत करने वालों के बीच फ़ैलाया जाएगा कि देखो-देखो, मोदी जी ने कैसे आरक्षण को ख़त्म करना शुरू कर दिया है! सवर्ण हिन्दू इससे ख़ुश हो जाएँगे। इसका सियासी फ़ायदा हो सकता है तो नुक़सान भी! लिहाज़ा, राजनीतिक तौर पर ये सौदा बेहद ख़तरनाक साबित हो सकता है।

उधर, वो लोग भी भारी दुविधा में रहेंगे तो ऐसे पदों पर नियुक्ति पाना चाहेंगे। क्योंकि सरकारी ताम-झाम, गाड़ी-बंगला, नौकर-चाकर, फ़ोन, मुफ़्त यात्रा वगैरह तो उन्हें मिल जाएँगे, लेकिन सरकारी की कार्यशैली उन्हें कभी रास नहीं आएगी। यूपीएससी के ज़रिये नियुक्ति पाने वाले अफ़सर जहाँ ज़िन्दगी भर पेंशन और मुफ़्त मेडिकल सुविधा वग़ैरह के हक़दार होते हैं, वहीं तिर्यक भर्ती वाले अल्पकालिक अफ़सरों को ये सुख नहीं मिलेगा। उनका सरकारी वेतन-भत्ता भी कॉरपोरेट की बराबरी शायद ही कर पाये। कुलमिलाकर, बाहर से आने वाले को शायद ही कुछ ऐसा मिले जिससे उन्हें लगे कि नेताओं और बड़े अफ़सरों की जी-हुज़ूरी वाली भूमिका में आने का उनका फ़ैसला सही था!

सरकारी ढर्रे में भी क़ाबलियत की अहमियत होती है। लेकिन बेहद कम। सरकार का सिर बहुत भारी और बड़ा होता है। वहाँ फ़ैसले लेने और उसे लागू करने का अपना ही ढर्रा होता है। वहाँ हज़ार रुपये का काम करवाने की प्रक्रिया भी वैसी ही होती है, जैसे अरबों-ख़बरों के मामले में होता है। अफ़सरों का सारा कौशल काग़ज़ का पेट भरने में नज़र आता है, लक्ष्य को यथाशीघ्र हासिल करना उनकी मानसिकता में ही नहीं होता। वहाँ का तो सूक्ति वाक्य ही होता है, ‘आज करे सो कल कर, कल करे सो परसो। इतनी जल्दी क्या है जब उम्र पड़ी हो बरसों!’ सरकारी तंत्र में ज़्यादातर लोग भ्रष्ट और बेईमान हैं। धीरे-धीरे वो सबको अपने जैसा ही समझने लगते हैं। जो उनके जैसा नहीं होता, उसे भी वो अपने जैसा बना डालते हैं।

सरकारी लोगों की महिमा हमेशा अपरम्पार रहती है। उनकी सेहत पर इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि सरकार को कितना घाटा या फ़ायदा हो रहा है! जबकि ग़ैर-सरकारी क्षेत्र के लोगों को हमेशा नफ़ा-नुक़सान का ख़्याल रखना होता है। यही ग़ैर-सरकारी क्षेत्र में रोज़गार और तरक्की की सबसे बड़ी और पहली शर्त होती है। इसके बावजूद, कई बार राजनीति में विशेषज्ञता वाले लोगों को बाहर से लाया जाता रहा है। लेकिन वो तभी सरकारी भँवर में टिक पाते हैं, जब उनके सिर पर देश की कुछ बड़ा कर दिखाने की चाहत सवार हो। कई बार सियासी जमात में बैठे लोग उन्हें देशहित और जनहित में अपना योगदान करने के लिए प्रेरित करने में सफल हो जाते हैं।

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ऐसे ही व्यक्तियों में अग्रणी हैं, जो राजनीति में विशुद्ध रूप से जनसेवा के इरादे से आये। इसी तरह आधार के जनक नन्दन निलेकणी भी जब केन्द्रीय मंत्री बनाये गये तब वो अपने आप में बेहद सम्पन्न थे। यही हाल सैप पेत्रोदा का भी रहा है। लेकिन इन लोगों की बराबरी उन दर्जन भर पूर्व नौकरशाहों से नहीं हो सकती, जो फ़िलहाल मोदी में मंत्री पद या अन्य शीर्ष स्थानों पर मौजूद हैं। मोदी राज में उन पूर्व नौकरशाहों की पौ-बारह है, जो सत्ता सुख लेने के लिए अपनी सियासी विचारधारा को परवान चढ़ाने के लिए सरकार में विराजमान हुए। इन्हीं की देखा-देखी संघ के विचारों से प्रेरित लोगों को अन्य क्षेत्रों से लाकर उन्हें सरकार के काम में लगाने का मंसूबा ही ‘तिर्यक भर्ती नीति’ का असली उद्देश्य है। लेकिन उपरोक्त जलिटताओं की वजह से ये प्रयोग कभी सफल नहीं हो सकता। देख लीजिएगा।

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FIFA World Cup : 11 शहरो में स्थित 12 स्टेडियमों में होंगे 64 मुकाबले

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FIFA World Cup 2018

नई दिल्ली, 12 जून | फीफा विश्व कप-2018 में बड़ी टीमों के बीच खेले जाने वाले मुकाबले जितने खास होते हैं उतने ही खास होते हैं वो स्टेडियम, जिनमें ये मुकाबले खेले जाते हैं।

रूस में 14 जून से शुरू हो रहे फीफा विश्व कप के मैच 11 शहरों के 12 स्टेडियमों में खेले जाएंगे और ये 12 स्टेडियम अपने आप में ही खास हैं।

इन 12 स्टेडियमों में फीफा विश्व कप में 64 मैच खेले जाने हैं। इसमें सबसे खास है लुज्निकी स्टेडियम, जिसमें फीफा विश्व कप का पहला और फाइनल मैच खेला जाएगा।

1. लुज्निकी स्टेडियम :

1956 में निर्मित हुआ यह स्टेडियम रूस की राजधानी मॉस्को में मोस्कवा नदी के किनारे स्थित है। पहले इसका नाम सेंट्रल लेनिन था। 450 दिन में बनकर तैयार हुआ यह स्टेडियम 1980 मॉस्को ओलम्पिक खेलों का मुख्य केंद्र था। 1990 में इसका पुन: निर्माण किया गया और इसके बाद इसका नाम लुज्निकी रखा गया।

इसमें 1999 में यूईएफए फाइनल और 2008 में चैम्पियंस लीग फाइनल मैच हुआ और ऐसे में यह स्टेडियम कई यादें संजोए बैठा है। 2018 में मरम्मत के दौरान इसके स्टैंडों को दो टायरों में विभाजित किया गया। इसमें ग्रुप मैचों के अलावा, नॉकआउट, सेमीफाइनल-2 और फाइनल मैच खेला जाएगा।

2. स्पार्ताक स्टेडियम :

मॉस्को शहर में ही स्थित 2014 में निर्मित स्पार्ताक स्टेडियम में 43,298 प्रशंसक एक समय पर बैठ सकते हैं। यह स्पार्ताक मॉस्को क्लब का घरेलू मैदान है। चेनमेल से सजा हुआ यह स्टेडियम बाहर से स्पार्ताक क्लब के लाल और सफेद रंग से रंगा हुआ है। हालांकि, इन रंगों को स्टेडियम में खेलने वाली टीमों के मुताबिक बदला भी जा सकता है। इसमें ग्रुप मैचों के अलावा, नॉकआउट का मैच भी खेला जाएगा।

3. निजनी नोवगोरोड स्टेडियम :

नीले रंग में रंगा यह गोलाकार स्टेडियम निजनी नोवगोरोड शहर में स्थित है। वोल्गा क्षेत्र में प्रकृति से प्रेरित इस स्टेडियम एक समय पर 45,331 एक साथ लाइव मैच देख सकते हैं। यह हवा और पानी अस्तित्व को दर्शाता है। 2015 में इसका निर्माण हुआ था। इसमें ग्रुप स्तर के अलावा, अंतिम-16 दौर के साथ क्वार्टर फाइनल-1 का मैच भी खेला जाएगा।

4. मोडरेविया एरीना :

नारंगी, सफेद और लाल रंग से सजा सरांस्क में स्थित मोडरेविया एरीना स्टेडियम का मैदान 2010 में खराब हो गया था। फंड में कमी के कारण इसके निर्माण में देरी हुई और इसीलिए, यह 2017 के अंत तक पूरी तरह से बनकर तैयार नहीं हो पाया था। इसमें अभी 45,000 प्रशंसकों के बैठने की क्षमता है, लेकिन फीफा विश्व कप के बाद इसके अपर टायर को हटा दिया जाएगा। ऐसे में कुल 28,000 लोग ही इसमें बैठ पाएंगे। इसमें केवल ग्रुप स्तर के मैच होंगे।

5. कजान एरीना :

कजान शहर में स्थित इस स्टेडियम का निर्माण वास्तुकारों ने किया है, जिन्होंने वेम्ब्ले और एमिरात स्टेडियमों का निर्माण किया। जुलाई, 2013 में बनकर तैयार हुए इस स्टेडियम में 44,779 दर्शक बैठ सकते हैं। यह स्थानीय लोगों की संस्कृति को दर्शाता है। इसमें ग्रुप स्तर के साथ-साथ अंतिम-16 दौर और क्वार्टर फाइनल-2 के मैच खेले जाएंगे।

6. समारान एरीना (कॉसमोस):

समारा शहर के प्रसिद्ध एयरोस्पेस क्षेत्र को प्रतिबिंबित करने के लिए इस स्टेडियम को अंतरिक्ष यान के रूपरंग में बनाया गया है। विश्व कप के समापन के बाद इसका नाम बदलकर कॉसमोस एरीना रखा जाएगा। ग्रुप मैचों के अलावा, इसमें नॉकआउट और चौथा क्वार्टर फाइनल मैच खेला जाएगा।

7. एकातेरीना स्टेडियम :

रूस के चौथे सबसे बड़े शहर एकातेरिनबर्ग में स्थित यह स्टेडियम को 1953 में बनाया गया था। इसके बाद, 2007 और 2011 में इसका पुन:निर्माण किया गया। 35,000 लोग इसमें एक समय पर बैठकर लाइव मैच देख सकते हैं। विश्व कप के बाद इसकी 12,000 अस्थायी सीटों को हटा दिया जाएगा, जिसके बाद इसमें केवल 23,000 लोग ही बैठ पाएंगे। इसमें ग्रुप मैच ही खेले जाएंगे।

8. सेंट पीटर्सबर्ग स्टेडियम :

साल 2007 में इसके मैदान को तोड़कर फिर से नया बनाया गया था, जो 2009 में तैयार होना था। हालांकि, कई बार देरी होने के बाद यह 2017 में बनकर तैयार हुआ। 68,134 सीटों वाला नीले रंग में ढका यह स्टेडियम विश्व के तकनीकी रूप से उन्नत बेहतरीन स्टेडियमों में से एक है। ग्रुप के अलावा, इसमें फीफा नॉकआउट और सेमीफाइनल-1 का मैच खेला जाएगा।

9. कालिनिग्रेड स्टेडियम :

बाल्टिक सागर के पास स्थित कालिनिग्रेड शहर का यह स्टेडियम बायर्न म्यूनिख क्लब के एलियांज एरीना के डिजाइन पर आधारित है। 35,000 सीटों वाला यह स्टेडियम फीफा विश्व कप के ग्रुप स्तर के मैच आयोजित करेगा। इस टूर्नामेंट के बाद स्टेडियम की 10,000 सीटों को हटा दिया जाएगा।

10. वोल्गोग्राड स्टेडियम :

वोल्गा नदी के पास वोल्गोग्राड शहर में स्थित 45,568 सीटों वाला यह स्टेडियम की छत का निर्माण साइकिल के पहियों के डिजाइन की तरह किया गया है। यह छोठे शंकु के उल्टे आकार पर आधारित होकर बनाया गया है। इसमें विश्व कप के ग्रुप स्तर के मैच होंगे और इसके बाद यह रोटोर वोल्गोग्राड का घरेलू मैदान बन जाएगा।

11. रोस्तोव एरीना :

रोस्तोव-ऑना-डॉन शहर में स्थित इस स्टेडियम का निर्माण 2013 में शुरु हुआ था, जिसमें देरी होती गई और 2018 के शुरुआत में बनकर तैयार हुआ। इसमें 45,145 लोग बैठ सकते हैं। ग्रुप स्तर के साथ इसमें नॉकआउट का एक मैच खेला जाएगा।

12. फिश्ट स्टेडियम :

सोचि शहर का यह स्टेडियम की छत दो भागों में बटी है, जो बर्फीले पहाड़ों के आकार को दर्शाती है। इसका नाम माउंट फिश्ट पहाड़ी के नाम पर रखा गया है। इसमें फीफा विश्व कप के ग्रुप मैचों के अलावा, नॉकआउट और तीसरा क्वार्टर फाइनल मैच खेला जाएगा। 47,700 लोग एक साथ बैठक लाइव मैच का आनंद ले सकते हैं।

–आईएएनएस

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