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जानकारी ही बचाव है: क्या है कोरोना का स्टेज – 1-2-3…?

वुहान और चीन को भी कोरोना की स्टेज के बारे में जानने में वक़्त लगा। यही हाल दुनिया के तमाम देशों का भी रहा। भारत को प्रकृति ने औरों के अनुभव से सीखने का बहुत मौका दिया।

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भारत में कोरोना का पहला मामला 30 जनवरी 2020 को सामने आया। जबकि चीन के वुहान महानगर में कोराना ने नवम्बर 2019 के दूसरे सप्ताह ने अवतार लिया। लेकिन 31 दिसम्बर तक कोरोना दूसरे स्टेज में पहुँच चुका था, क्योंकि उस दिन अचानक शहर के अस्पतालों में दर्ज़नों लोग एक-एक करके निमोनिया जैसे लक्षणों की शिकायत के साथ जा पहुँचे। तब डॉक्टरों का शक़ किसी नये वायरस के हमले की ओर गया। 7 जनवरी तक चीनी वैज्ञानिकों ने तय कर दिया कि कोरोना वायरस के परिवार में एक नये सदस्य ने अवतार ले लिया है। इसकी पहचान के लिए WHO से भी मदद माँगी गयी। उसने भी इसे अवतार ही पाया और COVID-19 का नाम दिया। हालाँकि, आम बोलचाल में इसे कोरोना वायरस ही कहा जा रहा है।

वुहान और चीन को भी कोरोना की स्टेज के बारे में जानने में वक़्त लगा। यही हाल दुनिया के तमाम देशों का भी रहा। भारत को प्रकृति ने औरों के अनुभव से सीखने का बहुत मौका दिया। वो बात अलग है कि हमने जागने में क़रीब हफ़्ते भर की देरी कर दी। Social Distancing और Total Lock Down का आख़िरी विकल्प हमने तब अपनाया जब हमारे कई शहरों में कोरोना स्टेज-2 की सीमाओं को तोड़ चुका था।

हालाँकि, ये हमारी ख़ुशकिस्मती है कि आज भी भारत का बहुत बड़ा हिस्सा कोरोना से अछूता है या अभी स्टेज-1 और स्टेज-2 में ही है। इसीलिए देश के कुल 732 में से अभी 75 ज़िलों में ही Total Lock-down या ‘जनता कर्फ़्यू’ को लागू किया गया है। यदि इससे कोरोना के संक्रमितों की संख्या की वृद्धि दर में कमी आने लगी तो ठीक, वर्ना पूरे देश को तब Total Lock-down करने की नौबत आ सकती है, जब तक संक्रमितों की संख्या पर काबू नहीं पा लिया जाता। अब बात कोरोना के स्टेजेज़ की।

कोरोना की पहली स्टेज

प्रशान्त विदेश से आया। एयरपोर्ट पर उसे बुखार नहीं था। इसलिए वहाँ यह शपथपत्र भरवाकर उसे घर जाने दिया गया कि वो अगले 14 दिन तक अपने घर में ही रहेगा। किसी से भी मेल-मिलाप नहीं करेगा और बुख़ार आदि आने पर फ़ौरन हेल्पलाइन नम्बर पर सम्पर्क करेगा। प्रशान्त ने शपथपत्र की शर्तों को सख़्ती से निभाया। परिवार के सदस्यों से भी दूरी बनाये रखी।

दो दिन बाद प्रशान्त की माँ ने कहा, “अरे! तुझे कुछ नहीं हुआ। अलग-थलग मत रह। इतने दिन बाद घर का खाना मिलेगा तुझे, आजा किचिन में… मैं गरम-गरम परोस देती हूँ।”

प्रशान्त ने मना कर दिया।

अगली सुबह भी माँ ने वही बातें दोहराईं। लेकिन प्रशान्त इस बार भी अडिग रहा । माँ बुरा भी मान गयीं। लेकिन प्रशान्त सबसे अलग-थलग ही रहता रहा। इत्तेफ़ाक से 6-7वें दिन उसे बुख़ार, सर्दी-खाँसी जैसे लक्षण आने लगे। प्रशान्त ने फ़ौरन हेल्पलाइन से सम्पर्क किया। उसका कोरोना टेस्ट पॉजिटिव निकला। जबकि परिवार के बाक़ी सदस्यों के टेस्ट नेगेटिव निकले।

प्रशान्त के घर के आस-पड़ोस में एक किलोमीटर के दायरे में कई लोगों की एहतियान औचक जाँच भी हुई। हालाँकि, सबने बताया था कि किसी ने प्रशान्त को विदेश से आने के बाद बाहर निकलते नहीं देखा। प्रशान्त ने ख़ुद को सही ढंग से आइसोलेट किया इसीलिए उसने किसी और में कोरोना नहीं फैलाया। प्रशान्त जवान था। कोरोना के लक्षण फ़्लू वाले आम वायरलों की तरह ही थे। लिहाज़ा, हफ़्ते भर के उपचार के बाद वो बिल्कुल स्वस्थ होकर अस्पताल से घर आ गया। अब माँ शुक्र मनाती हैं कि प्रशान्त की सूझ-बूझ से पूरा भर कोरोना से बच गया।

यही है पहली स्टेज, जहाँ कोरोना विदेश से भारत तो आ गया लेकिन आगे नहीं फैल पाया।

कोरोना की दूसरी स्टेज

ज्योत्सना की तबीयत बिगड़ी तो अस्पताल गयी। कोरोना जाँच पॉजिटिव निकली। वो या उसके परिवार में कोई विदेश से नहीं आया था। लेकिन पाँच दिन पहले वो जिस ज्वेलर्स की दुकान पर गयी थी, उसके लाला जी एक दिन पहले ही विदेश घूमकर लौटे थे। बुखार नहीं होने पर उनसे भी शपथपत्र भरवाकर सभी ज़रूरी हिदायतों के साथ उन्हें घर जाने दिया गया।

लाला जी ने इसे फ़ालतू वाली सरकारी क़वायद समझा। घर पहुँचकर सबसे ख़ूब गर्मजोशी से मिले। सबसे साथ खाना-पीना हुआ और अगली सुबह अपनी ज्वेलरी की दुकान जा पहुँचे। पाँच दिन बाद सबसे पहले लाला जी की बूढ़ी माँ की तबीयत बिगड़ी। फिर एक-एक करके पूरा घर बीमार पड़ गया। जाँच में सभी कोरोना पॉजिटिव पाये गये। तहक़ीकात में पता चला कि विदेश से लौटने के बाद लाला जी कम से कम 450 लोगों के सम्पर्क में आये। जैसे दुकान के कर्मचारी, ग्राहक और आस-पड़ोस के लोग। अब इन सभी को ढूँढ़कर ये पता लगाया जा रहा है कि वो लाला जी की दुकान के बाहर किन-किन लोगों के सम्पर्क में आये।

यही है कोरोना वायरस के संक्रमण की दूसरी स्टेज। इसमें सफलतापूर्वक ये पता लगाना पड़ता है कि कोराना के संक्रमण की आशंका वाले 450 लोग बीते छह-सात दिनों में कितने हज़ार लोगों के सम्पर्क में आये और इनमें से कितने लोग आख़िरकार संक्रमित हुए और कितने नहीं?

कोरोना की तीसरी स्टेज

गिरधारी लाल अस्पताल में भर्ती है। वो रेलवे स्टेशन का कुली है और कभी विदेश नहीं गया। लेकिन जाँच में कोरोना पॉजिटिव पाया गया है। ज़ाहिर है कि गिरधारी ऐसे किसी व्यक्ति के सम्पर्क में आया होगा जो कोराना का कैरियर था। ये कैरियर कौन था, कहाँ से आया था, कहाँ गया? इन सवालों का जवाब तो हवा में खो चुका है। यही स्टेज तीन है। इसमें आपको कोरोना के आने, जाने और रहने का पता-ठिकाना नहीं मिलता है। लिहाज़ा, आप नये लोगों को कोरोना की चपेट में आने से तब तक नहीं रोक सकते, जब तक कि आप हरेक आदमी को उसके घरों में क़ैद ना कर दें।

Social Distancing, Total Lock-down या ‘जनता कर्फ़्यू’ इकलौता ऐसा तरीका है जिससे ये तय होगा कि जो संक्रमित नहीं हैं वो स्वस्थ हैं। ‘जनता कर्फ़्यू’ के दौरान जो लोग बीमार होंगे उन्हें सबसे अलग-थलग रखते हुए उनका इलाज़ किया जाएगा और अन्ततः जब कोरोना का फैलना रुक जाएगा तो हफ़्ते भर में ख़त्म भी हो जाएगा। अलबत्ता, कोरोना का पूरी दुनिया से सफ़ाया तभी होगा जब इसके आख़िरी पीड़ित को भी सफलतापूर्वक isolate और quarantine कर लिया जाएगा।

Morale: कोरोना को सिर्फ़ isolation, quarantine, hand wash और डॉक्टर-नर्स-दवाई से ही डर लगता है। थाली-ताली वादन, शंखनाद या Go Corona Go के नारों से उसका कुछ नहीं बिगड़ता। गोमूत्र-गोबर, नमाज़-रोज़ा, ओझा-तांत्रिक, गंडा-तावीज़, मंत्र-जाप, यज्ञ-व्रत जैसे पाखंड तो इसके लिए खाद-पानी का काम करते हैं।

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‘5 अप्रैल, 9 बजे, 9 मिनट’ – मूर्खता के अथाह कुंड में गोताख़ोरी

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modi deep 9 Baje

प्रवचन और उपदेशों से समाज की विकृतियाँ दूर हुई होती तो चप्पे-चप्पे पर धर्मात्मा ही नज़र आते। दरअसल, समझाने से सिर्फ़ वही समझते हैं, जो समझना चाहते हैं। जो समझना चाहते हैं, उनमें समझने की क्षमता भी विकसित हो जाती है। लेकिन इतिहास ग़वाह है कि मूर्खों को समझा पाना नामुमकिन है। इस ब्रह्म सत्य को मौजूदा निज़ाम से बेहतर और कोई नहीं जानता। इसीलिए पहले ये रही-सही अक्ल वालों को मूर्खों में तब्दील करता है, फिर उनसे लगातार मूर्खता के अथाह कुंड में गोते लगवाता रहता है। ऐसा ही राष्ट्रीय गोताख़ोरी अभियान थी – ‘5 अप्रैल, 9 बजे, 9 मिनट’

देश भर में बड़े पैमाने पर मूर्खों इस मुबारक़ घड़ी का इन्तज़ार कर रहें। लेकिन हुक़ूमत के तमाम प्रलाप के बावजूद कुछ लोग हैं जिन्होंने काजल की कोठरी में होने के बावजूद ख़ुद को कालिख़ से बचा रखा है। जो वास्तव में ‘असतो मा ज्योतिर्गमय’ का मतलब समझते हैं। मैंने क़लम ऐसे ही मुट्ठी भर लोगों के लिए उठायी है। मुझे लगा कि अब भी वक़्त है कि बत्तियाँ बुझाकर, अन्धेरा करके और उस बनावटी अन्धेरे को दूर करने के लिए दीया, मोमबत्ती या मोबाइल के फ़्लैश को टॉर्च बनाकर जलाने वाले ‘इवेंट’ के प्रति आपत्ति या दुविधा रखने वालों को बताया जाए कि कैसे मौजूदा दौर के पागल बादशाह की सनक देश के पॉवर ग्रिड के लिए घातक साबित हो सकती है?

देश में पैदा होने वाली हरेक तरह की बिजली को उस नैशनल पॉवर ग्रिड में डाला जाता है, जिससे वितरित होते हुए असंख्य रूपों में बिजली हम तक पहुँचती है। नैशनल पॉवर ग्रिड को देश की भौगोलिक आकार के हिसाब से पाँच क्षेत्रीय पावर ग्रिडों (RLDCs) और फिर राज्य स्तरीय पॉवर ग्रिडों (SLDCs) में बाँटा गया है। ये हमारे शरीर की शिराओं और धमनियों जैसा बहुत बड़ा और जटिल ढाँचा है। पूरी तरह से सरकारी अनुशासन के मुताबिक़ चलता है। इसका सबसे बड़ा नियम है बिजली की फ्रिक्वेंसी को 50 हर्ट्ज पर बनाये रखना, क्योंकि फ्रिक्वेंसी के कम होने पर जहाँ लो-वोल्टेज की समस्या पैदा होती है, वहीं ज़्यादा होने पर बिजली के उपकरणों के बर्बाद होने का ख़तरा होता है।

देश का पूरा बिजली तंत्र केन्द्रीय बिजली नियामक (CERA) के नियमों से चलता है। यही संगठन देश में बिजली का सुप्रीम कोर्ट है। इसी ने भारतीय बिजली ग्रिड कोड (IEGC) के ज़रिये तय कर रखा है कि पॉवर ग्रिड और उससे जुड़े पूरे तंत्र को हर हालत में बिजली की फ्रिक्वेंसी को 49.95 से लेकर 50.05 हर्ट्ज (Hz) के दायरे में ही रहना है। यानी, नॉर्मल की रेंज में सिर्फ़ 0.1 हर्ट्ज अर्थात महज 2% के उतार-चढ़ाव की गुंज़ाइश रखी गयी है। ये दायरा इतना संवेदनशील है कि जुलाई 2012 में ज़रा सी असावधानी की वजह से उत्तरी और पूर्वी ग्रिड चरमराकर बैठ गया था। मिनटों में हुए इस हादसे के बाद ग्रिड को बहाल होने में 12 घंटे लग गये थे।

दरअसल, ग्रिड में जितनी बिजली डाली जाती है, ख़पत का उतना ही होना ज़रूरी है। यदि माँग ज़्यादा है लेकिन उत्पादन कम है तो हम ग्रिड से ज़्यादा बिजली नहीं ले सकते। इसी तरह, यदि बिजली की खपत कम है लेकिन उत्पादन अधिक, तो हमें फ़ौरन उत्पादन घटाया जाता है। बिजली घरों को इस हिसाब से संचालित किया जाता है कि बहुत कम वक़्त में उनका उत्पादन घटाया या बढ़ाया जा सके। बिजली की माँग के बढ़ने या ख़पत के घटने का सिलसिला इतनी धीमी रफ़्तार में होना चाहिए जो ग्रिड फ्रिक्वेंसी की रेंज में ही रहे।

इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए 5 अप्रैल 2020 को पॉवर ग्रिड ने सारे आपातकालीन उपाय किये हैं। सारे ट्रांसमिशन सिस्टम को घड़ी को एकरूप (synchronize) किया है। हरेक महत्वपूर्ण कर्मचारी को शाम छह बजे से रात दस बजे तक ड्यूटी पर रहने का हुक़्म है। हाइड्रो यूनिट्स को शाम 6:10 बजे से 8 बजे तक अपने न्यूनतम उत्पादन करते हुए रात 9 बजे वाले तमाशे के लिए तैयार रहना होगा। इस दौरान थर्मल और गैस आधारित बिजली घरों को शाम के पीक ऑवर वाले लोड के हिसाब से ख़ुद को ढालना होगा। रात 8:57 बजे तक हाइड्रो पॉवर फुल अलर्ट पर आकर ग्रिड की सिस्टम फ्रिक्वेंसी पर नज़र रखते हुए तब तक बिजली का उत्पादन गिराते चलेंगे, जब तक सारी नौटकीं को ख़त्म करके लोग फिर से बिजली की उस माँग को बहाल नहीं कर देते जो बत्तियाँ बन्द किये जाने से पहले थी।

इसके बाद राज्य सरकारों के कोयला या गैस आधारित थर्मल पॉवर स्टेशन्स को पीक ऑवर के समापन के तहत रात 9:55 बजे से अपने उत्पादन को 60 फ़ीसदी या अपनी न्यूनतम तकनीकी सीमा तक घटाना होगा। बिजलीघरों के लिए तकनीकी सीमा का दायरा वो लक्ष्मण रेखा जिसे यदि क़ायम नहीं रखा गया तो अचानक ठप हो जाएँगे। ठप होने के बाद इन्हें फिर से चालू होने में अच्छा ख़ासा वक़्त लगता है। इसीलिए ग्रिड फेल होने की दशा में हालात को सामान्य बनने में घंटों लग जाते हैं। वैसे प्रधानमंत्री के तमाशे के आह्वान को देखते हुए रात 8:30 बजे के बाद से ही सिस्टम फ्रिक्वेंसी न्यूनतम करते हुए 49.90 Hz पर ले जाने की आपातकालीन रणनीति भी अपनायी गयी है, ताकि 9 बजे होने वाली अनहोनी से ज़्यादा से ज़्यादा सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

चलते-चलते आपको ये बताता चलूँ कि कोरोना लॉकडाउन की वजह से बिजली की माँग में भारी गिरावट आयी है। मसलन, ऊर्जा मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार, बीते 2 अप्रैल को देश में 125.81 गीगा वॉट बिजली की ख़पत थी, जबकि पिछले साल इसी दिन 168.32 गीगा वॉट बिजली की ख़पत हुई थी। ये अन्तर 25 फ़ीसदी का है। ज़ाहिर है, बिजली की माँग का अचानक धड़ाम से गिरना और फिर उठना, हमारे पॉवर ग्रिड और बिजलीघरों के लिए एक नयी आफ़त पैदा कर सकता है। क्योंकि इन दिनों ट्रेनें नहीं चल रहीं, फैक्ट्रियाँ बन्द पड़ी हैं, कृषि क्षेत्र में बिजली की माँग बेहद कम है, इसीलिए विशेषज्ञों ने अचानक देश भर में बत्तियाँ बन्द करने के प्रयोग को ख़तरनाक बताया है।

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80 फीसदी लोग मास्क पहनें तो महामारी पर लगाम संभव : डॉ. शैलजा

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नई दिल्ली, 2 अप्रैल | देश की अगर 50 प्रतिशत आबादी मास्क पहनती है, तो सिर्फ 50 प्रतिशत आबादी को ही कोरोना वायरस से संक्रमित होने का खतरा हो सकता है। यदि 80 प्रतिशत आबादी मास्क पहनती है, तो इस महामारी पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाई जा सकती है।-यह कहना है, सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार के कार्यालय में वरिष्ठ सलाहकार डॉ. शैलजा वैद्य गुप्ता का। उन्होंने यह बात भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार कार्यालय द्वारा सार्स-सीओवी-2 कोरोना वायरस से जुड़ी एक नियमावली में पेश तथ्य के आधार पर कही।

डॉ. शैलजा ने कहा, “मास्क की कमी को देखते हुए इस नियमावली में घर पर मास्क बनाने पर जोर दिया गया है। यह पहल मुख्य रूप से उन लोगों के लिए है, जो मास्क पहनना चाहते हैं, लेकिन उनकी इन मास्कों तक पहुंच नहीं है। ऐसे में घर पर बनाए हुए मास्क उपयोगी हो सकते हैं। इनकी खूबी यह है कि इन्हें धोकर आप दोबारा उपयोग कर सकते हैं।”

कोरोना वायरस के खतरे को देखते हुए प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार कार्यालय ने घर में बने मास्क पर केंद्रित एक विस्तृत नियमावली ‘सार्स-सीओवी-2 कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए मास्क’ जारी की है।

नियमावली में विश्व स्वास्थ्य संगठन का हवाला देते हुए लिखा गया है, “मास्क उन्हीं लोगों पर प्रभावी हैं जो अल्कोहल युक्त हैंडवॉश या साबुन और पानी से हाथ साफ करते हैं। यदि आप मास्क पहनते हैं, तो आपको इसके इस्तेमाल और इसके उचित निस्तारण के बारे में पूरी जानकारी होनी चाहिए।”

मास्क को क्यों पहना जाए? इस सवाल पर नियमावली कहती है कि एक व्यक्ति के दूसरे व्यक्ति के संपर्क में आने पर कोविड-19 वायरस आसानी से फैलता है। वायरस को ले जाने वाली बूंदें इसे तेजी से फैलाती हैं और हवा में जीवित रहते हुए यह आखिरकार विभिन्न सतहों के संपर्क में आ जाता है। कोविड-19 को फैलाने वाला वायरस सार्स-कोव-2 किसी ठोस या तरल सतह (एयरोसोल) पर तीन घंटे तक और प्लास्टिक व स्टेनलेस स्टील पर तीन दिन तक जीवित रहता है।

नियमावली में कहा गया है कि मास्क के उपयोग से संक्रमित व्यक्ति से निकले द्रवकणों में मौजूद वायरस के किसी दूसरे व्यक्ति के श्वसन तंत्र में प्रवेश की आशंका कम हो जाती है। सुरक्षित मास्क पहनकर वायरस के सांस के माध्यम से शरीर में प्रवेश की संभावनाएं कम हो जाती हैं, जो इसके प्रसार को रोकने के लिहाज से अहम हो सकता है। हालांकि, मास्क को ऊष्मा, यूवी लाइट, पानी, साबुन और अल्कोहल के एक संयोजन के उपयोग से स्वच्छ किया जाना जरूरी है।

इस नियमावली को जारी करने का उद्देश्य मास्क, इनके उपयोग और मास्क के दोबारा उपयोग की सर्वश्रेष्ठ प्रक्रिया की सरल रूपरेखा उपलब्ध कराना है, जिससे एनजीओ और व्यक्तिगत रूप से लोग खुद ऐसे मास्क तैयार कर सकें और देशभर में तेजी से ऐसे मास्क अपनाए जा सकें। प्रस्तावित डिजाइन के मुख्य उद्देश्यों में सामग्रियों तक आसान पहुंच, घरों में निर्माण आसान करना, उपयोग और फिर से उपयोग को आसान बनाना शामिल है।

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इंदौर में सोशल डिस्टेंसिंग से बेरुखी महंगी पड़ी

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इंदौर, 2 अप्रैल | स्वच्छता का परचम लहराने वाला मध्य प्रदेश का इंदौर इन दिनों देश और दुनिया में फैली कोरोना वायरस की महामारी से जूझ रहा है। स्वच्छता के बावजूद आखिर क्या वजह रही कि इंदौर में कोरोना के मरीज बढ़ते गए। इनमें एक जो प्रमुख वजह रही वह है सोशल डिस्टेंसिंग का पालन न किया जाना। इसके साथ ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जुड़े और आधुनिक सुविधाओं वाले शहर में शुरुआती केस आने के बाद भी समय पर प्रबंध नहीं किए गए, जिनकी जरूरत थी। शहर में जांच की सुविधा नहीं होना भी अहम वजह रही।

इंदौर की स्थिति पर गौर करें तो एक बात साफ है कि राज्य का सबसे विकसित और आधुनिक सुविधाओं वाला शहर है। यहां अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है और कई देशों की उड़ानें भी आती रही है, इतना ही नहीं रेल और बस सुविधा के मामले में अव्वल है। कई राज्यों से सीधा संपर्क है। औद्योगिक दृष्टि से भी यहां कई बड़े उद्योग हैं, जिससे देशी-विदेशी लोगों की आवाजाही कुछ ज्यादा ही रहती है। इसके अलावा यहां दूसरे स्थानों के हजारों छात्र अध्ययन करने और शिक्षित व्यक्ति रोजगार की तलाश में आते है। वहीं इंदौर के हजारों बच्चे दूसरे शहर और विदेशों में पढ़ते हैं, जो हाल ही में लौटे भी है।

लंबे अरसे से इंदौर और मालवा निमाड़ के क्षेत्र में सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर काम करने वाले जन स्वास्थ्य अभियान के राष्ट्रीय सह संयोजक अमूल्य निधि का कहना है, “इंदौर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जुड़ा हुआ महानगर है यहां कई देशों से फ्लाइट आती हैं और पड़ोसी राज्य गुजरात और महाराष्ट्र से भी बड़ी संख्या में लोग आते हैं। कोरोना महामारी की जब बात सामने आई तब इंदौर में वह प्रबंध नहीं किए गए, जिनकी जरूरत थी। एक तो जांच की सुविधा नहीं थी, दूसरा सोशल डिस्टेंसिंग को ध्यान में नहीं रखा गया। यही कारण रहा कि इक्का-दुक्का मरीज कभी आए होंगे, जिनमें यह संक्रमण रहा होगा और वह लगातार समाज के संपर्क में रहे जिससे यह तेजी से फैल गया।”

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए अमूल्य निधि कहते हैं, “मरीजों की संख्या बढ़ने का दूसरा कारण भी है। पहले कम सैंपल लिए जा रहे थे और जांच रिपोर्ट उन सैंपलों की ही आ रही थी। अब ज्यादा नमूने लिए जा रहे है और रिपोर्ट भी ज्यादा आ रही है। इसे नकारात्मक रूप में नहीं लेना चाहिए बल्कि ज्यादा मरीज पाए जा रहे हैं तो यह सुरक्षा ज्यादा बढ़ाने की ओर हमें तैयार रहने का संदेश भी दे रहा है।”

इंदौर फार्मासिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष विनय बाकलीवाल भी मानते हैं, “इंदौर में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं किया गया और बीमारी फैलने की सबसे बड़ी वजह यही रही। जब लॉकडाउन हुआ है तो अब प्रयास हो रहे हैं और उम्मीद की जानी चाहिए कि जल्दी ही मरीजों की पहचान हो जाएगी और यह शहर सुरक्षित रहेगा।

इंदौर में मरीजों की संख्या बढ़ने के सवाल पर मुख्य चिकित्सा अधिकारी डा. प्रवीण जरिया ने आईएएनएस से कहा, “यह बात सही है कि इंदौर में संक्रमित मरीजों की संख्या और स्थानों की तुलना में कहीं ज्यादा है। मगर राहत की बात यह है कि गिनती के परिवारों के लोग ज्यादा संक्रमित हैं और उन्हीं के संपर्क में आए लोग संक्रमित पाए जा रहे हैं। प्रशासन ने इसीलिए लोगों को क्वारंटाइन में रखा है और आइसोलेट किया जा रहा है ताकि यह बीमारी आगे न फैल सके।”

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी इस बात को मान चुके है कि इंदौर के कुछ खास इलाकों में ही इस वायरस का संक्रमण फैला है। साथ ही उन्होंने लोगों से लॉकडाउन का पालन करने और सोशल डिस्टेंसिंग बनाए रखने पर जोर दिया। ऐसा इसलिए क्योंकि घरों में रहकर ही इस बीमारी की चेन को तोड़ा जा सकता है।

यह बात भी सामने आ रही है कि इंदौर के रानीपुरा, नयापुरा, दौलतगंज, हाथीपाला आदि स्थानों पर ही सबसे ज्यादा संक्रमित मरीज पाए जा रहे है। यहां बड़ी संख्या में लोगों को क्वारंटाइन और आइसोलेशन की प्रक्रिया में रखा गया है। होटल और निजी चिकित्सा महाविद्यालयों में इन मरीजों के लिए खास इंतजाम किए जा रहे हैं।

राज्य में कोरोना वायरस का सबसे ज्यादा असर इंदौर में नजर आ रहा है। यहां मरीजों की संख्या बढ़कर 75 हो गई है, वहीं राज्य में पीड़ितों की संख्या 98 है। अब तक छह लोगों की मौत हो चुकी है। इंदौर के अलावा भोपाल में चार, जबलपुर में आठ, ग्वालियर व शिवपुरी में दो-दो, खरगोन एक और उज्जैन में छह मरीज हैं। इस तरह राज्य में अब कोरोना के पाजिटिव मरीजों की संख्या बढ़कर 98 हो गई है।

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