Viral सचब्लॉगस्वास्थ्यकोरोना से जुड़ा सबसे बड़ा झूठ

Mukesh Kumar SinghMarch 23, 20201751 min

ये सबसे बड़ा झूठ है कि कोरोना वायरस को चीन या अमेरिका ने अपने किसी जैविक हथियार के रूप में विकसित किया था, लेकिन दुर्भाग्यवश वो प्रयोगशालाओं के तालों और दीवारों को चकमा देकर निकल भागा और अब सारी दुनिया में नरसंहार कर रहा है। जबकि वैज्ञानिक सच्चाई ये है कि आज तक मनुष्य अपनी प्रयोगशालाओं में किसी भी नये जन्तु का निर्माण नहीं कर पाया है। लिहाज़ा, कोरोना वायरस को किसी जैविक हथियार के रूप में पेश करना पूरी तरह से झूठ और भ्रामक है। अलबत्ता, इसमें कोई शक़ नहीं कि कोरोना वायरस के परिवार में COVID-19 एक नया सदस्य है। लेकिन इसकी जननी प्रकृति या क़ुदरत ही है।

वैज्ञानिकों ने बैक्टीरिया और वायरस जैसे घातक सूक्ष्म जीवों को मारने की दवाएँ तो तैयार की हैं, जेनेटिक बदलाव करके कई जीवों की प्रकृति में बदलाव करने में भी सफलता पायी है, लेकिन किसी नये जीव की रचना करने में उसे अभी तक कामयाबी नहीं मिली है। फिर चाहे ऐसे सूक्ष्म जीव इंसानों के लिए फ़ायदेमन्द हो या नुकसानदायक। इंसान अभी तक सिर्फ़ क्लोन पैदा कर सका है, टेस्ट ट्यूब में निषेचन (fertilization) करवा सका है, लेकिन वो शुक्राणु या अंडाणु को प्रयोगशाला में बना नहीं सका है। क्लोन को नया जीव नहीं माना गया है। बल्कि ये महज डुप्लीकेट है। ओरिजनल जैसे गुणों वाला डुप्लीकेट। लेकिन इस डुप्लीकेट को कभी भी ओरिजनल और स्वतंत्र नहीं माना गया।

क्या हैं जैविक और रासायनिक हथियार?

जैविक और रासायनिक अलग ही चीज़ होते हैं। सारी दुनिया में इसके निर्माण पर इस्तेमाल पर बेहद सख़्त पाबन्दी है। परमाणु हथियारों से भी कहीं ज़्यादा सख़्त। जैविक हथियार वो हैं जो ज्ञात घातक जन्तुओं या बीमारियों के संक्रमण के रूप में दुश्मनों पर फेंके जा सकते हैं। जैसे, चेचक के विषाणु। लेकिन इसकी भी कई प्रजाति हैं। जैसे small pox, chicken pox, measles आदि। इसमें से small pox का टीका विकसित करके इसे सारी दुनिया से मिटाया जा चुका है। ऐसे ही हैज़ा, प्लेग, टीबी जैसी बीमारियाँ काबू में हैं। लेकिन यदि कोई देश प्रयोगशालों में इनके कीटाणुओं की संख्या को बढ़ाकर उससे दुश्मन देश को संक्रमित करना चाहे तो ये प्रक्रिया जैविक हथियार का इस्तेमाल या हमला कहलाएगी।

दूसरी ओर रासायनिक हथियार का मतलब है युद्ध में ऐसे ज़हरीले कैमिकल्स को दुश्मन पर फेंकना जिससे उसे जान-माल का भारी नुक़सान हो, जिसमें रसायनों के प्रभाव से सेना या नागरिकों की मौत का ख़तरा हो। ऐसे घातक रसायनों या यौगिकों (compounds) को भी प्रयोगशालाओं में ही बनाया जाता है। ये ठोस, द्रव या गैस – किसी भी रूप में हो सकते हैं। लेकिन इनका निर्माण हमेशा उन प्राकृतिक पदार्थों से होता है जिन्हें क़ुदरत ने बनाया है। मनुष्य तो सिर्फ़ घातक यौगिक बना सकता है। किसी नये जीव की तरह, नया तत्व बनना भी हमेशा इसके बूते से बाहर ही रहा है।

बैक्टीरिया बनाम वायरस

जीव विज्ञान की परिभाषाओं के मुताबिक़, वायरस (विषाणु) और बैक्टीरिया दोनों ही सूक्ष्म जीव हैं। प्रकृति या कुदरत ही दोनों की जननी है। दोनों संक्रामक हैं। दोनों परजीवी हैं। यानी इन्हें पनपने के लिए अन्य प्राणियों के सम्पर्क में आना पड़ता है। दोनों में सबसे बड़ा फ़र्क़ ये है कि बैक्टीरिया जन्मजात तौर पर सजीव होते हैं। इनका प्रसार भी सजीव के रूप में ही होता है। जबकि वायरस बुनियादी तौर पर स्वतंत्र और निर्जीव होता है। लेकिन किसी सजीव प्राणी के सम्पर्क में आने पर थोड़े समय में ही इसमें सजीवों वाले गुण पनप जाते हैं।

एक बार सजीव बनने के बाद वायरस का भी जैविक विभाजन और विस्तार होने लगता है। लेकिन नवजात वायरस भी अपने पैतृक स्वभाव की वजह से तब तक निर्जीव ही बना रहता है जब तक कि वो किसी सजीव प्राणी में प्रवेश करके वहाँ फलने-फूलने ना लगे। सजीव के सम्पर्क के आने के बाद जल्द ही ये भी सजीव बन जाता है। मानव शरीर में एक ही तरह के लक्षण दिखाने वाले फ़्लू और इन्फ़्लूएंजा के वायरसों की दो सौ से भी अधिक ज्ञात किस्में हैं। इनके गुण-धर्म एक जैसे नहीं होते इसीलिए वैज्ञानिक मनुष्यों में फ़्लू पैदा करने वाले वायरसों का आज तक कोई ऐसा टीका नहीं विकसित कर पाये सके जो हरेक तरह के वायरस पर प्रभावी हो।

रोचक बात ये भी है कि चाहे जिस तरह का वायरस हो उसकी ज़िन्दगी यानी उम्र चार-छह दिन से ज़्यादा की नहीं होती है। इसीलिए इससे पैदा होने वाली तकलीफ़ें भी हफ़्ते-दस दिन बाद दूर होने लगती हैं। इस दौरान शरीर की प्रतिरोधक क्षमता वायरसों के लक्षणों से ख़ुद को उबार ही लेती है। इसीलिए वायरसों को तब तक जानलेवा नहीं माना जाता जब तक कि वो अन्य बीमारियों से पीड़ित मरीज़ों की दशा में और बेकाबू ना बना दे। इसीलिए, डॉक्टरों को बस वायरस के पीड़ित मरीज़ों को कष्टकारी लक्षणों को क़ाबू में रखना होता है और वो इसके लिए ही दवाइयाँ देते हैं।

दूसरी चुनौती होती है, वायरस को फ़ैलने से रोकना। इसके लिए ही अत्यधिक साफ़-सफ़ाई और सम्पर्क-विहीनता पर ज़ोर दिया जाता है। यदि वायरस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलेगा नहीं तो अपनी अल्प-आयु की वजह से भी ख़ुद ही बेअसर बन जाएगा। दूसरी ओर, बैक्टीरिया अपनी वृद्धि स्वतंत्र रूप से करता है। इसीलिए इसके संक्रमण और दुष्प्रभाव की रोकथाम के लिए डॉक्टर को एंटी बायोटिक दवाओं का इस्तेमाल करना पड़ता है। कमज़ोर शरीर पर बैक्टीरिया से पीड़ित होने की आशंका ज़्यादा रहती है। कोई मरीज़ बैक्टीरिया और वायरस दोनों से पीड़ित हो सकता है। इसीलिए डॉक्टरों को एंटी बायोटिक दवाओं की निर्धारित ख़ुराक यानी कोर्स के ज़रिये बैक्टीरिया का सफ़ाया करना पड़ता है। ये दवाएँ शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती हैं। बैक्टीरिया के गुण-धर्मों की वजह से उनके टीके बना पाना सम्भव हुआ है जबकि यही काम वायरस के लिए कर पाना हमेशा से बेहद कठिन साबित हुआ है।

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