कोरोना पैकेज़: झुनझुना बजाने और ऐलान करने के मोर्चे पर प्रधानमंत्री से आगे निकलीं वित्तमंत्री | WeForNewsHindi | Latest, News Update, -Top Story
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कोरोना पैकेज़: झुनझुना बजाने और ऐलान करने के मोर्चे पर प्रधानमंत्री से आगे निकलीं वित्तमंत्री

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PM Modi

12 मई को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस 20 लाख करोड़ रुपये के आत्म-निर्भर पैकेज़ का ऐलान किया था, वो अब बढ़कर क़रीब 21 लाख करोड़ रुपये का हो चुका है। रहा सवाल कि सरकार इतनी रक़म लाएगी कहाँ से? तो इसके बारे में वित्त मंत्री का कहना है कि स्वाभाविक रूप से इसके लिए सरकार कर्ज़ का ही इन्तज़ाम करेगी।

वित्तमंत्री ने बताया कि 22 मार्च से लेकर अब तक जितनी भी घोषणाएँ हुए हैं उससे सरकारी राजस्व को 7,800 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। इसके अलावा, प्रधानमंत्री ग़रीब कल्याण पैकेज़ के तहत 1.7 लाख करोड़ रुपये जन-धन खातों, किसान राहत, मुफ़्त गैस सिलेंडर और मुफ़्त राशन की योजनाओं पर खर्च हुए हैं। 15 हज़ार करोड़ रुपये का फंड प्रधानमंत्री ने कोरोना से जूझने के लिए ज़रूरी स्वास्थ्य सुविधाओं के इस्तेमाल के लिए जारी किये हैं।

वित्त मंत्री अब तक 20,97,053 करोड़ रुपये की घोषणाएँ कर चुकी हैं। पाँच दिनों के भीतर 5 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा भी किसी उपलब्धि से कम नहीं। मलाल बस इतना रहा कि तमाम ऐलान में ऐसी दूरगामी बजटीय घोषणाओं और आर्थिक सुधारों का पलड़ा ही भारी रहा, जिन्हें भारत को ‘आत्म-निर्भर’ बनाना है। अभी लोगों को जो भी तकलीफ़ें उठानी पड़ रही हैं, उससे जूझने के लिए फ़ौरी सहायता के रूप में 21 लाख करोड़ रुपये में से क़रीब दो लाख करोड़ रुपये का ही प्रावधान हुआ है। बाक़ी आत्म-निर्भरता का असर आगामी महीनों और वर्षों में ही नज़र आएगा। इस तरह, 21 लाख करोड़ रुपये वाले भारी-भरकम पैकेज़ में फ़ौरी राहत के खाते वाली सारी बातें 1,92,800 करोड़ रुपये में सिमट गयीं। बाक़ी बचे 19 लाख करोड़ रुपये या तो विभिन्न घोषणाओं के लिए रखे गये हैं या अर्थव्यवस्था में नयी जान फूँकने के लिए लागू होने वाले सुधारों को प्रभावी बनाने के लिए।

घोषणाओं के पाँच दिन

वित्तमंत्री ने पहले दिन 5,94,550 करोड़ रुपये की योजनाएँ बतायीं। लेकिन इनमें से कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) से जुड़ी राहत 8550 करोड़ रुपये की राहत ही ऐसी थी, जो ऐसे वेतनभोगी मज़दूरों को सीधे मिली, जो ऐसी कम्पनियों में काम करते हैं जहाँ 100 से कम मज़दूरों का वेतन 15,000 रुपये महीने तक है। बाक़ी 5.86 लाख रुपये या तो विशुद्ध कर्ज़ हैं या फिर ऐसी रक़म जिसकी वसूली सरकार ने थोड़े वक़्त के लिए टाल दी है।

वित्तमंत्री की दूसरे दिन की घोषणाएँ कुल 3.1 लाख करोड़ रुपये की थीं। लेकिन इसमें सिर्फ़ 3500 करोड़ रुपये ही उस राहत के थे, जिसके तहत सरकार ने अगले दो महीने तक प्रवासी मज़दूरों को मुफ़्त राशन देने की बातें की हैं। इस राहत में प्रवासी मज़दूरों को हर महीने 5 किलो चावल या गेहूँ और एक किलो दाल देने की बात है। ये राहत उन्हें भी मिलेगी जिनके पास राशन कार्ड नहीं है। बाक़ी बचे 3,07,500 करोड़ रुपये का फंड तरह-तरह के कर्ज़ों के लिए है।

तीसरे दिन 1.5 लाख करोड़ रुपये की घोषणाएँ हुईं, लेकिन ये सारी रक़म भी या तो कर्ज़ है या निवेश। कोरोना संकट से राहत वाली कोई भी बात इसमें नहीं थी। चौथे और पाँचवें दिन, दोनों को मिलाकर 48,100 रुपये के ऐलान हुए। इसमें ये 40 हज़ार रुपये का फंड मनरेगा में बढ़ाया गया है, जो इसके पिछले बजट 61,000 करोड़ रुपये के अलावा है। साफ़ है कि कोरोना संकट की वजह से बेरोज़गार हुए ग़रीब तबके की अतिरिक्त आबादी के लिए वित्त मंत्री सिर्फ़ 40,000 करोड़ रुपये का प्रावधान कर सकीं। ऐसे 1.01 लाख करोड़ रुपये की बदौलत 300 करोड़ मानव-दिवसों का रोज़गार सृजन किया जाएगा। इसके लाभार्थी अभी गाँवों में रहने वाले या लॉकडाउन के बाद शहरों से वापस गाँवों को लौटे लोगों या लौटने वालों को होगा।

ऐलान 10 फ़ीसदी का, मिला एक प्रतिशत

इसके अलावा, केन्द्र सरकार का एक और खर्च ऐसा ही जिसके कुछ वित्तीय बोझ का बता बाद में ही चलेगा। ये है श्रमिक स्पेशल ट्रेनों पर खर्च होने वाली रक़म। वित्तमंत्री का कहना है कि प्रवासी मज़दूरों के लिए चलायी जा इन ट्रेनों का 85 फ़ीसदी किराया और मुसाफ़िरों के खाने-पीने का खर्च केन्द्र सरकार उठा रही है। ज़ाहिर है, अगले कुछ महीनों में जब इस किस्म के खर्चों का सारा ब्यौरा आ जाएगा तो कोरोना के नाम पर जारी हुआ आत्म-निर्भर पैकेज़ 21 लाख करोड़ रुपये से भी अधिक हो जाएगा। लेकिन तब भी सीधी राहत 2 लाख करोड़ रुपये के आसपास ही सिमट जाएगा। ये देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का एक फ़ीसदी ही बैठेगा। जबकि याद कीजिए कि प्रधानमंत्री ने 12 मई को GDP के 10 फ़ीसदी जितना बड़ा राहत-पैकेज़ देने का सब्ज़बाग़ दिखाया था।

दरअसल, प्रधानमंत्री जानते थे कि देश की माली हालत ऐसी नहीं है कि वो दिल खोलकर मदद बाँट सकें। लिहाज़ा, उन्होंने ‘भाषणं किम् दरिद्रतां’ यानी ‘भाषण देने में भी कंजूरी क्यों की जाए’ वाली रणनीति बनायी। इसीलिए राहत का ऐलान हुआ 2 लाख करोड़ रुपये का लेकिन भाषणबाज़ी हुई 21 लाख करोड़ रुपये की। इसकी वजह ये है कि मोदीजी को अच्छी तरह से पता है कि 130 करोड़ भारतवासियों में से ज़्यादातर लोग पैकेज़ और आत्म-निर्भरता जैसे जुमलों में ही उलझ जाएँगे। वो सरकार से कोई सहारा पाये बग़ैर भी धीरे-धीरे ख़ुद को खड़ा कर लेंगे। अलबत्ता, कोरोना की आड़ में तमाम सरकारी क्षेत्र का निजीकरण करने का रास्ता ज़रूर खोल दिया गया है, ताकि कुछ और चहेते उद्योगपति दोस्तों को बहती गंगा का आचमन करवा दिया जाए।

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वित्तमंत्री का क़बूलनामा: बैंकों को भी डराती हैं CBI, CVC और CAG जैसी संस्थाएँ

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Nirmala Sitharam

भारत के संवैधानिक, क़ानूनी और सरकारी ढाँचे को जानने-समझने वाले लोग वैसे तो इतना जानते ही हैं कि CBI, CVC और CAG जैसी शीर्ष संस्थाएँ केन्द्र सरकार के इशारे पर ही काम करती हैं। इनकी निष्पक्षता और स्वायत्तता ‘हाथी के दिखाने वाले दाँतों’ की तरह ही रही हैं। इसलिए भी इन्हें केन्द्र सरकार के ‘दबंग सरकारी लठैतों’ की तरह देखा जाता रहा है। सरकारी दबंगों की इस बिरादरी में ही पुलिस के अलावा आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय (IT & ED) का नाम भी शुमार रहा है। लेकिन अब कोरोना पैकेज़ के बहाने ख़ुद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने CBI, CVC और CAG को लेकर लगाये जाने वाले तमाम आरोप और तथ्यों की परोक्ष रूप से पुष्टि कर दी है।

दरअसल, बीजेपी के प्रवक्ता नलिन कोहली को 23 मई को दिये एक ऑनलाइन वीडियो इंटरव्यू में वित्त मंत्री ने बताया कि बैंकों को ये निर्देश दिया गया है कि ‘वो तीनों Cs यानी CBI, CVC और CAG से बेख़ौफ़ होकर ‘योग्य ग्राहकों’ को स्वचालित ढंग से कर्ज़ बाँटते जाएँ।’ सीतारमन ने बताया कि उन्होंने 22 मई को सरकारी बैंकों और वित्तीय संस्थानों के CEOsऔर MDs को स्पष्ट निर्देश दिये हैं कि कोरोना पैकेज़ में जिस सेक्टरों के लिए सरकार ने 100 फ़ीसदी की गारंटी दी है, उसे लेकर बैंकों को किसी से डरने की ज़रूरत नहीं है। बीजेपी ने इस इंटरव्यू को पार्टी के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर शेयर किया है।

वित्तमंत्री ने बैंकों में बैठे डर को ख़त्म करने के बाबत साफ़ किया कि ‘यदि लोन देने का फ़ैसला आगे चलकर ग़लत साबित हुआ और इससे बैंकों को नुकसान हुआ, तो इस नुक़सान की भरपाई सरकार करेगी। किसी भी बैंक अधिकारी को दोषी नहीं ठहराया जाएगा। इसीलिए वो निडर होकर योग्य ग्राहकों को ‘अतिरिक्त टर्म लोन या अतिरिक्त वर्किंग कैपिटल लोन’ जिसके लिए भी वो सुपात्र हों, उन्हें लोन देते जाएँ।’

दरअसल, प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री ने जैसे उत्साह से ‘आओ क़र्ज़ा लो’ की ‘थीम’ पर आधारित कोरोना पैकेज़ का ऐलान किया था, वैसा उत्साह जब ग्राहकों में ही नहीं उमड़ रहा है तो बैंकों में कहाँ से नज़र आएगा? 21 लाख करोड़ रुपये के पैकेज़ में लघु, छोटे और मझोले उद्यमियों (MSME) के लिए 3 लाख करोड़ रुपये की इमरजेंसी क्रेडिट लाइन गारंटी स्कीम (ECLGS) शामिल है।

वित्तमंत्री जानती हैं कि बैंक अधिकारी ‘तेज़ी से सही फ़ैसले’ इसलिए नहीं ले पाते क्योंकि उन्हें केन्द्रीय जाँच ब्यूरो (CBI), केन्द्रीय सतर्कता आयोग (CVC) और भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) का ख़ौफ़ सताता रहता है कि ज़रा सी चूक हुई नहीं कि ये तीनों संस्थाएँ उन्हें धर दबोचेंगी। यहाँ सोचने वाली बात तो ये भी है कि बैंकों के अफ़सरों का डर नाहक तो नहीं हो सकता। आख़िर, वो भी तो दिन-रात इन तीनों संस्थाओं का रवैया और तेवर देखते ही रहे होंगे।

बैंक के अफ़सरों की भी कुछ आपबीती होगी, कुछ निजी तज़ुर्बा ज़रूर रहा होगा। वर्ना, ‘पक्की’ नौकरी कर रहे बैंकों के अफ़सर लोन बाँटने से भला क्यों डरते? वो इतने नादान भी नहीं हो सकते कि रस्सी को साँप समझ लें। लोन बाँटना उनका पेशेवर काम है। कर्तव्य है। इसे वो सालों-साल से करते आये हैं। इसके बावजूद यदि उनमें कोई डर समा गया है तो फिर इसकी कोई न कोई ठोस वजह ज़रूर होगी।

साफ़ है कि निर्मला सीतारमन बैंकिंग सेक्टर की अन्दर की बातों से वाफ़िक थीं। तभी तो उन्होंने सफ़ाई दी कि वित्त मंत्रालय ने अपनी कई ऐसी अधिसूचनाओं को वापस ले लिया है जिसकी वजह से बैंक अधिकारियों में CBI, CVC और CAG का डर बैठ गया था। साफ़ है कि बैंक के अफ़सरों का डर पूरी तरह से वाजिब था। वर्ना, सरकार अपनी ही अधिसूचनाओं को वापस क्यों लेती? अपने क़दम पीछे क्यों खींचती? मज़े की बात ये है कि बीते 7-8 महीने के दौरान भयभीत बैंक अफ़सरों को ख़ुद वितमंत्री तीन बार कह चुकी हैं कि उन्हें ‘3-Cs’ से नहीं डरना चाहिए।

अब ज़रा सोचिए कि यदि वस्तुस्थिति वाक़ई डरने लायक़ नहीं होती तो क्या बैंक अफ़सरों के मन से CBI, CVC और CAG का डर निकल नहीं गया होता! यदि वित्तमंत्री ही अपने बैंक अफ़सरों के मन से डरावने ख़्याल नहीं निकाल पा रहीं तो समस्या कितनी गम्भीर होगी। दरअसल, ECLGS पैकेज़ का सीधा सा नज़रिया है कि ‘यदि किसी कम्पनी ने बैंक से एक निश्चित सीमा तक लोन लिया है, या उसमें एक निश्चित सीमा तक निवेश हुआ है, या उसका एक निश्चित टर्नओवर है, तो यदि वो लॉकडाउन से बने हालात के बाद अपने कारोबार को फिर से चालू करने के लिए अतिरिक्त टर्म लोन या वर्किंग कैपिटल ले सकते हैं।’

वित्त मंत्रालय की इस नीति और इससे जुड़े ऐलान का एक स्याह पक्ष ये भी बैंकों के कर्ज़ो पर वसूला जाने वाला ब्याज़ दर क़तई रियायती नहीं है। चरामरा चुकी अर्थव्यवस्था में जब आमदनी औंधे मुँह गिरी पड़ी हो तब ऊँची ब्याज़ दरों पर बैंकों से पैसा उठाना और फिर इसकी किस्तें भरना आसान नहीं है। फिर भी वित्तमंत्री को उम्मीद है कि ‘पहली जून से बिना किसी कोलैटरल (यानी गिरवी या गारंटी) वाली नगदी का बैंकों से प्रवाह शुरू हो जाएगा।’ कर्ज़ के प्रवाह की रफ़्तार से जल्द ही पता चल जाएगा कि वास्तव में ज़मीनी स्तर पर बैंकों के अफ़सर कितना निडर हो पाये!

दरअसल, CBI, CVC और CAG से भी बढ़कर बैंकों को अपने नये NPA (डूबा कर्ज़) की चिन्ता खाये जा रही है। सरकार सिर्फ़ मौजूदा पैकेज़ वाले फंड को लेकर ही तो गारंटी दे रही है। जबकि बैंक तो अपने ही पुराने कर्ज़ों को लेकर मातम मना रहे हैं। इसकी सीधी सी वजह है कि NPA के बढ़ने से बैंकों की साख गिरती है। बैंकों के सरकारी होने के नाते सरकारें आम जनता के टैक्स के पैसों से बैंकों के नुक़सान की भरपाई देर-सबेर भले ही कर दे। लेकिन बैंकों को अपनी साख सुधारने में बहुत वक़्त लगता है।

इसी प्रसंग में ये समझना ज़रूरी है कि 21 लाख करोड़ रुपये के कोरोना पैकेज़ में 19 लाख करोड़ रुपये की ऐसी पेशकश हैं जिन्हें कर्ज़ की योजनाएँ ही कहा जाएगा। अभी सरकार ने सिर्फ़ कर्ज़ के लिए फंड बनाये हैं। इन्हें आकर्षक बनाने के लिए ब्याज़ दरों में कोई रियायत नहीं दी गयी है। इसीलिए, उद्यमियों की ओर से कर्ज़ लेकर अर्थव्यवस्था में नयी जान फूँकने की कोशिशों में ढीलापन नज़र आ रहा है। लॉकडाउन अब भी जारी है। मज़दूर पलायन कर रहे हैं। माँग-पक्ष बेहद कमज़ोर है। हरेक तबके की आमदनी में भारी गिरावट आयी है। नौकरियों में हुई छँटनी और बेहिसाब बेरोज़गारी ‘कोढ़ में खाज़ का काम’ कर रही है।

इन सभी परिस्थितियों के बीच बहुत गहरा आन्तरिक सम्बन्ध है। इसीलिए कर्ज़ लेकर अपनी गाड़ी को पटरी पर लाने वाली मनोदशा कमज़ोर पड़ी हुई है। इसीलिए भले ही बैंक निडर होकर कर्ज़ बाँटने की तैयारी करने लगें लेकिन मन्दी के दौर में कर्ज़दार भी कहाँ मिलते हैं? कोरोना से पहले भी बैंकों को कर्ज़दारों की तलाश कोई कम नहीं थी। दरअसल, कर्ज़ लेकर उसे चुकाने वाली कमाई भी तभी हो पाती है जबकि अर्थव्यवस्था की विकास दर ऊँची हो। माँग में तेज़ी हो। लेकिन अभी ऊँची और तेज़ी तो बहुत दूर की कौड़ी है। अभी तो ये सफ़ाचट है। अर्थव्यवस्था डूब रही है। इसीलिए, निर्मला सीतारमन के सपनों के साकार होने में भारी सन्देह है।

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आख़िर क्यों वित्तमंत्री के ऐलान झुनझुने जैसे ही हैं?

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Nirmala Sitharaman

ग़रीब हो या अमीर, अब तो सभी 20 लाख करोड़ रुपये के सुहाने पैकेज़ वाले झुनझुने की झंकार सुनने को बेताब हैं। लेकिन वित्तमंत्री की पहले दिन की पेशकश में ग़रीबों के लिए कुछ नहीं था। हो सकता है, आने वाले दिनों में सरकार को इनके लिए भी कुछ सूझने लगे। अभी तक तो सरकार की तरफ से समाज के उस सबसे कमज़ोर तबके के लिए हमदर्दी के बोल भी नहीं थे, वो एक से बढ़कर एक विचित्र तकलीफ़ झेलकर चिलचिलाती धूप में सैकड़ों किलोमीटर लम्बी सड़कों को पैदल नापकर अपनी आत्म-निर्भरता का प्रदर्शन करने के लिए मज़बूर हुए हैं।

वैसे क़रीब दस करोड़ ग़रीबों के लिए 26 मार्च 2020 को घोषित पहले दौर के पैकेज़ में करीब एक लाख करोड़ रुपये का इन्तज़ाम किया गया था। इन्हीं रुपयों से किसी को 500, किसी को 1000, किसी को 2000, किसी को मुफ़्त गैस सिलेंडर और किसी को सस्ता राशन वग़ैरह मुहैया करवाया जाना था। ग़रीबों को ये मदद पहुँची भी है। हालाँकि, ये चर्चाएँ तो होती ही रहेंगी कि मदद कितनी पर्याप्त या अपर्याप्त रही? लेकिन यदि ‘प्रत्यक्षं किम् प्रमाणम्’ यानी ‘प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या’ जैसा कोई आधार है, तो पैदल सड़क नाप रहे ग़रीबों को देखकर तमाम सरकारी दावों और कोशिशों की हक़ीक़त समझना मुश्किल नहीं है।

MSME पैकेज़ की श्रेणियाँ

20 लाख करोड़ रुपये के कोरोना पैकेज़ में से वित्तमंत्री ने सबसे पहले उस लघु, छोटे और मझोले श्रेणी (MSME) के उद्यमियों की परवाह की जिसकी 6.5 करोड़ इकाईयों से 12 करोड़ लोग रोज़गार पाते थे। खेती के बाद अर्थव्यवस्था का यही सेक्टर देश के सबसे अधिक लोगों का पेट भरता है। इसी में सबसे अधिक बेरोज़गारी पैदा हुई है। वित्तमंत्री ने MSME को सबसे बड़ा तोहफ़ा ये दिया कि उसकी परिभाषा बदल दी। इसकी माँग भी बहुत पुरानी थी। इसमें मैन्यूफ़ैक्चरिंग और सर्विस वाली श्रेणियाँ ख़त्म करके लघु, छोटे और मझोले, तीनों श्रेणियों के लिए निवेश और टर्न ओवर की सीमा को ख़ासा बढ़ाया गया। ये पैकेज़ नहीं बल्कि सुधारवादी क़दम है। फिर भी सरकार को शाबाशी मिलनी चाहिए।

अगला ऐलान है – संकट झेल रहे 45 लाख MSMEs को निहाल करने के लिए 3 लाख करोड़ रुपये का पैकेज़ देना। उद्यमियों को ये रक़म चार साल के लिए बतौर कर्ज़ दी जाएगी। बदले में उन्हें कोई गारंटी नहीं देनी पड़ेगी और ना ही किसी सम्पत्ति को गिरवी रखना होगा। यानी, यदि ये रकम डूब गयी तो बैंकों को इसकी भरपाई केन्द्र सरकार करेगी। इस ‘नो गारंटी, नो कोलेटेरल’ श्रेणी वाले कर्ज़ पर साल भर तक कोई ब्याज़ नहीं भरना पड़ेगा। अब सवाल ये कि 3 लाख करोड़ रुपये के इस पैकेज़ का ज़मीन पर असर क्या होगा?

3 लाख करोड़ रुपये को यदि सामान्य श्रेणी वाले 45 लाख MSMEs के बीच बराबर से बाँटा जाए तो हरेक के हिस्से में 6.66 लाख रुपये आएँगे। यही वो रक़म है, जिसे देखकर उद्यमी चाहें तो ख़ुशियाँ मना सकते हैं। बीमार (Stressed and NPA) श्रेणी वाले 2 लाख MSMEs के लिए भी 20,000 करोड़ रुपये का प्रावधान भी किया गया है। ये मदद 10 लाख रुपये प्रति इकाई बैठती है। पैकेज़ के बग़ैर 2 लाख उद्यमियों के लिए बैंकों से इसे पाना मुश्किल होता, क्योंकि वो पिछले देनदारी नहीं चुका पाये। फ़िलहाल, ये कहना मुश्किल है कि 10 लाख रुपये के टॉनिक से कितने बीमार MSMEs के दिन फिर जाएँगे और कितने इस रक़म को भी डुबो देंगे?

अब बात ‘ग्रोथ पोटेंशियल’ वाली उस श्रेणी के MSMEs की जिसे सही मायने में ‘भारत को आत्म-निर्भर’ और ‘विश्व गुरु’ बनाना है। ‘2024 तक भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर वाली इकोनॉमी’ बनाने का दारोमदार भी इसी श्रेणी पर है। शायद कोरोना संकट और 2016 से जारी मन्दी को देखते हुए फ़िलहाल ये नारा स्थगित हो गया है। वर्ना, प्रधानमंत्रीजी ‘आत्म-निर्भर भारत’ की बातें करते वक़्त इसका ज़िक्र क्यों नहीं करते? बहरहाल, ग्रोथ पोटेंशियल वाले लघु, छोटे और मझोले श्रेणियों के उद्योगों में निवेश को बढ़ावा देने के लिए 50,000 करोड़ रुपये का ‘फंड ऑफ फंड फॉर इक्विटी इन्फ्यूज़न’ भी बनाया गया है। वैसे ये भी नये जुमले वाला एक कर्ज़ ही है। इसे ज़बरन MSME पैकेज़ का चोला पहनाया गया है।

पैकेज़ में घुसा झुनझुना

MSME के लिए दो अन्य राहत भी मिली है। पहला, 200 करोड़ रुपये तक की सरकारी ख़रीद के लिए अब ग्लोबल टेंडर नहीं होगा। ताकि स्वदेशी कम्पनियों को ही ये धन्धा मिल सके। दूसरा, सरकार और इसकी कम्पनियों में जिन MSMEs का पेमेंट फँसा हुआ है, उसका भुगतान अगले 45 दिनों में हो जाएगा। ग्लोबल टेंडर की बात तो समझ में आती है, लेकिन बकाया भुगतान को वित्तमंत्री किस मुँह से पैकेज़ बता सकती हैं? MSMEs का बकाया उन्हीं का पैसा है, उनका हक़ है। इसे कमीशनख़ोर नौकरशाही अपने भ्रष्टाचारी हथकंडों में फँसाकर रखती है। इसे भी देने के लिए सरकार को 45 दिन समेत शाबाशी भी चाहिए।

इसी तरह, 14 लाख आयकरदाताओं का 5 लाख रुपये तक का रिफंड कर देना भी कोई पैकेज़ नहीं है। वित्तमंत्री का ये कहना भी फ़िज़ूल है कि इससे आयकर रिफंड से अर्थव्यवस्था में 80,000 करोड़ रुपये की लिक्विडिटी बढ़ गयी। कैसे भला? क्या रिफंड पाते ही लोगों ने उस रक़म को खर्च कर दिया? क्या ये लोगों की कोई नयी आमदनी है? ये भी उन्हीं का पैसा है।

ऐसा ही झुनझुना वो ऐलान भी है कि चालू वित्त वर्ष में टीडीएस कटौती में 25 फ़ीसदी की छूट दी जाती है। अरे, क्या इससे टैक्स घट गया, जो ख़ुशी मनायें? रियायत सिर्फ़ इतनी है कि जिसे 100 रुपये टीडीएस जमा करना है, वो अभी 75 रुपये जमा करेगा। लेकिन रिटर्न भरते वक़्त उसे ये 25 रुपये भी भरने होंगे। फ़िलहाल, झुनझुना बजाती वित्तमंत्री को लगता है कि ऐसा करके वो अर्थव्यवस्था में 50,000 करोड़ की डिक्विडिटी बढ़ा देंगी।

अगला ऐलान भी झुनझुना वाला ही है जो बिजली वितरण करने वाली कम्पनियों ‘Discoms’ से जुड़ा है। इसे भी ढोल बजाकर पैकेज़ बताया गया। कहा गया कि बिजली उत्पादन करने वाली कम्पनियाँ अपने ख़रीदारों यानी डिस्कॉम्स को 90,000 करोड़ रुपये का क्रेडिट देंगी। ये क्रेडिट उस रक़म के बदले ही होगी जिसे डिस्कॉम्स अपने उपभोक्ताओं से हासिल करने वाली होंगी या जो उपभोक्ताओं पर बक़ाया होगा। यहाँ असली बात ये है कि यदि डिस्कॉम्स को ऐसी सहूलियत नहीं मिलती तो बिजली पैदा करने वाली कम्पनियों की बिजली का बिकते रहना रुक जाता। इसीलिए ये ख़ुद को दान देने जैसा पुण्य है।

ग़ैर बैंकिंग पैकेज़ की हक़ीक़त

लॉकडाउन के बाद सरकार ने म्यूच्युल फंड की मदद के लिए 50,000 करोड़ रुपये के पैकेज़ का ऐलान किया। फ़िलहाल, ये रक़म अनुपयोगी बनकर रिज़र्व बैंक के पास है। इसी तर्ज़ पर अब वित्त मंत्री ने ग़ैर बैंकिंग वित्तीय कम्पनी (NBFC), हाउसिंग फाइनेंस कम्पनी (HFC) और माइक्रो फाइनेंस कम्पनियों के लिए 30,000 करोड़ रुपये वाले Special liquidity debt scheme का भी ऐलान किया है। ये पैकेज़ कितना बड़ा है? इसे यूँ समझिए कि जिस अर्थव्यवस्था की GDP का 10 फ़ीसदी, 20 लाख करोड़ रुपये है, उसमें 30 हज़ार करोड़ रुपये की औक़ात सिर्फ़ 0.015 प्रतिशत है। इससे ‘आत्म-निर्भर भारत अभियान’ को कैसी गति मिलेगी, इसका अन्दाज़ा लगाना मुश्किल नहीं?

ठेकेदार और EPF पैकेज़

सभी तरह के ठेकेदारों को लॉकडाउन की वजह से अपने करार को निभाने के लिए छह महीने की अतिरिक्त मियाद दी गयी है। उन्हें वक़्त पर करार नहीं निभाने के लिए कोई ज़ुर्माना नहीं भरना पड़ेगा। ठेकेदारों का जितना काम हो चुका है, उसके अनुपात में उनकी बैंक गारंटी को वापस करने के वित्तमंत्री के ऐलान से ठेकेदार बिरादरी को थोड़ी राहत ज़रूर मिलेगी। इसी तरह, कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) से जुड़े कुल 6.5 करोड़ खाताधारकों में से 72 लाख कर्मचारियों को जो सौग़ात सरकार ने 26 मार्च 2020 को दी थी, उस सहूलियत को अब अगस्त तक बढ़ा दिया गया है।

EPF वाली सहूलियत भी 3.66 लाख उद्यमियों और उनके ऐसे कर्मचारियों के लिए ही है, जहाँ 100 से कम कर्मचारी हैं और उनमें से 90 फ़ीसदी की तनख़्वाह 15,000 रुपये से कम है। इसमें नियोक्ता और कर्मचारी ने 12-12 फ़ीसदी की जगह 10-10 फ़ीसदी का अशंदान ही दिया। बाकी रक़म सरकार देगी। ये राहत कुल 6750 करोड़ की है। वित्तमंत्री के तमाम ऐलान में सिर्फ़ यही ऐसा है जो सीधे नीचे तक गया। लेकिन ये राहत प्रति कर्मचारी प्रति माह औसतन 1550 रुपये बैठती है। यानी, हर महीने 775 रुपये की राहत मज़दूर को और इतनी ही राहत उसे नौकरी पर रखने वाले उद्यमी को। अब इस मदद को जितना चाहें उतना महत्वपूर्ण और उदार मान लें।

माँग-पक्ष की कोई परवाह नहीं

साफ़ दिख रहा है कि कोरोना संकट भी मोदी सरकार के पिछले चिन्तन की दशा और इसकी प्रतिबद्धता को डिगा नहीं सका। 2016 की नोटबन्दी के बाद से देश की अर्थव्यवस्था में माँग-पक्ष के तेज़ी से सिकुड़ने का कष्ट जारी है। अब तक प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री ने अपने पिटारे से जितने भी नुस्ख़े निकाले हैं, वो सप्लाई-पक्ष को सुधारने के लिए तो कुछ उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन इनसे माँग-पक्ष का कोई भला नहीं होने वाला। माँग-पक्ष की दशा बदलने के लिए नये रोज़गार पैदा होना ज़रूरी है, जो रोज़गार में हैं उनकी आमदनी बढ़ना ज़रूरी है। जब तक लोगों के पास खर्च करने का पैसा नहीं होगा, खरीदने की ताक़त नहीं होगी, तब तक सप्लाई चाहे जितना उम्दा हो, बात नहीं बनने वाली। कर्ज़ देकर भी माँग को तभी बढ़ाया जा सकता है जब आमदनी कर्ज़ की किस्तें भर सके।

नयी बोतल में पुरानी शराब

इसीलिए ‘आत्म-निर्भर भारत अभियान’ और ‘लोकल के लिए वोकल’ जैसी बातें जुमला हैं। ये ‘नयी बोतल में पुरानी शराब’ जैसी हैं। क्योंकि 2019 की आख़िर में प्रधानमंत्री की ओर से वाराणसी के एक भाषण में ‘लोकल खरीदो’ और ‘लोकल को प्रमोट करो’ वाला नुस्ख़ा देश को मिल चुका था। सवाल ये भी है कि ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्म-निर्भर भारत अभियान’ में क्या फ़र्क़ है? सिवाय इसके कि ‘मेक इन इंडिया’ का ऐलान 15 अगस्त 2015 को ऐतिहासिक लाल क़िले की प्राचीर से हुआ था, तो ‘आत्म-निर्भर भारत अभियान’ का श्रीगणेश 12 मई 2020 को लोक कल्याण मार्ग स्थित प्रधानमंत्री आवास से हुआ।

‘मेक इन इंडिया’ में सबसे बड़ी उम्मीद रक्षा उत्पादन क्षेत्र से थी। इसे शत-प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की अनुमति भी मिली। इसके बावजूद बीते चार वर्षों में इसमें सिर्फ़ 1.17 करोड़ रुपये का विदेशी निवेश हुआ। साफ़ है कि ‘मेक इन इंडिया’ फ्लॉप साबित हुआ। इसी तरह, ‘स्टैंड अप इंडिया’, ‘स्टार्ट अप इंडिया’ और ‘स्किल इंडिया’ जैसे पहले मोदी राज के प्रथम कार्यकाल वाले क्रान्तिकारी नारे भी यदि फ़ुस्स नहीं साबित हुए होते तो अब ‘आत्म-निर्भर भारत अभियान’ की नौबत ही क्यों आती?

वैसे ‘आत्म-निर्भर’ का मतलब क्या है? यही कि हमें आयात पर निर्भर नहीं रहना पड़े, देश की ज़रूरतें देश में ही उत्पादित सामानों से पूरी हों। मोटे तौर पर क्रूड ऑयल, सोना और रक्षा ख़रीदारी, यही तीन क्षेत्र हैं जहाँ भारत आत्म-निर्भर नहीं है। यही हमारा मुख्य और स्थायी आयात का क्षेत्र भी है। बाक़ी, देश में तकनीक, मशीनरी और चिकित्सीय उपकरणों और सामग्री के आयात की हिस्सेदारी, कुल आयात के सामने बहुत छोटी है। इसीलिए, ‘आत्म-निर्भर भारत अभियान’ का असली मक़सद समझना मुश्किल नहीं है। वैसे प्रधानमंत्री जी, 130 करोड़ भारतीयों को मूर्ख भी क्यों बनाना चाहेंगे!

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ओपिनियन

बेशक़, प्रधानमंत्री की सहमति से ही हो रही है श्रम क़ानूनों की ‘हत्या’!

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Migrant Worker labour laws

ऐसे वक़्त में जब कोरोना संक्रमण से पैदा हुई चुनौतियाँ बेक़ाबू ही बनी हुई हैं, तभी हमारी राज्य सरकारों में एक नया संक्रमण बेहद तेज़ी से अपने पैर पसार रहा है। बीते पाँच दिनों में छह राज्यों ने 40 से ज़्यादा केन्द्रीय श्रम क़ानूनों को अपने प्रदेशों में तीन साल के लिए निलम्बित करने का असंवैधानिक और मज़दूर विरोधी फ़ैसला ले लिया।

पहले से ही तक़रीबन बेजान पड़े इन श्रम क़ानूनों को ताक़ पर रखने के संक्रमण की शुरुआत 5 मई को मध्य प्रदेश से हुई। दो दिन बाद इस संक्रमण ने उत्तर प्रदेश और गुजरात को अपनी चपेट में ले लिया। फिर 10 मई को ओडिशा, महाराष्ट्र और गोवा की सरकारों ने भी पूँजीपतियों की मदद के नाम पर मज़दूरों के शोषण के लिए सारे रास्ते खोलने का ऐलान कर दिया। यही रफ़्तार रही तो इस मज़दूर विरोधी संक्रमण को राष्ट्रव्यापी बनने में देर नहीं लगेगी।

कोरोना संकट के दौरान मोदी सरकार ने एक से बढ़कर एक ग़रीब विरोधी और अदूरदर्शी फ़ैसले लिये। लॉकडाउन की आड़ में ग़रीबों पर ऐसे सितम हुए जो भारत में पहले कभी देखे या सुने नहीं गये। दिल दहलाने वाला सबसे बड़ा सितम तो ये रहा कि ग़रीबों की न सिर्फ़ रोज़ी-रोटी छिनी बल्कि जब वो सिर पर कफ़न बाँधकर बड़े-बड़े शहरों से अपने गाँवों को लौटने के लिए सैकड़ों किलोमीटर पैदल ही सड़क नापने लगे तब उन पर पुलिसिया डंडे बरसाये गये। अब मुट्ठी भर ग़रीबों के लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलाने की रस्म अदायगी भी इसीलिए हुई है, ताकि इनकी देखा-देखी विदेश में फँसे सम्पन्न लोगों को विमानों और जहाज़ों से देश में वापस लाया जा सके।

ट्रेनों के अनिश्चितकालीन इन्तज़ार से जिन ग़रीबों का ऐतबार उठ चुका था, उन्हें सड़कों-हज़ारों किलोमीटर लम्बी सड़कों को पैदल भी नहीं नापने दिया जा रहा। जबकि सम्पन्न वर्ग के बच्चों के लिए कोटा बसें भेजीं गयी, स्पेशल ट्रेन चली, हरिद्वार में फँसे गुजरातियों को बसों में भरकर उनके घर पहुँचाया गया तो नांदेड़ में फँसे सिख श्रद्धालुओं को कोरोना के साथ पंजाब पहुँचाया गया। दूसरी ओर, चिलचिलाती धूप में भूखे-प्यासे सड़क नाप रहे ग़रीबों ने तो अपने मुँह पर मॉस्क या रुमाल या गमछा भी बाँध रखा है और वो सोशल डिस्टेंसिंग भी बरत रहे हैं।

जो प्रधानमंत्री ग़रीबों को रोना रोता रहा हो, जो ग़रीबों की सरकार होने और उनका मसीहा होने का जुमला बेचता रहा हो, उसकी नाक के नीचे बदनसीब ग़रीबों को सड़कों तो क्या रेल की पटरियों पर बिछे कंक्रीट पर भी नहीं चलने दिया जा रहा। ऐसा लग रहा है जैसे मोदी सरकार, ग़रीबों और मज़दूरों को जीते-जी मार डालने की किसी ख़ुफ़िया नीति पर काम कर रही है। एक हज़ार दिनों के लिए श्रम क़ानूनों का ख़ात्मा भी इसी साज़िश का हिस्सा है। वैसे भी भारत में ‘मज़दूरों के अधिकार’ सिर्फ़ क़ानून की किताबों तक ही सीमित थे, लेकिन अब कोरोना की आड़ में इन्हें किताबों से भी हटाया जा रहा है।

लॉकडाउन से पहले 130 करोड़ की भारतीय आबादी में क़रीब 31 करोड़ कामग़ार थे। इसमें से 92 फ़ीसदी असंगठित क्षेत्र से जुड़े थे। ये असंगठित सिर्फ़ इसीलिए कहलाये, क्योंकि इन्हें किताबी श्रम क़ानूनों ने कभी संरक्षण नहीं दिया। कुल कामगारों में से अब तक क़रीब 12 करोड़ लोग बेरोज़गार हो चुके हैं। दिहाड़ी मज़दूरों की तो कभी कोई पूछ रही ही नहीं, वेतन भोगी मज़दूरों को भी अप्रैल की तनख़्वाह नहीं मिली। बंगलुरू की अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के मुताबिक, 90 फ़ीसदी मज़दूरों को उनके नियोक्ता यानी इम्पलायरों ने बक़ाया मज़दूरी नहीं दी।

हमारी सामन्ती संस्कृति और इसी पर खड़े पूँजीवादी तंत्र ने देखते ही देखते ‘मज़दूरों के अधिकारों’ और ‘ट्रेड यूनियन’ का ऐसा चरित्र-हनन किया जैसा अभी राहुल गाँधी और नेहरू का हो रहा है। पूँजीवादी मीडिया और समाज में सामाजिक सुरक्षाओं से सबसे ज़्यादा लाभान्वित सरकारी कर्मचारियों के तबक़े ने ‘ट्रेड यूनियन्स’ के प्रति ऐसी नफ़रत फैलायी कि आज सरकारों ने चुटकी बजाकर ‘मज़दूरों के अधिकारों’ को ख़त्म करने की हिम्मत दिखा दी। यही वजह है कि देश में ‘न्यूनतम मज़दूरी’ अब भी एक ख़्वाब ही है। बीते दशकों में ठेका प्रथा का ऐसे विस्तार हुआ, जैसा अभी तक कोरोना का भी नहीं हुआ।

ये आलम किसी से छिपा नहीं है कि मज़दूरों को उनके अधिकार सरकारी श्रम विभाग तो छोड़िए, अदालतें में नहीं दिला रही हैं। मज़दूरों के हक़ों के मामले हमारी अदालतों में दशकों तक इंसाफ़ का मुँह ही देखते रहते हैं। इसीलिए व्यवहारिक तौर पर देश के श्रम क़ानूनों दिखावटी या शो-पीस बने हुए मुद्दत हो गयी, हालाँकि ये मज़दूरों के सैकड़ों बरस के संघर्ष के बाद अस्तित्व में आये थे। अभी जिन क़ानूनों को ख़त्म किया गया है उनमें से कई तो आज़ादी से भी कहीं ज़्यादा पुराने हैं। जैसे 1883 का Factories Act, जिसने काम के लिए आठ घंटे की सीमा बनायी, बाल श्रम को निषेध बनाया, महिलाओं को रात की ड्यूटी पर नहीं लगाने का नियम बनाया। इसी तरह 1926 में बने Trade Union Act को संविधान में अनुच्छेद 19(1)(c) के रूप में मौलिक अधिकार की ताक़त से जोड़ा गया।

1936 के Payment of Wages Act से मज़दूरों को हर महीने वेतन पाने का हक़ मिला। कुछ श्रम क़ानून तो ऐसे हैं जो संविधान से भी पहले के हैं। जैसे 1947 का Industrial Dispute Act, 1948 का Minimum Wage Act. दिलचस्प बात ये भी है कि जिन उद्यमियों को ख़ुश करने के लिए अभी श्रम क़ानूनों की हत्या की गयी है, उनके बारे में कभी कोई ऐसा प्रमाणिक अध्ययन या शोध सामने नहीं आया कि इनकी वजह से ही भारतीय उद्योग पिछड़ा हुआ है। अलबत्ता, ये सही है कि इन क़ानूनों से जो इंस्पेक्टर राज पैदा होता था, उससे सरकारी भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता था। लिहाज़ा, ज़रूरत भ्रष्टाचारी तंत्र को सुधारने की थी, लेकिन इसकी जगह सरकारों ने उन क़ानूनों को सफ़ाया कर दिया जो मज़दूरों को झूठी दिलासा दिलाते रहते थे।

ये किससे छिपा है कि देश में सरकारें पूँजीपतियों की मुट्ठी में ही रही हैं। इसीलिए धन्ना सेठों को कर्ज़ के ज़रिये बैंकों को लूटने की छूट हर दौर में मिलती रही है। ये बात अलग है कि मोदी राज में ये काम बेहद बड़े और व्यापक पैमाने पर हो रहा है। इसीलिए सिर्फ़ इसी तबके ने ‘अच्छे दिन’ का पूरा मज़ा लूटा है। आगे भी इसी की लूट को आसान बनाया जा रहा है। दिलचस्प बात ये भी है कि राज्यों ने चुटकी बजाकर जिस ढंग से अध्यादेश जारी करके केन्द्रीय श्रम क़ानूनों को निलम्बित करने का रास्ता थामा है, उसे संसद ने बरसों-बरस की मशक्कत और अनुभव से तैयार किया था। इसीलिए, राज्यों का फ़ैसला एकतरफ़ा नहीं हो सकता। उनके अध्यादेश को केन्द्र सरकार की रज़ामन्दी की बदौलत राष्ट्रपति की मंज़ूरी भी चाहिए।

इतना तो साफ़ दिख रहा है कि बग़ैर सोचे-समझे, बिना पर्याप्त तैयारी के नोटबन्दी और लॉकडाउन जैसे कड़े फ़ैसले लेने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘मज़दूरों के अधिकारों’ और ‘ट्रेड यूनियन’ को ख़त्म करने के लिए बाक़ायदा अपनी सहमति दी होगी, वर्ना शिवराज सिंह चौहान, योगी आदित्य नाथ, विजय रूपाणी और प्रमोद सावंत जैसों की हिम्मत नहीं हो सकती थी कि वो अपनी मर्ज़ी से इतना बड़ा फ़ैसला ले लें। नवीन पटनायक भी बीजेपी की बी-टीम वाले नेता ही हैं। लेकिन ये बात समझ से परे है कि काँग्रेस और एनसीपी की बैसाखियों पर सवार उद्धव ठाकरे को बीजेपी जैसी मूर्खता करने की क्या पड़ी थी? इन्हें तो बहुत जल्द ही पछताना पड़ेगा।

मौजूदा राष्ट्रपति राम नाथ कोविन्द में इतनी हिम्मत नहीं हो सकती कि वो छह राज्य सरकारों के असंवैधानिक अध्यादेश पर दस्तख़त करने से मना कर दें। क्योंकि देश ने उनकी स्वामि-भक्ति की शानदार लीला को 22 और 23 नवम्बर 2019 की उस ऐतिहासिक रात को देख लिया था, जब उन्होंने रातों-रात महाराष्ट्र से राष्ट्रपति शासन हटाने की अनुमति दे दी थी, ताकि सुबह 7 बजे राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी चटपट देवेन्द्र फड़नवीस की ताजपोशी करवा सकें। पेशे से वकील रह चुके राष्ट्रपति कोविन्द की संवैधानिक समझ को जनता ने उस वक़्त भी देखा था जब उन्होंने विवादास्पद नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) पर दस्तख़त किये थे।

वैसे जिन कोविन्द साहब से अभी श्रम क़ानूनों की परोक्ष रूप से हत्या करवायी जाएगी, उन्होंने ही 8 अगस्त 2019 को उस Code on Wages, 2019 पर दस्तख़त किये थे, जिसे मोदी सरकार ने अपने उद्यमी दोस्तों को ख़ुश करने के लिए श्रम सुधारों का नाम देकर संसद से पारित करवाया था। इस नये क़ानून की नौटंकी से भी कभी किसी का भला नहीं हुआ क्योंकि इसे लागू करने के लिए नियम (Rules) बनाने की सरकार को फ़ुर्सत ही नहीं थी। लिहाज़ा, कोविन्द के अब तक के अनुभव को देखकर कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि वो 2013 वाले एपीजे अब्दुल कलाम की तरह मनमोहन सिंह सरकार को Office of Profit Bill को या 1987 वाले ज्ञानी जैल सिंह की तरह राजीव गाँधी सरकार को Indian Post Office Bill पुनर्विचार के लिए लौटा भी सकते हैं।

फ़िलहाल, ‘मोदी है तो मुमकिन है’ वाला दौर है। इसमें सरकार हर उस काम को अवश्य करती है, जिसकी ज़बरदस्त आलोचना हो रही हो। मोदी जी किसी की नहीं सुनते। तानाशाह की तरह जो जी में आता है, वही करते हैं। उन्हें इस बात की भी परवाह नहीं है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े भारतीय मज़दूर संघ (BMS) ने श्रम क़ानूनों की हत्या को अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के उन सिद्धान्तों या conventions का सरासर उल्लंघन बताया है, जिन पर भारत ने भी दस्तख़त किये हैं। BMS अध्यक्ष शाजी नारायण का कहना है कि ‘श्रम क़ानूनों को ख़त्म किये जाने से ऐसी परिस्थितियाँ पैदा होंगी, जहाँ क़ानून के राज का नामोनिशान ही नहीं रहेगा।’

भारत ने अब तक ILO के 39 conventions पर दस्तख़त किये हैं। इसके आठ बुनियादी conventions को ही श्रम क़ानूनों में अपनाया गया है। मज़दूरों के हक़ का क़त्ल करने से दुनिया भर में भारत की ऐसी बेइज़्ज़ती होगी कि इसका प्रतिकूल असर उस काल्पनिक विदेशी निवेश पर भी पड़ेगा जिसकी उम्मीद में तमाम ऐतिहासिक मूर्खताएँ की जा रही हैं। इसीलिए ये साक्षात अन्धेर है। शर्मनाक है। पाग़लपन है। इससे सिर्फ़ इतना साबित हो रहा है कि कोरोना संकट के आगे हमारी सरकारें बदहवास हो चुकी हैं, अपनी सुध-बुध गवाँ चुकी हैं। इनकी मति मारी गयी है। इन पर सत्ता का ऐसा नशा सवार है कि इन्हें उचित-अनुचित का भी होश नहीं। ज़ाहिर है कि मोदीजी के सामने क़ानून के राज और संविधान की औक़ात ही क्या है!

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