अद्भुत है मोदीजी की 'कष्ट-थिरैपी'! | WeForNewsHindi | Latest, News Update, -Top Story
Connect with us

ब्लॉग

अद्भुत है मोदीजी की ‘कष्ट-थिरैपी’!

मोदीजी को पता है कि जनता जितना कष्ट में रहेगी, उतना ही उनकी ओर तारणहार की तरह देखेगी। तारणहार, यानी भगवान। आम तौर पर लोग कष्टों को भगवान की मर्ज़ी ही समझते हैं। तभी तो भगवान से ही कष्टों को हरने की प्रार्थना करते रहते हैं।

Published

on

Narendra Modi

बात कई दिन पुरानी है, लेकिन है झकझोर देने वाली सच्ची घटना। एक नौकरशाह ने प्रधानमंत्री की चाटुकारिता करते हुए, उनका सच्चा हमदर्द बनते हुए और उनके प्रति वफ़ादारी जताते हुए कहा कि ‘सर, प्रवासी मज़दूर बहुत तकलीफ़ में हैं। कहीं हमें इसका ख़ामियाज़ा न उठाना पड़ जाए।’

जवाब में मोदी ने कहा, ‘अरे छोड़ो! परेशान होने की कोई ज़रूरत नहीं है। इस देश के लोगों को कष्ट सहने की आदत है। सदियों से कष्ट झेलते आये हैं। देखा नहीं कि लोग मन्दिरों में दर्शन के लिए कैसे-कैसे कष्ट झेलते हैं? जितना कष्ट झेलते हैं, उतनी ही उनकी श्रद्धा बढ़ती जाती है। इसलिए मस्त रहो, हमारा कुछ नहीं बिगड़ने वाला।’

इतना सुनकर सरकारी बाबू को तो चुप होना ही था। सो वो हो गया। लेकिन हफ़्ते भर पहले निजी बातचीत ये प्रसंग मुझ तक पहुँचा। पहले तो फ़ोन पर ही मैं सन्न रह गया। अगले ही पल सहज हुआ तो अनायास मोदीजी की सूझ-बूझ का क़ायल हो गया। मुझे लगा कि इस आदमी को भारतीयों की मानसिकता की कितनी बुनियादी और व्यावहारिक समझ है! कई दिनों तक मैं मोदीजी की सूझ-बूझ की तुलना बीरबल और तेनालीराम के किस्सों से करता रहा। हमेशा अतीत की एक से एक ख़बरें मेरे दिमाग़ में कौंधने लगीं।

मैं याद करता गया कि सचमुच, जनता ने नोटबन्दी में कैसे-कैसे कष्ट झेले, तब वो इस मुग़ागते में भी रही कि उसके कष्ट से देश के बड़े कष्ट जैसे कालाधन, आतंकवाद, जाली-नोट वग़ैरह यदि मिट सकते हैं, रईसों को यदि तकलीफ़ झेलनी पड़ेगी तो फिर नोटबन्दी वाले कष्ट अच्छे हैं। इसके बाद व्यापारियों ने नोटबन्दी और जीएसटी की वजह-वजह से कैसे-कैसे कष्ट झेले, देश आर्थिक मन्दी की गर्त में धँसता चला गया, बेरोज़गारी और छँटनी, आम बातें बनने लगीं। किसानों की बदहाली, बैंकों की दुर्दशा, गिरता रुपया, बढ़ता पेट्रोल-डीज़ल का दाम, लोकतांत्रिक संस्थाओं और मीडिया के पतन की दशा किससे छिपी है।

ऐसे तमाम राष्ट्रीय कष्टों से मोदी की लोकप्रियता पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ा। वो दिनों-दिन और मज़बूत तथा निरंकुश बनते चले गये। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से राम मन्दिर का सौदा करवा लिया, 370 को उखाड़ फेंका, ज़बरन CAA लाकर दिखा दिया। मतलब साफ़ है कि उनकी सत्ता और सरकार ने लोगों को जितना कष्ट दिया, उतना ही उनका यश-गान बढ़ता चला गया। परपीड़ा से पनपने वाले, फलने-फूलने वाले विश्व के चुनिन्दा राजनेताओं में नरेन्द्र मोदी का नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज़ हो चुका है।

अभी देश और इंसानियत के लिए सबसे बड़ी आफ़त बनकर कोरोना सामने आया, लेकिन जनता की नब्ज़ पकड़ने के महारथी मोदीजी ने इस आपदा को भी अपनी ब्रॉन्डिंग का इवेंट में बदल दिया। ताली-थाली वादन और अन्धेरा-दीया का खेल खेलकर मोदीजी ने दिखा दिया कि उन्हें इस देश के लोगों को अपने इशारे पर नचाना आता है। इसके बाद बिल गेट्स की संस्था से ख़ुद को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्री भी घोषित करवा दिया। इस दौरान, PPE की किल्लत, टेस्टिंग का बेहद कम होना, वेंटिलेटर्स की किल्लत और टेस्ट-किट आयात घोटाला, जैसे तमाम मुद्दों ने सिर ज़रूर उठाया लेकिन अपने शानदार मीडिया मैनेज़मेंट से मोदीजी ने सबकी हवा निकाल दी।

दूरदर्शी मोदीजी काफ़ी पहले से जानते थे कि कोरोना से निपटने में भारत सरकार की बहुत छीछालेदर हो सकती है। इसीलिए ऐन वक़्त पर तब्लीगी वाला बम फोड़ा गया। इसके बाद, देखते ही देखते पूरे उत्तर भारत में कट्टरवादी हिन्दुओं के बीच ये धारणाएँ बेहद गहराई से बिठा दी गयीं कि कोरोना के लिए मुसलमान दोषी हैं। हिन्दू-मुस्लिम के ऐसे खेल से मोदीजी और मज़बूत बनकर उभरे। उन्होंने और संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कोरोना को अधार्मिक कहने की फ़ुर्सत तब निकाली जब तक कि साम्प्रदायिकता वाला ज़हर देश के पूरे शरीर में फैल चुका था। इसकी वजह से कुछेक विश्व मंच पर भारत की किरकिरी भी हुई, लेकिन इसमें भी ऐसी जान नहीं थी कि मोदीजी के चेहरे पर शिकन भी आ सके।

कोरोना आपदा के दौरान ही मोदीजी ने कोटा के छात्रों की आड़ में नीतीश कुमार का भी अच्छा ख़ासा हिसाब कर दिया। बीजेपी शासित राज्यों ख़ासकर उत्तर प्रदेश और राजस्थान ने अपने प्रदेश के बच्चों को वहाँ से निकाल लिया। लेकिन नीतीश बाबू ‘दो तरह की नीतियों’ की दुहाई ही देते रहे। किसी के कान पर जूँ तक नहीं रेंगी। कोरोना का फ़ायदा उठाकर मोदीजी ने ममता दीदी को दिन में ही तारे दिखा दिये। मृतकों की संख्या घटाकर दिखाने की ममता सरकार की कोशिश का भांडा फूटते ही बीजेपी ने अपनी सियासत को चमका लिया। केरल के मुख्यमंत्री ने लॉकडाउन में ढील को लेकर ज़रा ही उदारता क्या दिखायी मोदी दरबार से ऐसी फटकार लगी कि होश ठिकाने आ गये।

प्रवासी मज़दूरों की दुर्दशा का सारा ठीकरा भी बहुत ही चतुराई से नरेन्द्र भाई ने राज्यों के सिर पर ही फोड़ दिया। इसी तरह, दिल्ली में केजरीवाल और महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे को घुटनों का बिठा रखा है, क्योंकि यहाँ कोरोना के आँकड़े लगातार भयावह होते जा रहे हैं। अभी समाज का हरेक अंग आर्थिक दिक्कतें झेल रहा है। ग़रीबों का कष्ट कहीं भारी है। सरकारी कर्मचारियों की भी तनख़्वाह काटी जा चुकी है। एक झटके में उनका डेढ़ साल का डीए डूब गया। हरेक बाबू को चपत लगी, लेकिन कष्ट सहने के अभ्यस्त लोगों की ओर से कोई प्रतिशोध सामने नहीं आया।

मोदीजी को पता है कि कम से कम डेढ़ साल से पहले तो देश की अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटने से रही। इसीलिए सरकारी कर्मचारी और पेंशनर्स ने भी ख़ुद को लम्बे कष्ट के लिए तैयार कर लिया है। ये मोदीजी की ‘कष्ट-थिरैपी’ की सबसे बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि सरकारी कर्मचारियों वाला समाज का तबका हमेशा से ख़ुद को सबसे सुरक्षित समझता रहा है। इनकी हक़ीक़त भी ऐसी ही रही है। देश दल-दल में हो तो भी ये मौज़ में रहते थे। पिछली सरकारें हरेक उताव-चढ़ाव से अपने कर्मचारियों को अछूता रखती रही हैं। लेकिन ‘कोउ नृप होई हमै का हानि’ वाला ये तबका भी इतिहास में पहली बार असामान्य कष्ट झेलने वाला है।

मोदीजी को पता है कि जनता जितना कष्ट में रहेगी, उतना ही उनकी ओर तारणहार की तरह देखेगी। तारणहार, यानी भगवान। आम तौर पर लोग कष्टों को भगवान की मर्ज़ी ही समझते हैं। तभी तो भगवान से ही कष्टों को हरने की प्रार्थना करते रहते हैं। ईश्वर के विरोध या उसके ख़िलाफ़ बग़ावत का कोई रिवाज़ किसी भी मज़हब में नहीं है। ऐसे तत्व-ज्ञान के सबसे बड़े मर्मज्ञ मोदीजी ही हैं। जनता चाहे जितना कष्ट में रहे, वो निष्कंटक चक्रवर्ती बने रहेंगे।

Mukesh Kumar Singh मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

Mukesh Kumar Singh मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

ब्लॉग

‘ग़रीब कल्याण रोज़गार’ के तमाशे के पीछे अभी तो बस बिहार चुनाव ही है

Published

on

गरीब-कल्याण-रोजगार-योजना

मेरा 30 साल का सारा पत्रकारीय अनुभव और कौशल ये पता नहीं लगा पाया कि बिहार और बंगाल की चुनावी बेला को ध्यान में रखकर घोषित हुआ केन्द्र सरकार का चमत्कारी ‘ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान’ वास्तव में ज़मीन पर कब से और कितना चमत्कार दिखा पाएगा? कोरोना की मार खाकर बदहवासी के साथ अपने गाँवों को लौटे कितने स्किल्ड (हुनरमन्द) प्रवासी मज़दूरों को, कितने दिनों का, कितनी आमदनी वाला और कैसा रोज़गार देकर उनका उद्धार करके उन्हें और उनके गाँवों को ख़ुशहाल बना पाएगा?

कृपया मेरी इस वेदना पर यक़ीन करें कि 30 साल के अपने पत्रकारीय जीवन में मैंने कभी किसी एक ख़बर का ब्यौरा जानने के लिए इतनी मगज़मारी या इतनी मेहनत नहीं की, जितना बीते चार दिनों में की। जब से वित्तमंत्री ने इस अभियान का एलान किया, और इसके शुभारम्भ के लिए बिहार के खगड़िया ज़िले को चुना गया, तभी से मैं इस सरकारी योजना का पूरा ब्यौरा जानने के लिए बेताब था। क्योंकि तमाम सरकारी शोर-शराबे और डुगडुगी बजाकर मुनादी करवाने वाले चिरपरिचित अन्दाज़ के साथ शुरू हुई 50,000 करोड़ रुपये के अभियान का वास्ता जिस ‘ग़रीब’, ‘कल्याण’ और ‘रोज़गार’ से है, वहीं तीनों मिलकर ही को असली ‘भारत’ बनाते हैं।

लिहाज़ा, ‘इंडिया’ वाली कोरोना और भारत-चीन सीमा विवाद के सच-झूठ पर नज़र रखते हुए मैं ‘ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान’ की बारीकियाँ जानने में भी जुटा रहा। केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के कुछेक आला अफ़सरों से भी सम्पर्क किया, लेकिन सरकारी प्रेस विज्ञप्तियों, ट्वीटर-फ़ेसबुक के ढकोसलों और पॉवर प्लाइंट प्रेज़ेंटेशन वाले ऑडियो-वीडियो भाषणबाज़ी के सिवाय और कुछ भी हाथ नहीं लगा।

दरअसल, किसी भी सरकारी योजना को तमाम बन्दिशों से गुज़रना पड़ता है। जैसे, यदि सरकार एक बाँध बनाना चाहे तो महज इसका एलान होने या बजट आबंटन होने या शिलान्यास होने से काम शुरू नहीं हो जाता। ज़मीन पर काम शुरू होने की प्रक्रिया ख़ासी लम्बी और जटिल होती है। मसलन, बाँध कहाँ बनेगा, वहाँ का नक्शा बनाने के लिए सर्वे होगा, सर्वे से विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) बनेगी, फिर तरह-तरह के टेंडर होंगे और टेंडर अवार्ड होने के बाद बाँध के निर्माण का काम शुरू होगा। इसके साथ ही ये पता लगाया जाएगा कि बाँध में कितना इलाका डूबेगा, वहाँ के लोगों का पुर्नवास कहाँ और कैसे होगा, इसकी लागत और अन्य झंझट क्या-क्या होंगे? इसके बाद भी सारा मामला इतना जटिल होता है कि दस साल की परियोजना, अनुमानित लागत के मुकाबले पाँच गुना ज़्यादा वास्तविक लागत से तीस साल में तैयार हो पाती है।

इसी तरह ये जानना भी ज़रूरी है कि सरकार 50,000 करोड़ रुपये की जिस ‘ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान’ की बात कर रही है, उसके विभिन्न आयाम क्या-क्या हैं? क्योंकि अभी तक सरकार ने इस अभियान को ‘गड्ढे खोलने वाली’ मनरेगा से अलग बताया है। मनरेगा में 202 रुपये मज़दूरी और साल के 365 दिनों में से कम से कम 100 दिन काम की गारंटी की बातें हैं। अब चूँकि कोरोना की वजह से शहरों से गाँवों को लौटे प्रवासी मज़दूरों की ‘स्किल मैपिंग’ करवाने की बातें भी हुई हैं तो क्या अलग-अलग स्किल के हिसाब से लोगों को अलग-अलग मज़दूरी भी मिल जाएगी? इस सवाल का कहीं कोई ब्यौरा नहीं है।

इसी तरह, ‘ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान’ को लेकर फ़िलहाल, इतना ही बताया गया है कि इसे प्रवासी मज़दूरों की सहायता के लिए देश के 733 में से 116 ज़िलों में 125 दिनों तक मिशन मोड में चलाया जाएगा। ये ज़िले 6 राज्यों – बिहार (32), उत्तर प्रदेश (31), मध्य प्रदेश (24), राजस्थान (22), ओडिशा (4) और झारखंड (3) के हैं। इनमें से बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश तो ऐसे हैं जिन्हें 1980 में बीमारू राज्य का ख़िताब मिला था। बीते 40 वर्षों में इन बीमारू राज्यों ने विकास के एक से बढ़कर एक अद्भुत ध्वजवाहकों की सरकारें देखीं, लेकिन कोई भी अपने राज्य को बीमारू के कलंक से उबार नहीं सका। उल्टा जिन आधारों पर ये बीमारू बताये गये थे, उसके मुताबिक इनसे अलग हुए झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड भी बीमारू राज्यों की श्रेणी में ही जा पहुँचे।

अगली ज्ञात जानकारी है कि ‘ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान’ को 12 विभिन्न मंत्रालयों का साझा कार्यक्रम बनाया जाएगा। इनके नाम हैं – ग्रामीण विकास, पंचायती राज, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग, खान, पेयजल और स्वच्छता, पर्यावरण, रेलवे, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस, नयी और नवीकरणीय ऊर्जा, सीमा सड़क, दूरसंचार और कृषि मंत्रालय। इन सभी की अफ़सरशाही के बीच समन्वय की ज़िम्मेदारी ग्रामीण विकास मंत्रालय की होगी। अभियान के तहत कम्युनिटी सैनिटाइजेशन कॉम्पलेक्स, ग्राम पंचायत भवन, वित्त आयोग के फंड के तहत आने वाले काम, नेशनल हाइवे वर्क्स, जल संरक्षण और सिंचाई, कुएँ की खुदाई, वृक्षारोपण, हॉर्टिकल्चर, आंगनवाड़ी केन्द्र, प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण), प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, रेलवे, श्यामा प्रसाद मुखर्जी RURBAN मिशन, PMKUSUM, भारत नेट के फाइबर ऑप्टिक बिछाने, जल जीवन मिशन आदि 25 स्कीम्स में काम कराये जाएँगे।

लेकिन अभी कोई नहीं जानता कि इन दर्जन भर मंत्रालयों को अपनी-अपनी योजनाओं के लिए ‘स्किल्ड प्रवासी मज़दूर’ क्या ग्रामीण विकास मंत्रालय सुलभ करवाएगा या फिर उनके बजट को लेकर उन्हें सिर्फ़ वाहवाही देने की कोई ख़ुफ़िया रणनीति है? हालाँकि, जितनी जानकारी अभी तक सामने आयी है, उसके आधार पर इसे ‘अच्छे दिन’ की एक और उपलब्धि बताना जल्दबाज़ी होगी। लेकिन ये मानने का भी कोई आधार तो हो ही नहीं सकता कि सरकारी अमला इस अभियान को ज़मीन पर उतारने में महीनों से पहले कामयाब हो जाएगा। ध्यान रहे कि सरकार का पहिया बहुत भारी होता है और काफ़ी मुश्किल से घूम पाता है।

अब ज़रा 50,000 करोड़ रुपये की भारी भरकम रकम की महिमा को भी खंगाल लिया जाए। एक मोटा अनुमान है कि किसी भी सरकारी निर्माण पर क़रीब आधी रकम मज़दूरी पर खर्च होती है। इसका मतलब ये हुआ कि ‘ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान’ के तहत ताज़ा एलान में मज़दूरी का हिस्सा क़रीब 25,000 करोड़ रुपये होगा। इसे यदि 125 से विभाजित करें तो रोज़ाना का 200 करोड़ रुपये बैठेगा। इसे 116 ख़ुशनसीब ज़िलों से विभाजित करें तो हरेक ज़िले के हिस्से में रोज़ाना के 1.72 करोड़ रुपये आएँगे। अब यदि हम ये मान लें कि स्किल्ड प्रवासी मज़दूरों को मनरेगा के मज़दूरों के मुकाबले डेढ गुना वेतन भी मिला तो इसका औसत रोज़ाना 300 रुपये बैठेगा। इस 300 रुपये से यदि 1.72 करोड़ रुपये को विभाजित करें तो हम पाएँगे कि 125 दिनों में हरेक लाभान्वित ज़िले में 57,471 प्रवासी मज़दूरों की ही किस्मत सँवर पाएँगी।

अलबत्ता, यदि मज़दूरी 300 रुपये से ज़्यादा हुई तो मज़दूरों की संख्या उसी अनुपात में घटती जाएगी। अब ज़रा सोचिए कि इस अभियान से उन एक करोड़ से ज़्यादा प्रवासी मज़दूरों में से कितनों का पेट भरेगा, जिन्हें रेलवे की श्रमिक स्पेशल ट्रेनों के ज़रिये शहरों से उनके गाँवों को भेजा गया है। यहाँ उन अभागे प्रवासी मज़दूरों का तो कोई हिसाब ही नहीं है जो चिलचिलाती धूप में सैकड़ों किलोमीटर लम्बी सड़कों को पैदल नापकर या रेल की पटरियों पर चलकर अपने गाँवों को पहुँचे हैं।

ज़रा तस्वीर का दूसरा पहलू भी देखिए कि वित्त मंत्रालय ने 2016 के आर्थिक सर्वेक्षण में बताया था कि देश में कुल कामगार 48 करोड़ से ज़्यादा हैं और हरेक तीसरा कामगार प्रवासी मज़दूर है। यानी, प्रवासी मज़दूरों की संख्या 16 करोड़ बैठी। हालाँकि, महीने भर पहले जब वित्त मंत्री ने 21 लाख करोड़ रुपये के पैकेज़ का ब्यौरा दिया तो उन्होंने प्रवासी मज़दूरों की संख्या को 8 करोड़ मानते हुए उन्हें तीन महीने तक 5 किलो चावल या गेहूँ मुफ़्त देने के बजट का वास्ता दिया था। साफ़ है कि ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान के असली लाभार्थियों की संख्या जितनी बड़ी है, उसके लिए 50,000 करोड़ रुपये और 12 मंत्रालयों की सारी क़वायद ऊँट के मुँह में जीरा ही साबित होगी।

फ़िलहाल, इतना ज़रूर है कि अक्टूबर-नवम्बर में होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव से पहले सत्ता पक्ष इस अभियान को लेकर ख़ूब ढोल पीटता रहेगा। 25 अक्टूबर को बिहार में दुर्गापूजा की धूम रहेगी, फिर 14 नवम्बर को दिवाली और 20 नवम्बर को छठ पूजा की। बिहार की मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल 29 नवम्बर तक है। इससे पहले जनादेश आ ही जाएगा। और हाँ, ‘ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान’ की 125 दिनों की मियाद 26 अक्टूबर को ख़त्म हो जाएगी। हालाँकि, सरकार का कहना है कि वो इस अभियान को आगे भी जारी रख सकती है। लेकिन बात कैसे और कब आगे बढ़ेगी? इसे जानने के लिए तो इन्तज़ार करना ही होगा।

तब तक यदि प्रवासी मज़दूरों के सामने भूखों मरने की नौबत आ गयी तो सरकार का वैसे ही कोई दोष नहीं होगा, जैसे कोरोना संक्रमितों की संख्या का रोज़ाना अपना ही रिकॉर्ड तोड़ने का सिलसिला जारी है। या फिर, जैसे विकास का सारा बोझ अपने कन्धों पर उठाये पेट्रोल-डीज़ल के दाम रोज़ाना नये रिकार्ड बनाने में जुटे हुए हैं। या फिर, लद्दाख में भारत-चीन सीमा पर बग़ैर किसी घुसपैठ के बावजूद भारतीय सैनिक ख़ुद को शहीद करने पर आमादा रहे हैं, वायुसेना के लड़ाकू विमानों की अग्रिम अड्डों पर तैनाती और ‘फ़्लाई पास्ट’ हो रहा है तथा शान्ति का नारा लगा रहे चीनी सेना के जबाब में हमारी थल सेना भारतीय इलाके में मज़मा लगाकर और तालियाँ बजाकर उनका अभिनन्दन कर रही है। ज़ाहिर है, 130 करोड़ भारतीयों में से जितने भी ‘नासमझ’ हैं वो ‘झुकने और बिकने’ का मतलब तो बहुत अच्छी तरह से समझ चुके हैं!

Mukesh Kumar Singh मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

Continue Reading

ब्लॉग

शेयर बाजार में पूरे सप्ताह रहा उतार-चढ़ाव, 1.5 फीसदी टूटे सेंसेक्स, निफ्टी

Published

on

By

Stock Market Down

मुंबई, 13 जून (आईएएनएस)। घरेलू शेयर बाजार में इस सप्ताह भारी उतार-चढ़ाव का दौर लगातार जारी रहा, लेकिन लगातार दो सप्ताह बढ़त कायम नहीं रह पाई। घरेलू कारकों और कमजोर विदेशी संकेतों से सेंसेक्स और निफ्टी दोनों पिछले सप्ताह के मुकाबले करीब 1.5 फीसदी की गिरावट के साथ बंद हुए।

बंबई स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) के 30 शेयरों पर आधारित संवेदी सूचकांक सेंसेक्स पिछले सप्ताह के मुकाबले 506.35 अंकों यानी 1.48 फीसदी की गिरावट के साथ 33,780.89 पर बंद हुआ।

नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) के 50 शेयरों पर आधारित संवेदी सूचकांक निफ्टी पिछले सप्ताह के मुकाबले 169.25 अंकों यानी 1.67 फीसदी की कमजोरी के साथ 9972.90 पर ठहरा।

बीएसई मिडकैप सूचकांक पिछले सप्ताह से 45.99 अंकों यानी 0.37 फीसदी की कमजोरी के साथ 12,600.15 पर जबकि स्मॉलकैप सूचकांक 9.90 अंक फिसलकर 11,845.27 पर रूका।

सप्ताह के आरंभ में हालांकि सोमवार को सेंसक्स 83.34 अंकों की बढ़त बनाकर 34370.58 पर रूका और निफ्टी 25.30 अंक चढ़कर 10,167.45 पर बंद हुआ, लेकिन अगले सत्र में मंगलवार को गिरावट आ गई और सेंसक्स पिछले सत्र से 413.89 अंक यानी 1.20 फीसदी की कमजोरी के साथ 33956.69 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 120.80 अंकों यानी 1.19 फीसदी की गिरावट के साथ 10,046.65 पर ठहरा।

घरेलू बाजार में बुधवार को फिर रिकवरी आ गई और सेंसेक्स 290.35 अंक चढ़कर 34,247.05 पर ठहरा, जबकि निफ्टी 69.50 अंकों की बढ़त के साथ 10,116.15 पर रूका। अगले दिन फिर बाजार में बिकवाली के भारी दबाव में सेंसेक्स पिछले सत्र से 708.68 यानी 2.07 फीसदी लुढ़ककर 33,538.37 पर बंद हुआ। निफ्टी भी पिछले सत्र से 214.15 अंकों यानी 2.12 फीसदी की गिरावट के साथ 9,902 पर बंद हुआ।

सप्ताह के आखिरी सत्र में हालांकि काफी उतार-चढ़ाव रहा, लेकिन आखिर में जबरदस्त रिकवरी के साथ सेंसेक्स पिछले सत्र से 242.52 अंक चढ़कर 33,780.89 पर ठहरा और निफ्टी ने भी 70.90 अंकों की बढ़त बनाई फिर भी 10,000 के मनोवैज्ञानिक स्तर को बनाए रखने में नाकाम रहा।

कोरोनावायरस का संक्रमण गहराने और प्रमुख टेलीकॉम कंपनियों को एजीआर बकाया मामले में सर्वोच्च न्यायालय से राहत नहीं मिलने से घरेलू बाजार में कारोबारी रुझान कमजोर हुआ। वहीं, अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था में सुधार को लेकर जो संकेत दिया है वह आशावादी नहीं है, इसलिए विदेशी बाजारों में कमजोरी आई ,जिसका असर भारतीय शेयर बाजार पर भी दिखा।

Continue Reading

ओपिनियन

यदि देश में ‘समानान्तर सरकार’ चल रही है तो क्या भारत में गृह युद्ध छिड़ चुका है?

आश्चर्य की बात तो यह भी है कि सरकार को नाख़ुश कर रहे 19 हाईकोर्ट का क्षेत्राधिकार तक़रीबन 90 फ़ीसदी आबादी से जुड़ा हुआ है। क्या यह माना जाए कि कोरोना संकट के आगे देश का सारा संवैधानिक ढाँचा चरमरा चुका है। हालात पूरी तरह से हाथ से निकल चुके हैं। सरकारों ने जनता को उसकी क़िस्मत के हवाले कर दिया है।

Published

on

Parliament

कोरोना संकट की आड़ में जैसे श्रम क़ानूनों को लुगदी बनाया गया, क्या वैसा ही सलूक अब न्यायपालिका के साथ भी होना चाहिए? क्योंकि बक़ौल सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता, देश के 19 हाईकोर्ट्स के ज़रिये ‘कुछ लोग समानान्तर सरकार’ चला रहे हैं। ज़ाहिर है, ‘इन लोगों’ की जजों के साथ मिलीभगत भी होगी ही। वर्ना, देश के दूसरे नम्बर के सर्वोच्च विधि अधिकारी सॉलिसीटर जनरल की मति तो नहीं ही मारी गयी होगी कि वो न्यायपालिका के सबसे बड़े ‘प्रतीक और मन्दिर’ सुप्रीम कोर्ट में ‘समानान्तर सरकार’ के वजूद में आ जाने की दुहाई दें।

सॉलिसीटर जनरल कोई राजनेता तो होता नहीं। उनका तो काम ही है कि न्यायपालिका के सामने सरकार का पक्ष रखना, सरकार का बचाव करना भले ही इसके लिए उन्हें झूठी दलीलें तक क्यों ना गढ़नी पड़ें। तुषार मेहता कोई इकलौते नहीं हैं। अतीत में भी सभी विधि अधिकारियों ने ऐसे ही किरदार निभाये हैं। लेकिन पहले कभी देश में लोकतांत्रिक सरकारें होने के बावजूद ‘समानान्तर सरकार’ चलने की नौबत नहीं आयी। ये सही भी पहले कभी कोरोना संकट भी नहीं आया। हालाँकि, हैज़ा, प्लेग, चेचक जैसी महामारियाँ पहले भी आती रही हैं। लिहाज़ा, अब यदि वाक़ई में सॉलिसीटर जनरल सही फ़रमा रहे हैं कि देश में ‘समानान्तर सरकार’ चल रही है तो निश्चित रूप से मानना पड़ेगा कि देश में सर्वोच्च किस्म का संवैधानिक संकट खड़ा हो चुका है।

समानान्तर सरकार की नौबत कैसे आयी?

क्या संवैधानिक सरकारों के रहते हुए ‘समानान्तर सरकार’ का चलना ये बताता है कि देश में अघोषित गृह युद्ध की दशा पैदा हो चुकी है? यदि हाँ, तो ये सबसे गम्भीर स्थिति है। इसीलिए ये सवाल भी लाज़िमी है कि देश में लोकसभा के अस्तित्व में रहते हुए, ‘वैधानिक’ सरकारों के रहते हुए, अनुशासित सेनाओं और परमार्थ की ख़ातिर अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को तत्पर पुलिस तथा ‘वफ़ादार’ नौकरशाही के रहते हुए, परम राष्ट्रवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और परम देश भक्त राजनीतिक दल भारतीय सत्ता पार्टी (BJP) की अपार बहुमत वाली मोदी सरकार के रहते हुए भी ‘समानान्तर सरकार’ चलने की नौबत कैसे आ गयी?

यदि ‘समानान्तर सरकार’ की नौबत इसलिए आयी कि न्यायपालिका उच्चशृंखल होकर अपनी लक्ष्मण रेखाओं को लाँघ रही है तो क्या देश की ख़ातिर न्यायपालिका को भंग करने का वक़्त नहीं आ गया है? आख़िर, न्यायपालिका देश से बढ़कर तो नहीं हो सकती और सरकार से बढ़कर देश का हितैषी और कौन हो सकता है? सुप्रीम कोर्ट में तुषार मेहता बहैसियत ‘सरकार’ ही तो बोल रहे थे। गनीमत है कि उन्होंने बहुत संयम दिखाते हुए सुप्रीम कोर्ट से हाईकोर्ट्स पर नकेल कसने की गुहार नहीं लगायी। ज़ाहिर है, सरकार बहुत सब्र से पेश आ रही है। इसीलिए ‘समानान्तर सरकार’ चलाने वालों को फ़िलहाल, देशद्रोही भी नहीं बताया जा रहा। लेकिन कौन जाने कि पानी कब सिर से ऊपर चला जाए।

देश के 25 में से 19 हाईकोर्ट बने बाग़ी?

130 करोड़ भारतवासियों को ये कौन समझाएगा कि संविधान ने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट्स को नागरिकों के मूल अधिकारों का संरक्षक बनाया है? कोरोना संकट को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी दर्ज़नों फ़रियादें पहुँचीं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के हरेक दावे को ब्रह्म सत्य माना। ऐसे में हाईकोर्ट्स की ये ज़ुर्रत कैसे हो सकती कि वो सरकारों को तरह-तरह की हिदायतें दें और यहाँ तक कि ख़ुद अस्पतालों का दौरा करके वहाँ की दुर्दशा का जायज़ा लेने की धमकियाँ दें? दिलचस्प तो ये भी है कि ‘समानान्तर सरकार’ चलाने वाले कोई एकाध जज या हाईकोर्ट नहीं है, जिन्हें अपवाद समझकर नज़रअन्दाज़ किया जा सके। बल्कि देश के 25 में से 19 हाईकोर्ट्स सरकारों को प्रति बाग़ी तेवर दिखा चुके हैं।

अभी तक कोरोना संकट से पनपे हालात को देखते हुए जिन हाईकोर्ट्स ने जनहित याचिकाओं की सुनवाई की है, वो हैं: इलाहाबाद, गुजरात, झारखंड, कर्नाटक, केरल, आन्ध्र प्रदेश, बॉम्बे, कोलकाता, दिल्ली, पटना, उड़ीसा, सिक्किम, मणिपुर, मेघालय, तेलंगाना, गुवाहाटी, मद्रास, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश। इनमें से पटना, दिल्ली, आन्ध्र प्रदेश और बॉम्बे हाईकोर्ट ने तो इतनी हिम्मत दिखा दी कि वो हालात का स्वतः संज्ञान (sue motto) लेकर सरकारों से जबाब-तलब करने लगे, उन्हें फ़टकार लगाने लगे और सख़्त हिदायतें देने लगे।

गुजरात हाईकोर्ट ने हद्द पार की?

गुजरात हाईकोर्ट ने तो हद्द ही कर दी। इसके जजों ने तो अद्भुत गुजरात मॉडल की बखियाँ उधेड़नी शुरू कर दी, उसमें पतीला लगाना शुरू कर दिया। कभी अहमदाबाद के सिविल अस्तपाल को कालकोठरी बता दिया तो कभी ग़रीब मरीजों की देखभाल, अस्पतालों में वेंटिलेटर की कमी, डॉक्टरों और हेल्थ वर्कर्स के लिए सुरक्षा को लेकर विजय रूपाणी सरकार के कामकाज़ पर सवालिया निशान लगाये। इसकी जेबी परदीवाला और जस्टिस इलेश जे वोहरा वाली खंडपीठ ने सिविल अस्पताल पर छापा मारने तक की धमकी दे डाली।

कोरोना संकट को लेकर दिन-रात अपनी पीठ ख़ुद ठोंकने में जुटी मोदी सरकार के लिए हाईकोर्ट के ऐसा रवैया नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त तो होना ही था। लिहाज़ा, चीफ़ जस्टिस विक्रम नाथ ने सरकार के ज़ख़्मों पर मरहम लगाते हुए ‘कोरोना क्राइसिस के जुड़े मामलों’ की सुनवाई कर रही परदीवाला-वोहरा खंडपीठ को ही भंग कर दिया। बेचारे, ऐसा नहीं करते तो क्या उनके सुप्रीम कोर्ट पहुँचने का दरवाज़ा हमेशा-हमेशा के लिए बन्द नहीं हो जाता? इसी तरह, तेलंगाना हाईकोर्ट में जस्टिस आर एस चौहान और बी विजयसेन रेड्डी की खंडपीठ ने तो केसीआर सरकार पर संक्रमितों की संख्या को छिपाने को लेकर फटकार लगा दी और अस्पतालों को आदेश दे दिया कि वो शवों का पोस्टमार्टम किये बग़ैर उन्हें अस्पतालों से बाहर नहीं होने दें।

क्या संवैधानिक ढाँचा चरमरा गया?

मोदी सरकार ने वही किया या करवाया जो उसके स्वभाव में है। लेकिन ताज़्ज़ुब की बात तो ये है कि अचानक हमारी हाईकोर्ट और उसके जज इतने दुस्साहसी कैसे होने लगे कि वो ‘सरकार’ को नाख़ुश करने वाले आदेश देने लगें। आश्चर्य की बात तो ये भी है कि सरकार को नाकुश कर रहे 19 हाईकोर्ट्स का क्षेत्राधिकार तक़रीबन 90 फ़ीसदी आबादी से जुड़ा हुआ है। क्या ये माना जाए कि कोरोना संकट के आगे देश का सारा संवैधानिक ढाँचा चरमरा चुका है। हालात पूरी तरह से हाथ से निकल चुके हैं। सरकारों ने जनता को उसकी किस्मत के हवाले कर दिया है।

हाईकोर्ट्स के तेवरों से सरकार के लिए दूसरा ख़तरनाक सन्देश ये उभरा है कि इसके जजों में अब दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस एस मुरलीधर के वाक़ये का कोई ख़ौफ़ नहीं रह गया है। अभी महज तीन महीने पहले, फरवरी 2020 में जस्टिस मुरलीधर को दिल्ली के साम्प्रदायिक दंगों को लेकर सख़्ती दिखाने की सज़ा रातों-रात उनका तबादला करके दी गयी थी। शायद, उन्होंने बीजेपी के नेताओं के भड़काऊ बयानों पर दिल्ली पुलिस और सरकार को फटकार लगाकर उस ‘लक्ष्मण रेखा’ को पार कर दिया था, जिसने आगे चलकर ‘समानान्तर सरकार’ जैसे संवैधानिक संकट का रूप ले लिया।

रेलमंत्री के दावों की हक़ीकत

28 मई को रेलमंत्री पीयूष गोयल ये बताते हुए ख़ासे प्रसन्न थे कि “कोरोना आपदा में रेलवे की श्रमिक स्पेशल ट्रेनों ने अभी तक 50 लाख से अधिक कामगारों को सुविधाजनक व सुरक्षित तरीके से उनके गृहराज्य पहुंचाया है। इसके साथ ही रेलवे अब तक 84 लाख से अधिक निशुल्क भोजन व 1.25 करोड़ पानी की बोतल भी वितरित कर चुकी है।” इस बयान के भारी भरकम आँकड़े यदि आपको सुखद लगें तो ज़रा इसका विश्लेषण करके देखिए।

जब मुफ़्त भोजन वाले 84 लाख पैकेट को 50 लाख कामग़ारों को दिया गया होगा तो हरेक कामग़ार के हिस्से में दो पैकेट भी नहीं आये। 16 लाख कामग़ार ऐसे ज़रूर रहे होंगे जिन्हें दूसरा पैकेट मिलने से पहले ही पैकेट ख़त्म हो चुके होंगे। इसी तरह, 1.25 करोड़ पानी की बोतल का हिसाब भी प्रति कामग़ार सवा दो बोतल ही बैठता है। अब ज़रा सोचिए कि सवा दो बोतल पानी और एक-डेढ़ पैकेज खाने के साथ मौजूदा गर्मी के मौसम ट्रेन का जनरल क्लास के डिब्बे में 2-4 दिन का औसतन सफ़र करने वाले कामग़ारों पर क्या-क्या बीतती होगी? ज़रा सोचिए कि क्या कोई ईमानदारी से रेलमंत्री की वाहवाही कर सकता है?

इसी तरह, आप चाहें तो रेलमंत्री के अन्य ट्वीट्स को देखकर भी अपना सिर धुन सकते हैं। मसलन, मुज़फ़्फ़रपुर में रेलवे स्टेशन पर अपनी माँ का कफ़न खींचकर उसे जगा रहे नन्हें बच्चे वाली वारदात के बारे में पीयूष गोयल बताते हैं कि “हमें संवेदना रखनी चाहिये, जो वीडियो वॉयरल हुआ उसकी पूरी छानबीन हुई, मृतक के रिश्तेदारों ने लिखित में बयान दे कर बताया कि वह पहले से बीमार थी, और उसके कारण उनकी मृत्यु हुई।” उनका अगला दावा देखिए, “यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि यात्रा के दौरान किसी कारणवश किसी का देहांत हो गया, लेकिन इसमें खाना नही मिला, या पानी नही मिला, ऐसी कोई स्थिति नही थी।”

श्रमिक स्पेशल ट्रेनें या लेबर रूम?

इसी वक़्त रेल मंत्री ये भी बताते हैं कि “30 से अधिक बच्चे श्रमिक ट्रेनों में पैदा हुए हैं।” अब ये आप है कि आप चाहें तो गर्व करें कि श्रमिक स्पेशल ट्रेनों की गुणवत्ता इतनी उम्दा थी कि उसमें सफ़र कर रही गर्भवती महिलाओं ने उसे किसी अस्पताल के ‘लेबर रूम’ जैसा समझ लिया। या फिर आप ये भी मान सकते हैं कि इन जच्चाओं की दशा सफ़र के दौरान इतनी बिगड़ गयी कि वो चलती ट्रेन में प्रसव पीड़ा झेलती रहीं। इसी सिलसिले में एक के एक करके ट्वीट किये गये एक अन्य ट्वीट में रेलमंत्री बताते हैं कि “राज्य सरकारों की जिम्मेदारी तय की गयी थी, केंद्र ने पैसा भी दिया था, महिलाओं के खाते में पैसा भी भेजा, मुफ्त में अनाज भी दिया। जिन राज्यों ने अच्छे से जिम्मेदारी का पालन किया वहां कोई समस्या नही आई।”

अब ज़रा पीयूष गोयल के एक और ट्वीट पर ग़ौर फ़रमायें। “PM @NarendraModi जी का ये विज़न था , उन्होंने ये समझा कि देश में अगर संक्रमण रोकने के लिये वॉयरस की चैन नही तोड़ते, और स्वास्थ्य सेवाओं को बढाने का समय नही मिलता तो कितना गंभीर संकट देश के ऊपर आ सकता था। उन्होंने बहुत सूझबूझ से ये Lock Down घोषित किया।”

इस तरह, मोदी सरकार के चहेते वरिष्ठ मंत्री ने ये साफ़ कर दिया कि मोदीजी के सूझबूझ भरे लॉकडाउन के ज़रिये वॉयरस की चेन तोड़ी गयी, स्वास्थ्य सेवाएँ बढ़ायी गयीं, श्रमिकों को पूरी सुख-सुविधा के साथ उनके घरों तक भेजा गया। इसके बाद भी यदि किसी का कोई ग़िला-शिकवा है तो उसके लिए राज्य ज़िम्मेदार हैं, क्योंकि जिन एनडीए शासित राज्यों ने अपनी ज़िम्मेदारी निभायी वहाँ कोई समस्या नहीं आयी। इसके बावजूद, देश के 19 हाईकोर्ट्स यदि किसी निहित राजनीतिक स्वार्थ की वजह से ‘समानान्तर सरकार’ चलाने पर आमादा हैं तो सुप्रीम कोर्ट में सॉलिसीटर जनरल ऐसे ‘गुस्ताख़’ हाईकोर्ट्स के साथ क्या नरमी से पेश आएँगे?

Mukesh Kumar Singh मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

Continue Reading
Advertisement
Maharashtra Police
राष्ट्रीय1 min ago

महाराष्ट्र में 222 पुलिसकर्मी कोरोना पॉजिटिव

coronavirus
राष्ट्रीय2 mins ago

मिजोरम में कोरोना के 23 नए मामले

Sharjeel Imam
राष्ट्रीय15 mins ago

दिल्ली हाई कोर्ट से शरजील इमाम की याचिका खारिज

Alcohol-
राष्ट्रीय17 mins ago

ओडिशा: शराब पर कोविड शुल्क में बदलाव, अब 15 फीसदी तक ज्यादा होगी कीमत

rahul gandhi
राजनीति24 mins ago

विकास दुबे के एनकाउंटर पर बोले राहुल- कई जवाबों से अच्छी है ख़ामोशी

coronavirus
राष्ट्रीय39 mins ago

बिहार में कोरोना के 352 नए केस आए सामने

Coronavirus
राष्ट्रीय46 mins ago

नागालैंड में कोरोना के 36 नए मामले

coronavirus
राष्ट्रीय1 hour ago

ओडिशा में कोरोना के 755 नए केस

Coronavirus
राष्ट्रीय1 hour ago

आंध्र प्रदेश में कोरोना के 1608 नए केस आए सामने

Coronavirus
राष्ट्रीय2 hours ago

हिमाचल प्रदेश में कोरोना के कुल 1141 मामले

Stock Market Down
ब्लॉग4 weeks ago

शेयर बाजार में पूरे सप्ताह रहा उतार-चढ़ाव, 1.5 फीसदी टूटे सेंसेक्स, निफ्टी

अंतरराष्ट्रीय4 weeks ago

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री यूसुफ रजा कोरोना पॉजिटिव

गरीब-कल्याण-रोजगार-योजना
ब्लॉग3 weeks ago

‘ग़रीब कल्याण रोज़गार’ के तमाशे के पीछे अभी तो बस बिहार चुनाव ही है

टेक4 weeks ago

भारत में गुगल सर्च, असिस्टेंट एंड मैप्स पर कोरोना परीक्षण केंद्र खोजें

coronavirus
अंतरराष्ट्रीय3 weeks ago

बांग्लादेश में बढ़ रहा कोरोना का प्रकोप, ‘रेड जोन’ में तैनात की जाएगी सेना

Coronavirus
अंतरराष्ट्रीय3 weeks ago

कोरोना से बचने के उपायों पर बांग्लादेश को रिपोर्ट सौंपेगा चीन

Coronavirus Robot
अंतरराष्ट्रीय4 weeks ago

चीन में कोरोना वायरस संक्रमण के 15 नए मामले

लाइफस्टाइल4 weeks ago

जेजीयू क्यूएस रैंकिंग 2021 में भारत का शीर्ष निजी विश्वविद्यालय बना

disney
अंतरराष्ट्रीय4 weeks ago

डिज्नीलैंड ने 17 जुलाई से थीम पार्क खोलने की घोषणा की

अंतरराष्ट्रीय3 weeks ago

पुरी दुनिया में हर 100 लोगों में से एक व्यक्ति विस्थापित : यूएनएचसीआर

Kapil Sibal
राजनीति4 weeks ago

तेल से मिले लाभ को जनता में बांटे सरकार: कपिल सिब्बल

Vizag chemical unit
राष्ट्रीय2 months ago

आंध्र प्रदेश: पॉलिमर्स इंडस्ट्री में केमिकल गैस लीक, 8 की मौत

Delhi Police ASI
शहर3 months ago

दिल्ली पुलिस के कोरोना पॉजिटिव एएसआई के ठीक होकर लौटने पर भव्य स्वागत

WHO Tedros Adhanom Ghebreyesus
स्वास्थ्य3 months ago

WHO को दिए जाने वाले अनुदान पर रोक को लेकर टेडरोस ने अफसोस जताया

Sonia Gandhi Congress Prez
राजनीति3 months ago

PM Modi के संबोधन से पहले कोरोना संकट पर सोनिया गांधी का राष्ट्र को संदेश

मनोरंजन3 months ago

रफ्तार का नया गाना ‘मिस्टर नैर’ लॅान्च

WHO Tedros Adhanom Ghebreyesus
अंतरराष्ट्रीय3 months ago

चीन ने महामारी के फैलाव को कारगर रूप से नियंत्रित किया : डब्ल्यूएचओ

मनोरंजन3 months ago

शिवानी कश्यप का नया गाना : ‘कोरोना को है हराना’

Honey Singh-
मनोरंजन4 months ago

हनी सिंह का नया सॉन्ग ‘लोका’ हुआ रिलीज

Akshay Kumar
मनोरंजन4 months ago

धमाकेदार एक्शन के साथ रिलीज हुआ ‘सूर्यवंशी’ का ट्रेलर

Most Popular