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सम्पन्न तबके की दूरदर्शिता के बग़ैर पटरी पर नहीं लौटेगी अर्थव्यवस्था

कोरोना संकट के पहले से अर्थव्यवस्था पर गहराई चौतरफ़ा मन्दी और बढ़ती बेरोज़गारी का कहर ग़रीबों के बाद अब मध्य वर्ग पर सितम ढाने को तैयार है। अर्थव्यवस्था के हरेक सेक्टर के सामने अब लाखों-करोड़ों मज़दूरों का टोटा मुँह बाए खड़ा है।

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Migrant Workers in Train

भारत के 90 फ़ीसदी लोगों का गुज़र-बसर असंगठित क्षेत्र और दिहाड़ी मज़दूरी के ज़रिये ही होती है। अर्थव्यवस्था में इस तबके का वही मतलब है जो शरीर की कोशिकाओं का है। देश के 90 फ़ीसदी लोगों का भरण-पोषण यही क्षेत्र करता है। कोशिकाओं को ख़ून से पोषण मिलता है। स्वस्थ ख़ून के लिए सन्तुलित भोजन और सही पाचन तंत्र का होना ज़रूरी है। तभी उस ताक़तवर ख़ून का उत्पादन होगा, जिसे दिल हरेक कोशिका तक पहुँचाकर पूरे शरीर को तंदुरुस्त रखता है। इसीलिए कोरोना संकट की वजह से तबाह असंगठित क्षेत्र और दिहाड़ी मज़दूरों की परवाह किये बग़ैर चरमरा चुकी भारतीय अर्थव्यवस्था के दिन नहीं फिरने वाले। ये तबका जितना और जितनी देरी तक बदहाल रहेगा, भारत की दुर्दशा का दौर उतना ही लम्बा खिंचता रहेगा।

देश के कई इलाकों से जैसे-जैसे लॉकडाउन में ढील दिये जाने की ख़बरें आने लगीं वैसे ही ये ख़बरें भी आ रही हैं कि मज़दूर नदारद हैं। यानी, अर्थव्यवस्था के पहिये को घुमाने वाले असंगठित क्षेत्र के मज़दूर अब नहीं मिल रहे हैं। साफ़ है कि निकट भविष्य में अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौटने के आसार नहीं हैं। कोरोना संकट के पहले से अर्थव्यवस्था पर गहराई चौतरफ़ा मन्दी और बढ़ती बेरोज़गारी का कहर ग़रीबों के बाद अब मध्य वर्ग पर सितम ढाने को तैयार है। अर्थव्यवस्था के हरेक सेक्टर के सामने अब लाखों-करोड़ों मज़दूरों का टोटा मुँह बाए खड़ा है। आने वाले महीनों में मज़दूरों का संकट और बड़ा तथा व्यापक होता जाएगा। कोरोना संकट से पहले जैसी भी ख़ुशहाली हुआ करती थी, वो भी ख़ासतौर पर ग़रीब मज़दूरों के पसीने और शोषण से ही पैदा हो रही थी।

मज़दूरों का अपने गांव लौटना

अब मज़दूर अपने गाँवों में लौटकर तब तक अपनी दुर्दशा का सामना करेंगे जब तक कि उनके फिर से शहरों में पलायन के हालात नहीं बन जाएँ। ज़ाहिर है, गाँवों की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था उनका बोझ उठाने में जब कोरोना से पहले सक्षम नहीं थी तो अब कहाँ से हो जाएगी? ग़रीब मज़दूरों के लिए गाँवों में रोज़ी-रोटी की गुंज़ाइश होती तो बेचारे शहरों की ओर पलायन ही क्यों करते? गाँवों में पहले भी या तो मज़दूरी की गुंज़ाइश नहीं थी, या फिर मज़दूरी इतनी कम थी कि ग़ुजारा मुश्किल था।

लिहाज़ा, अब जब अर्थव्यवस्था चरमरा चुकी है तो मज़दूरी और नीचे ही गिरेगी। अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि कोरोना ने देश के 12 करोड़ लोगों को वापस ग़रीबी रेखा के नीचे धकेल दिया है। अब इस अतिरिक्त आबादी में भी कुपोषण, अशिक्षा और सेहत सम्बन्धी तकलीफ़ें बढ़ेंगी। ये संकट देश की उस 60 फ़ीसदी आबादी को अपने आगोश में लेगा जिसे हम असंगठित क्षेत्र के कामगारों और दिहाड़ी मज़दूरों के रूप में देखते हैं।

अर्थव्यवस्था में माँग के कमज़ोर पड़ना

अर्थव्यवस्था में माँग के कमज़ोर पड़ने का सबसे भारी असर ग़रीबों पर ही पड़ता है। क्योंकि मध्यम वर्ग की जब आमदनी घटने लगती है या जब उस पर बेरोज़गारी की मार तगड़ी होती है, तब वो अपने बचत के सहारे ही दिन काटता है। ऐसे कठिन दिनों में वो कम से कम खर्च करना चाहता है। इससे माँग ज़ोर नहीं पकड़ती। इससे सप्लाई साइड पर उत्पादन को नहीं बढ़ाने या घटाने का दबाव पड़ता है। क्षमता से कम उत्पादन होने पर लागत बढ़ जाती है। इसीलिए चीज़ें सस्ती नहीं होतीं। उधर, कम से कम ख़र्च करने की मज़बूरी में लोग नये सामान की ख़रीदारी टालते रहते हैं और कम से कम में गुज़ारा करने की कोशिश करते हैं। ऐसे चक्र की वजह से असंगठित क्षेत्र और दिहाड़ी मज़दूरों की दशा और बदतर होने लगती है।

संकट की घड़ी में सरकार और बैंकों का सहारा

संकट की ऐसी घड़ी में सरकार और बैंकों का सहारा होता है। लेकिन ये दोनों भी तभी मदद कर सकते हैं जब इनका ख़ुद का हाल अच्छा हो। आमदनी गिरने से बचत गिरती है और बचत गिरने से निवेश गिरता है। उधर, सरकार राजस्व के लिए तरसती है तो टैक्स बढ़ाने लगती है। पेट्रोल-डीज़ल जैसे ज़रूरी चीज़ के अतिशय महँगा होने से महँगाई उछलने लगती है। महँगाई बढ़ने और आमदनी के लगातार कम होते जाने से मध्यम वर्ग पर अपने खर्चों को और घटाने का दबाव बनता है। इससे उत्पादन और धीमा होता है तथा असंगठित क्षेत्र और दिहाड़ी मज़दूरों की दशा और बदतर होने लगती है।

उधर, बैंक उन निवेशकों के लिए तरसते हैं जो उनसे कर्ज़ लें और अर्थव्यवस्था के पहिए में रफ़्तार डालने के लिए आगे आएँ। लेकिन निवेशक तो पहले से ही माँग के गिरने और लागत बढ़ने से कराह रहा होता है। कष्ट के ऐसे दौर में रिश्वतख़ोर और बेईमान नौकरशाही और बेरहम हो जाती है। इसीलिए निवेशक नया जोख़िम उठाने से और डरते हैं। यही आर्थिक मन्दी का कुचक्र है। इसमें भँवर और दलदल दोनों के गुण होते हैं।

मन्दी से उबरने का तरीका

मन्दी से उबरने का बस एक ही टिकाऊ तरीका है कि सम्पन्न वर्ग अपनी कमाई या सम्पत्ति को अपने कर्मचारियों के बीच बाँटने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा आगे आये। जब तक ये तबका अपने मुनाफ़े को अपने कर्मचारियों में बाँटने के लिए आगे नहीं आएगा, तब तक न तो बैंक सुधर पाएँगे, ना सरकार का राजस्व और ना ही ग़रीबों की दुर्दशा। सम्पन्न तबका जब अमीर-ग़रीब की खाई को घटाने के लिए आगे आने लगेगा तभी अर्थव्यवस्था में गति दिखायी देगी। अलबत्ता, ये बात भी दीगर है कि एक बार जब अर्थव्यवस्था चल पड़े तो सम्पन्न वर्ग फिर से उसी दौर में लौटने की सोच सकता है, जहाँ से वो और धनवान बनने की अनन्त यात्रा पर आगे जा सके।

अभी कोरोना की आड़ में मुट्ठी भर कम्पनियों ने ऐलान किया कि वो अपने कर्मचारियों की तनख़्वाह नहीं काटेंगी। लेकिन दूसरी ओर, कितने ही बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों ने अपने कर्मचारियों के वेतन में कटौती करने का रास्ता थाम लिया। ऐसी कटौतियाँ करने वाले उद्यमी ना तो अपने बिज़नेस का भला कर रहे हैं और ना ही कष्ट उठाकर, दबाव झेलकर, तनाव को बर्दाश्त करके देश की ही सेवा कर रहे हैं। इन्हें सिर्फ़ अपनी सम्पत्ति और सम्पन्नता का ख़्याल है। संकट काल में भी ऐसे सम्पन्न लोगों को अपने ही उन कर्मचारियों, मज़दूरों तथा इनके परिवारों की कोई परवाह नहीं है, जिनके पुरुषार्थ से ही ये सम्पन्न होते रहे हैं।

लोगों पर भारी से भारी टैक्स लगाना

दिलचस्प बात ये है कि इन सम्पन्न लोगों पर भारी से भारी टैक्स लगाकर भी न तो समाज में बदलाव लाया जा सकता है और ना ही अर्थव्यवस्था में गति। क्योंकि ज़्यादा टैक्स से सिर्फ़ सरकारी लूट और भ्रष्टाचार बढ़ता है। सरकार का राजस्व तो तभी बढ़ता है जब टैक्स की दर कम से कम या इतनी नहीं हो कि वो लोगों को चुभने लगे। टैक्स-दर के ऊँचा होते ही लोगों में इसकी चोरी की प्रवृत्ति बढ़ती है। इससे टैक्स-संग्रह गिरता है। लिहाज़ा, सरकार तभी कल्याणकारी योजनाओं पर ज़्यादा खर्च कर पाएगी जब टैक्स की दरें कम हों, महँगाई कम हो, आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ें और इनकी बढ़ोत्तरी से कुल टैक्स-संग्रह बढ़े। इसीलिए अर्थव्यवस्थाएँ ज्यों-ज्यों उन्नत होती हैं, त्यों-त्यों ऐसे आर्थिक सुधार अपनाती हैं जो आर्थिक गतिविधियों को और बढ़ा सकें। इसी से विकास दर बढ़ती है।

अब सवाल ये है कि सम्पन्न लोग कैसे समाज में अपनी सम्पत्ति का ज़्यादा बँटवारा करें? कैसे अमीर-ग़रीब के बीच की खाई को पाटने के काम पर आगे बढ़ा जाए? इसका पहला तरीका तो ये है कि ये उन लोगों के यथासम्भव उदारतापूर्वक मज़दूरी दें जो उनके लिए काम करते हैं। इससे न सिर्फ़ कामगारों की आमदनी बेहतर होगी, बल्कि देखते ही देखते बहुत कुछ बेहतर होने लगेगा। दूसरा तरीका है कि सम्पन्न लोग अपनी सम्पत्ति का ख़ासा हिस्सा समाज में स्कूल, अस्पताल, मज़दूर बस्तियाँ वग़ैरह बनवाने पर खर्च करें। कमज़ोर तबके के होनहार छात्रों को वज़ीफ़ा वग़ैरह देकर प्रोत्साहित करें। उन तमाम गतिविधियों पर धर्मार्थ खर्च करने के लिए आगे आयें जिसका लाभ परोक्ष रूप से कमज़ोर तबकों को मिले। इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है।

हफ़्तों से चर्चा है कि अर्थव्यवस्था में जान फूँकने के लिए सरकार कुछ पैकेज़ देने की तैयारी कर रही है। लेकिन सही मायने में भारत में ग़रीबों की विकराल आबादी को देखते हुए बड़े से बड़े पैकेज़ से भी फ़ौरी राहत के सिवाय और कुछ भी हासिल नहीं होगा। क्योंकि आख़िर सरकार भी पैकेज़ के लिए रकम कहाँ से लाएगी? आर्थिक मन्दी के बाद कोरोना संकट की वजह से राजस्व-संग्रह ध्वस्त हो चुका है। सरकार के पास अपने कर्मचारियों को वेतन देने के लिए पैसे नहीं हैं। बाक़ी विकास तो भूल ही जाइए। ख़ज़ाना खाली है। बैंक पहले से ही बदहाल हैं। तो फिर विकल्प क्या हैं? नये नोट छापिए या कर्ज़ लीजिए या सरकारी सम्पत्ति बेचिए।

नये रुपये छापना या कर्ज़ लेना

नये रुपये छापने से रुपये की क़ीमत गिरती है। महँगाई बढ़ती है। इससे ग़रीब और बदहाल होता है। मन्दी आती है। कर्ज़ लेना विकल्प है, लेकिन ऐसे दौर में जब अमीर देश भी आर्थिक बदहाली से ही गुज़र रहे हों तब कर्ज़ देने वाले भी मुश्किल से मिलते हैं। कर्ज़ की अर्थव्यवस्था भी तभी ठीक है, जब आपके पास उसकी किस्तें भरने के लिए आमदनी या राजस्व हो। वर्ना, यदि आपको पाकिस्तान की तरह कर्ज़ चुकाने के लिए भी कर्ज़ लेना पड़े तो आप गर्त में डूबते जाएँगे। सरकारी सम्पत्तियाँ या कम्पनियों को बेचने का विकल्प भारी राजनीतिक क़ीमत माँगता है। इससे पूँजीपतियों को भारी फ़ायदा होता है। सरकार की बहुत बदनामी होती है। इस विकल्प की भी सबसे बड़ी ख़ामी ये है कि आप लम्बे समय तक सरकारी सम्पत्तियाँ बेचकर सरकारी खर्चों की भरपाई नहीं कर सकते।

आख़िरकार, आपके पास अर्थव्यवस्था में नयी जान फूँकने के अलावा कोई टिकाऊ विकल्प नहीं होता। इसीलिए, दुआ कीजिए कि भारत के सम्पन्न वर्ग को सदबुद्धि आये, वो दूरदर्शिता से काम ले और राजनीतिक नेतृत्व उसे ग़रीबों के प्रति उदारता दिखाने के लिए प्रेरित करे। क्योंकि अर्थशास्त्र का ये भी नियम है कि पैसे का काम तो पैसे से ही होगा। पैसा वही देगा, जिसके पास होगा। लिहाज़ा, बेहतर है कि जिनके पास पैसा है वो अपने आसपास के लोगों को उसका हिस्सा देने का ज़रिया बनाएँ। अर्थव्यवस्था रेंगने लगेगी तभी इसके दौड़ने के हालात बनेंगे। इसीलिए असंगठित क्षेत्र और दिहाड़ी मज़दूरों की परवाह किये बग़ैर किसी का भला नहीं होने वाला। अमीरों की अमीरी के लिए ग़रीबों का ज़िन्दा और स्वस्थ रहना बेहद ज़रूरी है।

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लौंगी भुइंया से दशरथ मांझी बनने की पूरी कहानी

लौंगी भुइंया के साथ के लोग शायद अब उनके साथ न हों पर आने वाली उस गाँव की पीढ़ी “लौंगी भुइंया” का हमेशा शुक्रगुज़ार रहेगी।

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Longi Bhuiyan

अभी हाल ही में महामारी के दौरान आप सभी को पता लगा… की लोग शहर छोड़ अपने-अपने गाँव लौट रहे है। और उनमें जो मजदूर थे वो ज़्यादातर बिहार से ताल्लुक रखते थे। ख़ैर ये तो बात थी उनके लौटने की।उनके अपने गाँव छोड़ शहर जाने की कहानी भी बहुत लम्बी है …पर उसके बारे में बात फिर कभी।

फिलहाल उन्हीं लम्बी कहानियों में से एक कहानी हैं, बिहार के “गया” ज़िले की राजधानी पटना से 200 किमी दूर बांकेबाज़ार प्रखंड की कहानी हैं।

यहाँ पर रहने वाले लोगों की ज़िन्दगी खेती पर ही निर्भर हैं और खेती निर्भर है पानी पर… यानी सिंचाई पर। और यहीं से शुरू होती है यहाँ पर रहने वाले लोगों के संघर्ष की कहानी।

यहाँ के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि है। मगर धान और गेहूं की खेती के लिए जो पानी उन्हें चाहिए था उस पानी और वहाँ रहने वालों के बीच जो सबसे बड़ा रोड़ा था वो था एक “पहाड़” ।

और यहीं से शुरू होती है देश के दूसरे दशरथ मांझी लौंगी भुइंया की कहानी।

पानी की किल्लत की वजह से वहां से लोगों का पलायन शुरू हुआ, और पलायन का असर उनके घर तक आ पहुंचा।

यहाँ तक की उनके खुद के बेटों ने भी वो गाँव छोड़ दिया। फिर एक दिन हुआ यूँ की लौंगी भुइंया उसी पहाड़ पर बकरी चरा रहे थे की अचानक उनको ख्याल आया की अगर ये पहाड़ तोड़ दिया जाए तो पलायन रुक सकता है।

उस दिन उस ख्याल ने उन्हें ढंग से सोने नहीं दिया। उनकी पत्नी ने भी उनसे कहा की…. ये तुमसे नहीं हो पायेगा । पर लौंगी भुइंया को अपनी ज़िद्द के आगे कुछ समझ नहीं आया।
फिर क्या था…. फावड़ा उठाया और चल दिया पहाड़ तोड़ने।

30 साल अकेले फावड़े और दूसरे औज़ारों से उन्होंने आज 3 किमी लम्बी नहर खोद डाली और पानी गाँव तक पहुंचा दिया। इस साल पहली बार उनके गाँव तक बारिश का पानी पहुंचा और इसी वजह से आसपास के तीन गाँव के किसानों को भी इसका लाभ मिल रहा हैं। लोगों ने इस बार धान की फसल भी उगाई है। पर अफ़सोस की अब तक गाँव के कई लोग दूसरे शहरों में पलायन कर चुके हैं।

लौंगी भुइंया के साथ के लोग शायद अब उनके साथ न हों पर आने वाली उस गाँव की पीढ़ी “लौंगी भुइंया” का हमेशा शुक्रगुज़ार रहेगी।

लौंगी भुइंया कहते हैं “हम एक बार मन बना लेते हैं तो पीछे नहीं हटते। अपने काम से जब फुर्सत मिलता हम नहर काटने में लग जाते।

हमारी पत्नी कहती थी की तुमसे नहीं हो पायेगा…. लेकिन मुझे लगता था की हो जायेगा।

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कांग्रेस की बीमारियां उन्हें क्यों सता रहीं जिन्होंने इसे वोट दिया ही नहीं?

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Sonia Gandhi and Rahul

मध्यम वर्गीय, शिक्षित, खाते-पीते लोगों और ख़ासकर सवर्णों के बीच कांग्रेस की चिर परिचित बीमारियां अरसे से आपसी चर्चा का मुद्दा बनती रही हैं। लेकिन मज़े की बात तो ये है कि ऐसा अनायास नहीं है। बल्कि बाक़ायदा, सुविचारित रणनीति के तहत ऐसा करवाया जा रहा है। इसे संघ के ‘डैमेज़ कंट्रोल एक्सरसाइज़’ की तरह देखा जा सकता है। इसकी कई वजहें साफ़ दिख रही हैं। संघ को स्पष्ट ‘फ़ीडबैक’ मिल रहा है कि मोदी सरकार की लोकप्रियता में पलीता लगा हुआ है। कोरोना को दैवीय प्रकोप यानी ‘एक्ट ऑफ़ गॉड’ बताने का खेल जनता को हज़म नहीं हो रहा।

औंधी पड़ी अर्थव्यवस्था ने उन करोड़ों लोगों की आँखें भी खोल दी हैं जो ख़ुद को भक्त कहे जाने पर गर्व महसूस करते थे। अब लोगों को अच्छी तरह समझ में आने लगा है कि मोदी सरकार और इसके रणनीतिकार देश को आर्थिक दलदल से बाहर नहीं निकाल सकते। इनके पास ऐसी दृष्टि ही नहीं है। क़ाबिलियत ही नहीं है। ये जितना नुकसान कर चुके हैं, उसकी भरपाई कभी नहीं कर पाएँगे। बोलचाल की भाषा में इसे ही कहते हैं, ‘इनसे ना हो पाएगा!’

दूसरी तरफ, राजनीति में दिलचस्पी रखने वाला हर शख़्स जानता है कि कांग्रेस बीमार है। कई सालों से बीमार है। बीमारी को गम्भीर भी बताया जाता है। हालांकि, कांग्रेसियों को पता है कि उनकी पार्टी में क्या-क्या बीमारियां हैं और वो कितनी गम्भीर हैं? वो बीमारियों के इलाज से भी वाक़िफ़ हैं और अच्छी तरह जानते भी हैं कि इलाज कब और कैसे किया जाना है? इलाज कितना कामयाब रहेगा, इसे लेकर भी वो कोई ख़ुशफ़हमी नहीं पालना चाहते।

कांग्रेस की इन सारी बातों में कोई ख़बर नहीं है। जबकि ख़बर के अन्दर की ख़बर तो ये है कि कांग्रेस की बीमारियों को लेकर, उसके परिवारवाद और वंशवाद को लेकर, तमाम योजनाओं और भवन-मार्ग वग़ैरह के नाम नेहरू-गाँधी परिवार के लोगों के नाम पर आधारित क्यों है, इन बातों को लेकर सबसे ज़्यादा परेशानी उन लोगों को सता रही है जिन्होंने 2019 और 2014 में कांग्रेस को वोट नहीं दिया था। इस परेशानी की असली वजह है मोदी सरकार का कामकाज और इसका प्रदर्शन। क्योंकि अब मध्यम वर्ग की आँखें खुलने लगी हैं। उसे ‘नाम बड़े और दर्शन छोटे’ का रोज़ाना अहसास हो रहा है। इसीलिए उसे भरमाने के लिए संघियों के दुष्प्रचार वाले सिस्टम ने भी अपने घोड़े खोल दिये हैं।

दरअसल, मध्यम वर्ग बेहद मायूस है। इतना कि उसे अब मौनी मनमोहन सिंह के दिनों की याद बहुत ज़्यादा सताने लगी है। इसे सोनिया-राहुल भी अब पहले जितने ‘घटिया और पतित’ नहीं लग रहे। मोदी जी के भाषण अब इसे भरमा नहीं पा रहे, क्योंकि इनकी बातों, नये-नये मंत्रों तथा जुमलों से उनका मोहभंग होने लगा है। इसने कोरोना काल के 21 लाख करोड़ रुपये के पैकेज की सच्चाई को क़रीब दे देख लिया है। इसकी समझ में आ गया है कि चीन को लेकर प्रधानमंत्री ने कैसे देश को गुमराह किया।

मध्यम वर्ग को तो 2016 की नोटबन्दी की लम्बी लाइनों से लेकर अब तक के तमाम अनुभवों की एक-एक बात याद आ रही है, क्योंकि तब से अब तक आर्थिक मोर्चों पर इसके हाथ लगातार सिर्फ़ बुरी ख़बरें ही आयी हैं। राम मन्दिर, 370 और तीन तलाक़ जैसे फ़ैसलों से इसे मिली ख़ुशी अब काफ़ूर हो चुकी है। कोरोना में इसने सरकारी दावों और विकास के स्तर की हक़ीक़त को भी बहुत क़रीब से देख लिया है।

छंटनी, बेरोज़गारी और गिरती आमदनी का आलम हर घर में मौजूद है। नयी नौकरियों का कहीं कोई अता-पता नहीं है। यहां तक कि जिन युवाओं को किसी-किसी नौकरी के लिए चुन लिया गया था, उनकी ज्वाइनिंग भी टल चुकी है। आर्थिक आँकड़ों ने कम शिक्षित लोगों को भी ज्ञानवान बना दिया है। ग़रीब तो बुरी तरह से टूटे हुए हैं। सरकारें जो कह और कर रही हैं, उससे उन्हें ढांढस नहीं मिल रहा।

पेट्रोल-डीज़ल के रोज़ाना उछल रहे दामों को लेकर भी जनता में बेहद गुस्सा है। इसने सबका जीना और दुश्वार बना रखा है। जनता को अब विपक्ष वाली उस बीजेपी की बहुत याद सता रही है जो सड़कों पर उतरकर तरह-तरह की ड्रॉमेबाज़ी के ज़रिये मनमोहन सरकार के नाम में दम करके रखती थी। विपक्ष वाली बीजेपी बहुत संगठित थी। उसके पीछे संघ की ताक़त थी। जबकि विपक्ष वाली कांग्रेस ख़ुद ही बहुत लुंज-पुंज है। कई बीमारियों से ग्रस्त है। अपनी सेहत को सुधारने के लिए जो किया जाना चाहिए, उसे भी करती नज़र नहीं आ रही।

मध्यम वर्ग को लगता है कि कांग्रेस वैसे संघर्ष करती नज़र क्यों नहीं आ रही, जैसे विपक्ष वाली बीजेपी किया करती थी? ये सहज प्रश्न घर-घर की चर्चा में स्थान पा रहा है। बात यहां आकर ख़त्म होती है कि राहुल-प्रियंका वग़ैरह से कुछ नहीं हो पाएगा। संघ इसी माहौल को भुनाना चाहता है। इसी मंत्र को फैलाना चाहता है कि कांग्रेस को जनता याद चाहे जितना करे, लेकिन पसन्द बिल्कुल न करे। राजनीति का ये स्वाभाविक व्यवहार भी है। इसीलिए, मौजूदा हालात से मायूस लोग जब भी विकल्प की बातें करते हैं, तो उन्हें ‘टीना फैक्टर’ यानी There is no alternative (TINA) की याद दिलायी जाती है।

मायूस मध्यम वर्ग को बताया जाता है कि कांग्रेस तो ठीक है, लेकिन इसका नेता कौन है, इसका पता ही नहीं है। राहुल गांधी का तो इतना चरित्र हनन किया जा चुका है कि उन्हें लोग विकल्प मान ही नहीं पाते। हालांकि, इसके लिए वो ख़ुद भी कोई कम कसूरवार नहीं हैं। लेकिन एक हक़ीक़त और भी है कि कांग्रेस में इन्दिरा गांधी के बाद जनता की नब्ज़ को पकड़कर सड़क पर संघर्ष करने वाला दूसरा बड़ा नेता नहीं हुआ। राजीव और सोनिया ने कांग्रेस को उबारने के लिए जैसे काम किए, कमोबेश वैसे ही आज भी हो रहा है। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि आज जनता और ख़ासकर मध्यम वर्ग की अपेक्षाएं काफ़ी बदल चुकी हैं।

‘अपेक्षाओं के इस बदलाव’ को पैदा करने में संघ के नये-पुराने दुष्प्रचार तंत्र ने कमाल का प्रदर्शन किया है। वर्ना, विरोधी तो हमेशा ही चरित्र हनन और लांछन का सहारा लेते ही रहे हैं। सभी पार्टियाँ यही करती हैं। क्योंकि ये राजनीति का अहिंसक हथियार है। इसके बावजूद अभी संघ की बेचैनी थोड़ी ज़्यादा है। बिहार के चुनाव जो सामने हैं। वहाँ भी नीतीश से टीना फैक्टर को जोड़ने का ही खेल चल रहा है। जनमानस की ख़ुशी या नाराज़गी को फैलने नहीं दिया जा रहा, क्योंकि मेनस्ट्रीम मीडिया मर चुका है। जनता अब सच्चाई को जानकर अपनी राय नहीं बना रही, बल्कि उसे व्हाट्सअप यूनिवर्सिटी के कंटेंट से ही ज्ञानालोकित किया जा रहा है।

कांग्रेस भी जानती है कि अगर अपनी बीमारियों से उबर भी गयी तो भी बीजेपी को खुले अखाड़े में अपने बूते चित नहीं कर पाएगी। संघ की अफ़ीम ने बीजेपी को अपराजेय बना दिया है। लेकिन संघ अच्छी तरह जानता है कि जब जनता का गुस्सा फूटेगा तो वो ये देखकर वोट नहीं करेगी कि मोदी का विकल्प कौन है? बल्कि ये सोचकर वोट डालेगी कि ‘कोई भी आये, लेकिन मोदी तो नहीं चाहिए!’

ये वही मनोदशा है, जिसने 2014 में कांग्रेस की मिट्टी-पलीद की थी और इतिहास में पहले बार ग़ैर-कांग्रेसी पूर्ण बहुमत वाली सरकार के सत्ता में आने का रास्ता खुला था। जब जनमानस में ये राय बन गयी थी कि अबकी कांग्रेस को वोट नहीं देना है। इसीलिए कांग्रेस मुक्त होने के कगार पर जा पहुंची। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री समेत संघ के रणनीतिकारों को जनता के मनोविज्ञान के इसी पहलू का ख़ौफ़ सता रहा है।

मुमकिन है कि अगले कैबिनेट विस्तार में वित्त मंत्रालय की ज़िम्मेदारी किसी और को थमाकर निर्मला सीतारमन को बलि का बकरा बना दिया जाए। राजनीति में ऐसे नुस्ख़ों को आसान उपायों की तरह देखा जाता है। इसे पार्टी और संघ ऐसे पेश करेंगे कि मोदी जी तो अद्भुत हैं ही, वित्त मंत्री ही नाक़ाबिल थीं, इसलिए उन्हें बदल दिया गया। अब देखना सब ठीक हो जाएगा। राजनीति ऐसे ही नुस्ख़ों का खेल है। यही वजह है कि संघ को कांग्रेस की बीमारी में भी अपने लिए नुस्ख़ा ही नज़र आ रहा है। इसमें ग़लत भी कुछ नहीं है।

उधर, कांग्रेस का सीधा सा मंत्र है कि वो सत्ता में लौटगी या नहीं, ये चुनौती उसकी नहीं बल्कि जनता की है। लिहाज़ा, जान झोंकने से क्या फ़ायदा! इसीलिए कांग्रेस को आप कभी सत्ता में वापसी के लिए वैसे जान झोंकता हुआ नहीं देखेंगे जैसा संघ-बीजेपी कुशलता से किया करती हैं। कांग्रेस आपको कभी संघ की तरह पूरी ताक़त से चुनाव लड़ती हुई भी नहीं नज़र आएगी।

इसके क्षेत्रीय नेता जैसे शरद पवार, ममता बनर्जी, जगन मोहन रेड्डी और चन्द्र शेखर राव भले ही ऐसा करते दिखें, लेकिन शीर्ष नेतृत्व सड़क पर उतरकर पसीना नहीं बहाने वाला। इसे आसानी से समझने के लिए ग़ालिब के एक शेर में ज़रा छेड़-छाड़ करके देखें, तो एक लाइन में सब समझ में आ जाएगा कि ‘हमको उनसे (वफ़ा) संघर्ष की है उम्मीद, जो नहीं जानते (वफ़ा) संघर्ष क्या है!’

Mukesh Kumar Singh मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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ओपिनियन

संविधान बचाने से ज़्यादा ज़रूरी है इसके आन्दोलनकारियों को बचाना

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Students and activists take part in a protest against India's new citizenship law in Bangalore on December 17, 2019 , AFP

सुप्रीम कोर्ट के वकील महमूद प्राचा के हवाले से शाहीन बाग़ वाले संविधान बचाओ आन्दोलन को जल्द बहाल करने की सुगबुगाहट है। इसी तर्ज़ पर क्या सोशल-डिस्टेसिंग का जोख़िम उठाकर 30 अगस्त को मुहर्रम का जुलूस निकालने की इजाज़त माँगने, देने या नहीं देने को लेकर कहीं तनाव के हालात तो नहीं बन जाएँगे? ऐसे दौर में जब रोज़ाना करीब 65 हज़ार कोरोना पॉज़िटिव के मामले सामने रहे हों, जब स्कूल-कॉलेज निलम्बित हों और रेल-सेवा असामान्य हो, जब मैट्रो-सेवा शान्त हो, होटल-रेस्टोरेंट बन्द हों, जब मॉस्क अनिवार्य हो, तब क्या ऐसी बातें होना ठीक है कि जल्द ही ‘शाहीन बाग़’ की बहाली होगी? संविधान बचाओ आन्दोलन के अगले दौर का वक़्त क्या अभी आने से फ़ायदा होगा? क्या सरकारें इसे होने देंगी? कहीं ये पुलिसिया सख़्ती को ‘आ बैल मुझे मार’ का सन्देश तो नहीं देगी?

दरअसल, भारत पर अभी कोरोना-मारीचिका हावी है। मारीचिका एक आभास है। इसमें रेगिस्तान में दुर्लभ पानी दिखने का भाव है। ये आभास और भाव तो असली होते हैं, लेकिन पानी असलियत नहीं होता। मारीचिका आध्यात्मिक ढोंग नहीं, बल्कि भौतिक भ्रम है। ये वैसा ही दृष्टि-दोष है, जैसे दूर जाती रेल की समानान्तर पटरियाँ परस्पर नज़दीक आती हुई प्रतीत होती हैं। बिल्कुल ऐसे ही दृष्टि-दोष की काली छाया अभी ‘कोरोना-अनलॉक’ को लेकर देश पर मँडरा रही है। इसीलिए कोरोना को पुरी में रथयात्रा बर्दाश्त है, अयोध्या का शिला-पूजन बर्दाश्त है, भोपाल, इम्फाल और जयपुर में सरकारों का लुढ़कना-ढनकना बर्दाश्त है, लेकिन किसी भी किस्म के अनलॉक को ईद की सामूहिक नमाज़, मुहर्रम के जुलूस और संविधान बचाने वाले सीएए-एनआरसी आन्दोलन की सुगबुगाहट बर्दाश्त नहीं है।

कोरोना-काल के दौरान उत्तर भारत के मुसलमानों में अज़ीबो-ग़रीब हूक उठती रही हैं। उन्हें यहाँ-वहाँ से अपनी बिरादरी के साथ हो रहे भेदभावों की ख़ूब ख़बरें भी मिलीं। देश देख चुका है कि तब्लीगी जमात के नाम पर उठी नफ़रत की लपटों ने ठेले पर फल-सब्ज़ी बेचने वालों की मज़हबी की पहचान को कैसी प्रमुखता दिलायी। गाय के नाम पर लिंचिंग का नयी घटना को भी कोरोना नहीं टाल सका। दिल्ली के दंगों की पुलिसिया जाँच से कई बदरंग पन्ने भी फिज़ाँ में उड़ते देखे गये। ‘370’ की पहली पुण्यतिथि भी निपट गयी। लॉकडाउन की तकलीफ़ों और बेरोज़गारी के बावजूद जो ग़रीब जीवित रहे, उन्हें भी बाढ़ और अस्पतालों की दुर्दशा ने जमकर डुबोया। लेकिन अमीरों के आईपीएल को न सिर्फ़ डूबने से बचाया गया, बल्कि उसे ‘आत्मनिर्भर’ बनने के लिए ‘वोकल फॉर लोकल’ वाले गुरु-मंत्र से भी विशेष छूट दी गयी। आसार हैं कि स्वतंत्रता-दिवस की भाषणबाज़ी भी कतई फ़ीकी नहीं रहेगी।

लेकिन क्या उपरोक्त तमाम मिसालों को देखते हुए मुस्लिम समाज बराबरी की उम्मीद पाल सकता है? ये सही है कि आन्दोलनकारियों पर कभी दमनकारी सत्ता के बर्बर रवैये का ख़ौफ़ नहीं होता। लेकिन आन्दोलन की कमान थामने वालों को अपनी ताक़त और कमज़ोरियों का भी सही अहसास ज़रूर होना चाहिए। कोरोना से पहले चले आन्दोलन के तज़ुर्बों से सीखना भी बहुत ज़रूरी है। मसलन, उस आन्दोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि ये थी कि वो मुसलमानों की नागरिकता के सवाल से शुरू होकर संविधान बचाने की ओर घूम गयी। इसे शिक्षित और सेक्यूलर मुसलमानों से ज़्यादा इसी श्रेणी के हिन्दुओं और इनमें से भी ख़ासतौर पर युवाओं और महिलाओं का अद्भुत समर्थन मिला। सिर्फ़ इसी इकलौते पहलू से भगवा हुक़्मरानों के माथे पर बल पड़े।

फरवरी में दिल्ली विधानसभा के चुनाव हुए। दिसम्बर-जनवरी में हुक़्मरानों को अपनी ज़मीनी सच्चाई दिखने लगी थी। मेनस्ट्रीम मीडिया तो मुट्ठी में था लेकिन सोशल मीडिया ने नाक में दम कर रखा था। यही देख हुक़्मरानों को डर सताने लगा कि सेक्यूलर हिन्दुओं और मुसलमानों की एकजुटता यदि उसी रफ़्तार से बढ़ती रहती तो उनके लिए ‘मुश्किल-काल’ बहुत दूर नहीं रहता। इसी एकजुटता में सेंधमारी के लिए दिल्ली में दंगों की पटकथा लिखी गयी। नफ़रत और उन्माद फैलाने वाली भाषणबाज़ी के धारावाहिक चले। दंगों में पुलिस ने वही किया जो उसे हुक़्म मिला, ताकि ‘सबसे ज़्यादा अनुशासित और आज्ञाकारी संस्था’ वाला उसका सिंहासन अक्षुण्य रहे।

अब तो सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं में भगवा-समाजवाद आ चुका है। सभी ने पुलिसिया-संस्कारों को ही अपना आराध्य बना लिया है। विधान सिर्फ़ इतना है कि हुक़्म की तामील होगी, हर हाल में होगी, अवश्य होगी। बाक़ी संविधान की बातें जिन्हें करना है वो नक्कारख़ाने में तूती बजाते रहें। नये भारत में सबको इस आकाशवाणी पर यक़ीन करना होगा कि “पूर्वी लद्दाख में न तो कोई हमारी सीमा में घुस आया है, न ही कोई घुसा हुआ है और ना ही हमारी कोई पोस्ट किसी दूसरे के कब्ज़े में है।”

इसीलिए मुस्लिम समाज चाहे तो गाँठ बाँध लें कि उसकी किसी भी किस्म की एकता से हुक़्मरानों की सेहत पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला। क्योंकि हुक़्मरानों को कपड़ों से पहचानने में महारत हासिल है। लिहाज़ा, शाहीन बाग़ की बहाली के लिए बेताब लोगों को पहचान के बजाय परिचय को तरजीह देना सीखना होगा। उन्हें समझना होगा कि पहचान तो दूर से ही हो जाती है जबकि परिचय के लिए नज़दीक या रूबरू आना पड़ता है। चन्दन-टीका, पगड़ी-टोपी, दाढ़ी-मूँछ, घूँघट-बुर्का, धोती-पजामा – ये सभी पहचान हैं, जबकि सेक्यूलर-कम्यूनल, कट्टर-उदार, जातिवादी-प्रगतिशील आदि परिचय हैं। इसी परिचय के साथ उन्हें जिन हिन्दुओं, युवाओं और महिलाओं का ज़ोरदार समर्थन मिला था, उसी ताक़त से वो मंज़िल पा सकते हैं।

अभी कोरोना के दौरान जिस स्तर का और जैसा ‘अनलॉक’ सामने आया है, उसमें संविधान बचाने की पैरोकारी करने वाले हिन्दुओं, युवाओं और महिलाओं की एकजुटता में मुश्किल होगी। इसीलिए अभी जोख़िम लेने का वक़्त नहीं है। थोड़ा और इन्तज़ार कर लेने में कोई हर्ज़ नहीं है। 15 अगस्त की बातें यदि सरककर 2 अक्टूबर हो जाए तो कोई आफ़त नहीं आ जाएगी। अबकी बार शाहीन बाग़ के आन्दोलनकारियों को संविधान के अलावा अर्थव्यवस्था की ऐतिहासिक दुर्दशा को भी अपने रडार में लेना होगा। इन्हें ये भी समझना होगा कि सरकार किसी भी कीमत पर अपने क़दम वापस नहीं खींचेंगी। वो ज़्यादा से ज़्यादा अपने क़दमों को आगे बढ़ाने का इरादा तब तक टालती रहेगी, जब तक कि उसका पतन न हो जाए। लेकिन इस दौरान आन्दोलनकारियों को हिंसा और हिरासत के उकसावों से भी ख़ुद को बचाना होगा। बीते एक साल में कश्मीर ने भारत, सेक्यूलरों और संविधान की दुहाई देने वालों को अनेक सबक दिये हैं। बहुसंख्यक समाज ने ताली-थाली और दीया-दिवाली के कई नज़ारे देश को दिखाये हैं। इसीलिए आन्दोलनकारियों को समझना होगा कि जो विरोधियों की ताक़त का सही अन्दाज़ा नहीं लगाते, वो विरोधियों का शिकार बनने के लिए अभिशप्त होते हैं। विरोधी जहाँ बात ख़त्म करना चाहते हैं, आन्दोलनकारियों को वहीं से बात शुरू करने की रणनीति अपनानी होगी। वर्ना, उनका सरकार का जाल में फँसना तय है।

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