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गठबन्धन को लेकर काँग्रेस के रणनीतिकारों का इम्तिहान अब होगा

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mahagathbandhan

क्या आप किसी टूर्नामेंट के लीग मैच को ही फ़ाइनल मान सकते हैं? क्या क्रिकेट में पहला विकेट गँवाने वाली टीम को हारा हुआ मान लिया जाता है? यदि नहीं तो फिर ये वक़्त उस राजनीति को समझने का है जिससे तहत मीडिया में इन दिनों तीन ‘प्लांटेड ख़बरें’ सुर्ख़ियाँ पा रही हैं। ये ख़बरें हैं –

  1. उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से मायावती-अखिलेश ने बाँटी 37-37 सीटें। काँग्रेस, अजित सिंह, ओम प्रकाश राजभर और निषाद पार्टी के लिए बना 2-2 सीटों का फ़ॉर्मूला। वहीं कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में ‘ख़ुलासा’ है कि बुआ-बबुआ ने काँग्रेस को गठबन्धन से बाहर रखा।
  2. अजय माकन और एचएस फुल्का के इस्तीफ़ों से आम आदमी पार्टी और काँग्रेस के बीच गठबन्धन का रास्ता खुला। ये गठबन्धन दिल्ली ही नहीं बल्कि पंजाब और हरियाणा की सीटों के लिए भी होने वाला है।
  3. कर्नाटक में जेडीएस और काँग्रेस के बीच सीटों के बँटवारे का फ़ार्मूला सामने आ चुका है? कोई इसे 2:1 बता रहा है। कोई कह रहा है 50:50 यानी 14-14 तो कोई लिख रहा है देवेगौड़ा को 12 और बाक़ी 16 पर काँग्रेस।

पत्रकारिता और राजनीतिक गलियारों में इन्हें ‘चंडू-खाने की ख़बरें’ कहते हैं। रिपोर्टर्स इन ख़बरों को ‘सूत्रों’ के आधार पर या ‘बताया जा रहा है’ की आड़ में लिखते हैं। इसके पीछे किसी ज़िम्मेदार नेता, पक्षकार या वार्ताकार का कोई बयान नहीं होता। इसीलिए इसे पुष्ट या पुख़्ता ख़बर नहीं माना जाता। इसका मक़सद भ्रम फैलाना होता है। इसे दुष्प्रचार या ‘प्लांटेड न्यूज़’ भी कहते हैं। ये पत्रकारिता नहीं बल्कि उसका काला चेहरा है। ख़बरों और उसके मनोविज्ञान को समझने वाले अच्छी तरह से जानते हैं कि ऐसी बातें कोरी गप्प या कयासबाज़ी होती हैं। ऐसे में ये सवाल उठना लाज़िमी है कि ‘फिर ऐसी अफ़वाहों को ख़बर क्यों बनाया जाता है? कयासबाज़ी पर कोई नक़ेल क्यों नहीं कसता?’

इन स्वाभाविक सवालों का जबाब भी उतना ही सहज है। दर्शकों अथवा पाठकों को सिर्फ़ इतना समझने की कोशिश करनी चाहिए कि ऐसी ‘प्लांटेड न्यूज़’ से किसके सियासी मंसूबों को फ़ायदा पहुँच सकता है? यानी, यदि यूपीए मज़बूत नहीं हो रहा, यदि काँग्रेस के साथ नये सहयोगी आने को तैयार नहीं, यदि राहुल गाँधी गठबन्धन के स्वाभाविक नेता बनकर नहीं उभर रहे तो फिर इन समीकरणों को लेकर किस ख़ेमे में ख़ुशियाँ मनायी जाएँगी? ज़ाहिर है, जो ख़ेमा टूर्नामेंट के लीग़ स्टेज के दौर में ही फ़ाइनल की ख़ुशियों में झूमना चाहेगा, वही मीडिया में चंडू ख़ाने की ख़बरें ‘प्लांट’ करवाने की तिकड़म आज़माएगा। यहाँ चुनाव की उपमा टूर्नामेंट से, लीग़ स्टेज का नाता चुनावी तालमेल के दौर से और फ़ाइनल का आशय जनादेश से है।

आमतौर पर भ्रमित करने वाली सूचनाओं को न्यूज़ एजेंसियों के ज़रिये फैलाया जाता है। न्यूज़ एजेंसियों के ग्राहक, ज़्यादातर मीडिया संस्थान होते हैं। क़ानून की नज़र में एजेंसी से आयी ख़बर को लेकर मीडिया संस्थानों की अपनी जबाबदेही बहुत मामूली सी होती है। कयासबाज़ी की ख़बरों को लेकर सियासी चटकारे लिये जाते हैं। बहुत कम रिपोर्टर या सम्पादक ही इस बात का आग्रह रखते हैं कि उन्हें अपुष्ट ख़बरों से परहेज़ करना है या इनके प्रकाशन-प्रसारण से पहले सम्बन्धित पक्षों से तथ्यों की पुष्टि भी करनी है। मौजूदा दौर के मीडिया में जो ‘भक्ति-भाव’ पसरा हुआ है, उसे देखते हुए ‘पुष्टि’ को लेकर कोई ख़ास आग्रह भी नज़र नहीं आता। यही वजह है कि अब तरह-तरह के चुनावी सर्वेक्षण भी सत्ता पक्ष के साथ ही खड़े दिखायी देते हैं।

बहरहाल, ताज़ा सन्दर्भ में ये समझना बहुत उपयोगी है कि कोई भी सियासी गठजोड़ सिर्फ़ मज़बूरी में ही होता है। एनडीए-यूपीए से लेकर यूनाइटेड फ़्रंट, जनता दल और जनता पार्टी जैसे सभी गठबन्धन हमेशा सियासी मज़बूरियों की वजह से ही हुए। किसी भी पार्टी को जब ये लगता है कि वो सिर्फ़ अपने बूते चुनाव में मैदान नहीं मार सकती, तभी गठजोड़ की सम्भावनाएँ तलाशी जाती हैं। गठजोड़ के ज़रिये जहाँ छोटी पार्टियों या क्षेत्रीय दलों को सत्ता का साझीदार बनने की उम्मीदें दिखती हैं, वहीं बड़े दलों को भी अपनी ज़मीनी ताक़त बढ़ाने की लालसा रहती है। हरेक सहयोगी दल का मक़सद एक-दूसरे की ताक़त का फ़ायदा उठाना होता है। कोई भी पार्टी किसी पर अहसान नहीं करती। अलबत्ता, कभी-कभार इसका राग ज़रूर अलापा जाता है।

कौन किसे कितना फ़ायदा देना चाहता है और बदले में कितना फ़ायदा पाना चाहता है, इसके लिए बन्द कमरों में लम्बी-चौड़ी बातचीत होती है। बातचीत में चुनाव से जुड़े बारीक़ से बारीक़ पहलू पर गौर किया जाता है। बन्द कमरे में बहस, लड़ना, अकड़ना, भड़कना वग़ैरह सब कुछ होता है। हरेक जायज़ और नाजायज़ बातें होती हैं। लेकिन हरेक पक्षकार उन्हें बाहर जाने देने से परहेज़ करता है। इसीलिए जब कभी गठबन्धन की सौदेबाज़ी परवान नहीं चढ़ती, तब भी कोई भी दल गोपनीयता का नियम नहीं तोड़ता है। कभी-कभार जो भी मामूली सी बात लीक़ की जाती है, वो भी क्षणिक ही होती है।

अब इस सियासी हक़ीक़त को समझना ज़रूरी है कि बीजेपी के ख़िलाफ़ तमाम क्षेत्रीय दल इसलिए एकजुट होना चाहते हैं, क्योंकि वो बीजेपी को अपनी राजनीतिक विचारधारा या वजूद के लिए नुकसानदेह पाते हैं। इसी वजह से कभी काँग्रेस के ख़िलाफ़ भी तमाम पार्टियाँ लामबन्द हुआ करती थीं। आज जैसे बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए से कई दल छिटक चुके हैं, वैसा ही काँग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए को भी झेलना पड़ा है। लेकिन जुड़ने-छिटकने के लिहाज़ से अब यूपीए की दशा कहीं बेहतर है। नीतीश और पासवान के अलावा बीजेपी से तौबा करने के बाद फिर किसी नेता ने दोबारा उसका दामन नहीं थामा।

ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, चन्द्र बाबू नायडू, करुणानिधि, देवेगौड़ा, ओम प्रकाश चौटाला, फ़ारूख़ अब्दुल्ला, महबूबा मुफ़्ती, अजित सिंह और मायावती जैसे क्षत्रप भी कभी न कभी बीजेपी को आज़मा चुके हैं। यहाँ तक कि काँग्रेस को सत्ता से हटाने के लिए वामपन्थियों ने भी ऐसे गठबन्धन को बाहर से समर्थन दिया है जिसमें बीजेपी रही हो। अकाली दल और शिवसेना को बीजेपी के टिकाऊ दोस्त हैं तो मुलायम, लालू और शरद पवार, कभी बीजेपी के साथ नहीं रहे। 1996 से पहले की जनता पार्टी, नेशनल फ़्रंट और यूनाइटेड फ़्रंट वाली गठबन्धन सरकारें जहाँ टिकाऊ नहीं रहीं, वहीं एनडीए और यूपीए ने टिकाऊ सरकारें दीं।

2019 में बीजेपी को सत्ता से बाहर करने की बेचैनी सबसे ज़्यादा उन दलों में है जो बीजेपी के साथ रह चुके हैं। इन्हें काँग्रेस से नफ़रत नहीं है। लेकिन वो काँग्रेस के प्रति कोई दरियादिली भी नहीं दिखा सकते। सियासत का दस्तूर ही कुछ ऐसा है कि सभी मौके पर चौका लगाना चाहते हैं। इसीलिए सीटों के बँटवारे के वक़्त ज़बरदस्त मोलभाव होता है। गुजरात और कर्नाटक के बाद छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में काँग्रेस के प्रदर्शन से राहुल गाँधी की छवि बदली है। शरद पवार, चन्द्र बाबू नायडू, लालू यादव, एम के स्टालिन और फ़ारूख़ अब्दुल्ला जैसे अनुभवी नेताओं ने भी राहुल के नेतृत्व को सराहा है।

ज़ाहिर है, उत्तर प्रदेश में काँग्रेस महज़ दो सीटों से नहीं मानने वाली। अखिलेश और मायावती भी ये जानते हैं। लिहाज़ा, यदि काँग्रेस, मोदी सरकार को सत्ता से बाहर करना चाहती है तो उसे उत्तर प्रदेश में कम से कम 8-10 सीटें जीतने का दमख़म तो दिखाना ही होगा। अब काँग्रेस के रणनीतिकारों का असली कौशल ये होगा कि वो कैसे अखिलेश और मायावती को इतनी सीटों के लिए राज़ी कर पाते हैं। दोनों की मंशा मध्य प्रदेश और राजस्थान में काँग्रेस से उदारता से सीटें लेने की है। ताकि उत्तर प्रदेश में भी जैसे को तैसा किया जा सके। पेशेवर मीडिया जनता को इतनी सी राजनीति क्यों नहीं बता पाता?

दरअसल, ये धारणा बीजेपी के पक्ष में जाती है कि उसे हराने का ख़्वाब देखने वाले मौकापरस्त हैं, सत्ता के लालची हैं। इसीलिए आपस में सिर-फुटव्वल हो रही है। चुनावी मौसमी भी सभी गठबन्धनों में हमेशा ऐसा ही होता रहा है। बीजेपी ने अभी बिहार में क्या यही नहीं झेला? कुशवाहा, क्यों बाहर गये? पासवान ने क्यों आँखें तरेरीं? क्या उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में एनडीए में पनपी तपिश किसी से छिपी है? किसी भी गठबन्धन के लिए मोल-तोल और रार-तकरार बहुत ही सहज और सामान्य बात है। सीटों को लेकर गठबन्धन नहीं बनना उतना बड़ी बात नहीं होती, जितनी कि बने गठजोड़ का टूट जाना। चुनाव के बाद उनके जुड़ने के आसार अधिक होते हैं जो पहले जुड़ते-जुड़ते रह जाते हैं। यही राजनीति है।

यूपीए ख़ेमें में सीटों के बँटवारे को लेकर कर्नाटक में कोई ख़ास उलझन नहीं है। जबकि बीजेपी की हवा बनाने के लिए आम आदमी पार्टी और काँग्रेस को लेकर ये ख़बर प्लांट कर दी गयी कि अजय माकन को हटाकर गठबन्धन का दरवाज़ा खोला गया है। सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है। माकन तो चाहते थे कि तालमेल हो जाए, लेकिन शीला दीक्षित का विरोध भारी पड़ा। पंजाब-हरियाणा में तो जोड़तोड़ की सुगबुगाहट तक नहीं है। अलबत्ता, राजनीति में भ्रम फैलाने कोई ओर-छोर कभी नहीं रहा।

ओपिनियन

बसपा-सपा गठबंधन से स्थायित्व के संकेत नहीं : शीला दीक्षित

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वरिष्ठ कांग्रेस नेता और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का कहना है कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) गठबंधन से स्थायित्व के संकेत नहीं मिल रहे हैं, लेकिन आगामी लोकसभा चुनाव में प्रदेश में कांग्रेस के परिणाम चौंकाने वाले होंगे।

शीला दीक्षित ने आईएएनएस को दिए साक्षात्कार में कहा, “उनको एक साथ आने दीजिए। वे मिलते और जुदा होते रहे हैं और फिर साथ आ रहे हैं। मेरा अभिप्राय यह है कि उनमें स्थिरता नहीं है और वे स्थायित्व के संकेत नहीं दे रहे हैं। अब आगे देखते हैं।”

तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकीं दीक्षित (80) सपा और बसपा गठबंधन को लेकर पूछे गए एक सवाल का जवाब दे रही थीं। सपा और बसपा ने कांग्रेस को महागठबंधन से अलग रखते हुए प्रदेश में 80 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए एक गठबंधन किया है। दीक्षित को 10 जनवरी को दिल्ली कांग्रेस की कमान सौंपी गई।

उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन होने से पहले शीला दीक्षित को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया था। दीक्षित ने कहा कि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की उम्मीद क्षीण पड़ गई है।

दीक्षित की टिप्पणी से इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस नेता चुनाव अभियान के दौरान सपा और बसपा को निशाना बनाएंगे, जबकि उनका सीधा मुकाबला सत्ताधारी पार्टी भाजपा से होगा।

कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश के सभी 80 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला लिया है, लेकिन पार्टी ने भाजपा को शिकस्त देने वाले सेक्यूलर दलों के लिए दरवाजा खुला रखा है।

उत्तर प्रदेश में पार्टी नेता उम्मीदवारों को बता सकते हैं कि कांग्रेस ही नरेंद्र मोदी सरकार को सत्ता से बाहर कर सकती है और भाजपा को शिकस्त दे सकती है।

कांग्रेस इस बात पर बल देंगे कि इस चुनाव के नतीजों से प्रदेश का मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि देश का प्रधानमंत्री चुना जाएगा।

लोकसभा चुनाव 2014 में कांग्रेस उत्तर प्रदेश में सिर्फ दो ही सीटें बचा पाई थीं, जबकि उससे पहले 2009 में पार्टी ने 21 सीटों पर जीत हासिल की थी, जब केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) दूसरी बार केंद्र की सत्ता को बरकार रख पाई थी।

दीक्षित ने कहा कि उनसे कहा जाएगा तो वह उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए चुनाव प्रचार करेंगी, लेकिन वह दिल्ली पर अपना अधिक ध्यान केंद्रित करेंगी क्योंकि उनको यहां काफी काम करना है।

उन्होंने पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी को कांग्रेस द्वारा प्रधानमंत्री उम्मीदवार के तौर पर पेश करने का अनुमोदन किया।

उन्होंने कहा, “पार्टी को इस पर फैसला लेने दीजिए। हम चाहते हैं और खासतौर से मैं चाहती हूंं और हमारे बीच अधिकांश लोग चाहते हैं। लेकिन इस पर पूरी पार्टी द्वारा फैसला लिया जाएगा।”

गैर-भाजपा दलों में प्रधानमंत्री का पद विवादास्पद मसला है। राहुल गांधी ने खुद भी कहा कि इसका फैसला चुनाव के बाद लिया जाएगा और पहला काम नरेंद्र मोदी सरकार को पराजित करना है।

संपूर्ण भारत में महागठबंधन की संभावना पर पूछे जाने पर दीक्षित ने कहा कि लोग इस दिशा में प्रयासरत हैं, लेकिन इस पर अभी पूरी सहमति नहीं बन पाई है।

विपक्षी दलों ने इस बात के संकेत दिए हैं कि लोकसभा चुनाव से पहले देशभर में गठबंधन की संभावना कम है, लेकिन भाजपा को शिकस्त देने के लिए राज्य विशेष में गठबंधन होगा।

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ओपिनियन

मोदी राज में लुप्त हुआ संसदीय संवाद

संसद में सार्थक चर्चा नहीं हो रही। प्रक्रिया और परम्परा दम तोड़ चुकी है। नौकरशाही भी दमघोटू हाल में है। लोकतंत्र की लौ फड़फड़ा रही है।

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Parliament of India
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देश पर विश्वास के संकट छाया है। संसद रूपी लोकतांत्रिक संस्था का तेज़ी से पतन हो रहा है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच होने वाला सार्थक संवाद नदारद है। विपक्ष का गला घोंटकर सियासी लाभ उठाने के क़ानून बनाये जा रहे हैं। विधेयकों को उन संसदीय समितियों की समीक्षा से बचाया जा रहा है, जो प्रस्तावित क़ानून को कारगर बनाने के लिए सभी पक्षों की राय को समायोजन करती हैं। झूठी वाहवाही बटोरने के लिए मंत्रीगण ग़लत आँकड़ों को परोसते हैं, क्योंकि उन्हें विशेषाधिकार हनन की परवाह नहीं है। अभी जो मंत्री संसद में गतिरोध से आहत होने की दलीलें देते हैं, वहीं जब विपक्ष में थे तो उनकी दलील होती थी कि गतिरोध भी संसदीय रणनीति का हिस्सा है। सरकार हमारे विरोध को भले ही ढोंग बताये, हमें श्रेय नहीं दे, लेकिन हम वही कर रहे हैं, जो हमारा दायित्व है। सरकार के ऐसे रवैये की वजह से ही संसद पर जनता का भरोसा न्यूनतम स्तर पर जा पहुँचा है।

वो दिन लद गये जब जजों के पास मुक़दमों के लिए इत्मिनान भरा वक़्त होता था। मुक़दमों का अम्बार है। न्यायतंत्र चरमरा चुका है। लेकिन कसूर जजों का नहीं है। न्यायालयों की गरिमा तार-तार हो चुकी है। अदालतों को बाहरी दख़ल से सुरक्षित होना चाहिए। लेकिन पूर्व प्रधान न्यायाधीश जैसे उच्च पद पर बैठे व्यक्ति पर ही ‘मास्टर ऑफ़ रोस्टर’ के अधिकार के दुरुपयोग का आरोप लगा। लेकिन कोई सच्चाई की तह तक नहीं जाना चाहता। सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में पहली बार उसके चार वरिष्ठतम जजों को अपने अन्तःकरण की आवाज़ का ख़ुलासा प्रेस कॉन्फ़्रेंस में करना पड़ा। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र ख़तरे में है। अदालतों के बाहर घड़ल्ले से ऐसी हरक़तें हो रही हैं, जिससे न्यायिक फ़ैसलों को प्रभावित किया जा सके। न्यायिक फ़ैसलों में समानता वाली परम्परा को अनोखे तर्कों के सहारे ध्वस्त किया जा रहा है।

अदालतें बेहद उदारता से सील-बन्द लिफ़ाफ़ों में मिली सरकारी दलीलें स्वीकार कर रही हैं, ताकि दूसरे पक्ष उसे चुनौती भी नहीं दे सकें। ऐसी बोझिल प्रक्रिया से न्यायिक आदेश का प्रभावित होना लाज़िमी है। घपलों-घोटालों से जुड़े काग़ज़ातों पर कोर्ट ग़ौर तक नहीं कर रही। जज लोया मामले की कार्यवाही, राफ़ेल सौदे में जाँच को नकारना और सीबीआई निदेशक के तबादले से जुड़े प्रसंगों से साफ़ है कि देश को झकझोरने वाले मुद्दों के प्रति न्याय-तंत्र का रवैया भी सवालों के घेरे में है। दुहाई तो क़ानून की दी जाती है, लेकिन व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मोर्चे पर सारे वादे पीछे छूट जाते हैं। अलग-अलग बेंच में संवैधानिक पीठ के जजों के फ़ैसले भी बदल जाते हैं। इसीलिए जनता के बढ़ते मोहभंग के प्रति न्यायपालिका को ख़ासतौर पर सचेत रहने की ज़रूरत है।

संसद में हासिल पूर्ण बहुमत का सही इस्तेमाल जटिल जनसमस्याओं को लोकतांत्रिक ढंग से निपटाने के लिए होना चाहिए। लेकिन ये तभी मुमकिन है, जब सबको साथ लेकर चलने की भावना से काम किया जाए। सरकार को सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का ज़रिया बनना चाहिए, लेकिन वो मतभेद के स्वरों को दबाने में जुटी हुई है। इन सन्दर्भों में देखें तो हमारी संस्थाओं पर भारी संकट गहराया हुआ है, कुछेक तो बन्धक बन चुकी हैं। कई संस्थाएँ तो सिर्फ़ आपने आकाओं की जी-हुज़ूरी कर रही हैं। सीबीआई, ईडी, एनआईए और सीबीडीटी यानी केन्द्रीय जाँच ब्यूरो, प्रवर्तन निदेशालय, राष्ट्रीय जाँच एजेंसी और केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड जैसी संस्थाओं से जुड़ा ताज़ा घटनाक्रम इन्हीं बातों का साबित करता है। ये संस्थाएँ आज क़ानून को सर्वोपरि बनाये रखने के लिए काम नहीं कर रहीं, बल्कि वो अक्सर इसे तबाह करती नज़र आती हैं। इसीलिए संस्थाओं में कलह बढ़ रहा है। वो शर्मसार हो रही हैं। जो पतन के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता है, उसे निकाल बाहर किया जा रहा है। जिनका काम क़ानून को सर्वोपरि बनाना है, वो बौने साबित हो रहे हैं। यदि जाँच एजेंसियाँ दाग़दार होंगी तो अदालती फ़ैसले भी वैसे ही होंगे। पक्षपात और दुर्भावनापूर्ण जाँच से अन्याय और आक्रोश पैदा होता है। तब जनता सड़कों पर उतरने के लिए मज़बूर होती है।

नौकरशाही का दम घुट रहा है। निष्कलंक निष्ठा वाले अफ़सरों का सताया जा रहा है। क्योंकि उनके पुराने बॉस मौजूदा सत्ता की आँखों में खटक रहे हैं। इसने कार्यपालिका में उदासी भरी थकान भर दी है। चहेते अफ़सर अपने आकाओं के इशारों पर नाच रहे हैं। बाक़ी उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। प्रशासन इसी का नतीज़ा भुगत रहा है, योजनाओं में देरी हो रही है और आर्थिक विकास सुस्त पड़ा हुआ है। विकास दर में शिथिलता की वजह से स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे उन दो बुनियादी क्षेत्रों के लिए संसाधन नहीं जुटा पा रही, जो सामाजिक बदलाव के सबसे अहम तत्व हैं। हमने देखा है कि भ्रष्टाचार के आरोपी अफ़सरों का गुस्सा कैसे मासूम लोगों पर फूट रहा है! ऐसे वातावरण की वजह से अफ़सरों का सारा ज़ोर सत्ता के प्रति वफ़ादार रहने का बन जाता है, जबकि उनसे भय और पक्षपात से मुक्त रहकर काम करना चाहिए।

संचार क्रान्ति ने नये तरह के दमन को बढ़ाया है। झूठ और अफ़वाह के ज़रिये लोगों के दिमाग़ में ज़हर भरा जा रहा है। ख़ासकर, इलेक्ट्रानिक मीडिया और काफ़ी हद्द तक प्रिंट मीडिया भी उन उद्योगों की मुट्ठी में है, जो अर्थव्यवस्था में भारी दबदबा रखते हैं। बड़े-बड़े मीडिया मालिक, सरकार की मदद से अपने कॉरपोरेट को चमकाने के लिए पत्रकारीय उसूलों से समझौता कर रहे हैं। मीडिया के ऐसे समझौते से लोकतंत्र का पतन निश्चित है।

चौतरफ़ा संकट वाले मौजूदा माहौल में उम्मीद की किरण सिर्फ़ यही है कि 2019 में भारत की जनता इसे पहचाने और इससे लोहा ले। सिर्फ़ जनता ही लोकतंत्र को बचा सकती है। वो चुनौतियों से कैसे निपटेगी, ये तो वक़्त ही बताएगा। लेकिन यदि वो नहीं चेती तो लोकतंत्र की फड़फड़ाती लौ को असहिष्णुता की तेज़ हवाएँ बुझा देंगी।

(लेखक, राज्यसभा सांसद, पूर्व केन्द्रीय मंत्री और वरिष्ठ काँग्रेस नेता हैं।)

(साभार:इंडियन एक्सप्रेस)

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तसलीमा नसरीन ने ‘बेशरम’ के हिंदी संस्करण का विमोचन किया

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taslima nasreen

नई दिल्ली, 12 जनवरी | बांग्लादेशी लेखिका और महिला अधिकार कार्यकर्ता तसलीमा नसरीन ने शनिवार को यहां नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में विवादास्पद ‘लज्जा’ उपन्यास की उत्तर कथा ‘बेशरम’ का विमोचन किया। उपन्यास ‘बेशरम’ का लोकार्पण राजकमल प्रकाशन के स्टाल जलसाघर में हुआ। इस मौके पर लेखिका अल्पना मिश्रा, हिमांशु बाजपेयी एवं राजकमल प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी मौजूद थे।

इस उपन्यास का बांग्ला भाषा से हिंदी में अनुवाद उत्पल बैनर्जी द्वारा किया गया है।

उपन्यास ‘लज्जा’ में हिन्दुओं को बांग्लादेश से कैसे सांप्रदायिक दंगों के कारण देश छोड़ना पड़ा, इसकी कहानी थी। वहीं ‘बेशरम’ उपन्यास के पात्र सुरंजन और माया, जो बांग्लादेश छोड़ने के बाद हिंदुस्तान आए और उन लोगों ने कैसे पराये देश में अपने जीवन यापन के लिए संघर्ष किया, उनकी कहानी है।

नसरीन ने कहा, “यह कोई राजनीतिक कहानी नहीं बल्कि एक सामाजिक कहानी है, जो उनकी जिंदगी, परिवार और संबंधों के बारे में है। मैं खुद को इस उपन्यास में देखती हूं क्योंकि किताब को लिखते वक्त मैं कोलकाता में रह रही थी।”

निर्वासन के बारे में अपना व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए तसलीमा ने माना कि जो लोग उस समय बांग्लादेश छोड़ कर भारत आए थे अगर वे चाहें तो वापस अपने देश जा सकते हैं लेकिन उनके पास वह मौका नहीं है।

उन्होंने कहा, ” ‘लज्जा’ लिखने के बाद मुझे बांग्लादेशी सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया। यहां आने वाले लोगों की तुलना में मेरी पीड़ा में अंतर है।”

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