गठबन्धन को लेकर काँग्रेस के रणनीतिकारों का इम्तिहान अब होगा | WeForNewsHindi | Latest, News Update, -Top Story
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क्या आप किसी टूर्नामेंट के लीग मैच को ही फ़ाइनल मान सकते हैं? क्या क्रिकेट में पहला विकेट गँवाने वाली टीम को हारा हुआ मान लिया जाता है? यदि नहीं तो फिर ये वक़्त उस राजनीति को समझने का है जिससे तहत मीडिया में इन दिनों तीन ‘प्लांटेड ख़बरें’ सुर्ख़ियाँ पा रही हैं। ये ख़बरें हैं –

  1. उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से मायावती-अखिलेश ने बाँटी 37-37 सीटें। काँग्रेस, अजित सिंह, ओम प्रकाश राजभर और निषाद पार्टी के लिए बना 2-2 सीटों का फ़ॉर्मूला। वहीं कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में ‘ख़ुलासा’ है कि बुआ-बबुआ ने काँग्रेस को गठबन्धन से बाहर रखा।
  2. अजय माकन और एचएस फुल्का के इस्तीफ़ों से आम आदमी पार्टी और काँग्रेस के बीच गठबन्धन का रास्ता खुला। ये गठबन्धन दिल्ली ही नहीं बल्कि पंजाब और हरियाणा की सीटों के लिए भी होने वाला है।
  3. कर्नाटक में जेडीएस और काँग्रेस के बीच सीटों के बँटवारे का फ़ार्मूला सामने आ चुका है? कोई इसे 2:1 बता रहा है। कोई कह रहा है 50:50 यानी 14-14 तो कोई लिख रहा है देवेगौड़ा को 12 और बाक़ी 16 पर काँग्रेस।

पत्रकारिता और राजनीतिक गलियारों में इन्हें ‘चंडू-खाने की ख़बरें’ कहते हैं। रिपोर्टर्स इन ख़बरों को ‘सूत्रों’ के आधार पर या ‘बताया जा रहा है’ की आड़ में लिखते हैं। इसके पीछे किसी ज़िम्मेदार नेता, पक्षकार या वार्ताकार का कोई बयान नहीं होता। इसीलिए इसे पुष्ट या पुख़्ता ख़बर नहीं माना जाता। इसका मक़सद भ्रम फैलाना होता है। इसे दुष्प्रचार या ‘प्लांटेड न्यूज़’ भी कहते हैं। ये पत्रकारिता नहीं बल्कि उसका काला चेहरा है। ख़बरों और उसके मनोविज्ञान को समझने वाले अच्छी तरह से जानते हैं कि ऐसी बातें कोरी गप्प या कयासबाज़ी होती हैं। ऐसे में ये सवाल उठना लाज़िमी है कि ‘फिर ऐसी अफ़वाहों को ख़बर क्यों बनाया जाता है? कयासबाज़ी पर कोई नक़ेल क्यों नहीं कसता?’

इन स्वाभाविक सवालों का जबाब भी उतना ही सहज है। दर्शकों अथवा पाठकों को सिर्फ़ इतना समझने की कोशिश करनी चाहिए कि ऐसी ‘प्लांटेड न्यूज़’ से किसके सियासी मंसूबों को फ़ायदा पहुँच सकता है? यानी, यदि यूपीए मज़बूत नहीं हो रहा, यदि काँग्रेस के साथ नये सहयोगी आने को तैयार नहीं, यदि राहुल गाँधी गठबन्धन के स्वाभाविक नेता बनकर नहीं उभर रहे तो फिर इन समीकरणों को लेकर किस ख़ेमे में ख़ुशियाँ मनायी जाएँगी? ज़ाहिर है, जो ख़ेमा टूर्नामेंट के लीग़ स्टेज के दौर में ही फ़ाइनल की ख़ुशियों में झूमना चाहेगा, वही मीडिया में चंडू ख़ाने की ख़बरें ‘प्लांट’ करवाने की तिकड़म आज़माएगा। यहाँ चुनाव की उपमा टूर्नामेंट से, लीग़ स्टेज का नाता चुनावी तालमेल के दौर से और फ़ाइनल का आशय जनादेश से है।

आमतौर पर भ्रमित करने वाली सूचनाओं को न्यूज़ एजेंसियों के ज़रिये फैलाया जाता है। न्यूज़ एजेंसियों के ग्राहक, ज़्यादातर मीडिया संस्थान होते हैं। क़ानून की नज़र में एजेंसी से आयी ख़बर को लेकर मीडिया संस्थानों की अपनी जबाबदेही बहुत मामूली सी होती है। कयासबाज़ी की ख़बरों को लेकर सियासी चटकारे लिये जाते हैं। बहुत कम रिपोर्टर या सम्पादक ही इस बात का आग्रह रखते हैं कि उन्हें अपुष्ट ख़बरों से परहेज़ करना है या इनके प्रकाशन-प्रसारण से पहले सम्बन्धित पक्षों से तथ्यों की पुष्टि भी करनी है। मौजूदा दौर के मीडिया में जो ‘भक्ति-भाव’ पसरा हुआ है, उसे देखते हुए ‘पुष्टि’ को लेकर कोई ख़ास आग्रह भी नज़र नहीं आता। यही वजह है कि अब तरह-तरह के चुनावी सर्वेक्षण भी सत्ता पक्ष के साथ ही खड़े दिखायी देते हैं।

बहरहाल, ताज़ा सन्दर्भ में ये समझना बहुत उपयोगी है कि कोई भी सियासी गठजोड़ सिर्फ़ मज़बूरी में ही होता है। एनडीए-यूपीए से लेकर यूनाइटेड फ़्रंट, जनता दल और जनता पार्टी जैसे सभी गठबन्धन हमेशा सियासी मज़बूरियों की वजह से ही हुए। किसी भी पार्टी को जब ये लगता है कि वो सिर्फ़ अपने बूते चुनाव में मैदान नहीं मार सकती, तभी गठजोड़ की सम्भावनाएँ तलाशी जाती हैं। गठजोड़ के ज़रिये जहाँ छोटी पार्टियों या क्षेत्रीय दलों को सत्ता का साझीदार बनने की उम्मीदें दिखती हैं, वहीं बड़े दलों को भी अपनी ज़मीनी ताक़त बढ़ाने की लालसा रहती है। हरेक सहयोगी दल का मक़सद एक-दूसरे की ताक़त का फ़ायदा उठाना होता है। कोई भी पार्टी किसी पर अहसान नहीं करती। अलबत्ता, कभी-कभार इसका राग ज़रूर अलापा जाता है।

कौन किसे कितना फ़ायदा देना चाहता है और बदले में कितना फ़ायदा पाना चाहता है, इसके लिए बन्द कमरों में लम्बी-चौड़ी बातचीत होती है। बातचीत में चुनाव से जुड़े बारीक़ से बारीक़ पहलू पर गौर किया जाता है। बन्द कमरे में बहस, लड़ना, अकड़ना, भड़कना वग़ैरह सब कुछ होता है। हरेक जायज़ और नाजायज़ बातें होती हैं। लेकिन हरेक पक्षकार उन्हें बाहर जाने देने से परहेज़ करता है। इसीलिए जब कभी गठबन्धन की सौदेबाज़ी परवान नहीं चढ़ती, तब भी कोई भी दल गोपनीयता का नियम नहीं तोड़ता है। कभी-कभार जो भी मामूली सी बात लीक़ की जाती है, वो भी क्षणिक ही होती है।

अब इस सियासी हक़ीक़त को समझना ज़रूरी है कि बीजेपी के ख़िलाफ़ तमाम क्षेत्रीय दल इसलिए एकजुट होना चाहते हैं, क्योंकि वो बीजेपी को अपनी राजनीतिक विचारधारा या वजूद के लिए नुकसानदेह पाते हैं। इसी वजह से कभी काँग्रेस के ख़िलाफ़ भी तमाम पार्टियाँ लामबन्द हुआ करती थीं। आज जैसे बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए से कई दल छिटक चुके हैं, वैसा ही काँग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए को भी झेलना पड़ा है। लेकिन जुड़ने-छिटकने के लिहाज़ से अब यूपीए की दशा कहीं बेहतर है। नीतीश और पासवान के अलावा बीजेपी से तौबा करने के बाद फिर किसी नेता ने दोबारा उसका दामन नहीं थामा।

ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, चन्द्र बाबू नायडू, करुणानिधि, देवेगौड़ा, ओम प्रकाश चौटाला, फ़ारूख़ अब्दुल्ला, महबूबा मुफ़्ती, अजित सिंह और मायावती जैसे क्षत्रप भी कभी न कभी बीजेपी को आज़मा चुके हैं। यहाँ तक कि काँग्रेस को सत्ता से हटाने के लिए वामपन्थियों ने भी ऐसे गठबन्धन को बाहर से समर्थन दिया है जिसमें बीजेपी रही हो। अकाली दल और शिवसेना को बीजेपी के टिकाऊ दोस्त हैं तो मुलायम, लालू और शरद पवार, कभी बीजेपी के साथ नहीं रहे। 1996 से पहले की जनता पार्टी, नेशनल फ़्रंट और यूनाइटेड फ़्रंट वाली गठबन्धन सरकारें जहाँ टिकाऊ नहीं रहीं, वहीं एनडीए और यूपीए ने टिकाऊ सरकारें दीं।

2019 में बीजेपी को सत्ता से बाहर करने की बेचैनी सबसे ज़्यादा उन दलों में है जो बीजेपी के साथ रह चुके हैं। इन्हें काँग्रेस से नफ़रत नहीं है। लेकिन वो काँग्रेस के प्रति कोई दरियादिली भी नहीं दिखा सकते। सियासत का दस्तूर ही कुछ ऐसा है कि सभी मौके पर चौका लगाना चाहते हैं। इसीलिए सीटों के बँटवारे के वक़्त ज़बरदस्त मोलभाव होता है। गुजरात और कर्नाटक के बाद छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में काँग्रेस के प्रदर्शन से राहुल गाँधी की छवि बदली है। शरद पवार, चन्द्र बाबू नायडू, लालू यादव, एम के स्टालिन और फ़ारूख़ अब्दुल्ला जैसे अनुभवी नेताओं ने भी राहुल के नेतृत्व को सराहा है।

ज़ाहिर है, उत्तर प्रदेश में काँग्रेस महज़ दो सीटों से नहीं मानने वाली। अखिलेश और मायावती भी ये जानते हैं। लिहाज़ा, यदि काँग्रेस, मोदी सरकार को सत्ता से बाहर करना चाहती है तो उसे उत्तर प्रदेश में कम से कम 8-10 सीटें जीतने का दमख़म तो दिखाना ही होगा। अब काँग्रेस के रणनीतिकारों का असली कौशल ये होगा कि वो कैसे अखिलेश और मायावती को इतनी सीटों के लिए राज़ी कर पाते हैं। दोनों की मंशा मध्य प्रदेश और राजस्थान में काँग्रेस से उदारता से सीटें लेने की है। ताकि उत्तर प्रदेश में भी जैसे को तैसा किया जा सके। पेशेवर मीडिया जनता को इतनी सी राजनीति क्यों नहीं बता पाता?

दरअसल, ये धारणा बीजेपी के पक्ष में जाती है कि उसे हराने का ख़्वाब देखने वाले मौकापरस्त हैं, सत्ता के लालची हैं। इसीलिए आपस में सिर-फुटव्वल हो रही है। चुनावी मौसमी भी सभी गठबन्धनों में हमेशा ऐसा ही होता रहा है। बीजेपी ने अभी बिहार में क्या यही नहीं झेला? कुशवाहा, क्यों बाहर गये? पासवान ने क्यों आँखें तरेरीं? क्या उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में एनडीए में पनपी तपिश किसी से छिपी है? किसी भी गठबन्धन के लिए मोल-तोल और रार-तकरार बहुत ही सहज और सामान्य बात है। सीटों को लेकर गठबन्धन नहीं बनना उतना बड़ी बात नहीं होती, जितनी कि बने गठजोड़ का टूट जाना। चुनाव के बाद उनके जुड़ने के आसार अधिक होते हैं जो पहले जुड़ते-जुड़ते रह जाते हैं। यही राजनीति है।

यूपीए ख़ेमें में सीटों के बँटवारे को लेकर कर्नाटक में कोई ख़ास उलझन नहीं है। जबकि बीजेपी की हवा बनाने के लिए आम आदमी पार्टी और काँग्रेस को लेकर ये ख़बर प्लांट कर दी गयी कि अजय माकन को हटाकर गठबन्धन का दरवाज़ा खोला गया है। सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है। माकन तो चाहते थे कि तालमेल हो जाए, लेकिन शीला दीक्षित का विरोध भारी पड़ा। पंजाब-हरियाणा में तो जोड़तोड़ की सुगबुगाहट तक नहीं है। अलबत्ता, राजनीति में भ्रम फैलाने कोई ओर-छोर कभी नहीं रहा।

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सेना ने माना, आईएलएंडएफएस बांड में फंसा एजीआईएफ का पैसा

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Indian Army insurance ILFS bonds

नई दिल्ली, 18 मार्च | भारतीय सेना जो पहले यह मानने को तैयार नहीं थी कि उनके कल्याण की निधि का पैसा आईएनएंडएफएस के विषैले बांड में फंस गया है, जबकि आईएनएस इस बात को बार-बार दोहराता रहा, लेकिन अब वह स्वीकार करती है कि भारत की एकमात्र निष्पक्ष न्यूज वायर का विश्लेषण सही है।

सेना के पीआरओ ने आखिरकार सवालों का जबाव देते हुए कहा कि आर्मी ग्रुप इंश्योरेंस फंड (एजीआईएफ) के काफी सख्त निवेश नियम हैं। देश के अत्यंत सम्मानित व प्रख्यात वित्तीय शख्सियतों की सलाह पर निवेश किया जाता है। इससे पहले सेना के पीआरओ लेफ्टिनेंट कर्नल मोहित वैष्णव मसले को उलझाते रहे और जवाब नहीं दिए थे। सेना का हालिया बयान आईएएनएस के तथ्यों के साथ इस प्रकार है :

एजीआईएफ का वर्षो से रिटर्न निर्धारित जोखिम लाभ सांचे में काफी बेहतर रहा। आईएएनएस ने इसपर कभी संदेह नहीं किया।

एजीआईएफ को 200 से कोई एनपीए नहीं रहा। इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज (आईएनएंडएफएस) ट्रिपल ‘ए’ रेटेड कंपनी थी और जब एजीआईएफ का निवेश हुआ उस समय उसे केंद्र व राज्य सरकारों दोनों की मदद मिली थी। कंपनी अगस्त 2018 में अचानक चूक के कारण ट्रिपल ‘ए’ से नीचे आ गई।

आईएएलएंडएफएस के 91,000 करोड़ के कर्ज में बैंकों का 63 फीसदी, म्यूचुअल फंड का तीन फीसदी से ज्यादा और बीमा कंपनियों, ईपीएफ वे पेंशन निधि का पांच फीसदी से ज्यादा फंस गया है।

बैंक/एएमसी/पेंशन निधि के मुकाबले एजीआईएफ की रकम अत्यल्प (0.5 फीसदी से कम) है। (सारा कुछ सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है और आईएएनएस का कहना है कि विषैले आईएलएंडएफएस बांड में एजीआईएफ की 210 करोड़ रुपये की रकम फंस गई है।)

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राफ़ेल सौदे में सीएजी ने उड़ाई पारदर्शिता की धज़्ज़ियाँ

राफ़ेल रिपोर्ट में सीएजी ने अपनी प्रतिष्ठा गँवाई, इसने जितने सवालों के जबाब दिये उसके ज़्यादा तो प्रश्न खड़े किये

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Rafale deal scam

राफ़ेल विमानों की ख़रीदारी के लिए भारत और फ़्राँस के बीच हुए सौदे को अन्तर-सरकारी क़रार (आईजीए) कहा गया। आईजीए के इस नामकरण को समझना बहुत मुश्किल है। ख़ासकर, उस घटनाक्रम को देखते हुए जो 10 अप्रैल 2015 से पहले का रहा है। इस दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने फ़्राँसिसी कम्पनी डसॉल्ट से 36 विमान ख़रीदने के फ़ैसले का ऐलान किया था।

यूपीए सरकार ने ग्लोबल टेंडर के ज़रिये दो विमानों के चुना था। पहला, डसॉल्ट कम्पनी का राफ़ेल और दूसरा, चार यूरोपीय देशों में बनने वाला यूरोफ़ाईटर टाइफून। टेंडर में राफ़ेल का दाम कम था। तब यूपीए ने 126 राफ़ेल विमानों की ख़रीदारी के लिए सौदेबाज़ी शुरू की।

ये क़रार दो सरकारों के बीच होने वाला जी-टू-जी समझौता नहीं था। क्योंकि ग्लोबल टेंडर को इस ढाँचे में नहीं रखा जा सकता। यही वजह है कि यूपीए सरकार ने जब रूस या अमेरिका से रक्षा उपकरणों की ख़रीदारी की तभी जी-टू-जी क़रार किये गये। यूपीए ने डसॉल्ट से जिस सौदे की बातचीत की थी, उसके तहत 18 विमानों का निर्माण सीधे डसॉल्ट को करना था और बाक़ी 108 का निर्माण हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) को करना था और डलॉल्ट को इसकी तकनीक मुहैया करवानी थी।

मार्च 2015 में डसॉल्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) ने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि एचएएल के साथ हो रहा समझौता 95 फ़ीसदी पूरा हो चुका है और बाक़ी भी जल्द ही पूरा हो जाएगा। लेकिन प्रधानमंत्री ने उस समझौते को ख़त्म कर दिया और उसकी जगह डसॉल्ट से सीधे 36 विमान ख़रीदने का सौदा किया। इस समझौते से एचएएल को बाहर कर दिया गया। साफ़ है कि अब भी राफ़ेल विमानों की आपूर्ति का ज़िम्मा डसॉल्ट पर ही है, फ़्राँसिसी सरकार पर नहीं। इसके बावजूद, नये सौदे को ‘सरकार से सरकार के बीच’ (जी-टू-जी) नहीं, बल्कि ‘अन्तर-सरकारी क़रार’ (आईजीए) कहा जा रहा है।

नये सौदे की आड़

प्रधानमंत्री की घोषणा का अंज़ाम ये हुआ कि पुराने समझौते से जुड़ी वो सारे शर्ते ख़त्म हो गयीं जिनका ताल्लुक राफ़ेल के दाम से था और जिसे इसे रक्षा ख़रीद प्रक्रिया यानी डिफ़ेंस प्रोक्योरमेंट प्रोसिज़र्स (डीपीपी) के तहत तय किया गया था। दूसरे शब्दों में, अब पुराना क़रार ख़त्म हो गया और उसकी जगह 36 विमानों की पूरी तरह से नयी डील (सौदे) ने ले ली। 2015 में फ़्राँस की धरती पर किये गये प्रधानमंत्री के ऐलान से भारत सरकार पशोपेश में फँस गयी, क्योंकि ये प्रधानमंत्री का एकतरफ़ा फ़ैसला था। अब आगे की बातचीत का दारोमदार सीधे-सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) पर आ गया।

नये सौदे की शर्तों पर बातचीत करने का जो रास्ता प्रधानमंत्री कार्यालय ने चुना वो रक्षा ख़रीद प्रक्रिया (डीपीपी) और रक्षा ख़रीद परिषद (डिफ़ेंस एक्वीज़ीशन काउन्सिल – डीएसी) के दायरे से बाहर था। क्योंकि रक्षा ख़रीद के लिए सौदेबाज़ी करने का काम डीपीपी को करना होता है। ये उसी का क्षेत्राधिकार है। इसीलिए राफ़ेल की फ़ाइल में रक्षा मंत्रालय के अफ़सरों की टिप्पणी ने प्रधानमंत्री कार्यालय पर सीधा-सीधा आक्षेप किया। दस्तावेज़ों से साबित हो गया कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने सौदेबाज़ी में रक्षा मंत्रालय की रसूख़ को गिरा दिया। दिलचस्प ये भी रहा कि नये सौदे में दो नयी बातें हुईं। पहला, एक ऑफ़सेट पार्टनर का जुड़ना और दूसरा, हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के हाथों से 108 विमानों के निर्माण की शर्ते का ख़त्म होना।

नया क़रार ‘अन्तर-सरकारी’ (आईजीए) नहीं है। क्योंकि डसॉल्ट एक निजी कम्पनी है। ये फ़्रेंच सरकार की भी कम्पनी नहीं है। इसीलिए फ़्रेंच सरकार ने 36 विमानों की सप्लाई की गारंटी लेने वाली शर्त से अपना पल्ला झाड़ लिया। फिर सप्लायर होने के नाते डसॉल्ट को गोपनीयता और कमीशन की शर्तों से छुटकारा दिलाने के लिए ज़ुर्माने और भ्रष्टाचार से जुड़े प्रावधानों को हटाया गया। ये काम प्रधानमंत्री कार्यालय की शह के बग़ैर कैसे मुमकिन हुआ? इसकी क्या वजह रही और ऐसा किससे कहने से हुआ? इन सवालों का कोई जबाब नहीं मिला।

रक्षा ख़रीद परिषद (डीएसी) को दरकिनार करने के लिए ऐसी शर्तें तैयार की गयीं जिससे प्रधानमंत्री और फ़्रेंच सरकार के लिए मुश्किलें पैदा नहीं हों। गारंटी की जगह उस ‘लेटर ऑफ़ कम्फर्ट’ (सहुलियत पत्र) ने ले ली जिसका कोई क़ानूनी प्रभाव नहीं होता। यहाँ तक कि फ़्रेंच सरकार ने डसॉस्ट को भुगतान करने के लिए अपने ‘स्क्रू खाते’ की सुविधा भी नहीं दी। शायद इसीलिए, क्योंकि फ़्रेंच सरकार इस सौदे की किसी भी ज़िम्मेदारी लेने से बचना चाहती थी। स्क्रू खाते के ज़रिये फ़्रेंच सरकार को ये सुनिश्चित करना होता कि डसॉल्ट ने अपनी शर्तों को निभाया, तभी उसे भुगतान हुआ।

ख़ामियों भरी रिपोर्ट

सीएजी ने कई तरह से देश को गच्चा दिया। पहला, इसकी रिपोर्ट 36 विमानों के दाम तक सीमित रही। इसका कहना है कि यूपीए के दौर वाले क़रार के मुक़ाबले नया सौदा 2.86% सस्ता है। लेकिन इस नतीज़े पर पहुँचने से पहले सीएजी ने सभी तथ्यों का ख़ुलासा नहीं किया। कहना मुश्किल है कि सीएजी ऐसा कैसे कर सकता है! दूसरा, सीएजी ने ये नहीं बताया कि प्रधानमंत्री ने किस आधार पर 36 विमानों की सीधी ख़रीदारी का साहसिक फ़ैसला लिया। तीसरा, सीएजी रिपोर्ट ने 2013 से लागू रक्षा ख़रीद प्रक्रिया (डीपीपी) को दरकिनार किये जाने के प्रति अपने नज़रें पूरी तरह से फेर लीं।

चौथा, सीएजी रिपोर्ट में इस तथ्य के प्रति भी उदासीनता दिखायी गयी है कि भारत की सौदेबाज़ी टीम ने एक ऐतराज़ ज़ाहिर किया है और उसे ठुकराने या ख़ारिज़ करने के लिए क्या दलीलें हैं। पाँचवाँ, सीएजी रिपोर्ट ने ये भी साफ़ नहीं किया कि नये क़रार के मसौदे से भ्रष्टाचार-विरोधी प्रावधान ग़ायब क्यों हैं। छठा, सीएजी रिपोर्ट ये तो बताती है कि गारंटी नहीं मिलने का कोई वित्तीय नुकसान नहीं होगा, लेकिन रिपोर्ट ये साफ़ नहीं करती कि गारंटी का प्रावधान क्यों नहीं है।

सबसे आश्चर्यजनक तो ये रहा कि सीएजी ने राफ़ेल के चयन के लिए यूपीए की आलोचना की, लेकिन उसी विमान को जब प्रधानमंत्री ने चुनने का फ़ैसला किया तो सीएजी की बोलती बन्द थी। इतना ही नहीं, राफ़ेल विमानों की संख्या को 126 से घटाकर 36 करने को लेकर भी जो उद्देश्य बताया गया वो ये कि भारतीय वायुसेना में विमानों की भारी कमी है जिसे यथाशीघ्र पूरा करना ज़रूरी था। लेकिन जब यूपीए के सौदे की तुलना मोदी सरकार के क़रार से की गयी तो पता चला कि नये सौदे में सिर्फ़ एक महीने की बचत होगी।

साफ़ है कि मौके की नज़ाक़त को देखते सीएजी अपनी अपेक्षाओं पर ख़रा नहीं उतरा। उसने अपने दायरे से बाहर जाकर सरकार की सुरक्षा करने का रास्ता चुना। अब तो सीएजी की प्रतिष्ठा को भी सुरक्षित करना होगा।

(लेखक, राज्यसभा सांसद, पूर्व केन्द्रीय मंत्री और वरिष्ठ काँग्रेस नेता हैं।)
(साभार: TheHindu)

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सरकार और मीडिया ही बने लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक

लोकतांत्रिक संस्थाओं के पतन का सबसे बड़ा सबूत है, ग़लत जानकारियों को ही विश्वसनीय बनाकर पेश करना

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Modi on TV

ज़माना बदल गया। हमारा राष्ट्रीय संवाद अब पक्ष-विपक्ष का नहीं रहा, बल्कि दोस्तों और दुश्मनों का हो चुका है। चर्चा और बहस की गुंज़ाइश नहीं रही। आज जो सरकार या उसके बैठे लोगों के विरोध में हो, उसे देशद्रोही कहा जाता है। ऐसा माहौल बना दिया गया है कि पाकिस्तान से सम्बन्धित सरकार के हरेक क़दम का समर्थन करना ज़रूरी है। यदि विपक्ष ऐसे सवाल पूछता है, जिन्हें पूछा ही जाना चाहिए तो उस पर राष्ट्रविरोधी होने का आरोप मढ़ दिया जाता है। फ़ेसबुक औऱ ट्वीटर जैसे सोशल मीडिया के माध्यमों पर भी यदि कोई सरकार की आलोचना करता है तो उसके ख़िलाफ़ देशद्रोह का मुक़दमा ठोंक दिया जाता है।

लोकसभा के चुनाव सामने पाकर जन-संवाद को इतना हानिकारक बना दिया गया है कि बात बर्दाश्त से बाहर हो गयी है। प्रधानमंत्री कुछ भी बोलें लेकिन उनके गुणगान के लिए इलेक्ट्रानिक मीडिया ने चीयरलीडर्स या भाँडों की भूमिका थाम ली है। जब ‘द हिन्दू’ अख़बार ने बोफ़ोर्स ख़ुलासा किया था, तब विपक्ष ने राजीव गाँधी से सवाल पूछे थे। लेकिन जब उसी ‘द हिन्दू’ ने राफ़ेल सौदे का भाँडाफोड़ किया तो सरकार ने ‘द हिन्दू’ को ही कठघरे में खड़ा कर दिया। विपक्ष के सवालों को ऐसे पेश किया गया जिनसे सुरक्षा बल कमज़ोर पड़ जाएँगे।

मुझे अच्छी तरह से याद है कि जब 26 नवम्बर 2008 को मुम्बई पर आतंकी हमला हुआ था, तब मुठभेड़ के दौरान ही गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मुम्बई पहुँचकर केन्द्र सरकार को नकारा होने और राष्ट्रीय सुरक्षा में नाकाम रहने का तमग़ा दे दिया। लेकिन जब पुलवामा हमला हुआ तो सरकार ने उन्हीं लोगों पर सवाल दाग़ने शुरू कर दिये जो उससे सवाल पूछ रहे थे। लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी की यादाश्त बहुत कमज़ोर है। मोदी उस वक़्त देश की सरकार के समर्थन में नहीं खड़े जब मुम्बई में आतंकी तबाही मचा रहे थे। शायद, उन्हें उस वक़्त अपनी कथनी और करनी में राष्ट्रभक्ति की छटा दिखायी दे रही थी।

ऐसी वारदातों के सामने मीडिया का दोहरा चरित्र बेनक़ाब हो गया है, क्योंकि अब उसके पास प्रधानमंत्री के दोमुँही बातों को उजागर करने का वक़्त नहीं है। ये मिसाल है कि हमारी लोकतांत्रिक संस्थाएँ अब कहाँ से कहाँ पहुँच चुकी हैं। 2014 से पहले पहले प्रेस और इलेक्ट्रानिक मीडिया ने संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन (यूपीए) की क़दम-क़दम पर चीड़फाड़ की। आज वही लोग इस सरकार के लिए भाँड या चीयरलीडर्स बन गये हैं। हालाँकि, ये बात मीडिया का सभी वर्गों पर लागू नहीं होती है। आज विपक्षी नेताओं के तक़रीबन सारे बयानों को तोड़-मरोड़कर पेश किया जाता है। आज सरकार के हर क़दम को राष्ट्रभक्ति बताकर उसका स्तुतिगान किया जाता है। प्रधानमंत्री और इस सरकार के हरेक मंत्री के बयान को अक्षरशः सत्य बनाकर पेश किया जाता है। उन आँकड़ों को लेकर कोई सवाल नहीं पूछे जाते जिन्हें राष्ट्रीय सैम्पल सर्वे (एनएसएसओ) जारी करता है। कोई सरकार से ये नहीं पूछ रहा कि वो किस आधार पर बालाकोट में 300-400 आतंकियों के सफ़ाये का दावा कर रही है। पत्रकारों और टीवी के एंकरों में प्रधानमंत्री को उनकी हैसियत से बड़े से बड़ा करके दिखाने की होड़ मची हुई है।

कई योजनाओं के नाम बदलकर उनकी उपलब्धियों के बारे में सरकार जो आँकड़े पेश करती है, कोई उसकी सच्चाई को जाँचने वाला नहीं है। जो लोग सच्चाई को सामने रखते हैं उनके साथ दक्षिण-पन्थी भक्तों की टोली ग़ाली-गलौज़ करती है। विपक्ष के नेताओं को फ़र्ज़ी बयान को जोड़कर उन्हें वायरल करवाया जाता है, ताकि उनका चरित्र-हनन किया जा सके। लेकिन दूसरी ओर, फ़ेसबुक और ट्वीटर के अफ़सरों को बुलाकर सरकार तलाड़ती है कि वो उसके क़रीबियों के चुनिन्दा पोस्ट को क्यों हटा रही है। सरकार को उन फ़ेक-पोस्ट की परवाह नहीं है, जिनमें विपक्षियों को निशाना बनाया जाता है। भ्रष्ट जानकारियों को आज विश्वसनीय सूचनाएँ बनाकर पेश किया जाता है। हर तरफ़ से ये झूठ फ़ैलाया जा रहा है कि मोदी सरकार ने भारत की दिशा ही बदल दी है।

अख़बारों में प्रधानमंत्री के विज्ञापन भरे पड़े हैं। इन पर जनता का पैसा बहाया जा रहा है, लेकिन कोई सवाल उठाने वाला नहीं है। मुट्ठीभर सम्पादकों ने सरकार को आड़े हाथों लेने का साहस दिखाया है। वो बधाई के पात्र हैं। लेकिन लोकतंत्र के चौथे खम्भे का ज़्यादातर हिस्सा सरकार की जाग़ीर बन चुका है। मीडिया की साख़ इतनी गिर चुकी है कि समाज के बहुत बड़े तबक़े ने टेलीविज़न देखना बन्द कर दिया है, क्योंकि अब वो इसे ख़बरें देने वाले माध्यम के रूप में नहीं पाते हैं। हर शाम को कुछ चैनलों पर कुछ ख़ास लोगों की साउंड बाइट सर्कस करते नज़र आती है। इनके ज़रिये समाज में ज़हर परोसा जाता है। ये लोकतंत्र का अराजक चेहरा है, जो सिर्फ़ झूठ और दुष्प्रचार के भरोसे क़ायम है।

यदि सरकार और चौथा खम्भा यानी मीडिया, एक ही चट्टा-बट्टा बन चुके हैं तो लोकतंत्र भारी ख़तरे में है। इसीलिए बहुत महत्वपूर्ण है कि वो लोग आगे आयें जो अपनी बातों को प्रभावी तरह से रखना जानते हैं। यदि ऐसे लोग मुखर नहीं होंगे तो झूठ और अफ़वाह को कौन चुनौती देगा। सच को कौन सामने लाएगा। हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं को संविधान से जो ज़िम्मेदारियाँ मिली हैं, उसे लेकर उन्हें सरकार के प्रति नहीं बल्कि देश के प्रति जबाबदेह होना चाहिए। उन्हें सरकार की रखैल बनने के बजाय अपने विवेक के काम लेना चाहिए। चाहे केन्द्रीय हो या प्रादेशिक, जाँच एजेंसियों को चाहिए कि वो डर और पक्षपात के बग़ैर क़सूरवार लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करें। लेकिन ये बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि जाँच एजेंसियाँ चुन-चुनकर उन लोगों को निशाना बना रही हैं, जो सरकार के विरोधी हैं, जबकि उन लोगों को नज़रअन्दाज़ किया जाता है जो या तो सरकार के क़रीबी हैं और फिर उसका हिस्सा हैं। न्यायपालिका को भी ये समझना होगा कि यदि वो बेक़सूर लोगों के हक़ में नहीं खड़ी होती तो उसे निष्पक्ष नहीं माना जा सकता।

ख़ुशहाली और अच्छे दिन के लिए शान्ति, सद्भाव और लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा ज़रूरी है। ऐसा लगता है कि आज हम ऐसे अन्यायपूर्ण भारत में रह रहे हैं, जहाँ कमज़ोर तबकों के लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ सपने हैं। मुट्ठी भर लोगों को छोड़कर चारों ओर नाउम्मीदी नज़र आती है।

(लेखक, राज्यसभा सांसद, पूर्व केन्द्रीय मंत्री और वरिष्ठ काँग्रेस नेता हैं।)
(साभार: द टेलिग्राफ)

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