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एक पक्षपातपूर्ण, हिंसक समाज में सफल होने की भी जटिलताएं हैं : अरुंधति रॉय

अरुं धति ने इस परमाणु परीक्षण की आलोचना करते हुए ‘द एंड ऑफ इमैजिनेशन’ शीर्षक से एक लेख लिखा, और इसके साथ ही राजनीतिक और सामाजिक चेतना से युक्त अरुं धति दुनिया के सामने आई।

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नई दिल्ली, 27 अगस्त | भारत की बेहद प्रतिष्ठित एवं 1997 में मैन बुकर पुरस्कार जीत चुकीं अरुंधति रॉय का कहना है कि पांच साल की छोटी सी उम्र में उन्होंने बिना हिले-डुले, चुपचाप, एक ही स्थिति में घंटों खड़े रहकर मछली पकड़ना सीखा और शायद इसी ने मुझे साहित्यकार बनाया।

अरुं धति ने आईएएनएस को दिए साक्षात्कार में अपने जीवन के शुरुआती समय और हाल में प्रकाशित अपने दूसरे उपन्यास ‘द मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस’ का बारे में बातचीत की।

अरुंधति का जन्म मेघालय में हुआ, लेकिन माता-पिता के बीच जल्द ही तलाक होने के चलते उनका अधिकांश बचपन केरल में बीता।

अपने पहले उपन्यास की रचना यात्रा की यादें दोहराते हुए अरुंधति ने कहा, “मैं एक छोटे से गांव में पली बढ़ी, जहां एक फोन तक नहीं था, न ही टेलीविजन था, न रोस्तरां, न सिनेमाहॉल। लेकिन हर तीन महीने पर एक पुस्तकालय से हमारे पास 100 किताबें आ जाती थीं और यही मेरा जीवन बदलने वाला साबित हुआ। मैं पुस्तकों की अगली खेप का इंतजार करती रहती थी..चूंकि यह उत्तर भारत के किसी गांव जैसा नहीं था, जहां इसका मतलब वंचित तबके से होना होता, बल्कि यहां जाति के आधार पर अलगाव था। वहां जाति के आधार पर भयानक भेदभाव था और मेरी पहली पुस्तक ‘द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ इसी जातिगत भेदभाव के बारे में है।”

अरुंधति इसी पुस्तक के लिए 1997 में मैन बुकर पुरस्कार प्रदान किया गया था।

अरुं धति कहती हैं कि इस माहौल में पलना-बढ़ना उनके ‘विशेष बात’ थी, क्योंकि सोशल मीडिया या एसएमएस ने उनका दिमाग खराब नहीं किया।

वह कहती हैं, “किसी चीज पर ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कमाल की चीज होती है।”

हालांकि वह यह भी कहती हैं कि वहां सबकुछ बेहतरीन ही नहीं था और जीवन के शुरुआती दिनों में कई वर्षो तक सिर्फ लेखन का विकल्प उनके पास मौजूद नहीं था।

अरुंधति कहती हैं, “हम जाति आधारित व्यवस्था में सबसे नीचे तो नहीं थे, लेकिन उन्हें ऐसा लगता था कि उनसे कोई विवाह नहीं करेगा या ऐसा ही कुछ। ऐसा शायद इसलिए भी था, क्योंकि बहुत शुरुआत में ही मेरे मन में आत्मनिर्भर बनने की बात आ गई थी। और आप आत्मनिर्भर तभी हो सकती हैं, जब आप आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हों, जिसका मतलब था जल्द से जल्द कुछ करना शुरू करना।”

अरुंधति ने 17 साल की अवस्था में घर छोड़ दिया और अब उनके दिमाग से सबसे बड़ी बात यही थी कि वह घर का किराया कैसे चुकाएंगी और महीने के आखिर तक कैसे चलाएंगी।

अरुं धति का कहना है, “कई साल ऐसे रहे जब सिर्फ लिखकर काम नहीं चलाया जा सकता था। उस समय यह संभव ही नहीं लगता था कि मैं कभी लेखिका बन पाऊंगी, क्योंकि कई साल तो सिर्फ और सिर्फ पैसों के बारे में सोचते बीते।”

और तब मेरी पहली पुस्तक ‘द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ आई, जिसकी पूरी दुनिया में लाखों प्रतियां बिकीं और अरुंधति अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मशहूर हुईं, साथ ही आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर भी। अरुं धति गल्प कथा के लिए मैन बुकर पुरस्कार जीतने वाली भारत की पहली साहित्यकार बनीं और पुरस्कार स्वरूप मिली राशि को उन्होंने नर्मदा बचाओ आंदोलन को दान दे दी।

अरुंधति ने कहा, “बुकर जीतने का जबरदस्त प्रभाव हुआ। यह सब इतनी तेजी से हुआ कि मुझे इसे जज्ब करने का भी समय नहीं मिला। इससे उबरने में काफी वक्त लगा, क्योंकि जहां कुछ हासिल कर ले जाने का अद्भुत अहसास था, तो साथ ही, जिस तरह की व्यक्ति मैं थी, एक ऐसे देश में रहना जहां बड़ी संख्या लोग पढ़ नहीं सकते, जहां बड़ी संख्या में लोगों के पास खाने तक के लिए कुछ नहीं है, वहां सफल होना वह भी एक पक्षपातपूर्ण और हिंसक समाज में थोड़ा जटिल हो जाता है।”

इन तमाम जटिलताओं के बावजूद अरुंधति बुकर जीतने के बाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर काफी सराही गईं और भारत में भी उन्हें काफी लोकप्रियता मिली।

और तभी 1998 में भारत ने अपना दूसरा परमाणु परीक्षण किया।

अरुंधति उसे याद करते हुए कहती हैं, “उस समय जो कुछ घटा वह ये हुआ कि जब मुझे चारों ओर से सराहना मिल रही थी, तभी यह परमाणु परीक्षण हुआ, और मेरे लिए कुछ कहना भी उतना ही राजनीतिक साबित होता, जितना चुप रहना। अगर मैं कुछ न कहती तो मैं भी उस जश्न का हिस्सा बन जाती-एक ऐसी बात का जश्न जिसे मैं पसंद नहीं करती थी।”

अरुंधति ने इस परमाणु परीक्षण की आलोचना करते हुए ‘द एंड ऑफ इमैजिनेशन’ शीर्षक से एक लेख लिखा, और इसके साथ ही राजनीतिक और सामाजिक चेतना से युक्त अरुं धति दुनिया के सामने आई।

अरुंधति कहती हैं, “मेरे लिए यह एक अलग ही सफर की शुरुआत साबित हुई।”

तब से विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक एवं पर्यावरणीय संघर्षो में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने वाली अरुं धति का दूसरा उपन्यास पूरे 20 साल के अंतराल के बात आता है।

अरुंधति की इस नई पुस्तक ‘द अटमोस्ट हैप्पिनेस’ की आखिरी लाइनें हैं – ‘पास से उड़ती प्यारी चिड़ियों पर बहुत कम लोग ध्यान देते हैं। इसके अलावा आगे देखने के लिए कितनी ही दूसरी चीजें हैं’। यह लाइनें अरुंधति पर भी सटीक बैठती हैं।

अरुंधति की यह पुस्तक भी मैन बुकर पुरस्कार-2017 के लिए चयनित पुस्तकों की सूची में जगह बना चुका है।

अरुं धति ने इस पुस्तक को लिखने में पूरे 10 साल लगाए। वह कहती हैं कि इस उपन्यास के चरित्रों को विकसित होने का उन्होंने पूरा समय दिया और उन्हें इसे खत्म करने की कभी कोई हड़बड़ी नहीं रही।

अरुंधति कहती हैं, “उपन्यास जादुई चीज होती है। यह कई तहों में लिपटी हुई दुनिया होती है। और अपनी रचना में उतना ही समय लेती है। मैं इसे इससे तेज या धीमी गति से नहीं लिख सकती थी। इसकी अपनी गति थी और इसने अपनी शर्तो पर अपनी रचना करवाई।”

–आईएएनएस

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हज 2018 होगा महंगा, मगर सब्सिडी की समाप्ति वजह नहीं

केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने मंगलवार को इस साल से हज सब्सिडी की समाप्ति की घोषणा की थी।

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हज 2018 की यात्रा पिछले साल के मुकाबले ज्यादा महंगी रहने वाली है। लेकिन इसकी वजह सरकार द्वारा मंगलवार को सब्सिडी समाप्त करने की घोषणा नहीं है।

इसके पीछे का कारण हज के दौरान सऊदी अरब में होने वाला खर्च है, जिसमें रहना, परिवहन, खाना और दूसरी चीजें शामिल हैं। यहां ध्यान दिलाने वाली बात यह है कि सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी इन खर्चो का वहन नहीं करती और साथ ही वह हवाई सफर में भी सीमित है।

भारतीय हज समिति (एचसीआई) के अध्यक्ष महबूब अली कैसर ने आईएएनएस को बताया कि कीमतों पर नियंत्रण के लिए सऊदी प्रशासन से सौदेबाजी करना कठिन था, लेकिन इस साल स्थानीय कारक हज की यात्रा में खर्चा बढ़ा सकते हैं।

2017 में एचसीआई हज के लिए साधारण आवास (अजीजिया) के साथ दो लाख रुपये और डीलक्स आवास (ग्रीन) के साथ 234,000 रुपये वसूलता था। डीलक्स आवास (ग्रीन) मक्का में हरम के समीप है।

कैसर ने कहा, “पिछले साल से सऊदी अरब में बिजली का शुल्क तीन गुना बढ़ गया है। इसके साथ ही पेट्रोल की कीमतें भी दोगुनी हो चुकी हैं। आवास की कीमतें भी बढ़ रही हैं। ये सभी कारक इस साल हज में आने वाली कुल लागत को बढ़ा सकते हैं।”

उन्होंने कहा कि इस वक्त हज 2018 में प्रत्येक श्रद्धालु पर आने वाली अंतिम लागत का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।

उन्होंने कहा, “ऐसा मानना बेमानी होगी कि बिजली की कीमतों में तीन गुना और पेट्रोल की कीमतों में दोगुनी वृद्धि हो जाने पर हर बार सऊदी अरब में सभी चीजों की कीमतें समान रहेंगी। दूसरा, सऊदी के लोग सौदेबाजी करने वालों को गाली देते हैं और हमें उनसे हर रियाल के लिए वास्तव में बहुत सौदेबाजी करनी पड़ी।”

कैसर ने कहा, “तब भी, हम अपना सर्वश्रेष्ठ देने का प्रयास कर रहे हैं और उनसे बहुत सौदेबाजी कर रहे हैं, ताकि यह सुनिश्चित कर सकें कि कीमतें जबरदस्त रूप से न बढ़ें।”

केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने मंगलवार को इस साल से हज सब्सिडी की समाप्ति की घोषणा की थी।

कैसर ने कहा कि एचसीआई को पता था कि ऐसा होने वाला है और इसके लिए हम मानसिक रूप से तैयार थे।

उन्होंने कहा, “किसी भी हालत में सब्सिडी को वापस लेने का फैसला मुंबई, दिल्ली, अहमदाबाद और बेंगलुरू जैसे बड़े शहरों के हवाई किराए को प्रभावित नहीं करेगा, लेकिन श्रीनगर, गया जैसे छोटी जगहों से किराया बढ़ सकता है। लेकिन इन राज्यों के लोग जहां किराया कम है, जैसे मुंबई, दिल्ली और अहमदाबाद जाकर उड़ानें पकड़ सकते हैं।”

हालांकि आने वाले वर्षो में हज की लागत कम होने के आसार हैं, क्योंकि भारत सरकार पहले से ही जेद्दाह जाने वाले समुद्री रास्ते को पुनर्जीवित करने की दिशा में काम कर रही है।

नकवी ने कहा कि सरकार ने इस बाबत पहले से ही इस दिशा में सक्रिय कदम उठाए हैं और एक बार लागू होने के बाद किराये में जबरदस्त गिरावट आएगी।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा कि हज सब्सिडी की शुरुआत 1980 (जब आजाद एचसीआई के सदस्य थे) के दशक में हुई थी, जब हज यात्रियों को ढोने वाली जहाजें पुरानी होने लगी थीं।

आजाद ने कहा, “बजट की कमी के कारण सरकार ने नई जहाजों की खरीद पर पैसा नहीं खर्च किया था। इस लिए श्रद्धालुओं को जेद्दाह ले जाने के लिए उड़ानें शुरू करने का फैसला किया गया था। लेकिन हवाई सफर जहाज के किराए से चार गुना महंगा था। इसलिए सरकार ने उस लागत का वहन करने के लिए सब्सिडी का भुगतान करना शुरू किया था।”

समुद्री रास्ते को 1995 में बंद कर दिया गया था।

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मोदी विरोधी चेहरा के रूप में उभरीं ‘दीदी’

देश की सभी संस्थाओं पर हमले हो रहे हैं। यह एक खतरनाक खेल है। प्रधानमंत्री कालिदास की तरह व्यवहार कर रहे हैं, वह जिस शाखा पर बैठे हैं उसी को काटने की कोशिश कर रहे हैं।

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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, जिन्हें उनके समर्थक ‘दीदी’ कहते हैं, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) विरोधी अपनी लय को बरकरार रखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर साल भर हमलावर रहीं। उन्होंने अपने भाषणों व सोशल मीडिया पर लेखों व व्यंग्य के जरिए मोदी सरकार पर कड़े हमले किए और उनकी सरकार का केंद्र से कई मुद्दों पर संघर्ष जारी रहा।

पौराणिक कथाओं से लेकर प्राचीन भारतीय इतिहास तक तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी मोदी पर सभी तरह के हमलावर रहीं, जबकि पश्चिम बंगाल में भाजपा का वोट शेयर विभिन्न उपचुनावों व स्थानीय निकाय के चुनावों में बढ़ना जारी रहा।

भाजपा ने जिस तरह से तृणमूल के विकल्प के तौर पर उभरने का प्रयास किया, ममता ने इसके उलट राष्ट्रीय तौर पर खुद को हिंदुत्व समूह के प्रमुख विरोधी के तौर पर पेश किया।

ममता ने क्षेत्रीय नेताओं के साथ मिलकर संघ परिवार का विरोध किया और अपने फैसलों व कार्रवाई से केंद्र के कामकाज पर दबाव बनाया व अपना हित साधा।

उन्होंने मोदी की प्रमुख नीतियों जैसे नोटबंदी व वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को लेकर उन पर निशाना साधा, जबकि आर्थिक वृद्धि में गिरावट, अहिष्णुता, गोमांस प्रतिबंध व गोरक्षकों जैसे ज्वलंत मुद्दों से फायदा उठाने की कोशिश की।

हालांकि, वह मोदी पर जोरदार हमलों की वजह से सुर्खियों में रहीं।

ममता ने एक मौके पर मोदी की तुलना संस्कृत के महान कवि व नाटककार कालिदास से की थी। हालांकि उन्होंने तुलना उस कालिदास से की थी, जिसे कभी महान मूर्ख समझा जाता था। कहानी का संदर्भ यह था कि राजकुमारी विद्योत्तमा के लिए जब महामूर्ख की तलाश की जा रही थी तो देखा गया कि एक युवक बुद्धिमत्ता की कमी की वजह से जिस डाल पर बैठा था, उसी को काट रहा था। वह युवक कालिदास था, जो विद्योत्तमा के साथ विवाह के बाद बुद्धिमान बना।

ममता बनर्जी ने अपनी टिप्पणी में कहा, “देश की सभी संस्थाओं पर हमले हो रहे हैं। यह एक खतरनाक खेल है। प्रधानमंत्री कालिदास की तरह व्यवहार कर रहे हैं, वह जिस शाखा पर बैठे हैं उसी को काटने की कोशिश कर रहे हैं।”

ममता ने अपने एक अन्य आक्रामक भाषण में मोदी व रामायण महाकाव्य के दैत्य राजा रावण की तुलना की।

मोदी के 56 इंच के सीने की टिप्पणी का जिक्र करते हुए ममता ने कहा, “वह दावा करते हैं कि उनका सीना व कंधा चौड़ा है। रावण के कंधे भी चौड़े थे और उसके दस सिर थे।”

बंकुरा जिले में एक सार्वजनिक सभा में ममता बनर्जी ने मोदी पर फिर से हमला किया और मोदी सरकार को ‘गूंगा व बहरा’ बताया।

उन्होंने कहा, “वह पहले खुद को चायवाला कहते थे। अब वह करोड़पति पेटीएम वाला बन चुके हैं।”

ममता बनर्जी ने नोटबंदी को ‘शर्मनाक’ बताया और ट्विटर पर मोदी के इस फैसले को ‘एक तानाशाह की दृष्टिहीन, उद्देश्यहीन व दिशाहीन फैसला’ बताकर खारिज किया था।

ममता बनर्जी ने लोकतांत्रिक प्रदर्शन के हर तरीके को अपनाया। उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का दरवाजा भी खटखटाया था और उनसे देश की अव्यवस्था को बचाने का आग्रह किया था।

ममता ने मोदी से इतर भाजपा के दूसरे नेताओं- लालकृष्ण आडवाणी, राजनाथ सिंह व अरुण जेटली के नेतृत्व को स्वीकार करने की बात कही।

जीएसटी को समर्थन देते हुए ममता बनर्जी ने कहा कि मोदी सरकार ने इस नई प्रणाली को ‘विनाशकारी रूप से जल्दबाजी’ में एक जुलाई से लागू कर दिया। उन्होंने केंद्र के इस कदम को ‘एक अन्य बड़ी भूल’ बताया।

हालांकि, ममता बनर्जी ने ‘संयुक्त नेतृत्व’ के जरिए मोदी को चुनौती देने पर जोर दिया। लेकिन एक मीडिया कॉन्क्लेव में बीते महीने उन्होंने संकेत दिया कि वह 2019 में सभी विपक्षी दलों को भाजपा के खिलाफ एक मंच पर लाने में कोई भूमिका निभाने नहीं जा रही हैं, कोई ऐसा साझा मंच बनेगा तो उसका समर्थन जरूर करेंगी।

By : शीर्षेदु पंत

–आईएएनएस

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ज़रा सोचिए कि क्या भारत के 69 फ़ीसदी सेक्युलर ख़ुद को हरामी बताये जाने से ख़ुश होंगे!

हेगड़े, उस धूर्त भगवा रणनीति को हवा देना चाहते हैं, जिसके तहत कर्नाटक के मन्दबुद्धि और अशिक्षित हिन्दुओं में ये ज़हर भरा जा सके कि ‘तख़्त बदल देंगे, ताज बदल देंगे, कर्नाटक जीते तो संविधान बदल देंगे!’

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ये किसी से छिपा नहीं है कि संघियों को और ख़ासकर मोदी सरकार तथा बीजेपी के नेताओं को ‘बदज़ुबानी’ का कितना प्रचंड संक्रमण है! 2014 के बाद से तो इस भगवा संक्रमण ने दमघोटू महामारी का रूप ले लिया! इससे भी ज़्यादा ताज़्ज़ुब की बात तो ये रहा कि शीर्ष संवैधानिक पद पर बैठे हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ख़ुद इस ‘बदज़ुबानी’ वाली महामारी के सबसे गम्भीर मरीज़ हैं। इसीलिए मोदी की ज़ुबान आये दिन लपलपाती रहती है। उनके रोग का लक्षण चुनाव सभाओं में इतना उग्र रूप धारण कर लेता है कि उन्हें पहचानना तक मुश्किल हो जाता है। लेकिन अक्सर चुनाव के बाद मोदी की ‘बदज़ुबानी’ वाली महामारी का ज्वार कुछ अरसे के लिए शान्त भी पड़ने लगता है।

मोदी की एक और विशेषता है! उन्हें विरोधियों के बयान को तोड़-मरोड़कर पेश करने और अपने सहयोगियों के नितान्त मूर्खतापूर्ण बयान की अनदेखी करने में भी महारथ हासिल है। वैसे भी गिरगिट की तरह रंग बदलने में नेताओं की पूरी कूँ पूरी बिरादरी का ही कोई जबाब नहीं होता, लेकिन प्रधानमंत्री के पद पर आरूढ़ नरेन्द्र मोदी में जैसा गिरगिटिया कौशल है, वैसे बीते 70 सालों में पहले कभी किसी और प्रधानमंत्री में नहीं नज़र आया। मोदी की ये ऐसी अद्भुत पहचान है। इसका ज़िक्र उस दौर में भी होता रहेगा, जब मोदी कहीं के नहीं होंगे! दरअसल, इतिहास ने हमेशा प्रमुख हस्तियों को उनके ऐसे कामों के लिए याद रखा है, जिसने जनमानस पर अच्छी या ख़राब, लेकिन गहरी छाप छोड़ी हो। इस लिहाज़ से मोदी काल को इतिहास, ‘बदज़ुबानी युग’ के रूप में ही याद रखेगा, क्योंकि नीयतख़ोर नेताओं को ये संसार उनके कुकर्मों के लिए ही याद रखता है।

गुजरात के चुनाव में नरेन्द्र मोदी ने मनमोहन सिंह और अन्य काँग्रेसियों को पाकिस्तान परस्त राष्ट्रद्रोही या देश का दुःखचिन्तक करार दिया। मोदी ने यहाँ तक कहा कि काँग्रेस, गुजरात को जीतने के लिए और अहमद पटेल को मुख्यमंत्री बनाने के लिए सीमापार पाकिस्तान के साथ मिलकर साज़िश कर रही है।

इससे पहले मोदी ने मणिशंकर अय्यर के बयान को बड़ी चतुराई से तोड़-मरोड़कर पेश किया। ‘नीच’ आचरण, ‘नीच’ सोच, ‘नीच’ विचार, ‘नीच’ नज़रिया जैसी बातों को मोदी ने ‘नीच’ जाति में बदल दिया। इसीलिए जब मनमोहन सिंह और हामिद अंसारी जैसे शीर्ष संवैधानिक पदों पर रहे नेताओं के लिए अपमानजनक शब्दों के इस्तेमाल पर नरेन्द्र मोदी ने माफ़ी नहीं माँगी तो संसद के मौजूदा सत्र का पहिया जाम होने लगा।

संसद में अपनी छीछालेदर करवाने के बावजूद प्रधानमंत्री ने अपने मूर्खतापूर्ण बयान पर शर्मिन्दगी नहीं ज़ाहिर की, बल्कि अपनी पार्टी की ओर से सिर्फ़ ये बयान दिलाना मुनासिब समझा कि बीजेपी, मनमोहन सिंह और हामिद अंसारी के संसदीय योगदान का आदर करती है। हालाँकि, ये कहना अनावश्यक है कि मनमोहन सिंह के लिए ‘देहाती औरत’, ‘रेनकोट पहनकर नहाने वाला’, ‘मौन-मोहन’ वग़ैरह कैसी-कैसी बातें कह चुके नरेन्द्र मोदी के ज़ुबान की लपलपाहट यहीं ख़त्म नहीं होने वाली! इसीलिए मनमोहन सिंह को पाकिस्तान परस्त बताने के बाद तो काँग्रेस ने मोदी को ललकार दिया कि वो राष्ट्रविरोधियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं करके ख़ुद राष्ट्रविरोधी आचरण कर रही है। उधर, मोदी का भी कहना रहा है कि काँग्रेसियों ने उन्हें ख़ून का सौदागर, चायवाला, ‘नीच’ वगैरह क्या-क्या नहीं कहा!

कह तो मोदी भी सही रहे हैं। भारतीय राजनीति ने तमाम स्तरहीन बयान देखे हैं, कोई भी पार्टी इस ‘बदज़ुबानी’ वाली महामारी से अछूती नहीं है। लेकिन अनाप-शनाप बोलने वालों की जितनी तादाद बीजेपी में है और वो जितनी ज़हरीली बातें करते हैं, उसे देश की कोई भी अन्य पार्टी टक्कर नहीं दे सकती! लेकिन ‘मैं अच्छा और तुम ख़राब’ करते-करते अब तो मोदी सरकार के मंत्रियों ने उस संविधान की ही धज़्ज़ियाँ उड़ाना शुरू कर दिया, जिसकी शपथ लेकर वो मंत्री बने हैं। केन्द्रीय कौशल विकास राज्‍यमंत्री अनन्त कुमार हेगड़े ने तो यहाँ तक कह दिया कि बीजेपी संविधान से ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द को ही उखाड़ फेंकेगी।

दरअसल, अगला चुनाव कर्नाटक विधानसभा का है। हेगड़े, कर्नाटक से ही आते हैं। वहाँ बीजेपी को हिन्दुओं के उन्मादी ध्रुवीकरण से बहुत बड़ा आसरा है। इसीलिए हेगड़े ने उन लोगों के तन-बदन में आग लगाने की सोची, जो संघियों के हिन्दुत्व को हमेशा से सिरे से ख़ारिज़ करते रहे हैं। तभी तो हेगड़े ने कहा कि “अगर आप कहते हैं कि मैं एक मुस्लिम, ईसाई, लिंगायत, ब्राह्मण या हिन्दू हूँ तो ऐसे में हम अपने धर्म और जाति से जुड़े होने पर गर्व महसूस करते हैं। लेकिन ये सेक्युलर कौन लोग हैं? इनका कोई माई-बाप नहीं होता। जो लोग ख़ुद को सेक्युलर कहते हैं, वो नहीं जानते कि उनका ख़ून क्या है? हाँ, संविधान ये अधिकार देता है कि हम ख़ुद को धर्मनिरपेक्ष कहें, लेकिन संविधान में कई बार संशोधन हो चुके हैं। हम भी उसमें संशोधन करेंगे। हम सत्ता में इसीलिए आये हैं।”

हेगड़े, उस धूर्त भगवा रणनीति को हवा देना चाहते हैं, जिसके तहत कर्नाटक के मन्दबुद्धि और अशिक्षित हिन्दुओं में ये ज़हर भरा जा सके कि ‘तख़्त बदल देंगे, ताज बदल देंगे, कर्नाटक जीते तो संविधान बदल देंगे!’ वैसे तो संघियों का सेक्युलरों से बैर उतना ही पुराना है, जितना पुराना ख़ुद संघ है। लेकिन संविधान की शपथ लेकर मंत्री बनने वाले किसी भी धूर्त को संविधान का अनादर करके पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं हो सकता। ऐसे मंत्री को मूर्ख नहीं तो फिर और क्या कहेंगे जिसे इतना भी पता नहीं कि बीजेपी को चाहे जितना बड़ा बहुमत मिल जाए, वो तो क्या, कोई भी दूसरी पार्टी संविधान के मूल ढाँचे को चाहकर भी नहीं बदल सकती।

संविधान की प्रस्तावना में भारत को एक ‘धर्मनिरपेक्ष’ देश कहा गया है। सुप्रीम कोर्ट कई बार स्थापित कर चुका है कि ‘धर्मनिरपेक्षता’, भारतीय संविधान की बुनियादी अवधारणा है और कोई भी संशोधन, संविधान की मूल भावना को नहीं बदल सकता। इसीलिए जब संसद में विपक्ष ने हेगड़े को अपने बयान के लिए माफ़ी माँगने या फिर उन्हें मंत्री पद से हटाने की माँग गरमायी तो ‘संविधान बदलने के लिए सत्ता में आयी बीजेपी’ का ख़म ठोंकने वाले अनन्त हेगड़े को थूककर चाटना पड़ा। उन्होंने कथित सफ़ाई भी दी कि “मैं सिर्फ़ यह कहना चाहता हूँ कि मोदी जी और हमारी सरकार देश के संविधान और बाबा साहेब के आदर्शों को लेकर प्रतिबद्ध है।”

हेगड़े के बयान को लेकर सोशल मीडिया पर कोहराम मचना ही था। मचा भी। क्योंकि भारतवर्ष में आज भी बहुसंख्यक लोग सेक्युलर हैं। उन्हें सेक्युलर होने पर गर्व है। ये वो लोग नहीं हैं जो किसी राजनीतिक पार्टी के कार्यकर्ता हों। अब यदि मोदी सरकार का कोई मंत्री इन सेक्युलरों की वल्दियत पर सवाल उठाकर उन्हें हरामी बताना चाहेगा तो इसे कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है!

वैसे नेताओं की ‘बदज़ुबानी’ भी एक क्रमागत प्रक्रिया से ही विकसित होती है। याद है ना कि केन्द्रीय क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा था कि ‘मुसलमान भाजपा को वोट नहीं देते तो उन्हें टिकट क्यों दें!’ लेकिन इससे एक क़दम आगे बढ़कर मध्य प्रदेश के सहकारिता राज्यमंत्री विश्वास सारंग ने बोल दिया कि ‘भाजपा को वोट न देने वाला पाकिस्तानी है!’ अब ज़रा सोचिए कि सार्वजनिक जीवन में क़मीनेपन की क्या सीमा होनी चाहिए? क्या 2014 में बीजेपी को वोट नहीं देने वाले 69 फ़ीसदी लोग पाकिस्तानी हैं? फिर राष्ट्रीयता का सर्टिफ़िकेट जारी करने का अधिकार आख़िरकार संघियों को मिल कहाँ से गया?

सबसे बड़ा और विचारनीय प्रश्न यही है। भारत को बचाना है तो ऐसी मानसिकता को उखाड़ फेंकना होगा, जिसमें सेक्युलर लोगों को हरामी और बीजेपी को वोट नहीं देने वालों को पाकिस्तानी कहने वालों की ज़ुबान बन्द की जा सके! वर्ना, ‘बदज़ुबानी’ का सिलसिला थमने वाला नहीं है और यही प्रवृत्ति हमें व्यापक हिंसा और अराजकता की ओर ढकेले बिना नहीं मानेगी!

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और ये उनका निजी विचार है)

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