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स्वास्थ्य

यमन में गंभीर मानवीय जरूरतों का सामना कर रहे बच्चे: यूनिसेफ

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यूनिसेफ

यमन में पिछले तीन सालों से जारी युद्ध और दशकों से गंभीर रूप से बाधित विकास के परिणामस्वरूप 1.10 करोड़ बच्चे कुपोषण व बीमारी से ग्रस्त हैं। यूनिसेफ के मुताबिक वे गंभीर मानवीय जरूरतों का सामना कर रहे हैं। समाचार एजेंसी सिन्हुआ के मुताबिक, उत्तर अफ्रीका और मध्यपूर्व के लिए यूनिसेफ के क्षेत्रीय निदेशक, गीर्ट कैपेलेयर ने रविवार को कहा कि अकेले सिर्फ 2017 में यमन में कम से कम पांच बच्चे प्रतिदिन के हिसाब से मारे गए या गंभीर रूप से घायल हुए। हैजा और डिप्थीरिया के प्रकोप ने सैकड़ों जिंदगियां छीन ली हैं।

कैपेलेयर ने संवाददाताओं को बताया, “यमन के हालात पर अतिरिक्त ध्यान देने की जरूरत है। इसे सही तौर पर विश्व के सबसे खराब मानवीय संकट के रूप में देखा गया है।”

मध्यपूर्व में यमन सबसे गरीब देशों में से एक है। देश 2015 से गृहयुद्ध से जूझ रहा है। 2015 में लंबे समय से राष्ट्रपति रहे अली अब्दुल्ला सालेह को अपने उपराष्ट्रपति अब्द रब्बू मंसूर हादी को शांतिपूर्ण तरीके से सत्ता सौंपनी थी, लेकिन तभी देश में क्षेत्रीय संघर्ष शुरू हो गया।

कैपेलेयर ने कहा, “यह कहना सही होगा कि आज यमन में प्रत्येक लड़की और लड़का गंभीर मानवीय जरूरतों का सामना कर रहा है। युद्ध और विकास के अभाव ने बच्चों के लिए दुर्भाग्यवश कुछ अच्छा नहीं किया।”

अधिकारी ने कहा कि 2015 में दो लाख बच्चे गंभीर कुपोषण से जूझ रहे थे। यह विश्व में अबतक का सबसे बड़ा आंकड़ा है। कैपेलेयर के मुताबिक, तब से लेकर अबतक तीन सालों में यह संख्या दोगुनी हो गई है।

युद्ध ग्रस्त देश में खराब मानवीय हालात के बारे में बताते हुए कैपेलेयर ने कहा कि यमन के करीब 20 लाख बच्चे शिक्षा से वंचित हो चुके हैं। बड़ी संख्या में लड़कियों को कम उम्र में शादी के लिए मजबूर किया गया, जिसमें से 75 फीसदी 18 से कम उम्र की थीं और 15 साल से बड़ी थीं।

–आईएएनएस

स्वास्थ्य

नींद की समस्या देती है मल्टीपल स्क्लेरोसिस का संकेत

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sleeping-wefornews
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एक अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पाया है कि मल्टीपल स्क्लेरोसिस (एमएस) की पहचान करीब पांच साल पहले की जा सकती है क्योंकि इसके मरीजों में तंत्रिका तंत्र विकार जैसे दर्द या नींद की समस्या के इलाज से गुजरने की संभावना ज्यादा होती है।

शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र में माइलिन पर हमला होने से एमएस की दिक्कते पैदा होती है। माइलिन, वसीय पदार्थ है जो इलेक्ट्रिकल संकेतों के तेज संचरण को सक्षम बनाता है। माइलिन पर हमले से दिमाग व शरीर के दूसरे हिस्सों में संचार में बाधा पहुंचती है।

इससे दृष्टि संबंधी समस्याएं, मांसपेशियों में कमजोरी, संतुलन व समन्वय में परेशानी होती है। कनाडा में ब्रिटिश कोलंबिया विश्वविद्यालय की न्यूरोलॉजी विभाग की प्रमुख शोधकर्ता हेलेन ट्रेमलेट ने कहा, “इस तरह के चेतावनी वाले संकेतकों की मौजूदगी को अल्जाइमर बीमारी व पर्किं सन्स रोग के लिए अच्छी तरह से स्वीकार किया जाता है, लेकिन इस तरह के एमएस के पैटर्न के लिए खोज कम हुई है।”

ट्रेमलेट ने कहा, हमें इस घटना की गहराई में जाने के लिए शायद डाटा माइनिंग तकनीक के इस्तेमाल से गुजरने की जरूरत है। हम देखना चाहते हैं कि क्या लिंग, आयु व एमएस के विकसित होने के पैटर्न प्रत्यक्ष तौर पर जुड़े हैं।”

–आईएएनएस

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स्वास्थ्य

बचपन के संक्रमण से अकादमिक प्रदर्शन हो सकता है प्रभावित

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 बचपन के दौरान गंभीर संक्रमण से, जिससे अस्पताल में भर्ती होना पड़ा हो, किशोरावस्था में अकादमिक प्रदर्शन पर असर पड़ सकता है। इस शोध का प्रकाशन ‘द पेडियाट्रिक इंफेक्शस डिजीज जर्नल’ में किया गया है।

इसमें कहा गया है कि संक्रमण की वजह से ज्यादा बार अस्पताल में भर्ती होने से नौवीं कक्षा को पूरा करने की संभावना कम होती है, साथ ही साथ इम्तिहान में कम अंक आने की संभावना रहती है।

अध्ययन के सह लेखक डेनमार्क के आरहुस विश्वविद्यालय अस्पताल के कोहलर-फोसबर्ग ने कहा, “हमारे निष्कर्ष खास तौर से बचपन के दौरान गंभीर संक्रमण व किशोरावस्था के ज्ञान संबंधी उपलब्धि के जुड़े होने के संदर्भ में हमारी समझ को विस्तार देते हैं।”

इस शोध के लिए शोधकर्ताओं ने डेनमार्क में 1987 से 1997 के बीच जन्मे 598,553 बच्चों के डाटा को शामिल किया।

–आईएएनएस

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स्वास्थ्य

गरीबों का मुफ्त इलाज निजी अस्पतालों की मंशा नहीं

निजी अस्पतालों में चिकित्सकों की चालाकी, जैसे कोई मरीज अस्पताल में इलाज के लिए पहुंचा और उसे आईसीयू की जरूरत नहीं है, लेकिन चिकित्सक उसे आईसीयू की जरूरत बताकर, अपने बेड की संख्या को फुल बताकर उसे भर्ती करने से मना कर देते हैं।

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Private Hospital Free Treatment

नई दिल्ली, 17 जुलाई | सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में राष्ट्रीय राजधानी में रियायती दर पर मिली जमीन पर बने निजी अस्पतालों को रोगी विभाग (आईपीडी) में 10 फीसदी और बाह्य रोगी विभाग (ओपीडी) में 25 फीसदी गरीबों का मुफ्त इलाज करने का आदेश दिया है, लेकिन निजी अस्पतालों पर इस आदेश का कितना असर होगा, यह कहना मुश्किल है।

अधिवक्ता अशोक अग्रवाल का कहना है कि निजी अस्पतालों की मंशा ही नहीं है कि वे गरीबों का इलाज मुफ्त करें। वे तो इस फिराक में रहते हैं कि कैसे इसे नजरअंदाज किया जा सके।

निजी अस्पतालों के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय और दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल करने वाले सोशल ज्यूरिस्ट अग्रवाल ने आईएएनएस को बताया, “रियायती दर पर मिली जमीन पर बने निजी अस्पतालों को गरीबों को मुफ्त इलाज मुहैया कराना एक महत्वपूर्ण शर्त है। निजी अस्पतालों की मंशा ही नहीं है कि वे गरीबों का इलाज मुफ्त में करें। वे यह देखते हैं कि कैसे इसको नजरअंदाज किया जा सके। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद गरीब मरीजों को इन अस्पतालों ने भर्ती करने से मना कर दिया। उन्हें लगता है कि सरकार की ओर से उन पर कोई कार्रवाई नहीं होगी, जिस कारण वे ऐसा करते हैं।”

उन्होंने बताया, “ऐसे मामलों में सरकार का रुख नरम रहता है। दिल्ली में अस्पतालों को मिली जमीन केंद्र सरकार और डीडीए के अधीन है। अगर वह इस पर सख्त कदम उठाए और उनके लाइसेंस रद्द करने की कार्रवाई शुरू करे तो यह एक उदाहरण के तौर पर सामने आएगा। लेकिन बात उस स्तर तक पहुंचती ही नहीं। अगर सरकार सख्त बर्ताव करे, तभी इस समस्या का हल निकलेगा।”

उन्होंने कहा कि दरअसल हमारी मॉनिटरिंग प्रणाली दबाव नहीं बना पा रही है। मॉनिटरिंग केमटी फिलहाल काम तो कर रही है, लेकिन इसमें अभी भी सुधार की जरूरत है। वर्तमान में दो कमेटियां चल रही हैं- पहली उच्च न्यायालय की मॉनिटरिंग कमेटी और दूसरी दिल्ली सरकार की मॉनिटरिंग कमेटी और इससे जुड़े सरकारी अस्पतालों का यह कर्तव्य की वे मरीज को मुफ्त इलाज दिलाएं।

अशोक अग्रवाल ने कहा, “निजी अस्पतालों में चिकित्सकों की चालाकी, जैसे कोई मरीज अस्पताल में इलाज के लिए पहुंचा और उसे आईसीयू की जरूरत नहीं है, लेकिन चिकित्सक उसे आईसीयू की जरूरत बताकर, अपने बेड की संख्या को फुल बताकर उसे भर्ती करने से मना कर देते हैं। इसे बदलने के लिए सरकारी चिकित्सकों को हस्तक्षेप करने की जरूरत है, लेकिन वह अपने काम के चलते ऐसा नहीं कर पाते, क्योंकि सरकारी अस्पतालों में ही इतने मरीज हैं कि वे इसके लिए टाइम हां से निकालें।”

उन्होंने कहा, “अगर सरकारी चिकित्सकों का हस्तक्षेप प्रभावी हो जाए तो एक भी निजी अस्पताल मरीज को भर्ती करने से मना नहीं कर पाएगा। सरकारी चिकित्सक इसमें ज्यादा हस्तक्षेप करे, यह ज्यादा महत्वपूर्ण है। सरकारी अस्पताल मरीज को रेफर करें और अगर मरीज खुद ही किसी निजी अस्पताल में जाए तो यह उस अस्पताल की ड्यूटी है कि वह लिंक्ड अस्पताल को सूचित करें और उसके बाद सरकारी अस्पताल उसको देखे और जांच करे कि कहीं मरीज के इलाज में कोई भेदभाव तो नहीं हो रहा, यह हस्तक्षेप अगर मजबूत होगा तो इसमें और अधिक सुधार हो सकता है।”

गरीब मरीजों को मुफ्त इलाज के लिए जरूरी दस्तावेजों के सवाल पर पर अशोक अग्रवाल ने कहा, “वह अपना बीपीएल कार्ड, खाद्य सुरक्षा कार्ड दिखाकर इस सुविधा का लाभ ले सकते हैं। दिल्ली में अगर किसी मजदूर परिवार की मासिक आय 13,896 रुपये या इससे कम है तो वह दिल्ली के निजी अस्पतालों में मुफ्त इलाज के लिए पात्र है। साथ ही विदेशी शरणार्थी जैसे अफगान और पाकिस्तानी-हिंदू शरणार्थी भी इस योजना के लिए पात्र हैं।”

उन्होंने कहा, “गर गरीब मरीज चाहें तो निजी अस्पताल जाकर वहां से एक घोषणा-फार्म भरकर, अपनी पारिवारिक आय दिखाकर मुफ्त इलाज करा सकते हैं। हां, अगर कोई व्यक्ति गलत घोषणा करता है तो उसे अदालत की अवमानना माना जाएगा। सभी सरकारी अस्पतालों में मॉनिटरिंग कमेटी का बोर्ड लगा है, जिसे देखकर मरीज कमेटी से अपनी शिकायत कर सकते हैं।”

अदालत के आदेश की अवमानना पर निजी अस्पतालों पर कार्रवाई के सवाल पर उन्होंने कहा, “अगर कोई अस्पताल अदालते के आदेश को मानने से मना करता है तो सबसे पहला उसका प्रबंधन सरकार के हाथ में चला जाएगा, जमीन के मालिकाना हक वाली एजेंसी उसका पट्टा रद्द कर उसे वहां से बेदखल कर सकती है और अंत में वह अदालत के आदेश की अवमानना भी है।”

लोगों में जागरूकता की कमी के सवाल पर उन्होंने आईएएनएस को बताया, “दूर दराज के गांवों में लोग मुंह से कही बात पर विश्वास करते हैं, जब एक व्यक्ति यहां से मुफ्त इलाज कराकर वापस गांव जाएगा और दूसरों को बताएगा तो उसका प्रभाव पड़ेगा, हालांकि अभी भी गांव और दूर दराज के इलाकों में जागरूकता की कमी है। एक तो लोगों का अपने स्वास्थ्य और शिक्षा को लेकर जागरूक नहीं है, जिस कारण ये चीजें सामने आती हैं।”

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष और प्रख्यात चिकित्सक डॉ. के.के. अग्रवाल ने आईएएनएस से कहा, “हां, यह तो बिल्कुल सही है, जिस अस्पताल को मुफ्त में जमीन मिली है उसे गरीबों का मुफ्त इलाज करना ही होगा और अगर वे अब भी नहीं करते हैं तो उन्हें जेल जाना होगा।”

उन्होंने कहा, “पहले इनके पट्टे में बचाव के रास्ते थे, जिनको अदालत ने इन्हें निकाल दिया। दरअसल पहले इनके समझौते में यह जिक्र नहीं था कि मरीज को क्या क्या मुफ्त देना है, इसमें खाना, दवाई और इलाज के बारे में असमंजस था, इसी के चलते 20 से 25 साल लग गए और इतना वक्त खराब हो गया।”

अधिवक्ता अशोक अग्रवाल ने कहा, “दिल्ली में फिलहाल 57 अस्पताल सरकारी जमीनों पर बने हैं और 16 का निर्माण बाकी है, सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद गरीबों को इसमें 1000 बेड और मिलेंगे।”

–आईएएनएस

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