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स्वास्थ्य

बचपन के संक्रमण से अकादमिक प्रदर्शन हो सकता है प्रभावित

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 बचपन के दौरान गंभीर संक्रमण से, जिससे अस्पताल में भर्ती होना पड़ा हो, किशोरावस्था में अकादमिक प्रदर्शन पर असर पड़ सकता है। इस शोध का प्रकाशन ‘द पेडियाट्रिक इंफेक्शस डिजीज जर्नल’ में किया गया है।

इसमें कहा गया है कि संक्रमण की वजह से ज्यादा बार अस्पताल में भर्ती होने से नौवीं कक्षा को पूरा करने की संभावना कम होती है, साथ ही साथ इम्तिहान में कम अंक आने की संभावना रहती है।

अध्ययन के सह लेखक डेनमार्क के आरहुस विश्वविद्यालय अस्पताल के कोहलर-फोसबर्ग ने कहा, “हमारे निष्कर्ष खास तौर से बचपन के दौरान गंभीर संक्रमण व किशोरावस्था के ज्ञान संबंधी उपलब्धि के जुड़े होने के संदर्भ में हमारी समझ को विस्तार देते हैं।”

इस शोध के लिए शोधकर्ताओं ने डेनमार्क में 1987 से 1997 के बीच जन्मे 598,553 बच्चों के डाटा को शामिल किया।

–आईएएनएस

स्वास्थ्य

जयपुर में जीका वायरस के 50 मामले आये सामने

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zika virus
प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर

राजस्थान के जयपुर में अब तक जीका वायरस की जांच में 50 लोगों को पॉजिटिव पाया गया है। खबर के मुताबिक जयपुर के शास्त्री नगर इलाके में कम से कम 10 लोग जीका वायरस की चपेट में बताए गए हैं। राजस्‍थान में जीका वायरस का पहला मामला 22 सितंबर को सामने आया था।

राजस्‍थान स्‍वास्‍थ्‍य विभाग के एक अधिकारी ने कहा था कि कुल 30 मामलों में इलाज के बाद मरीजों की तबीयत ठीक है।

बिगड़ते हालात के मद्देनजर जयपुर में निगरानी टीमों की संख्या 50 से बढ़ाकर 170 कर दी गई है और हीरा बाग इलाज केंद्र में एक विशेष वॉर्ड बनाया गया है, जहां जीका वायरस से प्रभावित मरीजों को अलग रखकर इलाज किया जा सके।

एडिज एजेप्टी मच्छर के जरिए फैलने वाले जीका वायरस की चपेट में आने पर व्यक्ति को बुखार होता है, त्वचा पर दाग हो जाते हैं, कंजक्टिवाइटिस यानी आंखों में संक्रमण हो जाता है, मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द होता है।

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स्वास्थ्य

आर्थराइटिस की रोकथाम के लिए चलना-फिरना जरूरी

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Arthritis -
प्रतीकात्मक तस्वीर

आर्थराइटिस से जोड़ों में सूजन आ जाती है, जिससे मरीज को चलने-फिरने में परेशानी होती है।

आज के शहरी लोग बिल्कुल गतिहीन हो गए हैं, जिसका बुरा असर उनके मांस और हड्डियों की ताकत पर पड़ता है। आज ऑर्थराइटिस (खासतौर पर घुटनों का ऑर्थराइटिस) महामारी का रूप ले रहा है। उम्र के साथ होने वाला ऑर्थराइटिस ऑस्टियोऑर्थराइटिस कहलाता है।

भारत में ऑस्टियोऑर्थराइटिस आमतौर पर 55-60 की उम्र में होता है, लेकिन आज कम उम्र में भी लोग ऑर्थरिटिस और अपंगता का शिकार बन रहे हैं। नोएडा स्थित जेपी हॉस्पिटल के डिपार्टमेंट ऑफ आथ्रोपेडिक्स एंड जॉइंट रिप्लेसमेंट के एसोसिएट निदेशक डॉक्टर गौरव राठोर का कहना है कि अक्सर लोग ऑस्टियोपोरोसिस और ऑस्टियोऑर्थराइटिस को एक ही समझ लेते हैं।

ऑस्टियोऑर्थराइटिस में जोड़ों में डीजनरेशन होने लगता है, वहीं ऑस्टियोपोरोसस में हड्डियों में मांस कम होने लगता है और हड्डियां टूटने या फ्रैक्च र होने की संभावना बढ़ जाती है। ऑस्टियोपोरोसिस को मूक रोग कहा जा सकता है क्योंकि अक्सर सालों तक मरीज को इसका पता ही नहीं चलता, जब हड्डियां टूटने लगती हैं, तब इस बीमारी का पता चल पाता है। ऑस्टियोपोरोसिस में मरीज को दर्द नहीं होता, लेकिन दर्द तभी होता है जब फ्रैक्च र हो जाता है।

डॉ. राठोर ने कहा कि आर्थराइटिस का सबसे आम प्रकार है ऑस्टियोआर्थराइटिस: इसका असर जोड़ों, विशेष रूप से कूल्हे, घुटने, गर्दन, पीठ के नीचले हिस्से, हाथों और पैरों पर पड़ता है। ऑस्टियोआर्थराइटिस आमतौर पर कार्टिलेज जॉइन्ट में होता है।

कार्टिलेज हड्डियों की सतह पर मौजूद सॉफ्ट टिश्यू है, जो ऑर्थराइटिस के कारण पतला और खुरदरा होने लगता है। इससे हड्डियों के सिरे पर मौजूद कुशन कम होने लगते हैं और हड्डियां एक दूसरे से रगड़ खाने लगती हैं। ऑर्थराइटिस के लक्षण इसके प्रकार पर निर्भर करते हैं।

इसमें दर्द, अकड़न, ऐंठन, सूजन, हिलने-डुलने या चलने-फिरने में परेशानी होने लगती है। उनके अनुसार, ऑर्थराइटिस का मुख्य कारण जीवनशैली से जुड़ा है। भारतीय आबादी में खान-पान के तरीके भी इस बीमारी का कारण बन चुके हैं। शहरी लोग आजकल कम चलते-फिरते हैं, जिससे उनकी शारीरिक एक्टिविटी का स्तर कम हो गया है।

महिलाएं कई कारणों से ऑर्थराइटिस का शिकार हो रही हैं, जैसे चलने-फिरने में कमी, जिसके कारण मसल कम होना आजकल आम हो गया है। डॉ. गौरव ने कहा कि ऑर्थराइटिस से अक्सर सबसे ज्यादा असर घुटनों, कूल्हों के जोड़ों पर पड़ता है। लगातार बैठे रहने के कारण से मांसपेशियां निष्क्रिय और कमजोर होने लगती हैं।

पेशियों के कमजोर होने से आर्थराइटिस का दर्द बढ़ जाता है और मांसपेशियां खराब होने लगती हैं। उन्होंने कहा कि शारीरिक एक्टिविटी कम होने के कारण मोटापा भी बढ़ता है, जो ऑर्थराइटिस के मुख्य कारणों में से एक है। ऑर्थराइटिस का असर मरीज के चलने-फिरने की क्षमता, रोजमर्रा के कामों पर पड़ता है।

मरीज रोजाना के कामों में मुश्किल महसूस करने लगता है। समय के साथ कम चलने के कारण उसके कार्डियो-वैस्कुलर स्वास्थ्य पर असर पड़ने लगता है और डायबिटीज की संभावना भी बढ़ जाती है। उनके अनुसार, ऑर्थराइटिस एजिंग यानी उम्र बढ़ने का एक हिस्सा है, लेकिन सही जीवनशैली के द्वारा इसकी संभावना को कम किया जा सकता है और ऑर्थराइटिस के कारण होने वाली अपंगता से बचा जा सकता है।

अच्छी जीवनशैली की शुरुआत बचपन से ही होती है। शुरूआती अवस्था में सक्रिय जीवन का अच्छा असर बाद के जीवन पर पड़ता है। अच्छे आहार और नियमित व्यायाम के द्वारा हड्डियों और मांसपेशियों को मजबूत बनाए रखा जा सकता है।

डॉ. राठोर के अनुसार, ऑर्थराइटिस से बचने का सबसे अच्छा तरीका है अपने वजन पर नियन्त्रण रखें। इसके लिए आहार में कार्बोहाइड्रेड का सेवन सीमित मात्रा में करें, ट्रांस-फैट के सेवन से बचें। ध्यान रखें कि आपके आहार में प्रोटीन की मात्रा भी सामान्य हो। आजकल लोग उम्र के 50वें दर्शक में जोड़ों की समस्या के शिकार होने लगते हैं।

मोटापा और मांसपेशियों की कमजोरी बीमारी को और बढ़ाते हैं। इसके लिए नियमित रूप से व्यायाम करें, ताकि जोड़ों का लचीलापन और गतिशीलता बनी रहे। आर्थराइटिस की शुरुआत में ही अगर व्यायाम शुरू कर दिया जाए तो घुटनों को खराब होने से बचाया जा सकता है। आप शारीरिक व्यायाम की मात्रा बढ़ाकर अपनी सेहत में सुधार ला सकते हैं। अच्छा मानसिक स्वास्थ्य भी बहुत जरूरी है।

— आईएएनएस

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स्वास्थ्य

रेटिना आंख की रील है…

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Eye-
फोटो-ट्विटर

जैसे कैमरा में लेंस तस्वीर लेता है, लेकिन अंतिम दृश्य कैमरा की रील में बनता है। इसी तरह, रेटिना आंख की रील है, जहां कॉर्निया (आंख के आगे का भाग) तस्वीर लेता है, लेकिन अंतिम ²श्य रेटिना (आंख के पीछे का भाग) में बनता है।

यह कहना है बॉम्बे हॉस्पिटल में ऑफ्थैल्मोलॉजिस्ट डॉ. अजय आई. दुदानी का। ‘वर्ल्ड रेटिना डे’ पर  उन्होंने कहा कि कॉर्निया से संबंधित रोगों, जैसे कैटेरेक्ट का पता आसानी से चल जाता है, लेकिन रेटिना के रोगों, जैसे एज-रिलेटेड मैक्युलर डीजनरेशन (एएमडी) और डायबेटिक मैक्युलर एडीमा (डीएमई) को पहचानना कठिन होता है।

डॉ. दुदानी ने कहा कि रेटिना के विभिन्न रोगों में से एएमडी और डीएमई ऐसे रोग हैं, जिनमें दिखाई देना बंद हो जाता है। एएमडी और डीएमई का प्रभावी प्रबंधन किया जा सकता है, यदि रोगी की समय पर जाँच हो। इसलिये, इन रोगों से जुड़े लक्षणों को समझना महत्वपूर्ण है, ताकि प्रारंभिक अवस्था में ही इनका पता चल सके।

उन्होंने कहा, “एक माह में आने वाले रोगियों में से लगभग 30 प्रतिशत को एज-रिलेटेड मैक्युलर डीजनरेशन (एएमडी) होता है, जबकि लगभग 40 प्रतिशत को डायबेटिक मैक्युलर एडीमा (डीएमई)। रेटिना के 50 प्रतिशत रोगियों में रोग की अवस्था एडवांस्ड होती है।”

व्रिटीयो रेटिना सोसायटी ऑफ इंडिया (वीआरएसआई) के सचिव और एल.वी. प्रसाद आई इंस्टीट्यूट, हैदराबाद में क्लीनिकल रिसर्च के प्रमुख डॉ. राजा नारायणन ने कहा, “वर्ष 2020 तक भारत में ²ष्टिहीनों की संख्या 15 मिलियन हो जाएगी।

रेटिना के रोग, जैस एज-रिलेटेड मैक्युलर डीजनरेशन और डायबेटिक मैक्युलर एडीमा ऐसी स्थितियां हैं, जिनका प्रभावी प्रबंधन किया जा सकता है, यदि समय पर जांच हो। इसलिए, लक्षण उभरने पर विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए। समय पर जांच होने से रोग का बढ़ना धीमा हो सकता है।”

उन्होंने कहा कि रोगियों को रेटिना रोगों के प्रारंभिक संकेतों और लक्षणों के प्रति सचेत रहना चाहिए। अधिकांशत: एएमडी के लक्षणों का कारण बड़ी आयु को समझा जाता है। मधुमेह रोगियों को प्रति छह माह में नेत्र रोग विशेषज्ञ/रेटिना रोग विशेषज्ञ के पास जाने की सलाह दी जाती है, क्योंकि उन्हें डायबेटिक रेटिनोपैथी होने का जोखिम अधिक होता है। एएमडी और डीएमई का शीघ्र पता लगने से अंधेपन की रोकथाम की संभावना बढ़ जाती है।

–आईएएनएस

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