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सदी की सबसे बड़ी ब्रेकिंग न्यूज़: क्रोधित गंगा पहुँचीं शिव के पास!

सदी इस सबसे बड़ी ब्रेकिंग न्यूज़ की जानकारी संघ-बीजेपी के पास भी पहुँच चुकी है। वहाँ खलबली मच गयी है। अपने गिनती के बचे दिनों को देखकर बीजेपी के सभी दिग्गज अलग-अलग तरह से लूट-पाट के लिए जुगत भिड़ाने में जुट गये हैं।

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Cartoon on Politician
Pictured Credit : BBC

[व्यंग्य: विश्व के सर्वप्रथम पत्रकार देवर्षि नारद की ज़ुबानी]

अभी-अभी देवाधिदेव शिव के दरबार में पृथ्वी लोक से गंगा मैया का आगमन हुआ है! वो फूट-फूटकर रो रही हैं! देवी गंगा को इस हाल में देख शिव और पार्वती ज़बरदस्त ढंग से आश्चर्यचकित हैं! शिव ने बड़ी मुश्किल से गंगा को ढाढ़स बँधाया और उनसे अपनी व्यथा बताने को कहा।

गंगा ने कहा, “मैं अब भारतवर्ष में नहीं रहना चाहतीं! अभी तक अपार प्रदूषण झेलते हुए भी मैं इसलिए अपने कर्त्तव्य-पथ पर डटी रहती थीं क्योंकि करोड़ों लोगों की मुझमें ये आस्था थी कि गंगा-स्नान से उनके सारे पाप धुल जाते हैं और कर्मों के बही-खाते में सिर्फ़ और सिर्फ़ पुण्यों का ही बोलबाला रहता है! लेकिन अब ऐसा नहीं रहा!”

शिव बोले, “अरे, तो अब अचानक क्या हो गया तो तुम ऐसे फूट पड़ीं…!”

गंगा बताने लगीं कि “अब तो बीजेपी ही अपने आप में एक ऐसे पवित्र जल कुंड में परिवर्तित हो चुकी है जिसमें स्नान करके बड़े से बड़े पापी, भ्रष्टाचारी, दुराचारी, अनाचारी, राष्ट्रद्रोही, ज़ारकर्मी, तस्कर, घोटालेबाज़, बलात्कारी, पाकिस्तान के दलाल वग़ैरह अचानक पवित्र, पूज्यनीय और आदरणीय हो जाते हैं! लिहाज़ा, अब भारत में मेरी कोई उपयोगिता बची नहीं! इसलिए मैं वहाँ अब एक पल भी नहीं रहना चाहती! इतना ही नहीं, बीजेपी और यहाँ तक कि ख़ुद प्रधानमंत्री ने मेरी साफ़-सफ़ाई करवाने की ख़ूब क़समें खायीं। यहाँ तक कि उसने तो मेरे अवैध पुत्र होने तक का दावा कर दिया! इसके बावजूद मेरी सेहत में रत्ती भर भी सुधार नहीं आया! और, अब तो वो आस्था भी मिट गयी कि गंगा नहाने से सारे पाप धुल जाएँगे। ऐसे में साफ़ है कि सारी इज़्ज़त-प्रतिष्ठा को गँवाकर मैं अब एक पल भी भारत में नहीं रहना चाहती! मुझे वापस स्वर्ग में लौटना है! बस, आप सिर्फ़ इसका इन्तज़ाम करवा दीजिए…!”

शिव ने कहा, “अरे, एक नरेश अग्रवाल के बीजेपी में पहुँचकर साफ़-सुथरा करार दिये जाने से तुम इतना टूट गयीं। अरे, तुमने से सदियों से न जाने कैसे-कैसे लोगों को झेला है!”

गंगा कहने लगीं, “आप ठीक कहते हैं, प्रभु। लेकिन पहले इक्का-दुक्का लोग ही मुझसे जुड़ी आस्था के साथ खिलवाड़ करते थे। उसे मैं किसी तरह बर्दाश्त कर लेती थी। लेकिन अब तो हद्द ही हो गयी है। अब तो सुबह का पापी अगर शाम तक बीजेपी में शामिल हो जाये तो मोदी भक्त उसे पापी नहीं, बल्कि पापा कहने लगते हैं। ऐसा घोर अनर्थ देखकर अब मेरा सब्र ज़बाब दे चुका है।”

ये सुनकर शिव विचारमग्न हो गये। फिर बोले, “अच्छा, गंगा ये बताओ कि उस जन्मजात दलबदलू नरेश अग्रवाल के अलावा तुम्हें और किसकी-किसकी करतूतों ने आहत किया?”

गंगा ने जबाब दिया, “प्रभु, कितने ही नाम हैं! जिन्हें कल तक बीजेपी अव्वल दर्ज़े का बेईमान और भ्रष्ट बताती थी, उन्होंने जब बीजेपी में जाने का फ़ैसला तो पार्टी ने अपने जल-कुंड में स्नान करवा उन्हें पवित्र हो जाने का सर्टिफ़िकेट दे दिया। नाम तो सैकड़ों में हैं, लेकिन फ़िलहाल मुझे नारायण राणे, एस एम कृष्णा, नारायण दत्त तिवारी, विजय और रीता बहुगुणा, जगदम्बिका पाल, ब्रजेश पाठक, स्वामी प्रसाद मौर्य, नीतीश कुमार, हेमन्त बिस्व शर्मा, जीतन राम माँझी जैसों के नाम याद आ रहे हैं। अरे प्रभु, पापियों को बीजेपी के जल-कुंड में स्नान करवाकर पवित्र बनाने की जुगत के ज़रिये बीजेपी ने कई राज्यों में पूरी की पूरी पार्टी को ही ख़रीदकर उसे पवित्र बना डाला!”

अब शिव आँख बन्द करके सोचने लगे। फिर बोले, “तुम्हारी बात में तो दम है, गंगा। मैं भी देख रहा हूँ कि बीजेपी के माई-बाप यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारत में मूर्तियाँ तोड़ने वालों और उसे सही ठहराने वालों की जमात खड़ी कर ली है। ये भारत के हिन्दू-तालिबान हैं। गाँधी के हत्यारों का ऐसा रूप तो होना ही था। भारत में तो अब ये कहने वाले भी पैदा हो गये हैं कि सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला मस्जिद के पक्ष में आया तो वहाँ सीरिया जैसे हालात हो जाएँगे! सचमुच, यदि ऐसा हो गया तो तुम भारत में कैसे रह पाओगी?”

शिव के मुँह से अपने प्रति हमदर्दी के स्वर सुनकर गंगा ने कहा, “अरे महाराज, आलम ये है कि किसी भी ख़ुद को मेरी अवैध सन्तान बताने वाला नरेन्द्र मोदी कहीं ये बोलता भी दिख सकता है कि ‘भाईयों-बहनों, श्रीश्री की चेतावनी के बाद भारत में संविधान की कोई अब कोई ज़रूरत नहीं रही, क्योंकि यदि किसी को संविधान, क़ानून, अदालत जैसी लोकतांत्रिक संस्थाओं की परवाह ही नहीं रहेगी, तो जैसा हिन्दुत्ववादी समाज बनेगा, उसमें हरेक पाप को करने वाले के लिए सिर्फ़ बीजेपी में होने की शर्त ही पर्याप्त होगी। कोई बीजेपी वालों पर तोहमत नहीं लगा पाएगा! सभी मानकर चलेंगे कि बीजेपी का मतलब है गंगा जैसी पवित्रता! ऐसे में मैं वहाँ कैसे रह पाऊँगी? अब तो सिर्फ़ यही दिन देखना बाक़ी रह गया है कि कल तक नरेश अग्रवाल को पाकिस्तान-परस्त बताने वाले भगवा नेताओं की ओर से ये बयान भी आ जाए कि नीरव मोदी, मेहुल चोकसी, विजय माल्या और ललित मोदी भी यदि भारत लौट आए तो उन्हें बीजेपी के जल-कुंड में स्नान करवाकर नरेन्द्र मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री बना दिया जाएगा! यही नहीं, यदि दाऊद इब्राहिम, हाफ़िज़ सईद और मणिशंकर अय्यर जैसे लोग भी बीजेपी में जाकर भारत माता की सेवा की पेशकश करने लगे तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए!”

इस पर शिव ने कहा, “देखो गंगा, ये जो कुछ हो रहा है उसके बारे में कहावत है कि ‘ज्ञानी से ज्ञानी मिले, मिले नीच से नीच, पानी से पानी मिले, मिले कीच से कीच!’ फ़िलहाल, भारत को पतन का ऐसा नज़ारा झेलना होगा। यक़ीनन, 2019 तक जनता की आँखें खुल जाएँगी। तब तक उसे अच्छी तरह से समझ में आ जाएगा कि गंगा-स्नान का विकल्प बीजेपी के जल-कुंड में डूबकी लगाना कभी नहीं हो सकता। कीचड़ से भरे घड़े पर दूध की मलाई डाल देने से उसका स्वभाव नहीं बदल जाता! इसीलिए, मेरा आग्रह है कि तुम थोड़ा सा और बर्दाश्त करो। 2019 तक यदि जनता ने बीजेपी के होश ठिकाने नहीं लगाये तो तुम मैं वचन देता हूँ कि तुम्हें भारत से बुला लिया जाएगा!”

इतना सुनकर व्यथित गंगा वापस पृथ्वी को लौट गयीं और 2019 का इन्तज़ार करने लगीं।

[नोट: सदी इस सबसे बड़ी ब्रेकिंग न्यूज़ की जानकारी संघ-बीजेपी के पास भी पहुँच चुकी है। वहाँ खलबली मच गयी है। अपने गिनती के बचे दिनों को देखकर बीजेपी के सभी दिग्गज अलग-अलग तरह से लूट-पाट के लिए जुगत भिड़ाने में जुट गये हैं। अमित शाह सभी नेताओं को तरह-तरह का मशविरा बाँट रहे हैं।]

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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हिंदी ब्लॉग्स को हर महीने 3 करोड़ पेज व्यू : मॉमस्प्रेसो

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Hindi Blog

नई दिल्ली, 14 सितम्बर | भारत के महिलाओं के लिए सबसे बड़े यूजर-जनरेटेड कंटेंट प्लेटफार्म मॉमस्प्रेसो ने हिंदी दिवस (14 सितंबर) पर अपने 6,500 से ज्यादा ब्लॉगर्स के डेटा का विश्लेषण कर नई रिपोर्ट प्रस्तुत की है। विश्लेषण कहता है कि हिन्दी ब्लॉग्स ने हर महीने 3 करोड़ से ज्यादा पेज व्यू हासिल की है। इसमें से 95 प्रतिशत की खपत पाठकों ने मोबाइल पर की है।

प्लेटफार्म ने बताया कि हिंदी पेज व्यू अंग्रेजी से ज्यादा हो गए हैं और इस समय कुल पेज व्यू का 50 प्रतिशत हो गया है।

मॉमस्प्रेसो की ओर से जारी बयान में कहा गया कि प्लेटफार्म पर हिंदी में लेखन की सूची मुख्य रूप से उन शहरों की माताओं ने तैयार की है, जिनकी तुलनात्मक रूप से भागीदारी कम रही है। इनमें पटना, आगरा, लखनऊ, शिमला, भुवनेश्वर और इंदौर शामिल है। 75 प्रतिशत हिन्दी ब्लॉग्स को मॉमस्प्रेसो मोबाइल ऐप के जरिये लिखा गया है, जबकि अंग्रेजी में ऐसा नहीं है। 60 प्रतिशत ब्लॉगर्स अभी भी ब्लॉग लिखने के लिए डेस्कटॉप उपयोग करते हैं। मोबाइल ऐप पर बने हिन्दी ब्लॉग्स में से 93 प्रतिशत एंड्रायड फोन पर बने हैं। प्लेटफार्म पर इस समय 1,595 हिन्दी ब्लॉगर्स हैं, जिन्होंने अब तक 14,746 ब्लॉग्स बनाए हैं। हर महीने करीब 1,800 ब्लॉग्स जोड़े जा रहे हैं।

मॉमस्प्रेसो ने बताया कि हिन्दी की अधिकतम रीडरशिप लखनऊ, जयपुर, इंदौर, चंडीगढ़, आगरा और पटना से है। यह भी बताया गया कि 95 प्रतिशत यूजर्स ने लेखन का इस्तेमाल मोबाइल पर किया। जिस कंटेंट ने अधिकतम रीडरशिप (65 प्रतिशत) हासिल की, वह ‘मां की जिंदगी’ या ‘मॉम्स लाइफ’ सेक्शन था। रिलेशनशिप्स से लेकर पैरेंटिंग और सामाजिक उत्तरदायित्व तक का लेखन इस पर उपलब्ध है। अन्य लोकप्रिय सेक्शन में प्रेग्नेंसी, बेबी, हेल्थ और रैसिपी भी शामिल हैं।

हिंदी पोस्ट्स को अंग्रेजी की तुलना में 4.2 गुना ज्यादा एंगेजमेंट मिला। इसमें लाइक्स, शेयर और कमेंट्स शामिल हैं। हिन्दी में हाइपर एंगेजमेंट की एक बड़ी वजह हिन्दी कंटेंट की क्वालिटी है। पहली बार महिलाओं को कई मुद्दों पर अपने विचार अभिव्यक्त करने के लिए सुरक्षित स्थान मिला है। कई महिलाएं जो लैंगिंक भेदभाव, सामाजिक मुद्दों और अन्य वजहों से खुलकर बोल नहीं पाती थी, वह भी इस पर अपने आपको अभिव्यक्त कर रही है।

मॉमस्प्रेसो के सह-संस्थापक और सीईओ विशाल गुप्ता ने कहा, “हमारा विजन यह है कि अगले तीन वर्षो में हमारे प्लेटफॉर्म पर सभी माताओं में से 70 फीसदी को लेकर आना है और क्षेत्रीय भाषा लेखन इस लक्ष्य को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण है। हमें गर्व है कि मॉमस्प्रेसो एक ऐसा मंच प्रदान कर रहा है जहां भारत भर की माताएं बिना डर के अपने विचार व्यक्त कर रही हैं। इन विषयों पर बहस और चर्चाओं को प्रोत्साहित करती हैं। पिछले 12 महीनों में हमारे ट्रैफिक चार गुना बढ़ा है और हिंदी की भूमिका इस विकास में महत्वपूर्ण रही है। इस समय हमारे पास चार अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में लेखन है और वर्ष के अंत से पहले हमारी योजना 3 और जोड़ने की है।

हिंदी भाषा लेखन का उपयोग करने वाले ब्रांड्स की संख्या 2017 के 6 फीसदी से बढ़कर 2018 में 27 फीसदी हो गई है। इसमें पैम्पर्स, डेटॉल, बेबी डव, नेस्ले, जॉनसन एंड जॉन्सन, एचपी, ट्रॉपिकाना एसेंशियल्स और क्वैकर जैसे ब्रांड शामिल हैं।

–आईएएनएस

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ओपिनियन

जानिये क्यों गिर रहा है रुपया

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Rupee Fall

नई दिल्ली, 13 सितम्बर | केंद्र सरकार ने रुपये की गिरावट को थामने की हरसंभव कोशिश करने का भरोसा दिलाया है। इसका असर पिछले सत्र में तत्काल देखने को मिला कि डॉलर के मुकाबले रुपये में जबरदस्त रिकवरी देखने को मिली। हालांकि रुपये में और रिकवरी की अभी दरकार है।

डॉलर के मुकाबले रुपया बुधवार को रिकॉर्ड 72.91 के स्तर तक लुढ़कने के बाद संभला और 72.19 रुपये प्रति डॉलर के मूल्य पर बंद हुआ। इससे पहले मंगलवार को 72.69 पर बंद हुआ था।

रुपये की गिरावट से अभिप्राय डॉलर के मुकाबले रुपये में कमजोरी आना है। सरल भाषा में कहें तो इस साल जनवरी में जहां एक डॉलर के लिए 63.64 रुपये देने होते थे वहां अब 72 रुपये देने होते हैं। इस तरह रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ है।

शेष दुनिया के देशों से लेन-देन के लिए प्राय: डॉलर की जरूरत होती है ऐसे में डॉलर की मांग बढ़ने और आपूर्ति कम होने पर देशी मुद्रा कमजोर होती है।

एंजेल ब्रोकिंग के करेंसी एनालिस्ट अनुज गुप्ता ने रुपये में आई हालिया गिरावट पर कहा, “भारत को कच्चे तेल का आयात करने के लिए काफी डॉलर की जरूरत होती है और हाल में तेल की कीमतों में जोरदार तेजी आई है जिससे डॉलर की मांग बढ़ गई है। वहीं, विदेशी निवेशकों द्वारा निवेश में कटौती करने से देश से डॉलर का आउट फ्लो यानी बहिगार्मी प्रवाह बढ़ गया है। इससे डॉलर की आपूर्ति घट गई है।”

उन्होंने बताया कि आयात ज्यादा होने और निर्यात कम होने से चालू खाते का घाटा बढ़ गया है, जोकि रुपये की कमजोरी की बड़ी वजह है।

ताजा आंकड़ों के अनुसार, चालू खाते का घाटा तकरीबन 18 अरब डॉलर हो गया है। जुलाई में भारत का आयात बिल 43.79 अरब डॉलर और निर्यात 25.77 अरब डॉलर रहा।

वहीं, विदेशी मुद्रा का भंडार लगातार घटता जा रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार 31 अगस्त को समाप्त हुए सप्ताह को 1.19 अरब डॉलर घटकर 400.10 अरब डॉलर रह गया।

गुप्ता बताते हैं, “राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बनने से भी रुपये में कमजोरी आई है। आर्थिक विकास के आंकड़े कमजोर रहने की आशंकाओं का भी असर है कि देशी मुद्रा डॉलर के मुकाबले कमजोर हो रही है। जबकि विश्व व्यापार जंग के तनाव में दुनिया की कई उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राएं डॉलर के मुकाबले कमजोर हुई हैं।”

अमेरिकी अर्थव्यवस्था में लगातार मजबूती के संकेत मिल रहे हैं जिससे डॉलर दुनिया की प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले मजबूत हुआ है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में मजबूती आने से विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से अपना पैसा निकाल कर ले जा रहे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि संरक्षणवादी नीतियों और व्यापारिक हितों के टकराव के कारण अमेरिका और चीन के बीच पैदा हुई व्यापारिक जंग से वैश्विक व्यापार पर असर पड़ा है।

–आईएएनएस

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ब्लॉग

मोदी सरकार को बिना विचारे नयी नीतियाँ लागू करने की बीमारी है!

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kapil-sibal

काग़ज़ों पर कोई नीति भले ही शानदार लगे, लेकिन उसे सफलतापूर्वक लागू करना ही सबसे अहम है। युगान्कारकारी नीतियों का ऐलान करने से पहले ज़मीनी हक़ीक़त का जायज़ा लेना बेहद ज़रूरी है। एनडीए की विफलता की सबसे बड़ी वजह ही ये है कि वो नयी नीतियों को लागू करने से पहले उसके प्रभावों का आंकलन नहीं पाती है। नोटबन्दी, इसका सबसे जीता-जागता उदाहरण है। मोदी सरकार को इसका अन्दाज़ा ही नहीं था कि नोटबन्दी, देश के लिए विनाशकारी साबित होगा। इसी वजह से जीएसटी को घटिया ढंग से लागू किया गया और उससे भी फ़ायदे की जगह नुक़सान ही हाथ लगा।

दिवालिया और कंगाली क़ानून यानी इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड यानी आईबीसी को मई 2016 में संसद ने पारित किया। मोदी सरकार ने इसे बहुत बड़े आर्थिक सुधार की तरह पेश किया और ख़ूब अपनी पीठ थपथपाई। इसका मक़सद बैंकों की बैलेंस शीट को साफ़-सुथरा करना, कॉरपोरेट को उनके पापों की सज़ा दिलाना, बैंकिंग प्रणाली में हेराफेरी करने वालों को दंडित करना और सबसे बढ़कर बैंकों के डूबे क़र्ज़ यानी एनपीए के लिए ज़िम्मेदार कम्पनियों पर कार्रवाई करना था।

12 फरवरी 2018 को रिज़र्व बैंक ने क़र्ज़ पुनर्निर्धारण यानी ‘लोन रिस्ट्रकचरिंग’ से जुड़ी आधा दर्जन योजनाओं को ख़त्म कर दिया। इसकी जगह नयी नीति सामने आयी जिसमें कॉरपोरेट्स को 180 दिनों के भीतर अपने बकाया क़र्ज़ों को चुकाने या फिर दिवालिया क़ानून यानी आईबीसी का सामना करने का बेहद सख़्त प्रावधान था। ज़मीनी हक़ीक़त का जायज़ा लिये गये बनी इस नीति का नतीज़ा ये निकला कि सुप्रीम कोर्ट ने रिज़र्व बैंक के 12 फरवरी वाले फ़रमान पर रोक लगा ही। लिहाज़ा, दिवालिया क़ानून को लागू करने की क़वायद बैंकों को रोक देनी पड़ी।

तब तक आईबीसी के मामलों के निपटारे के लिए दिवालियेपन से निपटने वाली तीन पेशेवर कम्पनियों के ज़रिये 1300 कर्मचारियों की भर्ती हो चुकी थी। नैशनल कम्पनी लॉ ट्राइबुनल (एनसीएलटी) की शाखाओं में कॉरपोरेट्स के ख़िलाफ़ 525 मामले भी दर्ज़ हो गये। 108 मामलों में कम्पनियाँ स्वेच्छा से दिवालियेपन की कार्रवाई के लिए आगे आ गयीं। इनमें स्टील, निर्माण और खदान से जुड़ी ऐसी कम्पनियाँ हैं, जिन पर बैंकों के 1,28,810 करोड़ रुपये बकाया है। इतनी बड़ी तादाद के बावजूद, 2014 से अभी महज कुछ ही मामलों में आईबीसी के तहत कार्रवाई आगे बढ़ी।

आईबीसी के तहत अगस्त और दिसम्बर 2017 के दौरान जिन 10 शुरुआती मामलों का निपटारा हुआ उसमें भी बैंकों को उनके कुल बकाये का सिर्फ़ 33.53 फ़ीसदी रक़म ही मिल पायी। 13 जून 2017 को रिज़र्व बैंक ने 12 बड़े बकायेदारों की पहचान दिवालियेपन की कार्रवाई के लिए की। एक साल बीतने के बावजूद, इन 12 कम्पनियों में से भूषण स्टील और इलेक्ट्रो स्टील के अलावा अन्य किसी का निपटारा नहीं हुआ।

12 बड़े क़र्ज़दारों का 3,12,947 करोड़ रुपये का दावा मंज़ूर हुआ था। लगता नहीं है कि आईबीसी की नीति के मुताबिक़, इतनी रक़म कभी वसूल हो पाएगी। ऐसे मामलों में 180 दिनों की निर्धारित अवधि के ख़त्म होने के बाद बाक़ी वक़्त मुक़दमेबाज़ी में खर्च हो रहा है। ऐसे मामलों से सिर्फ़ वकीलों और दिवालियापन की कार्रवाई से जुड़े पेशेवर लोगों को फ़ायदा हो रहा है।

बिजली क्षेत्र में 34 बीमार कम्पनियों पर 1.5 लाख करोड़ रुपये बकाया हैं। बैंकों की चिन्ता है कि दिवालियेपन की कार्रवाई के ख़त्म होते-होते इन कम्पनियों की सम्पत्ति का दाम और घट जाएगा। रिज़र्व बैंक ने बैंकों को सख़्त हिदायत दी है कि यदि उसके 12 फरवरी वाले फ़रमान को सख़्ती से लागू नहीं किया गया तो उन्हें गम्भीर नतीज़े भुगतने होंगे। यही वजह है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने केन्द्र सरकार को हिदायत दी है कि वो रिज़र्व बैंक से बात करके आईबीसी के प्रावधानों पर राहत देने का पता लगाये, वर्ना आशंका है कि दिवालियेपन की कार्रवाई में बैंकों का 85 फ़ीसदी बकाया डूब जाएगा।

आईबीसी से जुड़ी पूरी तस्वीर का स्याह पहलू ये है कि कॉरपोरेट सेक्टर में कुछ ही कम्पनियाँ ऐसी हैं जो दिवालियेपन की कार्रवाई के बाद ज़ब्त होने वाली कम्पनी को ख़रीदने के लिए उसकी क़ीमत के मुक़ाबले 15 से लेकर 35 फ़ीसदी रक़म ही जुटा सकती हैं। स्टील सेक्टर की दोनों बड़ी कम्पनियों की नीलामी के वक़्त सिर्फ़ दो घरेलू कम्पनियाँ ही बोली लगा पायी थीं। विदेशी कम्पनियों ने तो जैसी बोलियाँ लगायीं, उससे लगा कि वो बीमार कम्पनियों को कौड़ियों के मोल, बिल्कुल वैसे ही ख़रीदना चाहती हैं, जैसा वाजपेयी सरकार के ज़माने में विनिवेश के बहाने कुछ चहेती कम्पनियों को औने-पौने दाम में सरकारी कम्पनियों को बेचा गया था।

स्टील सेक्टर में बीमार कम्पनियों को ख़रीदने के लिए आगे आने वाली घरेलू कम्पनियों को तक़रीबन एकाधिकार नज़र आया है। बिजली क्षेत्र में भी दो मुख्य खिलाड़ी हैं। इसमें से एक को अयोग्य ठहराये जाने के बाद दूसरे के लिए कोई प्रतिस्पर्धी बचा ही नहीं। इस तरह से एक कॉरपोरेट को निहाल किया जा रहा है। स्टील और बिजली ऐसे क्षेत्र हैं, जहाँ बैंकों की भारी रक़म डूब रही है। आईबीसी की बदौलत स्टील सेक्टर में जहाँ 35 फ़ीसदी क़र्ज़ की वसूली हो पा रही है, वहीं बिजली क्षेत्र में तो ये कुल बकाया का महज 15 फ़ीसदी है। सारा माज़रा ही अपने आप में घोटाला है, क्योंकि बीमार कम्पनियों के ख़रीदार भी बैंकों से क़र्ज़ लेकर ही सम्पत्तियाँ ख़रीदेंगी!

आप चाहें तो सरकार की सूझबूझ पर तरस खा रहे हैं, क्योंकि शायद, उसने ऐसी परिस्थितियों का अन्दाज़ा ही नहीं लगाया हो। तभी तो एक ओर रिज़र्व बैंक का 12 फरवरी वाला सर्कुलर क़ायम रहता है और दूसरी ओर 19 जुलाई को बिजली मंत्रालय की ओर से स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया से कहा जाता है कि वो ‘समाधान’ योजना के तहत बीमार कम्पनियों के क़र्ज़ों का पुनर्निर्धारण कर दे। ये योजना ठंडे बस्ते में चली गयी। ऐसी ही एक अन्य योजना ग्रामीण विद्युतीकरण निगम पर बकाया 17,000 करोड़ रुपये के लिए भी प्रस्तावित हुई। लेकिन वो भी बेकार साबित हुई।

रिज़र्व बैंक भी समय-समय पर ऐसे दिशा-निर्देश जारी कर रहा है, जो बताते हैं कि नीतियों का ऐलान करते वक़्त उसके अंज़ाम के बारे में नहीं सोचा जाता। ऊर्जा से जुड़ी संसदीय समिति ने मार्च 2018 में जारी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि “यदि रिज़र्व बैंक ज़मीनी सच्चाई को नज़रअन्दाज़ करके दिशानिर्देश जारी करता रहेगा तो इसका मतलब ये है कि बैंक, वित्तीय संस्थाएँ और अन्य निवेशकों की रक़म की वसूली की उम्मीद घटाई में पड़ जाएगी।” संसदीय समिति की ऐसी प्रतिक्रिया से साफ़ है कि सरकार की न सिर्फ़ नीतियाँ ग़लत हैं, बल्कि उन्हें लागू करने का सलीका भी सही नहीं है।

संसदीय समिति की ये भी राय है कि “180 दिनों की मियाद में लक्ष्य को हासिल करना तक़रीबन असम्भव है।” उसने सचेत किया कि जिस दिन एनपीए के जुड़े सारे मामले राष्ट्रीय कम्पनी लॉ ट्राइबुनल में पहुँच जाएँगे, उस दिन वहाँ जाम लग जाएगा। समिति ने आगे कहा कि बिजली क्षेत्र अभी बदलाव के दौर में है। ऐसे में यदि रिज़र्व बैंक सिर्फ़ वित्तीय नज़रिये से देखेगा तो कई अन्य चुनौतियाँ भी खड़ी होंगी, जो वित्तीय परिधि से बाहर होगी। इसीलिए ये समझना ज़रूरी है कि बिजली क्षेत्र की बीमार कम्पनियाँ “राष्ट्रीय सम्पत्ति” हैं और “आख़िरकार इन्हें बचाना बहुत ज़रूरी है।”

नीति में ही घोटाला है। दो या तीन कॉरपोरेट कम्पनियों के बीच में महँगी सम्पत्तियों की बन्दरबाँट, सरकार से जुड़े पूँजीपति दोस्तों को निहाल करने का तरीका है। नीतियों को समुचित समीक्षा के बग़ैर लागू कर देना, उस आरोप के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा घटिया है जिसमें निर्णय लेने की ढिलाई के बावजूद 2004 से 2014 के दौरान अर्थव्यवस्था की विकास दर 8.2 फ़ीसदी दर्ज होती है।

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