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संघ-बीजेपी के लिए अब नीतीश और जेडीयू की बलि लेना ज़रूरी हो गया है…!

नीतीश की नयी सरकार बमुश्किल साल भर भी नहीं चल पाएगी कि जनता दल में बाग़ी तत्वों को हवा दी जाएगी।

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नरेन्द्र मोदी की शान में नीतीश कुमार चाहे जितने क़सीदें पढ़ें, उन्हें 2019 के लिए चाहे जैसे अपराजेय बताते रहे, लेकिन बिहार के मौजूदा मुख्यमंत्री की हैसियत अब उस बकरे जैसी हो चुकी है, जिसकी माँ कब तक ख़ैर मनाएगी! अब तो राजनीतिक क्षितिज पर ये लिखा दिखायी दे रहा है कि नीतीश और उनकी जनता दल यूनाइटेड (JDU) को 2019 के आम चुनाव से पहले ही इतिहास बना दिया जाएगा! संघ के रणनीतिकारों के सामने अब ऐसे ‘मिशन बिहार’ का कोई विकल्प नहीं हो सकता। इसीलिए, यही उनका अगला लक्ष्य भी रहेगा।

राजनीति में जिस बात का महत्व सबसे अधिक है, उसे छवि यानी Perception कहते हैं। हरेक नेता अपनी छवि के सहारे जीता है। हालाँकि, अक्सर छवि झूठी ही होती है! लेकिन नेतागिरी में छवि ही सर्वोपरि होती है। हरेक पार्टी और नेता अपनी छवि को बढ़िया और विरोधियों की छवि को घटिया साबित करने के अन्तहीन सिलसिले से जुड़े होते हैं। इस काम को जो ज़्यादा सफलतपूर्वक कर लेता है, वो सत्ता पाता है। जबकि पिछड़ने वाले को विपक्ष में रहना पड़ता है। 2013 के उत्तरार्ध से अभी तक नरेन्द्र मोदी और उनका संघ भी तरह-तरह के झूठ फैलाकर जहाँ अपनी ज़ोरदार ब्रॉन्डिंग करने में सफल रहा है, वहीं विरोधियों की छवि का मर्दन करने में भी उसे भरपूर क़ामयाबी मिली है। वैसे इतिहास गवाह है कि झूठा छवि-निर्माण जब अपनी सीमा को पार करता हुआ घोर अविश्वसनीय हो जाता है, तो सारी छवि और समूची नेतागिरी भरभराकर ढह जाती है।

नीतीश की छवि यानी उनके दीये का तेल अब समाप्ति पर है। उनके दीये का तेल कई तत्वों से मिलकर बना था। जैसे, सुशासन बाबू! अब ये छवि बहुत खोखली हो चुकी है। इसका जायज़ा उनके नये मंत्रियों के दाग़ी चेहरों की तादाद को देखकर आसानी से लिया जा सकता हैएसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक़, नीतीश के नव-नियुक्त 29 मंत्रियों में से 22 के ख़िलाफ़ गम्भीर आपराधिक मामले दर्ज़ हैं। ख़ुद नीतीश भी हत्या जैसे सबसे बड़े अपराध के आरोपी हैं। वैसे दाग़ी मंत्रियों की कमी महागठबन्धन सरकार में भी नहीं थी। अलबत्ता, अब ये कलंक नये शिखर पर जा पहुँचा है।

नीतीश के तेल का अगला तत्व है, उनकी ‘सेक्यूलर’ छवि। 17 साल तक बीजेपी के साथ रहने के बावजूद वो किसी न किसी तरह से इस छवि संजोये रहे। इस दौरान लालू को जंगलराज का प्रतीक बताकर उनका राज चलता रहा। उधर, 2015 में बिहार में मुँह की खाने के बावजूद देश में संघ-बीजेपी का फैलाव होता रहा। इससे उत्साहित होकर बीजेपी ने नीतीश से भी दो-दो हाथ करने की रणनीति बनायी। बीजेपी को लगा कि यदि वो नीतीश की सुशासन बाबू वाली छवि पर ज़ोरदार हमला करेगी, वो इससे पूरे महागठबन्धन पर एक ही तीर से निशाना साधा जा सकता है। लिहाज़ा, सुशासन को विलोम भ्रष्टाचार को फिर से मुद्दा बनाकर इसे ज़ोरदार हवा दी गयी। नीतीश को भी धमकाया गया कि महागठबन्धन तोड़कर वापस आ जाओ, वर्ना भ्रष्टाचार के आरोपों से छलनी-छलनी कर दिये जाओगे।

नीतीश में बहादुर नेता की तरह डटकर चुनौतियों का मुक़ाबला करने वाला ज़ज़्बा कभी नहीं रहा। संघ-बीजेपी को नीतीश के डरपोक और सत्ता के लालची होने के बारे में अच्छी तरह से पता था। दोनों एक-दूसरे के साथ 17 साल तक हम-बिस्तर रहे हैं। लिहाज़ा, संघ ने बिहार को मुट्ठी में करने की व्यापक रणनीति बनायी। उसी पटकथा पर क़रीब साल भर से काम चल रहा था। इससे उपजा पहला बड़ा संकेत नोटबन्दी के वक़्त सामने आया। तब भी अपनी जान बचाने के लिए, अपने ख़ेमे से दग़ाबाज़ी करके नीतीश, नोटबन्दी का गुणगान करने लगे। फिर जीएसटी की दरें और राष्ट्रपति चुनाव के मोर्चे पर भी बेसुरा राग ही आलापा। ये सब कुछ अनायास नहीं था! इसी पटकथा के मुताबिक, सुशील मोदी को आये दिन लालू यादव को निशाना बनाने की भूमिका दी गयी। ताकि नीतीश के लिए महागठबन्धन से बाहर आने का उपयुक्त अवसर पैदा किया जा सके। अब उसी पटकथा का ‘क्लाईमेक्स’ है कि 2019 के आम चुनाव से पहले नीतीश कुमार और उनके जनता दल यूनाइटेड का ख़त्म होना तय है। संघ-बीजेपी ज्यादा दिनों तक बिहार में जूनियर पार्टनर बनकर नहीं रहना चाहता। इसीलिए नीतीश और जेडीयू की बलि ली जाएगी!

संघ-बीजेपी की ओर से जल्द ही जेडीयू में बाग़ी तत्वों को हवा दी जाएगी। बाग़ियों को भारी-भरकम थैलियों और टिकट की गारंटी देकर वैसा ही खेल खेला जाएगा, जैसा अभी हमने गुजरात और उत्तर प्रदेश में देखा है! या जैसा असम के चुनाव के वक़्त हुआ था, या जैसा अरुणाचल प्रदेश, उत्तराखंड और मणिपुर में हम देख चुके हैं! थैलियों और टिकट के अलावा सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग जैसे सरकारी लठैतों के बल पर विधायकों और सांसदों का होश ठिकाने लगाया जाएगा। राजनीति में ‘साम-दाम-भेद-दंड’ का दस्तूर भी यही है। फ़िलहाल, बीजेपी इन्हीं हथकंडों को वैसे ही अपनाएगी जैसे मध्यकाल में तैमूर लंग और मोहम्मद ग़ोरी जैसे लुटेरों को क़त्लेआम से कोई गुरेज़ नहीं होता था। लोकलाज़ और नैतिकता को ये अरसे पहले ताक़ पर रख चुके हैं।

नीतीश की नयी सरकार बमुश्किल साल भर भी नहीं चल पाएगी कि जनता दल में बाग़ी तत्वों को हवा दी जाएगी।

पटकथा के मुताबिक़, पहले तो नीतीश को जेडीयू का बीजेपी में विलय कर लेने के लिए कहा जाएगा। ना-नुकुर हुई तो फ़ौरन बाग़ियों और सरकारी लठैतों के ज़रिये उन पर धावा बोल दिया जाएगा। जैसे ही बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बन जाएगी वैसे ही नीतीश को सत्ता से बाहर करके भगवा मुख्यमंत्री बनाया जाएगा। यदि नीतीश ज़्यादा नहीं फ़नफ़नाएँगे तो उनको बाक़ी ज़िन्दगी गुज़ारने के लिए किसी भी राजभवन में भेज दिया जाएगा। बिहार ही नहीं, ऐसे मिशन उड़ीसा और तमिलनाडु में भी चलाये जाएँगे। सरकारी लठैतों का ख़ौफ़ दिखाकर अन्नाद्रमुक को एनडीए में लाने का काम तो इन दिनों अपने आख़िरी दौर में है। किसी भी इसका ऐलान सामने आने वाला है। उड़ीसा में बीजू जनता दल को भी तोड़ने का अभियान छेड़ दिया गया है। वहाँ भी सही वक़्त पर नतीज़े सामने आ जाएँगे। ममता के मामले में भी खेल तो यही होना है, लेकिन फ़िलहाल, बंगाल में धीरे-धीरे आगे बढ़ा जाएगा। 2019 से पहले बंगाल पर तगड़ा हमला नहीं किया जाएगा क्योंकि ऐसा होने से विपक्ष एकता को फ़ायदा हो सकता है।

दरअसल, संघ को अच्छी तरह से पता है कि 2019 में मोदी सरकार की छवि को तगड़ा झटका लगेगा। क्योंकि चुनावी वादों को निभाने, उम्दा सरकार देने और अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर इसकी उपलब्धियाँ बेहद मायूसी भरी रही हैं। हालाँकि, संघ को अपने अफ़वाह फ़ैलाने वाले तंत्र की बदौलत, मन्द-बुद्धि हिन्दुओं को लगातार अफ़ीम चटाने में सफलता अब भी मिल रही है। लेकिन चुनावी इतिहास ये कहता है कि 2014 में जिन-जिन राज्यों में बीजेपी ने तक़रीबन पूर्ण विजय पायी थी, वहाँ 2019 में सत्ता-विरोधी भावना (Anti incumbency factor) अपना असर ज़रूर दिखाएगी।

2019 में यदि जनता का मोदी राज की झूठी छवि और ब्रॉन्डिंग से मोहभंग हो गया तो इन्हें भी वैसे ही सत्ता से बाहर होना होगा, जैसे 2004 में इंडिया शाइनिंग का झूठ, जनता को हज़म नहीं हुआ था। संघ-बीजेपी भी इस पहलू को अच्छी तरह समझते हैं। उन्हें पता है कि यदि 2014 जैसी मोदी लहर 2019 में भी रही, तो भी गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, हिमाचल, झारखंड और बिहार जैसे राज्यों में उसे कुछ न कुछ सीटों का नुकसान तो झेलना ही पड़ेगा। क्योंकि हरेक चुनाव में पार्टियाँ जहाँ कुछ नयी सीटें जीतती हैं, वहीं कुछ मौजूदा सीटें गँवाती भी हैं। फिर, यदि किसी राज्य में आप सर्वाधिक या सारी सीटें जीत चुके हैं, तो अगली बार उसमें कमी आना तय है। इसके अलावा, हरेक चुनाव में सबसे ज़्यादा मंत्री ही हारते हैं। कई उलटफेर भी होते हैं।

लिहाज़ा, सत्ता पक्ष के लिए जहाँ हारने वाली सीटों की भरपायी नयी सीटों को जीतकर करने की होती है, वहीं विपक्ष अपनी पुरानी साख को फिर से पाने के लिए जूझता है। इस हिसाब से 2019 में बिहार में एनडीए की दशा बहुत पेंचीदा होने वाली है। नीतीश की वापसी से पहले एनडीए में बीजेपी के साथ, राम विलास पासवान, उपेन्द्र कुशवाहा और जीतन राम माँझी अपनी-अपनी पार्टियों के साथ मौजूद थे। इन सबके बीच सबसे ज़बरदस्त टकराव सीटों के बँटवारे के वक़्त होगा। नीतीश यदि अपना क़द सबसे बड़ा रखना चाहेंगे तो उन्हें कितनी सीटों का लक्ष्य रखना होगा? 2014 में जेडीयू ने राज्य की सभी 40 सीटों पर चुनाव लड़ा था। लेकिन खाते में आयी सिर्फ़ 2 सीट। जबकि बीजेपी ने 22, पासवान ने 6 और कुशवाहा ने 3 सीटें जीती थीं। बाक़ी 9 सीटें यूपीए को मिलीं।

अब सवाल ये है कि ऐसी क्यों होगा कि बीजेपी सभी सहयोगियों की सीटों की माँग को पूरा करके सिर्फ़ बचा-खुचा से सन्तोष कर लेगी? एनडीए का हर सहयोगी चाहेगा कि उसे पिछली बार से ज़्यादा सीट मिलें। जबकि बाँटने के लिए तो सिर्फ़ 9 सीटें ही होंगी। इसी बात को लेकर ज़ोरदार टकराहट होगी। इसलिए भी यदि वैसी नौबत आने से पहले जेडीयू का बीजेपी में विलय हो जाए और नीतीश को दरकिनार कर दिया जाए तो सारा का सारा खेल बीजेपी की मुट्ठी में बना रहेगा! जेडीयू का बीजेपी में विलय इसलिए भी सहज और आसान होगा कि अब जेडीयू के विधायकों के पास विचारधारा नाम का कोई तत्व बचा नहीं है। जेडीयू के पास अब ऐसा कुछ भी नहीं रहा जिससे वो ख़ुद को बीजेपी से अलग पार्टी की तरह पेश कर सकें। ऐसी जो भी गुंज़ाइश है, उस जगह को पासवान, कुशवाहा और माँझी भी घेरकर बैठे हैं। कुलमिलाकर, अगले कुछ महीनों में जेडीयू के विधायकों की मानसिकता ऐसी बना दी जाएगी कि उन्हें लगेगा कि जब गूँ ही खाना है तो कुत्ते का क्यों खायें, हाथी का क्यों नहीं! जब साम्प्रदायिकता और दग़ाबाज़ी का ही कलंक झेलना है कि नीतीश के पीछे खड़े रहने से अच्छा है मोदी के पीछे खड़े रहना! नीतीश और जेडीयू के ख़ात्मे के लिए ये सब पर्याप्त आधार हैं।

ओपिनियन

हज 2018 होगा महंगा, मगर सब्सिडी की समाप्ति वजह नहीं

केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने मंगलवार को इस साल से हज सब्सिडी की समाप्ति की घोषणा की थी।

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हज 2018 की यात्रा पिछले साल के मुकाबले ज्यादा महंगी रहने वाली है। लेकिन इसकी वजह सरकार द्वारा मंगलवार को सब्सिडी समाप्त करने की घोषणा नहीं है।

इसके पीछे का कारण हज के दौरान सऊदी अरब में होने वाला खर्च है, जिसमें रहना, परिवहन, खाना और दूसरी चीजें शामिल हैं। यहां ध्यान दिलाने वाली बात यह है कि सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी इन खर्चो का वहन नहीं करती और साथ ही वह हवाई सफर में भी सीमित है।

भारतीय हज समिति (एचसीआई) के अध्यक्ष महबूब अली कैसर ने आईएएनएस को बताया कि कीमतों पर नियंत्रण के लिए सऊदी प्रशासन से सौदेबाजी करना कठिन था, लेकिन इस साल स्थानीय कारक हज की यात्रा में खर्चा बढ़ा सकते हैं।

2017 में एचसीआई हज के लिए साधारण आवास (अजीजिया) के साथ दो लाख रुपये और डीलक्स आवास (ग्रीन) के साथ 234,000 रुपये वसूलता था। डीलक्स आवास (ग्रीन) मक्का में हरम के समीप है।

कैसर ने कहा, “पिछले साल से सऊदी अरब में बिजली का शुल्क तीन गुना बढ़ गया है। इसके साथ ही पेट्रोल की कीमतें भी दोगुनी हो चुकी हैं। आवास की कीमतें भी बढ़ रही हैं। ये सभी कारक इस साल हज में आने वाली कुल लागत को बढ़ा सकते हैं।”

उन्होंने कहा कि इस वक्त हज 2018 में प्रत्येक श्रद्धालु पर आने वाली अंतिम लागत का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।

उन्होंने कहा, “ऐसा मानना बेमानी होगी कि बिजली की कीमतों में तीन गुना और पेट्रोल की कीमतों में दोगुनी वृद्धि हो जाने पर हर बार सऊदी अरब में सभी चीजों की कीमतें समान रहेंगी। दूसरा, सऊदी के लोग सौदेबाजी करने वालों को गाली देते हैं और हमें उनसे हर रियाल के लिए वास्तव में बहुत सौदेबाजी करनी पड़ी।”

कैसर ने कहा, “तब भी, हम अपना सर्वश्रेष्ठ देने का प्रयास कर रहे हैं और उनसे बहुत सौदेबाजी कर रहे हैं, ताकि यह सुनिश्चित कर सकें कि कीमतें जबरदस्त रूप से न बढ़ें।”

केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने मंगलवार को इस साल से हज सब्सिडी की समाप्ति की घोषणा की थी।

कैसर ने कहा कि एचसीआई को पता था कि ऐसा होने वाला है और इसके लिए हम मानसिक रूप से तैयार थे।

उन्होंने कहा, “किसी भी हालत में सब्सिडी को वापस लेने का फैसला मुंबई, दिल्ली, अहमदाबाद और बेंगलुरू जैसे बड़े शहरों के हवाई किराए को प्रभावित नहीं करेगा, लेकिन श्रीनगर, गया जैसे छोटी जगहों से किराया बढ़ सकता है। लेकिन इन राज्यों के लोग जहां किराया कम है, जैसे मुंबई, दिल्ली और अहमदाबाद जाकर उड़ानें पकड़ सकते हैं।”

हालांकि आने वाले वर्षो में हज की लागत कम होने के आसार हैं, क्योंकि भारत सरकार पहले से ही जेद्दाह जाने वाले समुद्री रास्ते को पुनर्जीवित करने की दिशा में काम कर रही है।

नकवी ने कहा कि सरकार ने इस बाबत पहले से ही इस दिशा में सक्रिय कदम उठाए हैं और एक बार लागू होने के बाद किराये में जबरदस्त गिरावट आएगी।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा कि हज सब्सिडी की शुरुआत 1980 (जब आजाद एचसीआई के सदस्य थे) के दशक में हुई थी, जब हज यात्रियों को ढोने वाली जहाजें पुरानी होने लगी थीं।

आजाद ने कहा, “बजट की कमी के कारण सरकार ने नई जहाजों की खरीद पर पैसा नहीं खर्च किया था। इस लिए श्रद्धालुओं को जेद्दाह ले जाने के लिए उड़ानें शुरू करने का फैसला किया गया था। लेकिन हवाई सफर जहाज के किराए से चार गुना महंगा था। इसलिए सरकार ने उस लागत का वहन करने के लिए सब्सिडी का भुगतान करना शुरू किया था।”

समुद्री रास्ते को 1995 में बंद कर दिया गया था।

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कश्मीर को हमने हिंदू-मुसलमान का मसला बना दिया

कश्मीर में 2010 से लेकर 2014 तक आतंकवाद नियंत्रित था, लेकिन अचानक हिरोइज्म की शुरुआत हुई और काफी सारे लोग सड़कों पर आने शुरू हो गए।

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कश्मीर समस्या अब तक इसलिए नहीं सुलझ पाई, क्योंकि हमने इसे हमेशा जमीन के एक टुकड़े की तरह देखा है। हमने कश्मीरियों को कभी भारत का नागरिक माना ही नहीं। दोनों देशों ने कश्मीर को अपने ‘अहं’ का सवाल बना लिया है। आम कश्मीरी पाकिस्तान को पसंद नहीं करता, उसकी पैन इस्लामिज्म में कोई दिलचस्पी नहीं है। वह रोजगार और शांति से जीना चाहता है। यह कहना है ‘कश्मीरनामा’ के लेखक अशोक कुमार पांडेय का।

कश्मीर की नब्ज समझने वाले लेखक कहते हैं कि कश्मीरी लोगों को लेकर हमारे अंदर मोहब्बत नहीं, संशय बना हुआ है। वह कहते हैं, “कश्मीर को हमने हिंदू-मुसलमान का मसला बना दिया है। मेरा मानना है कि यदि कश्मीर को अपना मानना है, तो वहां के लोगों की परेशानियों को अपनी परेशानियां समझना होगा। जैसे देखिए, अभी कश्मीर का एक लड़का शताब्दी एक्सप्रेस में बिना टिकट यात्रा करते पाया गया और उसे आतंकवादी और पता नहीं क्या-क्या कह दिया गया, यह सोच खत्म करने की जरूरत है।”

अशोक कुमार पांडेय की किताब ‘कश्मीरनामा’ कश्मीर के भारत में विलय और उसकी परिस्थितियों को बयां करती है। वह कहते हैं, “जब मैं कश्मीर का अध्ययन कर रहा था, तो कश्मीर का मतलब मेरे लिए सिर्फ एक जगह नहीं थी, बल्कि वहां के लोग थे। पिछले कुछ दशकों में कश्मीर का मामला सुलझने की बजाय और उलझ गया है।”

वह कहते हैं कि कश्मीर के लोग परेशान हैं कि उनसे जो वादे किए गए थे, उन्हें निभाया नहीं गया। सारी समस्याओं की जड़ यही है कि भारत और पाकिस्तान दोनों कश्मीर पर अपना हक जताना चाहते हैं। पांडेय कहते हैं, “अगर आप कानूनी रूप से देखें, तो कश्मीर और हिंदुस्तान के बीच संधि हुई थी, तो इस लिहाज से कश्मीर पर भारत का हक बनता है। लेकिन पाकिस्तान इसे अलग तरह से परिभाषित करता है। दोनों देशों ने इसे अपने अहं का सवाल बना लिया है।”

उन्होंने कहा, “इन सभी उलझनों के बीच में पैन इस्लामिज्म ने प्रवेश किया। पैन इस्लामिज्म के बाद यह पूरा मूवमेंट ही बदल गया। सच्चाई यह है कि आम कश्मीरी पाकिस्तान को पसंद नहीं करता। पैन इस्लामिज्म में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है। वह चैन की जिंदगी गुजर-बसर करना चाहता है। वह चाहता है कि कश्मीर में तैनात सुरक्षाबलों की संख्या में घटाई जाए। नौकरियां दी जाएं और वह हिंदुस्तान में शांति से रह सके।”

अशोक पांडेय की इस किताब का आज प्रगति मैदान में विश्व पुस्तक मेले में औपचारिक लोकार्पण हुआ। किताब के बारे में वह कहते हैं, “इस किताब को पूरा करने में उन्हें चार साल लगे। इनमें से दो साल शोध कार्यो में, जबकि दो साल लेखन में लगे। इस दौरान मैंने 125 किताबों की मदद ली, जिसमें आठ से नौ शोधग्रंथ भी हैं। इस सिलसिले में चार बार कश्मीर जाना हुआ।”

उन्होंने कहा, “यह शोधकार्य था। इसलिए जरूरी था दस्तावेज इकट्ठा करना। इसे लेकर मैंने श्रीनगर विश्वविद्यालय, जम्मू और कश्मीर के शोपियां और कई गांवों की खाक छानी। इंटरनेट से भी काफी मदद ली। कुछ ऐसे लोगों से भी मिला, जो पहले आतंकवादी थे लेकिन अब मुख्यधारा में शामिल हो गए हैं।”

पांडेय कहते हैं, “कश्मीर की एक समस्या यह भी है कि यहां कभी जनमत संग्रह नहीं हो पाया और इसके लिए हिंदुस्तान अकेला जिम्मेदार नहीं है, पाकिस्तान भी उतना ही जिम्मेदार है। हमने कश्मीर की समस्या को हिंदू-मुसलमान समस्या में तब्दील कर दिया है। दूसरी बात है कि कश्मीर लोग सिर्फ घूमने जाते हैं। यह सिर्फ पर्यटन तक सिमट गया है, कश्मीरियों से कोई संवाद नहीं है। दोनों के बीच में संवाद बेहद जरूरी है। मैंने किताब के अंत में यही बात लिखी है कि यदि कश्मीर के स्कूली बच्चे अन्य राज्यों में जाएं और वहां के छात्र यहां आएं तो संवाद की स्थिति बेहतर हो सकती है।”

वह कहते हैं, “कश्मीर में जिस तरह का माहौल है, उस पर लेबल चिपकाना बहुत गलत है। हम किसी को देशद्रोही या देशभक्त नहीं कह सकते। कश्मीर के साथ दिक्कत यही है कि वहां उद्योग-कारखाने नहीं हैं, लोगों के पास नौकरियां नहीं हैं, कहीं विकास नहीं है और ऊपर से कश्मीरियों का अपमान अलग से। मेरे लिए विकास का सीधा मतलब है कि लोगों को रोजगार मिले। लोगों को पढ़ने का मौका मिले।”

पांडेय कहते हैं, “कश्मीर के मसले पर सभी सरकारों ने कोई न कोई गलती की है। इंदिरा गांधी की अपनी गलतियां थीं, राजीव गांधी की अपनी और वाजपेयी जी के समय में कुछ काम जरूर हुआ, लेकिन वो कहीं पहुंच नहीं पाया। उसके बाद की सरकार की अपनी गलतियां और इस सरकार की अपनी गलतियां हैं। दिक्कत यही है कि कश्मीर को हमने कभी अपना नहीं समझा। हम सिर्फ यह मान बैठे हैं कि यह एक ऐसा इलाका है, जिस पर हमें कब्जा रखना है। इस मानसिकता को खत्म करना होगा। “

वह कहते हैं कि देश में हर जगह बवाल हो रहा है, हरियाणा में आरक्षण को लेकर कितनी हिंसा हुई। बिहार में जमकर बवाल हुआ। दलितों को छोटी सी बातों पर उन्हें मार दिया जाता है, खाप पंचायतों की करनी किसी से छिपी हुई न हीं है, लेकिन वे देशविरोधी नहीं कहलाते। वहीं, जब बात कश्मीर की आती है तो बलवा करने वाले को फौरन देशद्रोही बता दिया जाता है। हम कश्मीर को गैर मानकर चलते हैं। वे नाराज हैं और अपनी बात कहते हैं तो समझा जाता है कि वे पाकिस्तान का समर्थन कर रहे हैं। यही मानसिकता उन्हें एक दिन पाकिस्तान के पक्ष में धकेल देगी।

पांडेय कहते हैं, “नरेंद्र मोदी जब गुजरात में भाजपा के महासचिव थे तो उन्होंने कहा था कि कश्मीर समस्या के समाधान के लिए तीन ‘डी’ सूत्र जरूरी है- डेवलपमेंट, डेमोक्रेसी और डायलॉग और जब ये तीनों असफल रहें तो चौथे डी ‘डिफेंस’ का प्रयोग करना चाहिए, लेकिन दिक्कत यह है कि कश्मीर में अक्सर चौथा डी पहले प्रयोग में लाया जाता है। अगर पहले तीनों डी का सही तरीके से उपयोग किया जाए, थोड़ा धीरज रखा जाए, सेना को नियंत्रण में रखा जाए और लोगों का विश्वास जीता जाए तो एक दशक में ही कश्मीर में काफी हद तक आतंकवाद खत्म हो जाएगा।”

वह आगे कहते हैं, “कश्मीर में 2010 से लेकर 2014 तक आतंकवाद नियंत्रित था, लेकिन अचानक हिरोइज्म की शुरुआत हुई और काफी सारे लोग सड़कों पर आने शुरू हो गए।”

By : रीतू तोमर

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‘स्लोगन बाबा’ ने गंगा प्रेमियों को भी ठगा : राजेंद्र सिंह

गंगा पर बैराज बनाए जा रहे हैं, गंदे नाले मिल रहे हैं, इससे गंगा तो और खत्म होने के कगार पर पहुंच जाएगी। लिहाजा, अब तो वर्तमान सरकार पुरानी सरकार से ज्यादा संवेदनहीन दिखाई देने लगी है।

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लगभग पौने चार वर्षो में केंद्र सरकार गंगा नदी की अविरलता और इसे प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए कोई सार्थक काम कर पाने में नाकाम रही। इससे गंगा प्रेमी नाराज हैं। दुनिया में ‘जलपुरुष’ के नाम से विख्यात राजेंद्र सिंह का तो यहां तक कहना है कि ‘स्लोगन बाबा (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी) ने गंगा प्रेमियों को भी ठगने में कसर नहीं छोड़ी है।’

स्टॉकहोम वॉटर प्राइज से सम्मानित राजेंद्र सिंह ने आईएएनएस से फोन पर चर्चा के दौरान कहा, “वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में जब केंद्र में नई सरकार आई थी, तो इस बात की आस बंधी थी कि गंगा नदी का रूप व स्वरूप बदलेगा, क्योंकि प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी ने कहा था- ‘गंगा मां ने मुझे बुलाया है।’ उनकी इस बात पर प्रो. जी.डी. गुप्ता, नदी प्रेमी और संत समाज शांत होकर बैठ गया था, बीते पौने चार साल के कार्यकाल को देखें तो पता चलता है कि केंद्र सरकार ने अपने उन वादों को ही भुला दिया है, जो चुनाव के दौरान किए गए थे, अब तो सरकार गंगा माई का नाम ही नहीं लेती।”

Image result for स्टॉकहोम वॉटर प्राइज से सम्मानित राजेंद्र सिंह

Waterman India Rajendra Singh

बीते पौने चार वर्ष तक गंगा प्रेमियों के किसी तरह की आवाज न उठाने के सवाल पर राजेंद्र सिंह ने कहा, “सभी गंगा प्रेमियों को इस बात का भरोसा था कि नई सरकार वही करेगी, जो उसने चुनाव से पहले कहा था। मगर वैसा कुछ नहीं हुआ। तीन साल तक इंतजार किया, अब गंगा प्रेमियों में बेचैनी है, क्योंकि जो वादा किया गया था, उसके ठीक उलट हो रहा है।”

उन्होंने कहा, “गंगा पर बैराज बनाए जा रहे हैं, गंदे नाले मिल रहे हैं, इससे गंगा तो और खत्म होने के कगार पर पहुंच जाएगी। लिहाजा, अब तो वर्तमान सरकार पुरानी सरकार से ज्यादा संवेदनहीन दिखाई देने लगी है।”

‘जलपुरुष’ ने याद दिलाया कि वर्तमान सरकार ने नोटीफिकेशन कर गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया था, मगर गंगा को वैसा सम्मान नहीं मिला, जैसा प्रोटोकॉल के तहत मिलना चाहिए था। गंगा को वही सम्मान दिया जाए, जो राष्ट्रंीय ध्वज को दिया जाता है।

सरकार आखिर गंगा की अविरलता के लिए काम क्यों नहीं कर रही? इस सवाल पर राजेंद्र सिंह ने कहा, “उन्हें लगता है कि गंगा माई की सफाई में कोई कमाई नहीं हो सकती, इसलिए उस काम को किया ही न जाए। ऐसा सरकार से जुड़े लोगों ने सोचा। छोटे-छोटे काम भी अपने दल से जुड़े लोगों को ही दिया गया है।”

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अपनी मांगों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, “रिवर और सीवर को अलग-अलग किया जाए, हिमालय से गंगासागर तक गंगा को साफ किया जाए, गंगा के दोनों ओर की जमीन का संरक्षण हो, न कि विकास के नाम पर उद्योगपतियों को सौंपने की साजिश रची जाए।”

राजेंद्र सिंह का आरोप है, “कुछ पाखंडी गुरुओं ने नदियों की जमीन पर पौधरोपण करने के नाम पर सरकारों से जमीन और पैसे पाने के लिए सहमतिपत्र तैयार किए हैं। यह संकट पुराने संकट से बड़ा है, क्योंकि इसमें किसानी की जमीन बड़े औद्योगिक घरानों को दिलाने का षड्यंत्र नजर आता है। इस षड्यंत्र के बारे में भी गंगा के किसानों को बताना जरूरी है। इस सब संकटों के समाधान के लिए गंगा प्रेमी एक साथ बैठकर चर्चा करने की तैयारी में हैं।”

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‘ऑफिस ऑफ प्रॉफिट’ मामले में AAP के 20 विधायक अयोग्‍य करार, राष्‍ट्रपति ने चुनाव आयोग की सिफारिश को दी मंजूरी

narottam patel
राजनीति3 weeks ago

रूपाणी कैबिनेट में दरार के आसार! नितिन पटेल के समर्थन में उतरे बीजेपी नेता नरोत्‍तम पटेल

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राजनीति2 weeks ago

चारा घोटाला: लालू को साढ़े तीन साल की सजा

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ब्लॉग4 weeks ago

काँग्रेसियों की अग्निपरीक्षा! इन्हें ही एक बार फिर देश को आज़ाद करवाना होगा

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खेल2 weeks ago

केपटाउन टेस्‍ट: गेंदबाजों की मेहनत पर बल्‍लेबाजों ने फेरा पानी, 72 रनों से हारी टीम इंडिया

atal bihari vajpai
ज़रा हटके4 weeks ago

आजीवन क्यों कुंवारे रह गए अटल बिहारी बाजपेयी?

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ओपिनियन4 weeks ago

ज़रा सोचिए कि क्या भारत के 69 फ़ीसदी सेक्युलर ख़ुद को हरामी बताये जाने से ख़ुश होंगे!

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राजनीति3 weeks ago

नितिन पटेल की नाराजगी पर हार्दिक की चुटकी, कहा- ’10 एमएलए लेकर आओ, मनमाफिक पद पाओ’

Modi Manmohan Sonia
ओपिनियन4 weeks ago

2G मामले में ट्रायल कोर्ट के फ़ैसले से सुप्रीम कोर्ट और विपक्ष दोनों ग़लत साबित हुए!

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खेल4 days ago

सेंचुरियन टेस्ट : फिर नहीं चले भारतीय बल्लेबाज, मैच व सीरीज गंवाई

Modi Yogi DMRC
ब्लॉग4 weeks ago

मोदी-योगी ने साबित किया कि जो शिष्टाचार नहीं जानते वो सियासी अदब क्या जानें!

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मनोरंजन1 day ago

‘पैडमैन’ ने इस फिल्म की वजह से बदली रिलीज डेट

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मनोरंजन3 days ago

बिग बॅास के इन कंटेस्टेंट ने सपना चौधरी के गाने पर जमकर किया डांस, देखें वीडियो

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राजनीति3 days ago

सदन के भीतर ही BJP विधायकों ने निर्दलीय MLA को पीटा, देखें वीडियो

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मनोरंजन3 days ago

तापसी पन्नू की फिल्म ‘दिल जंगली’ का ट्रेलर रिलीज…

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राष्ट्रीय4 days ago

सुखोई-30 लड़ाकू विमान में उड़ान भरने वाली देश की पहली महिला रक्षा मंत्री बनीं निर्मला सीतारमण

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शहर4 days ago

बीजेपी नेता ने अधिकारी को जड़ा थप्पड़, देखें वीडियो…

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राजनीति5 days ago

शिवराज सिंह ने किसको जड़ा थप्पड़? देखें वीडियो…

अंतरराष्ट्रीय1 week ago

PoK में पाक सरकार के खिलाफ प्रदर्शन, सड़कों पर उतरे व्यापारी

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राष्ट्रीय1 week ago

पहली बार SC के जज आए सामने, कहा- ‘हम नहीं बोले तो लोकतंत्र खत्म हो जाएगा’

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राजनीति1 week ago

नौसेना पर बरसे गडकरी, कहा- ‘दक्षिणी मुंबई में नहीं दूंगा एक इंच जमीन’

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