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‘ग़रीब कल्याण रोज़गार’ के तमाशे के पीछे अभी तो बस बिहार चुनाव ही है

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गरीब-कल्याण-रोजगार-योजना

मेरा 30 साल का सारा पत्रकारीय अनुभव और कौशल ये पता नहीं लगा पाया कि बिहार और बंगाल की चुनावी बेला को ध्यान में रखकर घोषित हुआ केन्द्र सरकार का चमत्कारी ‘ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान’ वास्तव में ज़मीन पर कब से और कितना चमत्कार दिखा पाएगा? कोरोना की मार खाकर बदहवासी के साथ अपने गाँवों को लौटे कितने स्किल्ड (हुनरमन्द) प्रवासी मज़दूरों को, कितने दिनों का, कितनी आमदनी वाला और कैसा रोज़गार देकर उनका उद्धार करके उन्हें और उनके गाँवों को ख़ुशहाल बना पाएगा?

कृपया मेरी इस वेदना पर यक़ीन करें कि 30 साल के अपने पत्रकारीय जीवन में मैंने कभी किसी एक ख़बर का ब्यौरा जानने के लिए इतनी मगज़मारी या इतनी मेहनत नहीं की, जितना बीते चार दिनों में की। जब से वित्तमंत्री ने इस अभियान का एलान किया, और इसके शुभारम्भ के लिए बिहार के खगड़िया ज़िले को चुना गया, तभी से मैं इस सरकारी योजना का पूरा ब्यौरा जानने के लिए बेताब था। क्योंकि तमाम सरकारी शोर-शराबे और डुगडुगी बजाकर मुनादी करवाने वाले चिरपरिचित अन्दाज़ के साथ शुरू हुई 50,000 करोड़ रुपये के अभियान का वास्ता जिस ‘ग़रीब’, ‘कल्याण’ और ‘रोज़गार’ से है, वहीं तीनों मिलकर ही को असली ‘भारत’ बनाते हैं।

लिहाज़ा, ‘इंडिया’ वाली कोरोना और भारत-चीन सीमा विवाद के सच-झूठ पर नज़र रखते हुए मैं ‘ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान’ की बारीकियाँ जानने में भी जुटा रहा। केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के कुछेक आला अफ़सरों से भी सम्पर्क किया, लेकिन सरकारी प्रेस विज्ञप्तियों, ट्वीटर-फ़ेसबुक के ढकोसलों और पॉवर प्लाइंट प्रेज़ेंटेशन वाले ऑडियो-वीडियो भाषणबाज़ी के सिवाय और कुछ भी हाथ नहीं लगा।

दरअसल, किसी भी सरकारी योजना को तमाम बन्दिशों से गुज़रना पड़ता है। जैसे, यदि सरकार एक बाँध बनाना चाहे तो महज इसका एलान होने या बजट आबंटन होने या शिलान्यास होने से काम शुरू नहीं हो जाता। ज़मीन पर काम शुरू होने की प्रक्रिया ख़ासी लम्बी और जटिल होती है। मसलन, बाँध कहाँ बनेगा, वहाँ का नक्शा बनाने के लिए सर्वे होगा, सर्वे से विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) बनेगी, फिर तरह-तरह के टेंडर होंगे और टेंडर अवार्ड होने के बाद बाँध के निर्माण का काम शुरू होगा। इसके साथ ही ये पता लगाया जाएगा कि बाँध में कितना इलाका डूबेगा, वहाँ के लोगों का पुर्नवास कहाँ और कैसे होगा, इसकी लागत और अन्य झंझट क्या-क्या होंगे? इसके बाद भी सारा मामला इतना जटिल होता है कि दस साल की परियोजना, अनुमानित लागत के मुकाबले पाँच गुना ज़्यादा वास्तविक लागत से तीस साल में तैयार हो पाती है।

इसी तरह ये जानना भी ज़रूरी है कि सरकार 50,000 करोड़ रुपये की जिस ‘ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान’ की बात कर रही है, उसके विभिन्न आयाम क्या-क्या हैं? क्योंकि अभी तक सरकार ने इस अभियान को ‘गड्ढे खोलने वाली’ मनरेगा से अलग बताया है। मनरेगा में 202 रुपये मज़दूरी और साल के 365 दिनों में से कम से कम 100 दिन काम की गारंटी की बातें हैं। अब चूँकि कोरोना की वजह से शहरों से गाँवों को लौटे प्रवासी मज़दूरों की ‘स्किल मैपिंग’ करवाने की बातें भी हुई हैं तो क्या अलग-अलग स्किल के हिसाब से लोगों को अलग-अलग मज़दूरी भी मिल जाएगी? इस सवाल का कहीं कोई ब्यौरा नहीं है।

इसी तरह, ‘ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान’ को लेकर फ़िलहाल, इतना ही बताया गया है कि इसे प्रवासी मज़दूरों की सहायता के लिए देश के 733 में से 116 ज़िलों में 125 दिनों तक मिशन मोड में चलाया जाएगा। ये ज़िले 6 राज्यों – बिहार (32), उत्तर प्रदेश (31), मध्य प्रदेश (24), राजस्थान (22), ओडिशा (4) और झारखंड (3) के हैं। इनमें से बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश तो ऐसे हैं जिन्हें 1980 में बीमारू राज्य का ख़िताब मिला था। बीते 40 वर्षों में इन बीमारू राज्यों ने विकास के एक से बढ़कर एक अद्भुत ध्वजवाहकों की सरकारें देखीं, लेकिन कोई भी अपने राज्य को बीमारू के कलंक से उबार नहीं सका। उल्टा जिन आधारों पर ये बीमारू बताये गये थे, उसके मुताबिक इनसे अलग हुए झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड भी बीमारू राज्यों की श्रेणी में ही जा पहुँचे।

अगली ज्ञात जानकारी है कि ‘ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान’ को 12 विभिन्न मंत्रालयों का साझा कार्यक्रम बनाया जाएगा। इनके नाम हैं – ग्रामीण विकास, पंचायती राज, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग, खान, पेयजल और स्वच्छता, पर्यावरण, रेलवे, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस, नयी और नवीकरणीय ऊर्जा, सीमा सड़क, दूरसंचार और कृषि मंत्रालय। इन सभी की अफ़सरशाही के बीच समन्वय की ज़िम्मेदारी ग्रामीण विकास मंत्रालय की होगी। अभियान के तहत कम्युनिटी सैनिटाइजेशन कॉम्पलेक्स, ग्राम पंचायत भवन, वित्त आयोग के फंड के तहत आने वाले काम, नेशनल हाइवे वर्क्स, जल संरक्षण और सिंचाई, कुएँ की खुदाई, वृक्षारोपण, हॉर्टिकल्चर, आंगनवाड़ी केन्द्र, प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण), प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, रेलवे, श्यामा प्रसाद मुखर्जी RURBAN मिशन, PMKUSUM, भारत नेट के फाइबर ऑप्टिक बिछाने, जल जीवन मिशन आदि 25 स्कीम्स में काम कराये जाएँगे।

लेकिन अभी कोई नहीं जानता कि इन दर्जन भर मंत्रालयों को अपनी-अपनी योजनाओं के लिए ‘स्किल्ड प्रवासी मज़दूर’ क्या ग्रामीण विकास मंत्रालय सुलभ करवाएगा या फिर उनके बजट को लेकर उन्हें सिर्फ़ वाहवाही देने की कोई ख़ुफ़िया रणनीति है? हालाँकि, जितनी जानकारी अभी तक सामने आयी है, उसके आधार पर इसे ‘अच्छे दिन’ की एक और उपलब्धि बताना जल्दबाज़ी होगी। लेकिन ये मानने का भी कोई आधार तो हो ही नहीं सकता कि सरकारी अमला इस अभियान को ज़मीन पर उतारने में महीनों से पहले कामयाब हो जाएगा। ध्यान रहे कि सरकार का पहिया बहुत भारी होता है और काफ़ी मुश्किल से घूम पाता है।

अब ज़रा 50,000 करोड़ रुपये की भारी भरकम रकम की महिमा को भी खंगाल लिया जाए। एक मोटा अनुमान है कि किसी भी सरकारी निर्माण पर क़रीब आधी रकम मज़दूरी पर खर्च होती है। इसका मतलब ये हुआ कि ‘ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान’ के तहत ताज़ा एलान में मज़दूरी का हिस्सा क़रीब 25,000 करोड़ रुपये होगा। इसे यदि 125 से विभाजित करें तो रोज़ाना का 200 करोड़ रुपये बैठेगा। इसे 116 ख़ुशनसीब ज़िलों से विभाजित करें तो हरेक ज़िले के हिस्से में रोज़ाना के 1.72 करोड़ रुपये आएँगे। अब यदि हम ये मान लें कि स्किल्ड प्रवासी मज़दूरों को मनरेगा के मज़दूरों के मुकाबले डेढ गुना वेतन भी मिला तो इसका औसत रोज़ाना 300 रुपये बैठेगा। इस 300 रुपये से यदि 1.72 करोड़ रुपये को विभाजित करें तो हम पाएँगे कि 125 दिनों में हरेक लाभान्वित ज़िले में 57,471 प्रवासी मज़दूरों की ही किस्मत सँवर पाएँगी।

अलबत्ता, यदि मज़दूरी 300 रुपये से ज़्यादा हुई तो मज़दूरों की संख्या उसी अनुपात में घटती जाएगी। अब ज़रा सोचिए कि इस अभियान से उन एक करोड़ से ज़्यादा प्रवासी मज़दूरों में से कितनों का पेट भरेगा, जिन्हें रेलवे की श्रमिक स्पेशल ट्रेनों के ज़रिये शहरों से उनके गाँवों को भेजा गया है। यहाँ उन अभागे प्रवासी मज़दूरों का तो कोई हिसाब ही नहीं है जो चिलचिलाती धूप में सैकड़ों किलोमीटर लम्बी सड़कों को पैदल नापकर या रेल की पटरियों पर चलकर अपने गाँवों को पहुँचे हैं।

ज़रा तस्वीर का दूसरा पहलू भी देखिए कि वित्त मंत्रालय ने 2016 के आर्थिक सर्वेक्षण में बताया था कि देश में कुल कामगार 48 करोड़ से ज़्यादा हैं और हरेक तीसरा कामगार प्रवासी मज़दूर है। यानी, प्रवासी मज़दूरों की संख्या 16 करोड़ बैठी। हालाँकि, महीने भर पहले जब वित्त मंत्री ने 21 लाख करोड़ रुपये के पैकेज़ का ब्यौरा दिया तो उन्होंने प्रवासी मज़दूरों की संख्या को 8 करोड़ मानते हुए उन्हें तीन महीने तक 5 किलो चावल या गेहूँ मुफ़्त देने के बजट का वास्ता दिया था। साफ़ है कि ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान के असली लाभार्थियों की संख्या जितनी बड़ी है, उसके लिए 50,000 करोड़ रुपये और 12 मंत्रालयों की सारी क़वायद ऊँट के मुँह में जीरा ही साबित होगी।

फ़िलहाल, इतना ज़रूर है कि अक्टूबर-नवम्बर में होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव से पहले सत्ता पक्ष इस अभियान को लेकर ख़ूब ढोल पीटता रहेगा। 25 अक्टूबर को बिहार में दुर्गापूजा की धूम रहेगी, फिर 14 नवम्बर को दिवाली और 20 नवम्बर को छठ पूजा की। बिहार की मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल 29 नवम्बर तक है। इससे पहले जनादेश आ ही जाएगा। और हाँ, ‘ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान’ की 125 दिनों की मियाद 26 अक्टूबर को ख़त्म हो जाएगी। हालाँकि, सरकार का कहना है कि वो इस अभियान को आगे भी जारी रख सकती है। लेकिन बात कैसे और कब आगे बढ़ेगी? इसे जानने के लिए तो इन्तज़ार करना ही होगा।

तब तक यदि प्रवासी मज़दूरों के सामने भूखों मरने की नौबत आ गयी तो सरकार का वैसे ही कोई दोष नहीं होगा, जैसे कोरोना संक्रमितों की संख्या का रोज़ाना अपना ही रिकॉर्ड तोड़ने का सिलसिला जारी है। या फिर, जैसे विकास का सारा बोझ अपने कन्धों पर उठाये पेट्रोल-डीज़ल के दाम रोज़ाना नये रिकार्ड बनाने में जुटे हुए हैं। या फिर, लद्दाख में भारत-चीन सीमा पर बग़ैर किसी घुसपैठ के बावजूद भारतीय सैनिक ख़ुद को शहीद करने पर आमादा रहे हैं, वायुसेना के लड़ाकू विमानों की अग्रिम अड्डों पर तैनाती और ‘फ़्लाई पास्ट’ हो रहा है तथा शान्ति का नारा लगा रहे चीनी सेना के जबाब में हमारी थल सेना भारतीय इलाके में मज़मा लगाकर और तालियाँ बजाकर उनका अभिनन्दन कर रही है। ज़ाहिर है, 130 करोड़ भारतीयों में से जितने भी ‘नासमझ’ हैं वो ‘झुकने और बिकने’ का मतलब तो बहुत अच्छी तरह से समझ चुके हैं!

Mukesh Kumar Singh मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

ब्लॉग

मध्य प्रदेश: आतंकवादी और नक्सली बनने की ली शपथ

उनका आरोप था कि नगरपालिका द्वारा आवंटित दुकानों का प्रतिमाह किराया दिये जाने के बावजूद कार्रवाई की गई और न्यायालय में विचाराधीन मामलों को लेकर भी संज्ञान नहीं लिया गया न ही उचित माध्यम से सूचना दी गई।

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मध्यप्रदेश के खरगोन जिले के भीकनगांव में अतिक्रमण मुहिम से आक्रोशित लोगों द्वारा आतंकवादी और नक्सलवादी बनने की शपथ लिए जाने को लेकर 12 लोगों के खिलाफ प्रतिबंधात्मक कार्रवाई की गई है।

भीकनगांव के अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) ओम नारायण सिंह बड़कुल ने बताया कि सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो के परीक्षण के उपरांत 12 लोगों के खिलाफ तहसीलदार द्वारा प्रतिबंधात्मक कार्यवाही का नोटिस जारी किया गया है। उन्होंने बताया कि इस वीडियो में पुष्टि हुई है कि इन लोगों ने अतिक्रमण मुहिम के विरोध में आतंकवादी व नक्सलवादी बनने की सार्वजनिक शपथ ली है। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक कार्रवाई की प्रतिक्रिया स्वरूप इस तरह का कृत्य स्पष्ट रूप से विधि विरुद्ध है।

भीकनगांव कस्बे में 6 जनवरी को विभिन्न वार्डों में अतिक्रमण हटाए जाने की कार्रवाई से आक्रोशित प्रभावितों ने उनके रोजगार समाप्त हो जाने का हवाला देते हुए सार्वजनिक रूप से आतंकवादी तथा नक्सलवादी बन जाने की शपथ ले ली थी। उन्होंने इसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया था।

उनका आरोप था कि नगरपालिका द्वारा आवंटित दुकानों का प्रतिमाह किराया दिये जाने के बावजूद कार्रवाई की गई और न्यायालय में विचाराधीन मामलों को लेकर भी संज्ञान नहीं लिया गया न ही उचित माध्यम से सूचना दी गई। दूसरी ओर प्रशासन ने उनके आरोपों से नकारते हुए स्पष्ट किया था कि अतिक्रमण के विरुद्ध सम्बन्धितों को आवश्यक सूचना देने के उपरांत ही समस्त कार्रवाई संपादित की गई थी।

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अंतरराष्ट्रीय

चीन ने कैसे कोविड-19 महामारी पर काबू पाया

महामारी के दौरान वुहान में ठहरे फ्रांसीसी चिकित्सक फिलिप क्लेन ने कहा कि चीन सरकार ने महामारी की रोकथाम में चौंकाने वाला प्रयास किया है, और चीनी लोगों ने भी इसमें बड़ा योगदान दिया है।

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बीजिंग, 9 जनवरी । वर्ष 2021 की शुरूआत में चीन के वुहान शहर के वाणिज्यिक सड़क पर लोगों की भीड़ नजर आती है। वुहान वासी मास्क पहने हुए परिजनों और दोस्तों के साथ खुशी से शॉपिंग करते दिखाई देते हैं। लेकिन एक साल पहले वुहान में कोविड-19 महामारी की वजह से 76 दिनों तक लॉकडॉउन लगा रहा, और सारी सड़कें सुनसान दिखाई देती थीं।

सिर्फ कुछ महीनों में चीन ने महामारी पर काबू पाया, और आम लोगों का जीवन सामान्य हो गया। रूसी लड़की अन्ना ने कहा कि कुल 1.7 लाख चिकित्सकों ने वुहान में महामारी की रोकथाम का प्रयास किया, और चिकित्सा उपकरणों की कुल लागत 1 अरब युआन से अधिक रही। हर गंभीर मरीजों के इलाज में कम से कम 1 लाख युआन का खर्च आया है। पिछले साल मार्च के मध्य तक महामारी की रोकथाम में चीन ने 1 खरब 16 अरब 90 करोड़ युआन खर्च किया, जो दुनिया में सबसे अधिक है। महामारी फैलने के बाद लगभग सभी देशों ने आर्थिक विकास पर ध्यान दिया, सिर्फ चीन ने अपना पूरा ध्यान जनता की जान पर केंद्रित किया।

पिछले 10 मार्च को चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने वुहान का दौरा किया। उन्होंने सामुदायिक क्षेत्र जाकर स्थानीय लोगों का हालचाल जाना और महामारी की रोकथाम व लोगों के जीवन की स्थिति का जायजा लिया।

महामारी के दौरान वुहान में ठहरे फ्रांसीसी चिकित्सक फिलिप क्लेन ने कहा कि चीन सरकार ने महामारी की रोकथाम में चौंकाने वाला प्रयास किया है, और चीनी लोगों ने भी इसमें बड़ा योगदान दिया है।

वहीं, अमेरिका के कुह्न् फाउंडेशन के अध्यक्ष रॉबर्ट लॉरेंस कुह्न् ने कहा कि चीन सरकार की संगठनात्मक क्षमता अद्भुत है। कोई अन्य देश ऐसा नहीं कर सकता है। चीन में इतनी जल्दी महामारी की रोकथाम में विजय पाने का कारण चीनी कम्यनिस्ट पार्टी का नेतृत्व है।

(साभार—-चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)

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Mirza Ghalib: मिर्जा गालिब के वो जबरदस्त शेर जो अमर हैं

गालिब की मां शिक्षित थीं उन्होंने गालिब को घर पर ही शिक्षा दी जिसकी वजह से उन्हें नियमित शिक्षा कुछ ज़्यादा नहीं मिल सकी। गालिब ने आगरा के पास उस समय के प्रतिष्ठित विद्वान ‘मौलवी मोहम्मद मोवज्जम’ से फारसी की प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त की।

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Mirza Ghalib

वह कुछ दिन लाहौर रहे, फिर दिल्ली चले आए। क़ौकान बेग के चार बेटे और तीन बेटियां थीं। इतिहास के पन्ने पलटें तो उनके बेटों में अब्दुल्लाबेग और नसरुल्लाबेगका वर्णन मिलता है। गालिब अब्दुल्लाबेग के ही पुत्र थे। जब गालिब पांच साल के थे, तभी पिता का देहांत हो गया। पिता के बाद चाचा नसरुल्ला बेग खां ने गालिब का पालन-पोषण किया। नसरुल्ला बेग खां मराठों की ओर से आगरा के सूबेदार थे।

गालिब की मां शिक्षित थीं उन्होंने गालिब को घर पर ही शिक्षा दी जिसकी वजह से उन्हें नियमित शिक्षा कुछ ज़्यादा नहीं मिल सकी। गालिब ने आगरा के पास उस समय के प्रतिष्ठित विद्वान ‘मौलवी मोहम्मद मोवज्जम’ से फारसी की प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त की। ज्योतिष, तर्क, दर्शन, संगीत एवं रहस्यवाद इत्यादि से इनका कुछ न कुछ परिचय होता गया। गालिब की कम ही समय में फारसी में गजलें भी लिखने लगें थे। आज हम आपको उनके कुछ मशहूर शेर पढ़ाएंगे।

-हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है

-मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले

-हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

-उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

-ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता

-रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

-इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना

-न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता

-रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज
मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गईं

-आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक

-बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना

-हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़-ए-बयाँ और

-रेख़्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो ‘ग़ालिब’
कहते हैं अगले ज़माने में कोई ‘मीर’ भी था

-बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे

-काबा किस मुँह से जाओगे ‘ग़ालिब’
शर्म तुम को मगर नहीं आती

-दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ
मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ

-कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर-ए-नीम-कश को
ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता

-क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हाँ
रंग लावेगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन

-कहाँ मय-ख़ाने का दरवाज़ा ‘ग़ालिब’ और कहाँ वाइज़
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले

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