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राजनीति

भाजपा डूबता जहाज : तारिक अनवर

“उन्हें गांधी-नेहरू परिवार पर हमले करने के बदले देश के हालात सुधारने पर ध्यान देना चाहिए। मोदी का अधिकांश भाषण कांग्रेस ने 60 सालों में क्या गलत किया और क्या कुछ नहीं किया, इसपर होता है।”

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NCP leader Tariq Anwar

नई दिल्ली, 20 जुलाई | राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के नेता और सांसद तारिक अनवर ने शुक्रवार को भाजपा को डूबता जहाज बताया और कहा कि अब कोई इस जहाज पर सवार होने को तैयार नहीं है।

अनवर ने लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव के समर्थन में कहा कि यदि मौजूदा हालात, जैसा कि भाजपा कहती है, राम राज्य है, तो उन्हें आश्चर्य है कि फिर रावण राज क्या होगा।

उन्होंने कहा, “सरकार सबका साथ, सबका विकास के नारे के साथ सरकार में आई थी, लेकिन आज सरकार किसी के साथ नहीं है, और विकास गायब है।”

उन्होंने कहा, “भाजपा सरकार के पिछले चार वर्षो में बेरोजगारी बढ़ी है, किसान नाराज हैं, महिलाएं असुरक्षित हैं और अल्पसंख्यक और कमजोर वर्ग भयभीत हैं। पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ रही हैं। सरकार अच्छी विदेश नीति बनाने में भी विफल रही है।”

बिहार के कटिहार से सांसद अनवर ने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने पिछले चार सालों में अधिकांश समय गांधी-नेहरू परिवार पर हमले करने में बिताया। सरकार राजनीतिक लाभ के लिए जांच एजेंसियों का इस्तेमाल कर रही है।

उन्होंने कहा, “उन्हें गांधी-नेहरू परिवार पर हमले करने के बदले देश के हालात सुधारने पर ध्यान देना चाहिए। मोदी का अधिकांश भाषण कांग्रेस ने 60 सालों में क्या गलत किया और क्या कुछ नहीं किया, इसपर होता है।”

तारिक ने गृहमंत्री राजनाथ सिंह की मॉब लिंचिंग पर की गई टिप्पणी पर कहा, “उनके स्पष्टीकरण से लगता है कि वह इसके मूक समर्थक हैं। यदि यह सरकार इस मुद्दे को लेकर गंभीर होती तो लिंचिंग के कारण 200 मौतें नहीं होती।”

उन्होंने कहा, “भाजपा नेतृत्व सिर्फ दो लोगों तक सीमित है। यही कारण है कि जिन्होंने भाजपा का समर्थन किया था, वे कहीं नहीं दिखते।” उन्होंने कहा कि जो तेलुगू देशम पार्टी कभी भाजपा का समर्थक थी, उसने अपने अलग रास्ते अपना लिए हैं।

उन्होंने कहा, “शिव सेना भी उनके साथ नहीं है। बिहार के मुख्यमंत्री और जद (यू) के अध्यक्ष नीतीश कुमार भी अपना रंग दिखाते रहते हैं।”

–आईएएनएस

ब्लॉग

अटल जी ने कुछ बहुत अच्छा दिया तो कुछ बहुत ख़राब भी!

आज़ादी से पहले जहाँ वो अँग्रेज़ों की मुख़बिरी करने और उनका वादा-माफ़ गवाह बनने की ख़ता कर चुके थे। वहीं आज़ादी के बाद उन्होंने अपने लड़कपन की उन ग़लतियों को दुरुस्त किया। उन्होंने हमेशा अपने विरोधियों पर व्यक्तिगत हमलों से परहेज़ किया।

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Atal Bihar Vajpaeee

अटल बिहारी वाजपेयी नहीं रहे! कई वर्षों से अपनी नश्वर काया ढो रहे थे। गिरती सेहत उन्हें 2009 में राजनीति से दूर ले गयी। अपनी विनम्रता की वजह से महाप्रयाण के बाद उन्हें करोड़ों लोगों की श्रद्धा मिल रही है। वो इसके सच्चे हक़दार भी हैं। अटल जी, गाँधी-नेहरू युग के नेता थे। इन महान हस्तियों के व्यक्तित्व की छाप हमेशा उन पर दिखायी दी। वो महात्मा गाँधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे के ख़ानदान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से सम्बद्ध अवश्य थे, लेकिन उन्होंने हमेशा अपनी उदार, प्रगतिशील और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति आस्थावान नेता की छवि को बनाये रखा। वो दशकों तक उस कट्टर और साम्प्रदायिक संगठन में शीर्ष पर भी रहे, जहाँ वो अक्सर अटपटे भी लगते थे।

अटल जी की सबसे बड़ी उपलब्धि ये रही कि उन्होंने भारत को गठबन्धन की राजनीति को सफल बनाने का गुरुमंत्र दिया। इस हुनर को उन्होंने अपनी विफलताओं से ही निखारा था। संघी होने के बावजूद अटल जी प्रगतिशील और प्रयोगधर्मी थे। प्रयोगधर्मिता ने ही उन्हें विनम्र और शालीन बनाया था। इससे वो अपने क़रीब आने वालों के लिए सहज सुलभ हो पाते थे। इसी वजह से लाखों लोगों के पास अटल जी से जुड़े सुहाने संस्मरण हैं। किसी जन-नायक की यही सबसे बड़ी पूँजी है। 93 वर्ष की परिपूर्ण आयु के साथ विदा लेने पर जनमानस में पसरा अफ़सोस भी उसी पूँजी की वजह से है। उसी पूँजी के लाभांश की वजह से आज भारत के करोड़ों लोगों आँखें डबडबायी हुई हैं।

आज़ादी के बाद अटल जी के व्यक्ति ने बड़ी करवट ली। आज़ादी से पहले जहाँ वो अँग्रेज़ों की मुख़बिरी करने और उनका वादा-माफ़ गवाह बनने की ख़ता कर चुके थे। वहीं आज़ादी के बाद उन्होंने अपने लड़कपन की उन ग़लतियों को दुरुस्त किया। उन्होंने हमेशा अपने विरोधियों पर व्यक्तिगत हमलों से परहेज़ किया। सरकार की नीतियों की ज़ोरदार आलोचना ही उनका हथियार था। कालान्तर में इसी सिलसिले ने अटल जी के व्यक्तित्व में लोकतांत्रिक उदारवाद को स्थापित किया।

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अटल जी के प्रधानमंत्रित्व काल में मैंने प्रधानमंत्री कार्यालय, संसद, बीजेपी और संघ की बीट पर टीवी चैनल्स के लिए ख़ूब रिपोर्टिंग की। इसी वजह से सैकड़ों बार अटल जी को क़रीब से देखने और उनसे सवाल पूछने के अवसर मिले। प्रधानमंत्री निवास के समारोहों में सैंकड़ों बार शिरकत करने का मौका मिला। हरेक मौसम में हज़ारों घंटे 7 रेसकोर्स पर बने मीडिया स्टैंड पर बिताये। सैकड़ों बार वहाँ से घंटों-घंटों की लाइव रिपोर्टिंग भी की। उस दौर में स्तरीय पत्रकारिता पर कोई अंकुश नहीं था। सम्पादक भी सच्ची और तेज़ ख़बर के मुरीद होते थे। उस दौर का रोमांच ही निराला था! इसमें अटल जी जैसे उदार राजनेता और पत्रकारों के प्रति सहृदय व्यवहार रखने वाली शख़्सियत का सबसे बड़ा योगदान था।

विरोधियों की नज़र में आदर योग्य बनना किसी भी राजनेता का सबसे बड़ी उपलब्धि होती है। अटल जी के सन्तुलित व्यक्तित्व की वजह से ही विरोधी भी उनका आदर करते थे। वो उस नस्ल के नेता थे, जो अपशब्दों के बग़ैर कड़े प्रहार करना जानते थे। इस लिहाज़ से अटल जी को जवाहर लाल नेहरू, राम मनोहर लोहिया, मधु दंडवते और सोमनाथ चटर्जी जैसे नायकों की श्रेणी में रखा जा सकता है। ज़िन्दगी भर संघ जैसे पुरातनपन्थी और हिन्दुत्ववादी घराने में रहने के बावजूद अटल जी मानवीय मूल्यों के संरक्षक थे। नागरिकों के मूल अधिकारों के समर्थक थे। हालाँकि, इसी मोर्चे पर उन्हें सबसे ज़्यादा आघात भी लगे। लेकिन आलोचकों ने हमेशा इसके लिए उन्हें कम और उनकी संगत को ज़्यादा कसूरवार माना।

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In Pic : Chandrashekhar, Atal Bihari Vajpayee and PV Narsimha Rao

प्रधानमंत्री बनने के बाद अटल जी ने कई ऐतिहासिक फ़ैसले लिये। पोखरण-2 की वजह से भारत पर आर्थिक प्रतिबन्ध लगा। तब अपनी और वित्त मंत्री यशवन्त सिन्हा की सूझ-बूझ से अटल जी झंझावात को बख़ूबी पार किया। नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह की विरासत वाली अर्थनीति में उन्होंने सुधारों को आगे बढ़ाया। बाल्को, माडर्न ब्रेड और आईटीडीसी जैसे विनिवेश के फ़ैसले ख़ासे विवादित हुए। लेकिन प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, नैशनल हाईवे प्रोजेक्ट से अटल जी का प्रशासनिक और राजनीतिक कौशल साफ़ नज़र आया। लेकिन कारगिल युद्ध, आतंकवादियों को कन्धार पहुँचाना और तलहका कांड में बीजेपी अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण और एनडीए के संयोजक जॉर्ज फर्नांडिस का लपेटे में आना भी अटल-युग का स्याह पक्ष बना।

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Narendra Modi with Atal Bihari Vajpayee

कश्मीर के मोर्चे पर अटल-नीति सफल नहीं हुई। लेकिन 2002 में साफ़-सुथरे चुनाव करवाने से भारत सरकार की प्रतिष्ठा में काफ़ी इज़ाफ़ा हुआ। उसी साल अटल जी की राजनीतिक कमज़ोरी भी दिखायी दी। गुजरात बीजेपी में गुटबाज़ी और भ्रष्टाचार से ऐसी उथल-पुथल मची कि नहीं चाहते हुए भी अटल जी को गुजरात की क़मान नरेन्द्र मोदी जैसे नीयतख़ोर कार्यकर्ता के हवाले करनी पड़ी। मोदी ने झूठ, दुष्प्रचार, नफ़रत और धार्मिक कट्टरवाद को हवा दी और तरह-तरह की साज़िशें रची गयीं। नतीज़तन, गोधरा और गुजरात का कलंक भी अटल जी के मत्थे ही आया। उन्होंने ‘राजधर्म’ की दुहाई दी, लेकिन मोदी को हासिल संघ की खुली शह के आगे उसे अनसुना कर दिया गया। कालान्तर में चुनावी जीत की आड़े में मोदी के पापों पर लगातार पर्दा पड़ता चला गया।

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लेकिन अटल जी को गुजरात दंगों की भारी क़ीमत चुकानी पड़ी। 1992 में बाबरी मस्जिद के ढहाये जाने के बाद ये दूसरा मौका था, जब अटल जी को अपनी उदार छवि की वजह से उस बीजेपी और संघ में मुँह की खानी पड़ी, जिसके वो ख़ुद एक कारिन्दा या स्वयंसेवक थे। संघ ने उनकी नरम छवि को भी जमकर भुनाया। 2002 के गुजरात दंगों की कालिख ने जहाँ 2004 में अटल जी को सत्ता से बेदख़ल कर दिया, वहीं चुनाव हारते ही संघ ने अटल जी के प्रति बेरुखी दिखानी शुरू कर दी। तब शायद, वक़्त का निर्मम पहिया अटल जी से जनसंघ के पहले अध्यक्ष बलराज मधोक के साथ जो गुज़री, उसका हिसाब ले रहा था।

2004 की हार से आहत अटल बिहारी वाजपेयी जून 2004 में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी से पहले मनाली चले गये। वहाँ से उन्होंने दो-टूक बयान दिया कि गुजरात दंगों की वजह से हार हुई है। लिहाज़ा, कार्यकारिणी को नरेन्द्र मोदी पर फ़ैसला करना होगा। अगले दिन इस बयान की सुर्ख़ियाँ बनते ही अहमदाबाद में इशरत जहाँ मार गिरायी गयी। बस, उसी दिन बीजेपी में अटल युग समाप्त हो गया। 2004 में अटल जी लोकसभा पहुँचे, लेकिन विपक्ष के नेता की क़मान लाल कृष्ण आडवाणी को मिल गयी। 2009 में लौह पुरुष आडवाणी जी चुनावों में खेत रहे तो संघ ने उनकी जगह सुषमा स्वराज ने दे दी।

2014 के चुनाव तक तो संघ ने अटल-आडवाणी और सुषमा, तीनों को निपटा दिया। अब इनके जैसी गति ही 2019 में नरेन्द्र मोदी, अमित शाह और अरूण जेटली की भी होगी। इन तीनों का भी वही हश्र होगा जो उन तीनों का हुआ। यहाँ तक कि मोदी की सरकार बनवाने के वक़्त तो संघ ने क़रीब दर्जन भर वरिष्ठ नेताओं को एक झटके में दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंका। संघियों की बुनियादी रवायत है कि अपने कार्यकर्ताओं को इस्तेमाल के बाद नष्ट कर दो। यही बीजेपी के तमाम नेताओं के साथ हुआ है। इन नेताओं ने भी ‘बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से खाय!’ अटल जी में काँटों के बीच फूल की तरह रहने की अद्भुत कला थी। वो इसलिए भी लम्बे अरसे तक याद रखे जाएँगे! उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि!

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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राजनीति

विरोधियों को पूरा सम्मान देते थे अटल बिहारी: अखिलेश

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अखिलेश यादव (फाइल फोटो)

लखनऊ| उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने शुक्रवार को कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का चले जाना एक महान जीवन का अंत है, लेकिन उनके द्वारा दी गई प्रेरणा सदा जीवित रहेगी। वह विचारधारा से असहमति के बावजूद विरोधी नेताओं के प्रति भी सम्मान भाव रखते थे।

उन्होंने कहा, “अटल जी को हमारी भावपूर्ण श्रद्धांजलि! अटल बिहारी वाजपेयी की गिनती देश के शीर्ष नेताओं में की जाती थी। वे ओजस्वी वक्ता और लोकप्रिय कवि थे। उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में भी छाप छोड़ी थी।”

अखिलेश ने कहा कि लोकसभा में उनके भाषणों को बड़े ध्यान से सुना जाता था। उन्हें श्रेष्ठ सांसद के अलावा भारतरत्न से सम्मानित किया गया था। अटल संसदीय राजनीति में छह दशक तक सक्रिय रहे। सामान्य ग्रामीण परिवेश से शिखर तक पहुंचने का उनका संघर्षशील जिंदगी का सफर रहा। उनके निधन से देश ने एक कुशल प्रशासक एवं लोकप्रिय नेता खो दिया है।

उन्होंने कहा कि वे विचारधारा से असहमति के बावजूद विरोधी नेताओं के प्रति भी सम्मान भाव रखते थे। यह उनके व्यक्तित्व का विलक्ष्ण भाव था कि व्यक्तिगत स्तर पर वे किसी के प्रति राग-द्वेष नहीं रखते थे। अटल जी लोकतंत्र की स्वस्थ परंपराओं का निर्वहन करते थे।

–आईएएनएस

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राजनीति

राफेल मुद्दे पर पार्टी प्रदेश अध्यक्षों से मुलाकात करेंगे राहुल

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rahul gandhi
राहुल गांधी (फाइल फोटो)

राफेल मुद्दे पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी आज कांग्रेस पार्टी के नेताओं, महासचिवों और सभी प्रदेश अध्यक्षों से मुलाकात करेंगे।

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