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दर्दनाक त्रासदी, थोथे बयान

जन स्वास्थ्य से जुड़ी सरकारी उदासीनता को मिटाये बग़ैर गोरखपुर जैसे हादसों से बचाव नहीं

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kapil sibbal

गोरखपुर के बाबा राघव दास (बीआरडी) अस्पताल में इन्सेफलाइटिस (दिमाग़ में सूजन) से पीड़ित 70 मासूमों ने ऑक्सीजन की कमी से दम तोड़ दिया। इस हादसे के बाद से ही आपराधिक लापरवाही और जन स्वास्थ्य पर हो रहे खर्च को लेकर बहस छिड़ गयी है। स्वच्छ भारत और टीकाकरण से जुड़े मिशन इन्द्रधनुष जैसे सराहनीय प्रयासों से लगता है कि जन स्वास्थ्य के प्रति देश की संवेदनशीलता में सुधार आ रहा है। हालाँकि, इस लिहाज़ से अभी जश्न मनाना जल्दबाज़ी होगी।

गोरखपुर के अलावा फ़र्रूख़ाबाद में भी 49 बच्चों की मौत की ताज़ा ख़बर हमें आगाह कर रही हैं कि हमारा जन स्वास्थ्य क्षेत्र गम्भीर संकट से गुज़र रहा है। इसने महाशक्ति बनने के लिए बेताब भारत की प्राथमिकताओं पर भी सवालिया निशान लगाये हैं। प्रमुख सरकारी अस्पताल पर 70 लाख रुपये का बकाये का मासूमों के लिए सज़ा-ए-मौत का सबब बन जाना बेहद शर्मनाक है। सरकार की ये सफ़ाई बेहद दुर्भाग्यपूर्ण कि उसे 4 अगस्त तक ऑक्सीजन की किल्लत के बारे में पता तक नहीं था। जबकि ताज़ा मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़, योगी सरकार के मंत्रियों को मार्च से ही बकाये पेमेंट और ऑक्सीजन सप्लाई के ठप होने के ख़तरे का पता था। यहाँ तक कि 9 अगस्त को अस्पताल का दौरा करने वाले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी इसकी सूचना दी गयी थी। लेकिन कोई तात्कालिक क़दम नहीं उठाया गया और उसी रात ऑक्सीजन की सप्लाई कट गयी।

1978 से गोरखपुर और आसपास के इलाकों में इन्सेफ़लाइटिस का प्रकोप लगातार बना हुआ है। ये महामारी अब तक हज़ारों बच्चों को काल के मुँह में ढकेल चुकी है, लेकिन अस्पतालों में पसरी सरकारी उदासीनता अब भी जस की तस है। लिहाज़ा, वक़्त आ गया है कि हम देश के जन स्वास्थ्य ढाँचे में व्यापक फ़ेरबदल करने के लिए आगे बढ़ें और सबसे पहले सरकारी बजट को पर्याप्त बनाएँ। लेकिन ये तभी मुमकिन है, जब सरकार थोथे बयानबाज़ी और उदासीनता से तौबा करे।

1978 से हर साल मॉनसून के दस्तक देने के बाद गोरखपुर के आसपास के ज़िलों के अलावा बिहार और नेपाल के इलाकों में इन्सेफ़लाइटिस का प्रकोप रहता है। गोरखपुर का बीआरडी अस्पताल अकेला ऐसा संस्थान है जहाँ इस बीमारी का इलाज़ हो पाता है। इसके बावजूद, वहाँ पर्याप्त संख्या में डॉक्टर, बिस्तर और वेंटीलेटर्स नहीं हैं। सीएजी की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, बीआरडी अस्पताल में 27 फ़ीसदी क्लीनिकल उपकरणों का अभाव है, वो भी तब जबकि अस्पताल अपने 452.35 करोड़ रुपये के बजट में से सिर्फ़ 426.13 करोड़ रुपये ही खर्च कर पाता है।

इस अस्पताल में पहुँचने वाले ज़्यादातर लोग दूर-दराज़ के गाँवों से आने वाले ग़रीब लोग होते हैं। अक्सर यहाँ मरीज़ गम्भीर हालत में पहुँचते हैं। यहाँ तक कि काफ़ी रोगी तो अस्पताल पहुँचने से पहले रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं। 2013 में एक रिसर्च टीम की सिफ़ारिशों के ग्रामीण इलाकों में रोगियों के त्वरित इलाज़ से लिए कई उपचार केन्द्र खोले गये, लेकिन ये प्रयोग उम्मीद पर खरा नहीं उतरा। यही वजह है कि 40 साल के दौरान हज़ारों बच्चों की मौत और तमाम ढाँचागत ख़ामियों के बावजूद बीआरडी अस्पताल इन्सेफ़लाइटिस जैसी बेहद घातक महामारी के उपचार का प्रमुख केन्द्र बना हुआ है। जन स्वास्थ्य से जुड़ी ये बड़ी चुनौती है।

ग्रामीण स्वास्थ्य से सम्बन्धित 2015 के आँकड़ों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में 37.7 प्रतिशत डॉक्टरों की कमी है। बीआरडी अस्पताल के डॉक्टरों को अच्छी तरह से मालूम था कि अस्पताल में मौजूद ऑक्सीजन का भंडार दस दिन से अधिक नहीं चलेगा। लिहाज़ा, जब सप्लाई रूक गयी तो वैकल्पिक इन्तज़ाम किया जाना चाहिए था। ये सर्वोच्च स्तर की आपराधिक लापरवाही थी।

भारत में ये बीमारी जापानी इन्सेफ़लाइटिस के नाम से जानी जाती है। हालाँकि, ये नाम उस जीवाणु का है जो बक़ौल विश्व स्वास्थ्य संगठन, एईएस (यानी एक्यूट इन्सेफ़लाइटिस सिनोड्रोम) कहलाता है। ये दिमाग़ में गम्भीर सूजन के पैदा होने की दशा है। गोरखपुर अंचल में कई मामलों में जापानी इन्सेफ़लाइटिस विषाणु (वायरस) से संक्रमित नहीं होने के बावजूद मरीज़ में इसके लक्षण दिखते हैं। इस बीमारी के अन्य वायरसों का नाम है वेस्ट नील, डेंगू, चाँदीपुरा और चिकुनगुनिया। इन सभी से एक्यूट इन्सेफ़लाइटिस सिनोड्रोम (एईएस) पैदा होता है। सालों-साल से भारत का ज़ोर जापानी इन्सेफ़लाइटिस के उन्मूलन पर है। अन्य किस्म का इन्सेफ़लाइटिस तो पूरी तरह से उपेक्षित ही है।

नतीज़तन, जापानी इन्सेफ़लाइटिस के पीड़ितों की संख्या में तो कमी आयी है, लेकिन अन्य किस्मों के इन्सेफ़लाइटिस क़हर तो बरक़रार ही है। 2015 में इंडियन मेडिकल काउन्सिल ने 10 हज़ार से ज़्यादा मामलों में से सिर्फ़ 8.4 फ़ीसदी में ही जापानी इन्सेफ़लाइटिस वायरस के निशान पाये थे। विशेषज्ञों के कई दलों ने इस महामारी के रहस्यों का पता लगाने की कोशिश की, लेकिन उनके नतीज़ों में परस्पर विरोध था। इसीलिए अभी तक इस बीमारी के निदान का पुख्ता तरीका विकसित नहीं हो पाया है। यही वजह है कि अभी तक इससे रोकथाम की व्यावहारिक रणनीति भी नहीं बन पायी है। लिहाज़ा, इस पर व्यापक और गहन शोध किये जाने की ज़रूरत है।

पर्याप्त बजट की कमी की वजह से देश में जन स्वास्थ्य से जुड़ी ढाँचागत सुविधाओं की भारी कमी है। इसकी वजह से ग़रीबों को निजी क्षेत्र की ओर भागना पड़ता है, जो उन्हें और ग़रीब तथा कर्ज़दार बना देता है। वक़्त की माँग है कि सकल घरेलू उत्पाद का अधिक हिस्सा जन स्वास्थ्य के क्षेत्र पर ख़र्च हो। वहाँ की सुविधाएँ और गुणवत्ता दोनों में भारी सुधार आना चाहिए। ज़्यादा स्वास्थ्य कर्मियों को प्रशिक्षित और तैनात करने की आवश्यकता है। इसके बाद, ऐसा निगरानी तंत्र भी होना चाहिए जो सबके लिए उम्दा स्वास्थ्य सुविधाएँ सुनिश्चित कर सके।

जब हम विकास के नाम पर सीना ठोंकते हैं, तब ये क्यों भूल जाते हैं कि जनता का विकास होने से ही देश का विकास होता है। जनता को दरकिनार करके देश का विकास नहीं हो सकता। यदि हम ये मान लें कि विकास का मतलब मुट्ठी भर लोगों के लिए बनने वाली गगनचुम्बी इमारतें, उनके पास मौजूद बेशुमार दौलत और चुनिन्दा लोगों की सेहत ही है तो हम किस तरह का राष्ट्रवाद पैदा करेंगे? इसीलिए जब तक हमारी स्वास्थ्य सुविधाएँ लचर रहेंगी, जब तक महज लापरवाही की वजह से लोग मरते रहेंगे, तब तक हमारी राष्ट्रभक्ति खोखली है, थोथी है!

(साभार: The Times of India (Delhi)। लेखक राज्यसभा सदस्य, पूर्व केन्द्रीय मंत्री और वरिष्ठ काँग्रेस नेता हैं।)

ओपिनियन

विपक्षी दलों को साझा उम्मीदवार उतारना चाहिए : सलमान खुर्शीद

राहुल गांधी पार्टी में बदलाव लाएंगे और वह कांग्रेस को नया स्वरूप देंगे।

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Salman Khurshid

वरिष्ठ कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद का कहना है कि विपक्षी दलों को अगले लोकसभा चुनाव में साथ मिलकर सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के खिलाफ प्रत्येक चुनाव क्षेत्र में अपना साझा उम्मीदवार उतारना चाहिए। इसके लिए उनके बीच गठबंधन पर बातचीत पहले शुरू होनी चाहिए, जिससे सभी दलों के कार्यकर्ता आपस में तालमेल बैठा सकें।

सलमान खुर्शीद ने आईएएनएस को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि जाहिर है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के लिए पार्टी की पसंद हैं, लेकिन किसी प्रकार की घोषणा के लिए विपक्षी दलों के साथ गठबंधन की बातचीत के नतीजों का इंतजार करना होगा।

खुर्शीद का मानना है कि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाले राजग के खिलाफ समान विचार वाले विपक्षी दलों को एक साथ लाने के लिए संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की अध्यक्ष सोनिया गांधी सबसे उत्तम व्यक्ति हैं।

खुर्शीद ने कहा, “जहां तक मेरा और हमारी पार्टी की बात है, तो पसंद जाहिर है। लेकिन वृहत सहयोग व गठबंधन की स्थिति में तो यह होना चाहिए कि गठबंधन बनने तक हम प्रतीक्षा करें। लेकिन हमारे लिए बिल्कुल स्पष्ट है कि राहुल गांधी ही वह शख्सियत हैं, जो इस कार्य के लिए उपयुक्त हैं और वह हमारा नेतृत्व करेंगे।”

पूर्व केंद्रीय मंत्री से जब पूछा गया कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ 2019 के आम चुनाव में विपक्ष की ओर से किसी प्रधानमंत्री उम्मीदवार की घोषणा होनी चाहिए, तो उन्होंने कहा कि मोदी की विश्वसनीयता काफी घट गई है।

सलमान खुर्शीद की हाल ही में आई किताब ‘ट्रिपल तलाक : एग्जामिनिंग फेथ’ में उन्होंने तीन तलाक के मसले पर सवाल उठाया है।

उन्होंने कहा, “जहां तक मोदीजी का सवाल है, तो उनकी विश्वसनीयता में काफी कमी आई है, लेकिन मैं यह नहीं कहता कि यह गिरावट अभी पर्याप्त है। गिरावट लगातार जारी है।

राजग के खिलाफ विपक्षी एकता की संभावना के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, “इस समय यह कहना कठिन है, लेकिन अगर गठबंधन नहीं बनता है तो मौका गंवाने का हमें खेद रहेगा।” उन्होंने कहा कि भिन्न-भिन्न स्तरों पर बातचीत चल रही है।

खुर्शीद ने कहा, “सभी दल मान रहे हैं कि भारत के इतिहास के लिए यह बेहद अहम व क्रांतिकारी परिवर्तन का दौर है। मेरा मानना है कि बीती बातों को भुला देना चाहिए। लेकिन इसके लिए अभी कदम उठाने होंगे। कुछ लोगों को धीरे-धीरे ऐसी पहल शुरू कर देनी चाहिए। मैं नहीं बता सकता कि वह शख्सियत कौन होंगे और कौन इस काम को अंजाम देंगे। लेकिन धीरे-धीरे बातचीत चल रही है।”

विपक्षी दलों को एकजुट करने में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अहम भूमिका होने की संभावना के बावत पूछे जाने पर खुर्शीद ने कहा कि वही नहीं, कोई और भी यह काम कर सकता है।

उन्होंने कहा कि राहुल गांधी पार्टी में बदलाव लाएंगे और वह कांग्रेस को नया स्वरूप देंगे।

पूर्व विदेश मंत्री ने माना कि पूर्वोत्तर के प्रांत त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है, लेकिन उन्होंने अन्य राज्यों में होने वाले चुनावों में पार्टी की बेहतर स्थिति रहने की संभावना जताई।

–आईएएनएस

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ओपिनियन

हिंदू चरमपंथियों को परोक्ष रूप से बढ़ावा दे रही है सरकार : रामानुन्नी

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Ramanunney

साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता लेखक के. पी. रामानुन्नी का कहना है कि भाजपानीत केंद्रीय सरकार अप्रत्यक्ष रूप से हिंदू सांप्रदायिक चरमपंथियों के खिलाफ कार्रवाई करने से बच रही है और उन्हें बढ़ावा दे रही है। इस वजह से देश में अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना बढ़ी है।

रामानुन्नी ने आईएएनएस के साथ एक साक्षात्कार में कहा, “(केंद्रीय) सरकार हिंदू सांप्रदायिक चरमपंथियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर रही है। वह इस मुद्दे से बच रही है। यह अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा देने जैसा है।”

उन्होंने कहा, “जब बात अल्पसंख्यकों के खिलाफ अत्याचार की आती है तो वे (सरकार) कानून के तहत सख्त कदम नहीं उठाते हैं। अल्पसंख्यक असुरक्षित हैं।”

मलयालम भाषा के लेखक रामानुन्नी पिछले सप्ताह सुर्खियों में आए थे जब उन्होंने अपनी साहित्य अकदामी पुरस्कार की इनामी राशि लेने के कुछ ही मिनटों बाद उसे जुनैद खान की मां को दे दिया था। 16 वर्षीय जुनैद की जून 2017 में एक ट्रेन के अंदर लोगों के एक समूह ने हत्या कर दी थी।

उन्होंने इनाम राशि में से केवल तीन रुपये अपने पास रखे और बाकी के एक लाख रुपये जुनैद की मां सायरा बेगम को दे दिए थे।

रामानुन्नी ने आईएएनएस से कहा, “सांप्रदायिक घृणा कैंसर की तरह है और जब यह हो जाता है तो इसे रोक पाना बहुत मुश्किल होता है।”

यह पूछने पर कि क्या आपको लगता है कि सांप्रदायिक घटनाएं वर्तमान सरकार के सत्ता में आने के बाद बढ़ गई हैं, उन्होंने कहा, ‘हां।’

उन्होंने कहा, “वर्तमान सरकार के सत्ता में आने के बाद कई सांप्रदायिक मुद्दे उठे हैं। जब मैं सांप्रदायिक कहता हूं तो मेरा दोनों पक्षों से मतलब नहीं होता, यह अधिकतर हिंदू समुदाय के लिए है जो मुस्लिमों के साथ असहिष्णुता बरत रहे हैं।”

उन्होंने कहा कि सरकार इन सांप्रदायिक झगड़ों को समाप्त करने का प्रयास नहीं कर रही और एक दर्शक की तरह बर्ताव कर रही है। उन्होंने कहा कि वर्तमान हालात राष्ट्र के हित के लिए खराब हैं।

रामानुन्नी के साहित्यिक काम सांप्रदायिक सद्धभाव के उनके संदेश के लिए जानें जाते हैं। उनकी किताब ‘दैवाथिंते पुस्तकम’ (ईश्वर की अपनी पुस्तक) के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार 2017 मिला है।

जब उनसे यह पूछा गया कि उन्होंने अपनी इनाम की राशि जुनैद की मां को क्यों दी, तो उन्होंने कहा, “यह दान नहीं है। अगर ऐसा होता तो मैं जुनैद की मां को उनके घर जाकर यह देता। जब आप यह साहित्य अकादमी के मंच पर दे रहे हैं तो इसके कई मायने हैं। यह अन्य लेखकों को अत्याचारों के बारे में लिखने के लिए प्रोत्साहित करेगा और दूसरे हिंदुओं को बताएगा कि असली और सच्चे हिंदू सिद्धांतों के मुताबिक आपको सांप्रदायिक नहीं होना चाहिए।”

उन्होंने कहा कि जुनैद की हत्या इसलिए कर दी गई क्योंकि वह मुस्लिम था और यह सच्ची और असली हिंदू संस्कृति के लिए शर्मनाक है।

रामानुन्नी को जुलाई 2017 में उनका दाहिना हाथ काटने की धमकी मिली थी। उन्होंने कहा कि इस तरह की बातें लेखक के दिमाग को जकड़ देती हैं।

उन्होंने कहा, “बहुत से लोगों ने मुझसे पूछा कि क्या मैं सांप्रदायिक एकता पर लिखना बंद कर दूंगा। मैंने उनसे कहा कि नहीं। यह आत्महत्या करने जैसा होगा। एक लेखक के लिए अपना पक्ष नहीं जाहिर करना आत्महत्या के समान है।”

लेखक ने कहा, “हालांकि यह भी सही है कि आप यह सब कहते तो हैं, लेकिन जब आपको धमकियां मिलती हैं तो कई लोगों का अवचेतन मन उन्हें सब कुछ कहने से रोकता है। यह एक तरह से किसी को परोक्ष रूप से नियंत्रित करना है। धमकियां लोगों में यह डर पैदा करती हैं। यह तथ्य है।”

इंटरनेट के आज के दौर में किताबों के बारे में पूछने पर रामानुन्नी ने कहा कि पढ़ने की गुणवत्ता पिछले कुछ सालों में कम हुई है। उन्होंने कहा कि पढ़ने में लोग अब उस तरह का आनंद नहीं लेते जैसे पहले लिया जाता था। पढ़ने की आदत मरी तो नहीं है लेकिन इसकी गुणवत्ता घटी है।

–आईएएनएस

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श्रीलंका में चीन की उपस्थिति भारत के लिए चिंताजनक!

श्रीलंकाई लोगों के मुंह से अक्सर यह कहते हुए सुना जा सकता है कि वे चीनी उपस्थिति से कितने असंतुष्ट और नाखुश हैं, जो काफी कठोर और अभिमानी हैं।

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70th Independence Day celebrations in Colombo,

मेरी पत्नी और मैं हाल ही में अपने कुछ मित्रों के साथ छुट्टियों के लिए श्रीलंका गए थे। हम दोनों के लिए लगभग 15 वर्षों बाद यह पहली श्रीलंका यात्रा थी, जबकि उससे पहले यह सुंदर द्वीपीय देश हिंसक गृहयुद्ध में जकड़ा था, जिसने अनगिनत जानें लीं और देश की अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया था।

यह वह दौर था जब महिंदा राजपक्षे ने श्रीलंका के राष्ट्रपति के रूप में सत्ता संभाली और तमिल टाइगर्स के सफाए को अपना सबसे प्रमुख उद्देश्य बनाया। 30 महीनों की असहनीय हिंसा के बाद लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम(लिट्टे) के नेता वेलु पिल्लई प्रभाकरन और उसके समर्थकों की मौत के साथ ही 2009 में 26 सालों का गृहयुद्ध समाप्त हो गया।

यह तर्क दिया जाता है कि उस समय बड़े पैमाने पर मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ था और तमिलों के साथ खुले तौर पर भेदभाव किया गया था। यह सच है। लेकिन सच यह भी है कि यह द्वीपीय देश अंत में अशांति, अनिश्चितता और आतंकवाद के दशकों के बाद पहली बार शांति की ओर लौट आया। जिस श्रीलंका का मैं पहले आदी हो गया था, वह अब उससे बिलकुल विपरीत है। उस समय बंदूक लिए सुरक्षा कर्मी हर तरफ घूमते रहते थे। अब यहां शांति है।

भारत के लिए भी गृहयुद्ध और लिट्टे का अंत अच्छी खबर थी। इससे पहले ही लिट्टे को एक आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया गया था, लेकिन तमिलनाडु में प्रभाकरन के साथ कुछ संगठनों का गठबंधन नई दिल्ली के लिए चुनौती बन गया था। दुर्भाग्य से गृहयुद्ध के अंत के साथ इतिहास ने खुद को एक बार फिर दोहराया और भारत ने अपनी स्थिति खराब कर ली और आज हम एक बार फिर चीन की कूटनीति के बीच श्रीलंका को खोने के कगार पर हैं।

श्रीलंका में चीनी उपस्थिति कोई छिपी हुई बात नहीं है। आप उन्हें हर जगह पाएंगे। चीनी ड्रेजिंग (समुद्री पानी को साफ करने वाले) जहाजों को खुले तौर पर काम करते हुए देखा जा सकता है। हंबनटोटा बंदरगाह पर काम शुरू हो गया है। शॉपिंग मॉल से लेकर पब तक हर जगह चीनी श्रमिक नजर आएंगे। कई चीनी श्रीलंका की भाषा सिंहली बोलना सीख रहे हैं। होटल, सड़कों, बुनियादी ढांचों, थिएटरों और सुख-सुविधाओं से लैस क्रिकेट स्टेडियम केवल कागजों पर लिखी परियोजना भर नहीं हैं, बल्कि लोग उन्हें देख सकते हैं। आंखों देखी चीजों के महत्व को कभी भी कम करके आंका नहीं जाना चाहिए और जिस गति से चीन यहां परियोजनाओं को अंजाम दे रहा है, वह इस बात की बानगी है कि श्रीलंका में रियल एस्टेट परिवर्तन तेजी से हो रहा है।

2005-17 के बीच 12 वर्षों की अवधि में बीजिंग ने श्रीलंका की परियोजनाओं में 15 अरब डॉलर का निवेश किया है। वहीं, चीन के एक राजदूत भारत को एक स्पष्ट संदेश दे चुके हैं, जो श्रीलंका में चीनी उपस्थिति को अपने प्रभाव क्षेत्र में घुसपैठ के रूप में देखता है। राजदूत ने भारत को स्पष्ट जवाब देते हुए कहा था, “कोई नकारात्मक ताकत श्रीलंका और चीन के बीच सहयोग को कमजोर नहीं कर सकती है।”

भारत के लिए यह परेशान करने वाला है। भारतीय विदेश नीति समय की कसौटी पर खरा उतरे संबंधों पर काफी भरोसा करती है, लेकिन श्रीलंकाई लोगों में उम्मीदों की अधीरता रही है, जिन पर भारत ध्यान देने और प्रतिक्रिया करने में विफल रहा और चीन सफल रहा है।

श्रीलंकाई लोगों के मुंह से अक्सर यह कहते हुए सुना जा सकता है कि वे चीनी उपस्थिति से कितने असंतुष्ट और नाखुश हैं, जो काफी कठोर और अभिमानी हैं। इसे एक खतरे को गले लगाने के रूप में समझा जा सकता है, लेकिन जब उनके मन-मस्तिष्क में एक समृद्ध भविष्य की इच्छा उभरती है तो वे इस मौके को काफी आकर्षक पाते हैं।

वहीं, दूसरी ओर भारत सभी ओर से अलग-थलग पड़ता जा रहा है। पाकिस्तान से दुश्मनी है। मालदीव अस्थिर है। नेपाल की स्थिति लगभग असमजंस से भरी है और श्रीलंका एक स्पष्ट लुभावने मायाजाल में फंसा है। भारत वास्तव में इस समय अब तक की सबसे गंभीर सुरक्षा चुनौती का सामना कर रहा है।

अगर भारत को एक साथ मिलकर काम करना है तो इसके लिए केवल कल्पना की नहीं, बल्कि गति और दक्षता की जरूरत है, ताकि श्रीलंका के भविष्य को लेकर किए गए वादे पूरे हो सकें।

दिग्गज शतंरज खिलाड़ी बॉबी फिशर ने एक बार कहा था, “अगर आप खेल खेल रहे हैं तो आप जीतने के लिए खेलें, लेकिन अगर आप खेल हार गए तो वह इसलिए क्योंकि आपने अपनी आंखों को प्यादों से हटा लिया था, इसलिए आप हारने के ही लायक थे।”

By : अमित दासगुप्ता

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