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दर्दनाक त्रासदी, थोथे बयान

kapil sibbal

जन स्वास्थ्य से जुड़ी सरकारी उदासीनता को मिटाये बग़ैर गोरखपुर जैसे हादसों से बचाव नहीं

गोरखपुर के बाबा राघव दास (बीआरडी) अस्पताल में इन्सेफलाइटिस (दिमाग़ में सूजन) से पीड़ित 70 मासूमों ने ऑक्सीजन की कमी से दम तोड़ दिया। इस हादसे के बाद से ही आपराधिक लापरवाही और जन स्वास्थ्य पर हो रहे खर्च को लेकर बहस छिड़ गयी है। स्वच्छ भारत और टीकाकरण से जुड़े मिशन इन्द्रधनुष जैसे सराहनीय प्रयासों से लगता है कि जन स्वास्थ्य के प्रति देश की संवेदनशीलता में सुधार आ रहा है। हालाँकि, इस लिहाज़ से अभी जश्न मनाना जल्दबाज़ी होगी।

गोरखपुर के अलावा फ़र्रूख़ाबाद में भी 49 बच्चों की मौत की ताज़ा ख़बर हमें आगाह कर रही हैं कि हमारा जन स्वास्थ्य क्षेत्र गम्भीर संकट से गुज़र रहा है। इसने महाशक्ति बनने के लिए बेताब भारत की प्राथमिकताओं पर भी सवालिया निशान लगाये हैं। प्रमुख सरकारी अस्पताल पर 70 लाख रुपये का बकाये का मासूमों के लिए सज़ा-ए-मौत का सबब बन जाना बेहद शर्मनाक है। सरकार की ये सफ़ाई बेहद दुर्भाग्यपूर्ण कि उसे 4 अगस्त तक ऑक्सीजन की किल्लत के बारे में पता तक नहीं था। जबकि ताज़ा मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़, योगी सरकार के मंत्रियों को मार्च से ही बकाये पेमेंट और ऑक्सीजन सप्लाई के ठप होने के ख़तरे का पता था। यहाँ तक कि 9 अगस्त को अस्पताल का दौरा करने वाले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी इसकी सूचना दी गयी थी। लेकिन कोई तात्कालिक क़दम नहीं उठाया गया और उसी रात ऑक्सीजन की सप्लाई कट गयी।

1978 से गोरखपुर और आसपास के इलाकों में इन्सेफ़लाइटिस का प्रकोप लगातार बना हुआ है। ये महामारी अब तक हज़ारों बच्चों को काल के मुँह में ढकेल चुकी है, लेकिन अस्पतालों में पसरी सरकारी उदासीनता अब भी जस की तस है। लिहाज़ा, वक़्त आ गया है कि हम देश के जन स्वास्थ्य ढाँचे में व्यापक फ़ेरबदल करने के लिए आगे बढ़ें और सबसे पहले सरकारी बजट को पर्याप्त बनाएँ। लेकिन ये तभी मुमकिन है, जब सरकार थोथे बयानबाज़ी और उदासीनता से तौबा करे।

1978 से हर साल मॉनसून के दस्तक देने के बाद गोरखपुर के आसपास के ज़िलों के अलावा बिहार और नेपाल के इलाकों में इन्सेफ़लाइटिस का प्रकोप रहता है। गोरखपुर का बीआरडी अस्पताल अकेला ऐसा संस्थान है जहाँ इस बीमारी का इलाज़ हो पाता है। इसके बावजूद, वहाँ पर्याप्त संख्या में डॉक्टर, बिस्तर और वेंटीलेटर्स नहीं हैं। सीएजी की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, बीआरडी अस्पताल में 27 फ़ीसदी क्लीनिकल उपकरणों का अभाव है, वो भी तब जबकि अस्पताल अपने 452.35 करोड़ रुपये के बजट में से सिर्फ़ 426.13 करोड़ रुपये ही खर्च कर पाता है।

इस अस्पताल में पहुँचने वाले ज़्यादातर लोग दूर-दराज़ के गाँवों से आने वाले ग़रीब लोग होते हैं। अक्सर यहाँ मरीज़ गम्भीर हालत में पहुँचते हैं। यहाँ तक कि काफ़ी रोगी तो अस्पताल पहुँचने से पहले रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं। 2013 में एक रिसर्च टीम की सिफ़ारिशों के ग्रामीण इलाकों में रोगियों के त्वरित इलाज़ से लिए कई उपचार केन्द्र खोले गये, लेकिन ये प्रयोग उम्मीद पर खरा नहीं उतरा। यही वजह है कि 40 साल के दौरान हज़ारों बच्चों की मौत और तमाम ढाँचागत ख़ामियों के बावजूद बीआरडी अस्पताल इन्सेफ़लाइटिस जैसी बेहद घातक महामारी के उपचार का प्रमुख केन्द्र बना हुआ है। जन स्वास्थ्य से जुड़ी ये बड़ी चुनौती है।

ग्रामीण स्वास्थ्य से सम्बन्धित 2015 के आँकड़ों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में 37.7 प्रतिशत डॉक्टरों की कमी है। बीआरडी अस्पताल के डॉक्टरों को अच्छी तरह से मालूम था कि अस्पताल में मौजूद ऑक्सीजन का भंडार दस दिन से अधिक नहीं चलेगा। लिहाज़ा, जब सप्लाई रूक गयी तो वैकल्पिक इन्तज़ाम किया जाना चाहिए था। ये सर्वोच्च स्तर की आपराधिक लापरवाही थी।

भारत में ये बीमारी जापानी इन्सेफ़लाइटिस के नाम से जानी जाती है। हालाँकि, ये नाम उस जीवाणु का है जो बक़ौल विश्व स्वास्थ्य संगठन, एईएस (यानी एक्यूट इन्सेफ़लाइटिस सिनोड्रोम) कहलाता है। ये दिमाग़ में गम्भीर सूजन के पैदा होने की दशा है। गोरखपुर अंचल में कई मामलों में जापानी इन्सेफ़लाइटिस विषाणु (वायरस) से संक्रमित नहीं होने के बावजूद मरीज़ में इसके लक्षण दिखते हैं। इस बीमारी के अन्य वायरसों का नाम है वेस्ट नील, डेंगू, चाँदीपुरा और चिकुनगुनिया। इन सभी से एक्यूट इन्सेफ़लाइटिस सिनोड्रोम (एईएस) पैदा होता है। सालों-साल से भारत का ज़ोर जापानी इन्सेफ़लाइटिस के उन्मूलन पर है। अन्य किस्म का इन्सेफ़लाइटिस तो पूरी तरह से उपेक्षित ही है।

नतीज़तन, जापानी इन्सेफ़लाइटिस के पीड़ितों की संख्या में तो कमी आयी है, लेकिन अन्य किस्मों के इन्सेफ़लाइटिस क़हर तो बरक़रार ही है। 2015 में इंडियन मेडिकल काउन्सिल ने 10 हज़ार से ज़्यादा मामलों में से सिर्फ़ 8.4 फ़ीसदी में ही जापानी इन्सेफ़लाइटिस वायरस के निशान पाये थे। विशेषज्ञों के कई दलों ने इस महामारी के रहस्यों का पता लगाने की कोशिश की, लेकिन उनके नतीज़ों में परस्पर विरोध था। इसीलिए अभी तक इस बीमारी के निदान का पुख्ता तरीका विकसित नहीं हो पाया है। यही वजह है कि अभी तक इससे रोकथाम की व्यावहारिक रणनीति भी नहीं बन पायी है। लिहाज़ा, इस पर व्यापक और गहन शोध किये जाने की ज़रूरत है।

पर्याप्त बजट की कमी की वजह से देश में जन स्वास्थ्य से जुड़ी ढाँचागत सुविधाओं की भारी कमी है। इसकी वजह से ग़रीबों को निजी क्षेत्र की ओर भागना पड़ता है, जो उन्हें और ग़रीब तथा कर्ज़दार बना देता है। वक़्त की माँग है कि सकल घरेलू उत्पाद का अधिक हिस्सा जन स्वास्थ्य के क्षेत्र पर ख़र्च हो। वहाँ की सुविधाएँ और गुणवत्ता दोनों में भारी सुधार आना चाहिए। ज़्यादा स्वास्थ्य कर्मियों को प्रशिक्षित और तैनात करने की आवश्यकता है। इसके बाद, ऐसा निगरानी तंत्र भी होना चाहिए जो सबके लिए उम्दा स्वास्थ्य सुविधाएँ सुनिश्चित कर सके।

जब हम विकास के नाम पर सीना ठोंकते हैं, तब ये क्यों भूल जाते हैं कि जनता का विकास होने से ही देश का विकास होता है। जनता को दरकिनार करके देश का विकास नहीं हो सकता। यदि हम ये मान लें कि विकास का मतलब मुट्ठी भर लोगों के लिए बनने वाली गगनचुम्बी इमारतें, उनके पास मौजूद बेशुमार दौलत और चुनिन्दा लोगों की सेहत ही है तो हम किस तरह का राष्ट्रवाद पैदा करेंगे? इसीलिए जब तक हमारी स्वास्थ्य सुविधाएँ लचर रहेंगी, जब तक महज लापरवाही की वजह से लोग मरते रहेंगे, तब तक हमारी राष्ट्रभक्ति खोखली है, थोथी है!

(साभार: The Times of India (Delhi)। लेखक राज्यसभा सदस्य, पूर्व केन्द्रीय मंत्री और वरिष्ठ काँग्रेस नेता हैं।)

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