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बिहार: बीजेपी नेता से नाराज कार्यकर्ता उतरे बगावत पर, मुख्यालय पर किया प्रदर्शन

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फाइल फोटो

बिहार बीजेपी के सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने पार्टी मुख्‍यालय के बाहर जमकर हंगामा किया। इस दौरान कार्यकर्ताओं के बगावती तेवर साफ नजर गए।

समाचार पोर्टल जनसत्‍ता के हवाले से खबर है कि बीजेपी के ये कार्यकर्ता भागलपुर से पटना आए थे। पार्टी कार्यकर्ता भाजपा के भागलपुर जिलाध्यक्ष रोहित पांडेय को हटाने की मांग कर रहे थे। हालांकि बीजेपी के इन बागी कार्यकर्ताओं को तत्काल कुछ हाथ नहीं लगा है। लेकिन पार्टी कार्यकर्ताओं की मांग पर गंभीरता से विचार करने का भरोसा इन्हें जरूर दिया गया है।

रविवार को सैकड़ों की संख्या में पार्टी कार्यकर्ता पटना ऑफिस के बाहर जुट गये और दिन भर वहां जमे रहे। कार्यकर्ताओं ने कहा रोहित पांडेय पार्टी संविधान के खिलाफ काम कर रहे हैं। पार्टी कार्यकर्ताओं ने कहा कि रोहित पांडेय नशेड़ियों और निष्कासितों को पार्टी में शामिल कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि रोहित पांडेय जिले में मनमानी कर रहे हैं और वह किसी की नहीं सुनते हैं। भागलपुर से पटना आए बीजेपी कार्यकर्ताओं में महिलाएं भी शामिल थीं, उन्होंने कहा कि वे लोग मन बनाकर आईं हैं, जब तक जिलाध्यक्ष को नहीं हटाया जाएगा, वो यहां डटी रहेंगी।

जनसत्‍ता रिपोर्ट्स के मुताबिक जब कार्यकर्ताओं का विरोध बढ़ गया तो शाम साढ़े पांच बजे प्रदेश अध्यक्ष नित्यानंद राय ने इनसे बात की। बिहार बीजेपी अध्यक्ष ने कार्यकर्ताओं को आश्वासन देते हुए कहा कि तीन दिन के अंदर सारे विवाद को ठीक कर दिया जाएगा। लेकिन कार्यकर्ता इस बात पर अड़े थे कि वे लोग परिणाम लेकर ही वापस जाएंगे। कई बार आश्वसान के बाद भी पार्टी कार्यकर्ता ठंड के बावजूद दफ्तर से नहीं हटे। आखिरकार रात साढ़े नौ बजे प्रदेश अध्यक्ष के साथ महानगर अध्यक्ष अभय कुमार घोष और दूसरे कार्यकर्ताओं को बातचीत की टेबल पर बुलाया गया। कई घंटे तक इस मुद्दे पर बैठक चलती रही। पार्टी कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि उनकी बातों को ठीक ढंग से नहीं सुना गया। इधर विवादों के बीच रोहित पांडेय भी पटना पहुंचे, उन्होंने कहा कि उन्होंने कोई असंवैधानिक काम नहीं किया है।

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5 जजों की संवैधानिक पीठ में नहीं मिली प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले 4 जजों को जगह

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सुप्रीम कोर्ट के चार जजों के मीडिया में आकर चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा पर सवाल खड़े करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक लिस्ट जारी की है।

इस लिस्ट में सुनवाई के लिए 7 अहम मुद्दों का जिक्र किया गया है। इन सातों मुद्दों पर सुनवाई के लिए चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने 5 जजों की एक संवैधानिक पीठ का गठन किया है। पीठ में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सीजेआई पर गंभीर सवाल उठाने वाले चार जजों में से किसी का भी नाम नहीं है।

आधिकारिक जानकारी के अनुसार पांच न्यायाधीशों की पीठ में सीजेआई दीपक मिश्रा, जस्टिस ए के सीकरी, जस्टिस ए एम खानविलकर, जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस अशोक भूषण शामिल हैं। यह संविधान पीठ 18 जनवरी से इन सात महत्वपूर्ण मामलों पर सुनवाई शुरू करने वाली है। पीठ में जस्टिस जे चेलामेश्वर, रंजन गोगोई, मदन बी लोकुर और कुरियन जोजफ का नाम नहीं है।

खबर है कि पांच न्यायाधीशों की ये पीठ आधार कार्ड कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाले मामले और सहमति से वयस्क समलैंगिकों के बीच यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर रखने के फैसले को चुनौती देने से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों में सुनवाई करेगी। इसी पीठ ने पिछले साल 10 अक्तूबर से विभिन्न मामलों में सुनवाई की थी। इनमें प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र को लेकर केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच टकराव का मामला भी है।

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राजनीति

ठाणे जिला परिषद में शिवसेना ने एनसीपी से किया गठबंधन

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ठाणे में 53 में से 26 जिला परिषद की सीट जीतने के बाद सोमवार को शिव सेना ने एनसीपी के साथ गठबंधन करते हुए निर्विरोध अध्यक्ष पद पर कब्जा कर लिया है। वहीं एनसीपी के उम्मीदवार को डिप्टी प्रेसिडेंट पद के लिए चुन लिया गया है। शिव सेना की मंजुशा जाधव को अध्यक्ष पद मिला तो वहीं एनसीपी के सुभाष पवार को डिप्टी प्रेसिडेंट का पद दिया गया है। दिसंबर में हुए जिला परिषद के इन चुनावों में शिव सेना ने जहां 26 सीटों पर जीत दर्ज की थी। वहीं दूसरी तरफ बीजेपी के हाथ केवल 14 सीटें लगीं। एनसीपी ने 10 और कांग्रेस ने मात्र एक सीट पर जीत दर्ज की थी। इन चुनावों में एक सीट निर्दलीय उम्मीदवार के खाते में गई थी।

बता दें कि अध्यक्ष पद पर कब्जा जमाने के बाद ऐसा पहली बार होगा कि शिव सेना ठाणे जिला परिषद की सत्ता संभालेगी। शिव सेना नेताओं का कहना है कि स्थानीय नेताओं ने एनसीपी के साथ गठबंधन कर तालुका की कुछ सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया था। यह सच है कि एनसीपी के साथ गठबंधन किया गया है लेकिन यह केवल स्थानीय फैसला है। इस बारे में जब सेना के मंत्री और नेता एकनाथ शिंदे से बात करने की कोशिश की गई तो उन्होंने इस पर कोई भी जवाब नहीं दिया। शिव सेना के अलावा एनसीपी ने भी यह बात कही है कि यह फैसला केवल स्थानीय नेताओं का था और इसका असर राज्य की राजनीति पर नहीं पड़ेगा।

एनसीपी के चीफ प्रवक्ता नवाब मलिक ने कहा है कि स्थानीय नेताओं को स्वतंत्र होकर फैसला लेने की इजाजत दी गई है ताकि वे बीजेपी को सत्ता से हटाने का काम जारी रख सकें। एक तरफ शिव सेना और एनसीपी ने ठाणे जिला परिषद के लिए गठबंधन किया तो वहीं दूसरी ओर हमेशा एक दूसरे के खिलाफ रहने वाली बीजेपी और कांग्रेस ने गोंडिया जिला परिषद के लिए गठबंधन किया। अध्यक्ष पद की सीट कांग्रेस के खाते में गई जबकि बीजेपी उम्मीदवार को डिप्टी प्रेसिडेंट का पद दिया गया। गोंडिया जिला परिषद में एनसीपी ने 20 सीटें जीतीं जबकि कांग्रेस 17 और बीजेपी को 16 सीट मिलीं।

कांग्रेस-बीजेपी गठबंधन पर बात करते हुए एनसीपी के स्टेट प्रेसिडेंट सुनील टाटकरे ने कहा है कि हमने पिछले चार दिनों में कई बार कांग्रेस के साथ गठबंधन करने की कोशिश की और हम कोई भी पद देने के लिए तैयार थे। बीजेपी से गठबंधन के बाद कांग्रेस का भी सफाया होना चाहिए।

वहीं कांग्रेस का कहना है कि स्थानीय स्तर पर एनसीपी और पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच काफी मतभेद चल रहे थे। महाराष्ट्र कांग्रेस जनरल सेक्रेटरी सचिन सावंत ने कहा कि पार्टी को इस मामले की कई रिपोर्ट मिली थीं, जिसके बाद यह फैसला लिया गया।

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शिवसेना ने मोदी सरकार को बताया दमघोंटू, कहा- इंदिरा गांधी का शासन था लोकतांत्रिक और मानवीय

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मोदी सरकार की केंद्र और महाराष्‍ट्र में सहयोगी पार्टी शिवसेना ने कहा है कि ये सरकार दमघोंटू है। वहीं इंदिरा गांधी के शासन को लोकतांत्रिक और मानवीय बताया है।

उच्चतम न्यायालय के चार न्यायाधीशों द्वारा मामलों के चुनिंदा तरीके से आवंटन का मुद्दा उठाए जाने के बाद शिवसेना ने केंद्र पर निशाना साधते हुए सोमवार को कहा कि जो लोग लोकतंत्र की दुहाई देते हैं असल में वही उसे कमजोर कर रहे हैं। पार्टी ने कहा कि जो लोग पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर न्यायिक मामलों में दखल देने का आरोप लगाते थे, वे आज सत्ता में हैं। साथ ही पार्टी ने कहा कि उनका (इंदिरा) शासन ज्यादा मानवीय और लोकतांत्रिक लगता था।

शिवसेना ने पार्टी के मुखपत्र सामना के एक संपादकीय में कहा कि देश का दम घुट रहा था और न्यायाधीशों के आवाज उठाने के बाद अब वह आसानी से सांस ले पा रहा है। भारत की न्यायापालिका को लेकर पिछले शुक्रवार से खलबली मची हुई है जब उच्चतम न्यायालय के चार वरिष्ठ न्यायाधीश- न्यायमूर्ति जे चेलमेश्वर, न्यायमूर्ति रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति एम बी लोकुर और न्यायमूर्ति कुरियन जोसफ ने संवाददाता सम्मेलन आयोजित कर मामलों के आवंटन का मुद्दा उठाया था।

शिवसेना ने कहा कि यह चार न्यायाधीशों द्वारा लोकतंत्र की मजबूती के लिए उठाया गया एक साहसी कदम है। राजग की इस सहयोगी पार्टी ने सवाल उठाया, ”क्या यह प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के दवाब में आने और इन चार निष्पक्ष न्यायाधीशों को चुनिंदा सुनवाईयों से दूर रखने के संबंध में है?” पार्टी ने कहा कि जो लोग इंदिरा गांधी पर न्यायिक मामलों में हस्तक्षेप करने का आरोप लगाते थे, वे अब सत्ता में हैं। और अगर कई संवैधानिक पदों पर उठ रहे सवालों को देखा जाए तो इंदिरा का शासन ज्यादा मानवीय और लोकतांत्रिक मालूम होता है।

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