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भोपाल में नेताओं के स्वागत में लटकी जूतों की माला

चुनाव आते हैं, तो नेता वोट मांगने आ जाते हैं, मगर उनकी समस्या पर किसी का ध्यान नहीं है। यही कारण है कि यहां आने वाले नेताओं का स्वागत जूतों की माला से किया जा रहा है।

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jooton ki mala

भोपाल, 8 जुलाई (आईएएनएस)| आमतौर पर नेताओं के स्वागत में वंदनवार, स्वागत-द्वार और फूल-मालाओं के गजरों का सहारा लिया जाता है, मगर मध्य प्रदेश की राजधानी की एक बस्ती के लोगों ने सड़कों पर जूते-चप्पल की माला लटका रखी है। वे अपनी सड़क संबंधी समस्या का निदान न होने से नेताओं से बेहद खफा हैं और उनका निराले अंदाज में स्वागत कर रहे हैं।

मामला राजधानी के कोलार इलाके की ओम नगर बस्ती का है, यहां की सड़कें मानसून की पहली ही बारिश में कीचड़ से सराबोर हो गई। इससे यहां के निवासियों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। यहां के रहवासी विनेाद का कहना है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान राजधानी की सड़कों को अमेरिका से बेहतर बताते हैं, यहां भी आकर कभी देख लें तो पता चल जाएगा कि वास्तव में हाल क्या है।

डी़ बी़ खंडाले कहते हैं कि चुनाव आते हैं, तो नेता वोट मांगने आ जाते हैं, मगर उनकी समस्या पर किसी का ध्यान नहीं है। यही कारण है कि यहां आने वाले नेताओं का स्वागत जूतों की माला से किया जा रहा है। यहां के लोग सालों से अपनी सड़क संबंधी समस्या से तमाम नेताओं का अवगत कराते आ रहे हैं, मगर कोई भी इस तरफ ध्यान नहीं दे रहा है।

सीता देवी तो नेताओं की बात सुनते ही भड़क उठती हैं, उनका कहना है, “यहां के रहवासियों ने हर अफसर व नेता के दर पर माथा टेका, पर हालात नहीं सुधरे, तो परेशान होकर उन्होंने जूतों की माला तैयार की है। जैसे ही नेता यहां पर वोट मांगने आएंगे तो उन्हें दिखाएंगे कि स्वागत कैसे होता है!”

कांग्रेस नेता राहुल राठौर का कहना है कि चुनाव आने वाले हैं। यहां की जनता को जो परेशानी हो रही है, उसका वह सबक सिखाने में पीछे नहीं रहेंगी।

इस इलाके से भाजपा की पार्षद मन फूल मीणा जनता का गुस्सा जायज मानते हुए कहती हैं कि वे मजबूर हैं, क्योंकि अधिकारी और ठेकदार उनकी सुनते ही नहीं हैं।

बताते चलें कि स्वच्छता सर्वेक्षण में भोपाल को देश में दूसरा स्थान मिला है। इसको लेकर नगर निगम से सरकार तक खूब वाहवाही लूट रही है, मगर ओमनगर निवासियों का हाल देखें तो पता चलेगा कि हकीकत कुछ और है।

–आईएएनएस

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जवानों के लिए खूनी साबित हुआ फरवरी 2019

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pulwama terror attack

नई दिल्ली, 19 फरवरी | पिछले कुछ दिनों में विमान दुर्घटनाओं में भारतीय वायु सेना के तीन जवानों की मौत, पुलिवामा में हुए आत्मघाती हमले में सीआरपीएफ के 40 जवानों के शहीद होने और उसके बाद एक मुठभेड़ में चार जवानों के शहीद होने से यह समय सशस्त्र बलों के लिए सबसे खराब समय में से एक में तब्दील हो गया है।

बेंगलुरू में मंगलवार को दो विमानों के बीच टक्कर में विंग कमांडर शाहिल गांधी की मौत हो गई। हिसार के रहने वाले शाहिल को जून 2004 में लड़ाकू स्ट्रीम में शामिल किया गया था। शाहिल भारतीय वायु सेना के सूर्य किरण एयरोबेटिक टीम के और बिदर स्थित 52 स्क्वाड्रन का हिस्सा थे।

हाल के समय में वायुसेना की यह तीसरी विमान दुर्घटना है। इससे पहले 1 फरवरी को मिराज 2000 लड़ाकू विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया था, जिसमें स्क्वाड्रन लीडर समीर अबरोल और सिद्धार्थ नेगी की मौत हो गई थी।

उसके बाद 12 फरवरी को राजस्थान के पोखरन में वायु शक्ति अभ्यास से पहले एक मिग-27 दुर्घटनाग्रस्त हो गया था, लेकिन पायलट इस दुर्घटना में बाल-बाल बचने में सफल रहा था।

जम्मू एवं कश्मीर के पुलवामा में 14 फरवरी को सीआरपीएफ के काफिले पर हुए हमले में 40 जवान शहीद हो गए।

इसके एक दिन बाद, मेजर चित्रेश सिंह नियंत्रण रेखा के पास आईईडी को डिफ्यूज करते वक्त शहीद हो गए ।

वहीं 18 फरवरी को, मेजर विभूति शंकर ढौंडियाल समेत चार जवान एक मुठभेड़ में शहीद हो गए। मुठभेड़ में पुलवामा हमले का मास्टरमाइंड भी मारा गया।

शांति के समय में सशस्त्र सेनाओं का मारा जाना पहले से ही चिंता का सबब बना हुआ है, लेकिन सेना के इतने सदस्य केवल 20 दिन की समयसीमा के अंदर शहीद हुए हैं।

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सिन्धु का पानी तो भारत सिर के बल खड़े होकर भी नहीं रोक सकता!

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indus water treaty

पुलवामा हमले के बाद देश में राष्ट्रभक्ति का उन्माद है। कोई युद्ध की दुन्दुभि बजा रहा है, तो कोई पाकिस्तान को दिये गये मोस्ट फ़ेवर्ड नेशन (MFN) के दर्ज़े को ख़त्म करने को निर्णायक कार्रवाई के रूप में पेश कर रहा है। उन्माद की आग इतना प्रचंड है कि पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने पाकिस्तान को जा रहे सिन्धु नदी के पानी को रोकने का मशविरा दे डाला। उरी हमले (18 सितम्बर 2016) के हफ़्ते भर बाद ख़ुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी ये जुमला छोड़ चुके हैं कि पानी और ख़ून एक साथ नहीं बह सकता। हालाँकि, सिन्धु नदी की भौगोलिक सच्चाई ऐसी है कि भारत यदि सिर के बल खड़ा हो जाए तो भी उसका पानी नहीं रोक सकता।

पुलवामा हमले के बाद अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में विदेश सचिव रहे कंवल सिब्बल ने कहा कि “भारत को जितना सख़्त होना चाहिए, वो नहीं हो पा रहा है। भारत को सिन्धु जल सन्धि को तोड़ देना चाहिए। इससे पाकिस्तान सीधा हो जाएगा।” उरी हमले के 27 जनवरी 2017 को प्रधानमंत्री ने जालन्धर की एक चुनावी रैली में ऐलान किया कि “पंजाब के किसानों को ज़्यादा पानी मिलना चाहिए। इसके लिए हमने फैसला किया है कि सिन्धु नदी का जो पानी पाकिस्तान को चला जाता है, वो भारत को मिलना चाहिए।” इससे पहले 25 नवम्बर 2016 को भी मोदी ने बठिंडा की रैली में कहा था, “सिन्धु नदी का पानी भारतीय किसानों का है। हमारे किसानों को पर्याप्त पानी मुहैया कराने के लिए हम कुछ भी करेंगे।”

नामुमकिन है सिन्धु को रोकना

प्रधानमंत्री होने के नाते नरेन्द्र मोदी को अच्छी तरह से मालूम था कि पाकिस्तान के हिस्से वाले सिन्धु के पानी को रोकना तक़रीबन नामुमकिन है। सच्चाई तो ये है कि 1960 में दोनों पड़ोसियों के बीच हुए सिन्धु नदी जल समझौते के मुताबिक़, भारत को जो 20 फ़ीसदी पानी मिला था, उसके दोहन के लिए भी हम आज तक कोई ख़ास इन्तज़ाम नहीं कर पाये। कश्मीर के गुरेज़ सेक्टर में किशनगंगा नदी पर एक बड़ी पनबिजली परियोजना ज़रूर चल रही है, लेकिन एक तो इसके बनकर तैयार होने में अभी दसियों साल और लगेंगे तथा दूसरा इससे बन जाने के बाद भी सिन्धु बेसिन के कुल पानी के मुक़ाबले उसके मामूली सा हिस्से का ही दोहन हो पाएगा।

ऐसा नहीं है कि भारत की पूर्ववर्ती सरकारें सिन्धु नदी के पानी की अहमियत से अनजान थीं। बल्कि सच्चाई तो ये है कि सिन्धु के बेशुमार पानी को रोकना भारत के बूते का ही नहीं है। इसके लिए जितनी बड़ी इंज़ीनियरिंग और जितने अधिक धन का ज़रूरत होगी, उसे जुटाना भारत के लिए बहुत टेढ़ी खीर है। सिन्धु नदी का उद्गम चीन के क़ब्ज़े वाले तिब्बत से होता है। लेकिन महाशक्ति होने के बावजूद चीन चाहकर भी सिन्धु के पानी को अपने ही देश में नहीं रोक सकता। दरअसल, मनुष्य कितना भी बलशाली हो जाए, वो हरेक क़ुदरती ताक़त या भौगोलिक परिस्थिति को ठेंगा नहीं दिखा सकता। ग्लेशियरों (हिमनद) से निकलने वाली हिमालय की बारहमासी नदियाँ अपने साथ बहुत बड़ा पर्यावरण भी बनाती हैं। नदी के क़ुदरती मार्ग में बड़े फ़ेरबदल का सीधा मतलब है कि उसका सारा पर्यावरण भी बदलना होगा। यही पहलू हरेक कल्पना को सीमित करने के लिए काफ़ी है।

गंगा से भी बड़ी है सिन्धु

भारत, चीन और पाकिस्तान के बीच सिन्धु बेसिन क़रीब 11.5 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला है। ये अपनी पाँच सहायक नदियों चिनाब, झेलम, सतलज, राबी और ब्यास के बेसिनों से मिलकर बना है। ये भारत के गंगा बेसिन से भी बड़ा है। उत्तर प्रदेश जैसे चार राज्य सिन्धु बेसिन में समा सकते हैं। सिन्धु की लम्बाई गंगा से भी अधिक यानी 3 हज़ार किलोमीटर से ज़्यादा है। सिन्धु के अलावा सतलज भी चीन से निकलती है। जबकि बाक़ी चारों नदियों का उद्गम स्थल भारतीय सीमा में ही है। कराची और कच्छ के रन के बीच सभी सहायक नदियाँ सिन्धु के डेल्टा में मिलते हुए अरब सागर में विलीन होती हैं।

1960 की सिन्धु जल सन्धि की बदौलत भारत और पाकिस्तान के बीच तीन-तीन नदियों का बँटवारा हुआ। सिन्धु, चिनाब और झेलम जैसी पश्चिमी नदियों का 80 फ़ीसदी पानी पाकिस्तान के और बाक़ी 20 फ़ीसदी पानी भारत के हिस्से में आया। इस पानी का इस्तेमाल सिंचाई और पनबिजली उत्पादन के लिए हो सकता है। बशर्ते, भारत नदी के दुर्गम रास्तों में ऐसे-ऐसे बाँध और बिजलीघर बना सकें जिससे नदी का प्रवाह एक सीमा से ज़्यादा बाधित नहीं हो। ऐसी परियोजनाओं को ‘Run of the river projects’ कहते हैं।

सिन्धु की आड़ में झाँसा

कश्मीर के दुर्गम पहाड़ी और बर्फ़ीले इलाकों की तो छोड़िए, अन्य क्षेत्रों में भी किसी एक नदी बेसिन के पानी को दूसरे नदी बेसिन की ओर ले जाना बहुत मुश्किल काम है। इसमें बड़े पैमाने पर आबादी के विस्थापन की नौबत भी आती है। सबसे बड़ी चुनौती ये है कि क़ुदरत ने किसी भी बेसिन को ऐसा नहीं बनाया है कि वो अपने पड़ोसी बेसिन के अधिकतर पानी को भी सम्भाल सके। वैसे नदियों को जोड़ने की योजना के तहत एक नदी के पानी को दूसरे नदी के बेसिन में भेजने की कल्पना को साकार करने का काम देश के एकाध राज्यों के बीच शुरू हुआ है। लेकिन इससे सम्बन्धित नदियाँ बहुत छोटी हैं।

ज़रा सोचिए कि इन तथ्यों को अच्छी तरह से जानने-समझने के बावजूद देश के महत्वपूर्ण लोग भारतवासियों को कैसी अज्ञानता में ढकेलना चाहते हैं! ऐसे लोगों की मंशा को बेनक़ाब करना ही असली राष्ट्रभक्ति है जो जनता की आँखों में धूल झोंककर अपना सियासी उल्लू सीधा करना चाहते हैं। ऐसा नहीं होने की वजह से ही अन्ध-भक्तों की टोली उन्माद फ़ैलाने लगती हैं। मानों, सिन्धु नदी का पानी रोकना किसी बहते नल को बन्द कर देने जैसा आसान काम है।

भारत में भी तबाही लाएगी सिन्धु

भौगोलिक दृष्टि से देखें तो दो-तिहाई पाकिस्तान सिन्धु बेसिन में बसा है। पाकिस्तान ने सिन्धु पर कई बाँध, सिंचाई के लिए नहरें और पनबिजलीघर बनाये हैं। सिन्धु नदी के अपने ही हिस्से का पानी रोकने के लिए भी भारत को कई विशाल बाँध, विकराल सुरंगें, नहरों का व्यापक जाल तैयार करना होगा। इतना होने के बाद ही सिन्धु जल सन्धि को तोड़ने की बात हो सकती है। कल्पना कीजिए कि जब पाकिस्तान को सिन्धु का पानी नहीं मिलेगा, वहाँ पानी के लिए हाहाकार मचेगा तो क्या दुनिया की महाशक्तियाँ मानवाधिकारों की दुहाई देते हुए दख़ल नहीं देंगी? क्या इससे ऐसा तनाव नहीं पैदा होगा कि युद्ध की नौबत आ जाएगी? युद्ध की दशा में विशाल बाँधों की सुरक्षा असम्भव हो जाएगी। बाँधों के टूटने से पाकिस्तान में तबाही तो बाद में होगी, पहले तो भारत पर क़हर बरपा होगा।

साफ़ है कि जो भी सिन्धु के पानी को रोकने की बातें करने वाले सिर्फ़ हवाई क़िले बनाते हैं। ज़मीनी हक़ीक़त तो ये है कि आज भारत के अधिकतर राज्य अपनी नदियों के पानी को लेकर आपस में ऐसे झगड़ते हैं, मानों वो नेक-दिल पड़ोसी नहीं बल्कि एक-दूसरे के जानी-दुश्मन हों। पंजाब और हरियाणा भी दशकों से यमुना लिंक नहर की मसला नहीं सुलझा सके। पंजाब के लोग किसी भी क़ीमत पर हरियाणा को पानी नहीं देना चाहते। भले ही वो समुन्दर में ही बहकर क्यों न चला जाए! इस जल-विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट के कड़े रवैये से भी आजकल कुछ भी हासिल नहीं हुआ।

राज्यों और केन्द्र में चाहे क्षेत्रीय दलों की सरकारें रही हों या बीजेपी-काँग्रेस जैसे राष्ट्रीय दलों की, देश में अभी तक तो अपनी नदियों के पानी से जुड़े झगड़ों के समाधान की संस्कृति विकसित नहीं हो सकी। फिर भी तुर्रा ये कि हम सिन्धु को मुट्ठी में बाँध लेंगे! काश! ढींगे हाकनें की भी कोई सीमा होती।

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दिग्गज मिसाइल निर्माता कंपनी ईडी के घेरे में

कई सूत्रों ने पुष्टि की है कि एमबीडीए के भारत प्रमुख लोइस पीडीवाचे को सोमवार को ईडी की दिल्ली शाखा में पेश होने को कहा गया है। सूत्रों ने दावा किया कि भारतीय बलों के साथ कंपनी के जुड़ाव पर सवालों के अलावा उससे तलवार के एनजीओ में भुगतान पर भी सवाल किए जाएंगे।

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Rafale deal scam

नई दिल्ली, 17 फरवरी | राफेल लड़ाकू विमान विवाद के चरम पर पहुंचने के बाद मिसाइल बनाने वाली यूरोप की दिग्गज कंपनी एमबीडीए भारतीय जांच एजेंसियों के घेरे में आ गई है। एमबीडीए राफेल लड़ाकू विमान के लिए प्रमुख मिसाइल आपूर्तिकर्ता है और कंपनी 30 हजार करोड़ रुपये के ऑफसेट कार्यक्रम में शामिल है। ऑफसेट कार्यक्रम 36 युद्धक विमानों से जुड़ा है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने कॉरपोरेट लॉबिस्ट दीपक तलवार से कंपनी के रिश्ते के संबंध में एमबीडीए के कंट्री हेड को जांच में शामिल होने के लिए समन जारी किया है।

सरकार के एक अधिकारी के मुताबिक, तलवार की एमबीडीए में हिस्सेदारी है। उसे पिछले महीने दुबई से प्रत्यर्पित कर लाया गया था। ऐसा माना जाता है कि उसने संप्रग शासन के दौरान एयरबस के साथ कई सौदों में मुख्य भूमिका निभाई थी।

कई सूत्रों ने पुष्टि की है कि एमबीडीए के भारत प्रमुख लोइस पीडीवाचे को सोमवार को ईडी की दिल्ली शाखा में पेश होने को कहा गया है। सूत्रों ने दावा किया कि भारतीय बलों के साथ कंपनी के जुड़ाव पर सवालों के अलावा उससे तलवार के एनजीओ में भुगतान पर भी सवाल किए जाएंगे।

सूत्रों के मुताबिक, तलवार के एनजीओ एडवांटेज इंडिया को 11 जून, 2012 से 17 अप्रैल, 2015 के बीच एमबीडीए और एयरबस से 88 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया था। बाद में पूरी राशि फर्जी खरीद के जरिए निकाल ली गई थी।

रक्षा मंत्रालय के सूत्रों ने कहा कि ऐसा बहुत ही कम होता है कि एक यूरोपीय रक्षा कंपनी के कंट्री हेड को जांच में शामिल होने के लिए समन दिया गया हो।

सरकार के एक सूत्र ने दावा किया कि लोइस करीब एक दशक से भारत में कंपनी के संचालन का जिम्मा संभाल रहे हैं। मिराज अपग्रेड प्रोग्राम और राफेल पर भारत में लोइस के कार्यकाल के दौरान ही हस्ताक्षर किए गए थे और उसके पास गुप्त जानकारियां होंगी।

एक अधिकारी ने कहा, “अगर जरूरत पड़ी तो जांच एजेंसी समूह निर्यात निदेशक जीन लुक लामोथे को भी समन जारी कर सकती है। सबसे पहले लोइस से कंपनी द्वारा तलवार के एनजीओ को किए गए भुगतान के बारे में बताने के लिए कहा जाएगा।”

लोइस तक पहुंचने का प्रयास व्यर्थ हो चुका है। एमबीडीए के एक प्रवक्ता ने कहा, “एनबीडीए अधिकारियों के सवालों में पूरा सहयोग करेगी और जारी जांच पर कोई टिप्पणी नहीं करेगी। हम भारतीय बाजार के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।”

कंपनी ने दावा किया कि वह अपनी कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) पहल के हिस्से के रूप में भारत में कई सामाजिक विकास कार्यक्रमों में शामिल है। इसमें ही एडवांटेज इंडिया को किया गया भुगतान भी शामिल हो सकता है।

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