Connect with us

स्वास्थ्य

चुकंदर अल्जाइमर में लाभकारी

Published

on

-juice-

चुकंदर में पाया जाने वाला एक तत्व अल्जाइमर रोकने में मदद कर सकता है। इसी तत्व की वजह से चुकंदर का रंग लाल होता है। इससे अल्जाइमर बीमारी की दवा विकसित की जा सकती है।

शोध के निष्कर्षो से पता चलता है कि चुकंदर के रस में बीटानिन तत्व पाया जाता है, जो दिमाग में मिसफोल्डेड प्रोटीन के संचय को धीमा कर सकता है। मिसफोल्डेड प्रोटीन का संचय अल्जाइमर बीमारी में से जुड़ा होता है।

Image result for चुकंदर

साउथ फ्लोरिडा विश्वविद्यालय के ली-जून मिंग ने कहा, “हमारे आंकड़ों से पता चलता है कि बीटानिन दिमाग में कुछ रासायनिक क्रियाओं के लिए एक अवरोधक का काम करता है, जो अल्जाइमर बीमारी के होने में शामिल होते हैं। बीटा-एमालॉएड एक चिपचिपा प्रोटीन का टुकड़ा या पेप्टाइड होता है, जो कि दिमाग में जमा होता है।

यह दिमाग की कोशिकाओं के संचार में बाधा डालता है। इन दिमाग की कोशिकाओं को न्यूरान्स कहते हैं। सबसे ज्यादा नुकसान तक होता है, जब बीटा-एमालॉएड खुद को धातुओं जैसे लोहा या तांबे से जोड़ लेता है। इन धातुओं से बीटा-एमालॉएड पेप्टाइड एक समूह में बंध जाते हैं, जिससे सूजन व ऑक्सीकरण बढ़ सकता है।

–आईएएनएस

Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

स्वास्थ्य

टीबी विश्व का खतरनाक संक्रामक रोग बना हुआ है : डब्ल्यूएचओ

Published

on

Tuberculosis
प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर

जेनेवा। ट्यूबरक्लोसिस(टीबी) आज भी विश्व का खतरनाक संक्रामक रोग बना हुआ है, लेकिन वर्ष 2000 के बाद वैश्विक प्रयासों की वजह से टीबी से हो सकने वाली लगभग 5.4 करोड़ मौतों को टाला जा सका है। विश्व स्वास्थ्य संगठन(डब्ल्यूएचओ) ने मंगलवार को यह जानकारी दी। समाचार एजेंसी सिन्हुआ की रपट के मुताबिक, डब्ल्यूएचओ ने अपनी नवीनतम 2018 की वैश्विक टीबी रिपोर्ट में कहा कि विभिन्न देश 2030 तक इसे समाप्त करने के लिए अब भी कुछ ज्यादा नहीं कर रहे हैं।

डब्ल्यूएचओ ने इसके साथ ही देश व सरकार के 50 प्रमुखों को इस संदर्भ में निर्णायक निर्णय लेने के लिए कहा, जोकि टीबी पर संयुक्त राष्ट्र के पहले उच्च स्तरीय बैठक में संभवत: अगले हफ्ते हिस्सा लेंगे।

रपट में बताया गया है कि पिछले वर्षो में टीबी से मरने वालों की संख्या में कुछ कमी आई है। 2017 में एक अनुमान के मुताबिक 1 करोड़ लोगों को टीबी हुआ और इससे 16 लाख मौतें हुईं, जिसमें 3 लाख एचआईवी -पॉजिटिव लोग भी शामिल हैं। टीबी के नए मामले में 2 प्रतिशत की कमी आई है।

हालांकि टीबी मामले में बिना रिपोर्ट किए (अंडररिपोर्टिग) और बिना रोग-निदान (अंडर-डाइगनोसिस) के मामले एक बड़ी चुनौती बने हुए हैं। 2017 में जिन 1 करोड़ लोगों को टीबी हुआ, उसमें केवल 64 लाख मामले ही आधिकारिक रूप से नेशनल रिपोर्टिग सिस्टम में दर्ज कराए गए, जिसमें से 36 लाख लोगों का या तो इलाज नहीं हुआ या रोग की पहचान हुई लेकिन इसकी रिपोर्ट दर्ज नहीं हुई।

रपट के अनुसार, 2030 तक टीबी समाप्त करने के लक्ष्य को पूरा करने के लिए 2025 तक ट्रीटमेंट कवरेज को बढ़ाकर 64 प्रतिशत से 90 प्रतिशत तक करना होगा।

–आईएएनएस

Continue Reading

स्वास्थ्य

भारतीय युवाओं में तेजी से बढ़ रही है हार्ट अटैक की समस्या

Published

on

Heart attack-
प्रतीकात्मक तस्वीर

भारतीय युवाओं में हार्ट अटैक की समस्या बढ़ती जा रही है और यदि इस समस्या पर रोक के उपाय नहीं किए गए तो यह महामारी का रूप अख्तियार कर सकती है।

यह कहना है हृदय रोग विशेषज्ञ और मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल चिकित्सक डॉ. नित्यानंद त्रिपाठी का। डॉ. त्रिपाठी ने आईएएनएस को जारी एक बयान में कहा है, “भारत में हृदय रोग की महामारी को रोकने का एकमात्र तरीका लोगों को शिक्षित करना है, वरना 2020 तक सबसे अधिक मौत हृदय रोग के कारण ही होगी।”

डॉ. त्रिपाठी ने कहा है, “दिल के दौरे का संबंध पहले बुढ़ापे से माना जाता था। लेकिन अब अधिकतर लोग उम्र के दूसरे, तीसरे और चौथे दशक के दौरान ही दिल की बीमारियों से पीड़ित हो रहे हैं। आधुनिक जीवन के बढ़ते तनाव ने युवाओं में दिल की बीमारियों के खतरे पैदा कर दिया है।

हालांकि अनुवांशिक और पारिवारिक इतिहास अब भी सबसे आम और अनियंत्रित जोखिम कारक बना हुआ है, लेकिन युवा पीढ़ी में अधिकतर हृदय रोग का कारण अत्यधिक तनाव और लगातार लंबे समय तक काम करने के साथ-साथ अनियमित नींद पैटर्न है।

धूम्रपान और आराम तलब जीवनशैली भी 20 से 30 साल के आयु वर्ग के लोगों में इसके जोखिम को बढ़ा रही है।” बयान के अनुसार, देश में हृदय अस्पतालों में दो लाख से अधिक ओपन हार्ट सर्जरी की जाती है और इसमें सालाना 25 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है। लेकिन यह सर्जरी केवल तात्कालिक लाभ के लिए होती है।

हृदय रोग के कारण होने वाली मौतों को रोकने के लिए लोगों को हृदय रोग और इसके जोखिम कारकों के बारे में अवगत कराना महत्वपूर्ण है। डॉ. त्रिपाठी के अनुसार, “कोरोनरी हृदय रोग ठीक नहीं हो सकता है, लेकिन इसके इलाज से लक्षणों का प्रबंधन करने, दिल की कार्यप्रणाली में सुधार करने और दिल के दौरे जैसी समस्याओं को कम करने में मदद मिल सकती है। इसके लिए जीवनशैली में परिवर्तन, दवाएं और नॉन-इंवैसिव उपचार शामिल हैं।

अधिक गंभीर मामलों में इंवैसिव और शल्य चिकित्सा उपचार की आवश्यकता होती है।”डॉ. त्रिपाठी ने कहा है, “सभी हृदय रोगियों में समान लक्षण नहीं होते हैं और एंजाइना छाती का दर्द इसका सबसे आम लक्षण नहीं है। कुछ लोगों को अपच की तरह असहज महसूस हो सकता है और कुछ मामलों में गंभीर दर्द, भारीपन या जकड़न हो सकता है।

आमतौर पर दर्द छाती के बीच में महसूस होता है, जो बाहों, गर्दन, जबड़े और यहां तक कि पेट तक फैलता है, और साथ ही धड़कन का बढ़ना और सांस लेने में समस्या होती है।”उन्होंने कहा है, “धमनियां पूरी तरह से अवरुद्ध हो जाती हैं, तो दिल का दौरा पड़ सकता है, जो हृदय की मांसपेशियों को स्थायी नुकसान पहुंचा सकता है। दिल के दौरे में होने वाले दर्द में पसीना आना, चक्कर आना, मतली और सांस लेने में तकलीफ जैसी समस्याएं हो सकती हैं।”

–आईएएनएस

Continue Reading

स्वास्थ्य

सेरिडॉन समेत तीन दवाओं से हटा बैन

Published

on

Medicines
प्रतीकात्मक तस्‍वीर

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सेरिडॉन, प्रिट्रान और डार्ट ड्रग्स दवाओं पर लगे बैन को हटा दिया। यह आदेश कोर्ट ने दवा निर्माताओं की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब देने को कहा है।

गौरतलब है, ये सभी दवाएं 328 दवाओं की उस लिस्ट में मौजूद हैंं, जिन्हें पिछले दिनों केन्द्र सरकार ने बैन कर दिया था। केन्द्र सरकार ने एक ही झटके में इन 328 फिक्स डोज कॉम्बीनेशन (एफडीसी) दवाओं की बिक्री पर रोक लगा दी थी। बता दें कि एफडीसी वे दवाएं हैं जो दो या दो से अधिक दवाओं के अवयवों (सॉल्ट) को मिलाकर बनाई जाती हैं। अधिकांश देशों में इन दवाओं के सेवन पर बैन लगा हुआ है।

जानकारी के अनुसार, ड्रग टेक्निकल अडवाइजरी बोर्ड ने इस पर एक कमिटी का गठन किया। कमिटी ने 343 दवाओं पर लगाए गए बैन को जायज ठहराया। इसके साथ ही छह दवाओं के निर्माण और बिक्री के लिए कुछ शर्तें लगा दी। सरकार ने इनमें से 328 दवाओं को बैन किया है। बैन के बाद से ही बाजार से इन दवाओं के बाहर होने का रास्ता साफ हो गया।

बता दें, देश में मौजूदा तमाम स्वास्थ्य संगठन लंबे अर्से से ये दावा करते आ रहे थे कि इन दवाओं के सेवन से मरीजों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ होता है औऱ ये जानलेवा भी साबित हो सकता है। एक ओर जहां अमेरिका, फ्रांस, जापान, जर्मनी और ब्रिटेन समेत अधिकांश देशों में एफडीसी पर बैन लगा है तो वहीं दूसरी ओर भारत सहित कई विकासशील देशों में ये बिकती हैं। देश में महज पुडुचेरी एक ऐसा राज्य है, जिसने एफडीसी पर बैन लगा दिया हैं।

Continue Reading

Most Popular