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स्वास्थ्य

चुकंदर अल्जाइमर में लाभकारी

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चुकंदर में पाया जाने वाला एक तत्व अल्जाइमर रोकने में मदद कर सकता है। इसी तत्व की वजह से चुकंदर का रंग लाल होता है। इससे अल्जाइमर बीमारी की दवा विकसित की जा सकती है।

शोध के निष्कर्षो से पता चलता है कि चुकंदर के रस में बीटानिन तत्व पाया जाता है, जो दिमाग में मिसफोल्डेड प्रोटीन के संचय को धीमा कर सकता है। मिसफोल्डेड प्रोटीन का संचय अल्जाइमर बीमारी में से जुड़ा होता है।

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साउथ फ्लोरिडा विश्वविद्यालय के ली-जून मिंग ने कहा, “हमारे आंकड़ों से पता चलता है कि बीटानिन दिमाग में कुछ रासायनिक क्रियाओं के लिए एक अवरोधक का काम करता है, जो अल्जाइमर बीमारी के होने में शामिल होते हैं। बीटा-एमालॉएड एक चिपचिपा प्रोटीन का टुकड़ा या पेप्टाइड होता है, जो कि दिमाग में जमा होता है।

यह दिमाग की कोशिकाओं के संचार में बाधा डालता है। इन दिमाग की कोशिकाओं को न्यूरान्स कहते हैं। सबसे ज्यादा नुकसान तक होता है, जब बीटा-एमालॉएड खुद को धातुओं जैसे लोहा या तांबे से जोड़ लेता है। इन धातुओं से बीटा-एमालॉएड पेप्टाइड एक समूह में बंध जाते हैं, जिससे सूजन व ऑक्सीकरण बढ़ सकता है।

–आईएएनएस

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ब्लॉग

नवजात शिशुओं में लीवर रोग की पहचान के लिए जागरूकता अभियान

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Liver Disease Newborns

नई दिल्ली, 19 अप्रैल | नवजात शिशुओं और छोटे बच्चों को आमतौर पर प्रभावित करने वाली लीवर की बीमारी को लेकर आम लोगों के बीच जागरूकता फैलाने के लिए अपोलो अस्पताल ने वर्ल्ड लीवर डे के मौके पर जागरूकता अभियान चलाया। अपोलो हॉस्पिटल्स ग्रुप में मेडिकल डायरेक्टर व सीनियर कन्सलटेन्ट डॉ. अनुपम सिब्बल ने कहा, “दिमाग के बाद लीवर शरीर का दूसरा सबसे बड़ा ठोस अंग है, जो बहुत सारे मुश्किल काम करता है। लीवर हमारे शरीर में ऐसे सभी कामों को अंजाम देता है, जो अन्य अंगों के ठीक कार्य करने के लिए जरूरी हैं।”

उन्होंने कहा, “लीवर पाचन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भोजन पचाने के लिए बाईल बनाने के अलावा लीवर ब्लड शुगर को नियन्त्रित रखने में मदद करता है, शरीर से विषैले पदार्थों को बाहर निकालता है और कॉलेस्ट्रॉल का स्तर सामान्य बनाए रखता है। लीवर क्लॉटिंग फैक्टर्स, एल्बुमिन और ऐसे कई महत्वपूर्ण उत्पाद बनाता है।”

डॉ. अनुपम सिब्बल ने कहा, “लीवर बिना रुके काम करता है और अक्सर इसमें किसी भी तरह की खराबी के लक्षण जल्दी से दिखाई नहीं देते। लीवर रोगों के आम लक्षण हैं आंखों का पीला पड़ना, पेशाब का रंग पीला होना, भूख न लगना, मतली और उल्टी। 100 से ज्यादा ऐसी बीमारियां हैं जिनका असर लीवर पर पड़ता है।”

उन्होंने कहा, “अगर आपको पेट के आस-पास सूजन, पैरों में सूजन, वजन में कमी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं तो तुरंत डॉक्टर की सलाह लें।”

डॉ. अनुपम सिब्बल ने लीवर की बीमारियों से बचने और इसके प्रबन्धन के लिए सुझाव दिए। इसमें हर बच्चे को जन्म के तुरंत बाद हेपेटाइटिस बी का टीका लगाना, रक्त और रक्त उत्पादों का इस्तेमाल करने से पहले हेपेटाइटिस बी और सी की जांच, साफ पेयजल का ही सेवन करना, कच्चे फलों और सब्जियों को सेवन से पहले अच्छी तरह धोना, जब भी संभव हो हेपेटाइटिस ए का टीका लगवाना, नवजात शिशु को अगर दो सप्ताह से ज्यादा पीलिया रहता है तो इसकी जांच करवाना चाहिए ताकि अगर लीवर की कोई बीमारी है तो इसका निदान कर तुरंत इलाज किया जा सके।

हाल ही में हेपेटाइटिस बी, सी और कई अन्य आनुवंशिक बीमारियों का इलाज खोज लिया गया है और यह सभी आधुनिक इलाज भारत में उपलब्ध हैं। भारत में लीवर ट्रांसप्लान्ट अब कामयाबी से किया जा रहा है।

–आईएएनएस

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स्वास्थ्य

भोजन में कार्बोहाइड्रेड ज्यादा लेने से दोबारा कैंसर का खतरा

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डाइट
File Photo

भोजन में कार्बोहाइड्रेड और शुगर की मात्रा अधिक होने से सिर और गले के कैंसर के उपचाराधीन मरीज को दोबारा कैंसर का खतरा बढ़ सकता है और वह मौत का कारण बन सकता है।

यह बात एक शोध में सामने आई है। शोध में पाया गया है कि कैंसर का इलाज से पहले के साल में जिन्होंने कार्बोहाइड्रेट और सुक्रोज, फ्रक्टोज, लैक्टोज और माल्टोज के रूप में शुगर ज्यादा लिया, उनमें मृत्यु का खतरा अधिक होता है। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ कैंसर में प्रकाशित अध्ययन में कैंसर के 400 मरीजों में 17 फीसदी से अधिक मरीजों में कैंसर की पुनरावृत्ति दर्ज की गई, जबकि 42 फीसदी की मौत हो गई।

अरबाना शैंपैन स्थित इलिनोइस विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और प्रमुख शोधकर्ता अन्ना ई. आर्थर ने बताया कि कार्बोहाइड्रेट खाने वाले मरीजों और अन्य मरीजों में कैंसर के प्रकार और कैंसर के चरण में अंतर पाया गया। हालांकि उपचार के बाद कम मात्रा में वसा और अनाज, आलू जैसे स्टार्च वाले भोजन खाने वाले मरीजों में बीमारी की पुनरावृत्ति व मौत के खतरे कम हो सकते हैं।

–आईएएनएस

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स्वास्थ्य

भारत में प्रति 100 व्यक्तियों में से एक सीलियक रोग से ग्रस्त

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दुनिया की आबादी का लगभग 0.7 प्रतिशत हिस्सा सीलिएक रोग से प्रभावित है। वहीं भारत में इस बीमारी से करीब 60 से 80 लाख लोगों के ग्रसित होने का अनुमान है।

ताजा आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर भारत में प्रति 100 में एक व्यक्ति इस बीमारी से जूझ रहा है। सीलियक एक गंभीर ऑटोइम्यून डिसऑर्डर है, जो आनुवंशिक रूप से अतिसंवेदनशील लोगों में हो सकता है। आनुवंशिकी इस स्थिति के प्रसार में एक प्रमुख भूमिका निभाती है और इसलिए यह समस्या बच्चों में भी हो सकती है।

हार्ट केअर फाउंडेशन ऑफ इंडिया (एचसीएफआई) के अध्यक्ष एवं इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. के. के. अग्रवाल ने कहा, “सीलियक बीमारी से पीड़ित लोग ग्लूटेन नामक प्रोटीन को पचाने में सक्षम नहीं होते हैं, जो गेहूं व जौ के आटे में पाया जाता है।

ग्लूटेन इन रोगियों के प्रतिरक्षा तंत्र को छोटी आंत में क्षति पहुंचाने के लिए सक्रिय कर देता है। परिणामस्वरूप, रोगी भोजन से पोषक तत्वों को अवशोषित नहीं कर पाते हैं और कुपोषित रहने लगते हैं, जिससे एनीमिया हो जाता है, वजन में कमी होती है और थकान रह सकती है।”

उन्होंने कहा, “सीलियक रोगियों में वसा का ठीक से अवशोषण नहीं हो पाता है। गेहूं से एलर्जी, डमेर्टाइटिस हर्पेटिफॉर्मिस, मल्टीपल स्लेरोसिस, ऑटोइम्यून डिसऑर्डर, ऑटिज्म स्पेक्ट्रम विकार यानी एडीएचडी और कुछ व्यवहार संबंधी समस्या वाले रोगियों को ग्लूटेन फ्री आहार लेने की सिफारिश की जाती है।

ग्लूटेन युक्त अनाजों में गेहूं, जौ, राई, जई और ट्रिटिकेल प्रमुख हैं। कुछ खाद्य पदार्थों में स्वाद बढ़ाने या चिपकाने वाले एजेंट के रूप में ग्लूटेन मिला दिया जाता है। ऐसी हालत में व्यक्ति को ग्लूटेन फ्री फूड खाना चाहिए।”

आईजेसीपी के समूह संपादक डॉ. अग्रवाल ने बताया, “सीलियक बीमारी वाले व्यक्ति को गेहूं, राई, सूजी, ड्यूरम, माल्ट और जौ जैसे पदार्थों से दूर रहना चाहिए। ग्लूटेन की मौजूदगी पता करने के लिए उत्पादों के लेबल को जांच लेना चाहिए।

कुछ चीजें जिनमें ग्लूटेन हो सकता है, वे हैं- डिब्बाबंद सूप, मसाले, सलाद ड्रेसिंग, कैंडीज और पास्ता आदि। उन्होंने कहा, “हालांकि, इसका यह मतलब नहीं कि भोजन में विविधता नहीं हो सकती है। चावल, ज्वार, क्विनोआ, अमरंथ, बाजरा, रागी और बकव्हीट जैसे विकल्पों का उपयोग संभव है।”

— आईएएनएस

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