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संघ का अद्भुत शोध: बीफ़ का सेवन जारी रहने तक होती रहेगी लिंचिंग!

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Indresh Kumar

इन्द्रेश कुमार सरीखे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ विचारक/प्रचारक/नेता का नज़रिया कितना संकुचित और मूर्खतापूर्ण हो सकता है, इसे समझने के लिए उनका वो ताज़ा बयान ही पर्याप्त है, जहाँ वो कहते हैं कि “बीफ़ खाना बन्द हो तो रुक जाएगी मॉब लिंचिंग!” इन्द्रेश कुमार, संघ से जुड़े संगठन ‘राष्ट्रीय मुस्लिम मंच’ के संरक्षक हैं और मुसलमानों को संघ के नज़दीक लाने का काम देखते हैं। उन्होंने राँची में हिन्दू जागरण मंच की झारखंड इकाई का शुभारम्भ करने के बाद पत्रकारों के सवालों के जबाब में बीफ़ और लिंचिंग के बीच सम्बन्ध की व्याख्या करने के लिए ऐसे अद्भुत सिद्धान्त का प्रतिपादन किया!

इन्द्रेश कुमार का बयान पूरी तरह से भ्रामक है। इसे धर्मान्ध और मन्दबुद्धि सवर्ण हिन्दुओं को भ्रमित करने तथा उल्लू बनाने के लिए उछाला गया है। इस बयान का मक़सद इस मूर्खतापूर्ण सिद्धान्त का प्रतिपादन करना है कि ‘लिंचिंग इसलिए होती है, क्योंकि बीफ़ का सेवन होता है।’ बयान का निहितार्थ ये भी है कि ‘जब तक बीफ़ का सेवन होगा, तब तक लिंचिंग होती रहेगी!’ इसीलिए ये समझना बेहद ज़रूरी है कि इन्द्रेश कुमार ने ऐसा बयान देकर दोधारी तलवार भाँजी है! एक तीर से कई निशाने साधे हैं!

यदि इन्द्रेश कुमार का अद्भुत ‘बीफ़-लिंचिंग सिद्धान्त’ सही हो तो इसका मतलब ये हुआ कि बाढ़ को ख़त्म करना हो तो नदियों और बारिश को ख़त्म करना होगा! सूखे को ख़त्म करना हो तो सूर्य को ख़त्म करना होगा! महिलाओं से होने वाले दुष्कर्मों की रोकथाम करनी हो तो उन्होंने जन्म लेते ही मार देना होगा! ग़रीबी को दूर करना है तो ग़रीबों को सफ़ाया ज़रूरी है! साफ़ है कि इन्द्रेश कुमार मूर्खतापूर्ण बातें कर रहे हैं। लेकिन इतनी सी बात संघ के अन्ध-भक्तों के समझ में नहीं आती। क्योंकि इन्द्रेश कुमार की छवि संघ के वरिष्ठ नेताओं वाली है। संघ, धूर्त हिन्दुओं का ऐसा संगठन है जहाँ धूर्तता ही बोयी जाती है, धूर्तता ही काटी जाती है और धूर्तता का ही प्रचार-प्रचार किया जाता है, ताकि भारत की सत्ता धूर्तों की मुट्ठी में रहे!

इसी सत्ता की शिखर पर फ़िलहाल संघ ने नरेन्द्र मोदी को बैठा रखा है। लेकिन बीते 50 महीनों में मोदी-राज ने सिर्फ़ इतना साबित किया है कि इससे घटिया हुक़ूमत देश ने पहले कभी नहीं देखी। एक ग़रीब और विकासशील देश अपनी असंख्य चुनौतियों से जूझता हुआ धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। लेकिन मोदी राज की आर्थिक और सामाजिक नीतियों ने इसका बेड़ा गर्क कर दिया है। मोदी सरकार को पता है कि उसके अदूरदर्शी और मूर्खतापूर्ण फ़ैसलों की वजह से उसकी वो लोकप्रियता औंधे मुँह गिर चुकी है, जिसे 2014 में उसने तरह-तरह का झूठ फ़ैलाकर हथियाया था।

संघ-बीजेपी को पता है कि अब सिर्फ़ मन्दबुद्धि सवर्ण हिन्दू ही उसके समर्थक या वोट बैंक के रूप में उसके साथ बचे हुए हैं। बाक़ी दलित और पिछड़े वर्ग के हिन्दुओं का इनकी नीतियों और कार्यप्रणाली से मोहभंग हो चुका है। मुसलमान को इनकी साम्प्रदायिक नीतियों से हमेशा नफ़रत रही है। लेकिन अपनी साम्प्रदायिकता को चमकाते हुए संघियों ने हिन्दुओं के बीच अपनी पैठ बनायी है। इसके लिए धर्म और तमाम धार्मिक प्रतीकों का बेइन्तेहा इस्तेमाल किया गया है। दशकों पहले संघियों ने सफलतापूर्वक गाय को एक पशु से धार्मिक प्रतीक बना दिया था। उन्होंने अन्तहीन अफ़वाहें फ़ैलायीं कि गाय पर हमला हिन्दुओं के धर्म पर हमला है। गाय की हत्या करना या उसका माँस (बीफ़) खाना पाप है।

संघियों ने मन्दबुद्धि हिन्दुओं में ये धारणा बैठा दी है कि लोकतंत्र में चुनी हुई सरकारें भले ही गाय की हत्या को अपराध से जोड़कर देखती रहें, लेकिन जो लोग सरकारी तंत्र की प्रतीक्षा किये बग़ैर सीधे धर्म की रक्षा करने के लिए आगे आते हैं, वो धर्मात्मा हैं। इसीलिए तथाकथित धर्मात्माओं को जब भी ये लगे कि कोई गाय के लिए संकट पैदा कर रहा है तो धर्म की स्थापना की ख़ातिर गाय की रक्षा करें। इस गौरक्षा के लिए यदि वो इन्सानों की भी बलि चढ़ा दें, तो उन्हें कोई पाप नहीं लगेगा। अलबत्ता, इन्सानों की हत्या होने की वजह से जब क़ानून अपना काम करने की कोशिश करेगा, तब हिन्दुत्व को सर्वोपरि मानने वाली सत्ता उन ढोंगी धर्मात्माओं की हर तरह से मदद करेगी!

यही वजह है कि मन्दबुद्धि हिन्दुओं को इक्कठा रखने के लिए आये दिन लिंचिंग की वारदाते सामने आ रही हैं। इससे सियासी कोहराम मचता है। राज्य हो या केन्द्र की सरकारों पर क़ानून का राज स्थापित करने का दबाब पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट भी लिंचिंग करने वालों के प्रति सख़्ती से पेश आने का आदेश जारी करता है। केन्द्र सरकार को लिंचिंग की रोकथाम के लिए मशविरा देने के लिए समिति बनानी पड़ती है। तो क्या इस तरह की हलचलों को देखकर धर्मात्माओं को सहम जाना चाहिए? अरे, वो सहम गये तो फिर 2019 में संघ-बीजेपी की लुटिया को डूबने से कोई नहीं बचा सकता।

इसीलिए इन्द्रेश कुमार जैसे संघ के चोटी के धूर्तज्ञ एक ओर तो लिंचिंग पर अफ़सोस जताते हैं, तो दूसरी ओर उसी क्षण, लिंचिंग को स्वाभाविक बताने की भी साज़िश रचते हैं। कुतर्क गढ़े जाते हैं कि जब तक बीफ़ का सेवन होगा, तब तक लिंचिंग होती रहेगी! यानी, हे लिंचिंग को अंज़ाम देने वाले धर्मात्माओं, तुम तब तक धर्म की रक्षा करने के लिए लिंचिंग करते रहो, जब तक कि हम ये कहते रहें कि लोग और ख़ासकर मुसलमान बीफ़ खा रहे हैं, गाय का क़त्ल कर रहे हैं और उसके माँस का कारोबार किया जा रहा है!

रही बात, क़ानून-व्यवस्था को स्थापित करने वाली राज्य सरकारों, पुलिस और अदालत की जबाबदेही की तो भी यही दलील पर्याप्त होगी कि ‘जब तक बीफ़ का सेवन होगा, तब तक लिंचिंग होती रहेगी।’ चूँकि सरकार और पुलिस अन्य अपराधों की तरह बीफ़ के सेवन को रोक नहीं पा रही हैं, लिहाज़ा लिंचिंग को भी नहीं रोका जा सकता। जिस तरह से समाज में चोरी-डकैती-ठगी, हत्या-बलात्कार वग़ैरह होते रहेंगे, उसी तरह से लिंचिंग भी होती रहेगी। जो लोग इसे लेकर दुःखी हैं, वो वोट बैंक और देश को तोड़ने की सियासत कर रहे हैं!

लिंचिंक का बचाव करने की जो दलीलें इन्द्रेश कुमार ने समस्त संघी धर्मात्माओं पर चस्मा की हैं, उससे पहले बीकानेर के सांसद और केन्द्रीय वित्त राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल भी ज़बरदस्त धमाकेदार बयान दे चुके हैं। अलवर में अकबर उर्फ रकबर की लिंचिंग (21 जुलाई 2018) के ज़रिये हुई हत्या के बाद पूर्व प्रशासनिक अधिकारी मेघवाल ने सवा सौ करोड़ भारतवासियों को ज्ञानालोकित किया था कि “जैसे-जैसे प्रधानमंत्री मोदी पॉपुलर हो रहे हैं, इस तरह की घटनाएँ सामने आ रही हैं। यह सब मोदी जी क्यों पॉपुलर हो रहे हैं? इससे डरकर किया जा रहा है। केन्द्र सरकार ने राज्य सरकारों को कह दिया है कि इस तरह की किसी भी घटना पर कार्रवाई करें। लेकिन जैसे-जैसे 2019 का चुनाव नज़दीक आ रहा है, वैसे-वैसे नरेन्द्र मोदी की पॉपुलैरिटी और बढ़ती जा रही है। इसीलिए ये सब घटनाएँ सामने आ रही हैं।”

इसका मतलब ये हुआ कि सिर्फ़ बीफ़ के सेवन की वजह से ही नहीं बल्कि मोदी की लोकप्रियता बढ़ने की वजह से भी लिंचिंग हो रही है। इसी वजह से मोदी सरकार के नागरिक उड्डयन राज्यमंत्री जयन्त सिन्हा ने अपने घर पर रामगढ़ लिंचिंग कांड (29 जून 2017) के उन आठ अपराधियों का माल्यार्पण करके अभिनन्दन किया, जिन्हें बाक़ायदा अदालत ने लिंचिंग का दोषी पाने के बाद उम्र-क़ैद की सज़ा दी थी। इन्हें झारखंड हाईकोर्ट ने सिर्फ़ ज़मानत दी थी, बेकसूर बताते हुए लिंचिंग के गुनाह करते हुए अलीमुद्दीम नाम कार ड्राइवर की हत्या के क़सूर से बरी नहीं किया था।

इन्द्रेश कुमार से पहले 20 जुलाई को लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर हुई बहस के दौरान संघ परिवार के एक अन्य महापुरुष तथा केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह भी लिंचिंग की एक अलग व्याख्या कर चुके हैं। तब राजनाथ सिंह ने अघोषित तौर पर कहा था कि मोदी राज की लिंचिंग के बारे में सवाल तब पूछिएगा, जब इसमें मारे जा रहे लोगों की संख्या चौरासी का दंगों में मारे गये लोगों को पार कर जाए, क्योंकि वो ‘सबसे बड़ी लिंचिंग’ थी। इसीलिए आये दिन हो रही छिटपुट लिंचिंग पर चिन्ता करने की कोई ज़रूरत नहीं है। भले ही अब इसमें बच्चा-चोरी के नाम पर मौक़े पर ही किसी को भी मौत के घाट उतार देने की घटनाएँ भी जुड़ती जा रही हों।

हालाँकि, इसी मौके पर विश्व के सबसे वाचाल राजनेता के रूप में दुनिया भर में अपना परचम लहरा रहे, संघ परिवार की अनन्य विभूति और भारत के ‘लोकप्रिय’ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बमुश्किल 10 सेकेंड के भीतर ये कहकर रस्म अदायगी की कि ‘लिंचिंग मानवता के ख़िलाफ़ है और राज्यों को कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए!’ बहरहाल, अब आप चाहें तो ये तय करें कि जिस बीफ़ को उत्तर भारत के राज्यों में खाना पाप है और जिसके लिए तत्काल लिंचिंग रूपी मृत्युदंड मिलना स्वाभाविक है, उसी बीफ़ को उत्तर पूर्वी राज्यों तथा दक्षिण-पश्चिम भारत के कई बीजेपी शासित राज्यों में खाना क्यों पाप नहीं है! वहाँ लिंचिंग की बर्बर सज़ा क्यों प्रभावी नहीं है! इससे ‘एक देश – एक निशान – एक विधान’ वाला श्यामा प्रसाद मुखर्जी का चिन्तन कितना खोखला साबित होगा!

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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समाज में बदलाव के लिए अपने घर में झांकने की जरूरत : निकिता आनंद

साल 2003 की मिस इंडिया का कहना है कि महिलाओं के साथ हो रहे उत्पीड़न पर लगाम लगाने व समाज में सुधार और बदलाव लाने के लिए घर से शुरुआत करनी चाहिए और बाहर के बजाय सबसे पहले घर में झांककर देखना चाहिए कि घर में क्या हो रहा है।

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नई दिल्ली, 7 दिसंबर | साल 2003 की मिस इंडिया टाइटल विजेता व अभिनेत्री निकिता आनंद का मानना है कि समाज में कोई भी सुधार लाने के लिए हमें सबसे पहले अपने घर में झांककर देखना चाहिए और घर से सुधार व बदलाव लाने की कोशिश करनी चाहिए।

निकिता हाल ही में राष्ट्रीय राजधानी में ‘इंटरनेशनल वीमेन पॉलिटेक्निक’ द्वारा आयोजित ‘मिराकी 2018’ कार्यक्रम का हिस्सा बनीं, जहां उन्होंने आईएएनएस से बात की।

निकिता से जब पूछा गया कि मॉडलिंग में उनका कैसे आना हुआ तो उन्होंने आईएएनएस को बताया, “मैं आर्मी बैकग्राउंड से हूं मेरे पिता डॉक्टर हैं। 10वीं के बाद या 12 वीं के आसपास मेरी मॉडलिंग शुरू हो गई थी और मैंने काफी लोकल पेजेन्ट्स भी जीते हैं और साथ ही साथ प्रोफेशनल रैंप वॉक भी शुरू कर दिया था और मैं एनआईएफटी की स्टूडेंट थीं तो फैशन डिजाइनिंग भी हो रही थी और फैशन रैंप वॉक भी हो रहा था। मुझे मिस इंडिया के लिए पार्टिसिपेट करने का ख्याल आया और थोड़ा सोचने के बाद हिस्सा ले लिया और फिर मैंने मिस इंडिया का टाइटल जीत लिया।”

टीएलसी के शो ‘ओ माई गोल्ड’ की मेजबानी कर चुकीं निकिता को वास्तविक जीवन में गोल्ड के बजाय प्लेटिनम ज्यूलरी ज्यादा पसंद है। शो के बारे में उन्होंने कहा, “इस शो के लएि हमने पूरे देशभर में ट्रैवल किया जो दिलचस्प था। इसमें हमने गोल्ड के बारे में बात की थी, क्योंकि भारत में पारंपरिक आभूषण के तौर पर ज्यादातर पीले सोने का इस्तेमाल होता है। शो करके मुझे मुझे दक्षिण भारतीय और बंगाली ज्यूलरी के बारे में बहुत कुछ जानने को मिला, लेकिन मुझे निजी तौर पर गोल्ड के बजाय प्लेटिनम और डायमंड ज्यूलरी ज्यादा पसंद है। मैं इनेक आभूषण ज्यादातर पहनती हूं।”

साल 2003 की मिस इंडिया का कहना है कि महिलाओं के साथ हो रहे उत्पीड़न पर लगाम लगाने व समाज में सुधार और बदलाव लाने के लिए घर से शुरुआत करनी चाहिए और बाहर के बजाय सबसे पहले घर में झांककर देखना चाहिए कि घर में क्या हो रहा है।

उन्होंने कहा, “महिलाओं के साथ उत्पीड़न की बहुत सारी घटनाएं होती हैं। भारत में हर रोज हर क्षण कहीं न कहीं नाइंसाफी होती है। ऐसे लाखों केस होते होंगे जो कि रिपोर्ट नहीं होते हैं। किसी भी क्षेत्र में किसी भी किस्म के इंसान में बदलाव लाने का काम हमेशा शिक्षा से ही होता है। अपने बच्चों को क्या सिखाते हैं यह मायने रखता है। लोगों की मानसिकता होती है कि पहले बाहर देखो, वहां क्या खराब हो रहा है। लेकिन अपने घर में नहीं झांककर देखते कि उनके घर में क्या हो रहा है।”

निकिता ने कहा कि बच्चा स्कूल से ज्यादा वक्त घर में बिताता है, तो घर में अच्छे संस्कार व माहौल देने की कोशिश करनी चाहिए, तभी वह अच्छा नागरिक बन सकेगा। समाज में सुधार और बदलाव लाने की कोशिश घर से की जानी चाहिए। इस तरह की घटनाओं पर लगाम लगाने और समाज में बदलाव लाने के मानसिकता में बदलाव लाना बेहद जरूरी है।

उनका मानना है कि ‘हैशटैगमीटू’ मूवमेंट को आगे बढ़ाया जाना चाहिए, जिससे और महिलाओं को भी आगे आकर अपनी दास्तां बयां करने का प्रोत्साहन मिले।

उन्होंने कहा, “मेरा मानना है कि इस मूवमेंट को आगे बढ़ाना चाहिए, आवाज तो हर किसी की है तो क्यों एक हिस्से को बोलने दिया जाए और एक हिस्से को दबाया जाए वो नहीं होना चाहिए। जब हम समानता की और सशक्तिकरण की बात करते हैं तो इसका मतलब यही है न कि सबको समान अधिकार मिले। अगर किसी और के आगे आने से और उसकी कहानी आगे आने से किसी और को प्रोत्साहन मिलता है तो ये एक अच्छी बात है। किसी भी महिला के लिए अपने हुए दर्दनाक वाकये को याद करना मुश्किल होता है। उसकी भावना को समझने की कोशिश करनी चाहिए।”

मॉडलिंग में आने की ख्वाहिश रखने वाली लड़कियों के लिए दिए संदेश में उन्होंने कहा, “सबसे पहले आपको तय करना चाहिए कि आपको कहां जाना है, क्योंकि यह आसान लाइन नहीं है, आपके पास जरूरी क्राइटेरिया होनी चाहिए जैसे रैंप वॉक के लिए एक परफेक्ट बॉडी स्ट्रक्चर और हाइट होनी चाहिए। अगर, आपको प्रिंट मॉडलिंग के लिए जाना है तो फिर आपके पास वैसा चेहरा-मोहरा, भाव-भंगिमा होनी चाहिए, जिसे कैमरा अच्छे से कैप्चर कर सकें। आप किसी भी फील्ड को बस इसलिए नहीं चुने कि वो आपको आकर्षित कर रहा है, बल्कि अच्छे से आकलन कर लें कि आप उसके लायक है या नहीं।”

निकिता ने ‘लाइफ में कभी-कभी’ और ‘फोर टू का वन’ जैसी फिल्मों में भी काम किया है। लेकिन अब वह फिल्में नहीं कर रही हैं। फिल्मों से दूरी बनाने के बारे में उन्होंने कहा, “मैंने फिल्मों में काम किया है, लेकिन मुझे टेलीविजन प्रेजेंट करना या फिर लाइव शो करना ज्यादा पसंद है। आजकल मैं गायन का भी प्रशिक्षण ले रही हूं आगे जाकर मैं गायन में भी परफार्मेस दूंगी। अगर मैं टीवी की बात करूं तो मैंने लाइफस्टाइल के अलावा स्पोर्ट्स शो भी बहुत किया है, क्रिकेट पर भी बहुत शो किया है। मुझे टीवी बहुत पसंद आता है, क्योंकि निजी जिंदगी में मैं बहुत आर्गनाइज हूं और यही चीज टीवी में भी है।”

–आईएएनएस

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ओपिनियन

सहित्य साधना सृजन की चीज : वीणा ठाकुर

कथाकार वीणा का कहना है कि पुरस्कार एक उपलब्धि होती है, इसे नकारा नहीं जा सकता, लेकिन साहित्य सृजन की चीज है, जिसका सही मूल्यांकन पाठक ही करते हैं।

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veena thakur maithili sahitya
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दरभंगा, 6 दिसंबर | सर्वोच्च साहित्यिक संस्था साहित्य अकादमी से मिथिला क्षेत्र की समृद्ध मैथिली भाषा ही बिहार को अमूमन हर साल पुरस्कार दिलाती रही है। इस बार इस पुरस्कार के लिए दरभंगा की रहने वाली कथाकार प्रो.वीणा ठाकुर को चुना गया है। वीणा का चयन उनके कथा-संग्रह ‘परिणीता’ के लिए किया गया है।

वीणा का कहना है कि साहित्य साधना की चीज है। किसी भी कृति का समय खुद मूल्यांकन करता है, इस कारण साहित्यकारों को हड़बड़ी में नहीं, बल्कि किसी भी रचना के लिए धैर्य रखने की जरूरत है।

बचपन से ही लिखने-पढ़ने की शौक रखने वाली वीणा अपने संस्मरणों को याद करते हुए बताती हैं, “जब मैं पांचवीं कक्षा में थी, तभी तुलसीदास की रामचरित मानस पढ़ ली थी। यही नहीं, छठे वर्ग की पढ़ाई के दौरान ही घर से पैसे चुराकर विमल मित्र के बांग्ला उपन्यास का हिंदी अनुवाद ‘खरीदी कौड़ियों का मोल’ खरीदकर लाई थी और उसे मैंने पढ़ा था। पैसे चुराने को लेकर मुझे घर में डांट भी पड़ी थी।”

मधुबनी जिले के भवानीपुर की बेटी और दरभंगा के पंचोभ गांव की बहू वीणा ने अकादमी पुरस्कार की घोषणा के बाद आईएएनएस से खास बातचीत में कहा कि यह सम्मान मैथिली भाषा का है। इस पुरस्कार के बाद उनकी जिम्मेवारी और बढ़ गई है।

उन्होंने कहा कहा, “वैसे तो साहित्यकारों के लिए कई पुरस्कार हैं, लेकिन साहित्य अकादमी पुरस्कार साहित्यकारों के लिए सर्वोच्च पुरस्कार है। मुझ पर ईश्वर की असीम अनुकंपा है कि इस पुरस्कार के लिए मेरा नाम चयनित हुआ।”

कथा-संग्रह ‘परिणीता’ की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि इस कथा संग्रह में वैसे तो कई कहानियां हैं, मगर कथा ‘निरूत्तरित प्रश्न’ आज की जीवनशैली के काफी नजदीक है। उन्होंने कहा कि इसमें बुढ़ापे की अवस्था में पहुंचने और पुत्रों के रवैये को बताया गया है।

उपन्यास ‘भारती’, कथा-संग्रह ‘आलाप’, समीक्षा ‘मैथिली रामकाव्यक परंपरा’, ‘विद्यापतिक उत्स’, ‘इतिहास दर्पण’, ‘वाणिनी’, ‘मैथिली गीत साहित्यक विकास आ परंपरा’ तथा अनुवाद की पुस्तक ‘हाट-बाजार’ और ‘भारतीय कविता संचयन : हिंदी’ की रचनाकार वीणा का कहना है कि आज के युवा साहित्यकार किसी भी काम में हड़बड़ी में रहते हैं और तुरंत सभी कुछ पा लेना चाहते हैं।

उनका मानना है साहित्य हड़बड़ी नहीं, धैर्य की चीज है, जिसमें आपकी कृति या रचना को पाठक अवलोकन और मूल्यांकन करते हैं।

कथाकार वीणा का कहना है कि पुरस्कार एक उपलब्धि होती है, इसे नकारा नहीं जा सकता, लेकिन साहित्य सृजन की चीज है, जिसका सही मूल्यांकन पाठक ही करते हैं।

मधुबनी जिले के भवानीपुर गांव में प्रो. मोहन ठाकुर के घर 19 मार्च, 1954 को जन्म लेने वाली और दरभंगा के पंचोभ गोव में पशु चिकित्सा पदाधिकारी डॉ़ दिलीप झा की पत्नी वीणा ठाकुर बिरला फाउंडेशन के प्रतिष्ठित सम्मान के लिए गठित मैथिली भाषा समिति की संयोजिका हैं।

ललित नारायण विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर मैथिली विभाग की पूर्व अध्यक्ष वीणा की प्रारंभिक शिक्षा सहरसा में हुई और उच्च शिक्षा भागलपुर विश्वविद्यालय में हुई।

मैथिली भाषा के विषय में पूछे जाने पर प्रोफेसर वीणा कहती हैं, “मैंने तो मैथिली भाषा मां की गोद में सीखी। मैं इस भाषा की कृतज्ञ हूं। मेरे लिए यह भाषा नहीं, मेरा साहित्य सफर है। यही कारण है कि मेरी कहानियों में परंपरा, साहित्य, संस्कृति के साथ आधुनिकता से मैथिली के जुड़ने की भी कहानी रहती है।”


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आज के भारतीय सिनेमा में कंटेंट महत्वपूर्ण : मेघना गुलजार

“अब लोग कंटेंट के भूखे हैं..चीजें बदल गई हैं। पहले लोग अक्सर बड़े पर्दे पर बस अपने पसंदीदा सितारों को देखने के लिए थिएटर जाते थे, उन्हें कहानी से कोई मतलब नहीं होता था और अब वही लोग हैं जो कहानी के बारे में जानना चाहते हैं। वे फिल्म की समीक्षा पढ़ते हैं और उसके बाद किसी एक फिल्म को देखने के लिए थिएटर पर जाते हैं।”

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Filmmaker, Meghna Gulzar

फिल्मकार मेघना गुलजार का कहना है कि वह दिन चले गए जब फिल्में स्टार वैल्यू पर हिट हुआ करती थीं। अब भारतीय सिनेमा के दर्शक स्टार के साथ-साथ स्टोरी भी चाहते हैं। उनके मुताबिक, अच्छा कंटेंट आज के समय में फिल्मों की सफलता में एक बड़ी भूमिका निभा रहा है।

टाइम्स लिटफेस्ट दिल्ली 2018 में रविवार को ‘हिंदी सिनेमा के बदलते चलन’ सत्र में मेघना ने कहा, “भारतीय सिनेमा में पहले हीरो और हिरोइनों को ज्यादा तवज्जो दी जाती थी लेकिन अब चीजें पहले जैसी नहीं हैं। अब लोग अभिनेताओं के अलावा कंटेंट को भी महत्व दे रहे हैं..कंटेंट भारतीय सिनेमा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।”

पैनल का हिस्सा रहे गीतकार प्रसून जोशी ने भी इसपर सहमति जताई और कहा कि इस मामले में विकास हुआ है।

उन्होंने कहा, “अब लोग कंटेंट के भूखे हैं..चीजें बदल गई हैं। पहले लोग अक्सर बड़े पर्दे पर बस अपने पसंदीदा सितारों को देखने के लिए थिएटर जाते थे, उन्हें कहानी से कोई मतलब नहीं होता था और अब वही लोग हैं जो कहानी के बारे में जानना चाहते हैं। वे फिल्म की समीक्षा पढ़ते हैं और उसके बाद किसी एक फिल्म को देखने के लिए थिएटर पर जाते हैं।”

सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी ने कहा कि भारत में ‘जानकार (इन्फॉर्म्ड) सिनेमा’ का उदय हुआ है।

–आईएएनएस

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