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संघ का अद्भुत शोध: बीफ़ का सेवन जारी रहने तक होती रहेगी लिंचिंग!

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Indresh Kumar

इन्द्रेश कुमार सरीखे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ विचारक/प्रचारक/नेता का नज़रिया कितना संकुचित और मूर्खतापूर्ण हो सकता है, इसे समझने के लिए उनका वो ताज़ा बयान ही पर्याप्त है, जहाँ वो कहते हैं कि “बीफ़ खाना बन्द हो तो रुक जाएगी मॉब लिंचिंग!” इन्द्रेश कुमार, संघ से जुड़े संगठन ‘राष्ट्रीय मुस्लिम मंच’ के संरक्षक हैं और मुसलमानों को संघ के नज़दीक लाने का काम देखते हैं। उन्होंने राँची में हिन्दू जागरण मंच की झारखंड इकाई का शुभारम्भ करने के बाद पत्रकारों के सवालों के जबाब में बीफ़ और लिंचिंग के बीच सम्बन्ध की व्याख्या करने के लिए ऐसे अद्भुत सिद्धान्त का प्रतिपादन किया!

इन्द्रेश कुमार का बयान पूरी तरह से भ्रामक है। इसे धर्मान्ध और मन्दबुद्धि सवर्ण हिन्दुओं को भ्रमित करने तथा उल्लू बनाने के लिए उछाला गया है। इस बयान का मक़सद इस मूर्खतापूर्ण सिद्धान्त का प्रतिपादन करना है कि ‘लिंचिंग इसलिए होती है, क्योंकि बीफ़ का सेवन होता है।’ बयान का निहितार्थ ये भी है कि ‘जब तक बीफ़ का सेवन होगा, तब तक लिंचिंग होती रहेगी!’ इसीलिए ये समझना बेहद ज़रूरी है कि इन्द्रेश कुमार ने ऐसा बयान देकर दोधारी तलवार भाँजी है! एक तीर से कई निशाने साधे हैं!

यदि इन्द्रेश कुमार का अद्भुत ‘बीफ़-लिंचिंग सिद्धान्त’ सही हो तो इसका मतलब ये हुआ कि बाढ़ को ख़त्म करना हो तो नदियों और बारिश को ख़त्म करना होगा! सूखे को ख़त्म करना हो तो सूर्य को ख़त्म करना होगा! महिलाओं से होने वाले दुष्कर्मों की रोकथाम करनी हो तो उन्होंने जन्म लेते ही मार देना होगा! ग़रीबी को दूर करना है तो ग़रीबों को सफ़ाया ज़रूरी है! साफ़ है कि इन्द्रेश कुमार मूर्खतापूर्ण बातें कर रहे हैं। लेकिन इतनी सी बात संघ के अन्ध-भक्तों के समझ में नहीं आती। क्योंकि इन्द्रेश कुमार की छवि संघ के वरिष्ठ नेताओं वाली है। संघ, धूर्त हिन्दुओं का ऐसा संगठन है जहाँ धूर्तता ही बोयी जाती है, धूर्तता ही काटी जाती है और धूर्तता का ही प्रचार-प्रचार किया जाता है, ताकि भारत की सत्ता धूर्तों की मुट्ठी में रहे!

इसी सत्ता की शिखर पर फ़िलहाल संघ ने नरेन्द्र मोदी को बैठा रखा है। लेकिन बीते 50 महीनों में मोदी-राज ने सिर्फ़ इतना साबित किया है कि इससे घटिया हुक़ूमत देश ने पहले कभी नहीं देखी। एक ग़रीब और विकासशील देश अपनी असंख्य चुनौतियों से जूझता हुआ धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। लेकिन मोदी राज की आर्थिक और सामाजिक नीतियों ने इसका बेड़ा गर्क कर दिया है। मोदी सरकार को पता है कि उसके अदूरदर्शी और मूर्खतापूर्ण फ़ैसलों की वजह से उसकी वो लोकप्रियता औंधे मुँह गिर चुकी है, जिसे 2014 में उसने तरह-तरह का झूठ फ़ैलाकर हथियाया था।

संघ-बीजेपी को पता है कि अब सिर्फ़ मन्दबुद्धि सवर्ण हिन्दू ही उसके समर्थक या वोट बैंक के रूप में उसके साथ बचे हुए हैं। बाक़ी दलित और पिछड़े वर्ग के हिन्दुओं का इनकी नीतियों और कार्यप्रणाली से मोहभंग हो चुका है। मुसलमान को इनकी साम्प्रदायिक नीतियों से हमेशा नफ़रत रही है। लेकिन अपनी साम्प्रदायिकता को चमकाते हुए संघियों ने हिन्दुओं के बीच अपनी पैठ बनायी है। इसके लिए धर्म और तमाम धार्मिक प्रतीकों का बेइन्तेहा इस्तेमाल किया गया है। दशकों पहले संघियों ने सफलतापूर्वक गाय को एक पशु से धार्मिक प्रतीक बना दिया था। उन्होंने अन्तहीन अफ़वाहें फ़ैलायीं कि गाय पर हमला हिन्दुओं के धर्म पर हमला है। गाय की हत्या करना या उसका माँस (बीफ़) खाना पाप है।

संघियों ने मन्दबुद्धि हिन्दुओं में ये धारणा बैठा दी है कि लोकतंत्र में चुनी हुई सरकारें भले ही गाय की हत्या को अपराध से जोड़कर देखती रहें, लेकिन जो लोग सरकारी तंत्र की प्रतीक्षा किये बग़ैर सीधे धर्म की रक्षा करने के लिए आगे आते हैं, वो धर्मात्मा हैं। इसीलिए तथाकथित धर्मात्माओं को जब भी ये लगे कि कोई गाय के लिए संकट पैदा कर रहा है तो धर्म की स्थापना की ख़ातिर गाय की रक्षा करें। इस गौरक्षा के लिए यदि वो इन्सानों की भी बलि चढ़ा दें, तो उन्हें कोई पाप नहीं लगेगा। अलबत्ता, इन्सानों की हत्या होने की वजह से जब क़ानून अपना काम करने की कोशिश करेगा, तब हिन्दुत्व को सर्वोपरि मानने वाली सत्ता उन ढोंगी धर्मात्माओं की हर तरह से मदद करेगी!

यही वजह है कि मन्दबुद्धि हिन्दुओं को इक्कठा रखने के लिए आये दिन लिंचिंग की वारदाते सामने आ रही हैं। इससे सियासी कोहराम मचता है। राज्य हो या केन्द्र की सरकारों पर क़ानून का राज स्थापित करने का दबाब पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट भी लिंचिंग करने वालों के प्रति सख़्ती से पेश आने का आदेश जारी करता है। केन्द्र सरकार को लिंचिंग की रोकथाम के लिए मशविरा देने के लिए समिति बनानी पड़ती है। तो क्या इस तरह की हलचलों को देखकर धर्मात्माओं को सहम जाना चाहिए? अरे, वो सहम गये तो फिर 2019 में संघ-बीजेपी की लुटिया को डूबने से कोई नहीं बचा सकता।

इसीलिए इन्द्रेश कुमार जैसे संघ के चोटी के धूर्तज्ञ एक ओर तो लिंचिंग पर अफ़सोस जताते हैं, तो दूसरी ओर उसी क्षण, लिंचिंग को स्वाभाविक बताने की भी साज़िश रचते हैं। कुतर्क गढ़े जाते हैं कि जब तक बीफ़ का सेवन होगा, तब तक लिंचिंग होती रहेगी! यानी, हे लिंचिंग को अंज़ाम देने वाले धर्मात्माओं, तुम तब तक धर्म की रक्षा करने के लिए लिंचिंग करते रहो, जब तक कि हम ये कहते रहें कि लोग और ख़ासकर मुसलमान बीफ़ खा रहे हैं, गाय का क़त्ल कर रहे हैं और उसके माँस का कारोबार किया जा रहा है!

रही बात, क़ानून-व्यवस्था को स्थापित करने वाली राज्य सरकारों, पुलिस और अदालत की जबाबदेही की तो भी यही दलील पर्याप्त होगी कि ‘जब तक बीफ़ का सेवन होगा, तब तक लिंचिंग होती रहेगी।’ चूँकि सरकार और पुलिस अन्य अपराधों की तरह बीफ़ के सेवन को रोक नहीं पा रही हैं, लिहाज़ा लिंचिंग को भी नहीं रोका जा सकता। जिस तरह से समाज में चोरी-डकैती-ठगी, हत्या-बलात्कार वग़ैरह होते रहेंगे, उसी तरह से लिंचिंग भी होती रहेगी। जो लोग इसे लेकर दुःखी हैं, वो वोट बैंक और देश को तोड़ने की सियासत कर रहे हैं!

लिंचिंक का बचाव करने की जो दलीलें इन्द्रेश कुमार ने समस्त संघी धर्मात्माओं पर चस्मा की हैं, उससे पहले बीकानेर के सांसद और केन्द्रीय वित्त राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल भी ज़बरदस्त धमाकेदार बयान दे चुके हैं। अलवर में अकबर उर्फ रकबर की लिंचिंग (21 जुलाई 2018) के ज़रिये हुई हत्या के बाद पूर्व प्रशासनिक अधिकारी मेघवाल ने सवा सौ करोड़ भारतवासियों को ज्ञानालोकित किया था कि “जैसे-जैसे प्रधानमंत्री मोदी पॉपुलर हो रहे हैं, इस तरह की घटनाएँ सामने आ रही हैं। यह सब मोदी जी क्यों पॉपुलर हो रहे हैं? इससे डरकर किया जा रहा है। केन्द्र सरकार ने राज्य सरकारों को कह दिया है कि इस तरह की किसी भी घटना पर कार्रवाई करें। लेकिन जैसे-जैसे 2019 का चुनाव नज़दीक आ रहा है, वैसे-वैसे नरेन्द्र मोदी की पॉपुलैरिटी और बढ़ती जा रही है। इसीलिए ये सब घटनाएँ सामने आ रही हैं।”

इसका मतलब ये हुआ कि सिर्फ़ बीफ़ के सेवन की वजह से ही नहीं बल्कि मोदी की लोकप्रियता बढ़ने की वजह से भी लिंचिंग हो रही है। इसी वजह से मोदी सरकार के नागरिक उड्डयन राज्यमंत्री जयन्त सिन्हा ने अपने घर पर रामगढ़ लिंचिंग कांड (29 जून 2017) के उन आठ अपराधियों का माल्यार्पण करके अभिनन्दन किया, जिन्हें बाक़ायदा अदालत ने लिंचिंग का दोषी पाने के बाद उम्र-क़ैद की सज़ा दी थी। इन्हें झारखंड हाईकोर्ट ने सिर्फ़ ज़मानत दी थी, बेकसूर बताते हुए लिंचिंग के गुनाह करते हुए अलीमुद्दीम नाम कार ड्राइवर की हत्या के क़सूर से बरी नहीं किया था।

इन्द्रेश कुमार से पहले 20 जुलाई को लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर हुई बहस के दौरान संघ परिवार के एक अन्य महापुरुष तथा केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह भी लिंचिंग की एक अलग व्याख्या कर चुके हैं। तब राजनाथ सिंह ने अघोषित तौर पर कहा था कि मोदी राज की लिंचिंग के बारे में सवाल तब पूछिएगा, जब इसमें मारे जा रहे लोगों की संख्या चौरासी का दंगों में मारे गये लोगों को पार कर जाए, क्योंकि वो ‘सबसे बड़ी लिंचिंग’ थी। इसीलिए आये दिन हो रही छिटपुट लिंचिंग पर चिन्ता करने की कोई ज़रूरत नहीं है। भले ही अब इसमें बच्चा-चोरी के नाम पर मौक़े पर ही किसी को भी मौत के घाट उतार देने की घटनाएँ भी जुड़ती जा रही हों।

हालाँकि, इसी मौके पर विश्व के सबसे वाचाल राजनेता के रूप में दुनिया भर में अपना परचम लहरा रहे, संघ परिवार की अनन्य विभूति और भारत के ‘लोकप्रिय’ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बमुश्किल 10 सेकेंड के भीतर ये कहकर रस्म अदायगी की कि ‘लिंचिंग मानवता के ख़िलाफ़ है और राज्यों को कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए!’ बहरहाल, अब आप चाहें तो ये तय करें कि जिस बीफ़ को उत्तर भारत के राज्यों में खाना पाप है और जिसके लिए तत्काल लिंचिंग रूपी मृत्युदंड मिलना स्वाभाविक है, उसी बीफ़ को उत्तर पूर्वी राज्यों तथा दक्षिण-पश्चिम भारत के कई बीजेपी शासित राज्यों में खाना क्यों पाप नहीं है! वहाँ लिंचिंग की बर्बर सज़ा क्यों प्रभावी नहीं है! इससे ‘एक देश – एक निशान – एक विधान’ वाला श्यामा प्रसाद मुखर्जी का चिन्तन कितना खोखला साबित होगा!

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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अगस्त क्रांति कैसे बनी जन-क्रांति?

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Quit India Movement

नई दिल्ली, 9 अगस्त | अगस्त क्रांति भारत से ब्रितानी हुकूमत को उखाड़ फेंकने की अंतिम और निर्णायक लड़ाई थी, जिसकी कमान कांग्रेस के नौजवान नेताओं के हाथ में आ गई थी। राष्ट्रपति महात्मा गांधी ने ‘करो या मरो’ के नारे के साथ अंग्रेजों को देश छोड़ने पर मजबूर करने के लिए देश की जनता का आह्वान किया था। इसलिए इसे ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के रूप में याद किया जाता है।

देश की जनता उस समय द्वितीय विश्वयुद्ध में भारत को झोंक दिए जाने से ब्रितानी सरकार से नाराज थी। युद्ध के कारण जरूरियात की चीजों की कीमतें आसमान छूने लगी थीं। खाने-पीने की वस्तुओं से लेकर सभी मूलभूत चीजों का टोटा पड़ गया था।

हालांकि कांग्रेस के नेता पहले से ही यह जानते थे कि आंदोलन को दबाने के लिए सरकार कोई भी दमनात्मक कार्रवाई करने से बाज नहीं आएगी, क्योंकि द्वितीय विश्वयुद्ध चल रहा था और अंग्रेजों ने उस समय संभावित किसी भी प्रकार के विरोध को दबाने की पूरी तैयारी कर ली थी।

इतिहासकार विपिनचंद्र ने अपनी पुस्तक ‘भारत का स्वतंत्रता संघर्ष’ में लिखा है कि युद्ध की आड़ लेकर सरकार ने अपने को सख्त से सख्त कानूनों से लैस कर लिया था और शांतिपूर्ण राजनीतिक गतिविधियों को को भी प्रतिबंधित कर दिया था।

देश की जनता की मर्जी के खिलाफ भारत को विश्वयुद्ध में झोंक दिए जाने से लोगों में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ भारी असंतोष था। महात्मा गांधी इस असंतोष से भलीभांति परिचित थे, इसलिए उन्होंने जनांदोलन खड़ा करने का फैसला लिया।

विपिन चंद्र ने अपनी पुस्तक में एक जगह लिखा है कि कांग्रेस में इस मसले पर मतभेद होने पर महात्मा गांधी ने कांग्रेस को चुनौती देते हुए कहा- “मैं देश की बालू से ही कांग्रेस से भी बड़ा आंदोलन खड़ा कर दूंगा।”

आखिरकार 14 जुलाई, 1942 को वर्धा में कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में आंदोलन शुरू करने का फैसला लिया गया। इसके बाद 8 अगस्त को कांग्रेस के मुंबई अधिवेशन में भारत छोड़ो आंदोलन छेड़ने का प्रस्ताव पास हुआ। महात्मा गांधी ने अपने भाषण में कांग्रस को इसके लिए धन्यवाद दिया। उन्हें भी अंग्रेजों की दमनात्मक कार्रवाई की आशंका थी। इसलिए उन्होंने अपने भाषण में ‘करो या मरो’ का आह्वान करते हुए जनता पर खुद निर्णय करने और अपना नेतृत्व करने की जिम्मेदारी सौंप दी।

तय कार्यक्रम के अनुसार, नौ अगस्त को अगस्त क्रांति का ऐलान किया गया। लेकिन इससे पहले ही ब्रितानी हुकूमत ने कांग्रेस के सारे प्रमुख नेताओं को हवालात में बंद करना शुरू कर दिया। महात्मा गांधी को 9 अगस्त को तड़के गिरफ्तार कर आगा खां महल स्थित कैदखाने में बंद कर दिया गया।

लेकिन इससे आंदोलन दबने के बजाय और उग्र हो गया और देशभर में ब्रितानी सरकार के खिलाफ जनाक्रोश उमड़ पड़ा। कांग्रेस की दूसरी पंक्ति के नेताओं और महिलाओं ने आंदोलन की कमान संभाल ली।

विपिन चंद्र ने लिखा है कि आंदोलन की बागडोर अच्युत पटवर्धन, अरुणा आसफ अली, राममनोहर लोहिया, सुचेता कृपलानी, बीजू पटनायक, छोटूभाई पुराणिक, आर.पी. गोयनका और बाद में जेल से भागकर जयप्रकाश नारायण जैसे नेताओं ने संभाले रखी।

सरकारी आकलनों के अनुसार, एक सप्ताह के भीतर 250 रेलवे स्टेशन और 500 डाकघरों और 150 थानों पर हमले हुए और उन्हें क्षति पहुंचाया गया। जगह-जगह टेलीफोन के तार काट दिए गए और सरकारी दफ्तरों को क्षतिग्रस्त कर दिया गया।

आंदोलन जितना उग्र था, अंग्रेजों ने उसका दमन भी उतनी ही क्रूरता से किया। विपिनचंद्र के अनुसार, 1942 के अंत तक 60,000 से ज्यादा लोंगों को हवालात में बंद कर दिया गया, जिनमें 16,000 लोगों को सजा दी गई।

ब्रितानी हुकूमत ने आंदोलन को कुचलने की सारी तैयारी कर ली थी। दमनकारी कार्रवाई का अंदेशा कांग्रेसियों को पहले से ही था। इसलिए कांग्रेस ने 9 अगस्त को आंदोलन का आगाज होने से एक दिन पहले स्पष्ट कहा था कि आंदोलन में हिस्सा लेने वालों को खुद अपना मार्गदर्शक बनना होगा।

आंदोलनकारी अहिंसा का मार्ग छोड़ हिंसा पर उतर आए और उन्होंने जबरदस्त तोड़-फोड़ मचाकर अंग्रेजी सरकार की चूलें हिलाकर रख दी। मगर खुद गांधी ने भी इस हिंसक आंदोलन की निंदा करने से इनकार कर दिया और अनेक गांधीवादी विचारकों व नेताओं ने हिंसक कार्रवाई को वक्त की मांग बताई।

महात्मा गांधी की रिहाई के लिए पूरी दुनिया में मांग होने लगी। मगर, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल एक फकीर के आगे झुकने को तैयार नहीं थे। हालांकि ब्रितानी हुकूमत ने आखिरकार 6 मई, 1944 को महात्मा गांधी को रिहा कर दिया। इसके बाद अन्य प्रमुख नेताओं की रिहाई हुई।

अंग्रेजों ने भारत छोड़ो आंदोलन को क्रूरता के साथ दबा दिया, लेकिन इस आंदोलन से एक बात तय हो गया कि भारतीयों को अब पूर्ण आजादी के सिवा कुछ और मंजूर नहीं था और आखिरकार अंग्रेजों को महायुद्ध में विजय हासिल करने के बावजूद भारत को आजाद करना पड़ा।

–आईएएनएस

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ओपिनियन

करुणानिधि : द्रविड़ राजनीति के शलाका पुरुष

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Karunanidhi DMK

चेन्नई, 7 अगस्त | मुथुवल करुणानिधि द्रविड़ अभियान से जुड़े उन अंतिम लोगों में से एक थे, जो तमिलनाडु में पांच दशक पहले सामाजिक न्याय के आधार पर राजनीति में पिछड़े वर्ग के उत्थान और कांग्रेस शासन की समाप्ति के अगुवा बनकर उभरे थे।

94 वर्षीय करुणानिधि तमिलनाडु के पांच बार मुख्यमंत्री रहे, जिन्होंने यहां एक शलाका पुरुष की तरह अपने सार्वजनिक जीवन को जीया। उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जब उन्होंने 1971 में इंदिरा गांधी का साथ दिया और इसका चुनावों में उन्हें फायदा मिला।

लेकिन उन्होंने 1975-77 के आपातकाल का कड़ा विरोध किया था, जिस दौरान उनकी सरकार को भ्रष्टाचार के आरोप में बर्खास्त कर दिया गया था।

करुणानिधि के नेतृत्व में द्रमुक को 2004 और 2009 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार में बेहतर स्थिति हासिल थी। इससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई में राजग सरकार में भी उनकी पार्टी को अच्छी स्थिति हासिल थी।

वह अपने पथ प्रदर्शक सी.एन. अन्नादुरई या अन्ना के स्थान पर 1969 में मुख्यमंत्री बने थे और पार्टी व सरकार पर अपनी मजबूत पकड़ बनाई। वह लगभग 50 वर्षो तक द्रमुक के अध्यक्ष बने रहे।

वर्ष 2016 में उनकी प्रतिद्वंद्वी जे.जयललिता के निधन, और अब मंगलवार को उनके निधन के बाद तमिलनाडु में एक शून्य पैदा हो गया है।

करुणानिधि का जन्म तीन जून, 1924 को तंजावुर जिले में हुआ था। वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने पत्रकार, नाटककार और पटकथा लेखक के तौर पर भी काम किया।

वह समाज सुधारक ‘पेरियार’ ई.वी. रामास्वामी और अन्ना के प्रभाव में आकर द्रविड़ अभियान से जुड़े।

कलैगनार के रूप में विख्यात करुणानिधि को कला, साहित्य, फैशन, रंगमंच और सिनेमा में भी दक्षता हासिल थी।

करुणानिधि के राजनीतिक भाग्य का निर्माण तब हुआ, जब अन्ना ने डीके से अलग होकर 1949 में द्रमुक की स्थापना की। तमिल फिल्म ‘पाराशक्ति’ के हिट हो जाने और तिरुचिरापल्ली के समीप काल्लाकुडी में रेल रोको अभियान ने उन्हें पूरे राज्य में पहचान दिलाने में मदद की। फिल्म में उन्होंने पटकथा लेखन किया था।

अन्नादुरई के निधन के बाद वह 1969 में राज्य के मुख्यमंत्री बने।

एक गरीब ईसाई वेल्लालर(एक पिछड़ी जाति) में जन्मे करुणानिधि का नाम उनके माता-पिता अंजुगम और मुथुलवल ने दक्षिणमूर्ति रखा था। बाद में उन्होंने अपना नाम बदलकर करुणानिधि रख लिया।

उन्होंने 1937-40 के दौरान हिंदी विरोधी प्रदर्शन में भी भाग लिया था और एक हस्तलिखित अखबार ‘मानवर नेसान(छात्रों का साथी)’ भी प्रकाशित किया था।

करुणानिधि ने मासिक ‘मुरासोली’ का भी प्रकाश किया था, जो बाद में साप्ताहिक हो गया और द्रमुक का अधिकारिक दैनिक पत्र बन गया। गत वर्ष इस पत्रिका ने हीरक जयंती मनाई थी।

उन्होंने 1957 में कुलिथालाई से सफलतापूर्वक अपना पहला चुनाव लड़ा था और उसके बाद से उन्होंने 13 चुनावों में से एक में भी हार का सामना नहीं किया।

–आईएएनएस

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Viral सच

लड़कियों की तुलना में लड़कों का यौन उत्पीड़न ज्यादा!

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Child Sexual Abuse in India

नई दिल्ली, 6 अगस्त | देश में अक्सर जब बात बच्चों से यौन उत्पीड़न के मामलों की आती है तो दिमाग में लड़कियों के साथ होने वाली यौन उत्पीड़न की घटनाएं आंखों के सामने उमड़ने लगती हैं, लेकिन इसका एक पहलू कहीं अंधकार में छिप सा गया है। महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय की 2007 की रिपोर्ट दर्शाती है कि देश में 53.22 फीसदी बच्चों को यौन शोषण के एक या अधिक रूपों का सामना करना पड़ा, जिसमें से 52.94 फीसदी लड़के इन यौन उत्पीड़न की घटनाओं का शिकार हुए।

चेंज डॉट ओआरजी के माध्यम से बाल यौन उत्पीड़न के मामले को उठाने वाली याचिकाकर्ता, फिल्म निर्माता और लेखक इंसिया दरीवाला ने मुंबई से फोन पर आईएएनएस को बताया, “सबसे बड़ी समस्या है कि इस तरह के मामले कभी सामने आती ही नहीं क्योंकि हमारे समाज में बाल यौन उत्पीड़न को लेकर जो मानसिकता है उसके कारण बहुत से मामले दर्ज ही नहीं होते और होते भी हैं तो मेरी नजर में बहुत ही कम ऐसा होता है। इस तरह के मामले सामने आने पर समाज की पहली प्रतिक्रिया होती है कि लड़कों के साथ तो कभी यौन शोषण हो नहीं सकता, क्योंकि वे पुरुष हैं और पुरुषों के साथ कभी यौन उत्पीड़न नहीं होता।”

उन्होंने कहा, “समाज का जो यह नजरिया है लड़कों को देखने का ठीक नहीं है क्योंकि पुरुष बनने से पहले वह लड़के और बच्चे ही होते हैं। बच्चों की यह जो श्रेणी है काफी दोषपूर्ण है इसमें कोई लड़का-लड़की का भेद नहीं होता। लड़कों का जो शोषण हो रहा है अधिकतर पुरुषों द्वारा ही हो रहा है। मेरे हिसाब से यह काफी नजरअंदाज कर दी जाने वाली सच्चाई है और मैं पहले भी कई बार बोल चुकी हूं हम जो बच्चों व महिलाओं पर यह यौन हिंसा हमारे समाज में देख रहे हैं, कहीं न कहीं हम उसकी जड़ को नहीं पकड़ पा रहे हैं।”

लड़कों के साथ यौन उत्पीड़न होने पर बताने में कतराने की वजह के सवाल पर फिल्मनिर्माता ने कहा, “दरअसल जब समाज में किसी लड़की के साथ यौन उत्पीड़न की घटना होती है तो समाज की पहली प्रतिक्रिया हमदर्दी की होती है, उन्हें बचाने के लिए सपोर्ट सिस्टम होता है लेकिन अगर कोई लड़का अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न के मामले को लेकर बोलता भी है तो पहले लोग उसपर हंसेंगे, उसका मजाक उड़ाएंगे व मानेंगे भी नहीं और उसकी बातों का विश्वास नहीं करेंगे, कहेंगे तुम झूठ बोल रहे हो यह तो हो नहीं सकता। हंसी और मजाक बनाए जाने के कारण लड़कों को आगे आने से डर लगता है इसलिए समाज बाल यौन उत्पीड़न में एक अहम भूमिका निभा रहा है।”

उन्होंने बताया, “पिछले एक साल में जब से मैंने अपना अभियान और लोगों से बात करना शुरू किया है तब से काफी चीजें हुई हैं। इसलिए मैं सरकार की शुक्रगुजार हूं कि कम से कम वह इस ओर ध्यान दे रहे हैं। आज सामान्य कानूनों को निष्पक्ष बनाने की प्रक्रिया चल रही है, इसकी शुरुआत पॉस्को कानून से हुई और अब धारा 377, पुरुषों के दुष्कर्म कानून को भी देखा जा रहा है। अब अखिरकार हम लोग लिंग समानता की बात कर सकते हैं, जिससे वास्तव में समानता आएगी। लिंग समानता का मतलब यह नहीं है कि वह एक लिंग को ध्यान में रखकर सारे कानून बनाए, यह सिर्फ महिलाओं की बात नहीं है। पुरुष और महिलाओं को समान रूप से सुरक्षा मिलनी चाहिए।”

लेखक इंसिया दरीवाल ने कहा, “देखिए पॉस्को कानून निष्पक्ष है लेकिन जब आप लड़कों के साथ यौन उत्पीड़न के मामले में दंड के प्रावधान को देखते हैं तो वह धारा 377 के तहत दिया जाता था। जैसे पहले अगर दो पुरुषों के बीच सहमति से हुआ तो भी धारा 377 के तहत दोनों लोगों को सजा मिलती थी और नहीं हुआ तो भी दोनों को इसी धारा के तहत सजा दी जाती थी। इसमें पीड़ित को भी सजा मिलने का खतरा था, हालांकि अब चीजों में सुधार हुआ है और इसपर अब काफी चर्चा हो रही है और समाज में भी बदलाव आ रहा है।”

महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी से मिले समर्थन पर उन्होंने कहा, “उन्होंने मेरे काम की सराहना की है और कहा कि यह काम काफी जरूरी है। मैंने उनसे एक स्टडी की मांग की थी, जिसमें यह देखना था कि बाल यौन उत्पीड़न की हमारे समाज में कितनी प्रबलता है और इसके जो प्रभाव हैं वह बच्चों और पुरुषों पर क्या हैं, इसमें यौन प्रभाव, उनके संबंधों पर क्या प्रभाव पड़ता है, उनके मानसिकता और शारिरिक स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता यह सब शामिल है। इस स्टडी के निष्कर्षो से मुझे मापदंड तैयार करने हैं और उन मापदंड़ों को मैं इसलिए तैयार करना चाहती हूं क्योंकि जब तक हम जड़ की जांच नहीं करेंगे तब तक नहीं पता चलेगा कि यह क्यों हो रहा है।”

बाल यौन उत्पीड़न मामलों में समाज की गलती के सवाल पर इंसिया ने कहा, “समाज कौन है हम लोग, इसलिए मानसिकता बदलना बहुत जरूरी है क्योंकि अगर हम लोग मानसिकता नहीं बदल पाए तो कानून कितने भी सख्त हो जाए तो उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। जब भी कोई घटना होती है तो हम सरकार, कानून और वकीलों को दोषी ठहराते हैं लेकिन हमें कहीं न कहीं खुद को भी देखना चाहिए क्योंकि हमारे समाज में महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग भूमिका तैयार कर दी गई है, जिसे उन्हें निभाना पड़ता है, इसे बदलने की जरूरत है।”

भारत सरकार ने लिंग निष्पक्ष कानून बनाने के मद्दनेजर लड़कों के साथ होने वाले यौन शोषण को मौजूदा यौन अपराधों से बच्चों की सुरक्षा (पॉस्को) अधिनियम में संशोधनों को मंजूरी दे दी है जिसे कैबिनेट के पास मंजूरी के लिए भेजा जाना बाकी है।

–आईएएनएस

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