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संघ का अद्भुत शोध: बीफ़ का सेवन जारी रहने तक होती रहेगी लिंचिंग!

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Indresh Kumar

इन्द्रेश कुमार सरीखे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ विचारक/प्रचारक/नेता का नज़रिया कितना संकुचित और मूर्खतापूर्ण हो सकता है, इसे समझने के लिए उनका वो ताज़ा बयान ही पर्याप्त है, जहाँ वो कहते हैं कि “बीफ़ खाना बन्द हो तो रुक जाएगी मॉब लिंचिंग!” इन्द्रेश कुमार, संघ से जुड़े संगठन ‘राष्ट्रीय मुस्लिम मंच’ के संरक्षक हैं और मुसलमानों को संघ के नज़दीक लाने का काम देखते हैं। उन्होंने राँची में हिन्दू जागरण मंच की झारखंड इकाई का शुभारम्भ करने के बाद पत्रकारों के सवालों के जबाब में बीफ़ और लिंचिंग के बीच सम्बन्ध की व्याख्या करने के लिए ऐसे अद्भुत सिद्धान्त का प्रतिपादन किया!

इन्द्रेश कुमार का बयान पूरी तरह से भ्रामक है। इसे धर्मान्ध और मन्दबुद्धि सवर्ण हिन्दुओं को भ्रमित करने तथा उल्लू बनाने के लिए उछाला गया है। इस बयान का मक़सद इस मूर्खतापूर्ण सिद्धान्त का प्रतिपादन करना है कि ‘लिंचिंग इसलिए होती है, क्योंकि बीफ़ का सेवन होता है।’ बयान का निहितार्थ ये भी है कि ‘जब तक बीफ़ का सेवन होगा, तब तक लिंचिंग होती रहेगी!’ इसीलिए ये समझना बेहद ज़रूरी है कि इन्द्रेश कुमार ने ऐसा बयान देकर दोधारी तलवार भाँजी है! एक तीर से कई निशाने साधे हैं!

यदि इन्द्रेश कुमार का अद्भुत ‘बीफ़-लिंचिंग सिद्धान्त’ सही हो तो इसका मतलब ये हुआ कि बाढ़ को ख़त्म करना हो तो नदियों और बारिश को ख़त्म करना होगा! सूखे को ख़त्म करना हो तो सूर्य को ख़त्म करना होगा! महिलाओं से होने वाले दुष्कर्मों की रोकथाम करनी हो तो उन्होंने जन्म लेते ही मार देना होगा! ग़रीबी को दूर करना है तो ग़रीबों को सफ़ाया ज़रूरी है! साफ़ है कि इन्द्रेश कुमार मूर्खतापूर्ण बातें कर रहे हैं। लेकिन इतनी सी बात संघ के अन्ध-भक्तों के समझ में नहीं आती। क्योंकि इन्द्रेश कुमार की छवि संघ के वरिष्ठ नेताओं वाली है। संघ, धूर्त हिन्दुओं का ऐसा संगठन है जहाँ धूर्तता ही बोयी जाती है, धूर्तता ही काटी जाती है और धूर्तता का ही प्रचार-प्रचार किया जाता है, ताकि भारत की सत्ता धूर्तों की मुट्ठी में रहे!

इसी सत्ता की शिखर पर फ़िलहाल संघ ने नरेन्द्र मोदी को बैठा रखा है। लेकिन बीते 50 महीनों में मोदी-राज ने सिर्फ़ इतना साबित किया है कि इससे घटिया हुक़ूमत देश ने पहले कभी नहीं देखी। एक ग़रीब और विकासशील देश अपनी असंख्य चुनौतियों से जूझता हुआ धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। लेकिन मोदी राज की आर्थिक और सामाजिक नीतियों ने इसका बेड़ा गर्क कर दिया है। मोदी सरकार को पता है कि उसके अदूरदर्शी और मूर्खतापूर्ण फ़ैसलों की वजह से उसकी वो लोकप्रियता औंधे मुँह गिर चुकी है, जिसे 2014 में उसने तरह-तरह का झूठ फ़ैलाकर हथियाया था।

संघ-बीजेपी को पता है कि अब सिर्फ़ मन्दबुद्धि सवर्ण हिन्दू ही उसके समर्थक या वोट बैंक के रूप में उसके साथ बचे हुए हैं। बाक़ी दलित और पिछड़े वर्ग के हिन्दुओं का इनकी नीतियों और कार्यप्रणाली से मोहभंग हो चुका है। मुसलमान को इनकी साम्प्रदायिक नीतियों से हमेशा नफ़रत रही है। लेकिन अपनी साम्प्रदायिकता को चमकाते हुए संघियों ने हिन्दुओं के बीच अपनी पैठ बनायी है। इसके लिए धर्म और तमाम धार्मिक प्रतीकों का बेइन्तेहा इस्तेमाल किया गया है। दशकों पहले संघियों ने सफलतापूर्वक गाय को एक पशु से धार्मिक प्रतीक बना दिया था। उन्होंने अन्तहीन अफ़वाहें फ़ैलायीं कि गाय पर हमला हिन्दुओं के धर्म पर हमला है। गाय की हत्या करना या उसका माँस (बीफ़) खाना पाप है।

संघियों ने मन्दबुद्धि हिन्दुओं में ये धारणा बैठा दी है कि लोकतंत्र में चुनी हुई सरकारें भले ही गाय की हत्या को अपराध से जोड़कर देखती रहें, लेकिन जो लोग सरकारी तंत्र की प्रतीक्षा किये बग़ैर सीधे धर्म की रक्षा करने के लिए आगे आते हैं, वो धर्मात्मा हैं। इसीलिए तथाकथित धर्मात्माओं को जब भी ये लगे कि कोई गाय के लिए संकट पैदा कर रहा है तो धर्म की स्थापना की ख़ातिर गाय की रक्षा करें। इस गौरक्षा के लिए यदि वो इन्सानों की भी बलि चढ़ा दें, तो उन्हें कोई पाप नहीं लगेगा। अलबत्ता, इन्सानों की हत्या होने की वजह से जब क़ानून अपना काम करने की कोशिश करेगा, तब हिन्दुत्व को सर्वोपरि मानने वाली सत्ता उन ढोंगी धर्मात्माओं की हर तरह से मदद करेगी!

यही वजह है कि मन्दबुद्धि हिन्दुओं को इक्कठा रखने के लिए आये दिन लिंचिंग की वारदाते सामने आ रही हैं। इससे सियासी कोहराम मचता है। राज्य हो या केन्द्र की सरकारों पर क़ानून का राज स्थापित करने का दबाब पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट भी लिंचिंग करने वालों के प्रति सख़्ती से पेश आने का आदेश जारी करता है। केन्द्र सरकार को लिंचिंग की रोकथाम के लिए मशविरा देने के लिए समिति बनानी पड़ती है। तो क्या इस तरह की हलचलों को देखकर धर्मात्माओं को सहम जाना चाहिए? अरे, वो सहम गये तो फिर 2019 में संघ-बीजेपी की लुटिया को डूबने से कोई नहीं बचा सकता।

इसीलिए इन्द्रेश कुमार जैसे संघ के चोटी के धूर्तज्ञ एक ओर तो लिंचिंग पर अफ़सोस जताते हैं, तो दूसरी ओर उसी क्षण, लिंचिंग को स्वाभाविक बताने की भी साज़िश रचते हैं। कुतर्क गढ़े जाते हैं कि जब तक बीफ़ का सेवन होगा, तब तक लिंचिंग होती रहेगी! यानी, हे लिंचिंग को अंज़ाम देने वाले धर्मात्माओं, तुम तब तक धर्म की रक्षा करने के लिए लिंचिंग करते रहो, जब तक कि हम ये कहते रहें कि लोग और ख़ासकर मुसलमान बीफ़ खा रहे हैं, गाय का क़त्ल कर रहे हैं और उसके माँस का कारोबार किया जा रहा है!

रही बात, क़ानून-व्यवस्था को स्थापित करने वाली राज्य सरकारों, पुलिस और अदालत की जबाबदेही की तो भी यही दलील पर्याप्त होगी कि ‘जब तक बीफ़ का सेवन होगा, तब तक लिंचिंग होती रहेगी।’ चूँकि सरकार और पुलिस अन्य अपराधों की तरह बीफ़ के सेवन को रोक नहीं पा रही हैं, लिहाज़ा लिंचिंग को भी नहीं रोका जा सकता। जिस तरह से समाज में चोरी-डकैती-ठगी, हत्या-बलात्कार वग़ैरह होते रहेंगे, उसी तरह से लिंचिंग भी होती रहेगी। जो लोग इसे लेकर दुःखी हैं, वो वोट बैंक और देश को तोड़ने की सियासत कर रहे हैं!

लिंचिंक का बचाव करने की जो दलीलें इन्द्रेश कुमार ने समस्त संघी धर्मात्माओं पर चस्मा की हैं, उससे पहले बीकानेर के सांसद और केन्द्रीय वित्त राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल भी ज़बरदस्त धमाकेदार बयान दे चुके हैं। अलवर में अकबर उर्फ रकबर की लिंचिंग (21 जुलाई 2018) के ज़रिये हुई हत्या के बाद पूर्व प्रशासनिक अधिकारी मेघवाल ने सवा सौ करोड़ भारतवासियों को ज्ञानालोकित किया था कि “जैसे-जैसे प्रधानमंत्री मोदी पॉपुलर हो रहे हैं, इस तरह की घटनाएँ सामने आ रही हैं। यह सब मोदी जी क्यों पॉपुलर हो रहे हैं? इससे डरकर किया जा रहा है। केन्द्र सरकार ने राज्य सरकारों को कह दिया है कि इस तरह की किसी भी घटना पर कार्रवाई करें। लेकिन जैसे-जैसे 2019 का चुनाव नज़दीक आ रहा है, वैसे-वैसे नरेन्द्र मोदी की पॉपुलैरिटी और बढ़ती जा रही है। इसीलिए ये सब घटनाएँ सामने आ रही हैं।”

इसका मतलब ये हुआ कि सिर्फ़ बीफ़ के सेवन की वजह से ही नहीं बल्कि मोदी की लोकप्रियता बढ़ने की वजह से भी लिंचिंग हो रही है। इसी वजह से मोदी सरकार के नागरिक उड्डयन राज्यमंत्री जयन्त सिन्हा ने अपने घर पर रामगढ़ लिंचिंग कांड (29 जून 2017) के उन आठ अपराधियों का माल्यार्पण करके अभिनन्दन किया, जिन्हें बाक़ायदा अदालत ने लिंचिंग का दोषी पाने के बाद उम्र-क़ैद की सज़ा दी थी। इन्हें झारखंड हाईकोर्ट ने सिर्फ़ ज़मानत दी थी, बेकसूर बताते हुए लिंचिंग के गुनाह करते हुए अलीमुद्दीम नाम कार ड्राइवर की हत्या के क़सूर से बरी नहीं किया था।

इन्द्रेश कुमार से पहले 20 जुलाई को लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर हुई बहस के दौरान संघ परिवार के एक अन्य महापुरुष तथा केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह भी लिंचिंग की एक अलग व्याख्या कर चुके हैं। तब राजनाथ सिंह ने अघोषित तौर पर कहा था कि मोदी राज की लिंचिंग के बारे में सवाल तब पूछिएगा, जब इसमें मारे जा रहे लोगों की संख्या चौरासी का दंगों में मारे गये लोगों को पार कर जाए, क्योंकि वो ‘सबसे बड़ी लिंचिंग’ थी। इसीलिए आये दिन हो रही छिटपुट लिंचिंग पर चिन्ता करने की कोई ज़रूरत नहीं है। भले ही अब इसमें बच्चा-चोरी के नाम पर मौक़े पर ही किसी को भी मौत के घाट उतार देने की घटनाएँ भी जुड़ती जा रही हों।

हालाँकि, इसी मौके पर विश्व के सबसे वाचाल राजनेता के रूप में दुनिया भर में अपना परचम लहरा रहे, संघ परिवार की अनन्य विभूति और भारत के ‘लोकप्रिय’ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बमुश्किल 10 सेकेंड के भीतर ये कहकर रस्म अदायगी की कि ‘लिंचिंग मानवता के ख़िलाफ़ है और राज्यों को कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए!’ बहरहाल, अब आप चाहें तो ये तय करें कि जिस बीफ़ को उत्तर भारत के राज्यों में खाना पाप है और जिसके लिए तत्काल लिंचिंग रूपी मृत्युदंड मिलना स्वाभाविक है, उसी बीफ़ को उत्तर पूर्वी राज्यों तथा दक्षिण-पश्चिम भारत के कई बीजेपी शासित राज्यों में खाना क्यों पाप नहीं है! वहाँ लिंचिंग की बर्बर सज़ा क्यों प्रभावी नहीं है! इससे ‘एक देश – एक निशान – एक विधान’ वाला श्यामा प्रसाद मुखर्जी का चिन्तन कितना खोखला साबित होगा!

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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क्या अमेरिका F-16 विमान के बेज़ा इस्तेमाल के लिए पाकिस्तान को सज़ा देगा?

कभी पाकिस्तान के सबसे ख़ास दोस्त रहे अमेरिका के सामने अब धर्मसंकट है। अमेरिका को प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर ये स्वीकार करना होगा कि पाकिस्तान को लेकर उसकी पुरानी नीति ग़लत थी।

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F-16 jet

27 फरवरी 2019 को जम्मू-कश्मीर के नौशेरा और राजौरी सेक्टर में भारतीय वायुसेना के विंग कमांडर अभिनन्दन वर्तमान की ओर से दिखाये अदम्य साहस और वीरता ने पाकिस्तान को दो ऐसे गुनाहों को करने के लिए मज़बूर कर दिया, जिन पर पर्दा नहीं डाला जा सकता। पहला क़सूर है – 17 नवम्बर 2006 को अमेरिका से हुए क़रार को तोड़कर भारत के ख़िलाफ़ F-16 लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल और दूसरा गुनाह है – युद्ध बन्दियों के प्रति व्यवहार से जुड़ी जेनेवा संघि, 1949 का उल्लंघन।

दोनों अपराधों के सबूत सारी दुनिया के सामने हैं। चाहे सच्चा हो या झूठा और दुर्भावनापूर्ण, लेकिन अभिनन्दन का हरेक वीडियो वायरल हो चुका है। उसे भारत के सुपुर्द करने की प्रक्रिया का भी पाकिस्तानी मीडिया ने सीधा प्रसारण किया। ज़बरन पाकिस्तानी सेना की तारीफ़ करवाने और भारतीय मीडिया की आलोचना करवाने वाले वीडियो भी पाकिस्तान के गुनाह के जीते-जागते सबूत हैं। इसीलिए अभिनन्दन की रिहाई के बाद भारत सरकार और हमारे राजनयिकों को ये तय करना होगा कि वो संयुक्त राष्ट्र से इस अपराध के ख़िलाफ़ कैसी कार्रवाई की माँग करना चाहेंगे?

वैसे जेनेवा संघि का उल्लंघन करने के लिए पाकिस्तान के ख़िलाफ़ निन्दा प्रस्ताव पारित करने के अलावा कड़े आर्थिक प्रतिबन्धों की भी कार्रवाई हो सकती है। ऐसी कार्रवाई की ज़ोरदार माँग करके भारत चाहे तो पाकिस्तान और उसके दोस्तों को और शर्मसार कर सकता है। इस लिहाज़ से भारत सरकार ने अभी तक अपने अगले रुख़ का इज़हार नहीं किया है। अलबत्ता, ऐसे संकेत ज़रूर मिले हैं कि भारत ने पाकिस्तान की ओर से अपने ख़िलाफ़ F-16 फ़ाइटर्स और हवा से हवा में मार करने वाली एमराम (AMRAAM) मिसाइल के बेज़ा इस्तेमाल के लिए अमेरिका से कार्रवाई की अपेक्षा की है। इसीलिए 28 फरवरी को तीनों सेनाओं की ओर से हुई साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में सबूत के दौर पर एमराम के मलवे को सारी दुनिया के सामने पेश किया गया था।

कभी पाकिस्तान के सबसे ख़ास दोस्त रहे अमेरिका के सामने अब धर्मसंकट है। अमेरिका को प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर ये स्वीकार करना होगा कि पाकिस्तान को लेकर उसकी पुरानी नीति ग़लत थी। भारत ने पाकिस्तान को लेकर अमेरिका को ख़ूब आगाह किया। लेकिन अमेरिका की आँख तो 9/11 (11 सितम्बर 2001) के आतंकी हमले से ही खुली। तब धीरे-धीरे अमेरिका ने पाकिस्तान की पीठ पर से हाथ खींचना शुरू किया। पाकिस्तान ने फिर भी कोई सबक नहीं लिया। आख़िरकार, 2 मई 2011 को ओसामा बिन लादेन के सफ़ाये से पाकिस्तान की रही-सही इज़्ज़त भी जाती रही।

झूठ और दग़ा, पाकिस्तान की जन्मजात पहचान रही है। भारत ने तो इसे हमेशा झेला है। इस्लामिक देशों के संगठन (आईओसी) की ओर से भारत और पाकिस्तान के प्रति दिखाये गये रवैये से लगता है कि अब इस्लामिक देशों की आँखों पर पड़ा पर्दा भी झीना पड़ चुका है। तभी तो बालाकोट ऑपरेशन के बाद चीन, सउदी अरब, यूएई, मिस्र और तुर्की जैसे पुराने दोस्तों ने भी पाकिस्तान से कन्नी काट ली। किसी भी देश ने पाकिस्तान को पीड़ित नहीं माना। किसी भी देश ने भारतीय कार्रवाई की आलोचना नहीं की। किसी भी देश ने पाकिस्तान के जवाबी हमले को सही नहीं ठहराया।

भारत और पाकिस्तान की सैन्य कार्रवाईयों को ठंडा करवाने में अमेरिका ने भी अहम भूमिका रही। इसीलिए अब राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रम्प को ये अग्निपरीक्षा देनी है कि वो उस पाकिस्तान पर कार्रवाई करें, जिसने अमेरिका से वादा ख़िलाफ़ी करके उसके F-16 फ़ाइटर्स का भारत के विरूद्ध इस्तेमाल किया। पाकिस्तान ने अपनी आदत के मुताबिक़ झूठ बोला कि उसने भारत के ख़िलाफ़ F-16 विमानों का इस्तेमाल नहीं किया। जबकि भारत ने पुख़्ता सबूत हैं कि F-16 विमानों और सिर्फ़ उसी से लॉन्च हो सकने वाले एमराम (AMRAAM) मिसाइल का इस्तेमाल हिन्दुस्तान के ख़िलाफ़ किया गया है।

फ़िलहाल, ये साफ़ नहीं है कि F-16 विमानों और एमराम मिसाइलों को लेकर पाकिस्तान ने 2006 वाले जिस अमेरिकी क़रार तो तोड़ा है, इसके बदले में अमेरिका क्या क़दम उठाएगा? वो कैसे पाकिस्तान को दंडित करेगा? क्या अमेरिका अपने क़रार की अनदेखी करना चाहेगा? अनदेखी की नीति पर चलने से महाशक्ति अमेरिका और राष्ट्रपति ट्रम्प की प्रतिष्ठा पर आँच आएगी। वैश्विक स्तर पर यदि क़रारों और संधियों की प्रतिष्ठा नहीं रहेगी तो दुनिया की व्यवस्थाएँ कैसे चलेंगी?

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ओपिनियन

जंग के कुहासे में धूमिल पड़ गई सच्चाई

घंटों की चुप्पी के बाद भारत ने पुष्टि की कि उसका एक पायलट कार्रवाई में लापता है, लेकिन इससे ज्यादा कुछ बताने से मना कर दिया। इस बात की भी पुष्टि की गई कि भारत ने पाकिस्तान के एक विमान को मार गिराया, लेकिन यह नहीं बताया कि क्या यह एफ-16 है।

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Raveesh Kumar

जंग के कुहासे में सीमा पर हवाई मुठभेड़ को लेकर दावों और प्रतिदावों के बीच भारतीय वायुसेना (आईएएफ) के एक वरिष्ठ अधिकारी विदेश मंत्रालय संयुक्त सचिव (विदेश प्रचार) रवीश कुमार के साथ ब्रीफिंग में बुधवार को सामने आए, लेकिन सवालों के जवाब नहीं दिए और तथ्यों को कयासों पर छोड़ दिया।

एयर वाइस मार्शल आर. जी. के. कपूर वायुसेना मुख्यालय में सहायक वायुसेना प्रमुख (ऑपरेशन) हैं। वह आक्रामक हवाई सैन्य संचालन के प्रभारी हैं। दो दिनों में पहली बार आईएएफ के अधिकारी मीडिया के सामने आए, लेकिन पाकिस्तान द्वारा भारतीय पायलटों को हिरासत में लेने के दावों को लेकर उठे कई सवालों के जवाब नहीं दिए।

पाकिस्तान की हिरासत में लहूलुहान पायलट का परेशान करने वाला वीडियो वायरल होने से देश में पैदा हुई व्यग्रता के बावजूद कोई जवाब नहीं मिला।

यहां तक कि आधिकारिक तौर पर उनकी पहचान की भी पुष्टि नहीं की गई, जबकि सोशल मीडिया पर उनकी पृष्ठभूमि के ब्योरे छाए हुए हैं।

पाकिस्तान के भीतर घुसकर मंगलवार को किए गए हवाई हमले का उन्माद पायलट के भावी हाल को लेकर चिंता में बदल गया। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने दावा किया कि आईएएफ के दो पायलट उनकी हिरासत में हैं।

भारत का दावा है कि सिर्फ एक पायलट कार्रवाई में लापता है।

विदेश सचिव विजय गोखले ने मंगलवार के हवाई हमले को लेकर पहला बयान पाकिस्तान के इंटर सर्विसिस पब्लिक रिलेशंस के महानिदेशक, मेजर जनरल आसिफ गफूर द्वारा हमले को सार्वजनिक करने के घंटों बाद दिया।

सोशल मीडिया पर सुबह से ही पाकिस्तान की तरफ से जवान को भारी तैनाती के साथ सियालकोट में टैंक से जंग की खबरें छाई हुई थीं।

नियंत्रण रेखा (एलओसी) और जम्मू-कश्मीर की ओर फौरन कार्रवाई शुरू हो गई। पाकिस्तानी वायुसेना (पीएएफ) के लड़ाकू विमान द्वारा भारत के इलाके में बम गिराने की खबरों के बीच कश्मीर घाटी के बडगाम में एक विमान को मार गिराने की रिपोर्ट आई।

पाकिस्तान की तरफ से ही आधिकारिक दावे किए गए, जिसमें जवाबी कार्रवाई की बात कही गई।

हालांकि दावे के तथ्य बदलते रहे। पाकिस्तान ने घोषणा की कि उसने भारत के दो पायलट को अपने कब्जे में ले लिया है। इस खबर के फैलने से पहले खबर आई कि आईएएफ ने पाकिस्तान के एफ-16 को मार गिराया।

इस खबर का उन्माद बहुत देर नहीं रहा, क्योंकि भारत के पायलट के पकड़े जाने का कथित वीडियो पाकिस्तानी मीडिया पर वायरल हो गया।

घंटों की चुप्पी के बाद भारत ने पुष्टि की कि उसका एक पायलट कार्रवाई में लापता है, लेकिन इससे ज्यादा कुछ बताने से मना कर दिया। इस बात की भी पुष्टि की गई कि भारत ने पाकिस्तान के एक विमान को मार गिराया, लेकिन यह नहीं बताया कि क्या यह एफ-16 है।

जंग पर नजर रखने वाली वेबसाइटों ने भारत और पाकिस्तान सीमा पर खाली हवाई क्षेत्र दिखाया है, जिससे घबराहट बनी हुई है।

दावे काफी अधिक हो रहे हैं, लेनिक तथ्य बहुत कम हैं।

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पाकिस्तान को पानी रोकने पर विशेषज्ञों की राय बंटी

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नई दिल्ली, 16 फरवरी | सीआरपीएफ की टुकड़ी पर गुरुवार को पुलवामा में हुए आतंकवादी हमले के बाद कड़ी कार्रवाई करने की मांग को देखते हुए विशेषज्ञ पश्चिम और पूरब की तरफ बहने वाली सिंधु और ब्यास नदियों का पानी पाकिस्तान जाने से रोकने पर विचार कर रहे हैं। वहीं, कुछ इसकी संभाव्यता पर शक जता रहे हैं।

जल संसाधन मंत्रालय के सेवानिवृत्त शीर्ष अधिकारी एम. एस. मेनन का कहना है कि पाकिस्तान को दिए जानेवाले पानी को रोका जा सकता है। उन्होंने सिंधु जल समझौते पर लंबे समय से काम किया है।

उन्होंने कहा, “हमने अधिक पानी उपभोग करने की क्षमता विकसित कर ली है। स्टोरेज डैम में निवेश बढ़ाकर हम ऐसा कर सकते हैं। झेलम, चेनाब और सिंधु नदी का बहुत सारा पानी देश में ही इस्तेमाल किया जा सकता है।”

भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में हुआ सिंधु जल समझौता पूरब की तरफ बहने वाली नदियों – ब्यास, रावी और सतलुज के लिए हुआ है और भारत को 3.3 करोड़ एकड़ फीट (एमएएफ) पानी मिला है, जबकि पाकिस्तान को 80 एमएएफ पानी दिया गया है।

विवादास्पद यह है कि संधि के तहत पाकिस्तान को भारत से अधिक पानी मिलता है, जिससे यहां सिंचाई में भी इस पानी का सीमित उपयोग हो पाता है। केवल बिजली उत्पादन में इसका अबाधित उपयोग होता है। साथ ही भारत पर परियोजनाओं के निर्माण के लिए भी सटीक नियम बनाए गए हैं।

एक दूसरे सेवानिवृत्त अधिकारी, जो मंत्रालय में करीब दो दशकों तक सिंधु आयुक्त रह चुके हैं। उनका कहना है कि पाकिस्तान को पानी रोकना संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि यह अंतराष्ट्रीय संधि है, जिसका भारत को पालन करना अनिवार्य है। उन्होंने कहा, “मैं नहीं समझता कि इस प्रकार का कुछ करना संभव है। पानी प्राकृतिक रूप से बहता है। आप उसे रोक नहीं सकते।”

पूर्व अधिकारी ने कहा कि अतीत में भी इस मुद्दे पर चर्चा हुई है, लेकिन लोग ऐसी मांग भावनाओं में बहकर करते रहते हैं।

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