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संघ का अद्भुत शोध: बीफ़ का सेवन जारी रहने तक होती रहेगी लिंचिंग!

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Indresh Kumar

इन्द्रेश कुमार सरीखे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ विचारक/प्रचारक/नेता का नज़रिया कितना संकुचित और मूर्खतापूर्ण हो सकता है, इसे समझने के लिए उनका वो ताज़ा बयान ही पर्याप्त है, जहाँ वो कहते हैं कि “बीफ़ खाना बन्द हो तो रुक जाएगी मॉब लिंचिंग!” इन्द्रेश कुमार, संघ से जुड़े संगठन ‘राष्ट्रीय मुस्लिम मंच’ के संरक्षक हैं और मुसलमानों को संघ के नज़दीक लाने का काम देखते हैं। उन्होंने राँची में हिन्दू जागरण मंच की झारखंड इकाई का शुभारम्भ करने के बाद पत्रकारों के सवालों के जबाब में बीफ़ और लिंचिंग के बीच सम्बन्ध की व्याख्या करने के लिए ऐसे अद्भुत सिद्धान्त का प्रतिपादन किया!

इन्द्रेश कुमार का बयान पूरी तरह से भ्रामक है। इसे धर्मान्ध और मन्दबुद्धि सवर्ण हिन्दुओं को भ्रमित करने तथा उल्लू बनाने के लिए उछाला गया है। इस बयान का मक़सद इस मूर्खतापूर्ण सिद्धान्त का प्रतिपादन करना है कि ‘लिंचिंग इसलिए होती है, क्योंकि बीफ़ का सेवन होता है।’ बयान का निहितार्थ ये भी है कि ‘जब तक बीफ़ का सेवन होगा, तब तक लिंचिंग होती रहेगी!’ इसीलिए ये समझना बेहद ज़रूरी है कि इन्द्रेश कुमार ने ऐसा बयान देकर दोधारी तलवार भाँजी है! एक तीर से कई निशाने साधे हैं!

यदि इन्द्रेश कुमार का अद्भुत ‘बीफ़-लिंचिंग सिद्धान्त’ सही हो तो इसका मतलब ये हुआ कि बाढ़ को ख़त्म करना हो तो नदियों और बारिश को ख़त्म करना होगा! सूखे को ख़त्म करना हो तो सूर्य को ख़त्म करना होगा! महिलाओं से होने वाले दुष्कर्मों की रोकथाम करनी हो तो उन्होंने जन्म लेते ही मार देना होगा! ग़रीबी को दूर करना है तो ग़रीबों को सफ़ाया ज़रूरी है! साफ़ है कि इन्द्रेश कुमार मूर्खतापूर्ण बातें कर रहे हैं। लेकिन इतनी सी बात संघ के अन्ध-भक्तों के समझ में नहीं आती। क्योंकि इन्द्रेश कुमार की छवि संघ के वरिष्ठ नेताओं वाली है। संघ, धूर्त हिन्दुओं का ऐसा संगठन है जहाँ धूर्तता ही बोयी जाती है, धूर्तता ही काटी जाती है और धूर्तता का ही प्रचार-प्रचार किया जाता है, ताकि भारत की सत्ता धूर्तों की मुट्ठी में रहे!

इसी सत्ता की शिखर पर फ़िलहाल संघ ने नरेन्द्र मोदी को बैठा रखा है। लेकिन बीते 50 महीनों में मोदी-राज ने सिर्फ़ इतना साबित किया है कि इससे घटिया हुक़ूमत देश ने पहले कभी नहीं देखी। एक ग़रीब और विकासशील देश अपनी असंख्य चुनौतियों से जूझता हुआ धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। लेकिन मोदी राज की आर्थिक और सामाजिक नीतियों ने इसका बेड़ा गर्क कर दिया है। मोदी सरकार को पता है कि उसके अदूरदर्शी और मूर्खतापूर्ण फ़ैसलों की वजह से उसकी वो लोकप्रियता औंधे मुँह गिर चुकी है, जिसे 2014 में उसने तरह-तरह का झूठ फ़ैलाकर हथियाया था।

संघ-बीजेपी को पता है कि अब सिर्फ़ मन्दबुद्धि सवर्ण हिन्दू ही उसके समर्थक या वोट बैंक के रूप में उसके साथ बचे हुए हैं। बाक़ी दलित और पिछड़े वर्ग के हिन्दुओं का इनकी नीतियों और कार्यप्रणाली से मोहभंग हो चुका है। मुसलमान को इनकी साम्प्रदायिक नीतियों से हमेशा नफ़रत रही है। लेकिन अपनी साम्प्रदायिकता को चमकाते हुए संघियों ने हिन्दुओं के बीच अपनी पैठ बनायी है। इसके लिए धर्म और तमाम धार्मिक प्रतीकों का बेइन्तेहा इस्तेमाल किया गया है। दशकों पहले संघियों ने सफलतापूर्वक गाय को एक पशु से धार्मिक प्रतीक बना दिया था। उन्होंने अन्तहीन अफ़वाहें फ़ैलायीं कि गाय पर हमला हिन्दुओं के धर्म पर हमला है। गाय की हत्या करना या उसका माँस (बीफ़) खाना पाप है।

संघियों ने मन्दबुद्धि हिन्दुओं में ये धारणा बैठा दी है कि लोकतंत्र में चुनी हुई सरकारें भले ही गाय की हत्या को अपराध से जोड़कर देखती रहें, लेकिन जो लोग सरकारी तंत्र की प्रतीक्षा किये बग़ैर सीधे धर्म की रक्षा करने के लिए आगे आते हैं, वो धर्मात्मा हैं। इसीलिए तथाकथित धर्मात्माओं को जब भी ये लगे कि कोई गाय के लिए संकट पैदा कर रहा है तो धर्म की स्थापना की ख़ातिर गाय की रक्षा करें। इस गौरक्षा के लिए यदि वो इन्सानों की भी बलि चढ़ा दें, तो उन्हें कोई पाप नहीं लगेगा। अलबत्ता, इन्सानों की हत्या होने की वजह से जब क़ानून अपना काम करने की कोशिश करेगा, तब हिन्दुत्व को सर्वोपरि मानने वाली सत्ता उन ढोंगी धर्मात्माओं की हर तरह से मदद करेगी!

यही वजह है कि मन्दबुद्धि हिन्दुओं को इक्कठा रखने के लिए आये दिन लिंचिंग की वारदाते सामने आ रही हैं। इससे सियासी कोहराम मचता है। राज्य हो या केन्द्र की सरकारों पर क़ानून का राज स्थापित करने का दबाब पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट भी लिंचिंग करने वालों के प्रति सख़्ती से पेश आने का आदेश जारी करता है। केन्द्र सरकार को लिंचिंग की रोकथाम के लिए मशविरा देने के लिए समिति बनानी पड़ती है। तो क्या इस तरह की हलचलों को देखकर धर्मात्माओं को सहम जाना चाहिए? अरे, वो सहम गये तो फिर 2019 में संघ-बीजेपी की लुटिया को डूबने से कोई नहीं बचा सकता।

इसीलिए इन्द्रेश कुमार जैसे संघ के चोटी के धूर्तज्ञ एक ओर तो लिंचिंग पर अफ़सोस जताते हैं, तो दूसरी ओर उसी क्षण, लिंचिंग को स्वाभाविक बताने की भी साज़िश रचते हैं। कुतर्क गढ़े जाते हैं कि जब तक बीफ़ का सेवन होगा, तब तक लिंचिंग होती रहेगी! यानी, हे लिंचिंग को अंज़ाम देने वाले धर्मात्माओं, तुम तब तक धर्म की रक्षा करने के लिए लिंचिंग करते रहो, जब तक कि हम ये कहते रहें कि लोग और ख़ासकर मुसलमान बीफ़ खा रहे हैं, गाय का क़त्ल कर रहे हैं और उसके माँस का कारोबार किया जा रहा है!

रही बात, क़ानून-व्यवस्था को स्थापित करने वाली राज्य सरकारों, पुलिस और अदालत की जबाबदेही की तो भी यही दलील पर्याप्त होगी कि ‘जब तक बीफ़ का सेवन होगा, तब तक लिंचिंग होती रहेगी।’ चूँकि सरकार और पुलिस अन्य अपराधों की तरह बीफ़ के सेवन को रोक नहीं पा रही हैं, लिहाज़ा लिंचिंग को भी नहीं रोका जा सकता। जिस तरह से समाज में चोरी-डकैती-ठगी, हत्या-बलात्कार वग़ैरह होते रहेंगे, उसी तरह से लिंचिंग भी होती रहेगी। जो लोग इसे लेकर दुःखी हैं, वो वोट बैंक और देश को तोड़ने की सियासत कर रहे हैं!

लिंचिंक का बचाव करने की जो दलीलें इन्द्रेश कुमार ने समस्त संघी धर्मात्माओं पर चस्मा की हैं, उससे पहले बीकानेर के सांसद और केन्द्रीय वित्त राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल भी ज़बरदस्त धमाकेदार बयान दे चुके हैं। अलवर में अकबर उर्फ रकबर की लिंचिंग (21 जुलाई 2018) के ज़रिये हुई हत्या के बाद पूर्व प्रशासनिक अधिकारी मेघवाल ने सवा सौ करोड़ भारतवासियों को ज्ञानालोकित किया था कि “जैसे-जैसे प्रधानमंत्री मोदी पॉपुलर हो रहे हैं, इस तरह की घटनाएँ सामने आ रही हैं। यह सब मोदी जी क्यों पॉपुलर हो रहे हैं? इससे डरकर किया जा रहा है। केन्द्र सरकार ने राज्य सरकारों को कह दिया है कि इस तरह की किसी भी घटना पर कार्रवाई करें। लेकिन जैसे-जैसे 2019 का चुनाव नज़दीक आ रहा है, वैसे-वैसे नरेन्द्र मोदी की पॉपुलैरिटी और बढ़ती जा रही है। इसीलिए ये सब घटनाएँ सामने आ रही हैं।”

इसका मतलब ये हुआ कि सिर्फ़ बीफ़ के सेवन की वजह से ही नहीं बल्कि मोदी की लोकप्रियता बढ़ने की वजह से भी लिंचिंग हो रही है। इसी वजह से मोदी सरकार के नागरिक उड्डयन राज्यमंत्री जयन्त सिन्हा ने अपने घर पर रामगढ़ लिंचिंग कांड (29 जून 2017) के उन आठ अपराधियों का माल्यार्पण करके अभिनन्दन किया, जिन्हें बाक़ायदा अदालत ने लिंचिंग का दोषी पाने के बाद उम्र-क़ैद की सज़ा दी थी। इन्हें झारखंड हाईकोर्ट ने सिर्फ़ ज़मानत दी थी, बेकसूर बताते हुए लिंचिंग के गुनाह करते हुए अलीमुद्दीम नाम कार ड्राइवर की हत्या के क़सूर से बरी नहीं किया था।

इन्द्रेश कुमार से पहले 20 जुलाई को लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर हुई बहस के दौरान संघ परिवार के एक अन्य महापुरुष तथा केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह भी लिंचिंग की एक अलग व्याख्या कर चुके हैं। तब राजनाथ सिंह ने अघोषित तौर पर कहा था कि मोदी राज की लिंचिंग के बारे में सवाल तब पूछिएगा, जब इसमें मारे जा रहे लोगों की संख्या चौरासी का दंगों में मारे गये लोगों को पार कर जाए, क्योंकि वो ‘सबसे बड़ी लिंचिंग’ थी। इसीलिए आये दिन हो रही छिटपुट लिंचिंग पर चिन्ता करने की कोई ज़रूरत नहीं है। भले ही अब इसमें बच्चा-चोरी के नाम पर मौक़े पर ही किसी को भी मौत के घाट उतार देने की घटनाएँ भी जुड़ती जा रही हों।

हालाँकि, इसी मौके पर विश्व के सबसे वाचाल राजनेता के रूप में दुनिया भर में अपना परचम लहरा रहे, संघ परिवार की अनन्य विभूति और भारत के ‘लोकप्रिय’ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बमुश्किल 10 सेकेंड के भीतर ये कहकर रस्म अदायगी की कि ‘लिंचिंग मानवता के ख़िलाफ़ है और राज्यों को कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए!’ बहरहाल, अब आप चाहें तो ये तय करें कि जिस बीफ़ को उत्तर भारत के राज्यों में खाना पाप है और जिसके लिए तत्काल लिंचिंग रूपी मृत्युदंड मिलना स्वाभाविक है, उसी बीफ़ को उत्तर पूर्वी राज्यों तथा दक्षिण-पश्चिम भारत के कई बीजेपी शासित राज्यों में खाना क्यों पाप नहीं है! वहाँ लिंचिंग की बर्बर सज़ा क्यों प्रभावी नहीं है! इससे ‘एक देश – एक निशान – एक विधान’ वाला श्यामा प्रसाद मुखर्जी का चिन्तन कितना खोखला साबित होगा!

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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2019 में भी मोदी जीते तो 36 नहीं बल्कि 72 राफ़ेल मिलेंगे और वो भी बिल्कुल मुफ़्त!

अब तक सवा सौ करोड़ भारतवासियों के सामने 9, 20, 26 और 40 फ़ीसदी कम पर राफ़ेल सौदा करने का दावा किया जा चुका है! इसमें ग़ौर करने वाली सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि जैसे-जैसे वक़्त बीत रहा है, वैसे-वैसे राफ़ेल सौदे पर हुई बचत का आँकड़ा भी विकास के नये-नये कीर्तिमान बना रहा है! बिल्कुल पेट्रोल-डीज़ल, सीएनजी और रसोई गैस के क़ीमतों की तरह!

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Rafale deal scam

क्या आप जानते हैं कि फ़्राँस से अन्ततः भारत को 36 राफ़ेल विमान बिल्कुल मुफ़्त मिलने वाले हैं! जानकारों का तो यहाँ तक कहना है कि नरेन्द्र मोदी सरकार की राष्ट्रभक्ति और ईमानदारी को देखते हुए मुमकिन है कि भारतीय वायु सेना को आख़िरकार 36 की जगह 72 राफ़ेल हासिल हो जाएँ! और, वो भी बिल्कुल मुफ़्त! जी हाँ, ‘एक के साथ एक फ़्री’ के रूप में! मुमकिन है कि आपको ये ख़बर फ़ेक लगे! लेकिन ये फ़ेक नहीं हो सकती क्योंकि राफ़ेल सौदे के बारे में मोदी सरकार के मंत्री जिस तरह से आये-दिन सनसनीखेज़ ख़ुलासे कर रहे हैं, उसे देखते हुए वो दिन दूर नहीं जब परम माननीय प्रधानसेवक श्रीमान नरेन्द्र मोदी जी महाराज की ओर से ऐलान कर दिया जाए कि वास्तव में पूरा का पूरा राफ़ेल सौदा ही सवा सौ करोड़ भारतवासियों को मुफ़्त में हासिल होने वाला है!

विदेश राज्यमंत्री जनरल वीके सिंह ने शनिवार 30 सितम्बर 2018 को दुबई में भारतीय वाणिज्य दूतावास में जुटे भारतीय समुदाय के सामने दावा किया कि “संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन सरकार ने 126 विमानों के लिए जिस मूल क़ीमत को लेकर बातचीत की थी और उड़ान की स्थिति आते-आते राफ़ेल विमान की जो प्रभावी क़ीमत बैठेगी, यदि दोनों की तुलना की जाए तो मोदी सरकार ने राफ़ेल सौदा 40 प्रतिशत कम में किया है।”

मुमकिन है कि इतना पढ़ते ही आप उछल पड़े हों, क्योंकि अभी तक तो आपको यही बताया गया था कि मनमोहन सिंह सरकार के मुक़ाबले मोदी सरकार ने राफ़ेल सौदे में 20 फ़ीसदी की बचत हासिल करके दिखाया है। 29 अगस्त 2018 को भारत के सबसे बड़े गणितज्ञ और वित्त मंत्री अरूण जेटली ने रहस्योद्घाटन किया था कि “राफ़ेल डील की तुलना यदि 2007 की क़ीमतों से की जाए तो साल 2016 में हुई डील 20 फ़ीसदी कम क़ीमत पर की गयी है। दरअसल, एनडीए सरकार की डील, लोडेड एयरक्राफ्ट की है, जो हथियारों से लैस है। जबकि काँग्रेस ने सिर्फ़ बेसिक या ढाँचा एयरक्राफ्ट का सौदा किया था।”

उसी वक़्त जेटली ने कृतज्ञ राष्ट्र को ये भी समझाया कि राफ़ेल की क़ीमत में जो अन्तर है वो बेसिक और लोडेड की वजह से है। लेकिन देश की सबसे पुरानी पार्टी, काँग्रेस को इतनी सी बात भी समझने की अक़्ल नहीं है। इसीलिए उसके अध्यक्ष राहुल गाँधी सवा सौ करोड़ भारतवासियों को ग़ुमराह कर रहे हैं और पूर्व फ़्राँसिसी राष्ट्रपति फ्रॉस्वा ओलांद के साथ साज़िश रचकर मोदी सरकार को दुनिया भर में बदनाम कर रहे हैं। राफ़ेल सौदे की अद्भुत विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए जेटली ने बताया था कि “2007 के लोडेड एयरक्राफ्ट की तुलना यदि 2016 के लोडेड एयरक्राफ्ट से की जाए तो मोदी सरकार ने क़रीब 20 फ़ीसदी पैसा बचाया है।”

अब ज़रा और पीछे चलिए। 24 जुलाई 2018 को मोदी सरकार के एक और बेहद विद्वान, ईमानदार, निष्ठावान और साहसी मंत्री श्रीमान रविशंकर प्रसाद जी ने दुनिया भर में बिखरे हुए भारतवंशियों को ज्ञानालोकित किया था कि “2011 में काँग्रेस के शासन में हुई डील में एक राफ़ेल जेट की क़ीमत 813 करोड़ रुपये रखी गयी थी। 2016 में हमारी सरकार के दौरान हुए समझौते में इसकी क़ीमत 739 करोड़ रुपये तय हुई। जो यूपीए सरकार की कुल क़ीमत से 9% कम है।”

इसके एक दिन पहले यानी 23 जुलाई 2018 को केन्द्रीय क़ानून और सूचना-प्रौद्योगिकी मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने राष्ट्रसेवा की बड़ी मिसाल पेश करते हुए ट्वीट करके एक ही झटके में कई लोगों को चरित्र प्रमाणपत्र बाँट दिया। उन्होंने लिखा कि “एके एंटनी 8 साल तक देश के रक्षामंत्री थे। वो देश के रक्षा क्षेत्रों से जुड़े संवेदनशील मुद्दों को समझते हैं। लेकिन जब एक पार्टी किसी परिवार के इर्द-गिर्द हो जाती है, तो सभी नेताओं को भीड़ की तरह ही बोलना पड़ता है। 2004 से 2014 तक काँग्रेस की सरकार भ्रष्टाचार से ग्रस्त थी। आज जब हम ईमानदारी से काम कर रहे हैं। देश विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्था बन रही है। राहुल गाँधी ने राफ़ेल डील के बारे में लोकसभा में झूठ बोला। फ़्राँस के राष्ट्रपति से बातचीत को लेकर बोले गये झूठ ने तो मनमोहन सिंह और आनन्द शर्मा को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। राहुल गाँधी को देश के संवेदनशील मुद्दों की कितनी समझ है? जनता ये समझ गयी है।”

मोदी सरकार में रविशंकर प्रसाद से कोई कम समझदार और विदुषी नहीं हैं माननीय रक्षा मंत्री सुश्री निर्मला सीतारमन! ये देवी भी नारी-शक्ति की महान भारतीय परम्पराओं को निभाते हुए 18 सितम्बर 2018 को दोहराती हैं कि “यूपीए के मुक़ाबले एनडीए का सौदा 9 प्रतिशत सस्ता है।” हालाँकि, सीतारमन के 9 फ़ीसदी के दावे को उनके महकमे के ही वायु सैनिक अधिकारी एयर मार्शल रघुनाथ नाम्बियार ने भी फ़ुस्स साबित कर दिया। वायुसेना के उपप्रमुख नाम्बियार कह चुके हैं कि 2008 में जिस स्तर से यूपीए सरकार ने सौदेबाज़ी या मोलतोल शुरू की थी, उसके मुक़ाबले मोदी सरकार ने 40 फ़ीसदी कम दाम पर सौदा किया है।

इसी तरह, आपको ये जानकर भी शायद ही आश्चर्य हो कि संसद में राफ़ेल सौदे को गोपनीय बताने वाली मोदी सरकार ने 19 अप्रैल 2016 को बेहद की कलात्मक ब्यौरे के साथ ट्वीट करके विश्व को बताया था कि ‘मोदी सरकार ने 12 अरब डॉलर के सौदे में 3.2 अरब डॉलर बचा लिये हैं।’ हिसाब लगाएँ तो ये बचत 26 फ़ीसदी से ऊपर बैठती है! यानी, अब तक सवा सौ करोड़ भारतवासियों के सामने 9, 20, 26 और 40 फ़ीसदी कम पर राफ़ेल सौदा करने का दावा किया जा चुका है! इसमें ग़ौर करने वाली सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि जैसे-जैसे वक़्त बीत रहा है, वैसे-वैसे राफ़ेल सौदे पर हुई बचत का आँकड़ा भी विकास के नये-नये कीर्तिमान बना रहा है! बिल्कुल पेट्रोल-डीज़ल, सीएनजी और रसोई गैस के क़ीमतों की तरह!

विकास की ऐसी ऐतिहासिक लीला कोई साधारण बात नहीं है। 70 साल में कभी इतना शानदार विकास, देखा था किसी ने? राफ़ेल सौदे से जुड़ी ये उपलब्धि इसलिए भी मामूली नहीं है, क्योंकि ये जानकारियाँ भारतवर्ष की उन जीती-जागती महान विभूतियों के हवाले से है जो हमारे संवैधानिक पदों पर आसीन हैं और जिनके चाल-चरित्र और चेहरे की सौगन्ध खाकर देवलोक के देवतागण भी अपनी सत्ता संचालित करते हैं! बहरहाल, अब जल्द ही आपको एक और परम विदुषी और नाट्य शास्त्र के प्रणेता भरत मुनि की वंशज सुश्री स्मृति इरानी का ये बयान सुनने को मिलेगा कि राफ़ेल सौदे पर मोदी सरकार ने 60 फ़ीसदी का बचत की है!

इसके कुछ समय बाद महान शिक्षा शास्त्री और समाज सुधारक श्रीमान प्रकाश जावड़ेकर का ये ख़ुलासा सामने होगा कि मोदी सरकार ने राफ़ेल सौदे में मनमोहन सिंह सरकार के मुक़ाबले 80 फ़ीसदी की बचत की है! इसीलिए ये सारी की सारी रक़म भारत के एक अन्य महान सपूत और कर्ज़ों में डूबे हुए उद्योगपति अनिल अम्बानी को तोहफ़े के रूप में दे दी जाएगी! इसके भी कुछ वक़्त बाद, सदाचार के सबसे बड़े पुरोधा श्रीमान राजनाथ सिंह का बयान आएगा कि पाकिस्तान को मुँहतोड़ जबाब देने के संकल्प को देखते हुए फ़्राँस की डसॉल्ट एविएशन कम्पनी ने फ़ैसला किया है कि वो भारत को 36 लोडेड राफ़ेल बिल्कुल मुफ़्त देगा!

फिर 2019 का चुनाव नज़दीक आते-आते बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का बयान आएगा कि फ़्राँस के मौजूदा राष्ट्रपति इम्मुअल मैक्रों ने प्रस्ताव भेजा है कि युगपुरुष नरेन्द्र मोदी जी की चतुर्दिक तपस्या को देखते हुए भारत को ‘एक के साथ एक फ़्री’ वाला ऑफ़र दिया जाएगा! इसके लिए बस एक ही शर्ते होगी कि 2019 में मोदी को फिर से प्रधानमंत्री बनवाया जाए! यदि मोदी प्रधानमंत्री बने तो पाकिस्तान में दिवाली मनायी जाएगी, क्योंकि आख़िर राफ़ेल के रूप में आने वाले 72 विमानों से पाकिस्तान का ही तो काम तमाम होना है!

अमित शाह, तब देश को ये भी बताएँगे कि संयुक्त राष्ट्र से सम्मानित नरेन्द्र मोदी, भारत के लिए तभी 72 आँधियाँ या राफ़ेल (फ़्रेंच शब्द राफ़ेल का हिन्दी में अर्थ आँधी या तेज़ हवा होता है) ला पाएँगे, जब जनता बीजेपी को 350 सीटें जिताएगी! आख़िर में, धुआँधार चुनाव प्रचार करते हुए नरेन्द्र मोदी ख़ुलासा करेंगे कि राहुल गाँधी जानना चाहते हैं कि मैंने अनिल भाई को फ़ायदा क्यों पहुँचाया? तो जान लीजिए कि अनिल के अलावा राफ़ेल का मेल और किसी से हो ही नहीं सकता! क्योंकि अनिल का मतलब भी वही है जो राफ़ेल का है। यानी, ‘पवन, वायु, हवा’!

फिर मोदी गरजेंगे कि भाईयों-बहनों, मैं पूछना चाहता हूँ कि अनिल और राफ़ेल के मेल को कोई तेल और पानी का मिलन कह सकता है क्या? लेकिन नामदार को इतनी समझ कहाँ है! इसीलिए वो कहते फिरते हैं कि राफ़ेल सौदा दुनिया का सबसे बड़ा घोटाला है! मैं पूछता हूँ कि 70 साल में काँग्रेस एक भी ऐसा घोटाला क्यों नहीं कर सकी? क्योंकि इसकी नीयत ठीक नहीं थी। जबकि मेरी नीयत पहले दिन से साफ़ थी। इसीलिए आज तक काले धन का एक रुपया भी विदेश से नहीं आया। अच्छे दिन तो बस, आते ही रह गये।

भाईयों-बहनों,

नोटबन्दी और 2000 के नोट के ज़रिये मैंने काला धन रखने वालों की कितनी बड़ी मुसीबत दूर कर दी, ये उनसे पूछिए जिनके पास काला धन है और जिन्हें काले कारोबार में महारत हासिल है! नोटबन्दी में मैंने पूरे देश को लाइन में लगा दिया। लेकिन क्या कहीं किसी को कोई धन्ना सेठ या अफ़सर कभी लाइन में दिखायी दिया? नहीं ना! ऐसा सिर्फ़ इसलिए हुआ कि मेरे दोस्तों को पता था नोटबन्दी का असली मक़सद ही सारे काले धन को सफ़ेद बनाना था! इस काम को काँग्रेस 70 साल में भी नहीं कर पायी, लेकिन मैंने 50 दिन से भी कम में करके दिखा दिया! ये कोई मामूली उपलब्धि नहीं है। इसकी वजह से किसी भी रईस व्यक्ति ने ख़ुदकुशी क्यों नहीं की? क्योंकि उसे मालूम था कि नोटबन्दी का मक़सद, ग़रीबों को सबक सिखाना था, उनके पास दबे रुपयों को बाहर निकालना था!

भाईयों-बहनों,

ऐसी ही गर्व करने वाली कहानी जीएसटी की भी है। लेकिन इसकी बात फिर कभी। अभी तो आप से जानकार गदगद रहिए कि राफ़ेल दिनों-दिन सस्ता होते-होते, कैसे नसीबवालों की वजह से बिल्कुल मुफ़्त मिलने वाला है। वो भी ‘एक के साथ एक फ़्री’! अलबत्ता, इतना ज़रूर है कि मैं अनिल भाई से कह दूँगा कि वो काँग्रेस को 36 करोड़ रुपये का चन्दा पेटीएम से भेज दें, ताकि 2019 में काँग्रेस भी 44 से घटकर 36 पर ही सिमट जाए!

भाईयों-बहनों,

आपको मेरे मंत्रियों की देश भक्ति की ख़ास तौर पर दाद देनी चाहिए क्योंकि दिन-रात तरह-तरह की बयानबाज़ी करने में निपुण मेरे किसी भी मंत्री को, कभी नहीं लगा कि राफ़ेल सौदा करके मैंने काँग्रेस को भारी नुक़सान नहीं पहुँचाया है! राहुल गाँधी और उनके सहयोगी दलों को तथा यशवन्त सिन्हा और अरूण शौरी जैसे लोगों को भले ही राफेल सौदे में भारी घोटाले की बू आ रही हो, लेकिन देशप्रेम और राष्ट्रभक्ति के सबसे बड़े मन्दिर तथा मेरे प्रिय गुरुकुल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हरेक सिपाही राफ़ेल की सुगन्ध से गदगद है!

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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संशय भरे आधुनिक युग में हिंदू आदर्श धर्म : थरूर

वह धर्म जो सर्वज्ञानी सृजनकर्ता पर सवाल करता हो वह मेरे विचार से आधुनिक और उत्तर आधुनिक चैतन्य के लिए अनोखा धर्म है।

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Shashi-Tharoor

न्यूयॉर्क, 21 सितंबर | कांग्रेस सांसद व लेखक शशि थरूर के अनुसार, हिंदू एक अनोखा धर्म है और यह संशय के मौजूदा दौर के लिए अनुकूल है। थरूर ने धर्म के राजनीतिकरण की बखिया भी उधेड़ी।

न्यूयॉर्क में जयपुर साहित्य महोत्सव के एक संस्करण में के बातचीत सत्र के दौरान गुरुवार को थरूर ने कहा, “हिंदूधर्म इस तथ्य पर निर्भर करता है कि कई सारी बातें ऐसी हैं जिनके बारे में हम नहीं जानते हैं।”

मौजूदा दौर में इसके अनुकूल होने को लेकर उन्होंने कहा, “पहली बात यह अनोखा तथ्य है कि अनिश्चितता व संशय के युग में आपके पास एक विलक्षण प्रकार का धर्म है जिसमें संशय का विशेष लाभ है।”

सृजन के संबंध में उन्होंने कहा, “ऋग्वेद वस्तुत: बताता है कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति कहां से हुई, किसने आकाश और धरती सबको बनाया, शायद स्वर्ग में वह जानता हो या नहीं भी जानता हो।”

उन्होंने कहा, “वह धर्म जो सर्वज्ञानी सृजनकर्ता पर सवाल करता हो वह मेरे विचार से आधुनिक और उत्तर आधुनिक चैतन्य के लिए अनोखा धर्म है।”

उन्होंने कहा, “उससे भी बढ़कर आपके पास असाधारण दर्शनग्रहण है और चूंकि कोई नहीं जानता कि भगवान किस तरह दिखते हैं इसलिए हिंदूधर्म में हर कोई भगवान की कल्पना करने को लेकर स्वतंत्र है।”

कांग्रस सांसद और ‘व्हाइ आई एम हिंदू’ के लेखक ने उन लोगों का मसला उठाया जो स्त्री-द्वेष और भेदभाव आधारित धर्म की निंदा करते हैं।

मनु की आचार संहिता के बारे में उन्होंने कहा, “इस बात के बहुत कम साक्ष्य हैं। क्या उसका पालन किया गया और इसके अनेक सूत्र विद्यमान हैं।”

उन्होंने उपहास करते हुए कहा, “इन सूत्रों में मुझे नहीं लगता कि हर हिंदू कामसूत्र की भी सलाह मानते हैं।”

थरूर ने कहा, “प्रत्येक स्त्री विरोधी या जातीयता कथन (हिंदू धर्मग्रंथ में) के लिए मैं आपको समान रूप से पवित्र ग्रंथ दे सकता हूं, जिसमें जातीयता के विरुद्ध उपदेश दिया गया है।”

–आईएएनएस

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जानिये क्यों गिर रहा है रुपया

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Rupee Fall

नई दिल्ली, 13 सितम्बर | केंद्र सरकार ने रुपये की गिरावट को थामने की हरसंभव कोशिश करने का भरोसा दिलाया है। इसका असर पिछले सत्र में तत्काल देखने को मिला कि डॉलर के मुकाबले रुपये में जबरदस्त रिकवरी देखने को मिली। हालांकि रुपये में और रिकवरी की अभी दरकार है।

डॉलर के मुकाबले रुपया बुधवार को रिकॉर्ड 72.91 के स्तर तक लुढ़कने के बाद संभला और 72.19 रुपये प्रति डॉलर के मूल्य पर बंद हुआ। इससे पहले मंगलवार को 72.69 पर बंद हुआ था।

रुपये की गिरावट से अभिप्राय डॉलर के मुकाबले रुपये में कमजोरी आना है। सरल भाषा में कहें तो इस साल जनवरी में जहां एक डॉलर के लिए 63.64 रुपये देने होते थे वहां अब 72 रुपये देने होते हैं। इस तरह रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ है।

शेष दुनिया के देशों से लेन-देन के लिए प्राय: डॉलर की जरूरत होती है ऐसे में डॉलर की मांग बढ़ने और आपूर्ति कम होने पर देशी मुद्रा कमजोर होती है।

एंजेल ब्रोकिंग के करेंसी एनालिस्ट अनुज गुप्ता ने रुपये में आई हालिया गिरावट पर कहा, “भारत को कच्चे तेल का आयात करने के लिए काफी डॉलर की जरूरत होती है और हाल में तेल की कीमतों में जोरदार तेजी आई है जिससे डॉलर की मांग बढ़ गई है। वहीं, विदेशी निवेशकों द्वारा निवेश में कटौती करने से देश से डॉलर का आउट फ्लो यानी बहिगार्मी प्रवाह बढ़ गया है। इससे डॉलर की आपूर्ति घट गई है।”

उन्होंने बताया कि आयात ज्यादा होने और निर्यात कम होने से चालू खाते का घाटा बढ़ गया है, जोकि रुपये की कमजोरी की बड़ी वजह है।

ताजा आंकड़ों के अनुसार, चालू खाते का घाटा तकरीबन 18 अरब डॉलर हो गया है। जुलाई में भारत का आयात बिल 43.79 अरब डॉलर और निर्यात 25.77 अरब डॉलर रहा।

वहीं, विदेशी मुद्रा का भंडार लगातार घटता जा रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार 31 अगस्त को समाप्त हुए सप्ताह को 1.19 अरब डॉलर घटकर 400.10 अरब डॉलर रह गया।

गुप्ता बताते हैं, “राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बनने से भी रुपये में कमजोरी आई है। आर्थिक विकास के आंकड़े कमजोर रहने की आशंकाओं का भी असर है कि देशी मुद्रा डॉलर के मुकाबले कमजोर हो रही है। जबकि विश्व व्यापार जंग के तनाव में दुनिया की कई उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राएं डॉलर के मुकाबले कमजोर हुई हैं।”

अमेरिकी अर्थव्यवस्था में लगातार मजबूती के संकेत मिल रहे हैं जिससे डॉलर दुनिया की प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले मजबूत हुआ है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में मजबूती आने से विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से अपना पैसा निकाल कर ले जा रहे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि संरक्षणवादी नीतियों और व्यापारिक हितों के टकराव के कारण अमेरिका और चीन के बीच पैदा हुई व्यापारिक जंग से वैश्विक व्यापार पर असर पड़ा है।

–आईएएनएस

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