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बैंकों को लग चुकी 36 हजार करोड़ रुपये की चपत

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देश के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को कई हजार करोड़ों का चूना लगाने वालों में हीरा कारोबारी नीरव मोदी, शराब कारोबारी विजय माल्या, मेहुल चौकसी और विक्रम कोठारी जैसे बड़े कारोबारी ही शामिल नहीं है बल्कि आईआईएम बेंगलुरू के एक अध्ययन के मुताबिक 2012 से 2016 बैंकों में जमा जनता की गाढ़ी कमाई के 22,743 करोड़ रुपये धोखेबाज उड़ा ले गए हैं।

इसमें हाल के घोटाले की राशि को शामिल कर लिया जाए तो यहां आंकड़ा 36 हजार करोड़ से ऊपर पहुंच जाता है।

केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने संसद में भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा था कि पिछले साल 21 दिसंबर तक बैंकों के साथ धोखाधड़ी के 25,600 मामले सामने आए, जिनमें बैंकों को करीब 179 अरब रुपये की चपत लगाई गई।

आंकड़ों के मुताबिक, 2017 वित्तीय वर्ष के पहले नौ महीनों में बैंकों के साथ एक लाख या इससे ज्यादा राशि की धोखाधड़ी के करीब 455 मामले आईसीआईसीआई बैंक में, 429 मामले भारतीय स्टेट बैंक में, 244 मामले स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक में और 237 मामले एचडीएफसी बैंक में सामने आए।

वहीं, अप्रैल से दिसंबर 2016 के दौरान बैंकों से धोखाधड़ी करने के 3500 से ज्यादा मामले सामने आए थे।

बैंकों के साथ धोखाधड़ी में बैंक कर्मी भी शामिल पाए गए हैं। केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने 2011 में खुलासा किया था कि बैंक ऑफ महाराष्ट्र, ओरियंटल बैंक ऑफ कामर्स और आईडीबीआई जैसे बैंकों के कर्मियों ने करीब 10 हजार फर्जी खाते खोले और 15 हजार करोड़ रुपये के ऋण जारी किए।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2014 में भी बैंकों के साथ धोखाधड़ी के मामले सामने आए थे जब मुंबई पुलिस ने 700 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी के मामले में नौ प्राथमिकी दर्ज की थी, इसी वर्ष इलोक्ट्रोथर्म इंडिया कंपनी सेंट्रल बैंक को 436 करोड़ रुपये का भुगतान करने में नाकाम रही थी। इसके अलावा कोलकाता के उद्यमी बिपिन वोहरा ने कथित रूप से फर्जी दस्तावेजों के सहारे सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया से 140 करोड़ रुपये हासिल किए थे।

आईआईएन बेंगलुरू के अध्ययन के मुताबिक, 2015 में जैन इंफ्राप्रोजेक्ट के कर्मचारियों ने सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया को करीब 200 करोड़ रुपये का चूना लगाया था। हैरत की बात यह है कि इसी वर्ष विभिन्न बैंक के कर्मचारी नकली हांगकांग कॉरपोरेशन बनाकर धोखाधड़ी में लिप्त पाए गए थे। इन लोगों ने मिलकर बैंक को करीब 600 करोड़ रुपये का चूना लगाया था।

अध्ययन में कहा गया, “2016 में सिंडिकेट बैंक धोखाधड़ी का मामले सबसे बड़े मामलों में से एक हैं, जिसमें चार लोगों ने मिलकर करीब 380 खाते खोले और फर्जी चेक, एलआईसी पॉलिसी और लेटर ऑफ अंडरस्टेंडिंग (एलओयू) के माध्यम से बैंक को करीब 10 अरब रुपये का घाटा पहुंचाया।”

फर्जी लेटर ऑफ अंडरस्टेंडिंग (एलओयू) के बारे में बताते हुए इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर और विख्यात अर्थशास्त्री डॉ. विजय कौल ने आईएएनएस को बताया, “एलओयू किसी भी कारोबारी की कंपनी और उसके क्रेडिट स्कोर को देख कर बैंक की ओर से जारी किए जाते हैं और नीरव मोदी समेत सभी बड़े कारोबारियों को बैंक के अधिकारियों ने ही जारी किए। मगर, कारोबारियों ने बैंक के अधिकारियों को पैसा खिलाकर एलओयू हासिल किए जिसके परिणाम हमारे सामने हैं।”

उन्होंने कहा, “बैंकिंग प्रणाली हमेशा विश्वास पर चलती है लेकिन यहां कुछ लोगों ने अपने फायदे के लिए जालसाजी करके बैंकों को चूना लगाया।”

बैंकों के साथ धोखाधड़ी मामले में सबसे अहम खुलासा तब हुआ जब 2017 में शराब कारोबारी और किंगफिशर विमानन कंपनी के मालिक विजय माल्या ने आईडीबीआई और दूसरे बैंकों को करीब 9,500 करोड़ रुपये का चूना लगाया और देश से भाग निकले। इसी वर्ष भारत की दूसरी कंपनी विनसम डायमंड सुर्खियों में आई। इस कंपनी पर करीब सात हजार करोड़ रुपये की देनदारी का मामला है। सीबीआई ने समूह के खिलाफ छह एफआईआर दर्ज की।

इसके अलावा डक्कन क्रॉनिकल ने बैंकों को करीब 11.61 अरब करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचाया। वहीं 2017 में कोलकाता के बिजनेस टाइकून निलेश पारिख को कम से कम 20 बैंकों को 22.23 अरब रुपये का नुकसान पहुंचाने के लिए गिरफ्तार किया गया था।

वर्ष 2018 में हीरा कारोबारी नीरव मोदी ने पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) को करीब 11,450 करोड़ रुपया का चूना लगाया। मोदी ने पीएनबी के अलावा 17 अन्य बैंकों से करीब तीन हजार करोड़ रुपये का ऋण ले रखा था। बता दें कि मोदी को पीएनबी ने करीब 150 एलओयू जारी किए थे।

यह पूछने पर कि हीरा, शराब और जेम्स कारोबारियों द्वारा बैंकों के साथ धोखाधड़ी कर विदेश भाग जाने से देश की जनता पर बैंकों के प्रति कैसा प्रभाव पड़ेगा, उन्होंने कहा कि लोगों को पता है कि उनका पैसा सरकारी बैंकों में है और उसके पीछे सरकार का समर्थन है जिससे उन्हें डरने की जरूरत नहीं है। इनके भागने से उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

उन्होंने कहा, “हां, लेकिन यह बैंकों के निजीकरण की मांग कर रहे लोगों के लिए जरूर एक बहुत बड़ा धक्का है क्योंकि अगर यहां भी अमेरिका जैसे विकसित देश की तरह बैंकों का निजीकरण हो जाएगा तो जैसा हाल (आर्थिक संकट)वहां 2007 में हुआ था ठीक वैसा ही भारत में देखने को मिलता।”

निवेश को इच्छुक विदेशी कारोबारी के मन नें इन घोटालों के कारण भारत की छवि के बारे में अर्थशास्त्री विजय कौल ने कहा, “निवेशक के मन में भारत की छवि को लेकर इन घोटालों का ज्यादा असर नहीं पड़ेगा क्योंकि उन्हें यहां के हालात की जानकारी है और उन्हें पता है कि कहां निवेश करना बेहतर रहेगा।”

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अटल बिहारी वाजपेयी : नए भारत के सारथी और सूत्रधार

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नई दिल्ली, 16 अगस्त (आईएएनएस)| भारत रत्न, सरस्वती पुत्र एवं देश की राजनीति के युगवाहक पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का संपूर्ण जीवन राष्ट्रसेवा और जनसेवा को समर्पित रहा। वे सच्चे अर्थों में नवीन भारत के सारथी और सूत्रधार थे। वे एक ऐसे युग मनीषी थे, जिनके हाथों में काल के कपाल पर लिखने व मिटाने का अमरत्व था। ओजस्वी वक्ता विराट व्यक्तित्व और बहुआयामी प्रतिभा के धनी वाजपेयी की जीवन यात्रा आजाद भारत के अभ्युदय के साथ शुरू होती है और विश्व पटल पर भारत को विश्वगुरु के पद पर पुन: प्रतिष्ठित करने की आकांक्षा के साथ कई पड़ावों को जीते हुए आगे बढ़ती है। वे भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्य थे। वे 1968 से 1973 तक भारतीय जन संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने अटल बिहारी वाजपेयी में भारत का भविष्य देखा था। वाजपेयी 10 बार लोक सभा सांसद रहे। वहीं वे दो बार 1962 और 1986 में राज्यसभा सांसद भी रहे। वाजपेयी जी देश के एक मात्र सांसद थे, जिन्होंने देश की छह अलग-अलग सीटों से चुनाव जीता था। सन 1957 से 1977 तक वे लगातार बीस वर्षो तक जन संघ के संसदीय दल के नेता रहे। आपातकाल के बाद देश की जनता द्वारा चुने गए मोरार जी देसाई जी की सरकार में वे विदेश मंत्री बने और विश्व में भारत की एक अलग छवि का निर्माण किया।

इस दौरान संयुक्त राष्ट्र संघ में पहली बार हिंदी में ओजस्वी उद्बोधन देकर वाजपेयी ने विश्व में मातृभाषा को पहचान दिलाई और भारत की एक अलग छाप छोड़ी। आपातकाल के दौरान उन्हें भी लोकतंत्र की हत्यारी सरकार की प्रताड़ना झेलनी पड़ी। उन्हें जेल में डाल दिया गया लेकिन उन्होंने जेल से ही कलम के सहारे अनुशासन के नाम पर अनुशासन का खून लिख कर राष्ट्र को एकजुट रखने की कवायद जारी रखी।

सिद्धांतों पर अडिग रहते हुए विचारधारा की राजनीति करने वाले वाजपेयी भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के बाद पहले अध्यक्ष बने। उन्होंने तीन बार 1996, 1998-99 और 1999-2004 में प्रधानमंत्री के रूप में देश का प्रतिनिधित्व किया। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय फलक पर देश को नई ऊंचाइयों पर प्रतिष्ठित करने वाले वाजपेयी के कार्यकाल में देश ने प्रगति के अनेक आयाम छुए।

अजातशत्रु अटल बिहारी वाजपेयी ने पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के नारे को आगे बढ़ाते हुए ‘जय जवान-जय किसान- जय विज्ञान’ का नारा दिया। देश की सामरिक सुरक्षा पर उन्हें समझौता बिलकुल भी गंवारा नहीं था। वैश्विक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने 1998 में पोखरण में पांच भूमिगत परमाणु परीक्षण किए। इस परीक्षण के बाद कई अंतर्राष्ट्रीय शक्तियों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के बावजूद वाजपेयी की दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति ने इन परिस्थितियों में भी उन्हें अटल स्तंभ के रूप में अडिग रखा। कारगिल युद्ध की भयावहता का उन्होंने डट कर मुकाबला किया और पाकिस्तान को राजनीतिक, कूटनीतिक, रणनीतिक और सामरिक सभी स्तरों पर धूल चटाई।

वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में देश में विकास के स्वर्णिम अध्याय की शुरूआत हुई। वे देश के चारों कोनों को जोड़ने वाली स्वर्णिम चतुर्भुज जैसी अविस्मरणीय योजना के शिल्पी थे। नदियों के एकीकरण जैसे कालजयी स्वप्न के द्रष्टा थे। मानव के रूप में वे महामानव थे। सर्व शिक्षा अभियान, संरचनात्मक ढांचे के सुधार की योजना, सॉफ्टवेयर विकास के लिए सूचना एवं प्रौद्योगिकी कार्यदल का निर्माण और विद्युतीकरण में गति लाने के लिए केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग आदि योजनाओं की शुरुआत कर देश को प्रगति के पथ पर अग्रसर करने में उनकी भूमिका काफी अनुकरणीय रही। वाजपेयी सरकार की विदेश नीति ने दुनिया में भारत को एक नेतृत्वकर्ता के रूप में प्रतिष्ठित रहा।

अपनी ओजस्वी भाषण शैली, लेखन व विचारधारा के प्रति निष्ठा तथा ठोस फैसले लेने के लिए विख्यात वाजपेयी को कई पुरस्कारों से नवाजा गया। उन्हें 1992 में पद्म विभूषण 1994 में लोकमान्य तिलक पुरस्कार, 1994 में ही श्रेष्ठ सांसद पुरस्कार, भारत रत्न पंडित गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कार और 2015 में उन्हें बांग्लादेश के सर्वोच्च अवार्ड फ्रेंड्स ऑफ बांग्लादेश लिबरेशन वार अवॉर्ड से उन्हें सम्मानित किया गया। देश के विकास में अमूल्य योगदान देने एवं अंतर्राष्ट्रीय फलक पर देश को सम्मान दिलाने के लिए वाजपेयी को 2015 में देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से अलंकृत किया गया।

— आईएएनएस

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अगस्त क्रांति कैसे बनी जन-क्रांति?

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Quit India Movement

नई दिल्ली, 9 अगस्त | अगस्त क्रांति भारत से ब्रितानी हुकूमत को उखाड़ फेंकने की अंतिम और निर्णायक लड़ाई थी, जिसकी कमान कांग्रेस के नौजवान नेताओं के हाथ में आ गई थी। राष्ट्रपति महात्मा गांधी ने ‘करो या मरो’ के नारे के साथ अंग्रेजों को देश छोड़ने पर मजबूर करने के लिए देश की जनता का आह्वान किया था। इसलिए इसे ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के रूप में याद किया जाता है।

देश की जनता उस समय द्वितीय विश्वयुद्ध में भारत को झोंक दिए जाने से ब्रितानी सरकार से नाराज थी। युद्ध के कारण जरूरियात की चीजों की कीमतें आसमान छूने लगी थीं। खाने-पीने की वस्तुओं से लेकर सभी मूलभूत चीजों का टोटा पड़ गया था।

हालांकि कांग्रेस के नेता पहले से ही यह जानते थे कि आंदोलन को दबाने के लिए सरकार कोई भी दमनात्मक कार्रवाई करने से बाज नहीं आएगी, क्योंकि द्वितीय विश्वयुद्ध चल रहा था और अंग्रेजों ने उस समय संभावित किसी भी प्रकार के विरोध को दबाने की पूरी तैयारी कर ली थी।

इतिहासकार विपिनचंद्र ने अपनी पुस्तक ‘भारत का स्वतंत्रता संघर्ष’ में लिखा है कि युद्ध की आड़ लेकर सरकार ने अपने को सख्त से सख्त कानूनों से लैस कर लिया था और शांतिपूर्ण राजनीतिक गतिविधियों को को भी प्रतिबंधित कर दिया था।

देश की जनता की मर्जी के खिलाफ भारत को विश्वयुद्ध में झोंक दिए जाने से लोगों में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ भारी असंतोष था। महात्मा गांधी इस असंतोष से भलीभांति परिचित थे, इसलिए उन्होंने जनांदोलन खड़ा करने का फैसला लिया।

विपिन चंद्र ने अपनी पुस्तक में एक जगह लिखा है कि कांग्रेस में इस मसले पर मतभेद होने पर महात्मा गांधी ने कांग्रेस को चुनौती देते हुए कहा- “मैं देश की बालू से ही कांग्रेस से भी बड़ा आंदोलन खड़ा कर दूंगा।”

आखिरकार 14 जुलाई, 1942 को वर्धा में कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में आंदोलन शुरू करने का फैसला लिया गया। इसके बाद 8 अगस्त को कांग्रेस के मुंबई अधिवेशन में भारत छोड़ो आंदोलन छेड़ने का प्रस्ताव पास हुआ। महात्मा गांधी ने अपने भाषण में कांग्रस को इसके लिए धन्यवाद दिया। उन्हें भी अंग्रेजों की दमनात्मक कार्रवाई की आशंका थी। इसलिए उन्होंने अपने भाषण में ‘करो या मरो’ का आह्वान करते हुए जनता पर खुद निर्णय करने और अपना नेतृत्व करने की जिम्मेदारी सौंप दी।

तय कार्यक्रम के अनुसार, नौ अगस्त को अगस्त क्रांति का ऐलान किया गया। लेकिन इससे पहले ही ब्रितानी हुकूमत ने कांग्रेस के सारे प्रमुख नेताओं को हवालात में बंद करना शुरू कर दिया। महात्मा गांधी को 9 अगस्त को तड़के गिरफ्तार कर आगा खां महल स्थित कैदखाने में बंद कर दिया गया।

लेकिन इससे आंदोलन दबने के बजाय और उग्र हो गया और देशभर में ब्रितानी सरकार के खिलाफ जनाक्रोश उमड़ पड़ा। कांग्रेस की दूसरी पंक्ति के नेताओं और महिलाओं ने आंदोलन की कमान संभाल ली।

विपिन चंद्र ने लिखा है कि आंदोलन की बागडोर अच्युत पटवर्धन, अरुणा आसफ अली, राममनोहर लोहिया, सुचेता कृपलानी, बीजू पटनायक, छोटूभाई पुराणिक, आर.पी. गोयनका और बाद में जेल से भागकर जयप्रकाश नारायण जैसे नेताओं ने संभाले रखी।

सरकारी आकलनों के अनुसार, एक सप्ताह के भीतर 250 रेलवे स्टेशन और 500 डाकघरों और 150 थानों पर हमले हुए और उन्हें क्षति पहुंचाया गया। जगह-जगह टेलीफोन के तार काट दिए गए और सरकारी दफ्तरों को क्षतिग्रस्त कर दिया गया।

आंदोलन जितना उग्र था, अंग्रेजों ने उसका दमन भी उतनी ही क्रूरता से किया। विपिनचंद्र के अनुसार, 1942 के अंत तक 60,000 से ज्यादा लोंगों को हवालात में बंद कर दिया गया, जिनमें 16,000 लोगों को सजा दी गई।

ब्रितानी हुकूमत ने आंदोलन को कुचलने की सारी तैयारी कर ली थी। दमनकारी कार्रवाई का अंदेशा कांग्रेसियों को पहले से ही था। इसलिए कांग्रेस ने 9 अगस्त को आंदोलन का आगाज होने से एक दिन पहले स्पष्ट कहा था कि आंदोलन में हिस्सा लेने वालों को खुद अपना मार्गदर्शक बनना होगा।

आंदोलनकारी अहिंसा का मार्ग छोड़ हिंसा पर उतर आए और उन्होंने जबरदस्त तोड़-फोड़ मचाकर अंग्रेजी सरकार की चूलें हिलाकर रख दी। मगर खुद गांधी ने भी इस हिंसक आंदोलन की निंदा करने से इनकार कर दिया और अनेक गांधीवादी विचारकों व नेताओं ने हिंसक कार्रवाई को वक्त की मांग बताई।

महात्मा गांधी की रिहाई के लिए पूरी दुनिया में मांग होने लगी। मगर, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल एक फकीर के आगे झुकने को तैयार नहीं थे। हालांकि ब्रितानी हुकूमत ने आखिरकार 6 मई, 1944 को महात्मा गांधी को रिहा कर दिया। इसके बाद अन्य प्रमुख नेताओं की रिहाई हुई।

अंग्रेजों ने भारत छोड़ो आंदोलन को क्रूरता के साथ दबा दिया, लेकिन इस आंदोलन से एक बात तय हो गया कि भारतीयों को अब पूर्ण आजादी के सिवा कुछ और मंजूर नहीं था और आखिरकार अंग्रेजों को महायुद्ध में विजय हासिल करने के बावजूद भारत को आजाद करना पड़ा।

–आईएएनएस

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ओपिनियन

करुणानिधि : द्रविड़ राजनीति के शलाका पुरुष

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चेन्नई, 7 अगस्त | मुथुवल करुणानिधि द्रविड़ अभियान से जुड़े उन अंतिम लोगों में से एक थे, जो तमिलनाडु में पांच दशक पहले सामाजिक न्याय के आधार पर राजनीति में पिछड़े वर्ग के उत्थान और कांग्रेस शासन की समाप्ति के अगुवा बनकर उभरे थे।

94 वर्षीय करुणानिधि तमिलनाडु के पांच बार मुख्यमंत्री रहे, जिन्होंने यहां एक शलाका पुरुष की तरह अपने सार्वजनिक जीवन को जीया। उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जब उन्होंने 1971 में इंदिरा गांधी का साथ दिया और इसका चुनावों में उन्हें फायदा मिला।

लेकिन उन्होंने 1975-77 के आपातकाल का कड़ा विरोध किया था, जिस दौरान उनकी सरकार को भ्रष्टाचार के आरोप में बर्खास्त कर दिया गया था।

करुणानिधि के नेतृत्व में द्रमुक को 2004 और 2009 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार में बेहतर स्थिति हासिल थी। इससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई में राजग सरकार में भी उनकी पार्टी को अच्छी स्थिति हासिल थी।

वह अपने पथ प्रदर्शक सी.एन. अन्नादुरई या अन्ना के स्थान पर 1969 में मुख्यमंत्री बने थे और पार्टी व सरकार पर अपनी मजबूत पकड़ बनाई। वह लगभग 50 वर्षो तक द्रमुक के अध्यक्ष बने रहे।

वर्ष 2016 में उनकी प्रतिद्वंद्वी जे.जयललिता के निधन, और अब मंगलवार को उनके निधन के बाद तमिलनाडु में एक शून्य पैदा हो गया है।

करुणानिधि का जन्म तीन जून, 1924 को तंजावुर जिले में हुआ था। वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने पत्रकार, नाटककार और पटकथा लेखक के तौर पर भी काम किया।

वह समाज सुधारक ‘पेरियार’ ई.वी. रामास्वामी और अन्ना के प्रभाव में आकर द्रविड़ अभियान से जुड़े।

कलैगनार के रूप में विख्यात करुणानिधि को कला, साहित्य, फैशन, रंगमंच और सिनेमा में भी दक्षता हासिल थी।

करुणानिधि के राजनीतिक भाग्य का निर्माण तब हुआ, जब अन्ना ने डीके से अलग होकर 1949 में द्रमुक की स्थापना की। तमिल फिल्म ‘पाराशक्ति’ के हिट हो जाने और तिरुचिरापल्ली के समीप काल्लाकुडी में रेल रोको अभियान ने उन्हें पूरे राज्य में पहचान दिलाने में मदद की। फिल्म में उन्होंने पटकथा लेखन किया था।

अन्नादुरई के निधन के बाद वह 1969 में राज्य के मुख्यमंत्री बने।

एक गरीब ईसाई वेल्लालर(एक पिछड़ी जाति) में जन्मे करुणानिधि का नाम उनके माता-पिता अंजुगम और मुथुलवल ने दक्षिणमूर्ति रखा था। बाद में उन्होंने अपना नाम बदलकर करुणानिधि रख लिया।

उन्होंने 1937-40 के दौरान हिंदी विरोधी प्रदर्शन में भी भाग लिया था और एक हस्तलिखित अखबार ‘मानवर नेसान(छात्रों का साथी)’ भी प्रकाशित किया था।

करुणानिधि ने मासिक ‘मुरासोली’ का भी प्रकाश किया था, जो बाद में साप्ताहिक हो गया और द्रमुक का अधिकारिक दैनिक पत्र बन गया। गत वर्ष इस पत्रिका ने हीरक जयंती मनाई थी।

उन्होंने 1957 में कुलिथालाई से सफलतापूर्वक अपना पहला चुनाव लड़ा था और उसके बाद से उन्होंने 13 चुनावों में से एक में भी हार का सामना नहीं किया।

–आईएएनएस

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