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बैंकों को लग चुकी 36 हजार करोड़ रुपये की चपत

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देश के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को कई हजार करोड़ों का चूना लगाने वालों में हीरा कारोबारी नीरव मोदी, शराब कारोबारी विजय माल्या, मेहुल चौकसी और विक्रम कोठारी जैसे बड़े कारोबारी ही शामिल नहीं है बल्कि आईआईएम बेंगलुरू के एक अध्ययन के मुताबिक 2012 से 2016 बैंकों में जमा जनता की गाढ़ी कमाई के 22,743 करोड़ रुपये धोखेबाज उड़ा ले गए हैं।

इसमें हाल के घोटाले की राशि को शामिल कर लिया जाए तो यहां आंकड़ा 36 हजार करोड़ से ऊपर पहुंच जाता है।

केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने संसद में भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा था कि पिछले साल 21 दिसंबर तक बैंकों के साथ धोखाधड़ी के 25,600 मामले सामने आए, जिनमें बैंकों को करीब 179 अरब रुपये की चपत लगाई गई।

आंकड़ों के मुताबिक, 2017 वित्तीय वर्ष के पहले नौ महीनों में बैंकों के साथ एक लाख या इससे ज्यादा राशि की धोखाधड़ी के करीब 455 मामले आईसीआईसीआई बैंक में, 429 मामले भारतीय स्टेट बैंक में, 244 मामले स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक में और 237 मामले एचडीएफसी बैंक में सामने आए।

वहीं, अप्रैल से दिसंबर 2016 के दौरान बैंकों से धोखाधड़ी करने के 3500 से ज्यादा मामले सामने आए थे।

बैंकों के साथ धोखाधड़ी में बैंक कर्मी भी शामिल पाए गए हैं। केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने 2011 में खुलासा किया था कि बैंक ऑफ महाराष्ट्र, ओरियंटल बैंक ऑफ कामर्स और आईडीबीआई जैसे बैंकों के कर्मियों ने करीब 10 हजार फर्जी खाते खोले और 15 हजार करोड़ रुपये के ऋण जारी किए।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2014 में भी बैंकों के साथ धोखाधड़ी के मामले सामने आए थे जब मुंबई पुलिस ने 700 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी के मामले में नौ प्राथमिकी दर्ज की थी, इसी वर्ष इलोक्ट्रोथर्म इंडिया कंपनी सेंट्रल बैंक को 436 करोड़ रुपये का भुगतान करने में नाकाम रही थी। इसके अलावा कोलकाता के उद्यमी बिपिन वोहरा ने कथित रूप से फर्जी दस्तावेजों के सहारे सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया से 140 करोड़ रुपये हासिल किए थे।

आईआईएन बेंगलुरू के अध्ययन के मुताबिक, 2015 में जैन इंफ्राप्रोजेक्ट के कर्मचारियों ने सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया को करीब 200 करोड़ रुपये का चूना लगाया था। हैरत की बात यह है कि इसी वर्ष विभिन्न बैंक के कर्मचारी नकली हांगकांग कॉरपोरेशन बनाकर धोखाधड़ी में लिप्त पाए गए थे। इन लोगों ने मिलकर बैंक को करीब 600 करोड़ रुपये का चूना लगाया था।

अध्ययन में कहा गया, “2016 में सिंडिकेट बैंक धोखाधड़ी का मामले सबसे बड़े मामलों में से एक हैं, जिसमें चार लोगों ने मिलकर करीब 380 खाते खोले और फर्जी चेक, एलआईसी पॉलिसी और लेटर ऑफ अंडरस्टेंडिंग (एलओयू) के माध्यम से बैंक को करीब 10 अरब रुपये का घाटा पहुंचाया।”

फर्जी लेटर ऑफ अंडरस्टेंडिंग (एलओयू) के बारे में बताते हुए इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर और विख्यात अर्थशास्त्री डॉ. विजय कौल ने आईएएनएस को बताया, “एलओयू किसी भी कारोबारी की कंपनी और उसके क्रेडिट स्कोर को देख कर बैंक की ओर से जारी किए जाते हैं और नीरव मोदी समेत सभी बड़े कारोबारियों को बैंक के अधिकारियों ने ही जारी किए। मगर, कारोबारियों ने बैंक के अधिकारियों को पैसा खिलाकर एलओयू हासिल किए जिसके परिणाम हमारे सामने हैं।”

उन्होंने कहा, “बैंकिंग प्रणाली हमेशा विश्वास पर चलती है लेकिन यहां कुछ लोगों ने अपने फायदे के लिए जालसाजी करके बैंकों को चूना लगाया।”

बैंकों के साथ धोखाधड़ी मामले में सबसे अहम खुलासा तब हुआ जब 2017 में शराब कारोबारी और किंगफिशर विमानन कंपनी के मालिक विजय माल्या ने आईडीबीआई और दूसरे बैंकों को करीब 9,500 करोड़ रुपये का चूना लगाया और देश से भाग निकले। इसी वर्ष भारत की दूसरी कंपनी विनसम डायमंड सुर्खियों में आई। इस कंपनी पर करीब सात हजार करोड़ रुपये की देनदारी का मामला है। सीबीआई ने समूह के खिलाफ छह एफआईआर दर्ज की।

इसके अलावा डक्कन क्रॉनिकल ने बैंकों को करीब 11.61 अरब करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचाया। वहीं 2017 में कोलकाता के बिजनेस टाइकून निलेश पारिख को कम से कम 20 बैंकों को 22.23 अरब रुपये का नुकसान पहुंचाने के लिए गिरफ्तार किया गया था।

वर्ष 2018 में हीरा कारोबारी नीरव मोदी ने पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) को करीब 11,450 करोड़ रुपया का चूना लगाया। मोदी ने पीएनबी के अलावा 17 अन्य बैंकों से करीब तीन हजार करोड़ रुपये का ऋण ले रखा था। बता दें कि मोदी को पीएनबी ने करीब 150 एलओयू जारी किए थे।

यह पूछने पर कि हीरा, शराब और जेम्स कारोबारियों द्वारा बैंकों के साथ धोखाधड़ी कर विदेश भाग जाने से देश की जनता पर बैंकों के प्रति कैसा प्रभाव पड़ेगा, उन्होंने कहा कि लोगों को पता है कि उनका पैसा सरकारी बैंकों में है और उसके पीछे सरकार का समर्थन है जिससे उन्हें डरने की जरूरत नहीं है। इनके भागने से उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

उन्होंने कहा, “हां, लेकिन यह बैंकों के निजीकरण की मांग कर रहे लोगों के लिए जरूर एक बहुत बड़ा धक्का है क्योंकि अगर यहां भी अमेरिका जैसे विकसित देश की तरह बैंकों का निजीकरण हो जाएगा तो जैसा हाल (आर्थिक संकट)वहां 2007 में हुआ था ठीक वैसा ही भारत में देखने को मिलता।”

निवेश को इच्छुक विदेशी कारोबारी के मन नें इन घोटालों के कारण भारत की छवि के बारे में अर्थशास्त्री विजय कौल ने कहा, “निवेशक के मन में भारत की छवि को लेकर इन घोटालों का ज्यादा असर नहीं पड़ेगा क्योंकि उन्हें यहां के हालात की जानकारी है और उन्हें पता है कि कहां निवेश करना बेहतर रहेगा।”

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राहुल गांधी कर सकते हैं मप्र में मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा : कमलनाथ

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नई दिल्ली, 7 मई | मध्यप्रदेश कांग्रेस के नए अध्यक्ष कमलनाथ का कहना कि पार्टी में चुनाव से पहले मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा करने की परंपरा नहीं है। मगर, जरूरत पड़ी तो पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के नाम की घोषणा कर सकते हैं।

कमलनाथ ने कहा कि मध्यप्रदेश के लोग शिवराज सिंह चौहान की सरकार की ‘ठगी’ से नाराज हैं और कांग्रेस ने इस साल के आखिर में राज्य में होने वाले विधानसभा चुनाव में उन्हें हराने के लिए कमर कस ली है।

उन्होंने आईएएनएस से बातचीत में कहा, “बेशक, समय कम है मगर मुझे पक्का विश्वास है कि मैं गांव स्तर पर पार्टी के संगठन को मजबूत बनाने में सक्षम साबित होऊंगा। यह मुकाबला भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की संगठन-शक्ति व पैसे की ताकत के साथ है।”

कांग्रेस के 71 वर्षीय वरिष्ठ नेता और छिंदवाड़ा से सांसद कमलनाथ नौ बार लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं। उन्होंने कहा कि आगामी चुनाव के मद्देनजर पार्टी की प्रदेश इकाई में बदलाव संबंधी फैसला बहुत पहले ही हो जाना चाहिए था। लेकिन वह अब बीती बातों पर नुक्ताचीनी नहीं करना चाहते कि इस संबंध में फैसला पहले क्यों नहीं लिया गया।

पूर्व केंद्रीय मंत्री कमलनाथ को 26 अप्रैल को मध्यप्रदेश कांग्रेस की प्रदेश इकाई का अध्यक्ष बनाया गया। उन्होंने कहा कि उनका कोई गुट नहीं है और पार्टी के सभी नेताओं से उनके अच्छे रिश्ते हैं।

कमलनाथ की बातों से जाहिर होता है कि विधानसभा चुनाव में खुद उतरने को लेकर उन्होंने अपना विकल्प खुला रखा है। उन्होंने कहा, “मैं 40 साल से चुनाव लड़ता आ रहा हूं। बतौर सांसद मेरा सेवाकाल सबसे लंबा रहा है।”

जब पूछा गया कि क्या ज्योतिरादित्य सिंधिया विधानसभा चुनाव मैदान में उतरेंगे तो उन्होंने कहा, “मुझे नहीं मालूम।”

मध्यप्रदेश में कांग्रेस द्वारा मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा नहीं किए जाने और सिंधिया को चुनाव अभियान समिति का प्रमुख नियुक्त कर संतुलन कायम किए जाने के संबंध में पूछे गए सवालों पर कमलनाथ ने कहा, “मध्यप्रदेश एक बड़ा राज्य है और यहां कोई एक शख्स चुनाव नहीं जीत सकता। आपको कई चेहरों की जरूरत होती है। यही कारण है कि पार्टी ने ऐसा फैसला लिया है।”

जब पूछा गया कि क्या वह चाहेंगे कि पार्टी मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा करे तो उन्होंने कहा कि हर राज्य के लिए अगल रणनीति होती है।

कमलनाथ ने कहा, “कभी-कभी यह जरूरी होता है, जबकि कभी इसकी जरूरत नहीं होती। क्या भाजपा ने उत्तर प्रदेश में किसी को मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाया था? क्या उन्होंने उत्तराखंड में किसी को मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाया? उनका कभी कोई मुख्यमंत्री उम्मीदवार (चुनाव से पूर्व) नहीं था। इसलिए यह परिस्थितियों पर निर्भर करता है।”

कमलनाथ ने इससे पहले अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि पार्टी को हर राज्य में बताना चाहिए कि वहां उसका नेता कौन है। इसका जिक्र करने पर उन्होंने कहा, “अगर जरूरत महसूस होगी तो कांग्रेस अध्यक्ष किसी के नाम की घोषणा करेंगे।”

कमलनाथ ने कहा कि प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रमुख के तौर पर उनकी प्राथमिकता पार्टी को गांव स्तर पर मजबूत करना होगा। उन्होंने कहा, “चुनाव बहुत मायने में स्थानीय बन गया है और हमें यह समझना होगा।”

कांग्रेस को मध्यप्रदेश में पिछले तीन विधानसभा चुनावों में हार का मुंह देखना पड़ा है। कमलनाथ का आरोप है कि भाजपा पूर्व में किए अपने वादों को पूरा करने में विफल रही है।

पार्टी के प्रदेश प्रमुख के तौर पर अपनी नियुक्ति के संबंध मे कमलनाथ ने कहा, “मेरे सभी से अच्छे रिश्ते हैं। इसलिए मेरे लिए पार्टी में एकता लाना कोई चुनौती नहीं है। मैं भाग्यशाली हूं कि इसकी कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि पार्टी में पहले से ही एकता है।” उन्होंने पार्टी में सिंधिया के साथ किसी भी प्रकार के मतभेद से इनकार किया।

कमलनाथ ने कहा कि उनका मुकाबला अभी वर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज से है।

–आईएएनएस

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मोदी राज की सबसे ग़ैर-मामूली घटना है ‘रेपिस्ट समर्थक मंत्री बनो’ योजना…!

अभी तो संघ प्रमुख मोहन भागवत की ओर से तो ये यक्ष-प्रश्न उछाला ही नहीं गया है कि काँग्रेस के ज़माने में कितने बलात्कार और हत्याएँ होती थीं! राहुल गाँधी पहले अपनी चार पीढ़ियों के राज में हुए रेप का ब्यौरा दें, फिर उनके कैंडल-मार्च को गम्भीरता से लेने पर विचार किया जा सकता है!

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Deputy CM Kavinder Gupta

‘कठुआ रेप एंड मर्डर मामूली घटना है!’ और ‘इतने बड़े देश में कठुआ और उन्नाव जैसी घटनाएँ होती रहती हैं! इसे लेकर बात का बतंगड़ नहीं बनाना चाहिए!’ ये दोनों बयान बीजेपी के दो वरिष्ठ नेताओं के हैं। ‘मामूली घटना’ बताने वाले कविन्द्र गुप्ता को जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री का ताज मिला है तो ‘बतंगड़’ सिद्धान्त के प्रतिपादक और परम विद्वान सन्तोष गंगवार, मोदी सरकार में राज्यमंत्री के आसान पर शोभायमान हैं!

यदि इतना पढ़कर आप क्रोधित हो रहे हों, जो ज़रा ये भी जान लीजिए कि इन दोनों और लाखों भक्तों के गुरु घंटाल श्रीमान नरेन्द्र मोदी जी उर्फ़ प्रधानमंत्री सेवक उर्फ़ माननीय चौकीदार महाशय उर्फ़ ज़नाब नसीबवाला साहब का तो मानना है कि ‘कठुआ रेप को लेकर आरोप-प्रत्यारोप नहीं होना चाहिए!’ जन्म-जन्मान्तर से ‘आरोप-प्रत्यारोप’ से बचते आये मितभाषी मोदी तो कठुआ रेप एंड मर्डर से इस क़दर सदमे में जा डूबे थे कि भारत में प्रवास के दौरान उसके मुँह से रविशंकर प्रसाद की शैली में ‘कड़ी भर्त्सना’ का बोल तक नहीं फूट सका!

वो तो भला हो मोदी जी की विदेश यात्रा का, जिसमें साफ़ और ताज़ा हवा के सेवन के बाद उनकी सुध-बुध वापस लौट पायी। तब कहीं जाकर लन्दन में वो बोल पाये कि ‘एक बेटी के साथ अत्याचार कैसे सहन कर सकते हैं! मैंने लाल क़िले से कहा था कि बेटियों से सवाल करने वाले बेटों से सवाल क्यों नहीं करते? बेटी के साथ जघन्य अपराध करने वाला भी तो, किसी का बेटा ही होता है!’

अब देश की आदत तो रही ही नहीं कि वो अपने नेता की किसी पते की बात पर ग़ौर करे और द्रवित हो। क्योंकि जब रात-दिन जुमलों की फेंका-फेंकी ही होती रहेगी तो काम की बात को पकड़ना, हर किसी के लिए मुश्किल ही होता जाएगा। बहरहाल, जनता ने जब अपने लफ़्फ़ाज़ चौकीदार की बातें नहीं सुनी तो उसने उस लाल क़िले की ही पहचान बदल देने का फ़ैसला ले लिया जहाँ से उसने जनता को अपनी आँखें खोलने का सन्देश दिया था। लाल क़िले को अब डालमिया समूह के हवाले करने के पीछे की सबसे बड़ी वजह यही है।

इससे पहले अत्यन्त बहादुरी दिखाते हुए 56 इंची वाले के चेलों ने अध्यादेश लाकर उस POSCO क़ानून को बदल दिया, जिसका कठुआ कांड पर कोई असर नहीं पड़ सकता। क्योंकि आपराधिक दंड विधान के मुताबिक़, किसी भी अपराध की सज़ा को किसी भी पिछली तारीख़ से प्रभावी नहीं किया जा सकता। ज़ाहिर है कि जब अगली ‘मामूली घटना’ यानी किसी मासूम के साथ रेप होगा तो नये अध्यादेश के मुताबिक़, मुक़दमा चलाया जाएगा, वो भी तब यदि रेपिस्टों के समर्थन में संघियों ने तिरंगा चमकाकर रैलियाँ नहीं निकाली तो…!

बाक़ी, यदि रेप में ‘आरोप-प्रत्यारोप’ और ‘बतंगड़’ बनाने की गुँजाइश हुई तो आसाराम और गुरमीत राम रहीम फ़ार्मूले का इस्तेमाल किया जाएगा! वो भी तभी जब विजय रुपाणी वाले नारद जी, त्रिपुरा के परम प्रतापी मुख्यमंत्री बिप्लव देब के कान में ज्ञान-मंत्र फूँकेंगे कि इंटरनेट से पता चला है कि महाभारत काल में राजकुमारी द्रौपदी का जब भरे राज दरबार चीरहरण हो सकता है तो देश की आम महिलाओं की बिसात ही क्या है!

अभी तो संघ प्रमुख मोहन भागवत की ओर से तो ये यक्ष-प्रश्न उछाला ही नहीं गया है कि काँग्रेस के ज़माने में कितने बलात्कार और हत्याएँ होती थीं! राहुल गाँधी पहले अपनी चार पीढ़ियों के राज में हुए रेप का ब्यौरा दें, फिर उनके कैंडल-मार्च को गम्भीरता से लेने पर विचार किया जा सकता है! इतना ही नहीं, ममता बनर्जी भी पहले ये साफ़ करें कि पश्चिम बंगाल में होने वाले रेप की रोकथाम में वो सफल क्यों नहीं हुई?

जब तक इन सवालों का जबाब देश के सामने नहीं होगा, तब तक पेट्रोल-डीज़ल का दाम कुलाँचे भरता रहेगा, नोटबन्दी में बन्द हुए 1000/500 के नोट गिने ही जाते रहेंगे, ‘विकास’ नज़रबन्द ही रहेगा, कालाधन भूमिगत ही रहेगा, दलितों पर अत्याचार जारी रहेंगे, बेरोज़गारों की फौज़ बढ़ती रहेगी, जजों की रहस्यमय मौत होती रहेगी, नीरव-चोकसी-माल्या-ललित देश को लूटकर फ़ुर्र होते रहेंगे, सुप्रीम कोर्ट के जज ख़तरे में फँसे लोकतंत्र को बचाने की दुहाई देते रहेंगे, अविश्वास प्रस्ताव की गरिमा तार-तार होती रहेगी, चीन और पाकिस्तान के साथ बग़ैर एजेंडा वाली शिखर बैठकें होती रहेंगी! जनता के ख़ून-पसीने की कमाई पर सैर-सपाटा होता रहेगा! अर्थव्यवस्था, आईसीयू में कोमा में पड़ी रहेगी! क्योंकि ये सब तो रेप से कहीं अधिक ‘मामूली’ हैं!

एक बात और गाँठ बाँध लीजिए कि जम्मू-कश्मीर के नवनियुक्त उपमुख्यमंत्री को शपथ लेते ही कठुआ रेप एंड मर्डर कांड के ‘मामूली’ होने का दिव्य ज्ञान यूँ ही नहीं प्राप्त हो गया! ऐसा मोदी राज की चमत्कारी ‘रेपिस्ट समर्थक मंत्री बनो’ योजना के सफल क्रियान्वयन की वजह से ही हो पाया है!

दरअसल, बीजेपी बुनियादी तौर पर एक चमत्कारी पार्टी रही है। लेकिन मोदी राज में तो तक़रीबन रोज़ाना ही कोई न चमत्कार होता है! बीजेपी का ताज़ा चमत्कार ये है कि रेपिस्टों के समर्थन में तिरंगा चमकाओ, रैली निकालो और मंत्री पद पाओ!

तभी तो जम्मू-कश्मीर की महबूबा मुफ़्ती सरकार में बीजेपी के कोटे से मंत्री बनाये गये लोगों में वो विधायक भी शामिल है जिसने कठुआ रेप और हत्याकांड के आरोपियों के समर्थन में ज़ोरदार प्रदर्शन किया था।

जम्मू-कश्मीर सरकार तो पूरी की पूरी चमत्कारों से भरी पड़ी है। सबसे बड़ा और बुनियादी चमत्कार तो वहाँ का गठबन्धन है। एक ओर उत्कट राष्ट्रवादी पार्टी बीजेपी जिसकी नीति है, रेपिस्टों का समर्थन तो दूसरी तरफ़ है पीडीपी, जो अलगाववादियों का समर्थन करके गौरवान्वित होती रही है!

ऐसे चमत्कार को ही शास्त्रों में ‘एक ही घाट पर शेर और बकरी के पानी पीने’ की उपमा दी गयी है! ऐसा चमत्कार सिर्फ़ इसलिए मुमकिन हो पाता है कि बीजेपी हो या पीडीपी, दोनों का एजेंडा साफ़ है कि उसूल सिर्फ़ विरोधियों के लिए होने चाहिए, हमें तो हर हाल में सत्ता चाहिए!

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

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ओपिनियन

अंबेडकर ने नहीं सीखा था अन्याय के आगे झुकना

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कबीरपंथी परिवार में जन्मे डॉ. भीमराव अंबेडकर अपनी 127वीं जयंती के मौके पर भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितना संविधान के निर्माण के बाद और दलितों के संघर्ष के दौरान थे। दलितों और पिछड़ों को वोट बैंक समझने वाले सभी दल आज अंबेडकर को अपना मार्गदर्शक और प्रेरणा पुंज कहते नहीं अघाते हैं।

अंबेडकर के नाम पर कसमें खाई जाती हैं, आंदोलन किए जाते हैं और यह संदेश देने की पुरजोर कोशिशें की जाती हैं कि दलितों का सबसे बड़ा सिपहसालार कौन है। लेकिन यह भी हकीकत है कि राजनीति के मौजूदा बदले हुए तेवर में अगर वाकई कोई पीछे छूटता जा रहा है तो वह है सिर्फ और सिर्फ भीमराव अंबेडकर।

विलक्षण प्रतिभा के धनी भीमराव बेहद निर्भीक थे। वे न चुनौतियों से डरते थे, न झुकते थे। लड़ाकू और हठी अंबेडकर ने अन्याय के आगे झुकना तो जैसे सीखा ही न था।

14 अप्रैल, 1891 को तत्कालीन ब्रिटिश भारत के केंद्रीय प्रांत (मध्य प्रदेश) के इंदौर के पास महू नगर की छावनी में एक महार परिवार में माता-पिता की 14वीं संतान के रूप में जन्मे भीमराव के पिता की मृत्यु बालपन में ही हो गई थी। 1897 में बॉम्बे के एलफिन्सटोन हाईस्कूल में पहले अस्पृश्य के रूप में दाखिला लेकर 1907 में मैट्रिक की परीक्षा पास की थी। पढ़ाई के दौरान ही 15 साल की उम्र में 1906 में 9 साल की रमाबाई से इनकी शादी हुई।

अंबेडकर ने अर्थशास्त्र और राजनीति शास्त्र में डिग्री हासिल की। हिंदू धर्म में दलितों के साथ होने वाले भेदभाव और छुआछूत से दुखी होकर उन्होंने इसके खिलाफ संघर्ष भी किया, लेकिन विशेष सफलता न मिलने पर इस धर्म को ही त्याग दिया। 14 अक्टूबर, 1956 को उन्होंने लाखों दलितों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। यह क्रम निरंतर जारी है।

कहा जाता है कि दलित मुद्दों पर अंबेडकर के गांधीजी से मतभेद रहे हैं। पत्रिका ‘हरिजन’ के 18 जुलाई, 1936 के अंक में अंबेडकर के ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ की समीक्षा में गांधीजी ने जोर दिया था कि हर किसी को अपना पैतृक पेशा जरूर मानना चाहिए, जिससे अधिकार ही नहीं, कर्तव्यों का भी बोध हो। यह सच्चाई है कि ब्रिटिश शासन के डेढ़ सौ वर्षों में भी अछूतों पर होने वाले जुल्म में कोई कमी नहीं आई थी, जिससे अंबेडकर आहत थे।

लेकिन धुन के पक्के अंबेडकर ने गोलमेज कॉन्फ्रें स में जो तर्क रखे, वो इतने ठोस और अधिकारपूर्ण थे कि ब्रिटिश सरकार तक को उनके सामने झुकना पड़ा और 1932 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री रेम्जे मैक्डोनल्ड ने अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व के लिए एक तात्कालिक योजना की घोषणा की जिसे कम्युनल अवार्ड के नाम से जाना गया। इस अवार्ड में अछूत कहे जाने वाले समाज को दोहरा अधिकार मिला। पहला यह कि वे सुनिश्चित सीटों की आरक्षित व्यवस्था में अलग चुनकर जाएंगे और दूसरे में दो वोटों का अधिकार मिला। एक वोट आरक्षित सीट के लिए और दूसरा वोट अनारक्षित सीट के लिए। इसके बाद बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर का कद समाज में काफी ऊंचा हो गया।

उनकी अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग का गांधीजी ने पुरजोर विरोध कर एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। उनकी दलील थी कि इससे हिंदू समाज बिखर जाएगा, लेकिन जब अंबेडकर जीत गए तो गांधीजी ने पूना पैक्ट (समझौता) पर दस्तखत के लिए उन्हें मजबूर कर दिया और आमरण अनशन पर चले गए।

गांधीजी की बिगड़ती तबीयत और उससे बढ़ते दबाव के चलते अंबेडकर 24 सितंबर, 1932 की शाम येरवदा जेल पहुंचे, जहां पर दोनों के बीच समझौता हुआ। इसे पूना पैक्ट के नाम से जाना जाता है। समझौते के तहत डॉ. अंबेडकर ने दलितों को कम्युनल अवार्ड में मिले पृथक निर्वाचन के अधिकार को छोड़ने की घोषणा की, लेकिन इसी में 78 आरक्षित सीटों को बढ़ाकर 148 करवाया। साथ ही अस्पृश्य लोगों के लिए हर प्रांत में शिक्षा अनुदान के लिए पर्याप्त रकम की व्यवस्था के साथ नौकरियों में बिना किसी भेदभाव के दलित वर्ग के लोगों की भर्ती को सुनिश्चित कराया।

उन्हें हालांकि इसके क्रियान्वयन की चिंता थी, तभी तो 25 सितंबर 1932 को बंबई में सवर्ण हिंदुओं की बहुत बड़ी सभा में अंबेडकर ने कहा, “हमारी एक ही चिंता है, क्या हिंदुओं की भावी पीढ़ियां इस समझौते का अनुपालन करेंगी?” इस पर सभी सवर्ण हिंदुओं ने एक स्वर में कहा था कि करेंगे।

डॉ. अंबेडकर ने यह भी कहा था, “हम देखते हैं कि दुर्भाग्यवश हिंदू संप्रदाय एक संघटित समूह नहीं है, बल्कि विभिन्न संप्रदायों का फेडरेशन है। मैं आशा और विश्वास करता हूं कि आप अपनी तरफ से इस अभिलेख को पवित्र मानेंगे तथा सम्मानजनक भावना से काम करेंगे।”

लेकिन आज जो हो रहा है, क्या इसी भाव से हो रहा है? कहीं अंबेडकर के नाम पर जोड़-तोड़ की कोशिशें तो कहीं इस कोशिश पर ऐतराज की नई राजनीति शुरू हो गई है। यह सच है कि दलितों के शोषण और अत्याचार का एक सदियों पुराना और लंबा सिलसिला है जो अब भी किसी न किसी रूप में बरकरार है।

गुलाम भारत में अंबेडकर के राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष ने दलितों को जहां राह दिखाई, वहीं आजाद भारत में दलितों के सम्मानजनक स्थान के लिए मार्ग भी प्रशस्त किया। लेकिन लगता नहीं कि आत्मसम्मान और गरिमा की लड़ाई में दलित समुदाय अब भी अकेला है। अंबेडकर का उपयोग सभी दल करना चाहते हैं।

हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि स्कूल में पढ़ते समय भीम की प्रतिभा और लगन को देखकर महादेव अंबेडकर नामक ब्राह्मण अध्यापक अपने बेहद प्रिय इस छात्र को दोपहर की छुट्टी के समय अपने भोजन से चावल, दाल, रोटी देते थे। यह अत्यधिक स्नेह ही था जो भीमराव का उपनाम सकपाल घराने के अंबेवाडी गांव के चलते अंबेवाडेकर से बदलकर अपना ब्राह्मण उपनाम अंबेडकर कर दिया, बल्कि स्कूल के रजिस्टर तक में बदल डाला।

इस तरह दलित भीम के नाम के साथ ब्राह्मण अंबेडकर का नाम सदैव के लिए जुड़ गया, लेकिन राजनीति की फितरत देखिए कि भीमराव अंबेडकर के नाम पर राजनीति थमने का नाम नहीं ले रही है, जबकि उनका स्थान शुरू से ही राजनीति से कहीं ऊपर था, है और रहेगा।

By : ऋतुपर्ण दवे

–आईएएनएस

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