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ज़रा हटके

इस पहाड़ पर खुद-ब-खुद चढ़ने लगती हैं गाड़ियां

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ladakh

ऊंची चढ़ाई पर चढ़ने के लिए जहां कार को टॉप गियर में लगाना पड़ता है, वहीं लद्दाख में एक ऐसी पहाड़ी है जहां कार अपने आप चढ़ने लगती है। इस पहाड़ी को मैग्नेटिक हिल कहा जाता है।

सामान्यतौर पर पहाड़ी की ढलान पर गाड़ी को गियर में डालकर खड़ा किया जाता है। यदि ऐसा नहीं किया जाए तो गाड़ी नीचे की ओर जा सकती है लेकिन इस मैग्नेटिक हिल पर वाहन को न्यूट्रल करने खड़ा कर दिया जाए तब भी यह नीचे की और नहीं बल्कि ऊपर की ओर चलने लगती है।

इस पहाड़ी का ऐसा जादू है कि न्यूट्रल खड़ी गाड़ी भी लगभग 20 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से ऊपर की तरफ चढ़ने लगती है। माना जाता है कि इन पहाड़ों में गजब का मैग्नेटिक फोर्स है जो सिर्फ गाड़ियों को ही नहीं बल्कि हवाई जहाजों को भी प्रभावित करता है।

कई पायलेट्स के मुताबिक उन्होंने इस पहाड़ के ऊपर से गुजरते हुए प्लेन में जबरदस्त दबाव और कंपन महसूस किया है। इसलिए इस रूट पर वे प्लेन की रफ्तार बढ़ा लेते हैं।

साइंटिस्ट्स के मुताबिक इस हिल में गजब की चुंबकीय ताकत है, या ग्रेविटी की वजह से यह सब होता है, लेकिन यह कहां से आती है इसका पता अभी तक नहीं चल पाया है।

wefornews bureau 

ज़रा हटके

उज्जवला योजना : सिलेंडर मिला, गैस भरवाने के पैसे नहीं

गोमती के लिए हर महीने आठ सौ रुपये ईंधन पर खर्च करना आसान नहीं है। वह मुश्किल से दिन में 100 रुपये कमाती है और तीन बच्चों का खर्च उसके सिर पर है। पति खेती करता है, और खेती का बुरा हाल है।

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जबलपुर से मंडला की ओर जाने वाले मार्ग पर स्थित है आदिवासी बहुल गांव सिंघपुर। सड़क किनारे एक छोटी सी परचून की दुकान चलाने के साथ सिलाई का काम करने वाली गोमती को उज्जवला योजना के तहत गैस सिलेंडर और चूल्हा तो मिल गया है, मगर सिलेंडर दोबारा भरवाने के लिए पैसे उसके पास नहीं हैं। लिहाजा, वह फिर से लकड़ी की आंच पर खाना बनाने को मजबूर है।

गोमती (30) महज एक ऐसी महिला है, जिसने खुलकर अपनी व्यथा बताई। वह कहती है कि सरकार की योजना अच्छी है, गैस सिलेंडर और चूल्हा सौ रुपये देने पर मिल गया, मगर सिलेंडर खाली होने पर उसे दोबारा भरवाने के लिए आठ सौ रुपये कहां से लाएं? सब्सिडी का पैसा तो बाद में आएगा।

गोमती के लिए हर महीने आठ सौ रुपये ईंधन पर खर्च करना आसान नहीं है। वह मुश्किल से दिन में 100 रुपये कमाती है और तीन बच्चों का खर्च उसके सिर पर है। पति खेती करता है, और खेती का बुरा हाल है।

उसका कहना है कि अगर वास्तव में सरकार चाहती है कि आदिवासी और गरीब महिलाओं की आंखें सुरक्षित रहें, वे स्वस्थ्य रहें तो उसे मुफ्त में गैस सिलेंडर देना होगा, तभी गरीब लोग उसका उपयोग कर पाएंगे, नहीं तो चूल्हा और सिलेंडर सिर्फ घर की शोभा बढ़ाएंगे।

सिंघपुर की नजदीकी ग्राम पंचायत सिरसवाही की सुदामा बाई तो सरकारी अमले के रवैए से बेहद खफा है। उनका है कि गैस सिलेंडर के लिए उनसे कई बार आवेदन लिए जा चुके हैं, कभी कहते हैं कि आधार कार्ड की कॉपी दो, तो कभी राशनकार्ड की कॉपी मांगते हैं। कई बार दे चुके हैं, मगर सिलेंडर अब तक नहीं मिला है।

यहां की मुन्नी बाई भी उन महिलाओं में है जो रसोई गैस सिलेंडर के लिए काफी समय से इंतजार कर रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दो बड़े और गरीबों के हितकारी डीम प्रोजेक्ट हैं, जिनमें एक हर घर में शौचालय और गरीबों को सस्ती दर पर गैस सिलेंडर मुहैया कराना। आदिवासी अंचल में जाकर यही लगता है कि ये दोनों योजनाएं सिर्फ कुछ इलाकों तक ही कारगर होकर रह गई होंगी, क्योंकि मध्य प्रदेश के निपट आदिवासी इलाके में लोगों को अब तक इस योजना का लाभ ही नहीं मिल पाया है।

प्रधानमंत्री मोदी लगातार इस बात का हवाला देते हुए नहीं थकते हैं कि लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाने वाली महिला के शरीर में हर रोज कई सौ सिगरेट के धुएं के बराबर धुआं जाता है। इससे उसके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ता है। महिला स्वस्थ्य रहे, इसलिए उसे चूल्हे के धुएं से दूर रखना होगा, लिहाजा उसे सस्ती दर पर गैस सिलेंडर दिया जा रहा है। इसके बावजूद जो हकीकत है, वह गांव और जमीन पर पहुंचकर सामने आती है, आंकड़े भले ही चाहे जो गवाही दें।

–आईएएनएस

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ज़रा हटके

मधुबनी पेंटिंग और इतिहास का अनूठा मेल

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Madhubani Painting

नई दिल्ली, 19 अप्रैल | घनी चित्रकारी और उसमें इंद्रधुनषी रंगों को समेटे बिहार की मधुबनी पेंटिंग कला देश ही नहीं, विदेशों में भी लोकप्रिय है। नवोदित कलाकार नेहा दासगुप्ता ने इतिहास के प्रति अपने रुझान के चलते इस प्राचीन कला में ऐतिहासिक इमारतों के चित्रों का समावेश किया है

नेहा एक सामूहिक चित्र प्रदर्शनी ‘दिल्ली तेरे इश्क में’ में शामिल होने जा रही हैं, जिसका आयोजन 20 से 22 अप्रैल के बीच होगा।

मधुबनी पेंटिंग के प्रारंभिक स्वरूप पर गौर करें तो इस प्राचीन कला में ज्यादातर राम, जानकी, लक्ष्मण, राधा-कृष्ण व दुर्गा से जुड़े प्रसंगों को उकेरा जाता था, मगर समय के साथ इसमें नए-नए प्रयोग भी किए जाते रहे हैं। नेहा भी नया प्रयोग कर पेंटिंग की इस शैली को नए स्वरूप में पेश करने का प्रयास करती हैं।

नेहा दासगुप्ता की चित्र-कृतियां विशुद्ध रूप से मधुबनी पेंटिंग नहीं हैं, उससे केवल प्रेरित हैं, इसलिए उन्होंने अपनी प्रदर्शनी को नाम दिया है ‘ए टच ऑफ मधुबनी’।

अपनी पेंटिंग्स की खासियत बताते हुए नेहा कहती हैं, “मेरी पेंटिंग्स इसलिए अलग हैं, क्योंकि उनमें मधुबनी और इतिहास का अनूठा मेल है। अपनी प्रदर्शनी में मेरा उद्देश्य मधुबनी कला से प्रेरणा लेते हुए वैश्विक स्मारकों को चित्रित करना था। इसके जरिए मैंने इतिहास और यात्रा के प्रति अपने रुझान को एक सूत्र में बांधने का प्रयास किया है।”

उन्होंने कहा, “अपनी इन पेंटिंग्स के जरिए मैं अपनी यात्राओं को कागज पर उतारना चाहती थी। मैं जिस भी देश में गई, वहां के एक लोकप्रिय स्मारक को या उस स्थान से प्रेरित चित्र को चित्रित किया। इसलिए इस प्रदर्शनी में लगने वाली मेरे बनाए चित्रों में कोलकाता में बिताए मेरे समय और वहां की मछलियों की प्रतिछाया भी देखने को मिलेगी।”

इतिहास की छात्रा रहीं नेहा कहती हैं कि इस विषय में ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन करने के कारण ऐतिहासिक इमारतों के प्रति उनका लगाव बेहद स्वाभाविक है। उन्होंने कहा, “मैं ऐतिहासिक इमारतों की याद को किसी भी माध्यम से सहेजना चाहती थी, इसलिए यह प्रयोग किया।”

विभिन्न चित्र-शैलियों के मेल को आप कितना सही मानती हैं? इस सवाल पर नेहा ने कहा, “मेरा ख्याल है कि किसी भी पारंपरिक कला को एक नया स्वरूप देना अच्छा है। इस कला की खूबसूरती और विरासत को ध्यान में रखते हुए मैंने ऐतिहासिक इमारतों के प्रति अपने रुझान को पेश करने का प्रयास किया है, जैसे कि मैंने इनमें पेरिस के आइफिल टॉवर, रोम के कोलोसम, आगरा के ताजमहल और दिल्ली के इंडिया गेट और कुतुब मीनार को चित्रित किया है।”

कला को समाज के आईने के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। क्या आपको लगता है कि इसे समाज में मौजूद समस्याओं को दर्शाने के लिए प्रभावशाली माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है, यह पूछे जाने पर उन्होंने कहा, “बेशक, कला को जागरूकता फैलाने और सच्चाई को सामने लाने के लिए प्रयोग किया जा सकता है। चित्रकार हों या फोटोग्राफर, वे समाज के सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं को उभारते हुए लम्हों को कैद कर सकते हैं।”

वह कहती हैं, “कला मात्र सुखद पहलू से बढ़कर है, इसके माध्यम से लोगों को बेहतर जिंदगी और बेहतर समाज के लिए कोशिश करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। कला समाज और उसमें हो रहे विकास को रचनात्मक स्वरूप में पेश करने का माध्यम है।”

कला के विभिन्न माध्यमों को एक ही आर्टवर्क में पेश करने के सवाल पर नेहा कहती हैं, “मुझे लगता है कि यह सही है, लेकिन साथ ही किसी भी कलाकार को किसी कला से प्रेरणा लेते हुए उसके मौलिक स्वरूप के इतिहास और विरासत का सम्मान करना चाहिए। बदलाव गलत नहीं है, यह केवल रचनात्मक रूप से नए प्रयोग करने के हमारे कौशल को दर्शाता है।”

–आईएएनएस

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ओपिनियन

अंबेडकर ने नहीं सीखा था अन्याय के आगे झुकना

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Bhim-Rao-Ambedkar

कबीरपंथी परिवार में जन्मे डॉ. भीमराव अंबेडकर अपनी 127वीं जयंती के मौके पर भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितना संविधान के निर्माण के बाद और दलितों के संघर्ष के दौरान थे। दलितों और पिछड़ों को वोट बैंक समझने वाले सभी दल आज अंबेडकर को अपना मार्गदर्शक और प्रेरणा पुंज कहते नहीं अघाते हैं।

अंबेडकर के नाम पर कसमें खाई जाती हैं, आंदोलन किए जाते हैं और यह संदेश देने की पुरजोर कोशिशें की जाती हैं कि दलितों का सबसे बड़ा सिपहसालार कौन है। लेकिन यह भी हकीकत है कि राजनीति के मौजूदा बदले हुए तेवर में अगर वाकई कोई पीछे छूटता जा रहा है तो वह है सिर्फ और सिर्फ भीमराव अंबेडकर।

विलक्षण प्रतिभा के धनी भीमराव बेहद निर्भीक थे। वे न चुनौतियों से डरते थे, न झुकते थे। लड़ाकू और हठी अंबेडकर ने अन्याय के आगे झुकना तो जैसे सीखा ही न था।

14 अप्रैल, 1891 को तत्कालीन ब्रिटिश भारत के केंद्रीय प्रांत (मध्य प्रदेश) के इंदौर के पास महू नगर की छावनी में एक महार परिवार में माता-पिता की 14वीं संतान के रूप में जन्मे भीमराव के पिता की मृत्यु बालपन में ही हो गई थी। 1897 में बॉम्बे के एलफिन्सटोन हाईस्कूल में पहले अस्पृश्य के रूप में दाखिला लेकर 1907 में मैट्रिक की परीक्षा पास की थी। पढ़ाई के दौरान ही 15 साल की उम्र में 1906 में 9 साल की रमाबाई से इनकी शादी हुई।

अंबेडकर ने अर्थशास्त्र और राजनीति शास्त्र में डिग्री हासिल की। हिंदू धर्म में दलितों के साथ होने वाले भेदभाव और छुआछूत से दुखी होकर उन्होंने इसके खिलाफ संघर्ष भी किया, लेकिन विशेष सफलता न मिलने पर इस धर्म को ही त्याग दिया। 14 अक्टूबर, 1956 को उन्होंने लाखों दलितों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। यह क्रम निरंतर जारी है।

कहा जाता है कि दलित मुद्दों पर अंबेडकर के गांधीजी से मतभेद रहे हैं। पत्रिका ‘हरिजन’ के 18 जुलाई, 1936 के अंक में अंबेडकर के ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ की समीक्षा में गांधीजी ने जोर दिया था कि हर किसी को अपना पैतृक पेशा जरूर मानना चाहिए, जिससे अधिकार ही नहीं, कर्तव्यों का भी बोध हो। यह सच्चाई है कि ब्रिटिश शासन के डेढ़ सौ वर्षों में भी अछूतों पर होने वाले जुल्म में कोई कमी नहीं आई थी, जिससे अंबेडकर आहत थे।

लेकिन धुन के पक्के अंबेडकर ने गोलमेज कॉन्फ्रें स में जो तर्क रखे, वो इतने ठोस और अधिकारपूर्ण थे कि ब्रिटिश सरकार तक को उनके सामने झुकना पड़ा और 1932 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री रेम्जे मैक्डोनल्ड ने अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व के लिए एक तात्कालिक योजना की घोषणा की जिसे कम्युनल अवार्ड के नाम से जाना गया। इस अवार्ड में अछूत कहे जाने वाले समाज को दोहरा अधिकार मिला। पहला यह कि वे सुनिश्चित सीटों की आरक्षित व्यवस्था में अलग चुनकर जाएंगे और दूसरे में दो वोटों का अधिकार मिला। एक वोट आरक्षित सीट के लिए और दूसरा वोट अनारक्षित सीट के लिए। इसके बाद बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर का कद समाज में काफी ऊंचा हो गया।

उनकी अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग का गांधीजी ने पुरजोर विरोध कर एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। उनकी दलील थी कि इससे हिंदू समाज बिखर जाएगा, लेकिन जब अंबेडकर जीत गए तो गांधीजी ने पूना पैक्ट (समझौता) पर दस्तखत के लिए उन्हें मजबूर कर दिया और आमरण अनशन पर चले गए।

गांधीजी की बिगड़ती तबीयत और उससे बढ़ते दबाव के चलते अंबेडकर 24 सितंबर, 1932 की शाम येरवदा जेल पहुंचे, जहां पर दोनों के बीच समझौता हुआ। इसे पूना पैक्ट के नाम से जाना जाता है। समझौते के तहत डॉ. अंबेडकर ने दलितों को कम्युनल अवार्ड में मिले पृथक निर्वाचन के अधिकार को छोड़ने की घोषणा की, लेकिन इसी में 78 आरक्षित सीटों को बढ़ाकर 148 करवाया। साथ ही अस्पृश्य लोगों के लिए हर प्रांत में शिक्षा अनुदान के लिए पर्याप्त रकम की व्यवस्था के साथ नौकरियों में बिना किसी भेदभाव के दलित वर्ग के लोगों की भर्ती को सुनिश्चित कराया।

उन्हें हालांकि इसके क्रियान्वयन की चिंता थी, तभी तो 25 सितंबर 1932 को बंबई में सवर्ण हिंदुओं की बहुत बड़ी सभा में अंबेडकर ने कहा, “हमारी एक ही चिंता है, क्या हिंदुओं की भावी पीढ़ियां इस समझौते का अनुपालन करेंगी?” इस पर सभी सवर्ण हिंदुओं ने एक स्वर में कहा था कि करेंगे।

डॉ. अंबेडकर ने यह भी कहा था, “हम देखते हैं कि दुर्भाग्यवश हिंदू संप्रदाय एक संघटित समूह नहीं है, बल्कि विभिन्न संप्रदायों का फेडरेशन है। मैं आशा और विश्वास करता हूं कि आप अपनी तरफ से इस अभिलेख को पवित्र मानेंगे तथा सम्मानजनक भावना से काम करेंगे।”

लेकिन आज जो हो रहा है, क्या इसी भाव से हो रहा है? कहीं अंबेडकर के नाम पर जोड़-तोड़ की कोशिशें तो कहीं इस कोशिश पर ऐतराज की नई राजनीति शुरू हो गई है। यह सच है कि दलितों के शोषण और अत्याचार का एक सदियों पुराना और लंबा सिलसिला है जो अब भी किसी न किसी रूप में बरकरार है।

गुलाम भारत में अंबेडकर के राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष ने दलितों को जहां राह दिखाई, वहीं आजाद भारत में दलितों के सम्मानजनक स्थान के लिए मार्ग भी प्रशस्त किया। लेकिन लगता नहीं कि आत्मसम्मान और गरिमा की लड़ाई में दलित समुदाय अब भी अकेला है। अंबेडकर का उपयोग सभी दल करना चाहते हैं।

हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि स्कूल में पढ़ते समय भीम की प्रतिभा और लगन को देखकर महादेव अंबेडकर नामक ब्राह्मण अध्यापक अपने बेहद प्रिय इस छात्र को दोपहर की छुट्टी के समय अपने भोजन से चावल, दाल, रोटी देते थे। यह अत्यधिक स्नेह ही था जो भीमराव का उपनाम सकपाल घराने के अंबेवाडी गांव के चलते अंबेवाडेकर से बदलकर अपना ब्राह्मण उपनाम अंबेडकर कर दिया, बल्कि स्कूल के रजिस्टर तक में बदल डाला।

इस तरह दलित भीम के नाम के साथ ब्राह्मण अंबेडकर का नाम सदैव के लिए जुड़ गया, लेकिन राजनीति की फितरत देखिए कि भीमराव अंबेडकर के नाम पर राजनीति थमने का नाम नहीं ले रही है, जबकि उनका स्थान शुरू से ही राजनीति से कहीं ऊपर था, है और रहेगा।

By : ऋतुपर्ण दवे

–आईएएनएस

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