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‘स्लोगन बाबा’ ने गंगा प्रेमियों को भी ठगा : राजेंद्र सिंह

गंगा पर बैराज बनाए जा रहे हैं, गंदे नाले मिल रहे हैं, इससे गंगा तो और खत्म होने के कगार पर पहुंच जाएगी। लिहाजा, अब तो वर्तमान सरकार पुरानी सरकार से ज्यादा संवेदनहीन दिखाई देने लगी है।

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Ganga Polluton

लगभग पौने चार वर्षो में केंद्र सरकार गंगा नदी की अविरलता और इसे प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए कोई सार्थक काम कर पाने में नाकाम रही। इससे गंगा प्रेमी नाराज हैं। दुनिया में ‘जलपुरुष’ के नाम से विख्यात राजेंद्र सिंह का तो यहां तक कहना है कि ‘स्लोगन बाबा (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी) ने गंगा प्रेमियों को भी ठगने में कसर नहीं छोड़ी है।’

स्टॉकहोम वॉटर प्राइज से सम्मानित राजेंद्र सिंह ने आईएएनएस से फोन पर चर्चा के दौरान कहा, “वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में जब केंद्र में नई सरकार आई थी, तो इस बात की आस बंधी थी कि गंगा नदी का रूप व स्वरूप बदलेगा, क्योंकि प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी ने कहा था- ‘गंगा मां ने मुझे बुलाया है।’ उनकी इस बात पर प्रो. जी.डी. गुप्ता, नदी प्रेमी और संत समाज शांत होकर बैठ गया था, बीते पौने चार साल के कार्यकाल को देखें तो पता चलता है कि केंद्र सरकार ने अपने उन वादों को ही भुला दिया है, जो चुनाव के दौरान किए गए थे, अब तो सरकार गंगा माई का नाम ही नहीं लेती।”

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Waterman India Rajendra Singh

बीते पौने चार वर्ष तक गंगा प्रेमियों के किसी तरह की आवाज न उठाने के सवाल पर राजेंद्र सिंह ने कहा, “सभी गंगा प्रेमियों को इस बात का भरोसा था कि नई सरकार वही करेगी, जो उसने चुनाव से पहले कहा था। मगर वैसा कुछ नहीं हुआ। तीन साल तक इंतजार किया, अब गंगा प्रेमियों में बेचैनी है, क्योंकि जो वादा किया गया था, उसके ठीक उलट हो रहा है।”

उन्होंने कहा, “गंगा पर बैराज बनाए जा रहे हैं, गंदे नाले मिल रहे हैं, इससे गंगा तो और खत्म होने के कगार पर पहुंच जाएगी। लिहाजा, अब तो वर्तमान सरकार पुरानी सरकार से ज्यादा संवेदनहीन दिखाई देने लगी है।”

‘जलपुरुष’ ने याद दिलाया कि वर्तमान सरकार ने नोटीफिकेशन कर गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया था, मगर गंगा को वैसा सम्मान नहीं मिला, जैसा प्रोटोकॉल के तहत मिलना चाहिए था। गंगा को वही सम्मान दिया जाए, जो राष्ट्रंीय ध्वज को दिया जाता है।

सरकार आखिर गंगा की अविरलता के लिए काम क्यों नहीं कर रही? इस सवाल पर राजेंद्र सिंह ने कहा, “उन्हें लगता है कि गंगा माई की सफाई में कोई कमाई नहीं हो सकती, इसलिए उस काम को किया ही न जाए। ऐसा सरकार से जुड़े लोगों ने सोचा। छोटे-छोटे काम भी अपने दल से जुड़े लोगों को ही दिया गया है।”

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अपनी मांगों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, “रिवर और सीवर को अलग-अलग किया जाए, हिमालय से गंगासागर तक गंगा को साफ किया जाए, गंगा के दोनों ओर की जमीन का संरक्षण हो, न कि विकास के नाम पर उद्योगपतियों को सौंपने की साजिश रची जाए।”

राजेंद्र सिंह का आरोप है, “कुछ पाखंडी गुरुओं ने नदियों की जमीन पर पौधरोपण करने के नाम पर सरकारों से जमीन और पैसे पाने के लिए सहमतिपत्र तैयार किए हैं। यह संकट पुराने संकट से बड़ा है, क्योंकि इसमें किसानी की जमीन बड़े औद्योगिक घरानों को दिलाने का षड्यंत्र नजर आता है। इस षड्यंत्र के बारे में भी गंगा के किसानों को बताना जरूरी है। इस सब संकटों के समाधान के लिए गंगा प्रेमी एक साथ बैठकर चर्चा करने की तैयारी में हैं।”

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नोटबंदी ने राजनीतिक, आर्थिक उलझनें पैदा की : अरविंद सुबह्मण्यम

“इसका प्रमुख कारण भारत की राजनीति और अर्थव्यवस्था की एक व्यापक समझ में छिपा हुआ है, इस बारे में कि लोग वोट कैसे करते हैं।”

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Arvind Subramanian

नई दिल्ली, 9 दिसम्बर | देश के पूर्व आर्थिक सलाहकार अरविंद सुबह्मण्यम ने नोटबंदी और जीडीपी के आंकड़ों में संबंध स्थापित करते हुए कहा है कि नोटबंदी के कारण पैदा हुई उलझन के दोहरे पक्ष रहे हैं। क्या जीडीपी के आंकड़ों पर दिखे इसके प्रभाव ने एक लचीली अर्थव्यवस्था को प्रतिबिंबित किया है, और क्या वृद्धि दर के आंकड़ों ने आधिकारिक डेटा संग्रह प्रक्रिया पर सवाल खड़ा किए हैं।

सुबह्मण्यम इस समय हार्वर्ड केरेडी स्कूल में पढ़ा रहे हैं। वह यहां पेंगुइन द्वारा प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘ऑफ काउंसिल : द चैलेंजेस ऑफ द मोदी-जेटली इकॉनॉमी’ के विमोचन समारोह में हिस्सा लेने आए थे।

उन्होंने आईएएनएस के साथ एक बातचीत में पुस्तक के एक अध्याय ‘द टू पजल्स ऑफ डीमोनेटाइजेशन-पॉलिटिकल एंड इकॉनॉमिक’ का जिक्र किया।

उन्होंने अपनी पुस्तक में मौजूद दूसरे पजल का भी जिक्र किया, और यह पजल है भारत में पलायन और आर्थिक वृद्धि जैसी समकारी ताकतों के बावजूद क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था में विचलन। उन्होंने कहा कि राज्यों की एक गतिशीलता प्रतिस्पर्धी संघवाद के तर्क के खिलाफ होती है।

उन्होंने कहा, “अपनी नई पुस्तक के जरिए मैं इस पजल (उलझन), नोटबंदी के बाद नकदी में 86 प्रतिशत कमी की बड़ी उलझन, बावजूद इसके अर्थव्यवस्था पर काफी कम असर की तरफ ध्यान खींचने की कोशिश की है।”

सुबह्मण्यम ने कहा, “ये उलझनें खासतौर से इस सच्चाई से पैदा होती हैं कि यह कदम राजनीतिक रूप से क्यों सफल हुआ, और जीडीपी पर इसका इतना कम असर हुआ..क्या यह ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि हम जीडीपी को ठीक से माप नहीं रहे हैं, अनौपचारिक क्षेत्र को नहीं माप रहे हैं, या यह अर्थव्यवस्था में मौजूद लचीलेपन को रेखांकित कर रहा है?”

सुबह्मण्यम ने अपनी किताब में लिखा है, “नोटबंदी के पहली छह तिमाहियों में औसत वृद्धि दर आठ प्रतिशत थी और इसके बाद सात तिमाहियों में औसत वृद्धि दर 6.8 प्रतिशत।”

उन्होंने कहा, “इसका प्रमुख कारण भारत की राजनीति और अर्थव्यवस्था की एक व्यापक समझ में छिपा हुआ है, इस बारे में कि लोग वोट कैसे करते हैं।”

उन्होंने केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जीडीपी के बैक सीरीज डेटा को जारी करने के दौरान नीति आयोग की उपस्थिति को लेकर जारी विवाद का जिक्र किया। जीडीपी के इस आंकड़े में आधार वर्ष बदल दिया गया, और पूर्व की संप्रग सरकार के दौरान देश की आर्थिक विकास दर को कम कर दिया गया।

उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि जीडीपी की गणना एक बहुत ही तकनीकी काम है और तकनीकी विशेषज्ञों को ही यह काम करना चाहिए। जिस संस्थान के पास तकनीकी विशेषज्ञ नहीं हैं, उसे इसमें शामिल नहीं होना चाहिए।”

सुब्रह्मण्यम ने कहा, “जब मानक बहुत ऊंचे होंगे और वृद्धि दर फिर भी समान रहेगी तो अर्थशास्त्री स्वाभाविक रूप से सवाल उठाएंगे। यह आंकड़े की विश्वसनीयता को लेकर उतना नहीं है, जितना कि आंकड़े पैदा करने की प्रक्रिया को लेकर और उन संस्थानों को लेकर जिन्होंने इस काम को किया है।”

क्या नोटबंदी पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में वह शामिल थे? सुब्रह्मण्यम ने कहा, “जैसा कि मैंने किताब में कहा है, यह कोई निजी संस्मरण नहीं है..यह गॉसिप लिखने वाले स्तंभकारों का काम है।”

सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के बीच हाल के गतिरोध के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि आरबीआई के स्वायत्तता की हर हाल में रक्षा की जानी चाहिए, क्योंकि संस्थानों के मजबूत रहने से देश को लाभ होगा।

उन्होंने कहा, “मैंने इस बात की खुद वकालत की है कि आरबीआई को एक सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए, लेकिन इसके अधिशेष कोष को खर्च के लिए नियमित वित्तपोषण और घाटा वित्तपोषण में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। यह आरबीआई पर छापा मारना जैसा होगा।”

–आईएएनएस

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ओपिनियन

समाज में बदलाव के लिए अपने घर में झांकने की जरूरत : निकिता आनंद

साल 2003 की मिस इंडिया का कहना है कि महिलाओं के साथ हो रहे उत्पीड़न पर लगाम लगाने व समाज में सुधार और बदलाव लाने के लिए घर से शुरुआत करनी चाहिए और बाहर के बजाय सबसे पहले घर में झांककर देखना चाहिए कि घर में क्या हो रहा है।

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नई दिल्ली, 7 दिसंबर | साल 2003 की मिस इंडिया टाइटल विजेता व अभिनेत्री निकिता आनंद का मानना है कि समाज में कोई भी सुधार लाने के लिए हमें सबसे पहले अपने घर में झांककर देखना चाहिए और घर से सुधार व बदलाव लाने की कोशिश करनी चाहिए।

निकिता हाल ही में राष्ट्रीय राजधानी में ‘इंटरनेशनल वीमेन पॉलिटेक्निक’ द्वारा आयोजित ‘मिराकी 2018’ कार्यक्रम का हिस्सा बनीं, जहां उन्होंेने आईएएनएस से बात की।

निकिता से जब पूछा गया कि मॉडलिंग में उनका कैसे आना हुआ तो उन्होंने आईएएनएस को बताया, “मैं आर्मी बैकग्राउंड से हूं मेरे पिता डॉक्टर हैं। 10वीं के बाद या 12 वीं के आसपास मेरी मॉडलिंग शुरू हो गई थी और मैंने काफी लोकल पेजेन्ट्स भी जीते हैं और साथ ही साथ प्रोफेशनल रैंप वॉक भी शुरू कर दिया था और मैं एनआईएफटी की स्टूडेंट थीं तो फैशन डिजाइनिंग भी हो रही थी और फैशन रैंप वॉक भी हो रहा था। मुझे मिस इंडिया के लिए पार्टिसिपेट करने का ख्याल आया और थोड़ा सोचने के बाद हिस्सा ले लिया और फिर मैंने मिस इंडिया का टाइटल जीत लिया।”

टीएलसी के शो ‘ओ माई गोल्ड’ की मेजबानी कर चुकीं निकिता को वास्तविक जीवन में गोल्ड के बजाय प्लेटिनम ज्यूलरी ज्यादा पसंद है। शो के बारे में उन्होंने कहा, “इस शो के लएि हमने पूरे देशभर में ट्रैवल किया जो दिलचस्प था। इसमें हमने गोल्ड के बारे में बात की थी, क्योंकि भारत में पारंपरिक आभूषण के तौर पर ज्यादातर पीले सोने का इस्तेमाल होता है। शो करके मुझे मुझे दक्षिण भारतीय और बंगाली ज्यूलरी के बारे में बहुत कुछ जानने को मिला, लेकिन मुझे निजी तौर पर गोल्ड के बजाय प्लेटिनम और डायमंड ज्यूलरी ज्यादा पसंद है। मैं इनेक आभूषण ज्यादातर पहनती हूं।”

साल 2003 की मिस इंडिया का कहना है कि महिलाओं के साथ हो रहे उत्पीड़न पर लगाम लगाने व समाज में सुधार और बदलाव लाने के लिए घर से शुरुआत करनी चाहिए और बाहर के बजाय सबसे पहले घर में झांककर देखना चाहिए कि घर में क्या हो रहा है।

उन्होंेने कहा, “महिलाओं के साथ उत्पीड़न की बहुत सारी घटनाएं होती हैं। भारत में हर रोज हर क्षण कहीं न कहीं नाइंसाफी होती है। ऐसे लाखों केस होते होंगे जो कि रिपोर्ट नहीं होते हैं। किसी भी क्षेत्र में किसी भी किस्म के इंसान में बदलाव लाने का काम हमेशा शिक्षा से ही होता है। अपने बच्चों को क्या सिखाते हैं यह मायने रखता है। लोगों की मानसिकता होती है कि पहले बाहर देखो, वहां क्या खराब हो रहा है। लेकिन अपने घर में नहीं झांककर देखते कि उनके घर में क्या हो रहा है।”

निकिता ने कहा कि बच्चा स्कूल से ज्यादा वक्त घर में बिताता है, तो घर में अच्छे संस्कार व माहौल देने की कोशिश करनी चाहिए, तभी वह अच्छा नागरिक बन सकेगा। समाज में सुधार और बदलाव लाने की कोशिश घर से की जानी चाहिए। इस तरह की घटनाओं पर लगाम लगाने और समाज में बदलाव लाने के मानसिकता में बदलाव लाना बेहद जरूरी है।

उनका मानना है कि ‘हैशटैगमीटू’ मूवमेंट को आगे बढ़ाया जाना चाहिए, जिससे और महिलाओं को भी आगे आकर अपनी दास्तां बयां करने का प्रोत्साहन मिले।

उन्होंने कहा, “मेरा मानना है कि इस मूवमेंट को आगे बढ़ाना चाहिए, आवाज तो हर किसी की है तो क्यों एक हिस्से को बोलने दिया जाए और एक हिस्से को दबाया जाए वो नहीं होना चाहिए। जब हम समानता की और सशक्तिकरण की बात करते हैं तो इसका मतलब यही है न कि सबको समान अधिकार मिले। अगर किसी और के आगे आने से और उसकी कहानी आगे आने से किसी और को प्रोत्साहन मिलता है तो ये एक अच्छी बात है। किसी भी महिला के लिए अपने हुए दर्दनाक वाकये को याद करना मुश्किल होता है। उसकी भावना को समझने की कोशिश करनी चाहिए।”

मॉडलिंग में आने की ख्वाहिश रखने वाली लड़कियों के लिए दिए संदेश में उन्होंने कहा, “सबसे पहले आपको तय करना चाहिए कि आपको कहां जाना है, क्योंकि यह आसान लाइन नहीं है, आपके पास जरूरी क्राइटेरिया होनी चाहिए जैसे रैंप वॉक के लिए एक परफेक्ट बॉडी स्ट्रक्चर और हाइट होनी चाहिए। अगर, आपको प्रिंट मॉडलिंग के लिए जाना है तो फिर आपके पास वैसा चेहरा-मोहरा, भाव-भंगिमा होनी चाहिए, जिसे कैमरा अच्छे से कैप्चर कर सकें। आप किसी भी फील्ड को बस इसलिए नहीं चुने कि वो आपको आकर्षित कर रहा है, बल्कि अच्छे से आकलन कर लें कि आप उसके लायक है या नहीं।”

निकिता ने ‘लाइफ में कभी-कभी’ और ‘फोर टू का वन’ जैसी फिल्मों में भी काम किया है। लेकिन अब वह फिल्में नहीं कर रही हैं। फिल्मों से दूरी बनाने के बारे में उन्होंने कहा, “मैंने फिल्मों में काम किया है, लेकिन मुझे टेलीविजन प्रेजेंट करना या फिर लाइव शो करना ज्यादा पसंद है। आजकल मैं गायन का भी प्रशिक्षण ले रही हूं आगे जाकर मैं गायन में भी परफार्मेस दूंगी। अगर मैं टीवी की बात करूं तो मैंने लाइफस्टाइल के अलावा स्पोर्ट्स शो भी बहुत किया है, क्रिकेट पर भी बहुत शो किया है। मुझे टीवी बहुत पसंद आता है, क्योंकि निजी जिंदगी में मैं बहुत आर्गनाइज हूं और यही चीज टीवी में भी है।”

–आईएएनएस

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सुबोध के बलिदान ने बुलन्दशहर को एक और मुज़फ़्फ़रनगर बनने से बचा लिया!

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Inspector Subodh Kumar

अब ये साफ़ हो चुका है कि संघ की औलादों यानी हिन्दू युवा वाहिनी, बजरंगदल, वीएचपी, एबीवीपी और बीजेपी की असली मंशा बुलन्दशहर में मुज़फ़्फ़रनगर को दोहराने की थी! दरअसल, इस भगवा ख़ानदान के तन-बदन में उस वक़्त आग लग गयी जब इसने देखा कि आलमी तबलीगी इज्तिमा (विश्व धार्मिक समागम) के बहाने लाखों मुसलमान बुलन्दशहर में इक्कठा हुए हैं। इज्तिमा का वक़्त 1 से 3 दिसम्बर का था और साज़िश ये रची गयी कि आख़िरी दिन जब मुसलमान अपने घरों को लौट रहे होंगे तब उनसे भिड़न्त कर ली जाए। वो भी इतनी ज़बरदस्त कि मुज़फ़्फ़रनगर के सूरमा  संगीत सोम और संजीव बालियान जैसे दंगा-पुरुष भी चुल्लू भर पानी ढूँढ़ना शुरू कर दें!

पुलिस की एफआईआर में नामजद अभियुक्तों के आकाओं ने बुलन्दशहर ज़िले में मुस्लिमों के धार्मिक आयोजन के बहाने दंगा करवाने का पुख़्ता इन्तज़ाम किया था। लेकिन इज्तिमा में जुटी भीड़ इतनी भारी थी कि दंगाई गिरोह वहाँ घुसकर उपद्रव करने के लिए तैयार नहीं हुआ। लेकिन दंगाई गिरोह मौके को भी हाथ से निकलने नहीं देना चाहते थे। राजस्थान और तेलंगाना में बीजेपी के पक्ष में हवा पलटने और 2019 की ज़रूरतों को देखते हुए अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर दंगाई को कोई ना कोई कारनामा तो करना ही था।

bulandshahr violence

यहीं से दंगाइयों का ‘प्लान बी’ क्रियान्वित हुआ। गाय या सुअर काटकर दंगा कराना बहुत आसान होता है। भीष्म साहनी के उपन्यास ‘तमस’ के मुताबिक़, गाय और सुअर को उम्दा दंगा सामग्री के रूप में उस दौर में देखा गया था, जब देश आज़ाद हुआ था। 70 साल में भी दंगा का ये तत्व बिल्कुल नहीं बदला। गाय ने ही अख़लाक के रूप में अपनी ताक़त की पहचान उस वक़्त भी करवाई थी जब मोदी सरकार सत्तासीन हुई थी। बुलन्दशहर में भी हिन्दुओं ने गाय काटी और उसके टुकड़ों को खेत में लगे गन्नों पर लटका दिया। ताकि उन्हें दूर से भी देखा जा सके। लेकिन मूर्खों से एक ग़लती हो गयी कि गाय को काटा कहीं और, लेकिन उसकी नुमाइश कहीं और की गयी।

इससे पहले क़रीब 500 दंगाई युवाओं के लिए लाठी-डंडे और पत्थर वग़ैरह जुटाया गया। प्रशासन को इसकी पूरी भनक थी। बेसिक शिक्षा अधिकारी ने ज़िले के स्कूलों को 11 बजे के आसपास फ़ोन किया कि जल्द से जल्द बच्चों की छुट्टी कर दी जाए तथा दूर से आने वाले अध्यापकों को भी निकल लेने के लिए कह दिया जाए। शायद, दिवंगत इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह को भी इसकी भनक लग चुकी थी। इसीलिए वो नहीं चाहते थे कि जमातियों के लौटने वाले मुख्य मार्ग पर कोई जाम लगे। जबकि दंगाईयों का इरादा गोकशी के नाम पर इज्तिमा से लौटने वाले मुसलमानों से ज़ोरदार भिड़न्त करने का था। दंगाईयों का नेतृत्व बजरंग दल, वीएचपी और एबीवीपी के छुटभैये नेताओं के हवाले था। एक स्थानीय चैनल को भी आग में घी डालने का ज़िम्मा मिला।

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लेकिन इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह के घटनास्थल पर पहुँच जाने से दंगाईयों की सारी प्लानिंग धरी की धरी रह गयी। सुबोध ने जमातियों के लौटने के रास्ते पर लगा जाम खुलवाने के लिए पुलिस बल का प्रयोग किया। इसीलिए दंगाईयों को मुसलमानों से भिड़ने के नाम पर इकट्ठा किये गये लाठी-डंडों, पत्थर, बल्लम वग़ैहर का इस्तेमाल सुबोध के पुलिस दस्ते के ख़िलाफ़ करना पड़ा। ये दंगा नहीं कर पाने का आक्रोश था, जो फूटा पुलिस दल और ख़ासकर इंस्पेक्टर सुबोध सिंह पर। पुलिस के निशाना बनने की वजह से दंगाईयों के मंसूबों पर पानी फिर गया। लक्ष्य था बुलन्दशहर से शुरू करके पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश को हिंसा की आग में झोंक देना, लेकिन इंस्पेक्टर सुबोध के बलिदान की वजह से ये सम्भव नहीं हो पाया।

दंगे के लिए इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह के इलाके को भी इसलिए चुना गया क्योंकि वही अख़लाक़ हत्याकांड के जाँच अधिकारी थे और उनके तौर-तरीक़े कट्टरपन्थी संघियों को रास नहीं आ रहे थे। ये वही सुबोध थे, जिन्होंने अख़लाक़ की हत्या के बाद संगीत सोम को प्रभावित इलाके में नहीं जाने दिया था। इसी वजह से सुबोध का तबादला करवाया गया था। यही वो सबसे अहम वजह है जिसके आधार पर शहीद सुबोध सिंह की पत्नी और बहन उनकी हत्या को सुनियोजित और पुलिस की साज़िश बताया है। सारे घटनाक्रम से साफ़ है कि सुबोध ने अपने फ़र्ज़ और इंसानियत की ख़ातिर अपनी जान की क़ुर्बानी देकर न जाने कितने लोगों की जानें बचा लीं! इसके बावजूद, लगता नहीं कि योगी-मोदी सरकार के रहते सुबोध को कभी इन्साफ़ मिल पाएगा!

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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