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मोदी सरकार को बिना विचारे नयी नीतियाँ लागू करने की बीमारी है!

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kapil-sibal

काग़ज़ों पर कोई नीति भले ही शानदार लगे, लेकिन उसे सफलतापूर्वक लागू करना ही सबसे अहम है। युगान्कारकारी नीतियों का ऐलान करने से पहले ज़मीनी हक़ीक़त का जायज़ा लेना बेहद ज़रूरी है। एनडीए की विफलता की सबसे बड़ी वजह ही ये है कि वो नयी नीतियों को लागू करने से पहले उसके प्रभावों का आंकलन नहीं पाती है। नोटबन्दी, इसका सबसे जीता-जागता उदाहरण है। मोदी सरकार को इसका अन्दाज़ा ही नहीं था कि नोटबन्दी, देश के लिए विनाशकारी साबित होगा। इसी वजह से जीएसटी को घटिया ढंग से लागू किया गया और उससे भी फ़ायदे की जगह नुक़सान ही हाथ लगा।

दिवालिया और कंगाली क़ानून यानी इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड यानी आईबीसी को मई 2016 में संसद ने पारित किया। मोदी सरकार ने इसे बहुत बड़े आर्थिक सुधार की तरह पेश किया और ख़ूब अपनी पीठ थपथपाई। इसका मक़सद बैंकों की बैलेंस शीट को साफ़-सुथरा करना, कॉरपोरेट को उनके पापों की सज़ा दिलाना, बैंकिंग प्रणाली में हेराफेरी करने वालों को दंडित करना और सबसे बढ़कर बैंकों के डूबे क़र्ज़ यानी एनपीए के लिए ज़िम्मेदार कम्पनियों पर कार्रवाई करना था।

12 फरवरी 2018 को रिज़र्व बैंक ने क़र्ज़ पुनर्निर्धारण यानी ‘लोन रिस्ट्रकचरिंग’ से जुड़ी आधा दर्जन योजनाओं को ख़त्म कर दिया। इसकी जगह नयी नीति सामने आयी जिसमें कॉरपोरेट्स को 180 दिनों के भीतर अपने बकाया क़र्ज़ों को चुकाने या फिर दिवालिया क़ानून यानी आईबीसी का सामना करने का बेहद सख़्त प्रावधान था। ज़मीनी हक़ीक़त का जायज़ा लिये गये बनी इस नीति का नतीज़ा ये निकला कि सुप्रीम कोर्ट ने रिज़र्व बैंक के 12 फरवरी वाले फ़रमान पर रोक लगा ही। लिहाज़ा, दिवालिया क़ानून को लागू करने की क़वायद बैंकों को रोक देनी पड़ी।

तब तक आईबीसी के मामलों के निपटारे के लिए दिवालियेपन से निपटने वाली तीन पेशेवर कम्पनियों के ज़रिये 1300 कर्मचारियों की भर्ती हो चुकी थी। नैशनल कम्पनी लॉ ट्राइबुनल (एनसीएलटी) की शाखाओं में कॉरपोरेट्स के ख़िलाफ़ 525 मामले भी दर्ज़ हो गये। 108 मामलों में कम्पनियाँ स्वेच्छा से दिवालियेपन की कार्रवाई के लिए आगे आ गयीं। इनमें स्टील, निर्माण और खदान से जुड़ी ऐसी कम्पनियाँ हैं, जिन पर बैंकों के 1,28,810 करोड़ रुपये बकाया है। इतनी बड़ी तादाद के बावजूद, 2014 से अभी महज कुछ ही मामलों में आईबीसी के तहत कार्रवाई आगे बढ़ी।

आईबीसी के तहत अगस्त और दिसम्बर 2017 के दौरान जिन 10 शुरुआती मामलों का निपटारा हुआ उसमें भी बैंकों को उनके कुल बकाये का सिर्फ़ 33.53 फ़ीसदी रक़म ही मिल पायी। 13 जून 2017 को रिज़र्व बैंक ने 12 बड़े बकायेदारों की पहचान दिवालियेपन की कार्रवाई के लिए की। एक साल बीतने के बावजूद, इन 12 कम्पनियों में से भूषण स्टील और इलेक्ट्रो स्टील के अलावा अन्य किसी का निपटारा नहीं हुआ।

12 बड़े क़र्ज़दारों का 3,12,947 करोड़ रुपये का दावा मंज़ूर हुआ था। लगता नहीं है कि आईबीसी की नीति के मुताबिक़, इतनी रक़म कभी वसूल हो पाएगी। ऐसे मामलों में 180 दिनों की निर्धारित अवधि के ख़त्म होने के बाद बाक़ी वक़्त मुक़दमेबाज़ी में खर्च हो रहा है। ऐसे मामलों से सिर्फ़ वकीलों और दिवालियापन की कार्रवाई से जुड़े पेशेवर लोगों को फ़ायदा हो रहा है।

बिजली क्षेत्र में 34 बीमार कम्पनियों पर 1.5 लाख करोड़ रुपये बकाया हैं। बैंकों की चिन्ता है कि दिवालियेपन की कार्रवाई के ख़त्म होते-होते इन कम्पनियों की सम्पत्ति का दाम और घट जाएगा। रिज़र्व बैंक ने बैंकों को सख़्त हिदायत दी है कि यदि उसके 12 फरवरी वाले फ़रमान को सख़्ती से लागू नहीं किया गया तो उन्हें गम्भीर नतीज़े भुगतने होंगे। यही वजह है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने केन्द्र सरकार को हिदायत दी है कि वो रिज़र्व बैंक से बात करके आईबीसी के प्रावधानों पर राहत देने का पता लगाये, वर्ना आशंका है कि दिवालियेपन की कार्रवाई में बैंकों का 85 फ़ीसदी बकाया डूब जाएगा।

आईबीसी से जुड़ी पूरी तस्वीर का स्याह पहलू ये है कि कॉरपोरेट सेक्टर में कुछ ही कम्पनियाँ ऐसी हैं जो दिवालियेपन की कार्रवाई के बाद ज़ब्त होने वाली कम्पनी को ख़रीदने के लिए उसकी क़ीमत के मुक़ाबले 15 से लेकर 35 फ़ीसदी रक़म ही जुटा सकती हैं। स्टील सेक्टर की दोनों बड़ी कम्पनियों की नीलामी के वक़्त सिर्फ़ दो घरेलू कम्पनियाँ ही बोली लगा पायी थीं। विदेशी कम्पनियों ने तो जैसी बोलियाँ लगायीं, उससे लगा कि वो बीमार कम्पनियों को कौड़ियों के मोल, बिल्कुल वैसे ही ख़रीदना चाहती हैं, जैसा वाजपेयी सरकार के ज़माने में विनिवेश के बहाने कुछ चहेती कम्पनियों को औने-पौने दाम में सरकारी कम्पनियों को बेचा गया था।

स्टील सेक्टर में बीमार कम्पनियों को ख़रीदने के लिए आगे आने वाली घरेलू कम्पनियों को तक़रीबन एकाधिकार नज़र आया है। बिजली क्षेत्र में भी दो मुख्य खिलाड़ी हैं। इसमें से एक को अयोग्य ठहराये जाने के बाद दूसरे के लिए कोई प्रतिस्पर्धी बचा ही नहीं। इस तरह से एक कॉरपोरेट को निहाल किया जा रहा है। स्टील और बिजली ऐसे क्षेत्र हैं, जहाँ बैंकों की भारी रक़म डूब रही है। आईबीसी की बदौलत स्टील सेक्टर में जहाँ 35 फ़ीसदी क़र्ज़ की वसूली हो पा रही है, वहीं बिजली क्षेत्र में तो ये कुल बकाया का महज 15 फ़ीसदी है। सारा माज़रा ही अपने आप में घोटाला है, क्योंकि बीमार कम्पनियों के ख़रीदार भी बैंकों से क़र्ज़ लेकर ही सम्पत्तियाँ ख़रीदेंगी!

आप चाहें तो सरकार की सूझबूझ पर तरस खा रहे हैं, क्योंकि शायद, उसने ऐसी परिस्थितियों का अन्दाज़ा ही नहीं लगाया हो। तभी तो एक ओर रिज़र्व बैंक का 12 फरवरी वाला सर्कुलर क़ायम रहता है और दूसरी ओर 19 जुलाई को बिजली मंत्रालय की ओर से स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया से कहा जाता है कि वो ‘समाधान’ योजना के तहत बीमार कम्पनियों के क़र्ज़ों का पुनर्निर्धारण कर दे। ये योजना ठंडे बस्ते में चली गयी। ऐसी ही एक अन्य योजना ग्रामीण विद्युतीकरण निगम पर बकाया 17,000 करोड़ रुपये के लिए भी प्रस्तावित हुई। लेकिन वो भी बेकार साबित हुई।

रिज़र्व बैंक भी समय-समय पर ऐसे दिशा-निर्देश जारी कर रहा है, जो बताते हैं कि नीतियों का ऐलान करते वक़्त उसके अंज़ाम के बारे में नहीं सोचा जाता। ऊर्जा से जुड़ी संसदीय समिति ने मार्च 2018 में जारी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि “यदि रिज़र्व बैंक ज़मीनी सच्चाई को नज़रअन्दाज़ करके दिशानिर्देश जारी करता रहेगा तो इसका मतलब ये है कि बैंक, वित्तीय संस्थाएँ और अन्य निवेशकों की रक़म की वसूली की उम्मीद घटाई में पड़ जाएगी।” संसदीय समिति की ऐसी प्रतिक्रिया से साफ़ है कि सरकार की न सिर्फ़ नीतियाँ ग़लत हैं, बल्कि उन्हें लागू करने का सलीका भी सही नहीं है।

संसदीय समिति की ये भी राय है कि “180 दिनों की मियाद में लक्ष्य को हासिल करना तक़रीबन असम्भव है।” उसने सचेत किया कि जिस दिन एनपीए के जुड़े सारे मामले राष्ट्रीय कम्पनी लॉ ट्राइबुनल में पहुँच जाएँगे, उस दिन वहाँ जाम लग जाएगा। समिति ने आगे कहा कि बिजली क्षेत्र अभी बदलाव के दौर में है। ऐसे में यदि रिज़र्व बैंक सिर्फ़ वित्तीय नज़रिये से देखेगा तो कई अन्य चुनौतियाँ भी खड़ी होंगी, जो वित्तीय परिधि से बाहर होगी। इसीलिए ये समझना ज़रूरी है कि बिजली क्षेत्र की बीमार कम्पनियाँ “राष्ट्रीय सम्पत्ति” हैं और “आख़िरकार इन्हें बचाना बहुत ज़रूरी है।”

नीति में ही घोटाला है। दो या तीन कॉरपोरेट कम्पनियों के बीच में महँगी सम्पत्तियों की बन्दरबाँट, सरकार से जुड़े पूँजीपति दोस्तों को निहाल करने का तरीका है। नीतियों को समुचित समीक्षा के बग़ैर लागू कर देना, उस आरोप के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा घटिया है जिसमें निर्णय लेने की ढिलाई के बावजूद 2004 से 2014 के दौरान अर्थव्यवस्था की विकास दर 8.2 फ़ीसदी दर्ज होती है।

ज़रा हटके

इस नारे का मतलब क्या कि ‘ग़ली-ग़ली में शोर है, चौकीदार चोर है!’

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Rahul Modi

2013 के उत्तरार्ध से लेकर नोटबन्दी वाली महा-मनहूस रात तक किसने सोचा था कि ख़ुद को फ़क़ीर बताने वाला चौकीदार नरेन्द्र मोदी का चेहरा इस क़दर बेनक़ाब हो जाएगा कि उन्हें ‘चोर’ कहा जाएगा! ख़ुद को ग़रीब चाय वाले की औलाद बताने वाले के बारे में किसने सोचा था कि वो भारत के किसी भी प्रधानमंत्री से ज़्यादा झूठा, बेईमान, फ़रेबी, मक्कार और जुमलेबाज़ साबित होगा! किसने सोचा था कि गुजरात मॉडल वाला फ़र्ज़ी विकास दिल्ली पहुँचते खूँखार जंगली भेड़िया में तब्दील हो जाएगा! किसने सोचा था कि भारत माता की कसमें खाकर राजनीति के शिखर पर पहुँचा उसका ही एक अंश जननी-जन्मभूमि को लहू-लुहान करके छोड़ेगा! किसने सोचा था कि ग़रीबों, किसानों और महिलाओं की गरिमा के लिए आहें भरने वाला धरतीपुत्र जब सवा सौ करोड़ भारतवासियों का मुखिया बनेगा तो उसके ख़िलाफ़ नारा लगेगा कि ‘ग़ली-ग़ली में शोर है, चौकीदार चोर है!’

किसने सोचा था कि कालेधन के ख़िलाफ़ जिहाद यानी धर्मयुद्ध का शंखनाद करने वाला युगपुरुष सत्ता पाते ही लाखों करोड़ रुपये वाले नोटबन्दी घोटाले की पटकथा लिखने लगेगा! किसने सोचा था कि भारत के ख़ज़ाने को लूटेरों के पंजे से बचाने की दुहाई देने वाला अपने चहेते दोस्तों से ही देश के सरकारी बैंकों को लुटवा देगा! किसने सोचा था कि ख़ुद को गंगा पुत्र बताने वाला फ़रेबी भारतीय सेना के लिए ख़रीदे जाने वाले राफ़ेल विमानों का इतना बड़ा दलाल निकलेगा, जिससे सुनकर रोंगटे खड़े हो जाएँ! किसने सोचा था कि बचपन में मगरमच्छ के बच्चों को पकड़कर उनसे खेलने वाला और ख़ुद को अनपढ़ बताने वाला इतना बड़ा जालसाज़ निकलेगा जिसके पास न सिर्फ़ बीए-एमए की फ़र्ज़ी डिग्रियाँ होंगी, बल्कि जिसकी जन्मतिथि में भी गड़बड़झाला होगा!

MODI

किसने सोचा था कि पेट्रोलियम के दाम को लेकर ख़ुद को नसीबवाला बताने वाला राजनेता इतना पतित साबित होगा कि उसकी नाक के नीचे पेट्रोल-डीज़ल रोज़ाना इतिहास रचने लगेंगे! किसने सोचा था कि रुपये के गिरते दाम पर घड़ियाली आँसू बहाने वाला एक दिन इतना बेदर्द हो जाएगा कि रुपये को अपनी किस्मत पर भी शर्म आ लगे! किसने सोचा था कि रुपये के दाम को अर्थव्यवस्था की नब्ज़ बताने वाली के सोच रुपये से भी ज़्यादा गिर जाएगी! किसने सोचा था कि ख़ुद को जनता का प्रधानसेवक और लोकतंत्र का पहरेदार बताने वाले की नाक के नीचे देश की न्यायपालिका को, उसकी संवैधानिक संस्थाओं को पतन का ऐसा रूप देखना पड़ेगा जहाँ वो मुंसिफ़ इन्साफ़ माँगते नज़र आएँगे, जो ख़ुद इन्सान करने की जगह पर बैठे हों! किसने सोचा था कि दुनिया के सबसे वाचाल जननायक की मुँह पर तब भी ताला ही जड़ा रहेगा, जबकि उसे लेकर ये नारा लगेगा कि ‘ग़ली-ग़ली में शोर है, चौकीदार चोर है!’

क्या ये सभी उदाहरण चीख़-चीख़कर नहीं बता रहे कि 2014 में सवा सौ करोड़ भारतवासियों के साथ बहुत भयंकर धोखा हुआ था? यदि आप इस धोखे की जड़ में जाना चाहते हैं तो आपको राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और लाल कृष्ण आडवाणी को कभी माफ़ नहीं करना चाहिए! क्योंकि नरेन्द्र मोदी का जन्म किसी भी परिस्थिति में हुआ हो, लेकिन उन्हें दीक्षित और संस्कारित करने का काम संघ ने किया था। लिहाज़ा, अपने ख़राब उत्पाद के लिए संघ की जबाबदेही तो बनती ही है। देश की बीते साढ़े चार साल में जो दुर्दशा हुई है उसके लिए दूसरे कसूरवार लाल कृष्ण आडवाणी हैं। आडवाणी ने ही इस आस्तीन के साँप को पाला-पोसा और उसे गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया। आडवाणी ने ही इस आपराधिक प्रवृत्ति वाले, कट्टरपन्थी हिन्दुत्व के समर्थक को गुजरात के दंगों के वक़्त अभयदान दिया। हालाँकि, इस शख़्स ने आडवाणी को उनके कर्मों की सज़ा देने में कोई कसर नहीं रखी। उन्हें और उनके कई क़रीबी तथा अनुभवी साथियों को इसी धूर्तज्ञ ने चलता-फिरता एनपीए या खंडहर बना दिया।

तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष ने 8 जून 2013 को न जाने किस मनहूस घड़ी में ये ऐलान किया था कि 2014 के आम चुनाव के लिए नरेन्द्र मोदी उनकी पार्टी की प्रचार समिति के मुखिया होंगे। ये ऐलान मोदी को सिर्फ़ मुख्य प्रचारकर्ता के रूप में पेश करने का था, प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में नहीं। वो बात अलग है कि जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आते गये, वैसे-वैसे मोदी को लेकर बनाये जा रहे माहौल ने रंग लाना शुरू कर दिया और देखते ही देखते संघियों ने मोदी को ही प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर पेश किया। मोदी ने 30 साल बाद पूर्ण बहुमत की सरकार तो बना दी, लेकिन इसके लिए इतना झूठ और दुष्प्रचार किया गया, जिसने भारत को भारी नुकसान पहुँचाया। नुकसान के वो बीज अब हमारे सामने किसी बड़े पेड़ की तरह खड़ा है!

Rafale Deal Facts

वही पेड़ आज देश की ऐसी नाक कटवा रहा है कि फ़्राँस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रास्वां ओलांद ने सारी दुनिया को बता दिया कि भारत का चौकीदार चोर है! उसने राफ़ेल सौदे की आड़ में देश को लूटा है, जनता को ग़ुमराह किया है, अपने उद्योगपति दोस्त को नाजायज़ फ़ायदा पहुँचाने के लिए प्रतिष्ठित सरकारी कम्पनी हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के हितों पर कुठाराघात किया है। इसीलिए आज यक्ष प्रश्न ये है कि अब ये कैसे तय होगा कि मोदी सरकार, फ़्राँस सरकार, डसॉल्ट एविएशन और रिलायन्स डिफ़ेंस, चारों मिलकर झूठ पर झूठ नहीं बोल रहे हैं? क्या विडम्बना नहीं है कि अभी सच बोलने का दावा कर रहे सारे लोग विपक्ष में हैं तो झूठ फैलाकर सच पर पर्दा डालने वाले सारे लाभार्थी सत्ता में है! दोनों का नतीज़ा या मतलब एक ही है!

सारी दुनिया में कहीं ऐसा नहीं होता कि कोई अपराधी कहे कि वो निर्दोष है और उसे पाक-साफ़ मान लिया जाए। ख़ुद मोदी सरकार ने भी जिनके-जिनके ख़िलाफ़ सच्ची या झूठी कार्रवाई की, क्या उन्हें जाँच और अदालती प्रक्रिया के बग़ैर अपराधी मान लिया गया? क्या कभी किसी अपराधी ने आरोप लगाये जाते ही ख़ुद को क़सूरवार बताते हुए क़ानून के हवाले किया है? अरे, क़ानून तो ये कहता है कि यदि कोई व्यक्ति ख़ुद भी अपराधी होने का ऐलान कर दे, तो भी उसे जाँच और सबूतों के बग़ैर अपराधी नहीं माना जा सकता, सज़ा नहीं दी जा सकती! मोदी सरकार ने तमाम काँग्रेसी नेताओं पर आरोप मढ़े, लेकिन क्या किसी को जाँच के बग़ैर सज़ा दे दी?

क़ानून की परिभाषा में किसी का आरोपी होना ये नहीं साबित करता कि वो दोषी है। मोदी भी फ़िलहाल वैसे ही आरोपी हैं, जैसे कि राहुल गाँधी! राहुल के मामले में कम से कम क़ानूनी कार्रवाई तो हुई, लेकिन मोदी तो ये माने बैठे हैं कि चूँकि वो प्रधानमंत्री हैं, इसीलिए सिर्फ़ वही और उनकी पार्टी ही सच बोल सकती है। क्या 2014 में जनता ने सिर्फ़ बीजेपी और मोदी को ही सत्यवादी हरिश्चन्द्र बनने का ठेका दिया था? यदि नहीं, तो दूध का दूध और पानी का पानी कैसे होगा? कौन करेगा? कब करेगा? क्या इन सवालों का उत्तर हमारी लोकतांत्रिक संस्थाएँ तलाश कर पाएँगी या फिर सीधे जनता जर्नादन को ही आगामी चुनावों में अपने जनादेश के रूप में फ़ैसला सुनाना पड़ेगा?

अरे, वक़्त का तगाज़ा तो ये होना चाहिए कि मोदी और उनके बचाव में एक से बढ़कर एक झूठ बोलने वाले मंत्री अपने पदों से इस्तीफ़ा देकर जाँच का सामना करते। यही वक़्त है कि भगवा ख़ानदान की नैतिकता के सबसे बड़े सचेतक तथा संघ प्रमुख मोहन भागवत को ऐलान करने चाहिए कि सार्वजनिक जीवन में शुचिता के उच्च आदर्शों की स्थापना के लिए मोदी को फ़ौरन पद त्यागकर जाँच करवानी चाहिए! सवाल है कि क्या अग्निपरीक्षा सिर्फ़ सीता की ही होगी? चोर चौकीदार, क्या रामनामी ओढ़कर, ख़ुद को रामज़ादा बताकर, नंगा नाच ही करते रहेंगे? क्या ये सभी विधि-विधान और लोकलाज़ से ऊपर हैं?

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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ओपिनियन

संशय भरे आधुनिक युग में हिंदू आदर्श धर्म : थरूर

वह धर्म जो सर्वज्ञानी सृजनकर्ता पर सवाल करता हो वह मेरे विचार से आधुनिक और उत्तर आधुनिक चैतन्य के लिए अनोखा धर्म है।

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न्यूयॉर्क, 21 सितंबर | कांग्रेस सांसद व लेखक शशि थरूर के अनुसार, हिंदू एक अनोखा धर्म है और यह संशय के मौजूदा दौर के लिए अनुकूल है। थरूर ने धर्म के राजनीतिकरण की बखिया भी उधेड़ी।

न्यूयॉर्क में जयपुर साहित्य महोत्सव के एक संस्करण में के बातचीत सत्र के दौरान गुरुवार को थरूर ने कहा, “हिंदूधर्म इस तथ्य पर निर्भर करता है कि कई सारी बातें ऐसी हैं जिनके बारे में हम नहीं जानते हैं।”

मौजूदा दौर में इसके अनुकूल होने को लेकर उन्होंने कहा, “पहली बात यह अनोखा तथ्य है कि अनिश्चितता व संशय के युग में आपके पास एक विलक्षण प्रकार का धर्म है जिसमें संशय का विशेष लाभ है।”

सृजन के संबंध में उन्होंने कहा, “ऋग्वेद वस्तुत: बताता है कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति कहां से हुई, किसने आकाश और धरती सबको बनाया, शायद स्वर्ग में वह जानता हो या नहीं भी जानता हो।”

उन्होंने कहा, “वह धर्म जो सर्वज्ञानी सृजनकर्ता पर सवाल करता हो वह मेरे विचार से आधुनिक और उत्तर आधुनिक चैतन्य के लिए अनोखा धर्म है।”

उन्होंने कहा, “उससे भी बढ़कर आपके पास असाधारण दर्शनग्रहण है और चूंकि कोई नहीं जानता कि भगवान किस तरह दिखते हैं इसलिए हिंदूधर्म में हर कोई भगवान की कल्पना करने को लेकर स्वतंत्र है।”

कांग्रस सांसद और ‘व्हाइ आई एम हिंदू’ के लेखक ने उन लोगों का मसला उठाया जो स्त्री-द्वेष और भेदभाव आधारित धर्म की निंदा करते हैं।

मनु की आचार संहिता के बारे में उन्होंने कहा, “इस बात के बहुत कम साक्ष्य हैं। क्या उसका पालन किया गया और इसके अनेक सूत्र विद्यमान हैं।”

उन्होंने उपहास करते हुए कहा, “इन सूत्रों में मुझे नहीं लगता कि हर हिंदू कामसूत्र की भी सलाह मानते हैं।”

थरूर ने कहा, “प्रत्येक स्त्री विरोधी या जातीयता कथन (हिंदू धर्मग्रंथ में) के लिए मैं आपको समान रूप से पवित्र ग्रंथ दे सकता हूं, जिसमें जातीयता के विरुद्ध उपदेश दिया गया है।”

–आईएएनएस

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मोहन भागवत झूठ पर झूठ परोसते रहे और भक्त झूम-झूमकर कीर्तिन करते रहे!

आख़िरी हथकंडे के रूप में संघ प्रमुख मोहन भागवत ये दिखाना चाहता है कि वो भविष्य के भारत की ख़ातिर ख़ुद को बदल चुका है। इसमें लेस-मात्र भी सच्चाई नहीं है।

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‘भविष्य का भारत’ के नाम पर दिल्ली में तीन दिन चली संघ प्रमुख मोहन भागवत की भाषण-माला ने जितने सवालों को सुलझाने की कोशिश की, उससे कई गुणा ज़्यादा सवाल तो और उलझ गये! इसकी सबसे आसान वजह ये रही कि भागवत की बातें झूठ का पुलिन्दा हैं। उनकी वो हरेक बात जो मीडिया में सुर्ख़ियाँ बनी, वो सरासर झूठी, मक्कारी भरी और दुर्भावनापूर्ण हैं। इसका सिर्फ़ एक ही मक़सद है कि जनता को संघ के बारे में और ग़ुमराह किया जाए, क्योंकि चुनाव सिर पर हैं और मोदी राज की पतन निश्चित है। इसीलिए मोहन भागवत झूठ पर झूठ परोसते रहे और संघी-भक्त झूम-झूमकर कीर्तिन करते रहे! यही वजह है कि देश के जितने बुद्धिजीवी संघ को पहचानते हैं, उनमें से किसी ने भी भागवत की बातों पर यक़ीन नहीं किया, बल्कि ऐसे हरेक शख़्स को भागवत की बातों में साज़िश नज़र आयी।

ये साज़िश नहीं तो और क्या है कि जिस मुस्लिम-विरोध से संघ का जन्म हुआ, जो मुस्लिम-घृणा संघियों के साहित्य में बिखरी पड़ी है, उसे ख़ारिज़ किये बग़ैर मोहन भागवत कहते हैं कि ‘मुसलमान के बिना हिन्दुत्व बेमानी है!’ एक जगह भागवत कहते हैं कि ‘भारत हिन्दू राष्ट्र था, है और रहेगा!’ दूसरी जगह बोलते हैं कि ‘हिन्दू राष्ट्र का मतलब यह नहीं है कि इसमें मुस्लिम नहीं रहेगा। जिस दिन ऐसा कहा जाएगा उस दिन वो हिन्दुत्व नहीं रहेगा। हिन्दुत्व तो वसुधैव कुटुम्बकम् की बात करता है।’ जबकि संघियों के भगवान समझे जाने वाले गोलवलकर अपनी किताब ‘बंच ऑफ़ थॉट’ में समझा चुके हैं कि “ये सोचना आत्मघाती होगा कि पाकिस्तान बनने के बाद वे रातोंरात देशभक्त हो गये हैं। इसके विपरीत पाकिस्तान बनने के बाद मुस्लिम ख़तरा सैकड़ों गुना बढ़ गया है।” इसी किताब में मुसलमानों और ईसाइयों को देश का दुश्मन बताया गया है।

संघियों के दूसरे देवताओं वीर सावरकर, केशव बलिराम हेडगेवार और दीन दयाल उपाध्याय ने जैसे हिन्दुत्व का ढाँचा संघ को दिया है उसमें सत्ता पाने के लिए हिंसा, नफ़रत और उन्माद को बेहद पवित्र हथियार की तरह पेश किया गया है। मनुवाद से बढ़कर संघ के लिए कोई विधान या संविधान कभी नहीं रहा। भागवत आज जाति-अव्यवस्था की दुहाई देते हैं, लेकिन संघ का स्नायु-तंत्र यानी ‘नर्वस सिस्टम’ इसी से चलता है। मुसलमानों के अलावा दलितों और महिलाओं को भी संघ ने हमेशा हेय दृष्टि से देखा है। ये किसी से छिपा नहीं है कि संघ बुनियादी तौर पर एक फ़ासिस्ट संगठन है। इसीलिए मोहन भागवत के शब्दों और उनकी मंशा पर शक होना लाज़िमी है।

अगर भागवत की ये बातें संघ के दोमुँहापन की पुष्टि नहीं करतीं या क्या वाकई संघ बदल गया है या बदलना चाहता है, तो भागवत को विज्ञान भवन के उसी मंच से बीजेपी के सिरफिरे नेताओं और विश्व हिन्दू परिषद तथा बजरंग दल जैसे हिन्दू तालिबानी संगठनों को दो-टूक कहना चाहिए था कि उन्हें संघ के नये नज़रिये को अपनाना होगा। क्योंकि अब संघ की संविधान और तिरंगे को लेकर राय बदल चुकी है। भागवत ने संघी हिन्दुत्व के शीर्ष प्रचारक और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ के भी उन बयानों की भर्त्सना नहीं की, जिसमें योगी कह चुके हैं कि ‘क़ब्र से निकालकर मुस्लिम महिलाओं से बलात्कार’ किया जाएगा। यही योगी चुनावी मंच से ‘एक के बदले सौ मुस्लिम बेटियों की इज़्ज़त लूटने’ की भी धमकी भी दे चुका है। इसी ने क़ब्रिस्तान और श्मशान के नाम पर हिन्दू-मुस्लिम को लड़ाने का खेल खेला था। इसे ही ईद मनाने पर गर्व नहीं होता।

दरअसल संघ, अष्टावक्र से भी ज़्यादा विचित्र किस्म का संगठन है। रंग बदलने के लिहाज़ से संघ के आगे गिरगिट में पानी भरेंगे। संघ ख़ुद को विचारधारा आधारित संगठन बताते नहीं अघाता है। लेकिन सच्चाई ये है कि संघ में इतना साहस कभी नहीं रहा कि वो अपनी करतूतों के लिए ख़ुद को जबाबदेह मानने के लिए तैयार हो जाए। उसे सत्ता की दरकार होती है तो वो 370, समान नागरिक संहिता और अयोध्या मसले को ताक पर रख देता है। सत्ता से हटने के बाद इन्हें फिर सिर पर लाद लेता है। संघ पूरी बेशर्मी से कहता है कि उसकी सरकारें नागपुर से नहीं चलतीं। जबकि सच्चाई बिल्कुल उल्टी है। झूठ फैलाते हैं संघी कि उन्होंने तिरंगे को सर्वोपरि माना। अगर तिरंगा संविधान की श्रेष्ठता को स्थापित करता है तो भगवा को ‘गुरु’ क्यों होना चाहिए? संविधान ही ‘गुरु’ क्यों नहीं है? लोकतंत्र में संविधान को किसी ‘गुरु’ से कमतर क्यों होना चाहिए? हिन्दुत्व को संविधान से ऊपर क्यों होना चाहिए?

अब मोहन भागवत ये क्यों स्वीकार करना चाहते हैं कि 2014 से पहले भी भारत था? अब भागवत को ये दिव्य ज्ञान कैसे प्राप्त हो गया कि ‘काँग्रेस ने देश को बहुत से महापुरुष दिये और आज़ादी की लड़ाई में काँग्रेस की भूमिका सराहनीय रही?’ भागवत ने ये क्यों नहीं बताया कि किन-किन काँग्रेसियों को अब संघ-ख़ानदान महापुरुष मानेगा? किनके ख़िलाफ़ अब झूठ नहीं फैलाया जाएगा? किनका चरित्रहरण अब व्हाट्सअप पर नहीं दिखायी देगा? गाँधी-नेहरू परिवार के चरित्रहनन में लगे लाखों संघी-उत्पातियों को अब कौन सा रोज़गार दिया जाएगा? क्या ये ट्रोल्स अब गायों को सड़कों पर भटकने से रोकने के काम में झोंके जाएँगे? काश! तीन दिन की जुगाली के दौरान मोहन भागवत ने ये ख़ुलासा भी किया होता कि ‘स्वतंत्रता आन्दोलन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका क्या थी?’

दरअसल, यदि संघ से झूठ-फ़रेब, मक्कारी, हिन्दुत्ववादी उन्माद, मुस्लिम-ईसाई नफ़रत और मनुवाद को निकाल दिया जाए तो फिर वहाँ स्वयंसेवकों की लाठी और उनकी ख़ाकी नेकर के सिवाय और कुछ नहीं बचेगा। मोहन भागवत को साफ़ दिख रहा है कि बीते साढ़े चार साल में संघ-बीजेपी की नीतियों और उपलब्धि की वजह से हिन्दुओं का वो बहुत बड़ा वर्ग बेहद नाराज़ है जिसकी संविधान में आस्था है, जो हरेक भारतीय के साथ मेल-मिलाप से रहने और शान्तिपूर्वक देश की जटिल चुनौतियों से निपटने का हिमायती है, जिसे मालूम है कि देश जादू या जुमलों से नहीं बल्कि सच्ची नीयत से आगे बढ़ता है। मोदी राज में हर मोर्चे पर मुँह की खाने के बाद संघ का हिन्दुत्ववादी कॉडर, जनता में सिर्फ़ ये बात फैला रहे हैं कि ‘और कुछ हो या ना हो, लेकिन मोदी-योगी ने मुसलमानों को उनकी औक़ात दिखा दी है!’

लेकिन ज़्यादातर हिन्दू सिर्फ़ इस बात के लिए मोदी को वोट देने के लिए तैयार नहीं हैं। उन्हें लिंचिंग के नाम पर मुसलमानों के प्रति क्रूरता दिखाने का सिलसिला पूरी तरह से नामंज़ूर है। उन्हें हिन्दू-मुस्लिम नफ़रत की भट्ठी में जलना स्वीकार नहीं है। उन्हें उना से लेकर वेमुला तक का दलित उत्पीड़न बर्दाश्त नहीं है। वो गाँधी के हत्यारों के समर्थकों को पराक्रमी नहीं मानते। वो पिछली सरकारों के योगदान को समझते हैं। उन्हें मालूम है कि शेर कभी झुंड में नहीं रहता और ना ही उसे जंगली कुत्तों से कोई ख़तरा महसूस होता है। हिन्दुओं को अब समझ में आने लगा है कि किस मायावी शेर की ख़ातिर उन्हें कुत्तों के झुंड की तरह रहने की नसीहत दी जा रही है?

संघ की सबसे बड़ी शक्ति हैं सवर्ण हिन्दुओं की अज्ञानता। इसी से संघ, असहिष्णुता पैदा करता है। झूठ और अफ़वाह, उसके दुष्प्रचार का सबसे बड़ा हथियार है। संघ के लाखों प्रशिक्षित कार्यकर्ता इसी हथियार से उसे मज़बूती प्रदान करते हैं। लेकिन सवर्णों को अब समझ में आ रहा है कि सियासी रोटियाँ सेंकने के लिए जो संघ कल तक आरक्षण की समीक्षा की दुहाई देता था, जाति और सामाजिक पिछड़ेपन को आरक्षण का आधार बनाये रखने का विरोधी था, ग़रीब सवर्णों को भी आरक्षण देने का झूठ फैलाता था, वही संघ अब कह रहा है कि ‘संविधान में आरक्षण की जो व्यवस्था है उसे संघ का पूरा समर्थन है। कब तक चलेगा ये उन्हें ही तय करना है, जो आरक्षण के लाभार्थी हैं? क्रीमी लेयर का क्या करना है? ये समाज ही तय करेगा। आरक्षण समस्या नहीं है। आरक्षण पर राजनीति समस्या है। हाथ से हाथ मिलाकर जो गड्ढे में गिरा है उसे ऊपर लाना चाहिए। एक हज़ार साल की बेमानी दूर करने के लिए 100-150 साल झुककर रहना पड़े तो महँगा सौदा नहीं है।’

अब यदि भागवत का ये नज़रिया सही है तो फिर पिछले दिनों संघ-समर्थित सवर्णों का भारत बन्द क्यों हुआ था? वो बन्द भी बाक़ायदा था। एससी-एसटी एक्ट तो मुखौटा था। असली आग तो आरक्षण-विरोध की थी। दरअसल, भागवत की सारी बातें चुनावी पैंतरा है। संघ के ख़ास डीएनए से बना है, जिसे बदला गया तो संघ की ख़त्म हो जाएगा। इसीलिए भागवत की मंशा संघ के पुराने कुकर्मो पर सफ़ेदी पोतने की है। उसकी चालें धूर्ततापूर्ण हैं। उस पर लगे दाग़ इतने गहरे हैं कि सदियों तक नहीं मिटेंगे। महात्मा गाँधी की हत्या पर मिठाई बाँटने बाला ये संगठन मानवता का दुश्मन और संविधान का विरोधी है। इसके लोग तर्कवादियों की हत्या का जश्न मनाते हैं और हत्यारों को माला पहनाते हैं।

हरेक अलोकतांत्रिक और संविधान विरोधी गतिविधि में संघ की प्रत्यक्ष या परोक्ष हिस्सेदारी होती है। ऐसे हरेक सवाल का संघ हमेशा गोलमोल जबाब देता रहा है, जो उसे बेनक़ाब करते हैं। संघ उसी रास्ते पर चलने के लिए अभिशप्त है जो उसके पुरखों ने दिखाया है। इसीलिए सावधान रहिए, सतर्क रहिए, भागवत की बातों में मत आइए और 2019 में संघियों को बुरी तरह से परास्त कीजिए। चोला बदलने से मानसिकता या विचारधारा नहीं बदला करती। वर्ना, भागवत डंके की चोट पर इतना सनसनीखेज़ झूठ हर्ग़िज़ नहीं बोलते कि ‘स्वयंसेवक को किसी पार्टी को वोट या सपोर्ट करने के लिए नहीं कहा जाता’ और ‘संघ का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है!’

तमाम मुद्दों पर संघ प्रमुख के नये और पुराने बयानों का मिलान करके देख लीजिए। आपको संविधान की जयजयकार भी मिलेगी और हिन्दू राष्ट्र भी मिलेगा। विश्व शान्ति का जाप भी मिलेगा और बाहुबल से दोबारा अखंड भारत बनाने का संकल्प भी। आधुनिक समाज की वकालत भी मिलेगी और ये दलील भी कि यदि पत्नी अपने पति की इच्छाएँ पूरी नहीं करे तो उसे छोड़ देना चाहिए। अब ये आप पर है कि आपको क्या अच्छा लगता है। जो अच्छा लगे उसे चुन लीजिए और जैसे संघ आपको भरमाना चाहता है, वैसे भरमाते रहिए। क्योंकि संघ कभी किसी बात की ज़िम्मेदारी नहीं लेता। संविधान की धज़्ज़ियाँ उड़ाकर बाबरी मस्जिद को गिरवाने वाले वाजपेयी- आडवाणी समेत संघियों ने उन्मादी भीड़ पर ठीकरा फोड़ दिया और ख़ुद दुःख व्यक्त करने लगे।

संघियों में नैतिकता का नामोनिशाँ भी नहीं होता। लिहाज़ा, इस पर चर्चा बेमानी है। संघ हमेशा मुखौटों में जीता है। इसके नेता संवाद नहीं करते, बल्कि प्रवचन देते हैं। प्रधानमंत्री भी सिर्फ़ भाषण देते हैं, किसी सवाल का जबाब देना उनके आत्म-सम्मान के ख़िलाफ़ है। संघियों की पुख़्ता मान्यता है कि समाज पर बुद्धिजीवियों का कोई असर नहीं होता। समाज, उनके पीछे चलता है जो आम आदमी से ज़रा सा ऊपर होते हैं। यही आदमी संघ की असली ताकत है। ऐसे लोग घर-घर में हैं। वही संघियों के असली ‘ओपिनयन मेकर’ हैं। वर्ना, ज़रा सोचिए कि यदि तीन दिनों में मोहन भागवत ने जितनी बातें की हैं, यदि उसे नरेन्द्र मोदी और अमित शाह तथा सैकड़ों छुटभैय्ये नेता सही मान लेंगे तो क्या बीजेपी में लौट पाएगी?

भागवत को अच्छी तरह से पता है कि मोदी राज में अर्थव्यवस्था का कचूमर निकल चुका है। मोदी सरकार की हरेक महत्वपूर्ण नीति और योजना विफल साबित हुई है। जनता बेहद तकलीफ़ में है। राम राज्य के सारे भ्रम टूट चुके हैं। दलित और आदिवासी बीजेपी से बहुत दूर जा चुके हैं। मुसलमान तो हमेशा से ही संघियों से दूर रहे हैं। शहरी, शिक्षित, मध्य वर्ग पर बेरोज़गारी और महँगाई की ज़बरदस्त मार है। विपक्ष एकजुट हो रहा है। हिन्दुओं को अब विकास के झुनझुने की हक़ीक़त समझ में आ चुकी है। इसीलिए आख़िरी हथकंडे के रूप में संघ प्रमुख ये दिखाना चाहता है कि वो भविष्य के भारत की ख़ातिर ख़ुद को बदल चुका है। इसमें लेस-मात्र भी सच्चाई नहीं है।

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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