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‘रेप रोको आंदोलन’ मील का पत्थर साबित होगा : स्वाति मालीवाल

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Swati Maliwal

सत्याग्रह के तहत ‘रेप रोको आंदोलन’ के जरिए जनांदोलन खड़ा कर रहीं दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल मानती हैं कि बच्चियों और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर समाज असंवेदनशील हो गया है। छेड़छाड़ और दुष्कर्म जैसे संगीन अपराधों पर चुप्पी साधने की संस्कृति अब खत्म करनी होगी। उम्मीद है कि यह आंदोलन महिला सुरक्षा के नाम पर मील का पत्थर साबित होगा।

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आम आदमी पार्टी से ताल्लुक रखने वाली स्वाति दो टूक कहती हैं, “हम बदलाव चाहते हैं। हर बार की तरह महिला हिंसा पर मौन धारण करने की आदत और सिस्टम में बदलाव हमारा मिशन है।”

उन्होंने आईएएनएस के साथ बातचीत में कहा, “अब बहुत हो गया, जुर्म करने वालों में कानून का कोई भय नहीं है। हमारी सीधी-सपाट मांग है कि नाबालिगों के साथ दुष्कर्म करने वालों को छह महीने के भीतर मौत की सजा मिले। छेड़छाड़ सहित अन्य मामलों में तेजी से सुनवाई हो, ताकि पीड़िता को समय पर न्याय मिल सके।

स्वाति ने कहा, “हम इस आंदोलन के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लोगों के हस्ताक्षर युक्त एक लाख पत्र सौंपने जा रहे हैं, जिनमें महिला उत्पीड़न से निपटने के उपायों पर जोर होगा। आठ मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर शांतिपूर्ण मार्च के साथ बड़ा ऐलान भी हो सकता है।”

लोगों में पनप रही अपराध की प्रवृत्ति पर चिंता प्रकट करते हुए उन्होंने कहा, “हाल ही में आपने एक वीडियो देखा होगा, जिसमें एक शख्स डीटीसी की बस में डीयू की एक छात्रा के सामने खुलेआम हस्तमैथुन कर रहा है। उसे इस बात का भी डर नहीं है कि बस में 30 से 40 लोग बैठे हैं, छात्रा वीडियो बना रही है। वह बेधड़क बेशर्मी दिखा रहा है। हमारा समाज किस ओर जा रहा है? जब तक सरकार और समाज महिलाओं और बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराध के खिलाफ खड़े नहीं होंगे, कुछ नहीं बदलेगा।”

डीसीडब्ल्यू प्रमुख ने कहा, “जब छात्रा ने बस में सवार उस शख्स की अश्लील हरकत की अन्य यात्रियों से शिकायत की, तब एक भी शख्स कुछ नहीं बोला, न मदद को आगे आया। हम वही लोग हैं, जो घर में बैठकर महिला सुरक्षा की लंबी-लंबी बातें किया करते हैं।”

महिला सुरक्षा के नाम पर स्वाति एक महीने के सत्याग्रह पर हैं। 31 जनवरी को शुरू इस सत्याग्रह के तहत स्वाति कार्यालय में ही रहकर सभी कामकाज कर रही हैं। उन्होंने कहा, “आज सत्याग्रह का 16वां दिन है। मैं 16 दिन से अपने घर नहीं गई हूं। मैं और मेरी टीम कार्यालय में ही रहकर दिन-रात काम कर रहे हैं। हमारी मांग यह भी है कि महिला अपराधों से संबंधित आईपीसी और पोस्को अधिनियम में आवश्यक संशोधन किया जाए। यौन उत्पीड़न के लिए अतिरिक्त फास्ट्रैक अदालतों की स्थापना की जाए। दिल्ली पुलिस में तत्काल 14,000 पदों पर नियुक्तियां की जाएं।”

इन आंदोलनों की जरूरतों पर स्पष्टीकरण देते हुए स्वाति ने कहा, “आप देख रही हैं, हालात क्या हैं.. लोग मूक दर्शक बने रहते हैं। किसी में कोई डर नहीं है। हमारी मांग है कि कम से कम छोटी बच्चियों को तो तुरंत न्याय दीजिए। हम ढाई साल से जूझ रहे हैं, इन अपराधों को बर्दाश्त कर रहे हैं। लोगों में यह डर बैठाना जरूरी है कि आप किसी महिला या बच्ची की अस्मिता से खिलवाड़ कर बच नहीं सकते।”

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बुंदेलखंड की महिलाएं पानी से भरेंगी धरती का पेट

बुंदेलखंड वह इलाका है, जहां कभी 9000 से ज्यादा तालाब और इससे कहीं ज्यादा कुएं हुआ करते थे। लगभग हर घर में एक कुआं होता था। आज ऐसा नहीं है। दूसरी तरफ, पानी संग्रहण और संचय की प्रवृत्ति भी कम हो गई है। इसके साथ ही पानी का दोहन बढ़ गया है।

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छतरपुर/ललितपुर, 20 जून | मानसून दस्तक देने की तैयारी में है, मगर बुंदेलखंड का इलाका बूंद-बूंद पानी के संकट के दौर से गुजर रहा है। कई-कई किलोमीटर का रास्ता तय करने के बाद पीने का पानी नसीब हो पा रहा है। पानी का इंतजाम करने के लिए सबसे ज्यादा संघर्ष करने वाली महिलाओं ने संकल्प लिया है कि वे पानी से धरती का पेट भरने में पीछे नहीं रहेंगी, ताकि आने वाले वर्षो में उन्हें इस तरह की समस्या से न जूझना पड़े।

बुंदेलखंड वह इलाका है, जहां कभी 9000 से ज्यादा तालाब और इससे कहीं ज्यादा कुएं हुआ करते थे। लगभग हर घर में एक कुआं होता था। आज ऐसा नहीं है। दूसरी तरफ, पानी संग्रहण और संचय की प्रवृत्ति भी कम हो गई है। इसके साथ ही पानी का दोहन बढ़ गया है।

छतरपुर जिले के बड़ा मलेहरा के झिरिया झोर की पानी पंचायत की सचिव सीमा विश्वकर्मा बताती हैं, “इस इलाके में पानी का संकट बना हुआ है। झिरिया झोर की महिलाओं ने बीते वर्षो में कई स्थानों पर पानी रोकने का काम किया था, उसी का नतीजा है कि एक तालाब में अब भी पानी बचा हुआ है। गांव के हैंडपंप ने पानी देना बंद कर दिया है, यहां की कई महिलाएं हैंडपंप भी सुधार लेती हैं, अगर पाइप मिल जाएं तो हैंडपंप को और गहरा करके पानी हासिल करने का प्रयास कर सकती हैं।”

ललितपुर के तालबेहट के निवासी बुजुर्ग रामसेवक पाठक हरिकिंकर (70) बताते हैं, “पहले बुंदेलखंड के लगभग हर घर में कुआं हुआ करता था, आज लोगों ने कुएं खत्म कर दिए हैं, बोरिंग पर जोर है, लिहाजा पानी का स्तर नीचे चला गया है। इतना ही नहीं, तालाबों व अन्य जलस्रोतों तक बारिश का पानी पहुंचने के रास्ते भी बंद हो गए हैं, अगर अब भी नहीं जागे तो आने वाले वर्षो में हालात और भी बिगड़ेंगे।”

बुंदेलखंड में महिलाओं में जल संरक्षण के प्रति जागृति लाने के लिए ग्रामीण स्तर पर काम करने वाली जल सहेली गनेशी बाई बताती हैं कि क्षेत्र की महिलाओं ने संकल्प लिया है कि इस बार बारिश के पानी को बहकर नहीं जाने देंगी। उसे धरती के पेट तक पहुंचाने के लिए जगह-जगह पानी को रोकेंगी। ऐसा करने से भूजल स्तर बढ़ेगा और पानी के संकट से काफी हद तक मुक्ति मिलेगी।

तालबेहट नगर पंचायत की अध्यक्ष मुक्ता सोनी का कहना है कि पानी से सीधा जुड़ाव महिलाओं का होता है, यह वह इलाका है, जहां पानी की व्यवस्था भी महिलाओं के जिम्मे होती है। पानी संरक्षण के लिए तो महिलाएं काम करेंगी ही। साथ ही वे एक महिला जनप्रतिनिधि हैं, इसलिए उन्होंने निर्णय लिया है कि जो नए मकान नगर में बनेंगे और रेन वाटर हार्वेटिंग सिस्टम की व्यवस्था करेगा, उसे 100 फीसदी गृहकर में छूट दी जाएगी।

बुंदेलखंड के कई गांव में सामाजिक संगठनों ने पानी पंचायतें बनाई हैं, इन पानी पंचायतों में से दो को ‘जल सहेली’ चुना जाता है। यह पानी पंचायत और जल सहेलियां मिलकर पानी संरक्षण के प्रति जनजागृति लाने का प्रयास करती हैं। जल सेहली रानी उपाध्याय कहती हैं कि ‘जल है तो जीवन है’- यही संदेश वे महिलाओं को दे रही हैं।

उन्होंने कहा, “हम सबने ठाना है कि इस बार मानसून की बारिश के पानी को जगह-जगह रोकेंगे और बेकार बह जाने वाले पानी को तालाबों तक पहुंचाएंगे, ताकि जलस्तर नीचे न जाए और गर्मियों में पानी का संकट न गहराए।”

मध्य प्रदेश के छह जिले- छतरपुर, टीकमगढ़, पन्ना, दमोह, सागर, दतिया और उत्तर प्रदेश के सात जिलों- झांसी, ललितपुर, जालौन, हमीरपुर, बांदा, महोबा, कर्वी (चित्रकूट) को मिलाकर बुंदेलखंड बनता है। सूखे के कारण इस क्षेत्र में खेती हो नहीं पा रही है और गांव में काम नहीं है, लिहाजा यहां से बड़ी संख्या में लोग काम की तलाश में दिल्ली, गुरुग्राम, गाजियाबाद, पंजाब, हरियाणा और जम्मू कश्मीर के लिए पलायन कर रहा है। तालाब मैदान में बदल गए हैं। कुओं की तलहटी सूखी नजर आने लगी है। कई हिस्सों में तो लोग पानी के लिए पूरा-पूरा दिन लगा देते हैं।

बुंदेलखंड की महिलाओं ने पानी बचाने, संग्रहीत करने और धरती का पेट भरने का संकल्प लिया है और अगर इसमें वे सफल होती हैं तो आने वाले दिनों में इस इलाके की सूरत बदलेगी जरूर, ऐसी उम्मीद तो की ही जा सकती है।

–आईएएनएस

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महबूबा को तलाक़ देने से भी संघियों के दिन नहीं फ़िरने वाले

एनडीए के बिखरने का मौसम दस्तक दे चुका है। चन्द्रबाबू नायडू (टीडीपी) ने बीजेपी का साथ छोड़ा। चन्द्रशेखर राव (टीआरएस) ने छोड़ा। शिव सेना (उद्धव ठाकरे) ने एकला चलो का राग छेड़ रखा है। महबूबा मुफ़्ती (पीडीपी) को तलाक़ मिल चुका है।

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bjp pdp alliance in kashmir

बीजेपी ने जिस तीन तलाक़ (तलाक़-ए-बिद्दत या फ़ौरी तलाक़) को लेकर मुसलिम महिलाओं का दिल जीतने की रणनीति बनायी, उसी का बेज़ा इस्तेमाल करते हुए अचानक मुसलिम महिला, महबूबा को तलाक़ दे दिया। तीन साल का बेमेल रिश्ता बिल्कुल उसी तरह से तोड़ दिया गया जिसे भगवा ख़ानदान ‘ज़ुल्म और ज़्यादती’ की दुहाई दिया करता था! बहरहाल, महबूबा सरकार को गिराकर बीजेपी ने अपनी गिरती साख और घटती लोकप्रियता पर रोक लगाने का आख़िरी दाँव भी चल दिया। हालाँकि, संघ-बीजेपी के इस पैंतरे के बावजूद मोदी सरकार का हाल ‘बकरे की माँ कब तक ख़ैर मनाएगी’ जैसा ही बना रहेगा!

इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि भगवा ख़ानदान ने अब खुले तौर पर ये क़बूल कर लिया है कि मोदी सरकार की कश्मीर नीति चारों खाने चित हो गयी है! लगे हाथ, संघ-बीजेपी ने ये भी मान लिया है कि सीमापार से आ रहे आतंकवाद से सख़्ती से निपटने का उसका नज़रिया खोखला साबित हो चुका है! नियंत्रण रेखा पर युद्ध-विराम के उल्लंघन और आतंकवादियों की पाकिस्तान से होने वाली घुसपैठ में जैसी तेज़ी मोदी-राज में दिखायी दी, वैसी पहले कभी नहीं रही। महबूबा सरकार गिराकर संघ-बीजेपी ने साबित किया कि सर्ज़िकल हमले का गुणगान करने की उसकी नीति निहायत भोथरी थी।

चार साल में 373 जवानों का शहीद होना और 239 नागरिकों का मारा जाना भी चीख़-चीख़कर मोदी-राज की नाकामी की दास्ताँ ही सुना रहा है। जम्मू-कश्मीर में सेना के बड़े ठिकानों ख़ासकर पठानकोट, उरी और नगरोटा जैसी वारदातों ने दिखा दिया कि रक्षा और गृह मंत्रालय तथा ख़ुफ़िया विभाग की क़मान अपने हाथों में रखने वाले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की रणनीतियों से राज्य के हालात दिन-ब-दिन बद से बदतर ही होते रहे। कश्मीर का अमन-चैन ही नहीं, वहाँ के लोगों के रोटी-रोज़गार की तबाही और युवाओं का बड़े पैमाने पर पत्थरबाज़ बनने के सिलसिले से जितनी मिट्टीपलीद मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती की हुई, उससे कहीं ज़्यादा संघ-बीजेपी की पोल खुलती रही!

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का लाहौर जाना और ‘एक के बदले दस सिर लाने’ जैसे वीर रस से ओत-प्रोत भाषणों की कलई भी अब खुल चुकी है। महबूबा के साथ गलबहियाँ करने से पहले संघ-बीजेपी जिस तरह से जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने की बातें किया करता था, जैसे कश्मीरी पंडितों को बीजेपी के सत्तासीन होते ही घर-वापसी के सब्ज़बाग़ दिखाये गये थे, सैनिक ताक़त की बदौलत जैसे पाक अधिकृत कश्मीर को छीनने की बातें की जाती थीं, उसे कौन भूल सकता है। लेकिन ऐसी सभी बातों की हक़ीक़त अब सबके सामने है। जम्मू-कश्मीर में केन्द्र सरकार की ओर से दिनेश्वर शर्मा को वार्ताकर नियुक्त करके जैसी लीपापोती की गयी, उसकी गम्भीरता भी अब देश के सामने है।

मोदी-राज के दौरान जम्मू-कश्मीर के सन्दर्भ में पर्दे के सामने या उसके पीछे, जो कुछ भी हुआ, उसने राज्य और देश को भारी नुकसान पहुँचा है। 2015 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी में सत्ता की मलाई खाने की जो ललक पैदा हुई, उससे भी उसकी मुसलिम विरोधी छवि में कोई गिरावट नहीं आयी। बीजेपी के प्रति कश्मीर घाटी में हमेशा से नफ़रत का माहौल रहा है। क्योंकि कश्मीरीयत और साम्प्रदायिकता कभी साथ-साथ नहीं चल सकते। उधर, चौतरफ़ा नाक़ामी के बावजूद महबूबा के हिस्से में इतनी क़ामयाबी तो आयी ही कि वो अपने समर्थकों को बता सकें कि उन्होंने संघ-बीजेपी को 370 से दूर रहने के लिए मजबूर बनाये रखा।

तीन साल की सत्ता के बाद बीजेपी ने पहली बार ये क़बूल किया कि कश्मीर में हालात बहुत ख़राब हो चुके हैं। झूठ फैलाने की अपनी आदत के मुताबिक़, संघियों की ओर से अपनी नाक़ामी का ठीकरा महबूबा के सिर फोड़ने की रणनीति में कुछ भी अटपटा नहीं है। अब तो नये झूठ गढ़े जाएँगे कि ‘मोदी की नोटबन्दी की बदौलत आतंकवाद की क़मर टूट चुकी थी, लेकिन ऐसा होता देख महबूबा ने ही आतंकवादियों के पास रुपये भेजने शुरू कर दिये थे!’ संघी ये झूठ भी फैलाएँगे कि ‘महबूबा नहीं चाहती थीं कि सेना खुलकर आतंकवादियों की सफ़ाया करे, इसीलिए उनकी सरकारी गिरा दी गयी।’ 370 को लेकर भी नये झूठ सामने आएँगे।

कश्मीर और कश्मीरियत को समझने वाले हर शख़्स जानता है कि पीडीपी और बीजेपी का गठबन्धन शुरू से ही नापाक था। ये रिश्ता पहले दिन से ही ‘कुत्ते-बिल्ली की शादी’ की तरह बेमेल था। मुफ़्ती मोहम्मद सईद और संघ-बीजेपी ने 2015 में जिस लाचारी की वजह से इसे बनाया था, वो मुफ़्ती साहब के निधन के बाद से ही ज़िन्दा लाश बन चुकी थी। सियासी मजबूरियों की वजह से महबूबा इसे ढो रही थीं। उधर, येन-केन-प्रकारेण सत्ता हासिल करने की भूखी बीजेपी के लिए इससे सुनहरा मौक़ा शायद ही कभी आ पाता! क्योंकि संघ की ख़्वाहिश महज सत्ता नहीं, बल्कि इसके ज़रिये हिन्दू-राष्ट्र तक पहुँचना है।

महबूबा की सरकार को चलाते रहने से संघ-बीजेपी का हाल ‘माया मिली ना राम’ वाला हो चुका था। भगवा ख़ानदान को अब 2019 की चिन्ता सता रही है। उसे साफ़ दिख रहा है कि मोदी राज के ‘अच्छे दिन’, ‘विकास’, ‘तेज़ी से कड़े फ़ैसले लेने वाले’ जैसी हरेक बात या वादा सिर्फ़ जुमला ही साबित हुआ है। इसीलिए यदि चुनाव तक हिन्दुओं को डराकर उनका वोट बटोरने की नीति परवान नहीं चढ़ी तो मोदी सरकार को गिरने से कोई नहीं बचा सकता। भगवा ख़ानदान के पास अब अपनी इसी भूल को दोहराने के सिवाय कोई विकल्प नहीं बचा है। 2014 में भगवा-झूठ का खाद-पानी पाकर जो मोदी लहर लहलहाने लगी थी, वही अब साथ छोड़ती परछाई में बदलती जा रही है। मोदी नाम की ब्रॉन्डिंग और सरकार की झूठी उपलब्धियों का बख़ान अब जनता को और नहीं बरगला पा रहा।

बीजेपी को कश्मीर जीतने के लिए अभी कई चुनाव लड़ने होंगे। इसीलिए कश्मीर के चक्कर में वो देश की सत्ता के हाथ से निकल जाने के आसार को देखकर ख़ौफ़ज़दा है। अब राष्ट्रपति शासन लगाकर बीजेपी भले ही परोक्ष रूप से राज्य की सत्ता को पूरी तरह से अपनी मुट्ठी में कर ले, लेकिन कश्मीरियों का भरोसा वो कभी नहीं जीत पाएगी। अवाम के जज़्बातों से खिलवाड़ करने वाले बड़े-बड़े शूरमाओं की सरकारों के हाथ जल जाते हैं। तो नरेन्द्र मोदी किस खेत की मूली हैं! अभी तो महबूबा सरकार गिराकर संघ-बीजेपी ने भी अपने हाथ वैसे ही जलाये हैं, जैसे इस सरकार को बनाते वक़्त महबूबा ने अपने हाथ जलाये थे।

बहरहाल, एनडीए के बिखरने का मौसम दस्तक दे चुका है। चन्द्रबाबू नायडू (टीडीपी) ने बीजेपी का साथ छोड़ा। चन्द्रशेखर राव (टीआरएस) ने छोड़ा। शिव सेना (उद्धव ठाकरे) ने एकला चलो का राग छेड़ रखा है। महबूबा मुफ़्ती (पीडीपी) को तलाक़ मिल चुका है। सुदेश महतो (ऑल झारखंड स्टूडेंट यूनियन यानी आजसू) विदाई की ओर बढ़ रहे हैं। नीतीश कुमार (जेडीयू) तो जन्मजात पलटू राम हैं ही। उपेन्द्र कुशवाहा (आरएलएसपी) वाज़िब मुद्दे उठाकर मोल-तोल कर रहे हैं। रामविलास पासवान (एलजेपी) दलितों को लेकर मुखर दिखने की कोशिश कर रहे हैं। बीजेपी के कई वरिष्ठ नेता आये दिन अपनी पार्टी और मोदी-शाह के ख़िलाफ़ बयान दे रहते हैं।

सारा माहौल भक्तों को साफ़ सन्देश दे रहा है कि ‘इब्तिदा-ए-इश्क़ है रोता है क्या, आगे-आगे देखिये होता है क्या!’

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मप्र में नौकरशाहों को ईमानदारी की मिलती है सजा!

रस्तोगी ने विभाग की जब जिम्मेदारी संभाली तो ई-टेंडरिंग में संभावित गड़बड़ियों पर पड़ताल की। उन्हें जब इस बात पर पूरी तरह भरोसा हो गया कि गड़बड़ियां चल रही हैं तो कई अफसरों सहित मुख्यमंत्री कार्यालय तक को अवगत कराया। कई टेंडर निरस्त करने की बात कही, मगर उनकी बात सुनी जाती उससे पहले ही सरकार सकते में आ गई और रस्तोगी पर ही तलवार चला दी गई।

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Shivraj Singh Chauhan

भोपाल, 17 जून | कोई भी नौकरशाह जब शासकीय सेवा में प्रवेश करता है तो उसे संविधान के मुताबिक हर वर्ग, जाति-धर्म के लोगों के लिए समान रूप से काम करने और अपने कर्तव्यों के प्रति ईमानदार रहने की सौगंध दिलाई जाती है, लेकिन मध्य प्रदेश ऐसा राज्य बन गया है जहां अपनी सौगंध को पूरा करने की कोशिश करने वाले अफसरों को इनाम नहीं बल्कि सजा जरूर मिल रही है।

नया उदाहरण भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी मनीष रस्तोगी हैं जिन्होंने ई-टेंडरिंग के घपले को उजागर क्या किया उन्हें जबरन छुट्टी पर भेजे जाने के साथ संबंधित विभाग से ही हटा दिया गया।

राज्य सरकार ने ईमानदारी का दावा करते हुए तमाम निर्माण विभाग के कार्यो के लिए ई-टेंडर सेवा की शुरुआत की थी। इस दावे की पोल भी खुल गई। पोल खोलने वाले विज्ञान व प्रौद्योगिकी विभाग के प्रमुख सचिव मनीष रस्तोगी हैं जिन्होंने ई-टेंडरिंग में गड़बड़ी को उजागर किया तो पहले उन्हें जबरन छुट्टी पर भेज दिया गया।

इतना ही नहीं, उनके छुट्टी पर जाते ही विज्ञान व प्रौद्योगिकी विभाग की जिम्मेदारी दूसरे अफसर को सौंप दी गई।

सूत्र बताते हैं कि रस्तोगी ने विभाग की जब जिम्मेदारी संभाली तो ई-टेंडरिंग में संभावित गड़बड़ियों पर पड़ताल की। उन्हें जब इस बात पर पूरी तरह भरोसा हो गया कि गड़बड़ियां चल रही हैं तो कई अफसरों सहित मुख्यमंत्री कार्यालय तक को अवगत कराया। कई टेंडर निरस्त करने की बात कही, मगर उनकी बात सुनी जाती उससे पहले ही सरकार सकते में आ गई और रस्तोगी पर ही तलवार चला दी गई।

बताते चलें कि मुरैना में भारतीय पुलिस सेवा के अफसर नरेंद्र कुमार को माफियाओं ने ट्रैक्टर से कुचलकर सिर्फ इसलिए मार दिया था क्योकि उन्होंने रेत माफियाओं के खिलाफ मुहिम छेड़ी थी। इसी तरह मुख्यमंत्री के गृह जिले सीहोर से रेत खनन के खिलाफ कार्रवाई करने वाले एक अफसर और एक महिला खनिज अधिकारी को हटाया गया।

जनता के लिए शाजापुर में जिलाधिकारी रहते हुए आईएएस राजीव शर्मा ने काम किया तो उन्हें सचिवालय भेज दिया गया। प्रदेश में इसी तरह के कई मामले हैं जिनमें अफसर ने गड़बड़ी पकड़ी, जनता के लिए काम किया तो उसे इनाम नहीं, सजा मिली।

विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने ई-टेंडरिंग घोटाले के दोषियों को सामने लाने की मांग करते हुए कहा कि घोटाले के राज एक मोबाइल नंबर में छुपे हुए हैं।

नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि इस पूरे घोटाले के तार शीर्ष स्तर पर सरकार को संचालित करने वालों से जुड़े हुए हैं। उन्होंने कहा कि अगर मुख्यमंत्री चौहान वाकई में इस घोटाले को उजागर कर दोषियों को दंडित करना चाहते हैं तो वे मोबाइल नंबर 9582112323 की जांच करवाएं। इस नंबर की कॉल डिटेल की ईमानदारी से जांच हुई तो कई बड़े खुलासे होंगे।

वहीं सरकार के जनसंपर्क मंत्री नरोत्तम मिश्रा ई-टेंडरिंग में किसी भी तरह की गड़बड़ी की बात को नकारते हैं और कहते हैं कि “जो टेंडर हुआ ही नहीं, जिसमें एक पैसे का काम नहीं हुआ, एक पैसे का भुगतान नहीं हुआ, उसमें भ्रष्टाचार कैसे हो गया।”

वहीं, सामाजिक कार्यकर्ता का अक्षय हुंका का कहना है कि राज्य में कुछ लोगों को ताकतवर बनाने का काम किया जा रहा है, जो भी व्यक्ति उनके ताकतवर बनने में बाधक बनता है, उसे हटा दिया जाता है। मनीष रस्तोगी के मामले में भी यही हुआ है, उन्होंने ई-टेंडरिंग की गड़बड़ी को पकड़ा और आशंका तो यहां तक है कि बीते समय में हुए 400 से 500 टेंडरों में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हुई है और रस्तोगी उन गड़बड़ियों तक पहुंच गए होंगे, लिहाजा सरकार को अपनी पोल खुलते दिखी तो उन्हें हटा दिया गया।

संभवता मध्य प्रदेश देश के उन विरले राज्यों में होगा, जहां घोटालेबाजों को संरक्षण देने वालों को नहीं, बल्कि घोटालेबाजी को उजागर करने वालों को सजा मिल रही है। सरकार के इस रवैए में बदलाव नहीं आया तो आगामी चुनाव में सरकार के खाते में क्या आएगा, इसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता।

–आईएएनएस

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