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ज़रा हटके

और कितनी निर्भयाएं..? झकझोरती हकीकत..!

अगर आंकड़ों को देखें तो बेहद चौंकाते हैं। 2017 में ही 19000 हजार से ज्याद दुष्कर्म के मामले हुए। जबकि बीते 5 बरस में बच्चों से दुष्कर्म मामलों में 151 फीसदी बढ़ोतरी हुई है यानी हर दिन करीब 55 बच्चे दुष्कर्म का शिकार होते हैं।

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Picture Credit : thestar

केवल 6 बरस ही तो बीते हैं जब निर्भया कांड से पूरा देश गुस्से में था। अब गुस्से का कारण मंदसौर कांड बन गया है। मंदसौर की आग बुझती कि ठीक चार दिन बाद मप्र के ही सतना के परसमनिया गांव में दुष्कर्म की शिकार चार साल की बालिका गंभीर हालत में मिली। उसे एयरलिफ्ट कर 3 जुलाई को एम्स दिल्ली में भर्ती कराया गया।

दोनों मामलों में पीड़ित बच्चियां सूनी जगहों पर मरणासन्न हालत में मिलीं। दोनों घटनाओं के तीनों आरोपी 20 से 25 साल के आवारा तथा नशे की लत के शिकार नौजवान हैं। यकीनन ये समाज से अलग-थलग होंगे इस कारण भी भयमुक्त होंगे। सोशल थेरेपी की कमीं भी डिप्रेशन या कुंठित मानसिकता के शिकार ऐसे अपराधियों को बढ़ावा देती है, जिससे कई बार गंभीरता को समझते और जानते हुए भी तो कई बार लचर कानून और सजा का भय न होना भी ऐसी घटनाओं का कारण बनते हैं।

अगर आंकड़ों को देखें तो बेहद चौंकाते हैं। 2017 में ही 19000 हजार से ज्याद दुष्कर्म के मामले हुए। जबकि बीते 5 बरस में बच्चों से दुष्कर्म मामलों में 151 फीसदी बढ़ोतरी हुई है यानी हर दिन करीब 55 बच्चे दुष्कर्म का शिकार होते हैं। ये वो हकीकत है जो पुलिस तक पहुंचती है। परंतु ऐसे मामलों का कोई हिसाब नहीं हैए जिनमें मासूमों ने छेड़छाड़ तथा दुष्कर्म से जुड़ी मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना को सहा और मजबूरन चुप रहना पड़ा या डराकर नहीं तो पैसों के बल पर चुप करवा दिया गया।

राष्ट्रीय क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों बताते हैं कि देश के नौनिहालों की सुरक्षा की हालत बेहद खस्ता है। 2010 में दर्ज 5,484 बलात्कार के मामलों की संख्या बढ़कर 2014 में 13,766 हो गई थी। संसद में पेश आंकड़े बेहद चौंकाते हैं। अक्टूबर 2014 तक पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज 6,816 एफआईआर में केवल 166 को ही सजा हो सकी है, जबकि 389 मामले में लोग बरी कर दिए गए, जो 2.4 प्रतिशत से भी कम है।

इसी तरह 2014 तक 5 साल से दर्ज मामलों में 83 फीसदी मामले लंबित थेए जिनमें से 95 फीसदी पॉक्सो के और 88 फीसदी बच्चियों के ‘लाज भंग’ यानी दुष्कर्म के थे। भारतीय दंड संहिता की धारा 354 के तहत महिला की लाज भंग के इरादे से किए गए हमले के 11,335 मामले दर्ज किए गए।

यदि कानून की कमी को दोष दें तो धीमी न्याय प्रक्रिया और सबूतों की मजबूती के तर्क पर कई बार बच जाने वाले जघन्य अपराधों के दोषियों की हरकतें भी नए अपराधों में छिपी होती हैं। लेकिन सवाल फिर वही कि इससे निपटा कैसे जाए? कौन इसके लिए पहल करेगा? किस तरह से तैयारी करनी होगी और तैयारी के बाद अमल में कैसे लाया जाए? लेकिन आज हकीकत ठीक उलट है।

घटना घटने के बाद गुस्सा स्वाभाविक है। लेकिन राजनीतिक रोटी का सेंका जाना जरूर सवालिया है। देखा भी गया है कि ऐसी घटनाओं में राजनीतिकरण के आवरण में असली दर्द छिप जाता है और मरहम के बजाय मातम पुरसी का दौर चल पड़ता है। हालाकि केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इसी 21 अप्रैल को 12 साल से कम उम्र के बच्चों से दुष्कर्म के दोषियों को अदालतों द्वारा मौत की सजा देने संबंधी एक अध्यादेश को मंजूरी दे दी। लेकिन फिर भी घटनाएं हैं कि थम नहीं रही हैं।

निर्भया कांड के बाद 2013-14 में निर्भया फंड बनाया गया। सरकार ने 1 हजार करोड़ रुपये से शुरुआत की। 2014-15 में इसमें फिर 1 हजार करोड़ और डाले। 2015-16 में कुछ नहीं दिया, जबकि 2016-17 में रकम घटाकर 550 करोड़ कर दी गई। केवल 2016 में महज 191 करोड़ रुपये खर्चे गए, जबकि 2017-18 में इसमें साढ़े 500 करोड़ रुपये और इस साल 500 करोड़ डाले गए।

इस तरह कुल मिलाकर यह फंड 3409 करोड़ रुपये का हो गया, जिसका कोई इस्तेमाल नहीं किया गया, जबकि इससे पूरे देश में 660 उज्ज्वला वन स्टॉप सेंटर बनने थे, जिसमें पीड़ितों का इलाज भी हो। चप्पे-चप्पे पर सीसीटीवी लगें, उन्हें कानूनी और आर्थिक मदद मिले और पहचान भी छुपी रहे। लेकिन हकीकत उलट है। आम लोगों को इस बारे में पता तक नहीं कि कितने सेंटर कहां-कहां हैं!

सुप्रीम कोर्ट भी इस पर केंद्र व सभी राज्यों से पूछ चुका है कि निर्भया फंड का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा रहा है, नोडल अथॉरिटी के रूप में महिला एवं बाल विकास मंत्रालयए महिला उत्थान व सुरक्षा के लिए खर्च की छूट के बावजूद केवल 600 करोड़ खर्च करने और 2400 करोड़ बचे रहने का ठोस जवाब नहीं दे पाया।

चाहे दिल्ली, मंदसौर, सतना सहित न जाने कितनी अनाम निर्भया हों या मुंबई की नर्स अरुणा शानबाग हो जो सहकर्मी की यौन प्रताड़ना से बचने के खातिर उसके गुस्से का ऐसा शिकार हुई कि 23 नवंबर, 1973 को कोमा में पहुंचने के बाद 19 मई, 2015 को मौत होने तक लगातार 42 साल रोज मरकर भी जिंदा रही।

ऐसे अपराधों को रोकने के लिए फंड तो है, लेकिन बेहद कठोर कानून, फास्ट ट्रैक अदालतें उससे जरूरी हैं, ताकि यौन तथा बाल अपराधियों पर लगाम लगा सके। अपराधियों में खौफ पैदा हो, वरना यह सवाल बना ही रहेगा और कितनी निर्भयाएं?

ऋतुपर्ण दवे 

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार हैं)

–आईएएनएस

ज़रा हटके

यहां खाने में डाला जाता है सोना…

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फाइल फोटो

पूरब के हमारे पड़ोसी देश म्यांमार को कभी बर्मा कहा जाता था। पर, पूर्वी एशियाई देशों के बीच ये स्वर्णभूमि के तौर पर काफी मशहूर है। आप बर्मा या म्यांमार के शहरों के ऊपर से गुजरें तो पूरी जमीन के ऊपर सुनहरी चादर सी तनी दिखाई देती है। सुनहरे स्तूप, मंदिर और पगोड़ा ही नजर आते हैं। फिर चाहे शहरों की व्यस्त सड़कें हों या गांव के शांत इलाके।

आपको यहां कदम-कदम पर सुनहरे बौद्ध मंदिर दिखाई पड़ेंगे। सबसे बड़े मंदिर तो पहाड़ों पर स्थित हैं। वहीं छोटे-छोटे मंदिर पुराने पेड़ों के नीचे या लोगों के घरों के सामने बने दिखते हैं। यूं कहें कि हर तरफ सोना ही सोना दिखाई पड़ता है।

यहां पहाड़ों पर बने विशाल बौद्ध मंदिर, बूंदों से भरे बादल, दूर-दूर तक फैले जंगल और किनारों पर स्थित छोटे-बड़े मकान ऐसे लगते हैं मानो किसी कलाकार ने कूची से एक कृति रच दी हो।

मांडले बिजनेस फोरम के मुताबिक, मांडले के आस-पास की पहाड़ियों पर ही सात सौ से ज्यादा स्वर्ण मंदिर हैं। इन्हें इरावदी नदी की लहरों पर तैरते हुए देखा जा सकता है। बगान नाम के शहर के इर्द-गिर्द तो 2200 से ज्यादा मंदिरों और पगोडा के खंडहर बिखरे हुए हैं।

11वीं से 13वीं सदी के बीच पगान साम्राज्य के दौर में यहां दस हजार से ज्यादा मंदिर हुआ करते थे। इसी दौर में बौद्ध धर्म का विस्तार पूरे म्यांमार में हो रहा था। हालांकि बौद्ध धर्म ने बर्मा की धरती पर दो हजार साल पहले ही कदम रख दिए थे।

मांडले के पेशेवर गाइड सिथु हतुन कहते हैं कि बर्मा की संस्कृति में सोने की बहुत अहमियत है। यहां अभी भी परंपरागत तरीके से ही सोने को तरह-तरह के रंग-रूप में ढाला जाता है। इस बात का खास ख्याल रखा जाता है कि सोना पूरी तरह से शुद्ध है। 24 कैरेट गोल्ड है।

बांस की पत्तियों के बीच में सोने को रखकर सौ से दो सौ परतें तैयार की जाती हैं। फिर इन्हें ढाई किलो के हथौड़ों से करीब 6 घंटे तक पीटा जाता है। ताकि ये सही आकार ले सकें। फिर इन्हें पतले-छोटे एक एक इंच के टुकड़ों में काटा जाता है। सोने की ये पत्तियां मंदिरों में चढ़ाई जाती हैं। सोने का इस्तेमाल परंपरागत दवाओं में भी होता है। यही नहीं, यहां की स्थानीय शराब में भी सोने के ये पत्तर डाले जाते हैं।

म्यांमार में सोने को बहुत पवित्र माना जाता है। यहां की 90 फीसदी आबादी बौद्ध है। बौद्ध धर्म में सोने को बहुत अहमियत दी जाती है, क्योंकि सोने को सूरज का प्रतीक माना जाता है और सूरज ज्ञान और बुद्धि की नुमाइंदगी करता है।

बर्मा के लोग मंदिरों को सोने से सजाकर बुद्ध को अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं। सिथु हतुन कहते है कि खास मौकों पर बनने वाले चावल और सब्जियों में भी सोने के टुकड़े डाले जाते हैं। लड़कियां सोने से श्रृंगार करने के अलावा केले और सोने के बने हुए फेस मास्क से चेहरे भी चमकाती हैं।

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ज़रा हटके

सबसे ज्यादा सोना निकालती है ये कंपनी…

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प्रतीकात्मक तस्वीर

कनाडा की बैरिक गोल्ड कॉपोरेशन दुनिया में सबसे ज्यादा सोना निकालने वाली कंपनी है। इस कंपनी की बाजार में वैल्यू 18,000 मिलियन डॉलर है। इसने हाल ही में जर्सी स्थित रैंडगोल्ड कंपनी को खरीदा है जो खासकर माली में सोना खुदाई का काम करती है। कनाडा की राजधानी टोरंटो में बैरिक गोल्ड का मुख्यालय है। वहीं इसका सबसे बड़ा माइनिंग कॉम्प्लेक्स अमरीका के शहर नवाडा में है।

बता दें कि ये कंपनी 10 देशों से सोना निकालने का काम करती है। साल 2017 में इसने 10 टन सोना निकाला और 1400 मिलियन अमरीकी डॉलर का शुद्ध लाभ कमाया। बैरिक गोल्ड और रैंडगोल्ड का विलय अगले साल की पहली तिमाही में पूरा होगा लेकिन इस विलय के साथ ही कंपनी को वैश्विक बाज़ार की चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।

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ज़रा हटके

ये है दुनिया का सबसे खतरनाक लाई डिटेक्टर टेस्ट…

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‘लाई डिटेक्टर टेस्ट’ एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके तहत अपराधियों से सच उगलवाया के लिए मशीन का सहारा लिया जाता है। ये मशीने आधुनिक युग की देन है, लेकिन आपको यह जानकर काफी हैरानी होगी कि लाई डिटेक्टर टेस्ट का इस्तेमाल इंसान सैंकड़ों सालों कर रहा है। जी हां, मशीनों के अभाव में सैंकड़ों साल पहले से मिस्र में लाई डिटेक्टर टेस्ट का इस्तेमाल किया जा रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो मिस्त्र का ‘अयिदाह कबीला’ सदियों से इस लाई डिटेक्टर टेस्ट का इस्तेमाल कर रहा है, लेकिन जब आप झूठ पकड़ने वाले इनके तरीके के बारे में जान लेंगे तो खौफ से आपके भी रोंगटे खड़े हो जाएंगे। जी हां, यह तरीका बेहद डरावना है। खास बात ये है कि ये समुदाय आज भी लाई डिटेक्टर की इस पुरानी तकनीक का इस्तेमाल कर रहा है।

झूठ पकड़ने का यहां जो तरीका अपनाया जाता है उसके तहत अयिदाह कबीले के लोग एक धातु को पहले गरम करते हैं। इसके बाद में उस धातु को आरोपी की जीभ पर लगाते हैं। माना जाता है कि जिस आरोपी की जीभ पर इस प्रक्रिया के बाद फफोले पड़ जाते हैं, उसे दोषी मान लिया जाता है। इसे एक परम्परा का नाम दिया गया है जिसे ‘बिशाह’ कहा जाता है। मिस्र के कबीलों में पुराने समय में लाई डिटेक्टर टेस्ट करने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है।

हालांकि आज अधिकतर कबीलों में यह परंपरा बंद हो चुकी है, लेकिन एक कबीला अब भी इसका इस्तेमाल कर रहा है। जी हां, अयिदाह कबीला इस परंपरा का इस्तेमाल कर रहा है। अल अरबिया डॉट नेट की खबर के मुताबिक, इस परंपरा के तहत अयिदाह कबीले के लोग एक लोहे की छड़ को पहले गरम करते हैं और उसके बाद उस छड़ को आरोपी की जीभ पर लगाते हैं। इसके बाद दोषी का दोष सिद्ध होता है। इसके लिए इनका लॉजिक भी गजब का है। आप इसके बारे में सोच भी नहीं सकते।

जी हां, इस प्रक्रिया के तहत जिस व्यक्ति की जीभ पर फफोले नहीं पड़ते वह निर्दोष साबित होता है। इस परंपरा को मानने वाले लोगों का कहना है कि जिस व्यक्ति ने अपराध किया होता है, वो नर्वस होता है, जिससे उसकी जीभ सूख जाती है और जब गरम धातु की छड़ उसकी जीभ से छूती है तो उस पर फफोले पड़ जाते हैं। वहीं जो व्यक्ति निर्दोष होता है, उसकी जीभ पर सलाइवा होता है और जब छड़ उससे छूती है तो कुछ नहीं होता।

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